04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2421–2430
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2421–2430
पृष्ठ 2421
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
'जब यह महायुद्ध चल रहा था, उस समय तुम्हारा और कर्णका युद्ध देखनेके लिये धर्मनन्दन युधिष्ठिर पहले आये थे ॥ ६ ॥
भृशं तु गाढविद्धत्वान्नाशकत् स्थातुमाहवे ।
ततः स शिबिरं गत्वा स्थितवान् पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥
‘ परंतु गहरी चोट खानेके कारण वे देरतक युद्धस्थलमें ठहर न सके । यहाँसे शिबिरमें जाकर वे पुरुषप्रवर युधिष्ठिर विश्राम कर रहे हैं' ॥ ७ ॥
तथेत्युक्तः केशवस्तु पार्थेन यदुपुङ्गवः ।
पर्यावर्तयदव्यग्रो रथं रथवरस्य तम् ॥ ८ ॥
तब अर्जुनने केशवसे ' तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की । तत्पश्चात् यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने शान्तभावसे रथिश्रेष्ठ अर्जुनके उस रथको युधिष्ठिरके शिबिरकी ओर लौटाया ॥ ८ ॥
एवमुक्त्वार्जुनं कृष्णः सैनिकानिदमब्रवीत् ।
परानभिमुखा यत्तास्तिष्ठध्वं भद्रमस्तु वः ॥ ९ ॥
अर्जुनसे पूर्वोक्त बात कहकर भगवान् श्रीकृष्ण सैनिकोंसे इस प्रकार बोले — ' वीरो! तुम्हारा कल्याण हो! तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये सदा प्रयत्नपूर्वक डटे रहना' ॥ ९ ॥
धृष्टद्युम्नं युधामन्युं माद्रीपुत्रौ वृकोदरम् ।
युयुधानं च गोविन्द इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥
इसके बाद गोविन्द धृष्टद्युम्न, युधामान्यु, नकुल, सहदेव, भीमसेन और सात्यकिसे इस प्रकार बोले- ॥ १० ॥
यावदावेद्यते राज्ञे हतः कर्णोऽर्जुनेन वै ।
तावद्भवद्भिर्यत्तैस्तु भवितव्यं नराधिपैः ॥ ११ ॥
‘ अर्जुनने कर्णको मार डाला' यह समाचार जबतक हमलोग राजा युधिष्ठिरसे निवेदन करते हैं, तबतक तुम सभी नरेशोंको यहाँ शत्रुओंकी ओरसे सावधान रहना चाहिये ॥
स तैः शूरैरनुज्ञातो ययौ राजनिवेशनम् ।
पार्थमादाय गोविन्दो ददर्श च युधिष्ठिरम् ॥ १२ ॥
उन शूरवीरोंने उनकी आज्ञा स्वीकार करके जब जानेकी अनुमति दे दी, तब भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको साथ लेकर राजा युधिष्ठिरका दर्शन किया ॥ १२ ॥
शयानं राजशार्दूलं काञ्चने शयनोत्तमे ।
अगृह्णीतां च मुदितौ चरणौ पार्थिवस्य तौ ॥ १३ ॥
उस समय नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर सोनेके उत्तम पलंगपर सो रहे थे । उन दोनोंने वहाँ पहुँचकर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजाके चरण पकड़ लिये ॥ १३ ॥
तयोः प्रहर्षमालक्ष्य हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ।
पृष्ठ 2422
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राधेयं निहतं मत्वा समुत्तस्थौ युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥
उन दोनोंके हर्षोल्लासको देखकर राजा युधिष्ठिर यह समझ गये कि राधापुत्र कर्ण मारा गया; अतः वे शय्यासे उठ खड़े हुए और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाने लगे ॥ १४ ॥
उवाच च महाबाहुः पुनः पुनररिंदमः ।
वासुदेवार्जुनौ प्रेम्णा तावुभौ परिषस्वजे ॥ १५ ॥
शत्रुदमन महाबाहु युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण और अर्जुनसे बारंबार प्रेमपूर्वक बोलने और उन दोनोंको हृदयसे लगाने लगे ॥ १५ ॥
तत् तस्मै तद् यथावृत्तं वासुदेवः सहार्जुनः ।
कथयामास कर्णस्य निधनं यदुपुङ्गवः ॥ १६ ॥
उस समय अर्जुनसहित यदुकुलतिलक वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कर्णके मारे जानेका सारा समाचार उन्हें यथावत्ररूपसे कह सुनाया ॥ १६ ॥
ईषदुत्स्मयमानस्तु कृष्णो राजानमब्रवीत् ।
युधिष्ठिरं हतामित्रं कृताञ्जलिरथाच्युतः ॥ १७ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण हाथ जोड़कर किंचित् मुस्कराते हुए, जिनका शत्रु मारा गया था, उस राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले- ॥ १७ ॥
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च पाण्डवश्च वृकोदरः ।
त्वं चापि कुशली राजन् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १८ ॥
‘ राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डव भीमसेन, पाण्डुकुमार माद्रीनन्दन नकुल सहदेव और आप भी सकुशल हैं ॥ १८ ॥
मुक्ता वीरक्षयादस्मात् संग्रामाल्लोमहर्षणात् ।
क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कार्याणि पाण्डव ॥ १ ९ ॥
‘ आप सब लोग वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे मुक्त हो गये ।
पाण्डुनन्दन! अब आगे जो कार्य करने हैं, उन्हें शीघ्र पूर्ण कीजिये ॥ १ ९ ॥
हतो वैकर्तनो राजन् सूतपुत्रो महारथः ।
दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र दिष्ट्या वर्धसि भारत ॥ २० ॥
' राजन्! महारथी सूतपुत्र वैकर्तन कर्ण मारा गया, राजेन्द्र! सौभाग्यसे आप विजयी हो रहे हैं । भारत! आपकी वृद्धि हो रही है, यह परम सौभाग्यकी बात है ॥ २० ॥
यस्तु द्यूतजितां कृष्णां प्राहसत् पुरुषाधमः ।
तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पिबति शोणितम् ॥ २१ ॥
‘ जिस नराधमने जूएमें जीती हुई द्रौपदीका उपहास किया था, आज पृथ्वी उस सूतपुत्र कर्णका रक्त पी रही है ॥ २१ ॥
शेतेऽसौ शरपूर्णाङ्गः शत्रुस्ते कुरुपुङ्गव ।
तं पश्य पुरुषव्याघ्र विभिन्नं बहुभिः शरैः ॥ २२ ॥
पृष्ठ 2423
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ कुरुपुंगव! आपका वह शत्रु रणभूमिमें सो रहा है और उसके सारे शरीरमें बाण भरे हुए हैं । नरव्याघ्र! अनेक बाणों से क्षत - विक्षत हुए उस कर्णको आप देखिये ॥ २२ ॥
हतामित्रामिमामुर्वीमनुशाधि महाभुज ।
यत्तो भूत्वा सहास्माभिर्भुङ्क्ष्व भोगांश्च पुष्कलान् ॥ २३ ॥
‘ महाबाहो! आप सावधान होकर हम सब लोगोंके साथ इस निष्कंटक हुई पृथ्वीका शासन और प्रचुर भोगोंका उपभोग कीजिये ' ॥ २३ ॥
संयज उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा दाशार्हं वाक्यमब्रवीत् ॥ २४ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! महात्मा श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका चित्त प्रसन्न हो गया । उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे वार्तालाप आरम्भ किया ॥ २४ ॥
दिष्ट्या दिष्ट्येति राजेन्द्र वाक्यं चेदमुवाच ह ।
नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दन ॥ २५ ॥
त्वया सारथिना पार्थो यत्नवानहनश्च तम् ।
न तच्चित्रं महाबाहो युष्मद्बुद्धिप्रसादजम् ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! ‘ अहो भाग्य! अहो भाग्य! ' ऐसा कहकर युधिष्ठिर इस प्रकार बोले— ' महाबाहु देवकीनन्दन! आपके रहते यह महान् कार्य सम्पन्न होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । आप-जैसे सारथिके होते ही पार्थने प्रयत्नपूर्वक उसका वध किया है । महाबाहो! आपकी बुद्धिके प्रसादसे ऐसा होना आश्चर्य नहीं है ' ॥ २५-२६ ॥
प्रगृह्य च कुरुश्रेष्ठ साङ्गदं दक्षिणं भुजम् ।
उवाच धर्मभृत् पार्थ उभौ तौ केशवार्जुनौ ॥ २७ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इसके बाद धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने बाजूबंदविभूषित श्रीकृष्णका दाहिना हाथ अपने हाथमें लेकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंसे कहा— ॥ २७ ॥
नरनारायणौ देवौ कथितौ नारदेन मे ।
धर्मात्मानौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ ॥ २८ ॥
' प्रभो! देवर्षि नारदने मुझसे कहा था कि आप दोनों धर्मात्मा, महात्मा, पुराणपुरुष तथा ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् नर और नारायण हैं ॥ २८ ॥
असकृच्चापि मेधावी कृष्णद्वैपायनो मम ।
कथामेतां महाभाग कथयामास तत्त्ववित् ॥ २ ९ ॥
'महाभाग! परम बुद्धिमान् तत्त्ववेत्ता महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनने भी बारंबार मुझसे यही बात कही है ॥ २ ९ ॥ तव कृष्ण प्रसादेन पाण्डवोऽयं धनंजयः ।
पृष्ठ 2424
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जिगायाभिमुखः शत्रून् न चासीद् विमुखः क्वचित् ॥ ३० ॥
‘ श्रीकृष्ण! आपके प्रसादसे ही ये पाण्डुपुत्र धनंजय सदा सामने रहकर युद्धमें शत्रुओं पर विजयी हुए हैं और कभी युद्धसे मुँह नहीं मोड़ सके हैं ॥ ३० ॥
जयश्चैव ध्रुवोऽस्माकं न त्वस्माकं पराजयः ।
यदा त्वं युधि पार्थस्य सारथ्यमुपजग्मिवान् ॥ ३१ ॥
' प्रभो! जब आप युद्धमें अर्जुनके सारथि बने थे, तभी हमें यह विश्वास हो गया था कि
हमलोगोंकी विजय निश्चित है, अटल है । हमारी पराजय नहीं हो सकती ॥ ३१ ॥
भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च महात्मा गौतमः कृपः ।
अन्ये च बहवः शूरा ये च तेषां पदानुगाः ॥ ३२ ॥
त्वद्बुद्ध्या निहते कर्णे हता गोविन्द सर्वथा । ' गोविन्द! भीष्म, द्रोण, कर्ण, महात्मा गौतमवंशी कृपाचार्य तथा इनके पीछे चलनेवाले जो और भी बहुत - से शूरवीर हैं और रहे हैं, आपकी बुद्धिसे आज कर्णके मारे जानेपर उन सबका वध हो गया, ऐसा मैं मानता हूँ ' ॥ १ ९ ३ ॥ इत्युक्त्वा धर्मराजस्तु रथं हेमविभूषितम् ॥ ३३ ॥
श्वेतवर्णैर्हयैर्युक्तं कालवालैर्मनोजवैः ।
आस्थाय पुरुषव्याघ्रः स्वबलेनाभिसंवृतः ॥ ३४ ॥
प्रययौ स महाबाहुर्द्रष्टुमायोधनं तदा ।
कृष्णार्जुनाभ्यां वीराभ्यामनुमन्त्र्य ततः प्रियम् ॥ ३५ ॥
आभाषमाणस्तौ वीरावुभौ माधवफाल्गुनौ ।
स ददर्श रणे कर्णं शयानं पुरुषर्षभम् ॥ ३६ ॥
ऐसा कहकर पुरुषसिंह महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर श्वेतवर्ण और काली पूँछवाले, मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो अपनी सेनाके साथ युद्ध देखनेके लिये चले । श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीरोंके साथ प्रिय विषयपर परामर्श और उनसे वार्तालाप करते हुए युधिष्ठिरने रणभूमिमें सोये हुए पुरुषप्रवर कर्णको देखा ॥ ३३– ३६ ॥
यथा कदम्बकुसुमं केसरैः सर्वतो वृतम् ।
चितं शरशतैः कर्णं धर्मराजो ददर्श सः ॥ ३७ ॥
जैसे कदम्बका फूल सब ओरसे केसरोंसे भरा होता है, उसी प्रकार कर्णका शरीर
सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त था । धर्मराज युधिष्ठिरने इसी अवस्थामें उसे देखा ॥ ३७ ॥
गन्धतैलावसिक्ताभिः काञ्चनीभिः सहस्रशः ।
दीपिकाभिः कृतोद्योतं पश्यते वै वृषं तदा ॥ ३८ ॥
उस समय सुगन्धित तेलसे भरे हुए सहस्रों सोनेके दीपक जलाकर प्रकाश किया गया था । उसी उजालेमें वे धर्मात्मा कर्णको देख रहे थे ॥ ३८ ॥
पृष्ठ 2425
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संछिन्नभिन्नकवचं बाणैश्च विदलीकृतम् ।
सपुत्रं निहतं दृष्ट्वा कर्णं राजा युधिष्ठिरः ॥ ३ ९ ॥
संजातप्रत्ययोऽतीव वीक्ष्य चैवं पुनः पुनः ।
प्रशशंस नरव्याघ्रावुभौ माधवपाण्डवौ ॥ ४० ॥
उसका कवच छिन्न- भिन्न हो गया था और सारा शरीर बाणोंसे विदीर्ण हो चुका था । उस अवस्थामें पुत्रसहित मरे हुए कर्णको देखकर बारंबार उसका निरीक्षण करके राजा युधिष्ठिरको इस बातपर पूरा - पूरा विश्वास हुआ । फिर वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३ ९ -४० ॥
अद्य राजास्मि गोविन्द पृथिव्यां भ्रातृभिः सह ।
त्वया नाथेन वीरेण विदुषा परिपालितः ॥ ४१ ॥
उन्होंने कहा— ‘ गोविन्द! आप जैसे विद्वान् और वीर स्वामी एवं संरक्षकके द्वारा सुरक्षित होकर आज मैं भाइयोंसहित इस भूमण्डलका राजा हो गया ॥ ४१ ॥
हतं श्रुत्वा नरव्याघ्रं राधेयमतिमानिनम् ।
निराशोऽद्य दुरात्मासौ धार्तराष्ट्रो भविष्यति ॥ ४२ ॥
जीविते चैव राज्ये च हते राधात्मजे रणे ।
त्वत्प्रसादाद् वयं चैव कृतार्थाः पुरुषर्षभ ॥ ४३ ॥
' आज दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अत्यन्त अभिमानी नरव्याघ्र राधापुत्र कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर राज्य और जीवनसे भी निराश हो जायगा । पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे रणभूमिमें राधापुत्र कर्णके मारे जानेपर हम सब लोग कृतार्थ हो गये ॥ ४२-४३ ॥
दिष्ट्या जयसि गोविन्द दिष्ट्या शत्रुर्निपातितः ।
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च विजयी पाण्डुनन्दनः ॥ ४४ ॥
‘ गोविन्द! बड़े भाग्यसे आपकी विजय हुई है । भाग्यसे ही हमारा शत्रु कर्ण आज मार गिराया गया है और सौभाग्यसे ही गाण्डीवधारी पाण्डुनन्दन अर्जुन विजयी हुए हैं ' ॥ ४४ ॥
त्रयोदश समास्तीर्णा जागरेण सुदुःखिताः ।
स्वप्स्यामोऽद्य सुखं रात्रौ त्वत्प्रसादान्महाभुज ॥ ४५ ॥
' महाबाहो! अत्यन्त दुःखी होकर हमलोगोंने जागते हुए तेरह वर्ष व्यतीत किये हैं ।
आजकी रातमें आपकी कृपासे हमलोग सुखपूर्वक सो सकेंगे ' ॥ ४५ ॥
संजय उवाच
एवं स बहुशो राजा प्रशशंस जनार्दनम् ।
अर्जुनं च कुरुश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४६ ॥
पृष्ठ 2426
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार धर्मराज राजा युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्ण तथा कुरुश्रेष्ठ अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा की ॥ ४६ ॥
दृष्ट्वा च निहतं कर्णं सपुत्रं पार्थसायकैः ।
पुनर्जातमिवात्मानं मेने च स महीपतिः ॥ ४७ ॥
पुत्रसहित कर्णको अर्जुनके बाणोंसे मारा गया देख राजा युधिष्ठिरने अपना नया जन्म हुआ-सा माना ॥ ४३ ॥
समेत्य च महाराज कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
हर्षयन्ति स्म राजानं हर्षयुक्ता महारथाः ॥ ४८ ॥
महाराज! उस समय हर्षमें भरे हुए पाण्डवपक्षके महारथी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे मिलकर उनका हर्ष बढ़ाने लगे ॥ ४८ ॥
नकुलः सहदेवश्च पाण्डवश्च वृकोदरः ।
सात्यकिश्च महाराज वृष्णीनां प्रवरो रथः ॥ ४ ९ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पाण्डुपाञ्चालसृञ्जयाः ।
पूजयन्ति स्म कौन्तेयं निहते सूतनन्दने ॥ ५० ॥
राजेन्द्र! नकुल- सहदेव, पाण्डुपुत्र भीमसेन, वृष्णिवंशके श्रेष्ठ महारथी सात्यकि, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी आदि पाण्डव, पांचाल तथा संजय योद्धा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर कुन्तीकुमार अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४ ९-५० ॥
ते वर्धयित्वा नृपतिं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
जितकाशिनो लब्धलक्ष्या युद्धशौण्डाः प्रहारिणः ॥ ५१ ॥
स्तुवन्तः स्तवयुक्ताभिर्वाग्भिः कृष्णौ परंतपौ ।
जग्मुः स्वशिबिरायैव मुदा युक्ता महारथाः ॥ ५२ ॥
वे विजयसे उल्लसित हो रहे थे । उनका लक्ष्य सिद्ध हो गया था । वे युद्धकुशल महारथी योद्धा धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको बधाई देकर स्तुतियुक्त वचनोंद्वारा शत्रुसंतापी श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने शिबिरको गये ॥ ५१-५२ ॥
एवमेष क्षयो वृत्तः सुमहाँल्लोमहर्षणः ।
तव दुर्मन्त्रिते राजन् किमर्थमनुशोचसि ॥ ५३ ॥
राजन्! इस प्रकार आपकी ही कुमन्त्रणाके फलस्वरूप यह रोमांचकारी महान् जनसंहार हुआ है । अब आप किसलिये बारंबार शोक करते हैं? ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतदप्रियं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
पपात भूमौ निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ५४ ॥
पृष्ठ 2427
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यह अप्रिय समाचार सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र निश्चेष्ट हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५४ ॥
तथा सा पतिता देवी गान्धारी दीर्घदर्शिनी ।
शुशोच बहुलालापैः कर्णस्य निधनं युधि ॥ ५५ ॥
इसी तरह दूरतक सोचनेवाली गान्धारी देवी भी पछाड़ खाकर गिरीं और बहुत विलाप करती हुई युद्धमें कर्णकी मृत्युके लिये शोक करने लगीं ॥ ५५ ॥
तां पर्यगृह्णाद् विदुरो नृपतिं संजयस्तथा ।
पर्याश्वासयतां चैव तावुभावेव भूमिपम् ॥ ५६ ॥
उस समय विदुरजीने गान्धारी देवीको और संजयने राजा धृतराष्ट्रको सँभाला । फिर दोनों ही मिलकर राजाको समझाने - बुझाने लगे ॥ ५६ ॥
तथैवोत्थापयामासुर्गान्धारीं कुरुयोषितः ।
सदैवं परमं मत्वा भवितव्यं च पार्थिवः ॥ ५७ ॥
परां पीडां समाश्रित्य नष्टचित्तो महातपाः ।
चिन्ताशोकपरीतात्मा न जज्ञे मोहपीडितः ।
स समाश्वासितो राजा तूष्णीमासीद् विचेतनः ॥ ५८ ॥
इसी प्रकार कुरुकुलकी स्त्रियोंने आकर गान्धारी देवीको उठाया । भाग्य और भवितव्यताको ही प्रबल मानकर राजा धृतराष्ट्र भारी व्यथाका अनुभव करने लगे । उनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी । वे महातपस्वी नरेश चिन्ता और शोकमें डूब गये और मोहसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें किसी भी बातकी सुध न रही । विदुर और संजयके समझानेपर राजा धृतराष्ट्र अचेत - से होकर चुपचाप बैठे रह गये ॥ ५७-५८ ॥ श्रवणमहिमा इमं महायुद्धमखं महात्मनो- र्धनंजयस्याधिरथेश्च यः पठेत् । स सम्यगिष्टस्य मखस्य यत् फलं तदाप्नुयात् संश्रवणाच्च भारत ॥ ५ ९ ॥ भारत! जो मनुष्य महात्मा अर्जुन और कर्णके इस महायुद्धरूपी यज्ञका पाठ अथवा श्रवण करेगा, वह विधिपूर्वक किये हुए यज्ञानुष्ठानका फल प्राप्त कर लेगा ॥ ५ ९ ॥ मखो हि विष्णुर्भगवान् सनातनो वदन्ति तच्चाग्न्यनिलेन्दुभानवः । अतोऽनसूयुः शृणुयात् पठेच्च यः स सर्वलोकानुचरः सुखी भवेत् ॥ ६० ॥
सनातन भगवान् विष्णु यज्ञस्वरूप हैं, इस बातको अग्नि, वायु, चन्द्रमा और सूर्य भी कहते हैं । अतः जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इस युद्धयज्ञका वर्णन पढ़ता या
पृष्ठ 2428
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुनता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें* विचरनेवाला और सुखी होता है ॥ ६० ॥
तां सर्वदा भक्तिमुपागता नराः पठन्ति पुण्यां वरसंहितामिमाम् । धनेन धान्येन यशसा च मानुषा नन्दन्ति ते नात्र विचारणास्ति ॥ ६१ ॥
जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे इस उत्तम एवं पुण्यमयी संहिताका पाठ करते हैं, वे धन-धान्य एवं यशसे सम्पन्न हो आनन्दके भागी होते हैं । इस बातमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ६१ ॥
अतोऽनसूयुः शृणुयात् सदा तु वै नरः स सर्वाणि सुखानि चाप्नुयात् । विष्णुः स्वयंभूर्भगवान् भवश्च तुष्यन्ति ते तस्य नरोत्तमस्य ॥ ६२ ॥
अतः जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर सदा इस संहिताको सुनता है, वह सम्पूर्ण सुखोंको प्राप्त कर लेता है, उस श्रेष्ठ मनुष्यपर भगवान् विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी भी प्रसन्न होते हैं ॥ ६२ ॥
वेदावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह दृष्टा रणे बलं क्षत्रियाणां जयो युधि । धनज्येष्ठाश्चापि भवन्ति वैश्याः शूद्राऽऽरोग्यं प्राप्नुवन्तीह सर्वे ॥ ६३ ॥
इसके पढ़ने और सुननेसे ब्राह्मणोंको वेदोंका ज्ञान प्राप्त होता है, क्षत्रियोंको बल और युद्धमें विजय प्राप्त होती है, वैश्य धनमें बढ़े- चढ़े हो जाते हैं और समस्त शूद्र आरोग्य लाभ करते हैं ॥ ६३ ॥
तथैव विष्णुर्भगवान् सनातनः स चात्र देवः परिकीर्त्यते यतः । ततः स कामाल्लभते सुखी नरो महामुनेस्तस्य वचोऽर्चितं यथा ॥ ६४ ॥
इसमें सनातन भगवान् विष्णु ( श्रीकृष्ण) - की महिमाका वर्णन किया गया है; अतः मनुष्य इसके स्वाध्यायसे सुखी होकर सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है । महामुनि व्यासदेवकी इस परम पूजित वाणीका ऐसा ही प्रभाव है ॥ ६४ ॥
कपिलानां सवत्सानां वर्षमेकं निरन्तरम् ।
यो दद्यात् सुकृतं तद्धि श्रवणात् कर्णपर्वणः ॥ ६५ ॥
लगातार एक वर्षतक प्रतिदिन जो बछड़ोंसहित कपिला गौओंका दान करता है, उसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वही कर्णपर्वके श्रवणमात्रसे मिल जाता है ॥ ६५ ॥
पृष्ठ 2429
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरहर्षे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका हर्षविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
॥ कर्णपर्व सम्पूर्णम् ॥ OF FULL अनुष्टुप् ( बड़े श्लोक ) बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर कुल उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये १२४७ ॥।- ५३४०।- ४० ९ २ ॥ ( ९ ०७ ॥ ) दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये १२५ ॥ ( २८ ) ३८ ॥ १६४ कर्णपर्व की कुल श्लोक संख्या ५५०४।- * ‘ सर्वलोकानुचरः ' का यह अर्थ भी हो सकता है कि सब लोग उसके अनुचर हो जाते हैं ।
पृष्ठ 2430
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् शल्यपर्व प्रथमोऽध्यायः संजयके मुखसे शल्य और दुर्योधनके वधका वृत्तान्त सुनकर राजा धृतराष्ट्रका मूर्च्छित होना और सचेत होनेपर उन्हें विदुरका आश्वासन देना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और ( उन लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये । जनमेजय उवाच
एवं निपातिते कर्णे समरे सव्यसाचिना ।
अल्पावशिष्टाः कुरवः किमकुर्वत वै द्विज ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! जब इस प्रकार समरांगणमें सव्यसाची अर्जुनने कर्णको मार गिराया, तब थोड़े - से बचे हुए कौरव - सैनिकोंने क्या किया? ॥ १ ॥
उदीर्यमाणं च बलं दृष्ट्वा राजा सुयोधनः ।
पाण्डवैः प्राप्तकालं च किं प्रापद्यत कौरवः ॥ २ ॥
पाण्डवोंका बल बढ़ता देखकर कुरुवंशी राजा दुर्योधनने उनके साथ कौन- सा समयोचित बर्ताव करनेका निश्चय किया? ॥ २ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम ।
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ ३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं यह सब सुनना चाहता हूँ । मुझे अपने पूर्वजोंका महान् चरित्र सुनते - सुनते तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप इसका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच