04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2381–2390
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2381–2390
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जग्राह बाणं यमदण्डकल्पम् ॥ ३२ ॥
ततोऽर्जुनः प्राञ्जलिकं महात्मा ततोऽब्रवीद वासुदेवोऽपि पार्थम् । छिन्ध्यस्य मूर्धानमरेः शरेण न यावदारोहति वै रथं वृषः ॥ ३३ ॥
इसी समय होशमें आकर किरीटधारी महात्मा अर्जुनने यमदण्डके समान भयंकर आंजलिक नामक बाण हाथमें लिया । यह देख भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनसे कहा -'पार्थ! कर्ण जबतक रथपर नहीं चढ़ जाता तबतक ही अपने बाणके द्वारा इस शत्रुका मस्तक काट डालो' ॥ तथैव सम्पूज्य स तद् वचः प्रभो- स्ततः शरं प्रज्वलितं प्रगृह्य । जघान कक्षाममलार्कवर्णां महारथे रथचक्रे विमग्ने ॥ ३४ ॥
तब ‘ बहुत अच्छा ' कहकर अर्जुनने भगवान्की उस आज्ञाको सादर शिरोधार्य किया और उस प्रज्वलित बाणको हाथमें लेकर जिसका पहिया फँसा हुआ था, कर्णके उस विशाल रथपर फहराती हुई सूर्यके समान प्रकाशमान ध्वजापर प्रहार किया ॥ ३४ ॥
तं हस्तिकक्षाप्रवरं च केतुं सुवर्णमुक्तामणिवज्रपृष्ठम् । ज्ञानप्रकर्षोत्तमशिल्पियुक्तैः कृतं सुरूपं तपनीयचित्रम् ॥ ३५ ॥
हाथीकी साँकलके चिह्नसे युक्त उस श्रेष्ठ ध्वजाके पृष्ठभागमें सुवर्ण, मुक्ता, मणि और हीरे जड़े हुए थे । अत्यन्त ज्ञानवान् एवं उत्तम शिल्पियोंने मिलकर उस सुवर्णजटित सुन्दर ध्वजाका निर्माण किया था ॥ ३५ ॥
जयास्पदं तव सैन्यस्य नित्य- ममित्रवित्रासनमीड्यरूपम् । विख्यातमादित्यसमं स्म लोके त्विषा समं पावकभानुचन्द्रैः ॥ ३६ ॥
वह विश्वविख्यात ध्वजा आपकी सेनाकी विजयका आधार स्तम्भ होकर सदा शत्रुओंको भयभीत करती रहती थी । उसका स्वरूप प्रशंसाके ही योग्य था । वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी समानता करती थी ॥ ३६ ॥
ततः क्षुरप्रेण सुसंशितेन सुवर्णपुङ्खेन हुताग्निवर्चसा । श्रिया ज्वलन्तं ध्वजमुन्ममाथ
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महारथस्याधिरथेः किरीटी ॥ ३७ ॥
किरीटधारी अर्जुनने सोनेके पंखवाले और आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान तेजस्वी उस तीखे क्षुरप्रसे महारथी कर्णके उस ध्वजको नष्ट कर दिया, जो अपनी प्रभासे निरन्तर देदीप्यमान होता रहता था ॥ ३७ ॥
यशश्च दर्पश्च तथा प्रियाणि सर्वाणि कार्याणि च तेन केतुना । साकं कुरूणां हृदयानि चापतन् बभूव हाहेति च निःस्वनो महान् ॥ ३८ ॥
कटकर गिरते हुए उस ध्वजके साथ ही कौरवोंके यश, अभिमान, समस्त प्रिय कार्य तथा हृदयका भी पतन हो गया और चारों ओर महान् हाहाकार मच गया ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा ध्वजं पातितमाशुकारिणा कुरुप्रवीरेण निकृत्तमाहवे । नाशंसिरे सूतपुत्रस्य सर्वे जयं तदा भारत ये त्वदीयाः ॥ ३ ९ ॥ भारत! शीघ्रकारी कौरव वीर अर्जुनके द्वारा युद्धस्थलमें उस ध्वजको काटकर गिराया हुआ देख उस समय आपके सभी सैनिकोंने सूतपुत्रकी विजयकी आशा त्याग दी ॥ ३ ९ ॥ अथ त्वरन् कर्णवधाय पार्थो महेन्द्रवज्रानलदण्डसंनिभम् । आदत्त चाथाञ्जलिकं निषङ्गात् सहस्ररश्मेरिव रश्मिमुत्तमम् ॥ ४० ॥
तदनन्तर कर्णके वधके लिये शीघ्रता करते हुए अर्जुनने अपने तरकससे एक अंजलिक नामक बाण निकाला, जो इन्द्रके वज्र और अग्निके दण्डके समान भयंकर तथा सूर्यकी एक उत्तम किरणके समान कान्तिमान् था ॥ ४० ॥
मर्मच्छिदं शोणितमांसदिग्धं वैश्वानरार्कप्रतिमं महार्हम् । नराश्वनागासुहरं त्र्यरत्निं षड्वाजमञ्जोगतिमुग्रवेगम् ॥ ४१ ॥
सहस्रनेत्राशनितुल्यवीर्यं कालानलं व्यात्तमिवातिघोरम् । पिनाकनारायणचक्रसंनिभं भयङ्करं प्राणभृतां विनाशनम् ॥ ४२ ॥
वह शत्रुके मर्मस्थलको छेदनेमें समर्थ, रक्त और मांससे लिप्त होनेवाला, अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी, बहुमूल्य, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाला, मूठी बँधे हुए
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हाथसे तीन हाथ बड़ा, छ: पंखोंसे युक्त, शीघ्रगामी, भयंकर वेगशाली, इन्द्रके वज्रके तुल्य पराक्रम प्रकट करनेवाला, मुँह बाये हुए कालाग्निके समान अत्यन्त भयानक, भगवान् शिवके पिनाक और नारायणके चक्र - सदृश भयदायक तथा प्राणियोंका विनाश करनेवाला था ॥ जग्राह पार्थः स शरं प्रहृष्टो यो देवसङ्घैरपि दुर्निवार्यः । सम्पूजितो यः सततं महात्मा देवासुरान् यो विजयेन्महेषुः ॥ ४३ ॥
देवताओंके समुदाय भी जिनकी गतिको अनायास नहीं रोक सकते, जो सदा सबके द्वारा सम्मानित, महामनस्वी, विशाल बाण धारण करनेवाले और देवताओं तथा असुरोंपर भी विजय पानेमें समर्थ हैं उन कुन्तीकुमार अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको हाथमें लिया ॥ ४३ ॥
तं वै प्रमृष्टं प्रसमीक्ष्य युद्धे
चचाल सर्वं सचराचरं जगत् ।
स्वस्ति जगत् स्यादृषयः प्रचुक्रुशु- स्तमुद्यतं प्रेक्ष्य महाहवेषुम् ॥ ४४ ॥
महायुद्धमें उस बाणको हाथमें लिया और ऊपर उठाया गया देख समस्त चराचर जगत् काँप उठा । ऋषिलोग चोर- जोरसे पुकार उठे कि ' जगत्का कल्याण हो! ' ॥ ४४ ॥
ततस्तु तं वै शरमप्रमेयं गाण्डीवधन्वा धनुषि व्ययोजयत् । युक्त्वा महास्त्रेण परेण चापं विकृष्य गाण्डीवमुवाच सत्वरम् ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अप्रमेय शक्तिशाली बाणको धनुषपर रखा और उसे उत्तम एवं महान् दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित करके तुरंत ही गाण्डीवको खींचते हुए कहा ॥ ४५ ॥
अयं महास्त्रप्रहितो महाशरः शरीरहृच्चासुहरश्च दुर्हृदः । तपोऽस्ति तप्तं गुरवश्च तोषिता मया यदीष्टं सुहृदां श्रुतं तथा ॥ ४६ ॥
अनेन सत्येन निहन्त्वयं शरः सुसंहितः कर्णमरिं ममोर्जितम् । इत्यूचिवांस्तं प्रमुमोच बाणं धनंजयः कर्णवधाय घोरम् ॥ ४७ ॥
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'यह महान् दिव्यास्त्रसे प्रेरित महाबाण शत्रुके शरीर, हृदय और प्राणोंका विनाश करनेवाला है । यदि मैंने तप किया हो, गुरुजनोंको सेवाद्वारा संतुष्ट रखा हो, यज्ञ किया हो और हितैषी मित्रोंकी बातें ध्यान देकर सुनी हो तो इस सत्यके प्रभावसे यह अच्छी तरह संधान किया हुआ बाण मेरे शक्तिशाली शत्रु कर्णका नाश कर डाले, ऐसा कहकर धनंजयने उस घोर बाणको कर्णके वधके लिये छोड़ दिया ॥ कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्रां दीप्तामसह्यां युधि मृत्युनापि । ब्रुवन् किरीटी तमतिप्रहृष्टो ह्ययं शरो मे विजयावहोऽस्तु ॥ ४८ ॥
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः कर्णं मयास्तो नयतां यमाय । जैसे अथर्वांगिरस मन्त्रोंद्वारा आभिचारिक प्रयोग करके उत्पन्न की हुई कृत्या उग्र, प्रज्वलित और युद्धमें मृत्युके लिये भी असह्य होती है, उसी प्रकार वह बाण भी था । किरीटधारी अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको लक्ष्य करके बोले — ' मेरा यह बाण मुझे विजय दिलानेवाला हो । इसका प्रभाव चन्द्रमा और सूर्यके समान है । मेरा छोड़ा हुआ यह घातक अस्त्र कर्णको यमलोक पहुँचा दे ' ॥ तेनेषुवर्येण किरीटमाली प्रहृष्टरूपो विजयावहेन ॥ ४ ९ ॥ जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभेण चक्रे विषक्तं रिपुमाततायी । किरीटधारी अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो अपने शत्रुको मारनेकी इच्छासे आततायी बन गये थे । उन्होंने चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले उस विजयदायक श्रेष्ठ बाणसे अपने शत्रुको बींध डाला ॥ तथा विमुक्तो बलिनार्कतेजाः प्रज्वालयामास दिशो नभश्च । ततोऽर्जुनस्तस्य शिरो जहार वृत्रस्य वज्रेण यथा महेन्द्रः ॥ ५० ॥
बलवान् अर्जुनके द्वारा इस प्रकार छोड़ा हुआ वह सूर्यके तुल्य तेजस्वी बाण आकाश एवं दिशाओंको प्रकाशित करने लगा । जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे वृत्रासुरका मस्तक काट लिया था, उसी प्रकार अर्जुनने उस बाणद्वारा कर्णका सिर धड़से अलग कर दिया ॥ ५० ॥
शरोत्तमेनाञ्जलिकेन राजं- स्तदा महास्त्रप्रतिमन्त्रितेन । पार्थोऽपराह्णे शिर उच्चकर्त
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वैकर्तनस्याथ महेन्द्रसूनुः ॥ ५१ ॥
राजन्! महान् दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित अंजलिक नामक उत्तम बाणके द्वारा इन्द्रपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनने अपराह्नकालमें वैकर्तन कर्णका सिर काट लिया ॥ ५१ ॥
तत् प्रापतच्चाञ्जलिकेन छिन्न- मथास्य कायो निपपात पश्चात् । तदुद्यतादित्यसमानतेजसं शरन्नभोमध्यगभास्करोपमम् ॥ ५२ ॥
वराङ्गमुर्व्यामपतच्चमूमुखे दिवाकरोऽस्तादिव रक्तमण्डलः । अंजलिकसे कटा हुआ कर्णका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके बाद उसका शरीर भी धराशायी हो गया । जैसे लाल मण्डलवाला सूर्य अस्ताचलसे नीचे गिरता है, उसी प्रकार उदित सूर्यके समान तेजस्वी तथा शरत्कालीन आकाशके मध्यभागमें तपनेवाले भास्करके समान दुःसह वह मस्तक सेनाके अग्रभागमें पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ५२ ॥
ततोऽस्य देहं सततं सुखोचितं सुरूपमत्यर्थमुदारकर्मणः ॥ ५३ ॥
परेण कृच्छ्रेण शिरः समत्यजद् गृहं महर्धीव सुसङ्गमीश्वरः । तदनन्तर सदा सुख भोगनेके योग्य, उदारकर्मा कर्णके उस अत्यन्त सुन्दर शरीरको उसके मस्तकने बड़ी कठिनाईसे छोड़ा । ठीक उसी तरह, जैसे धनवान् पुरुष अपने समृद्धिशाली घरको और मन एवं इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला पुरुष सत्संगको बड़े कष्टसे छोड़ पाता है ॥ ५३ ॥
शरैर्विभिन्नं व्यसु तत् सुवर्चसः पपात कर्णस्य शरीरमुच्छ्रितम् ॥ ५४ ॥
स्रवद्व्रणं गैरिकतोयविस्रवं गिरेर्यथा वज्रहतं महाशिरः । देहाच्च कर्णस्य निपातितस्य तेजः सूर्यं खं वितत्याविवेश ॥ ५५ ॥
तेजस्वी कर्णका वह ऊँचा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो घावोंसे खूनकी धारा बहाता हुआ प्राणशून्य होकर गिर पड़ा, मानो वज्रके आघातसे भग्न हुआ किसी पर्वतका विशाल शिखर गेरुमिश्रित जलकी धारा बहा रहा हो । धरतीपर गिराये गये कर्णके शरीरसे एक तेज निकलकर आकाशमें फैल गया और ऊपर जाकर सूर्यमण्डलमें विलीन हो गया ॥ तदद्भुतं सर्वमनुष्ययोधाः संदृष्टवन्तो निहते स्म कर्णे ।
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ततः शङ्खान् पाण्डवा दध्मुरुच्चै- र्दृष्ट्वा कर्णं पातितं फाल्गुनेन ॥ ५६ ॥
इस अद्भुत दृश्यको वहाँ खड़े हुए सब लोगोंने अपनी आँखों देखा था । कर्णके मारे जानेपर उसे अर्जुनद्वारा गिराया हुआ देख पाण्डवोंने उच्च स्वरसे शंख बजाया ॥ ५६ ॥
तथैव कृष्णश्च धनंजयश्च हृष्टौ यमौ दध्मतुर्वारिजातौ । तं सोमकाः प्रेक्ष्य हतं शयानं सैन्यैः सार्धं सिंहनादान् प्रचक्रुः ॥ ५७ ॥
इसी प्रकार श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा हर्षमें भरे हुए नकुल सहदेवने भी शंख बजाये ।
सोमकगण कर्णको मरकर गिरा हुआ देख अपनी सेनाओंके साथ सिंहनाद करने लगे ॥
तूर्याणि संजघ्नुरतीव हृष्टा वासांसि चैवादुधुवुर्भुजांश्च । संवर्धयन्तश्च नरेन्द्र योधाः पार्थं समाजग्मुरतीव हृष्टाः ॥ ५८ ॥
वे बड़े हर्षमें भरकर बाजे -बजाने और कपड़े तथा हाथ हिलाने लगे । नरेन्द्र! अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डव योद्धा अर्जुनको बधाई देते हुए उनके पास आकर मिले ॥ बलान्विताश्चापरे ह्यप्यनृत्य- न्नन्योन्यमाश्लिष्य नदन्त ऊचुः । दृष्ट्वा तु कर्णं भुवि वा विपन्नं कृत्तं रथात् सायकैरर्जुनस्य ॥ ५ ९ ॥ अर्जुनके बाणोंसे छिन्न -भिन्न एवं प्राणशून्य हुए कर्णको रथसे नीचे पृथ्वीपर गिरा देख दूसरे बलवान् सैनिक एक- दूसरेको गलेसे लगाकर नाचते और गर्जते हुए बातें करते थे ॥ महानिलेनाद्रिमिवापविद्धं
यज्ञावसानेऽग्निमिव प्रशान्तम् ।
रराज कर्णस्य शिरो निकृत्त- मस्तं गतं भास्करस्येव बिम्बम् ॥ ६० ॥
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कर्णवध
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कर्णका वह कटा हुआ मस्तक वायुके वेगसे टूटकर गिरे हुए पर्वतखण्डके समान, यज्ञके अन्तमें बुझी हुई अग्निके सदृश तथा अस्ताचलपर पहुँचे हुए सूर्यके बिम्बकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ ६० ॥
शरैराचितसर्वाङ्गः शोणितौघपरिप्लुतः ।
विभाति देहः कर्णस्य स्वरश्मिभिरिवांशुमान् ॥ ६१ ॥
सभी अंगोंमें बाणोंसे व्याप्त और खूनसे लथपथ हुआ कर्णका शरीर अपनी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ ६१ ॥
प्रताप्य सेनामामित्रीं दीप्तैः शरगभस्तिभिः ।
बलिनार्जुनकालेन नीतोऽस्तं कर्णभास्करः ॥ ६२ ॥
अस्तं गच्छन् यथादित्यः प्रभामादाय गच्छति ।
तथा जीवितमादाय कर्णस्येषुर्जगाम सः ॥ ६३ ॥
बाणमयी उद्दीप्त किरणोंसे शत्रुकी सेनाको तपाकर कर्णरूपी सूर्य बलवान् अर्जुनरूपी कालसे प्रेरित हो अस्ताचलको जा पहुँचा । जैसे अस्ताचलको जाता हुआ सूर्य अपनी प्रभाको लेकर चला जाता है, उसी प्रकार वह बाण कर्णके प्राण लेकर चला गया ॥ ६३ ॥
अपराह्णेऽपराह्णेोऽस्य सूतपुत्रस्य मारिष ।
छिन्नमञ्जलिकेनाजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ॥ ६४ ॥
माननीय नरेश! दान देते समय जो दूसरे दिनके लिये वादा नहीं करता था, उस सूतपुत्र कर्णका अंजलिक नामक बाणसे कटा हुआ देहसहित मस्तक अपराह्नकालमें धराशायी हो गया ॥ ६४ ॥
उपर्युपरि सैन्यानामस्य शत्रोस्तदञ्जसा ।
शिरः कर्णस्य सोत्सेधमिषुः सोऽप्यहरद् द्रुतम् ॥ ६५ ॥
उस बाणने सारी सेनाके ऊपर-ऊपर जाकर अर्जुनके शत्रुभूत कर्णके शरीरसहित मस्तकको वेगपूर्वक अनायास ही काट डाला था ॥ ६५ ॥
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां
शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् ।
दृष्ट्वा शयानं भुवि मद्रराज- श्छिन्नध्वजेनाथ ययौ रथेन ॥ ६६ ॥
शूरवीर कर्णको बाणसे व्याप्त और खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख मद्रराज शल्य उस कटी हुई ध्वजावाले रथके द्वारा ही वहाँसे भाग खड़े हुए ॥ ६६ ॥
हते कर्णे कुरवः प्राद्रवन्त भयार्दिता गाढविद्धाश्च संख्ये । अवेक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य ध्वजं महान्तं वपुषा ज्वलन्तम् ॥ ६७ ॥
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कर्णके मारे जानेपर युद्धमें अत्यन्त घायल हुए कौरवसैनिक अर्जुनके प्रज्वलित होते हुए महान् ध्वजको बारंबार देखते हुए भयसे पीड़ित हो भागने लगे ॥ ६७ ॥
सहस्रनेत्रप्रतिमानकर्मणः सहस्रपत्रप्रतिमाननं शुभम् । सहस्ररश्मिर्दिनसंक्षये यथा तथापतत् कर्णशिरो वसुंधराम् ॥ ६८ ॥
सहस्रनेत्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी कर्णका सहस्रदल कमलके समान वह सुन्दर मस्तक उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे सायंकालमें सहस्र किरणोंवाले सूर्यका मण्डल अस्त हो जाता है ॥ ६८ ॥
(व्यूढोरस्कं कमलनयनं तप्तहेमावभासं कर्णं दृष्ट्वा भुवि निपतितं पार्थबाणाभितप्तम् । पांशुग्रस्तं मलिनमसकृत् पुत्रमन्वीक्षमाणो मन्दं मन्दं व्रजति सविता मन्दिरं मन्दरश्मिः ॥ ) जिसकी छाती चौड़ी और नेत्र कमलके समान सुन्दर थे तथा कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान जान पड़ती थी, वह कर्ण अर्जुनके बाणोंसे संतप्त हो धरतीपर पड़ा, धूलमें सना मलिन हो गया था । अपने उस पुत्रकी ओर बारंबार देखते हुए मन्द किरणोंवाले सूर्यदेव
धीरे - धीरे अपने मन्दिर ( अस्ताचल) -की ओर जा रहे थे ।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णवधे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णवधविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ १ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६ ९ श्लोक हैं । )
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द्विनवतितमोऽध्यायः कौरवोंका शोक, भीम आदि पाण्डवोंका हर्ष, कौरव- सेनाका पलायन और दुःखित शल्यका दुर्योधनको सान्त्वना देना संजय उवाच शल्यस्तु कर्णार्जुनयोर्विमर्दे बलानि दृष्ट्वा मृदितानि बाणैः । ययौ हते चाधिरथौ पदानुगे रथेन संछिन्नपरिच्छदेन ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! कर्ण और अर्जुनके संग्राममें बाणोंद्वारा सारी सेनाएँ रौंद डाली गयी थीं और अधिरथपुत्र कर्ण पैदल होकर मारा गया था । यह सब देखकर राजा शल्य, जिसका आवरण एवं अन्य सारी सामग्री नष्ट कर दी गयी थी, उस रथके द्वारा वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥
निपातितस्यन्दनवाजिनागं बलं च दृष्ट्वा हतसूतपुत्रम् । दुर्योधनोऽश्रुप्रतिपूर्णनेत्रो दीनो मुहुर्निःश्वसंश्चार्तरूपः ॥ २ ॥
कौरव - सेनाके रथ, घोड़े और हाथी मार डाले गये थे । सूतपुत्रका भी वध कर दिया गया था । उस अवस्थामें उस सेनाको देखकर दुर्योधनकी आँखोंमें आँसू भर आये और वह बारंबार लंबी साँस खींचता हुआ दीन एवं दुःखी हो गया ॥ २ ॥
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् । यदृच्छया सूर्यमिवावनिस्थं दिदृक्षवः सम्परिवार्य तस्थुः ॥ ३ ॥
शूरवीर कर्ण पृथ्वीपर पड़ा हुआ था । उसके शरीरमें बहुत - से बाण व्याप्त हो रहे थे तथा सारा अंग खूनसे लथपथ हो रहा था । उस अवस्थामें दैवेच्छासे पृथ्वीपर उतरे हुए सूर्यके समान उसे देखनेके लिये सब लोग उसकी लाशको घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥
प्रहृष्टवित्रस्तविषण्णविस्मिता- स्तथा परे शोकहता इवाभवन् । परे त्वदीयाश्च परस्परेण