04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1411–1420

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1411–1420

पृष्ठ 1411

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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः दुःशासन और सहदेवका, कर्ण और भीमसेनका तथा द्रोणाचार्य और अर्जुनका घोर युद्ध संजय उवाच

ततो दुःशासनः क्रुद्धः सहदेवमुपाद्रवत् ।

रथवेगेन तीव्रेण कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर अपने रथके तीव्र वेगसे पृथ्वीको कँपाते हुए - से दुःशासनने कुपित होकर सहदेवपर आक्रमण किया ॥ १ ॥

तस्यापतत एवाशु भल्लेनामित्रकर्शनः ।

माद्रीपुत्रः शिरो यन्तुः सशिरस्त्राणमच्छिनत् ॥ २ ॥

उसके आते ही शत्रुसूदन माद्रीकुमार सहदेवने शीघ्र ही एक भल्ल मारकर दुःशासनके सारथिका मस्तक शिरस्त्राणसहित काट डाला ॥ २ ॥

नैनं दुःशासनः सूतं नापि कश्चन सैनिकः ।

कृत्तोत्तमाङ्गमाशुत्वात् सहदेवेन बुद्धवान् ॥ ३ ॥

इस कार्यमें उन्होंने ऐसी फुर्ती दिखायी कि न तो दुःशासन और न दूसरा ही कोई सैनिक इस बातको जान सका कि सहदेवने सारथिका सिर काट डाला है ॥ ३ ॥

यदा त्वसंगृहीतत्वात् प्रयान्त्यश्वा यथासुखम् ।

ततो दुःशासनः सूतं बुबुधे गतचेतसम् ॥ ४ ॥

जब रास छूट जानेके कारण घोड़े अपनी मौजसे इधर- उधर भागने लगे, तब दुःशासनको यह ज्ञात हुआ कि मेरा सारथि मारा गया ॥ ४ ॥

स हयान् संनिगृह्याजौ स्वयं हयविशारदः ।

युयुधे रथिनां श्रेष्ठो लघु चित्रं च सुष्ठु च ॥ ५ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ दुःशासन अश्व संचालनकी कलामें निपुण था । वह रणभूमिमें स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें करके शीघ्रतापूर्वक विचित्र रीतिसे अच्छी तरह युद्ध करने लगा ॥ ५ ॥

तदस्यापूजयन् कर्म स्वे परे चापि संयुगे ।

हतसूतरथेनाजौ व्यचरद् यदभीतवत् ॥ ६ ॥

सारथिके मारे जानेपर भी दुःशासन उस रथके द्वारा युद्धभूमिमें निर्भय-सा विचरता रहा; उसके इस कर्मकी अपने और शत्रुपक्षके लोगोंने भी प्रशंसा की ॥

सहदेवस्तु तानश्वांस्तीक्ष्णैर्बाणैरवाकिरत् ।

पीड्यमानाः शरैश्चाशु प्राद्रवंस्ते ततस्ततः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1412

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सहदेव उन घोड़ोंपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। उन बाणोंसे पीड़ित हुए वे घोड़े शीघ्र ही इधर - उधर भागने लगे ॥ ७ ॥

स रश्मिषु विषक्तत्वादुत्ससर्ज शरासनम् ।

धनुषा कर्म कुर्वंस्तु रश्मींश्च पुनरुत्सृजत् ॥ ८ ॥

दुःशासन जब घोड़ोंकी रास सँभालने लगता तो धनुष छोड़ देता और जब धनुषसे काम लेता तो विवश होकर घोड़ोंकी रास छोड़ देता था ॥ ८ ॥

छिद्रेष्वेतेषु तं बाणैर्माद्रीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् ।

परीप्संस्त्वत्सुतं कर्णस्तदन्तरमवाप तत् ॥ ९ ॥

उसकी दुर्बलताके इन्हीं अवसरोंपर माद्रीकुमार सहदेव उसे बाणोंसे ढक देते थे । उस समय आपके पुत्रकी रक्षाके लिये कर्ण बीचमें कूद पड़ा ॥ ९ ॥

वृकोदरस्ततः कर्णं त्रिभिर्भल्लैः समाहितः ।

आकर्णपूर्णैरभ्यघ्नद् बाह्वोरुरसि चानदत् ॥ १० ॥

तब भीमसेनने भी सावधान होकर धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये तीन भल्लोंद्वारा कर्णकी दोनों भुजाओं और छातीमें गहरी चोट पहुँचायी । फिर वे जोर- जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १० ॥

सनिवृत्तस्ततः कर्णः संघट्टित इवोरगः ।

भीममावारयामास विकिरन् निशितान् शरान् ॥ ११ ॥

तदनन्तर पैरोंसे कुचले गये सर्पके समान कुपित हो कर्ण लौट पड़ा और तीखे बाणोंकी वर्षा करके भीमको रोकने लगा ॥ ११ ॥

ततोऽभूत् तुमुलं युद्धं भीमराधेययोस्तदा ।

तौ वृषाविव नर्दन्तौ विवृत्तनयनावुभौ ॥ १२ ॥

फिर तो भीमसेन और राधापुत्र कर्णमें घोर युद्ध होने लगा। दोनों ही एक- दूसरेकी ओर विकृत दृष्टिसे देखते हुए साँड़ोंके समान गर्जने लगे ॥ १२ ॥

वेगेन महतान्योन्यं संरब्धावभिपेततुः ।

अभिसंश्लिष्टयोस्तत्र तयोराहवशौण्डयोः ॥ १३ ॥

विच्छिन्नशरपातत्वाद् गदायुद्धमवर्तत । फिर दोनों परस्पर अत्यन्त कुपित हो बड़े वेगसे टूट पड़े । उन युद्धकुशल योद्धाओंके परस्पर अत्यन्त निकट आ जानेके कारण उनके बाण चलानेका क्रम टूट गया; इसलिये उनमें गदायुद्ध आरम्भ हो गया ॥ १३३ ॥

गदया भीमसेनस्तु कर्णस्य रथकूबरम् ॥ १४ ॥

बिभेद शतधा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् । राजन्! भीमसेनने अपनी गदासे कर्णके रथका कूबर तोड़कर उसके सौ टुकड़े कर दिये, वह अद्भुत- सा कार्य हुआ ॥ १४३ ॥

पृष्ठ 1413

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ततो भीमस्य राधेयो गदामाविध्य वीर्यवान् ॥ १५ ॥

अवासृजद् रथे तां तु बिभेद गदया गदाम् । फिर पराक्रमी राधापुत्र कर्णने भीमकी ही गदा उठा ली और उसे घुमाकर उन्हींके रथपर फेंका; किंतु भीमने दूसरी गदासे उस गदाको तोड़ डाला ॥ १५३ ॥

ततो भीमः पुनर्गुर्वी चिक्षेपाधिरथेर्गदाम् ॥ १६ ॥

तां गदां बहुभिः कर्णः सुपुङ्खैः सुप्रवेजितैः ।

प्रत्यविध्यत् पुनश्चान्यैः सा भीमं पुनराव्रजत् ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने अधिरथपुत्र कर्णपर पुनः एक भारी गदा छोड़ी । परंतु कर्णने तेज किये हुए सुन्दर पंखवाले दूसरे दूसरे बहुत- से बाण मारकर उस गदाको बींध डाला । इससे वह पुनः भीमपर ही लौट आयी ॥

व्यालीव मन्त्राभिहता कर्णबाणैरभिद्रुता ।

तस्याः प्रतिनिपातेन भीमस्य विपुलो ध्वजः ॥ १८ ॥

पपात सारथिश्चास्य मुमोह च गदाहतः । कर्णके बाणोंसे आहत हो वह गदा मन्त्रसे मारी गयी सर्पिणीके समान लौटकर भीमसेनके ही रथपर गिरी । उसके गिरनेसे भीमसेनकी विशाल ध्वजा धराशायी हो गयी और उस गदाकी चोट खाकर उनका सारथि भी मूर्च्छित हो गया ॥ १८३ ॥

स कर्णं सायकानष्टौ व्यसृजत् क्रोधमूर्च्छितः ॥ १ ९ ॥

तैस्तस्य निशितैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनो महाबलः ।

चिच्छेद परवीरघ्नः प्रहसन्निव भारत ॥ २० ॥

ध्वजं शरासनं चैव शरावापं च भारत । तब क्रोधसे व्याकुल हुए भीमसेनने कर्णको आठ बाण मारे। भारत! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली भीमसेनने हँसते हुए- से उन तेज धारवाले तीखे बाणोंद्वारा कर्णके ध्वज, धनुष और तरकसको काट गिराया ॥ १ ९ -२० ॥ कर्णोऽप्यन्यद् धनुर्गृह्य हेमपृष्ठं दुरासदम् ॥ २१ ॥

ततः पुनस्तु राधेयो हयानस्य रथेषुभिः ।

ऋक्षवर्णाञ्जघानाशु तथोभौ पार्ष्णिसारथी ॥ २२ ॥

तत्पश्चात् राधापुत्र कर्णने पुनः सोनेकी पीठवाला दूसरा दुर्जय धनुष हाथमें लेकर रथपर रखे हुए बाणोंद्वारा भीमसेनके रीछके समान रंगवाले काले घोड़ों और दोनों पार्श्वरक्षकोंको शीघ्र ही मार डाला ॥ २१-२२ ॥

स विपन्नरथो भीमो नकुलस्याप्लुतो रथम् ।

हरिर्यथा गिरेः शृङ्गं समाक्रामदरिंदमः ॥ २३ ॥

इस तरह रथ नष्ट हो जानेसे शत्रुदमन भीमसेन जैसे सिंह पर्वतके शिखरपर चढ़ जाता है, उसी प्रकार उछलकर नकुलके रथपर जा बैठे ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1414

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तथा द्रोणार्जुनौ चित्रमयुध्येतां महारथौ ।

आचार्यशिष्यौ राजेन्द्र कृतप्रहरणौ युधि ॥ २४ ॥

राजेन्द्र! इसी प्रकार उस युद्धस्थलमें आचार्य और शिष्य महारथी द्रोण तथा अर्जुन परस्पर प्रहार करते हुए विचित्र रीतिसे युद्ध कर रहे थे ॥ २४ ॥

लघुसंधानयोगाभ्यां रथयोश्च रणेन च ।

मोहयन्तौ मनुष्याणां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ २५ ॥

शीघ्रतापूर्वक बाणोंके संधान और रथोंके योगसे अपने संग्रामद्वारा वे दोनों वीर लोगोंके नेत्रों और मनको भी मोह लेते थे ॥ २५ ॥

उपारमन्त ते सर्वे योधा भरतसत्तम ।

अदृष्टपूर्वं पश्यन्तस्तद् युद्धं गुरुशिष्ययोः ॥ २६ ॥

भरतश्रेष्ठ! गुरु और शिष्यके उस अपूर्व युद्धको देखते हुए सब योद्धा संग्रामसे विरत हो गये ॥ २६ ॥

विचित्रान् पृतनामध्ये रथमार्गानुदीर्य तौ ।

अन्योन्यमपसव्यं च कर्तुं वीरौ तदेषतुः ॥ २७ ॥

वे दोनों वीर सेनाके बीचमें रथके विचित्र पैंतरे प्रकट करते हुए उस समय एक- दूसरेको दायें कर देनेकी चेष्टा करने लगे ॥ २७ ॥

पराक्रमं तयोर्योधा ददृशुस्ते सुविस्मिताः ।

तयोः समभवद् युद्धं द्रोणपाण्डवयोर्महत् ॥ २८ ॥

आमिषार्थे महाराज गगने श्येनयोरिव । उन द्रोणाचार्य और पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको वे सब सैनिक अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे । महाराज! जैसे मांसके टुकड़ेके लिये आकाशमें दो बाज लड़ रहे हों, उसी प्रकार राज्यके लिये उन दोनों गुरु- शिष्योंमें बड़ा भारी युद्ध हो रहा था ॥ २८३ ॥

यद् यच्चकार द्रोणस्तु कुन्तीपुत्रजिगीषया ॥ २ ९ ॥ तत् तत् प्रतिजघानाशु प्रहसंस्तस्य पाण्डवः । द्रोणाचार्य कुन्तीपुत्र अर्जुनको जीतनेकी इच्छासे जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस--उसको पाण्डुपुत्र अर्जुन हँसते हुए तत्काल काट देते थे ॥ २ ९ ३ ॥ यदा द्रोणो न शक्नोति पाण्डवं स्म विशेषितुम् ॥ ३० ॥

ततः प्रादुश्चकारास्त्रमस्त्रमार्गविशारदः । जब द्रोणाचार्य पाण्डुपुत्र अर्जुनकी अपेक्षा अपनी विशेषता न सिद्ध कर सके, तब अस्त्रमार्गोंके ज्ञाता गुरुदेवने दिव्यास्त्रोंको प्रकट किया ॥ ३० ॥

ऐन्द्रं पाशुपतं त्वाष्ट्रं वायव्यमथ वारुणम् ॥ ३१ ॥

मुक्तं मुक्तं द्रोणचापात् तज्जघान धनंजयः ।

पृष्ठ 1415

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द्रोणाचार्यके धनुषसे क्रमश: छूटे हुए ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र, वायव्य तथा वारुण नामक अस्त्रको अर्जुनने तत्काल शान्त कर दिया ॥ ३१३ ॥

अस्त्राण्यस्त्रैर्यदा तस्य विधिवद्धन्ति पाण्डवः ॥ ३२ ॥

ततोऽस्त्रैः परमैर्दिव्यैर्द्रोणः पार्थमवाकिरत् । जब पाण्डुकुमार अर्जुन आचार्यके सभी अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक नष्ट करने लगे, तब द्रोणने परम दिव्य अस्त्रोंद्वारा अर्जुनको ढक दिया ॥ ३२ ॥

यद् यदस्त्रं स पार्थाय प्रयुङ्क्ते विजिगीषया ॥ ३३ ॥

तस्य तस्य विघाताय तत् तद्धि कुरुतेऽर्जुनः । परंतु विजयकी इच्छासे वे पार्थपर जिस -जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस - उसके विनाशके लिये अर्जुन वैसे ही अस्त्रोंका प्रयोग करते थे ॥ ३३३ ॥

स वध्यमानेष्वस्त्रेषु दिव्येष्वपि यथाविधि ॥ ३४ ॥

अर्जुनेनार्जुनं द्रोणो मनसैवाभ्यपूजयत् । जब अर्जुनके द्वारा उनके विधिपूर्वक चलाये हुए दिव्यास्त्र भी प्रतिहत होने लगे, तब द्रोणने अर्जुनकी मन- ही- मन सराहना की ॥ ३४ ॥

मेने चात्मानमधिकं पृथिव्यामधि भारत ॥ ३५ ॥

तेन शिष्येण सर्वेभ्यः शस्त्रविद्भ्यः परंतपः । भारत! शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य उस शिष्यके द्वारा अपने - आपको भूमण्डलके सभी शस्त्रवेत्ताओंसे श्रेष्ठ मानने लगे ॥ ३५३ ॥

वार्यमाणस्तु पार्थेन तथा मध्ये महात्मनाम् ॥ ३६ ॥

यतमानोऽर्जुनं प्रीत्या प्रत्यवारयदुत्स्मयन् । महामनस्वी वीरोंके बीचमें अर्जुनके द्वारा इस प्रकार रोके जाते हुए द्रोणाचार्य प्रयत्न करके प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए स्वयं भी अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३६३ ॥

ततोऽन्तरिक्षे देवाश्च गन्धर्वाश्च सहस्रशः ॥ ३७ ॥

ऋषयः सिद्धसंघाश्च व्यतिष्ठन्त दिदृक्षया । तदनन्तर वह युद्ध देखनेकी इच्छासे आकाशमें बहुत- से देवता, सहस्रों गन्धर्व, ऋषि और सिद्धसमुदाय खड़े हो गये ॥ ३७ ॥

तदप्सरोभिराकीर्णं यक्षगन्धर्वसंकुलम् ॥ ३८ ॥

श्रीमदाकाशमभवद् भूयो मेघाकुलं यथा । अप्सराओं, यक्षों और गन्धर्वोंसे भरा हुआ आकाश ऐसी विशिष्ट शोभा पा रहा था, मानो उसमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो ॥ ३८३ ॥

तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुनः पुनः ॥ ३ ९ ॥ द्रोणपार्थस्तवोपेता व्यश्रूयन्त नराधिप ।

पृष्ठ 1416

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नरेश्वर! वहाँ द्रोणाचार्य और अर्जुनकी स्तुतिसे युक्त अदृश्य व्यक्तियोंके मुखोंसे निकली हुई बातें बारंबार सुनायी देने लगीं ॥ ३ ९ ॥ विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालयत्सु दिशो दश ॥ ४० ॥

अब्रुवंस्तत्र सिद्धाश्च ऋषयश्च समागताः । जब दिव्यास्त्रोंके प्रयोग होने लगे और उनके तेजसे दसों दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, उस समय आकाशमें एकत्र हुए सिद्ध और ऋषि इस प्रकार वार्तालाप करने लगे— ॥ ४० ३ ॥ नैवेदं मानुषं युद्धं नासुरं न च राक्षसम् ॥। ४१ ॥

न दैवं न च गान्धर्वं ब्राह्मं ध्रुवमिदं परम् ।

विचित्रमिदमाश्चर्यं न नो दृष्टं न च श्रुतम् ॥ ४२ ॥

'यह युद्ध न तो मनुष्योंका है, न असुरोंका, न राक्षसोंका है और न देवताओं एवं गन्धर्वोंका ही । निश्चय ही यह परम उत्तम ब्राह्म युद्ध है । ऐसा विचित्र एवं आश्चर्यजनक संग्राम हमलोगोंने न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ४१-४२ ॥

अति पाण्डवमाचार्यो द्रोणं चाप्यति पाण्डवः ।

नानयोरन्तरं शक्यं द्रष्टुमन्येन केनचित् ॥ ४३ ॥

‘ आचार्य द्रोण पाण्डुपुत्र अर्जुनसे बढ़कर हैं और पाण्डुपुत्र अर्जुन भी आचार्य द्रोणसे बढ़कर हैं । इन दोनोंमें कितना अन्तर है, इसे दूसरा कोई नहीं देख सकता ॥

यदि रुद्रो द्विधाकृत्य युध्येतात्मानमात्मना ।

तत्र शक्योपमा कर्तुमन्यत्र तु न विद्यते ॥ ४४ ॥

‘ यदि भगवान् शंकर अपने दो रूप बनाकर स्वयं ही अपने साथ युद्ध करें तो उसी युद्धसे इनकी उपमा दी जा सकती है और कहीं इन दोनोंकी समता नहीं है ॥ ४४ ॥

ज्ञानमेकस्थमाचार्ये ज्ञानं योगश्च पाण्डवे ।

शौर्यमेकस्थमाचार्ये बलं शौर्यं च पाण्डवे ॥ ४५ ॥

‘ आचार्य द्रोणमें सारा ज्ञान एकत्र संचित है; परंतु पाण्डुपुत्र अर्जुनमें ज्ञानके साथ- साथ योग भी है । इसी प्रकार आचार्य द्रोणमें सारा शौर्य एक स्थानपर आ गया है; परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुनमें शौर्यके साथ बल भी है ॥ ४५ ॥

मौ शक्यौ महेष्वासौ युद्धे क्षपयितुं परैः ।

इच्छमानौ पुनरिमौ हन्येतां सामरं जगत् ॥ ४६ ॥

' ये दोनों महाधनुर्धर वीर युद्धमें दूसरे किन्हीं योद्धाओंके द्वारा नहीं मारे जा सकते । परंतु यदि ये दोनों चाहें तो देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्का विनाश कर सकते हैं ' ॥ ४६ ॥

इत्यब्रुवन् महाराज दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ ।

अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सर्वशः ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1417

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महाराज! उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको देखकर आकाशमें छिपे हुए तथा प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले प्राणी भी सब ओर यही बातें कह रहे थे ॥ ४७ ॥

ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं प्रादुश्चक्रे महामतिः ।

संतापयन् रणे पार्थं भूतान्यन्तर्हितानि च ॥ ४८ ॥

तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् द्रोणाचार्यने रणभूमिमें अर्जुनको तथा आकाशवर्ती अदृश्य प्राणियोंको संताप देते हुए ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ॥ ४८ ॥

ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।

ववौ च विषमो वायुः सागराश्चापि चुक्षुभुः ॥ ४ ९ ॥

फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित धरती डोलने लगी, आँधी उठ गयी और समुद्रोंमें ज्वार आ गया ॥ ४ ९ ॥

ततस्त्रासो महानासीत् कुरुपाण्डवसेनयोः ।

सर्वेषां चैव भूतानामुद्यतेऽस्त्रे महात्मना ॥ ५० ॥

महामना द्रोणके द्वारा ब्रह्मास्त्रके उठाये जाते ही कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंपर तथा समस्त प्राणियोंमें बड़ा भारी आतंक छा गया ॥ ५० ॥

ततः पार्थोऽप्यसम्भ्रान्तस्तदस्त्रं प्रतिजघ्निवान् ।

ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ततः सर्वमशीशमत् ॥ ५१ ॥

राजेन्द्र! तब अर्जुनने भी बिना किसी घबराहटके ब्रह्मास्त्रसे ही द्रोणाचार्यके उस अस्त्रको दबा दिया; फिर सारा उपद्रव शान्त हो गया ॥ ५१ ॥

यदा न गम्यते पारं तयोरन्यतरस्य वा ।

ततः संकुलयुद्धेन तद् युद्धं व्याकुलीकृतम् ॥ ५२ ॥

जब द्रोणाचार्य और अर्जुनमेंसे कोई भी किसीको परास्त न कर सका, तब सामूहिक युद्धके द्वारा उस संग्रामको व्यापक बना दिया गया ॥ ५२ ॥

नाज्ञायत ततः किंचित् पुनरेव विशाम्पते ।

प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवयोर्मृधे ॥ ५३ ॥

प्रजानाथ! रणभूमिमें द्रोणाचार्य और अर्जुनमें घमासान युद्ध छिड़ जानेपर फिर किसीको कुछ सूझ नहीं रहा था ॥ ५३ ॥

(द्रोणो मुक्त्वा रणे पार्थं पञ्चालानन्वधावत ।

अर्जुनोऽपि रणे द्रोणं त्यक्त्वा प्राद्रावयत् कुरून् ॥

द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें अर्जुनको छोड़कर पांचालोंपर धावा किया और अर्जुनने भी वहाँ द्रोणाचार्यका मुकाबला छोड़कर कौरव- सैनिकोंको वेगपूर्वक खदेड़ना आरम्भ किया । शरौघैरथ ताभ्यां तु छायाभूतं महामृधे । तुमुलं प्रबभौ राजन् सर्वस्य जगतो भयम् ॥ )

पृष्ठ 1418

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राजन्! उस महासमरमें उन दोनोंने अपने बाणसमूहोंद्वारा सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न कर दिया । वह तुमुल युद्ध सम्पूर्ण जगत्के लिये भयदायक प्रतीत हो रहा था ।

शरजालैः समाकीर्णे मेघजालैरिवाम्बरे ।

नापतच्च ततः कश्चिदन्तरिक्षचरस्तदा ॥ ५४ ॥

आकाशमें इस प्रकार बाणोंका जाल बिछ गया, मानो वहाँ मेघोंकी घटा घिर आयी हो ।

इससे वहाँ उस समय कोई आकाशचारी पक्षी भी कहीं उड़कर न जा सका ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें घमासान युद्धविषयक एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८८ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 1419

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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः धृष्टद्युम्नका दुःशासनको हराकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण, नकुल सहदेवद्वारा उनकी रक्षा, दुर्योधन तथा सात्यकिका संवाद तथा युद्ध, कर्ण और भीमसेनका संग्राम और अर्जुनका कौरवोंपर आक्रमण संजय उवाच

तस्मिंस्तथा वर्तमाने गजाश्वनरसंक्षये ।

दुःशासनो महाराज धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! इस प्रकार हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार करनेवाले उस वर्तमान युद्धमें दुःशासन धृष्टद्युम्नके साथ जूझने लगा ॥ १ ॥

स तु रुक्मरथासक्तो दुःशासनशरार्दितः ।

अमर्षात् तव पुत्रस्य शरैर्वाहानवाकिरत् ॥ २ ॥

धृष्टद्युम्न पहले द्रोणाचार्यके साथ उलझे हुए थे, दुःशासनके बाणोंसे पीड़ित होकर उन्होंने आपके पुत्रके घोड़ोंपर रोषपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥

क्षणेन स रथस्तस्य सध्वजः सहसारथिः ।

नादृश्यत महाराज पार्षतस्य शरैश्चितः ॥ ३ ॥

महाराज! एक ही क्षणमें धृष्टद्युम्नके बाणोंका ऐसा ढेर लग गया कि दुःशासनका रथ ध्वजा और सारथिसहित अदृश्य हो गया ॥ ३ ॥

दुःशासनस्तु राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ।

नाशकत् प्रमुखे स्थातुं शरजालप्रपीडितः ॥ ४ ॥

राजेन्द्र! महामना धृष्टद्युम्नके बाणसमूहोंसे अत्यन्त पीड़ित हो दुःशासन उनके सामने ठहर न सका ॥ ४ ॥

स तु दुःशासनं बाणैर्विमुखीकृत्य पार्षतः ।

किरन् शरसहस्राणि द्रोणमेवाभ्ययाद् रणे ॥ ५ ॥

इस प्रकार अपने बाणोंद्वारा दुःशासनको सामनेसे भगाकर सहस्रों बाणोंकी वर्षा करते हुए धृष्टद्युम्नने रणभूमिमें पुनः द्रोणाचार्यपर ही आक्रमण किया ॥ ५ ॥

अभ्यपद्यत हार्दिक्यः कृतवर्मा त्वनन्तरम् ।

सोदर्याणां त्रयश्चैव त एनं पर्यवारयन् ॥ ६ ॥

यह देख हृदिकपुत्र कृतवर्मा तथा दुःशासनके तीन भाई बीचमें आ धमके । वे चारों मिलकर धृष्टद्युम्नको रोकने लगे ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1420

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तं यमौ पृष्ठतोऽन्वैतां रक्षन्तौ पुरुषर्षभौ ।

द्रोणायाभिमुखं यान्तं दीप्यमानमिवानलम् ॥ ७ ॥

प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी धृष्टद्युम्नको द्रोणाचार्यके सम्मुख जाते देख नरश्रेष्ठ नकुल और सहदेव उनकी रक्षा करते हुए पीछे - पीछे चले ॥ ७ ॥

सम्प्रहारमकुर्वंस्ते सर्वे च सुमहारथाः ।

अमर्षिताः सत्त्ववन्तः कृत्वा मरणमग्रतः ॥ ८ ॥

उस समय अमर्षसे भरे हुए उन सभी धैर्यशाली महारथियोंने मृत्युको सामने रखकर परस्पर युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ८ ॥

शुद्धात्मानः शुद्धवृत्ता राजन् स्वर्गपुरस्कृताः ।

आर्यं युद्धमकुर्वन्त परस्परजिगीषवः ॥ ९ ॥

राजन्! उन सबके हृदय शुद्ध और आचार- व्यवहार निर्मल थे । वे सभी स्वर्गकी प्राप्तिरूप लक्ष्यको अपने सामने रखते थे; अतः परस्पर विजयकी अभिलाषासे वे आर्यजनोचित युद्ध करने लगे ॥ ९ ॥

शुक्लाभिजनकर्माणो मतिमन्तो जनाधिप ।

धर्मयुद्धमयुध्यन्त प्रेप्सन्तो गतिमुत्तमाम् ॥ १० ॥

जनेश्वर! उन सबके वंश शुद्ध और कर्म निष्कलंक थे; अतः वे बुद्धिमान् योद्धा उत्तम गति पानेकी इच्छासे धर्मयुद्धमें तत्पर हो गये ॥ १० ॥

न तत्रासीदधर्मिष्ठमशस्तं युद्धमेव च ।

ना कर्णी न नालीको न लिप्तो न च बस्तिकः ॥ ११ ॥

वहाँ अधर्मपूर्ण और निन्दनीय युद्ध नहीं हो रहा था, उसमें कर्णी, नालीक, विष लगाये हुए बाण और वस्तिक' नामक अस्त्रका प्रयोग नहीं होता था ॥ ११ ॥

न सूची कपिशो नैव न गवास्थिर्गजास्थिजः ।

इषुरासीन्न संश्लिष्टो न पूतिर्न च जिह्मगः ॥ १२ ॥

न सूची, न कपिश, न गायकी हड्डीका बना हुआ, न हाथीकी हड्डीका बना हुआ, न दो फलों या काँटोंवाला, न दुर्गन्धयुक्त और न जिह्मग ( टेढ़ा जानेवाला ) बाण ही काममें लाया जाता था ॥ १२ ॥

ऋजून्येव विशुद्धानि सर्वे शस्त्राण्यधारयन् ।

सुयुद्धेन पराँल्लोकानीप्सन्तः कीर्तिमेव च ॥ १३ ॥

वे सब योद्धा न्याययुक्त युद्धके द्वारा उत्तम लोक और कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखकर सरल और शुद्ध शस्त्रोंको ही धारण करते थे ॥ १३ ॥

तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं सर्वदोषविवर्जितम् ।

चतुर्णां तव योधानां तैस्त्रिभिः पाण्डवैः सह ॥ १४ ॥