04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2191–2200

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2191–2200

पृष्ठ 2191

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अद्य तीक्ष्णैर्विपाठैश्च क्षुरैश्च मधुसूदन ॥ ३ ९ ॥ रणे छेत्स्यामि गात्राणि राधेयस्य दुरात्मनः । ' श्रीकृष्ण! आज तीखे विपाठों और क्षुरोंसे रणभूमिमें दुरात्मा राधापुत्रके अंगोंको काट डालूँगा ॥ ३ ९ ३ ॥ अद्य राजा महत् कृच्छ्रं संत्यक्ष्यति युधिष्ठिरः ॥ ४० ॥

संतापं मानसं वीरश्चिरसम्भृतमात्मनः । ' आज वीर राजा युधिष्ठिर महान् कष्ट और अपने चिरसंचित मानसिक संतापसे छुटकारा पा जायँगे ॥ अद्य केशव राधेयमहं हत्वा सबान्धवम् ॥ ४१ ॥

नन्दयिष्यामि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । ‘ केशव! आज मैं बन्धु- बान्धवोंसहित राधापुत्रको मारकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको आनन्दित करूँगा ॥ ४१३ ॥

अद्याहमनुगान् कृष्ण कर्णस्य कृपणान् युधि ॥ ४२ ॥

हन्ता ज्वलनसंकाशैः शरैः सर्पविषोपमैः । ' श्रीकृष्ण! आज मैं युद्धस्थलमें कर्णके पीछे चलनेवाले दीन- हीन सैनिकोंको सर्पविष और अग्निके समान बाणोंद्वारा भस्म कर डालूँगा ॥ ४२३ ॥

अद्याहं हेमकवचैराबद्धमणिकुण्डलैः ॥ ४३ ॥

संस्तरिष्यामि गोविन्द वसुधां वसुधाधिपैः । ' गोविन्द! आज मैं सुवर्णमय कवच और मणिमय कुण्डल धारण करनेवाले भूपतियोंकी लाशोंसे रणभूमिको पाट दूँगा ॥ ४३ ॥

अद्याभिमन्योः शत्रूणां सर्वेषां मधुसूदन ॥ ४४ ॥

प्रमथिष्यामि गात्राणि शिरांसि च शितैः शरैः । ‘ मधुसूदन! आज पैने बाणोंसे मैं अभिमन्युके समस्त शत्रुओंके शरीरों और मस्तकोंको मथ डालूँगा ॥ ४४ ॥

अद्य निर्धार्तराष्ट्रां च भ्रात्रे दास्यामि मेदिनीम् ॥ ४५ ॥

निरर्जुनां वा पृथिवीं केशवानुचरिष्यसि । ‘ केशव! या तो आज इस पृथ्वीको धृतराष्ट्रपुत्रोंसे सूनी करके अपने भाईके अधिकारमें दे दूँगा या आप अर्जुनरहित पृथ्वीपर विचरेंगे ॥ ४५३ ॥

अद्याहमनृणः कृष्ण भविष्यामि धनुर्भृताम् ॥ ४६ ॥

कोपस्य च कुरूणां च शराणां गाण्डिवस्य च । 'श्रीकृष्ण! आज मैं सम्पूर्ण धनुर्धरोंके, क्रोधके, कौरवोंके, बाणोंके तथा गाण्डीव धनुषके भी ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा ॥

पृष्ठ 2192

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अद्य दुःखमहं मोक्ष्ये त्रयोदशसमार्जितम् ॥ ४७ ॥

हत्वा कर्णं रणे कृष्ण शम्बरं मघवानिव । ‘ श्रीकृष्ण! जैसे इन्द्रने शम्बरासुरका वध किया था, उसी प्रकार मैं रणभूमिमें कर्णको मारकर आज तेरह वर्षोंसे संचित किये हुए दुःखका परित्याग कर दूँगा ॥ अद्य कर्णे हते युद्धे सोमकानां महारथाः ॥ ४८ ॥

कृतं कार्यं च मन्यन्तां मित्रकार्येप्सवो युधि । ‘ आज युद्धमें कर्णके मारे जानेपर मित्रके कार्यकी सिद्धि चाहनेवाले सोमकवंशी महारथी अपनेको कृतकार्य समझ लें ॥ न जाने च कथं प्रीतिः शैनेयस्याद्य माधव ॥ ४ ९ ॥ भविष्यति हते कर्णे मयि चापि जयाधिके । ‘ माधव! आज कर्णके मारे जाने और विजयके कारण मेरी प्रतिष्ठा बढ़ जानेपर न जाने शिनिपौत्र सात्यकिको कितनी प्रसन्नता होगी? ॥ ४ ९ ३ ॥ अहं हत्वा रणे कर्णं पुत्रं चास्य महारथम् ॥ ५० ॥

प्रीतिं दास्यामि भीमस्य यमयोः सात्यकस्य च । ‘ मैं रणभूमिमें कर्ण और उसके महारथी पुत्रको मारकर भीमसेन, नकुल, सहदेव तथा सात्यकिको प्रसन्न करूँगा ॥ धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्यां पञ्चालानां च माधव ॥ ५१ ॥

अद्यानृण्यं गमिष्यामि हत्वा कर्णं महाहवे । ‘ माधव! आज महासमरमें कर्णका वध करके मैं धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा पांचालोंके ऋणसे छुटकारा पा जाऊँगा ॥ अद्य पश्यन्तु संग्रामे धनंजयममर्षणम् ॥ ५२ ॥

युध्यन्तं कौरवान् संख्ये घातयन्तं च सूतजम् । ‘ आज समस्त सैनिक देखें कि संग्रामभूमिमें अमर्षशील धनंजय किस प्रकार कौरवोंसे युद्ध करता और सूतपुत्र कर्णको मारता है ॥ ५२३ ॥

भवत्सकाशे वक्ष्ये च पुनरेवात्मसंस्तवम् ॥ ५३ ॥

धनुर्वेदे मत्समो नास्ति लोके

पराक्रमे वा मम कोऽस्ति तुल्यः ।

को वाप्यन्यो मत्समोऽस्ति क्षमावां- स्तथा क्रोधे सदृशोऽन्यो न मेऽस्ति ॥ ५४ ॥

‘ मैं आपके निकट पुनः अपनी प्रशंसासे भरी हुई बात कहता हूँ, धनुर्वेदमें मेरी समानता करनेवाला इस संसारमें दूसरा कोई नहीं है । फिर पराक्रममें मेरे जैसा कौन है? मेरे समान क्षमाशील भी दूसरा कौन है तथा क्रोधमें भी मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है ॥ ५३-५४ ॥ अहं धनुष्मान् ससुरासुरांश्च

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सर्वाणि भूतानि च सङ्गतानि । स्वबाहुवीर्याद् गमये पराभवं मत्पौरुषं विद्धि परं परेभ्यः ॥ ५५ ॥

'मैं धनुष लेकर अपने बाहुबलसे एक साथ आये हुए देवताओं, असुरों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको परास्त कर सकता हूँ । मेरे पुरुषार्थको उत्कृष्टसे भी उत्कृष्ट समझो ॥ ५५ ॥

शरार्चिषा गाण्डिवेनाहमेकः सर्वान् कुरून् बाह्लिकांश्चाभिहत्य । हिमात्यये कक्षगतो यथाग्नि- स्तथा दहेयं सगणान् प्रसह्य ॥ ५६ ॥

' मैं अकेला ही बाणोंकी ज्वालासे युक्त गाण्डीव धनुषके द्वारा समस्त कौरवों और बाह्लिकोंको दल - बलसहित मारकर ग्रीष्म ऋतुमें सूखे काठमें लगी हुई आगके समान सबको भस्म कर डालूँगा ॥ ५६ ॥

पाणौ पृषत्का लिखिता ममैते धनुश्च दिव्यं विततं सबाणम् । पादौ च मे सरथौ सध्वजौ च न मादृशं युद्धगतं जयन्ति ॥ ५७ ॥

‘ मेरे एक हाथमें बाणके चिह्न हैं और दूसरेमें फैले हुए बाणसहित दिव्य धनुषकी रेखा है । इसी प्रकार मेरे पैरोंमें भी रथ और ध्वजाके चिह्न हैं । मेरे - जैसे लक्षणोंवाला योद्धा जब युद्धमें उपस्थित होता है, तब उसे शत्रु जीत नहीं सकते हैं ' ॥ ५७ ॥

इत्येवमुक्त्वार्जुन एकवीरः क्षिप्रं रिपुघ्नः क्षतजोपमाक्षः । भीमं मुमुक्षुः समरे प्रयातः कर्णस्य कायाच्च शिरो जिहीर्षुः ॥ ५८ ॥

भगवान्से ऐसा कहकर अद्वितीय वीर शत्रुसूदन अर्जुन क्रोधसे लाल आँखें किये समरभूमिमें भीमसेनको संकटसे छुड़ाने और कर्णके मस्तकको धड़से अलग करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक वहाँसे चल दिये ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनवाक्ये चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

पृष्ठ 2194

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें द्वन्द्वयुद्ध तथा सुषेणका वध धृतराष्ट्रउवाच समागमे पाण्डवसृञ्जयानां महाभये मामकानामगाधे । धनंजये तात रणाय याते कर्णेन तद् युद्धमथोऽत्र कीदृक् ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा — तात संजय! मेरे पुत्रों तथा पाण्डवों और सृजयोंमें पहलेसे ही अगाध एवं महाभयंकर संग्राम छिड़ा हुआ था । फिर जब धनंजय भी वहाँ कर्णके साथ युद्धके लिये जा पहुँचे, तब उस युद्धका स्वरूप कैसा हो गया? ॥ १ ॥

संजय उवाच तेषामनीकानि बृहद्ध्वजानि समृद्धानि समागतानि । गर्जन्ति भेरीनिनदोन्मुखानि नादैर्यथा मेघगणास्तपान्ते ॥ २ ॥

संजय कहते हैं – महाराज! ग्रीष्म ऋतु बीत जानेपर जैसे मेघसमूह गर्जना करने लगते हैं, उसी प्रकार दोनों पक्षोंकी सेनाएँ एकत्र हो रणभूमिमें गर्जना करने लगीं । उनके भीतर बड़े - बड़े ध्वज फहरा रहे थे और सभी सैनिक अस्त्र - शस्त्रोंसे सम्पन्न थे । रणभेरियोंकी ध्वनि उन्हें युद्धके लिये उत्सुक किये हुए थी ॥ २ ॥

महागजाभ्राकुलमस्त्रतोयं वादित्रनेमीतलशब्दवच्च । हिरण्यचित्रायुधविद्युतं च शरासिनाराचमहास्त्रधारम् ॥ ३ ॥

तद् भीमवेगं रुधिरौघवाहि खड्गाकुलं क्षत्रियजीवघाति । अनार्तवं क्रूरमनिष्टवर्षं बभूव तत् संहरणं प्रजानाम् ॥ ४ ॥

क्रमशः वह क्रूरतापूर्ण युद्ध बिना ऋतुकी अनिष्टकारी वर्षाके समान प्रजाजनोंका संहार करने लगा । बड़े - बड़े हाथियोंका समूह मेघोंकी घटा बनकर वहाँ छाया हुआ था । अस्त्र ही जल थे, वाद्यों और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द ही मेघ गर्जनके समान प्रतीत होता था ।

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सुवर्णजटित विचित्र आयुध विद्युत् के समान प्रकाशित होते थे । बाण, खड्ग और नाराच आदि बड़े - बड़े अस्त्रोंकी धारावाहिक वृष्टि हो रही थी । धीरे- धीरे उस युद्धका वेग बड़ा भयंकर हो उठा, रक्तका स्रोत बह चला । तलवारोंकी खचाखच मार होने लगी, जिससे क्षत्रियोंके प्राणोंका संहार होने लगा ॥ ३-४ ॥ एकं रथं सम्परिवार्य मृत्युं

नयन्त्यनेके च रथाः समेताः ।

एकस्तथैकं रथिनं रथाग्रयां- स्तथा रथश्चापि रथाननेकान् ॥ ५ ॥

बहुत - से रथी एक साथ मिलकर किसी एक रथीको घेर लेते और उसे यमलोक पहुँचा देते थे । इसी प्रकार एक रथी एक रथीको और अनेक श्रेष्ठ रथियोंको भी यमलोकका पथिक बना देता था ॥ ५ ॥

रथं ससूतं सहयं च कञ्चित् कश्चिद्रथी मृत्युवशं निनाय । निनाय चाप्येकगजेन कश्चिद् रथान् बहून् मृत्युवशे तथाश्वान् ॥ ६ ॥

किसी रथीने किसी एक रथीको घोड़ों और सारथिसहित मौतके हवाले कर दिया तथा किसी दूसरे वीरने एकमात्र हाथीके द्वारा बहुत - से रथियों और घोड़ोंको मौतका ग्रास बना दिया ॥ ६ ॥

रथान् ससूतान् सहयान् गजांश्च सर्वानरीन् मृत्युवशं शरौघैः । निन्ये हयांश्चैव तथा ससादीन् पदातिसङ्घांश्च तथैव पार्थः ॥ ७ ॥

उस समय अर्जुनने सारथिसहित रथों, घोड़ों सहित हाथियों, समस्त शत्रुओं, सवारोंसहित घोड़ों तथा पैदलसमूहोंको भी अपने बाणसमूहोंद्वारा मृत्युके अधीन कर दिया ॥ ७ ॥

कृपः शिखण्डी च रणे समेतौ दुर्योधनं सात्यकिरभ्यगच्छत् । श्रुतश्रवा द्रोणपुत्रेण सार्धं युधामन्युश्चित्रसेनेन सार्धम् ॥ ८ ॥

उस रणभूमिमें कृपाचार्य और शिखण्डी एक- दूसरेसे भिड़े थे, सात्यकिने दुर्योधनपर धावा किया था, श्रुतश्रवा द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके साथ जूझ रहा था और युधामन्यु चित्रसेनके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ ८ ॥

कर्णस्य पुत्रं तु रथी सुषेणं

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समागतं सृजयश्चोत्तमौजाः । गान्धारराजं सहदेवः क्षुधार्तो महर्षभं सिंह इवाभ्यधावत् ॥ ९ ॥

सृजयवंशी रथी उत्तमौजाने अपने सामने आये हुए कर्णपुत्र सुषेणपर आक्रमण किया था । जैसे भूखसे पीड़ित हुआ सिंह किसी साँड़पर धावा करता है, उसी प्रकार सहदेव गान्धारराज शकुनिपर टूट पड़े थे ॥ ९ ॥

शतानीको नाकुलिः कर्णपुत्रं युवा युवानं वृषसेनं शरौघैः । समार्पयत् कर्णपुत्रश्च शूरः पाञ्चालेयं शरवर्षैरनेकैः ॥ १० ॥

नकुलपुत्र नवयुवक शतानीकने कर्णके नौजवान बेटे वृषसेनको अपने बाणसमूहोंसे घायल कर दिया तथा शूरवीर कर्णपुत्र वृषसेनने भी अनेक बाणोंकी वर्षा करके पांचालीकुमार शतानीकको गहरी चोट पहुँचायी ॥ रथर्षभः कृतवर्माणमार्छ- न्माद्रीपुत्रो नकुलश्चित्रयोधी । पञ्चालानामधिपो याज्ञसेनिः सेनापतिः कर्णमार्छत् ससैन्यम् ॥ ११ ॥

विचित्र युद्ध करनेवाले, रथियोंमें श्रेष्ठ माद्रीकुमार नकुलने कृतवर्मापर चढ़ाई की । द्रुपदकुमार पांचालराज सेनापति धृष्टद्युम्नने सेनासहित कर्णपर आक्रमण किया ॥ दुःशासनो भारत भारती च संशप्तकानां पृतना समृद्धा । भीमं रणे शस्त्रभृतां वरिष्ठं भीमं समार्छत्तमसह्यवेगम् ॥ १२ ॥

भारत! दुःशासन, कौरव- सेना और संशप्तकोंकी समृद्धिशालिनी वाहिनीने असह्य वेगशाली, शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें भयंकर प्रतीत होनेवाले भीमसेनपर चढ़ाई की ॥ १२ ॥

कर्णात्मजं तत्र जघान वीर- स्तथाच्छिनच्चोत्तमौजाः प्रसह्य । तस्योत्तमाङ्गं निपपात भूमौ निनादयद् गां निनदेन खं च ॥ १३ ॥

वीर उत्तमौजाने हठपूर्वक वहाँ कर्णपुत्र सुषेणपर घातक प्रहार किया और उसका मस्तक काट डाला । सुषेणका वह मस्तक अपने आर्तनादसे आकाश और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2197

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सुषेणशीर्ष पतितं पृथिव्यां विलोक्य कर्णोऽथ तदार्तरूपः । क्रोधाद्धयांस्तस्य रथं ध्वजं च बाणैः सुधारैर्निशितैरकृन्तत् ॥ १४ ॥

सुषेणके मस्तकको पृथ्वीपर पड़ा देख कर्ण शोकसे आतुर हो उठा । उसने कुपित हो उत्तम धारवाले पैने बाणोंसे उत्तमौजाके रथ, ध्वज और घोड़ोंको काट डाला ॥ १४ ॥

स तूत्तमौजा निशितैः पृषत्कै- विव्याध खड्गेन च भास्वरेण । पार्ष्णिं हयांश्चैव कृपस्य हत्वा शिखण्डिवाहं स ततोऽध्यरोहत् ॥ १५ ॥

तब उत्तमौजाने तीखे बाणोंसे कर्णको बींध डाला और (जब कृपाचार्यने बाधा दी तब) चमचमाती हुई तलवारसे कृपाचार्यके पृष्ठरक्षकों और घोड़ोंको मारकर वह शिखण्डीके रथपर आरूढ़ हो गया ॥ १५ ॥

कृपं तु दृष्ट्वा विरथं रथस्थो नैच्छच्छरैस्ताडयितुं शिखण्डी तं द्रौणिरावार्य रथं कृपस्य समुज्जह्रे पङ्कगतां यथा गाम् ॥ १६ ॥

कृपाचार्यको रथहीन देख रथपर बैठे हुए शिखण्डीने उनपर बाणोंसे आघात करनेकी इच्छा नहीं की । तब अश्वत्थामाने शिखण्डीको रोककर कीचड़में फँसी हुई गायके समान कृपाचार्यके रथका उद्धार किया ॥ १६ ॥

हिरण्यवर्मा निशितैः पृषत्कै- स्तवात्मजानामनिलात्मजो वै । अतापयत् सैन्यमतीव भीमः काले शुचौ मध्यगतो यथार्कः ॥ १७ ॥

जैसे आषाढ़मासमें दोपहरका सूर्य अत्यन्त ताप प्रदान करता है, उसी प्रकार सुवर्णकवचधारी वायुपुत्र भीमसेन आपके पुत्रोंकी सेनाको तीखे बाणोंद्वारा अधिक संताप देने लगे ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलद्वन्द्वयुद्धे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलद्वन्द्वयुद्धविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

पृष्ठ 2198

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद संजय उवाच अथ त्विदानीं तुमुले विमर्दे द्विषद्भिरेको बहुभिः समावृतः । महारणे सारथिमित्युवाच भीमश्चमूं वाहय धार्तराष्ट्रीम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! उस समय उस घमासान युद्धमें बहुत -से शत्रुओंद्वारा अकेले घिरे हुए भीमसेन महासमरमें अपने सारथिसे बोले – ' सारथे! अब तुम रथको धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाकी ओर ले चलो ॥ १ ॥

त्वं सारथे याहि जवेन वाहै- र्नयाम्येतान् धार्तराष्ट्रान् यमाय । संचोदितो भीमसेनेन चैवं स सारथिः पुत्रबलं त्वदीयम् ॥ २ ॥

प्रायात् ततः सत्वरमुग्रवेगो यतो भीमस्तद् बलं गन्तुमैच्छत् । ततोऽपरे नागरथाश्वपत्तिभिः प्रत्युद्ययुस्तं कुरवः समन्तात् ॥ ३ ॥

' सूत! तुम अपने वाहनोंद्वारा वेगपूर्वक आगे बढ़ो । जिससे इन धृतराष्ट्रपुत्रोंको मैं यमलोक भेज सकूँ । ' भीमसेनके इस प्रकार आदेश देनेपर सारथि तुरंत ही भयंकर वेगसे युक्त हो आपके पुत्रोंकी सेनाकी ओर, जिधर भीमसेन जाना चाहते थे, चल दिया । तब अन्यान्य कौरवोंने हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी विशाल सेना साथ ले सब ओरसे उनपर आक्रमण किया ॥ २-३ ॥ भीमस्य वाहाग्रयमुदारवेगं समन्ततो बाणगणैर्निजघ्नुः । ततः शरानापततो महात्मा चिच्छेद बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ॥ ४ ॥

वे भीमसेनके अत्यन्त वेगशाली श्रेष्ठ रथपर चारों ओरसे बाणसमूहोंद्वारा प्रहार करने लगे; परंतु महामनस्वी भीमसेनने अपने ऊपर आते हुए उन बाणोंको सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा काट डाला ॥ ४ ॥

ते वै निपेतुस्तपनीयपुङ्खा

पृष्ठ 2199

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द्विधा त्रिधा भीमशरैर्निकृत्ताः । ततो राजन् नागरथाश्वयूनां भीमाहतानां वरराजमध्ये ॥ ५ ॥

घोरो निनादः प्रबभौ नरेन्द्र वज्राहतानामिव पर्वतानाम् । वे सोनेकी पाँखवाले बाण भीमसेनके बाणोंसे दो - दो तीन - तीन टुकड़ोंमें कटकर गिर गये । राजन्! नरेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ राजाओंकी मण्डलीमें भीमसेनके द्वारा मारे गये हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदल युवकोंका भयंकर आर्तनाद प्रकट होने लगा, मानो वज्रके मारे हुए पहाड़ फट पड़े हों ॥ ५३ ॥

ते वध्यमानाश्च नरेन्द्रमुख्या निर्भिद्यन्तो भीमशरप्रवेकैः ॥ ६ ॥

भीमं समन्तात् समरेऽभ्यरोहन् वृक्षं शकुन्ता इव जातपक्षाः । जैसे जिनके पंख निकल आये हैं, वे पक्षी सब ओरसे उड़कर किसी वृक्षपर चढ़ बैठते हैं, उसी प्रकार भीमसेनके उत्तम बाणोंसे आहत और विदीर्ण होनेवाले प्रधान- प्रधान नरेश समरांगणमें सब ओरसे भीमसेनपर ही चढ़ आये ॥ ६३ ॥

ततोऽभियाते तव सैन्ये स भीमः प्रादुश्चक्रे वेगमनन्तवेगः ॥ ७ ॥

यथान्तकाले क्षपयन् दिधक्षु- र्भूतान्तकृत् काल इवात्तदण्डः । आपकी सेनाके आक्रमण करनेपर अनन्त वेगशाली भीमसेनने अपना महान् वेग प्रकट किया । ठीक उसी तरह, जैसे प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाला काल हाथमें दण्ड लिये सबको नष्ट और दग्ध करनेकी इच्छासे असीम वेग प्रकट करता है ॥ तस्यातिवेगस्य रणेऽतिवेगं नाशक्नुवन् वारयितुं त्वदीयाः ॥ ८ ॥

व्यात्ताननस्यापततो यथैव कालस्य काले हरतः प्रजा वै । अत्यन्त वेगशाली भीमसेनके महान् वेगको आपके सैनिक रणभूमिमें रोक न सके । जैसे प्रलयकालमें मुँह बाकर आक्रमण करनेवाले प्रजासंहारकारी कालके वेगको कोई नहीं रोक सकता ॥ ८३ ॥

ततो बलं भारत भारतानां प्रदह्यमानं समरे महात्मना ॥ ९ ॥

भीतं दिशोऽकीर्यत भीमनुन्नं

पृष्ठ 2200

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महानिलेनाभ्रगणा यथैव । भारत! तदनन्तर समरांगणमें महामना भीमसेनके द्वारा दग्ध होती हुई कौरव - सेना भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गयी । जैसे आँधी बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देती है, उसी प्रकार भीमसेनने आपके सैनिकोंको मार भगाया था ॥ ९ ३ ॥ ततो धीमान् सारथिमब्रवीद् बली स भीमसेनः पुनरेव हृष्टः ॥ १० ॥

सूताभिजानीहि स्वकान् परान् वा

रथान् ध्वजांश्चापततः समेतान् ।

युद्धयन् ह्यहं नाभिजानामि किंचि- न्मा सैन्यं स्वं छादयिष्ये पृषत्कैः ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् बलवान् और बुद्धिमान् भीमसेन हर्षसे उल्लसित हो अपने सारथिसे पुनः इस प्रकार बोले — ' सूत! ये जो बहुत- से रथ और ध्वज एक साथ इधर बढ़े आ रहे हैं, उन्हें पहचानो तो सही! ये अपने पक्षके हैं या शत्रुपक्षके? क्योंकि युद्ध करते समय मुझे अपने-परायेका ज्ञान नहीं रहता, कहीं ऐसा न हो कि अपनी ही सेनाको बाणोंसे आच्छादित कर डालूँ ॥ १०-११ ॥ अरीन् विशोकाभिनिरीक्ष्य सर्वतो मनस्तु चिन्ता प्रदुनोति मे भृशम् । राजाऽऽतुरो नागमद् यत् किरीटी बहूनि दुःखान्यभियातोऽस्मि सूत ॥ १२ ॥

‘विशोक! सम्पूर्ण दिशाओंमें शत्रुओंको देखकर उठी हुई चिन्ता मेरे हृदयको अत्यन्त संतप्त कर रही है; क्योंकि राजा युधिष्ठिर बाणोंके आघातसे पीड़ित हैं और किरीटधारी अर्जुन अभीतक उनका समाचार लेकर लौटे नहीं । सूत! इन सब कारणोंसे मुझे बहुत दुःख हो रहा है ॥ १२ ॥

एतद् दुःखं सारथे धर्मराजो यन्मां हित्वा यातवान् शत्रुमध्ये । नैनं जीवं नाद्य जानाम्यजीवं बीभत्सुं वा तन्ममाद्यातिदुःखम् ॥ १३ ॥

‘ सारथे! पहले तो इस बातका दुःख हो रहा है कि धर्मराज मुझे छोड़कर स्वयं ही शत्रुओंके बीचमें चले गये । पता नहीं, वे अबतक जीवित हैं या नहीं? अर्जुनका भी कोई समाचार नहीं मिला; इससे आज मुझे अधिक दुःख है ॥ सोऽहं द्विषत्सैन्यमुदग्रकल्पं विनाशयिष्ये परमप्रतीतः । एतन्निहत्याजिमध्ये समेतं