04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1611–1620

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1611–1620

पृष्ठ 1611

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सामुद्रश्चित्रसेनश्च सह पुत्रेण भारत ॥ १५ ॥

समुद्रसेनेन बलाद् गमितो यमसादनम् । भारत! समुद्रतटवर्ती राज्यके अधिपति चित्रसेन अपने पुत्रके साथ युद्धमें आकर समुद्रसेनके द्वारा बलपूर्वक यमलोक भेज दिया गया ॥ १५३ ॥

अनूपवासी नीलश्च व्याघ्रदत्तश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥

अश्वत्थाम्ना विकर्णेन गमितो यमसादनम् । समुद्रतटवासी नील और पराक्रमी व्याघ्रदत्त–इन दोनोंको क्रमशः अश्वत्थामा और विकर्णने यमलोक पहुँचा दिया ॥ १६३ ॥

चित्रायुधश्चित्रयोधी कृत्वा च कदनं महत् ॥ १७ ॥

चित्रमार्गेण विक्रम्य विकर्णेन हतो मृधे । विचित्र युद्ध करनेवाले चित्रायुध समरमें विचित्र रीतिसे पराक्रम करते हुए कौरव- सेनाका महान् संहार करके अन्तमें विकर्णके हाथसे मारे गये ॥ १७३ ॥

वृकोदरसमो युद्धे वृतः कैकेययोधिभिः ॥ १८ ॥

कैकेयेन च विक्रम्य भ्रात्रा भ्राता निपातितः । केकयदेशीय योद्धाओंसे घिरे हुए भीमके समान पराक्रमी केकयराजकुमारको उन्हींके भाई दूसरे केकयराजकुमारने बलपूर्वक मार गिराया ॥ १८३ ॥

जनमेजयो गदायोधी पर्वतीयः प्रतापवान् ॥ १ ९ ॥ दुर्मुखेन महाराज तव पुत्रेण पातितः । महाराज! प्रतापी पर्वतीय राजा जनमेजय गदायुद्धमें कुशल थे । उन्हें आपके पुत्र दुर्मुखने धराशायी कर दिया ॥ रोचमानौ नरव्याघ्रौ रोचमानौ ग्रहाविव ॥ २० ॥

द्रोणेन युगपद् राजन् दिवं सम्प्रापितौ शरैः । राजन्! दो चमकते हुए ग्रहोंके समान नरश्रेष्ठ रोचमान, जो एक ही नामके दो भाई थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बाणोंसे एक साथ ही स्वर्गलोक पहुँचा दिये गये ॥ नृपाश्च प्रतियुध्यन्तः पराक्रान्ता विशाम्पते ॥ २१ ॥

कृत्वा नसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम् । प्रजानाथ! और भी बहुत- से पराक्रमी नरेश आपकी सेनाका सामना करते हुए दुष्कर पराक्रम करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ २१ ॥

पुरुजित् कुन्तिभोजश्च मातुलौ सव्यसाचिनः ॥ २२ ॥

संग्रामनिर्जिताँल्लोकान् गमितौ द्रोणसायकैः ।

पृष्ठ 1612

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पुरुजित् और कुन्तिभोज दोनों सव्यसाची अर्जुनके मामा थे । द्रोणाचार्यके सायकोंने उन्हें भी उन लोकोंमें पहुँचा दिया, जो संग्राममें मारे जानेवाले वीरोंको प्राप्त होते हैं ॥ २२३ || अभिभूः काशिराजश्च काशिकैर्बहुभिर्वृतः ॥ २३ ॥

वसुदानस्य पुत्रेण न्यासितो देहमाहवे । काशिराज अभिभू बहुतेरे काशीनिवासी योद्धाओंसे घिरे हुए थे । वसुदानके पुत्रने युद्धस्थलमें उनसे उनके शरीरका परित्याग करवा दिया ॥ २३ ॥

अमितौजा युधामन्युरुत्तमौजाश्च वीर्यवान् ॥ २४ ॥

निहत्य शतशः शूरानस्मदीयैर्निपातिताः । अमितौजा, युधामन्यु तथा पराक्रमी उत्तमौजा ये सैकड़ों शूरवीरोंका संहार करके हमारे सैनिकोंद्वारा मारे गये ॥ २४ ॥

मित्रवर्मा च पाञ्चाल्यः क्षत्रधर्मा च भारत ॥ २५ ॥

द्रोणेन परमेष्वासौ गमितौ यमसादनम् । भारत! पांचालयोद्धा मित्रवर्मा और क्षत्रधर्मा महाधनुर्धर थे । उन्हें भी द्रोणाचार्यने यमलोक पहुँचा दिया ॥ २५३ ॥

शिखण्डितनयो युद्धे क्षत्रदेवो युधां पतिः ॥ २६ ॥

लक्ष्मणेन हतो राजंस्तव पौत्रेण भारत । भरतवंशी नरेश! आपके पौत्र लक्ष्मणने युद्धमें योद्धाओंके स्वामी क्षत्रदेवको जो शिखण्डीका पुत्र था, मार डाला ॥ २६३ ॥

सुचित्रश्चित्रवर्मा च पितापुत्रौ महारथौ ॥ २७ ॥

प्रचरन्तौ महावीरौ द्रोणेन निहतौ रणे । सुचित्र और चित्रवर्मा ये दो महावीर महारथी परस्पर पिता- पुत्र थे । रणभूमिमें विचरते हुए इन दोनोंको द्रोणाचार्यने मार डाला ॥ २७ ॥

वार्द्धक्षेमिर्महाराज समुद्र इव पर्वणि ॥ २८ ॥

आयुधक्षयमासाद्य प्रशान्तिं परमां गतः । महाराज! जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्र उमड़ पड़ता है, उसी प्रकार वृद्धक्षेमका पुत्र भी युद्धमें उद्धत हो उठा था, परंतु उसके सारे अस्त्र- शस्त्र नष्ट हो गये थे, इसलिये वह प्राणशून्य हो सदाके लिये परम शान्त हो गया ॥ २८३ ॥

सेनाविन्दुसुतः श्रेष्ठः शात्रवान् प्रहरन् युधि ॥ २ ९ ॥ बाह्लिकेन महाराज कौरवेन्द्रेण पातितः । राजाधिराज! सेनाविन्दुका श्रेष्ठ पुत्र रणभूमिमें शत्रुओंपर प्रहार कर रहा था । उस समय कौरवेन्द्र बाह्लीकने उसे मार गिराया ॥ २ ९ ३ ॥

पृष्ठ 1613

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धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः ॥ ३० ॥

कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् । महाराज! चेदिदेशका श्रेष्ठ रथी धृष्टकेतु भी युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकका पथिक हो गया ॥ ३० ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरः कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३१ ॥

पाण्डवार्थे पराक्रान्तो गमितो यमसादनम् । पाण्डवोंके लिये पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर सत्यधृतिने भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके यमलोककी राह ली ॥ ३१३ ॥

सेनाबिन्दुः कुरुश्रेष्ठ कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३२ ॥

पुत्रस्तु शिशुपालस्य सुकेतुः पृथिवीपतिः ।

निहत्य शात्रवान् संख्ये द्रोणेन निहतो युधि ॥ ३३ ॥

कुरुश्रेष्ठ! सेनाविन्दु भी युद्धमें शत्रुओंका संहार करके कालके गालमें चला गया । शिशुपालका पुत्र राजा सुकेतु भी युद्धमें शत्रुसैनिकोंका वध करके स्वयं भी द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया ॥ ३२-३३ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरो मदिराश्चश्च वीर्यवान् ।

सूर्यदत्तश्च विक्रान्तो निहतो द्रोणसायकैः ॥ ३४ ॥

इसी प्रकार वीर सत्यधृति, पराक्रमी मदिराश्व और बल- विक्रमशाली सूर्यदत्त भी द्रोणाचार्यके बाणोंसे मारे गये हैं ॥ ३४ ॥

श्रेणिमांश्च महाराज युध्यमानः पराक्रमी ।

कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ३५ ॥

महाराज! पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले श्रेणिमान्ने युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकके मार्गका आश्रय लिया है ॥ ३५ ॥

तथैव युधि विक्रान्तो मागधः परमास्त्रवित् ।

भीष्मेण निहतो राजशेतेऽद्य परवीरहा ॥ ३६ ॥

राजन्! इसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला और उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता पराक्रमी मागध वीर भी भीष्मजीके हाथसे मारा जाकर आज रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३६ ॥

विराटपुत्रः शङ्खस्तु उत्तरश्च महारथः ।

कुर्वन्तौ सुमहत् कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ३७ ॥

राजा विराटके पुत्र शंख और महारथी उत्तर ये दोनों युद्धमें महान् कर्म करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ३७ ॥

वसुदानश्च कदनं कुर्वाणोऽतीव संयुगे ।

भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1614

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वसुदान भी युद्धस्थलमें बड़ा भारी संहार मचा रहा था । परंतु भरद्वाजनन्दन द्रोणने पराक्रम करके उसे यमलोक पहुँचा दिया ॥ ३८ ॥

( पाण्ड्यराजश्च विक्रान्तो बलवान् बाहुशालिना । अश्वत्थाम्ना हतस्तत्र गमितो वै यमक्षयम् ॥ ) अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले अश्वत्थामाने बलवान् एवं पराक्रमी पाण्ड्यराजको मारकर यमलोक पहुँचा दिया ।

एते चान्ये च बहवः पाण्डवानां महारथाः ।

हता द्रोणेन विक्रम्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३ ९ ॥

ये तथा और भी बहुत - से पाण्डव महारथी, जिनके बारेमें आप मुझसे पूछ रहे थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बलपूर्वक मार डाले गये ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्ये षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजय- वाक्यविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं । )

पृष्ठ 1615

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सप्तमोऽध्यायः कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा धृतराष्ट्रउवाच

मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेकस्य संजय ।

अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १ ॥

- धृतराष्ट्रने कहा – संजय! प्रधान पुरुष भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिके मारे जानेसे मेरी

सेनाका घमंड चूर- चूर हो गया है । मैं देखता हूँ, अब यह बच नहीं सकेगी ॥ १ ॥

तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ ।

भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नार्थो वै जीवितेऽसति ॥ २ ॥

वे दोनों कुरुश्रेष्ठ महाधनुर्धर वीर भीष्म और द्रोणाचार्य मेरे लिये मारे गये; यह सुन लेनेपर इस अधम जीवनको रखनेका अब कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २ ॥

न च मृष्यामि राधेयं हतमाहवशोभनम् ।

यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ॥ ३ ॥

जिसकी दोनों भुजाओंमें समानरूपसे दस- दस हजार हाथियोंका बल था, युद्धमें शोभा पानेवाले उस राधापुत्र कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं इस शोकको सहन नहीं कर पाता हूँ ॥ ३ ॥

हतप्रवरसैन्यं मे यथा शंससि संजय ।

अहतानपि मे शंस येऽत्र जीवन्ति केचन ॥ ४ ॥

संजय! जैसा कि तुम कह रहे हो कि मेरी सेनाके प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं, उसी प्रकार यह भी बताओ कि कौन - कौन वीर नहीं मारे गये हैं । इस सेनामें जो कोई भी श्रेष्ठ वीर जीवित हैं, उनका परिचय दो ॥ ४ ॥

एतेषु हि मृतेष्वद्य ये त्वया परिकीर्तिताः ।

येऽपि जीवन्ति ते सर्वे मृता इति मतिर्मम ॥। ५ ॥

आज तुमने जिन लोगोंके नाम लिये हैं, उनकी मृत्यु हो जानेपर तो जो भी अब जीवित हैं वे सभी मरे हुएके ही समान हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५ ॥

संजय उवाच यस्मिन् महास्त्राणि समर्पितानि चित्राणि शुभ्राणि चतुर्विधानि । दिव्यानि राजन् विहितानि चैव

पृष्ठ 1616

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द्रोणेन वीरे द्विजसत्तमेन ॥ ६ ॥

महारथः कृतिमान् क्षिप्रहस्तो दृढायुधो दृढमुष्टिर्दृढेषुः । स वीर्यवान् द्रोणपुत्रस्तरस्वी व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ७ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यने जिस वीरको चित्र ( अद्भुत ), शुभ्र (प्रकाशमान ), दिव्य तथा धनुर्वेदोक्त चार प्रकारके महान् अस्त्र समर्पित किये थे, जो सफल प्रयत्न करनेवाला महारथी वीर है, जिसके हाथ बड़ी शीघ्रतासे चलते हैं, जिसका धनुष, जिसकी मुट्ठी और जिसके बाण सभी सुदृढ़ हैं, वह वेगशाली तथा पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा आपके लिये युद्धकी इच्छा रखकर समरभूमिमें डटा हुआ है ॥ आनर्तवासी हृदिकात्मजोऽसौ महारथः सात्वतानां वरिष्ठः । स्वयं भोजः कृतवर्मा कृतास्त्रो व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ८ ॥

सात्वतकुलका श्रेष्ठ महारथी, आनर्तनिवासी, भोजवंशी अस्त्रवेत्ता, हृदिकपुत्र कृतवर्मा भी आपके लिये युद्ध करनेको दृढ़ निश्चयके साथ डटा हुआ है ॥ ८ ॥

आर्तायनिः समरे दुष्प्रकम्प्यः सेनाग्रणीः प्रथमस्तावकानाम् । यः स्वस्रीयान् पाण्डवेयान् विसृज्य सत्यां वाचं स्वां चिकीर्षुस्तरस्वी ॥ ९ ॥

तेजोवधं सूतपुत्रस्य संख्ये प्रतिश्रुत्याजातशत्रोः पुरस्तात् । दुराधर्षः शक्रसमानवीर्यः शल्यः स्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ १० ॥

जिन्हें युद्धमें विचलित करना अत्यन्त कठिन है, जो आपके सैनिकोंके प्रथम सेनापति एवं वेगशाली वीर हैं, जो अपनी बात सच्ची कर दिखानेके लिये अपने सगे भानजे पाण्डवोंको छोड़कर तथा अजातशत्रु युधिष्ठिरके सामने युद्धस्थलमें सूतपुत्र कर्णके तेज और उत्साहको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा करके आपके पक्षमें चले आये थे, वे बलवान् दुर्धर्ष तथा इन्द्रके समान पराक्रमी ऋतायनपुत्र शल्य आपके लिये युद्ध करनेको तैयार हैं ॥ ९ -१० ॥ आजानेयैः सैन्धवैः पर्वतीयै- र्नदीजकाम्बोजवनायुजैश्च । गान्धारराजः स्वबलेन युक्तो

पृष्ठ 1617

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व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ११ ॥

अच्छी नस्लके सिंधी, पहाड़ी, दरियाई, काबुली और वनायुदेशके बहुसंख्यक घोड़ों तथा अपनी सेनाके साथ गान्धारराज शकुनि आपके लिये युद्ध करनेको डटा हुआ ॥ ११ ॥

शारद्वतो गौतमश्चापि राजन् महाबाहुर्बहुचित्रास्त्रयोधी । धनुश्चित्रं सुमहद् भारसाहं व्यवस्थितो योद्धुकामः प्रगृह्य ॥ १२ ॥

राजन्! अनेक प्रकारके विचित्र अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेवाले, गौतमवंशीय शरद्वान्‌के पुत्र महाबाहु कृपाचार्य भी महान् भार सहन करनेमें समर्थ विचित्र धनुष हाथमें लेकर आपके लिये युद्ध करनेको तैयार हैं ॥ १२ ॥

महारथः केकयराजपुत्रः सदश्वयुक्तं च पताकिनं च । रथं समारुह्य कुरुप्रवीर व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ १३ ॥

कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर! महारथी केकयराजकुमार भी सुन्दर घोड़ोंसे जुते हुए, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित रथपर आरूढ़ हो आपके लिये युद्ध करनेकी इच्छासे डटा हुआ है ॥ १३ ॥

तथा सुतस्ते ज्वलनार्कवर्णं रथं समास्थाय कुरुप्रवीरः । व्यवस्थितः पुरुमित्रो नरेन्द्र व्यभ्रे सूर्यो भ्राजमानो यथा खे ॥ १४ ॥

नरेन्द्र! कुरुकुलका प्रमुख वीर आपका पुत्र पुरुमित्र अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् रथपर आरूढ़ हो बिना बादलोंके आकाशमें सूर्यके समान प्रकाशित होता हुआ युद्धके लिये खड़ा है ॥ १४ ॥

दुर्योधनो नागकुलस्य मध्ये व्यवस्थितः सिंह इवाबभासे । रथेन जाम्बूनदभूषणेन व्यवस्थितः समरे योत्स्यमानः ॥ १५ ॥

हाथियोंकी सेनाके बीच जो अपने सुवर्णभूषित रथके द्वारा उपस्थित हो सिंहके समान सुशोभित होता है, वह राजा दुर्योधन भी समरांगणमें जूझनेके लिये खड़ा है ॥ १५ ॥

स राजमध्ये पुरुषप्रवीरो रराज जाम्बूनदचित्रवर्मा ।

पृष्ठ 1618

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पद्मप्रभो वह्निरिवाल्पधूमो मेघान्तरे सूर्य इव प्रकाशः ॥ १६ ॥

पुरुषोंमें प्रधान वीर और कमलके समान कान्तिमान् दुर्योधन सोनेका बना हुआ विचित्र कवच धारण करके राजाओंके समुदायमें अल्प धूमवाली अग्नि एवं बादलोंके बीचमें सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १६ ॥

तथा सुषेणोऽप्यसिचर्मपाणि- स्तवात्मजः सत्यसेनश्च वीरः । व्यवस्थितौ चित्रसेनेन सार्धं हृष्टात्मानौ समरे योद्धुकामौ ॥ १७ ॥

हाथमें ढाल- तलवार लिये हुए आपके वीर पुत्र सुषेण और सत्यसेन मनमें हर्ष और उत्साह लिये समरमें जूझनेकी इच्छा रखकर चित्रसेनके साथ खड़े हैं ॥ ह्रीनिषेवो भारत राजपुत्र उग्रायुधः क्षणभोजी सुदर्शः । जारासंधिः प्रथमश्चादृढश्च चित्रायुधः श्रुतवर्मा जयश्च ॥ १८ ॥

शलश्च सत्यव्रतदुःशलौ च व्यवस्थिताः सहसैन्या नराग्रयाः । भारत! लज्जाशील भयंकर आयुधोंवाला शीघ्रभोजी और देखनेमें सुन्दर जरासंधका प्रथम पुत्र राजकुमार अदृढ, चित्रायुध, श्रुतवर्मा, जय, शल, सत्यव्रत और दुःशल — ये सभी श्रेष्ठ पुरुष युद्धके लिये अपनी सेनाओंके साथ खड़े हैं ॥ १८६३ ॥

कैतव्यानामधिपः शूरमानी रणे रणे शत्रुहा राजपुत्रः ॥ १ ९ ॥ रथीही नागपत्तिप्रयायी व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे । प्रत्येक युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाला और अपनेको शूरवीर माननेवाला एक राजकुमार, जो जुआरियोंका सरदार है तथा रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंकी चतुरंगिणीसेना साथ लेकर चलता है, आपके लिये युद्ध करनेको तैयार खड़ा है ॥ १ ९ ३ ॥ वीरः श्रुतायुश्च धृतायुधश्च चित्राङ्गदश्चित्रसेनश्च वीरः ॥ २० ॥

व्यवस्थिता योद्धुकामा नराग्रयाः प्रहारिणो मानिनः सत्यसंधाः । वीर श्रुतायु, धृतायुध, चित्रांगद और वीर चित्रसेन -ये सभी प्रहारकुशल स्वाभिमानी और सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ आपके लिये युद्ध करनेको तैयार खड़े हैं ॥ २०६३ ॥

पृष्ठ 1619

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कर्णात्मजः सत्यसंधो महात्मा व्यवस्थितः समरे योद्धुकामः ॥ २१ ॥

अथापरौ कर्णसुतौ वरास्त्रौ व्यवस्थितौ लघुहस्तौ नरेन्द्र । बलं महद् दुर्भिदमल्पधैर्यैः समाश्रितौ योत्स्यमानौ त्वदर्थे ॥ २२ ॥

नरेन्द्र! कर्णका महामना एवं सत्यप्रतिज्ञ पुत्र समरांगणमें युद्धकी इच्छासे डटा हुआ है । इसके सिवा कर्णके दो पुत्र और हैं, जो उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता और शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं, वे भी आपकी ओरसे युद्धके लिये तैयार खड़े हैं । इन दोनोंने ऐसी विशाल सेनाको अपने साथ ले रखा है, जिसका अल्प धैर्यवाले वीरोंके लिये भेदन करना कठिन है ॥ २१-२२ ॥ एतैश्च मुख्यैरपरैश्च राजन् योधप्रवीरैरमितप्रभावैः । व्यवस्थितो नागकुलस्य मध्ये यथा महेन्द्रः कुरुराजो जयाय ॥ २३ ॥

राजन्! इनसे तथा अन्य अनन्त प्रभावशाली श्रेष्ठ एवं प्रधान योद्धाओंसे घिरा हुआ कुरुराज दुर्योधन हाथियोंके समूहमें देवराज इन्द्रके समान विजयके लिये खड़ा है ॥ २३ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

आख्याता जीवमाना येऽपरे सैन्या यथायथम् ।

इतीदमवगच्छामि व्यक्तमर्थाभिपत्तितः ॥ २४ ॥

धृतराष्ट्रने कहा – संजय! अपने पक्षके जो जीवित योद्धा हैं एवं उनसे भिन्न जो मारे जा चुके हैं, उनका तुमने यथार्थरूपसे वर्णन कर दिया । इससे जो परिणाम होनेवाला है, उसे अर्थापत्ति प्रमाणके द्वारा मैं स्पष्टरूपसे समझ रहा हूँ ( मेरे पक्षकी हार सुनिश्चित है ) ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवन्नेव तदा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

हतप्रवीरं विश्वस्तं किंचिच्छेषं स्वकं बलम् ॥ २५ ॥

श्रुत्वा व्यामोहमागच्छच्छोकव्याकुलितेन्द्रियः । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यह कहते हुए ही अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र उस समय यह सुनकर कि अपनी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये, अधिकांश सेना नष्ट हो गयी और बहुत थोड़ी शेष रह गयी है, मूर्च्छित हो गये । उनकी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं ॥ २५३ ॥

मुह्यमानोऽब्रवीच्चापि मुहूर्तं तिष्ठ संजय ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1620

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1620 का मूल पृष्ठ
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व्याकुलं मे मनस्तात श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।

मनो मुह्यति चाङ्गानि न च शक्नोमि धारितुम् ॥ २७ ॥

वे अचेत होते -होते बोले - ' संजय! दो घड़ी ठहर जाओ। तात! यह महान् अप्रिय संवाद सुनकर मेरा मन व्याकुल हो गया है, चेतना लुप्त सी हो रही है और मैं अपने अंगोंको धारण करनेमें असमर्थ हो रहा हूँ' ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

भ्रान्तचित्तस्ततः सोऽथ बभूव जगतीपतिः ॥ २८ ॥

ऐसा कहकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र भ्रान्तचित्त ( मूर्च्छित ) हो गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्यं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजयवाक्यविषयक सातवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७ ॥