04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2401–2410
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2401–2410
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अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ॥ ५३ ॥
अद्य सर्वान् हनिष्यामि ध्रुवो हि विजयो भवेत् । ‘ योद्धाओ! तुम भयसे पीड़ित हो रहे हो । परंतु मैं ऐसा कोई स्थान नहीं देखता, जहाँ तुम भागकर जाओ और वहाँ जानेपर तुम्हें पाण्डुपुत्र अर्जुन या भीमसेनसे छुटकारा मिल जाय । ऐसी दशामें तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? इन शत्रुओंके पास थोड़ी- सी ही सेना बच गयी है । श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः आज मैं इन सब लोगोंको
मार डालूँगा । हमारी विजय अवश्य होगी ॥
विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान् ॥ ५४ ॥
अनुसृत्य वधिष्यन्ति श्रेयान् नः समरे वधः । ‘यदि तुम अलग- अलग होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सब अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे । ऐसी दशामें युद्धमें मारा जाना ही हमारे लिये श्रेयस्कर है ॥ सुखं सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ॥ ५५ ॥
मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते । ‘ क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंकी संग्राममें सुखपूर्वक मृत्यु होती है । वहाँ मरे हुएको मृत्युके दुःखका अनुभव नहीं होता और परलोकमें जानेपर उसे अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ५५३ ॥
शृणुध्वं क्षत्रियाः सर्वे यावन्तः स्थ समागताः ॥ ५६ ॥
यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तको यमः ।
को नु मूढो न युध्येत मादृशः क्षत्रियव्रतः ॥ ५७ ॥
' तुम जितने क्षत्रिय वीर यहाँ आये हो सभी कान खोलकर सुन लो । जब प्राणियोंका अन्त करनेवाला यमराज शूरवीर और कायर दोनोंको ही मार डालता है, तब मेरे - जैसा क्षत्रियव्रतका पालन करनेवाला होकर भी कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो युद्ध नहीं करेगा? ॥ ५६-५७ ॥
द्विषतो भीमसेनस्य क्रुद्धस्य वशमेष्यथ ।
पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ ॥ ५८ ॥
' हमारा शत्रु भीमसेन क्रोधमें भरा हुआ है । यदि भागोगे तो उसके वशमें पड़कर मारे जाओगे; अतः अपने बाप -दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए क्षत्रिय धर्मका परित्याग न करो ॥ ५८ ॥
न ह्यधर्मोऽस्ति पापीयान् क्षत्रियस्य पलायनात् ।
न युद्धधर्माच्छ्रेयो हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः ।
अचिरेण हता लोकान् सद्यो योधाः समश्नुत ॥ ५ ९ ॥
‘ कौरववीरो! क्षत्रियके लिये युद्धसे पीठ दिखाकर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है तथा युद्धधर्मके पालनसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गकी प्राप्तिका कल्याणकारी
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मार्ग भी नहीं है; अतः योद्धाओ! तुम युद्धमें मारे जाकर शीघ्र ही उत्तम लोकोंके सुखका अनुभव करो' ॥ ५ ९ ॥ संजय उवाच
एवं ब्रुवति पुत्रे ते सैनिका भृशविक्षताः ।
अनवेक्ष्यैव तद्वाक्यं प्राद्रवन् सर्वतो दिशः ॥ ६० ॥
संजय कहते हैं - महाराज! आपका पुत्र इस प्रकार व्याख्यान देता ही रह गया; किंतु अत्यन्त घायल हुए सैनिक उसकी बातपर ध्यान दिये बिना ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कौरवसैन्यपलायने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
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चतुर्नवतितमोऽध्यायः शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन संजय उवाच दृष्ट्वा तु सैन्यं परिवर्त्यमानं पुत्रेण ते मद्रपतिस्तदानीम् । संत्रस्तरूपः परिमूढचेता दुर्योधनं वाक्यमिदं बभाषे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! आपके पुत्रद्वारा सेनाको पुनः लौटानेका प्रयत्न होता देख उस समय भयभीत और मूढचित्त हुए मद्रराज शल्यने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
शल्य उवाच पश्येदमुग्रं नरवाजिनागै- रायोधनं वीरहतैः सुपूर्णम् । महीधराभैः पतितैश्च नागैः सकृत्प्रभिन्नैः शरभिन्नदेहैः ॥ २ ॥
सुविह्वलद्भिश्च गतासुभिश्च
प्रध्वस्तवर्मायुधचर्मखड्गैः ।
वज्रापविद्धैरिव चाचलोत्तमै - विभिन्नपाषाणमहाद्रुमौषधैः ॥ ३ ॥
प्रविद्धघण्टाङ्कुशतोमरध्वजैः सहेमजालै रुधिरौघसम्प्लुतैः । शरावभिन्नैः पतितैस्तुरङ्गमैः श्वसद्भिरार्तैः क्षतजं वमद्भिः ॥ ४ ॥
दीनं स्तनद्भिः परिवृत्तनेत्रै- र्महीं दशद्भिः कृपणं नदद्भिः । तथापविद्धैर्गजवाजियोधैः शरापविद्धैरथ वीरसंघैः ॥ ५ ॥
मन्दासुभिश्चैव गतासुभिश्च नराश्वनागैश्च रथैश्च मर्दितैः । मन्दांशुभिश्चैव मही महाहवे
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नूनं यथा वैतरणीव भाति ॥ ६ ॥
शल्य बोले — वीर नरेश! देखो, मारे गये मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशोंसे भरा हुआ यही युद्धस्थल कैसा भयंकर जान पड़ता है? पर्वताकार गजराज, जिनके मस्तकोंसे मदकी धारा फूटकर बहती थी, एक ही साथ बाणोंकी मारसे शरीर विदीर्ण हो जानेके कारण धराशायी हो गये हैं । उनमेंसे कितने ही वेदनासे छटपटा रहे हैं, कितनोंके प्राण निकल गये हैं । उनपर बैठे हुए सवारोंके कवच, अस्त्र- शस्त्र, ढाल और तलवार आदि नष्ट हो गये हैं । इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो वज्रके आघातसे बड़े - बड़े पर्वत ढह गये हों और उनके प्रस्तरखण्ड, विशाल वृक्ष तथा औषधसमूह छिन्न-भिन्न हो गये हों । उन गजराजोंके घंटा, अंकुश, तोमर और ध्वज आदि सभी वस्तुएँ बाणोंके आघातसे टूट-फूटकर बिखर गयी हैं । उन हाथियोंके ऊपर सोनेकी जालीसे युक्त आवरण पड़ा है । उनकी लाशें रक्तके प्रवाहसे नहा गयी हैं । घोड़े बाणोंसे विदीर्ण होकर गिरे हैं, वेदनासे व्यथित हो उच्छ्वास लेते और मुखसे रक्त वमन करते हैं । वे दीनतापूर्ण आर्तनाद कर रहे हैं। उनकी आँखें घूम रही हैं । वे धरतीमें दाँत गड़ाते और करुण चीत्कार करते हैं । हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक तथा वीरसमुदाय बाणों से क्षत-विक्षत हो मरे पड़े हैं । किन्हींकी साँसें कुछ- कुछ चल रही हैं और कुछ लोगोंके प्राण सर्वथा निकल गये हैं । हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथ कुचल दिये गये हैं । इन सबकी कान्ति मन्द पड़ गयी है। इनके कारण उस महासमरकी भूमि निश्चय ही वैतरणीके समान प्रतीत होती है ॥ २–६ ॥ गजैर्निकृत्तैर्वरहस्तगात्रै- रुद्वेपमानैः पतितैः पृथिव्याम् । विशीर्णदन्तैः क्षतजं वमद्भिः स्फुरद्भिरार्तैः करुणं नदद्भिः ॥ ७ ॥
हाथियोंके शुण्डदण्ड और शरीर छिन्न-भिन्न हो गये हैं । कितने ही हाथी पृथ्वीपर गिरकर काँप रहे हैं, कितनोंके दाँत टूट गये हैं और वे खून उगलते तथा छटपटाते हुए वेदनाग्रस्त हो करुण स्वरमें कराह रहे हैं ॥ ७ ॥
निकृत्तचक्रेषुयुगैः सयोक्तृभिः
प्रविद्धतूणीरपताककेतुभिः ।
सुवर्णजालावततैर्भृशाहतै- महारथौघैर्जलदैरिवावृता ॥ ८ ॥
बड़े - बड़े रथोंके समूह इस रणभूमिमें बादलोंके समान छा गये हैं । उनके पहिये, बाण, जूए और बन्धन कट गये हैं । तरकस, ध्वज और पताकाएँ फेंकी पड़ी हैं; सोनेके जालसे आवृत हुए वे रथ बहुत ही क्षतिग्रस्त हो गये हैं ॥ ८ ॥
यशस्विभिर्नागरथाश्वयोधिभिः पदातिभिश्चाभिमुखैर्हतैः परैः ।
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विशीर्णवर्माभरणाम्बरायुधै- र्वृता प्रशान्तैरिव तावकैर्मही ॥ ९ ॥
हाथी, रथ और घोड़ोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले यशस्वी योद्धा और पैदल वीर सामने लड़ते हुए शत्रुओंके हाथसे मारे गये हैं । उनके कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध सभी छिन्न- भिन्न होकर बिखर गये हैं । इस प्रकार शान्त पड़े हुए आपके प्राणहीन योद्धाओंसे यह पृथ्वी पट गयी है ॥ ९ ॥
शरप्रहाराभिहतैर्महाबलै- रवेक्ष्यमाणैः पतितैः सहस्रशः ।
दिवश्च्युतैर्भूरतिदीप्तिमद्भि- र्नक्तं ग्रहैर्धीरमलप्रदीप्तैः ॥ १० ॥
बाणोंके प्रहारसे घायल होकर गिरे हुए सहस्रों महाबली योद्धा आकाशसे नीचे गिरे हुए अत्यन्त दीप्तिमान् एवं निर्मल प्रभासे प्रकाशित ग्रहोंके समान दिखायी देते हैं और उनसे ढकी हुई यह भूमि रातके समय उन ग्रहोंसे व्याप्त हुए आकाशके सदृश सुशोभित होती है ॥ १० ॥
प्रणष्टसंज्ञैः पुनरुच्छ्वसद्भि- र्मही बभूवानुगतैरिवाग्निभिः ।
कर्णार्जुनाभ्यां शरभिन्नगात्रै- र्हतैः प्रवीरैः कुरुसृञ्जयानाम् ॥ ११ ॥
कर्ण और अर्जुनके बाणोंसे जिनके अंग-अंग छिन्न -भिन्न हो गये हैं, उन मारे गये कौरव - सृजय वीरोंकी लाशोंसे भरी हुई भूमि यज्ञमें स्थापित हुई अग्नियोंके द्वारा यज्ञभूमिके समान सुशोभित होती है । उनमें से कितने ही वीरोंकी चेतना लुप्त हो गयी है और कितने ही पुनः साँस ले रहे हैं ॥ ११ ॥
शरास्तु कर्णार्जुनबाहुमुक्ता
विदार्य नागाश्वमनुष्यदेहान् ।
प्राणान् निरस्याशु महीं प्रतीयु- महोरगा वासमिवातिताम्राः ॥ १२ ॥
कर्ण और अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए बाण हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उनके प्राण निकालकर तुरंत पृथ्वीमें घुस गये थे, मानो अत्यन्त लाल रंगके विशाल सर्प अपनी बिलमें जा घुसे हों ॥ हतैर्मनुष्याश्वगजैश्च संख्ये शरापविद्धैश्च रथैर्नरेन्द्र । धनंजयस्याधिरथेश्च मार्गणै- रगम्यरूपा वसुधा बभूव ॥ १३ ॥
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नरेन्द्र! अर्जुन और कर्णके बाणोंद्वारा मारे गये हाथी, घोड़े एवं मनुष्योंसे तथा बाणोंसे नष्ट- भ्रष्ट होकर गिरे पड़े रथोंसे इस पृथ्वीपर चलना- फिरना असम्भव हो गया है ॥ १३ ॥
रथैवरषून्मथितैः सुकल्पैः
सयोधशस्त्रैश्च वरायुधैर्ध्वजैः ।
विशीर्णयोक्त्रैर्विनिकृत्तबन्धनै- र्निकृत्तचक्राक्षयुगत्रिवेणुभिः ॥ १४ ॥
सजे- सजाये रथ बाणोंके आघातसे मथ डाले गये हैं । उनके साथ जो योद्धा, शस्त्र, श्रेष्ठ आयुध और ध्वज आदि थे, उनकी भी यही दशा हुई है । उनके पहिये, बन्धनरज्जु, धुरे, जूए और त्रिवेणु काष्ठके भी टुकड़े - टुकड़े हो गये हैं ॥ १४ ॥
विमुक्तशस्त्रैश्च तथा व्युपस्करै- र्हतानुकर्षैर्विनिषङ्गबन्धनैः । प्रभग्ननीडैर्मणिहेमभूषितैः स्तृता मही द्यौरिव शारदैर्घनैः ॥ १५ ॥
उनपर जो अस्त्र - शस्त्र रखे गये थे, वे सब दूर जा पड़े हैं । सारी सामग्री नष्ट हो गयी है । अनुकर्ष, तूणीर और बन्धनरज्जु - ये सब- के - सब नष्ट- भ्रष्ट हो गये हैं । उन रथोंकी बैठकें टूट -फूट गयी हैं । सुवर्ण और मणियोंसे विभूषित उन रथोंद्वारा आच्छादित हुई पृथ्वी शरद्-ऋतुके बादलोंसे ढके हुए आकाशके समान जान पड़ती है ॥ १५ ॥
विकृष्यमाणैर्जवनैस्तुरङ्गमै- र्हतेश्वरै राजरथैः सुकल्पितैः ।
मनुष्यमातङ्गरथाश्वराशिभि- द्रुतं व्रजन्तो बहुधा विचूर्णिताः ॥ १६ ॥
जिनके स्वामी (रथी ) मारे गये हैं, राजाओंके उन सुसज्जित रथोंको, जब वेगशाली घोड़े खींचे लिये जाते थे और झुंड के - झुंड मनुष्य, हाथी, साधारण रथ और अश्व भी भागे जा रहे थे, उस समय उनके द्वारा शीघ्रतापूर्वक भागनेवाले बहुत- से मनुष्य कुचलकर चूर-चूर हो गये हैं ॥ १६ ॥
सहेमपट्टाः परिघाः परश्वधाः शिताश्च शूला मुसलानि मुद्गराः । पेतुश्च खड्गा विमला विकोशा गदाश्च जाम्बूनदपट्टनद्धाः ॥ १७ ॥
सुवर्ण- पत्रसे जड़े गये परिघ, फरसे, तीखे शूल, मूसल, मुद्गर, म्यानसे बाहर निकाली हुई चमचमाती तलवारें और स्वर्णजटित गदाएँ जहाँ - तहाँ बिखरी पड़ी हैं ॥ १७ ॥
चापानि रुक्माङ्गदभूषणानि शराश्च कार्तस्वरचित्रपुङ्खाः ।
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ऋष्ट्यश्च पीता विमला विकोशाः प्रासाश्च दण्डैः कनकावभासैः ॥ १८ ॥
छत्राणि वालव्यजनानि शङ्खा- श्छिन्नापविद्धाश्च स्रजो विचित्राः । सुवर्णमय अंगदोंसे विभूषित धनुष, सोनेके विचित्र पंखवाले बाण, ऋष्टि, पानीदार एवं कोशरहित निर्मल खड्ग तथा सुनहरे डंडोंसे युक्त प्रास, छत्र, चँवर, शंख और विचित्र मालाएँ छिन्न -भिन्न होकर फेंकी पड़ी हैं ॥ कुथाः पताकाम्बरभूषणानि किरीटमाला मुकुटाश्च शुभ्राः ॥ १ ९ ॥ प्रकीर्णका विप्रकीर्णाश्च राजन् प्रवालमुक्तातरलाश्च हाराः । राजन्! हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कम्बल या झूल, पताका, वस्त्र, आभूषण, किरीटमाला, उज्ज्वल मुकुट, श्वेत चामर, मूँगे और मोतियोंके हार - से सब - के - सब इधर-उधर बिखरे पड़े हैं ॥ १ ९ ३ ॥ आपीडकेयूरवराङ्गदानि ग्रैवैयनिष्काः ससुवर्णसूत्राः ॥ २० ॥
मण्युत्तमा वज्रसुवर्णमुक्ता रत्नानि चोच्चावचमङ्गलानि । गात्राणि चात्यन्तसुखोचितानि शिरांसि चेन्दुप्रतिमाननानि ॥ २१ ॥
देहांश्च भोगांश्च परिच्छदांश्च त्यक्त्वा मनोज्ञानि सुखानि चैव । स्वधर्मनिष्ठां महतीमवाप्य व्याप्याशु लोकान् यशसा गतास्ते ॥ २२ ॥
शिरोभूषण, केयूर, सुन्दर अंगद, गलेके हार, पदक, सोनेकी जंजीर, उत्तम मणि, हीरे, सुवर्ण तथा मुक्ता आदि छोटे- बड़े मांगलिक रत्न, अत्यन्त सुख भोगनेके योग्य शरीर, चन्द्रमाको भी लज्जित करनेवाले मुखसे युक्त मस्तक, देह, भोग, आच्छादन - वस्त्र तथा मनोरम सुख– इन सबको त्यागकर स्वधर्मकी पराकाष्ठाका पालन करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपने यशका विस्तार करके वे वीर सैनिक दिव्य लोकोंमें पहुँच गये हैं ॥ २०– २२ ॥ निवर्त दुर्योधन यान्तु सैनिका व्रजस्व राजन् शिबिराय मानद । दिवाकरोऽप्येष विलम्बते प्रभो
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पुनस्त्वमेवात्र नरेन्द्र कारणम् ॥ २३ ॥
दूसरोंको सम्मान देनेवाले राजा दुर्योधन! अब लौटो । इन सैनिकोंको भी जाने दो । शिबिरमें चलो । प्रभो! ये भगवान् सूर्य भी अस्ताचलपर लटक रहे हैं । नरेन्द्र! तुम्हीं इस नर- संहारके प्रधान कारण हो ॥ २३ ॥
इत्येवमुक्त्वा विरराम शल्यो
दुर्योधनं शोकपरीतचेताः ।
हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाण- मार्तं विसंज्ञं भृशमश्रुनेत्रम् ॥ २४ ॥
दुर्योधनसे ऐसा कहकर राजा शल्य चुप हो गये । उनका चित्त शोकसे व्याकुल हो रहा था । दुर्योधन भी आर्त होकर ' हा कर्ण! हा कर्ण! ' पुकारने लगा । वह सुध- बुध खो बैठा था । उसके नेत्रोंसे वेगपूर्वक आँसुओंकी अविरल धारा बह रही थी ॥ २४ ॥
तं द्रोणपुत्रप्रमुखा नरेन्द्राः सर्वे समाश्वास्य मुहुः प्रयान्ति । निरीक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य ध्वजं महान्तं यशसा ज्वलन्तम् ॥ २५ ॥
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा अन्य सभी नरेश बारंबार आकर दुर्योधनको सान्त्वना देते और अर्जुनके महान् ध्वजको, जो उनके उज्ज्वल यशसे प्रकाशित हो रहा था, देखते हुए फिर लौट जाते थे ॥ २५ ॥
नराश्वमातङ्गशरीरजेन
रक्तेन सिक्तां च तथैव भूमिम् ।
रक्ताम्बरस्रक् तपनीययोगा- न्नारीं प्रकाशामिव सर्वगम्याम् ॥ २६ ॥
मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके शरीरसे बहते हुए रक्तकी धारासे वहाँकी भूमि ऐसी सिंच गयी थी कि लाल वस्त्र, लाल फूलोंकी माला तथा तपाये हुए सुवर्णके आभूषण धारण करके सबके सामने आयी हुई सर्वगम्या नारी ( वेश्या ) के समान प्रतीत होती थी ॥ २६ ॥
प्रच्छन्नरूपां रुधिरेण राजन् रौद्रे मुहूर्तेऽतिविराजमाने । नैवावतस्थुः कुरवः समीक्ष्य प्रव्राजिता देवलोकाय सर्वे ॥ २७ ॥
राजन्! अत्यन्त शोभा पानेवाले उस रौद्रमुहूर्त ( सायंकाल) - में, रुधिरसे जिसका स्वरूप छिप गया था, उस भूमिको देखते हुए कौरव- सैनिक वहाँ ठहर न सके । वे सब - के - सब देवलोककी यात्राके लिये उद्यत थे ॥ २७ ॥
वधेन कर्णस्य तु दुःखितास्ते
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हा कर्ण हा कर्ण इति ब्रुवाणाः । द्रुतं प्रयाताः शिबिराणि राजन् दिवाकरं रक्तमवेक्षमाणाः ॥ २८ ॥
महाराज! समस्त कौरव कर्णके वधसे अत्यन्त दुःखी हो 'हा कर्ण! हा कर्ण! ' की रट लगाते और लाल सूर्यकी ओर देखते हुए बड़े वेगसे शिबिरकी ओर चले ॥ २८ ॥
गाण्डीवमुक्तैस्तु सुवर्णपुङ्खैः शिलाशितैः शोणितदिग्धवाजैः । शरैश्चिताङ्गो युधि भाति कर्णो हतोऽपि सन् सूर्य इवांशुमाली ॥ २ ९ ॥ हुए गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखवाले और शिलापर तेज किये बाणोंसे कर्णका अंग - अंग बिंध गया था । उन बाणोंकी पाँखें रक्तमें डूबी हुई थीं । उनके द्वारा युद्धस्थलमें पड़ा हुआ कर्ण मर जानेपर भी अंशुमाली सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २ ९ ॥ कर्णस्य देहं रुधिरावसिक्तं भक्तानुकम्पी भगवान् विवस्वान् । स्पृष्ट्वांशुभिर्लोहितरक्तरूपः सिष्णासुरभ्येति परं समुद्रम् ॥ ३० ॥
भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् सूर्य खूनसे भीगे हुए कर्णके शरीरका किरणोंद्वारा स्पर्श करके रक्तके समान ही लालरूप धारणकर मानो स्नान करनेकी इच्छासे पश्चिम समुद्रकी ओर जा रहे थे ॥ ३० ॥
इतीव संचिन्त्य सुरर्षिसंघाः
सम्प्रस्थिता यान्ति यथा निकेतनम् ।
संचिन्तयित्वा जनता विसस्रु- र्यथासुखं खं च महीतलं च ॥ ३१ ॥
इस युद्धके ही विषयमें सोच - विचार करते हुए देवताओं तथा ऋषियोंके समुदाय वहाँसे प्रस्थित हो अपने - अपने स्थानको चल दिये और इसी विषयका चिन्तन करते हुए अन्य लोग भी सुखपूर्वक अन्तरिक्ष अथवा भूतलपर अपने - अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३१ ॥
तदद्भुतं प्राणभृतां भयंकरं निशाम्य युद्धं कुरुवीरमुख्ययोः । धनंजयस्याधिरथेश्च विस्मिताः प्रशंसमानाः प्रययुस्तदा जनाः ॥ ३२ ॥
कौरव तथा पाण्डवपक्षके उन प्रमुख वीर अर्जुन और कर्णका वह अद्भुत तथा प्राणियोंके लिये भयंकर युद्ध देखकर सब लोग आश्चर्यचकित हो उनकी प्रशंसा करते हुए
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वहाँसे चले गये ॥ ३२ ॥
शरसंकृत्तवर्माणं रुधिरोक्षितवाससम् ।
गतासुमपि राधेयं नैव लक्ष्मीर्विमुञ्चति ॥ ३३ ॥
राधापुत्र कर्णका कवच बाणोंसे कट गया था । उसके सारे वस्त्र खूनसे भीग गये थे और प्राण भी निकल गये थे तो भी उसे शोभा छोड़ नहीं रही थी ॥ ३३ ॥
तप्तजाम्बूनदनिभं ज्वलनार्कसमप्रभम् ।
जीवन्तमिव तं शूरं सर्वभूतानि मेनिरे ॥ ३४ ॥
वह तपाये हुए सुवर्ण तथा अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् था । उस शूरवीरको देखकर सब प्राणी जीवित- सा समझते थे ॥ ३४ ॥
हतस्यापि महाराज सूतपुत्रस्य संयुगे ।
वित्रेसुः सर्वतो योधाः सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥ ३५ ॥
महाराज! जैसे सिंहसे दूसरे जंगली पशु सदा डरते रहते हैं, उसी प्रकार युद्धस्थलमें मारे गये सूतपुत्रसे भी समस्त योद्धा भय मानते थे ॥ ३५ ॥
हतोऽपि पुरुषव्याघ्र जीववानिव लक्ष्यते ।
नाभवद् विकृतिः काचिद्धतस्यापि महात्मनः ॥ ३६ ॥
पुरुषसिंह नरेश! वह मारा जानेपर भी जीवित -सा दीखता था, महामना कर्णके शरीरमें मरनेपर भी कोई विकार नहीं हुआ था ॥ ३६ ॥
चारुवेषधरं वीरं चारुमौलिशिरोधरम् ।
तन्मुखं सूतपुत्रस्य पूर्णचन्द्रसमद्युति ॥ ३७ ॥
सूतपुत्र कर्णका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् था । उसने मनोहर वेष धारण किया था । वह वीरोचित शोभासे सम्पन्न था । उसके मस्तक और कण्ठ भी मनोहर थे ॥ ३७ ॥
नानाभरणवान् राजंस्तप्तजाम्बूनदाङ्गदः ।
हतो वैकर्तनः शेते पादपोऽङ्कुरवानिव ॥ ३८ ॥
राजन्! नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा तपाये हुए सुवर्णका अंगद ( बाजूबंद ) धारण किये वैकर्तन कर्ण मारा जाकर अंकुरयुक्त वृक्षके समान पड़ा था ॥ ३८ ॥
कनकोत्तमसंकाशो ज्वलन्निव विभावसुः ।
स शान्तः पुरुषव्याघ्र पार्थसायकवारिणा ॥ ३ ९ ॥
नरव्याघ्र नरेश! उत्तम सुवर्णके समान कान्तिमान् कर्ण प्रज्वलित अग्निके तुल्य प्रकाशित होता था; परंतु पार्थके बाणरूपी जलसे वह बुझ गया ॥ ३ ९ ॥
यथा हि ज्वलनो दीप्तो जलमासाद्य शाम्यति ।
कर्णाग्निः समरे तद्वत् पार्थमेघेन शामितः ॥ ४० ॥