04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2231–2240
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2231–2240
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दृश्यते वानरो भीमो वीराणां भयवर्धनः ॥ २२ ॥
'कुन्तीकुमार अर्जुनकी ध्वजाके अग्रभागमें एक भयंकर वानर दिखायी देता है, जो सब ओर देखता हुआ कौरववीरोंका भय बढ़ा रहा है ॥ २२ ॥
एतच्चक्रं गदा शङ्खः शार्ङ्गं कृष्णस्य च प्रभो ।
दृश्यते पाण्डवरथे वाहयानस्य वाजिनः ॥ २३ ॥
‘ पाण्डुपुत्रके रथपर बैठकर घोड़े हाँकते हुए भगवान् श्रीकृष्णके ये चक्र, गदा, शंख तथा शार्ङ्गधनुष दृष्टिगोचर हो रहे हैं ॥ २३ ॥
एतत् कूजति गाण्डीवं विसृष्टं सव्यसाचिना ।
एते हस्तवता मुक्ता घ्नन्त्यमित्रान् शिताः शराः ॥ २४ ॥
' यह सव्यसाचीके द्वारा खींचा गया गाण्डीव धनुष टंकार रहा है, सिद्धहस्त अर्जुनके छोड़े हुए ये पैने बाण शत्रुओंका विनाश कर रहे हैं ॥ २४ ॥
विशालायतताम्राक्षैः पूर्णचन्द्रनिभाननैः ।
एषा भूः कीर्यते राज्ञां शिरोभिरपलायिनाम् ॥ २५ ॥
‘ जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते, उन राजाओंके कटे हुए मस्तकोंसे यह रणभूमि पटी जा रही है । उन मस्तकोंके नेत्र बड़े - बड़े और लाल हैं तथा मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है ॥ २५ ॥
एते परिघसंकाशाः पुण्यगन्धानुलेपनाः ।
उद्धता रणशूराणां पात्यन्ते सायुधा भुजाः ॥ २६ ॥
‘ रणवीरोंकी ये अस्त्र - शस्त्रोंसहित उठी हुई भुजाएँ, जो परिघोंके समान मोटी तथा पवित्र सुगन्धयुक्त चन्दनसे चर्चित हैं, काटकर गिरायी जा रही हैं ॥ २६ ॥
निरस्तजिह्वानेत्रान्ता वाजिनः सह सादिभिः ।
पतिताः पात्यमानाश्च क्षितौ क्षीणा विशेरते ॥ २७ ॥
‘ ये कौरवपक्षके सवारोंसहित घोड़े क्षत- विक्षत हो, अर्जुनके द्वारा गिराये जा रहे हैं ।
इनकी जीभें और आँखें बाहर निकल आयी हैं । ये गिरकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ २७ ॥
एते पर्वतशृङ्गाणां तुल्या हैमवता गजाः ।
संछिन्नकुम्भाः पार्थेन प्रपतन्त्यद्रयो यथा ॥ २८ ॥
‘ ये हिमाचलप्रदेशके हाथी, जो पर्वत-शिखरोंके समान जान पड़ते हैं, पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे हैं । अर्जुनने इनके कुम्भस्थल काट डाले हैं ॥ २८ ॥
गन्धर्वनगराकारा रथा वा ते नरेश्वराः ।
विमानादिव पुण्यान्ते स्वर्गिणो निपतन्त्यमी ॥ २ ९ ॥
‘ ये गन्धर्व - नगरके समान विशाल रथ हैं, जिनसे ये मारे गये राजालोग उसी प्रकार नीचे गिर रहे हैं, जैसे पुण्य समाप्त होनेपर स्वर्गवासी प्राणी विमानसे नीचे गिर जाते हैं ॥ २ ९ ॥ व्याकुलीकृतमत्यर्थं परसैन्यं किरीटिना ।
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नानामृगसहस्राणां यूथं केसरिणां यथा ॥ ३० ॥
‘ किरीटधारी अर्जुनने शत्रुसेनाको उसी प्रकार अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, जैसे सिंह नाना जातिके सहस्रों मृगोंके झुंडको व्याकुल कर देता है ॥ ३० ॥
त्वामभिप्रेप्सुरायाति कर्ण निघ्नन् वरान् रथान् ।
असह्यमानो राधेय तं याहि प्रति भारत ॥ ३१ ॥
' राधापुत्र कर्ण! अर्जुन बड़े - बड़े रथियोंका संहार करते हुए तुम्हें ही प्राप्त करनेके लिये इधर आ रहे हैं । ये शत्रुओंके लिये असह्य हैं । तुम इन भरतवंशी वीरका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो ॥ ३१ ॥
( घृणां त्यक्त्वा प्रमादं च भृगोरस्त्रं च संस्मर । दृष्टिं मुष्टिं च संधानं स्मृत्वा रामोपदेशजम् । धनंजयं जयप्रेप्सुः प्रत्युद्गच्छ महारथम् ॥ ) ' कर्ण! तुम दया और प्रमाद छोड़कर भृगुवंशी परशुरामजीके दिये हुए अस्त्रका स्मरण करो, उनके उपदेशके अनुसार लक्ष्यकी ओर दृष्टि रखना, धनुषको अपनी मुट्ठीसे दृढ़तापूर्वक पकड़े रहना और बाणोंका संधान करना आदि बातें याद करके मनमें विजय पानेकी इच्छा लिये महारथी अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो ।
एषा विदीर्यते सेना धार्तराष्ट्री समन्ततः ।
अर्जुनस्य भयात् तूर्णं निघ्नतः शात्रवान् बहून् ॥ ३२ ॥
' अर्जुन थोड़ी ही देरमें बहुत - से शत्रुओंका संहार कर डालते हैं, इसलिये उनके भयसे दुर्योधनकी यह सेना चारों ओरसे छिन्न - भिन्न होकर भागी जा रही है ॥ ३२ ॥
वर्जयन् सर्वसैन्यानि त्वरते हि धनंजयः ।
त्वदर्थमिति मन्येऽहं यथास्योदीर्यते वपुः ॥ ३३ ॥
‘ इस समय अर्जुनका शरीर जैसा उत्तेजित हो रहा है उससे मैं समझता हूँ कि वे सारी सेनाओंको छोड़कर तुम्हारे पास पहुँचनेके लिये जल्दी कर रहे हैं ॥ ३३ ॥
न ह्यवस्थास्यते पार्थो युयुत्सुः केनचित् सह ।
त्वामृते क्रोधदीप्तो हि पीड्यमाने वृकोदरे ॥ ३४ ॥
‘ भीमसेनके पीड़ित होनेसे अर्जुन क्रोधसे तमतमा उठे हैं, इसलिये आज तुम्हारे सिवा और किसीसे युद्ध करनेके लिये वे नहीं रुक सकेंगे ॥ ३४ ॥
विरथं धर्मराजं तु दृष्ट्वा सुदृढविक्षतम् ।
शिखण्डिनं सात्यकिं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ॥ ३५ ॥
द्रौपदेयान् युधामन्युमुत्तमौजसमेव च ।
नकुलं सहदेवं च भ्रातरौ द्वौ समीक्ष्य च ॥ ३६ ॥
सहसैकरथः पार्थस्त्वामभ्येति परंतपः ।
क्रोधरक्तेक्षणः क्रुद्धो जिघांसुः सर्वपार्थिवान् ॥ ३७ ॥
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' तुमने धर्मराज युधिष्ठिरको अत्यन्त घायल करके रथहीन कर दिया है । शिखण्डी, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पुत्रों, उत्तमौजा, युधामन्यु तथा दोनों भाई नकुल-सहदेवको भी तुम्हारे हाथों बहुत चोट पहुँची है । यह सब देखकर शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुन अत्यन्त कुपित हो उठे हैं । उनके नेत्र रोषसे रक्तवर्ण हो गये हैं, अतः वे समस्त राजाओंका संहार करनेकी इच्छासे एकमात्र रथके साथ सहसा तुम्हारे ऊपर चढ़े आ रहे हैं ॥ ३५—३७ ||
त्वरितो ऽभिपतत्यस्मांस्त्यक्त्वा सैन्यान्यसंशयम् ।
त्वं कर्ण प्रतियाह्येनं नास्त्यन्यो हि धनुर्धरः ॥ ३८ ॥
' इसमें संदेह नहीं कि वे सारी सेनाओंको छोड़कर बड़ी उतावलीके साथ हमलोगोंपर टूट पड़े हैं; अतः कर्ण! अब तुम भी इनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो, क्योंकि तुम्हारे सिवा दूसरा कोई धनुर्धर ऐसा करनेमें समर्थ नहीं है ॥ ३८ ॥
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिंस्त्वत्तो ह्यन्यं धनुर्धरम् ।
अर्जुनं समरे क्रुद्धं यो वेलामिव धारयेत् ॥ ३ ९ ॥
‘ इस संसारमें मैं तुम्हारे सिवा दूसरे किसी धनुर्धरको ऐसा नहीं देखता जो समुद्रमें उठे हुए ज्वारके समान समरांगणमें कुपित हुए अर्जुनको रोक सके ॥ ३ ९ ॥
न चास्य रक्षां पश्यामि पार्श्वतो न च पृष्ठतः ।
एक एवाभियाति त्वां पश्य साफल्यमात्मनः ॥ ४० ॥
‘ मैं देखता हूँ कि अगल - बगलसे या पीछेकी ओरसे उनकी रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं किया गया है । वे अकेले ही तुमपर चढ़ाई कर रहे हैं; अतः देखो, तुम्हें अपनी सफलताके लिये कैसा सुन्दर अवसर हाथ लगा है ॥ ४० ॥
त्वं हि कृष्णौ रणे सक्तः संसाधयितुमाहवे ।
तवैव भारो राधेय प्रत्युद्याहि धनंजयम् ॥ ४१ ॥
‘ राधापुत्र! रणभूमिमें तुम्हीं श्रीकृष्ण और अर्जुनको परास्त करनेकी शक्ति रखते हो, तुम्हारे ऊपर ही यह भार रखा गया है; इसलिये तुम अर्जुनको रोकनेके लिये आगे बढ़ो ॥ ४१ ॥
समानो ह्यसि भीष्मेण द्रोणद्रौणिकृपेण च ।
सव्यसाचिनमायान्तं निवारय महारणे ॥ ४२ ॥
' तुम भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्यके समान पराक्रमी हो, अतः इस महासमरमें आक्रमण करते हुए सव्यसाची अर्जुनको रोको ॥ ४२ ॥
लेलिहानं यथा सर्पं गर्जन्तमृषभं यथा ।
वनस्थितं यथा व्याघ्रं जहि कर्ण धनंजयम् ॥ ४३ ॥
‘ कर्ण! जीभ लपलपाते हुए सर्प, गर्जते हुए साँड़ और वनवासी व्याघ्रके समान भयंकर अर्जुनका तुम वध करो ॥ ४३ ॥
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एते द्रवन्ति समरे धार्तराष्ट्रा महारथाः ।
अर्जुनस्य भयात् तूर्णं निरपेक्षा जनाधिपाः ॥ ४४ ॥
'देखो! समरभूमिमें दुर्योधनकी सेनाके ये महारथी नरेश अर्जुनके भयसे आत्मीयजनोंकी भी अपेक्षा न रखकर बड़ी उतावलीके साथ भागे जा रहे हैं ॥ ४४ ॥
द्रवतामथ तेषां तु नान्योऽस्ति युधि मानवः ।
भयहा यो भवेद् वीरस्त्वामृते सूतनन्दन ॥ ४५ ॥
‘ सूतनन्दन! इस युद्धस्थलमें तुम्हारे सिवा ऐसा कोई भी वीर पुरुष नहीं है, जो उन भागते हुए नरेशोंका भय दूर कर सके ॥ ४५ ॥
एते त्वां कुरवः सर्वे द्वीपमासाद्य संयुगे ।
धिष्ठिताः पुरुषव्याघ्र त्वत्तः शरणकाङ्क्षिणः ॥ ४६ ॥
‘ पुरुषसिंह! इस समुद्र - जैसे युद्धस्थलमें तुम द्वीपके समान हो । ये समस्त कौरव तुमसे शरण पानेकी आशा रखकर, तुम्हारे ही आश्रयमें आकर खड़े हुए हैं ॥ ४६ ॥
वैदेहाम्बष्ठकाम्बोजास्तथा नग्नजितस्त्वया ।
गान्धाराश्च यया धृत्या जिताः संख्ये सुदुर्जयाः ।
तां धृतिं कुरु राधेय ततः प्रत्येहि पाण्डवम् ॥ ४७ ॥
‘ राधानन्दन! तुमने जिस धैर्यसे पहले अत्यन्त दुर्जय विदेह, अम्बष्ठ, काम्बोज, नग्नजित् तथा गान्धार- गणोंको युद्धमें पराजित किया था, उसीको पुनः अपनाओ और पाण्डुपुत्र अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो ॥ ४७ ॥
वासुदेवं च वार्ष्णेयं प्रीयमाणं किरीटिना ।
प्रत्युद्याहि महाबाहो पौरुषे महति स्थितः ॥ ४८ ॥
‘ महाबाहो! तुम महान् पुरुषार्थमें स्थित होकर अर्जुनसे सतत प्रसन्न रहनेवाले वृष्णिवंशी, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका भी सामना करो ॥ ४८ ॥
(यथैकेन त्वया पूर्वं कृतो दिग्विजयः पुरा ।
मरुत्सूनोर्यथा सूनुर्घातितः शक्रदत्तया ॥
तदेतत् सर्वमालम्ब्य जहि पार्थं धनंजयम् । ) 'जैसे पूर्वकालमें तुमने अकेले ही सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पायी थी, इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे भीमपुत्र घटोत्कचका वध किया था, उसी तरह इस सारे बल- पराक्रमका आश्रय ले कुन्तीपुत्र अर्जुनको मार डालो ’ । कर्णउवाच
प्रकृतिस्थोऽसि मे शल्य इदानीं सम्मतस्तथा ।
प्रतिभासि महाबाहो मा भैषीस्त्वं धनंजयात् ॥ ४ ९ ॥
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कर्णने कहा — शल्य! इस समय तुम अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो और मुझसे सहमत जान पड़ते हो । महाबाहो! तुम अर्जुनसे डरो मत ॥ ४ ९ ॥
पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य शिक्षितस्य च पश्य मे ।
एकोऽद्य निहनिष्यामि पाण्डवानां महाचमूम् ॥ ५० ॥
आज मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखो और मेरी शिक्षाकी शक्तिपर भी दृष्टिपात करो । आज मैं अकेला ही पाण्डवोंकी विशाल सेनाका संहार कर डालूँगा ॥ ५० ॥
कृष्णौ च पुरुषव्याघ्र ततः सत्यं ब्रवीमि ते ।
नाहत्वा युधि तौ वीरौ व्यपयास्ये कथंचन ॥ ५१ ॥
पुरुषसिंह! मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ कि युद्धस्थलमें उन दोनों वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध किये बिना मैं किसी तरह पीछे नहीं हटँगा ॥ ५१ ॥
स्वप्स्ये वा निहतस्ताभ्यामनित्यो हि रणे जयः ।
कृतार्थोऽद्य भविष्यामि हत्वा वाप्यथवा हतः ॥ ५२ ॥
अथवा उन्हीं दोनोंके हाथों मारा जाकर सदाके लिये सो जाऊँगा, क्योंकि रणमें विजय अनिश्चित होती है । आज मैं उन दोनोंको मारकर अथवा मारा जाकर सर्वथा कृतार्थ हो जाऊँगा ॥ ५२ ॥
शल्य उवाच अजय्यमेनं प्रवदन्ति युद्धे महारथाः कर्ण रथप्रवीरम् । एकाकिनं किमु कृष्णाभिगुप्तं विजेतुमेनं क इहोत्सहेत ॥ ५३ ॥
शल्यने कहा — कर्ण! रथियोंमें प्रमुख वीर अर्जुन अकेले भी हों तो महारथी योद्धा उन्हें युद्धमें अजेय बताते हैं, फिर इस समय तो वे श्रीकृष्णसे सुरक्षित हैं; ऐसी दशामें कौन इन्हें जीतनेका साहस कर सकता है? ॥ ५३ ॥
कर्णउवाच नैतादृशो जातु बभूव लोके रथोत्तमो यावदुपश्रुतं नः । तमीदृशं प्रतियोत्स्यामि पार्थ महाहवे पश्य च पौरुषं मे ॥ ५४ ॥
कर्ण बोला— शल्य! मैंने जहाँतक सुना है, वहाँतक संसारमें ऐसा श्रेष्ठ महारथी वीर कभी नहीं उत्पन्न हुआ, ऐसे कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ मैं महासमरमें युद्ध करूँगा, मेरा पुरुषार्थ देखो ॥ ५४ ॥
रणे चरत्येष रथप्रवीरः
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सितैर्हयैः कौरवराजपुत्रः । स वाद्य मां नेष्यति कृच्छ्रमेतत् कर्णस्यान्तादेतदन्तास्तु सर्वे ॥ ५५ ॥
ये रथियोंमें प्रधान वीर कौरवराजकुमार अर्जुन अपने श्वेत अश्वोंद्वारा रणभूमिमें विचर रहे हैं । ये आज मुझे मृत्युके संकटमें डाल देंगे और मुझ कर्णका अन्त होनेपर कौरवदलके अन्य समस्त योद्धाओंका विनाश भी निश्चित ही है ॥ ५५ ॥
अस्वेदिनौ राजपुत्रस्य हस्ता- ववेपमानौ जातकिणौ बृहन्तौ । दृढायुधः कृतिमान् क्षिप्रहस्तो न पाण्डवेयेन समोऽस्ति योधः ॥ ५६ ॥
राजकुमार अर्जुनके दोनों विशाल हाथोंमें कभी पसीना नहीं होता, उनमें धनुषकी प्रत्यंचाके चिह्न बन गये हैं और वे दोनों हाथ कभी काँपते नहीं हैं । उनके अस्त्र- शस्त्र भी सुदृढ़ हैं । वे विद्वान् एवं शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं । पाण्डुपुत्र अर्जुनके समान दूसरा कोई योद्धा नहीं है ॥ ५६ ॥
गृह्णात्यनेकानपि कङ्कपत्रा- कं यथा तान् प्रतियोज्य चाशु । क्रोशमात्रे निपतन्त्यमोघाः कस्तेन योधोऽस्ति समः पृथिव्याम् ॥ ५७ ॥
वे कंकपत्रयुक्त अनेक बाणोंको इस प्रकार हाथमें लेते हैं, मानो एक ही बाण हो और उन सबको शीघ्रतापूर्वक धनुषपर रखकर चला देते हैं । वे अमोघ बाण एक कोस दूर जाकर गिरते हैं; अतः इस पृथ्वीपर उनके समान दूसरा योद्धा कौन है? ॥ ५७ ॥
अतोषयत् खाण्डवे यो हुताशं कृष्णद्वितीयोऽतिरथस्तरस्वी । लेभे चक्रं यत्र कृष्णो महात्मा धनुर्गाण्डीवं पाण्डवः सव्यसाची ॥ ५८ ॥
उन वेगशाली और अतिरथी वीर अर्जुनने अपने दूसरे साथी श्रीकृष्णके साथ जाकर खाण्डववनमें अग्निदेवको तृप्त किया था, जहाँ महात्मा श्रीकृष्णको तो चक्र मिला और पाण्डुपुत्र सव्यसाची अर्जुनने गाण्डीव धनुष प्राप्त किया ॥ ५८ ॥
श्वेताश्वयुक्तं च सुघोषमुग्रं रथं महाबाहुरदीनसत्त्वः । महेषुधी चाक्षये दिव्यरूपे शस्त्राणि दिव्यानि च हव्यवाहात् ॥ ५ ९ ॥
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उदार अन्तःकरणवाले महाबाहु अर्जुनने अग्निदेवसे श्वेत घोड़ोंसे जुता हुआ गम्भीर घोष करनेवाला एक भयंकर रथ, दो दिव्य विशाल और अक्षय तरकस तथा अलौकिक अस्त्र- शस्त्र प्राप्त किये ॥ ५ ९ ॥ तथेन्द्रलोके निजघान दैत्या- नसंख्येयान् कालकेयांश्च सर्वान् । लेभे शङ्खं देवदत्तं स्म तत्र को नाम तेनाभ्यधिकः पृथिव्याम् ॥ ६० ॥
उन्होंने इन्द्रलोकमें जाकर असंख्य कालकेय नामक सम्पूर्ण दैत्योंका संहार किया और वहाँ देवदत्त नामक शंख प्राप्त किया; अतः इस पृथ्वीपर उनसे अधिक कौन है? ॥ महादेवं तोषयामास योऽस्त्रैः साक्षात् सुयुद्धेन महानुभावः । लेभे ततः पाशुपतं सुघोरं त्रैलोक्यसंहारकरं महास्त्रम् ॥ ६१ ॥
जिन महानुभावने अस्त्रोंद्वारा उत्तम युद्ध करके साक्षात् महादेवजीको संतुष्ट किया और उनसे त्रिलोकीका संहार करनेमें समर्थ अत्यन्त भयंकर पाशुपतनामक महान् अस्त्र प्राप्त कर लिया ॥ ६१ ॥
पृथक् पृथग्लोकपालाः समेता ददुर्महास्त्राण्यप्रमेयाणि संख्ये । यैस्ताञ्जघानाशु रणे नृसिंहः सकालकेयानसुरान् समेतान् ॥ ६२ ॥
भिन्न-भिन्न लोकपालोंने आकर उन्हें ऐसे महान् अस्त्र प्रदान किये जो युद्धस्थलमें अपना सानी नहीं रखते। उन पुरुषसिंहने रणभूमिमें उन्हीं अस्त्रोंद्वारा संगठित होकर आये हुए कालकेय नामक असुरोंका शीघ्र ही संहार कर डाला ॥ ६२ ॥
तथा विराटस्य पुरे समेतान् सर्वानस्मानेकरथेन जित्वा । जहार तद् गोधनमाजिमध्ये वस्त्राणि चादत्त महारथेभ्यः ॥ ६३ ॥
इसी प्रकार विराटनगरमें एकत्र हुए हम सब लोगोंको एकमात्र रथके द्वारा युद्धमें जीतकर अर्जुनने उस विराटका गोधन लौटा लिया और महारथियोंके शरीरोंसे वस्त्र भी उतार लिये ॥ ६३ ॥
तमीदृशं वीर्यगुणोपपन्नं कृष्णद्वितीयं परमं नृपाणाम् । तमाह्वयन् साहसमुत्तमं वै
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जाने स्वयं सर्वलोकस्य शल्य ॥ ६४ ॥
शल्य! इस प्रकार जो पराक्रमसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न, श्रीकृष्णकी सहायतासे युक्त और क्षत्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, उन्हें युद्धके लिये ललकारना सम्पूर्ण जगत्के लिये बहुत बड़े साहसका काम है; इस बातको मैं स्वयं भी जानता हूँ ॥ ६४ ॥
अनन्तवीर्येण च केशवेन नारायणेनाप्रतिमेन गुप्तः । वर्षायुतैर्यस्य गुणा न शक्या वक्तुं समेतैरपि सर्वलोकैः ॥ ६५ ॥
महात्मनः शङ्खचक्रासिपाणे- र्विष्णोर्जिष्णोर्वसुदेवात्मजस्य । अर्जुन उन अनन्त पराक्रमी, उपमारहित, नारायणावतार, हाथोंमें शंख, चक्र और खड्ग धारण करनेवाले, विष्णुस्वरूप, विजयशील, वसुदेवपुत्र महात्मा भगवान् श्रीकृष्णसे सुरक्षित हैं; जिनके गुणोंका वर्णन सम्पूर्ण जगत् के लोग मिलकर दस हजार वर्षोंमें भी नहीं कर सकते ॥ ६५३ ॥
भयं मे वै जायते साध्वसं च दृष्ट्वा कृष्णावेकरथे समेतौ ॥ ६६ ॥
अतीव पार्थो युधि कार्मुकिभ्यो नारायणश्चाप्रति चक्रयुद्धे । एवंविधौ पाण्डववासुदेवौ चलेत् स्वदेशाद्धिमवान् न कृष्णौ ॥ ६७ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुनको एक रथपर मिले हुए देखकर मुझे बड़ा भय लगता है, मेरा हृदय घबरा उठता है। अर्जुन युद्धमें समस्त धनुर्धरोंसे बढ़कर हैं और नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण भी चक्र- युद्धमें अपना सानी नहीं रखते। पाण्डुपुत्र अर्जुन और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण दोनों ऐसे ही पराक्रमी हैं । हिमालय भले ही अपने स्थानसे हट जाय; किंतु दोनों कृष्ण अपनी मर्यादासे विचलित नहीं हो सकते ॥ हि शूरौ लौ दृढायुधौ महारथौ संहननोपपन्नौ । एतादृशौ फाल्गुनवासुदेवौ कोऽन्यः प्रतीयान्मदृते तौ तु शल्य ॥ ६८ ॥
वे दोनों ही शौर्यसम्पन्न, बलवान्, सुदृढ़ आयुधोंवाले और महारथी हैं, उनके शरीर सुगठित एवं शक्तिशाली हैं । शल्य! ऐसे अर्जुन और श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये मेरे सिवा दूसरा'कौन जा सकता है? ॥ ६८ ॥
मनोरथो यस्तु ममाद्य तस्य
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मद्रेश युद्धं प्रति पाण्डवस्य ।
नैतच्चिरादाशु भविष्यतीद- मत्यद्भुतं चित्रमतुल्यरूपम् ॥ ६ ९ ॥
एतौ च हत्वा युधि पातयिष्ये मां वापि कृष्ण निहनिष्यतोऽद्य । मद्रराज! अर्जुनके साथ युद्धके विषयमें जो आज मेरा मनोरथ है, वह अविलम्ब और शीघ्र सफल होगा । यह युद्ध अत्यन्त अद्भुत, विचित्र और अनुपम होगा । मैं युद्धस्थलमें इन दोनोंको मार गिराऊँगा अथवा वे दोनों ही कृष्ण मुझे मार डालेंगे ॥ ६ ९ ॥ इति ब्रुवन् शल्यममित्रहन्ता कर्णो रणे मेघ इवोन्ननाद ॥ ७० ॥
अभ्येत्य पुत्रेण तवाभिनन्दितः समेत्य चोवाच कुरुप्रवीरम् । कृपं च भोजं च महाभुजावुभौ तथैव गान्धारपतिं सहानुजम् ॥ ७१ ॥
गुरोः सुतं चावरजं तथाऽऽत्मनः पदातिनोऽथ द्विपसादिनश्च तान् । निरुध्यताभिद्रवताच्युतार्जुनौ श्रमेण संयोजयताशु सर्वशः ॥ ७२ ॥
यथा भवद्भिर्भृशविक्षितावुभौ सुखेन हन्यामहमद्य भूमिपाः । राजन्! शत्रुहन्ता कर्ण शल्यसे ऐसा कहकर रणभूमिमें मेघके समान उच्चस्वरसे गर्जना करने लगा । उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने निकट आकर उसका अभिनन्दन किया । उससे मिलकर कर्णने कुरुकुलके उस प्रमुख वीरसे, महाबाहु कृपाचार्य और कृतवर्मासे, भाइयोंसहित गान्धारराज शकुनिसे, गुरुपुत्र अश्वत्थामासे, अपने छोटे भाईसे तथा पैदल और गजारोही सैनिकोंसे इस प्रकार कहा- ' वीरो! श्रीकृष्ण और अर्जुनपर धावा करो, उन्हें आगे बढ़नेसे रोको तथा शीघ्र ही सब प्रकारसे प्रयत्न करके उन्हें परिश्रमसे थका दो । भूमिपालो! ऐसा करो, जिससे तुम्हारेद्वारा अत्यन्त क्षत -विक्षत हुए उन दोनों कृष्णोंको आज मैं सुखपूर्वक मार सकूँ' ॥ ७०–७२ ॥ तथेति चोक्त्वा त्वरिताः स्म तेऽर्जुनं जिघांसवो वीरतराः समभ्ययुः ॥ ७३ ॥
शरैश्च जघ्नुर्युधि तं महारथा धनंजयं कर्णनिदेशकारिणः ।
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तब ‘ बहुत अच्छा ' कहकर वे अत्यन्त वीर सैनिक बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनको मार डालनेके लिये एक साथ आगे बढ़े । कर्णकी आज्ञाका पालन करनेवाले वे महारथी योद्धा युद्धस्थलमें बाणोंद्वारा अर्जुनको चोट पहुँचाने लगे ॥ ७३ ॥
नदीनदं भूरिजलो महार्णवो यथा तथा तान् समरेऽर्जुनोऽग्रसत् ॥ ७४ ॥
न संदधानो न तथा शरोत्तमान् प्रमुञ्चमानो रिपुभिः प्रदृश्यते । धनंजयास्तैस्तु शरैर्विदारिता हता निपेतुर्नरवाजिकुञ्जराः ॥ ७५ ॥
परंतु जैसे प्रचुर जलसे भरा हुआ महासागर नदियों और नदोंके जलको आत्मसात् कर लेता है, उसी प्रकार अर्जुनने समरांगणमें उन सब वीरोंको ग्रस लिया। वे कब धनुषपर उत्तम बाणोंका संधान करते और कब उन्हें छोड़ते हैं, यह शत्रुओंको नहीं दिखायी देता था; किंतु अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण हुए हाथी, घोड़े और मनुष्य प्राणशून्य हो धड़ाधड़ गिरते जा रहे थे ॥ ७४-७५ ॥ शरार्चिषं गाण्डिवचारुमण्डलं युगान्तसूर्यप्रतिमानतेजसम् । न कौरवाः शेकुरुदीक्षितुं जयं यथा रविं व्याधितचक्षुषो जनाः ॥ ७६ ॥
उस समय अर्जुन प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी जान पड़ते थे । उनके बाण किरण - समूहोंके समान सब ओर छिटक रहे थे । खींचा हुआ गाण्डीव धनुष सूर्यके मनोहर मण्डल- सा प्रतीत होता था । जैसे रोगी नेत्रोंवाले मनुष्य सूर्यकी ओर नहीं देख सकते, उसी प्रकार कौरव अर्जुनकी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ७६ ॥
शरोत्तमान् सम्प्रहितान् महारथै- श्चिच्छेद पार्थः प्रहसन् शरौघैः । भूयश्च तानहनद् बाणसङ्घान् गाण्डीवधन्वायतपूर्णमण्डलः ॥ ७७ ॥
कौरवमहारथियोंके चलाये हुए उत्तम बाणोंको कुन्तीकुमारने अपने शरसमूहोंद्वारा हँसते - हँसते काट दिया । उनका गाण्डीव धनुष खींचा जाकर पूरा मण्डलाकार बन गया था और उसके द्वारा वे उन शत्रु सैनिकोंपर बारंबार बाणसमूहोंका प्रहार करते थे ॥ ७७ ॥
यथोग्ररश्मिः शुचिशुक्रमध्यगः सुखं विवस्वान् हरते जलौघान् । तथार्जुनो बाणगणान् निरस्य ददाह सेनां तव पार्थिवेन्द्र ॥ ७८ ॥