04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2471–2480
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2471–2480
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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि दुर्योधनवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें दुर्योधनका वाक्यविषयक पाँचवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
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षष्ठोऽध्यायः दुर्योधनके पूछनेपर अश्वत्थामाका शल्यको सेनापति बनानेके लिये प्रस्ताव, दुर्योधनका शल्यसे अनुरोध और शल्यद्वारा उसकी स्वीकृति संजय उवाच
अथ हैमवते प्रस्थे स्थित्वा युद्धाभिनन्दिनः ।
सर्व एव महायोधास्तत्र तत्र समागताः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — महाराज! तदनन्तर हिमालयके ऊपरकी चौरस भूमिमें डेरा डालकर युद्धका अभिनन्दन करनेवाले सभी महान् योद्धा वहाँ एकत्र हुए ॥ १ ॥
शल्यश्च चित्रसेनश्च शकुनिश्च महारथः ।
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २ ॥
सुषेणोऽरिष्टसेनश्च धृतसेनश्च वीर्यवान् ।
जयत्सेनश्च राजानस्ते रात्रिमुषितास्ततः ॥ ३ ॥
शल्य, चित्रसेन, महारथी शकुनि, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, सात्वतवंशी कृतवर्मा, सुषेण, अरिष्टसेन, पराक्रमी धृतसेन और जयत्सेन आदि राजाओंने वहीं रात बितायी ॥ २-३ ॥
रणे कर्णे हते वीरे त्रासिता जितकाशिभिः ।
नालभन् शर्म ते पुत्रा हिमवन्तमृते गिरिम् ॥ ४ ॥
रणभूमिमें वीर कर्णके मारे जानेपर विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा डराये हुए आपके पुत्र हिमालय पर्वतके सिवा और कहीं शान्ति न पा सके ॥ ४ ॥
तेऽब्रुवन् सहितास्तत्र राजानं शल्यसंनिधौ ।
कृतयत्ना रणे राजन् सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ५ ॥
राजन्! संग्रामभूमिमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सब योद्धाओंने वहाँ एक साथ होकर शल्यके समीप राजा दुर्योधनका विधिपूर्वक सम्मान करके उससे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
कृत्वा सेनाप्रणेतारं परांस्त्वं योद्धुमर्हसि ।
येनाभिगुप्ताः संग्रामे जयेमासुहृदो वयम् ॥ ६ ॥
' नरेश्वर! तुम किसीको सेनापति बनाकर शत्रुओंके साथ युद्ध करो, जिससे सुरक्षित होकर हमलोग विपक्षियोंपर विजय प्राप्त करें' ॥ ६ ॥
ततो दुर्योधनः स्थित्वा रथे रथवरोत्तमम् ।
सर्वयुद्धविभावज्ञमन्तकप्रतिमं युधि ॥ ७ ॥
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स्वङ्गं प्रच्छन्नशिरसं कम्बुग्रीवं प्रियंवदम् ।
व्याकोशपद्मपत्राक्षं व्याघ्रास्यं मेरुगौरवम् ॥ ८ ॥
स्थाणोर्वृषस्य सदृशं स्कन्धनेत्रगतिस्वरैः ।
पुष्टश्लिष्टायतभुजं सुविस्तीर्णवरोरसम् ॥ ९ ॥
बले जवे च सदृशमरुणानुजवातयोः ।
आदित्यस्यार्चिषा तुल्यं बुद्धया चोशनसा समम् ॥ १० ॥
कान्तिरूपमुखैश्वर्यैस्त्रिभिश्चन्द्रमसा समम् ।
काञ्चनोपलसंघातैः सदृशं श्लिष्टसंधिकम् ॥ ११ ॥
सुवृत्तोरुकटीजङ्घ सुपादं स्वङ्गुलीनखम् ।
स्मृत्वा स्मृत्वैव तु गुणान् धात्रा यत्नाद् विनिर्मितम् ॥ १२ ॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं निपुणं श्रुतिसागरम् ।
जेतारं तरसारीणामजेयमरिभिर्बलात् ॥ १३ ॥
दशाङ्गं यश्चतुष्पादमिष्वस्त्रं वेद तत्त्वतः ।
साङ्गांस्तु चतुरो वेदान् सम्यगाख्यानपञ्चमान् ॥ १४ ॥
आराध्य त्र्यम्बकं यत्नाद् व्रतैरुग्रैर्महातपाः ।
अयोनिजायामुत्पन्नो द्रोणेनायोनिजेन यः ॥ १५ ॥
तमप्रतिमकर्माणं रूपेणाप्रतिमं भुवि ।
पारगं सर्वविद्यानां गुणार्णवमनिन्दितम् ॥ १६ ॥
तमभ्येत्यात्मजस्तुभ्यमश्वत्थामानमब्रवीत् । राजन्! तब आपका पुत्र दुर्योधन रथपर बैठकर अश्वत्थामाके निकट गया। अश्वत्थामा महारथियोंमें श्रेष्ठ, युद्धविषयक सभी विभिन्न भावोंका ज्ञाता और युद्धमें यमराजके समान भयंकर है । उसके अंग सुन्दर हैं, मस्तक केशोंसे आच्छादित है और कण्ठ शंखके समान सुशोभित होता है । वह प्रिय वचन बोलनेवाला है । उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर और मुख व्याघ्रके समान भयंकर है । उसमें मेरुपर्वतकी - सी गुरुता है । स्कन्ध, नेत्र, गति और स्वरमें वह भगवान् शंकरके वाहन वृषभके समान है । उसकी भुजाएँ पुष्ट, सुगठित एवं विशाल हैं । वक्षःस्थलका उत्तमभाग भी सुविस्तृत है । वह बल और वेगमें गरुड़ एवं वायुकी बराबरी करनेवाला है । तेजमें सूर्य और बुद्धिमें शुक्राचार्यके समान है । कान्ति, रूप तथा मुखकी शोभा —इन तीन गुणोंमें वह चन्द्रमाके तुल्य है । उसका शरीर सुवर्णमय प्रस्तरसमूहके समान सुशोभित होता है । अंगोंका जोड़ या संधिस्थान भी सुगठित है । ऊरु, कटिप्रदेश और पिण्डलियाँ–ये सुन्दर और गोल हैं । उसके दोनों चरण मनोहर हैं । अंगुलियाँ और नख भी सुन्दर हैं, मानो विधाताने उत्तम गुणोंका बारंबार स्मरण करके बड़े यत्नसे उसके अंगोंका निर्माण किया हो । वह समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त कार्योंमें कुशल और वेदविद्याका समुद्र है । अश्वत्थामा शत्रुओंपर वेगपूर्वक विजय पानेमें समर्थ है ।
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परंतु शत्रुओंके लिये बलपूर्वक उसके ऊपर विजय पाना असम्भव है । वह दसों अंगोंसे युक्त चारों चरणोंवाले धनुर्वेदको ठीक- ठीक जानता है । छहों अंगोंसहित चार वेदों और इतिहास- पुराण- स्वरूप पंचम वेदका भी अच्छा ज्ञाता है । महातपस्वी अश्वत्थामाको उसके पिता अयोनिज द्रोणाचार्यने बड़े यत्नसे कठोर व्रतोंद्वारा तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकरकी आराधना करके अयोनिजा कृपीके गर्भसे उत्पन्न किया था । उसके कर्मोंकी कहीं तुलना नहीं है । इस भूतलपर वह अनुपम रूप-सौन्दर्यसे युक्त है। सम्पूर्ण विद्याओंका पारंगत विद्वान् और गुणोंका महासागर है । उस अनिन्दित अश्वत्थामाके निकट जाकर आपके पुत्र दुर्योधनने इस प्रकार कहा— ॥ ७–१६३ ॥ यं पुरस्कृत्य सहिता युधि जेष्याम पाण्डवान् ॥ १७ ॥
गुरुपुत्रोऽद्य सर्वेषामस्माकं परमा गतिः ।
भवांस्तस्मान्नियोगात्ते कोऽस्तु सेनापतिर्मम ॥ १८ ॥
‘ब्रह्मन्! तुम हमारे गुरुपुत्र हो और इस समय तुम्हीं हमारे सबसे बड़े सहारे हो । अतः मैं तुम्हारी आज्ञासे सेनापतिका निर्वाचन करना चाहता हूँ। बताओ, अब कौन मेरा सेनापति हो, जिसे आगे रखकर हम सब लोग एक साथ हो युद्धमें पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करें? ' ॥ १७-१८ ॥ द्रौणिरुवाच
अयं कुलेन रूपेण तेजसा यशसा श्रिया ।
सर्वैर्गुणैः समुदितः शल्यो नोऽस्तु चमूपतिः ॥ १ ९ ॥
अश्वत्थामाने कहा — ये राजा शल्य उत्तम कुल, सुन्दर रूप, तेज, यश, श्री एवं समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं, अतः ये ही हमारे सेनापति हों ॥ १ ९ ॥
भागिनेयान् निजांस्त्यक्त्वा कृतज्ञोऽस्मानुपागतः ।
महासेनो महाबाहुर्महासेन इवापरः ॥ २० ॥
ये ऐसे कृतज्ञ हैं कि अपने सगे भानजोंको भी छोड़कर हमारे पक्षमें आ गये हैं । ये महाबाहु शल्य दूसरे महासेन ( कार्तिकेय ) के समान महती सेनासे सम्पन्न हैं ॥ २० ॥
एनं सेनापतिं कृत्वा नृपतिं नृपसत्तम ।
शक्यः प्राप्तुं जयोऽस्माभिर्देवैः स्कन्दमिवाजितम् ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ! जैसे देवताओंने किसीसे पराजित न होनेवाले स्कन्दको सेनापति बनाकर असुरोंपर विजय प्राप्त की थी, उसी प्रकार हमलोग भी इन राजा शल्यको सेनापति बनाकर शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर सकते हैं ॥ २१ ॥
तथोक्ते द्रोणपुत्रेण सर्व एव नराधिपाः ।
परिवार्य स्थिताः शल्यं जयशब्दांश्च चक्रिरे ॥ २२ ॥
युद्धाय च मतिं चक्रुरावेशं च परं ययुः ।
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द्रोणपुत्रके ऐसा कहनेपर सभी नरेश राजा शल्यको घेरकर खड़े हो गये और उनकी जय-जयकार करने लगे । उन्होंने युद्धके लिये पूर्ण निश्चय कर लिया और वे अत्यन्त आवेशमें भर गये ॥ २२ ॥
ततो दुर्योधनो भूमौ स्थित्वा रथवरे स्थितम् ॥ २३ ॥
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा द्रोणभीष्मसमं रणे ।
अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल ॥ २४ ॥
यत्र मित्रममित्रं वा परीक्षन्ते बुधा जनाः । तदनन्तर राजा दुर्योधनने भूमिपर खड़ा हो रथपर बैठे हुए रणभूमिमें द्रोण और भीष्मके समान पराक्रमी राजा शल्यसे हाथ जोड़कर कहा - ' मित्रवत्सल! आज आपके मित्रोंके सामने वह समय आ गया है जब कि विद्वान् पुरुष शत्रु या मित्रकी परीक्षा करते हैं ॥ २३-२४ ॥ स भवानस्तु नः शूरः प्रणेता वाहिनीमुखे ॥ २५ ॥
रणं याते च भवति पाण्डवा मन्दचेतसः ।
भविष्यन्ति सहामात्याः पञ्चालाश्च निरुद्यमाः ॥ २६ ॥
‘ आप हमारे शूरवीर सेनापति होकर सेनाके मुहानेपर खड़े हों । रणभूमिमें आपके जाते ही मन्दबुद्धि पाण्डव और पांचाल अपने मन्त्रियोंसहित उद्योगशून्य हो जायँगे ' ॥ २५-२६ ॥
दुर्योधनवचः श्रुत्वा शल्यो मद्राधिपस्तदा ।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो राजानं राजसंनिधौ ॥ २७ ॥
उस समय वचनके रहस्यको जाननेवाले मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य दुर्योधनके वचन सुनकर समस्त राजाओंके सम्मुख राजा दुर्योधनसे यह वचन बोले ॥ २७ ॥
शल्य उवाच
यत्तु मां मन्यसे राजन् कुरुराज करोमि तत् ।
त्वत्प्रियार्थं हि मे सर्वं प्राणा राज्यं धनानि च ॥ २८ ॥
शल्य बोले — राजन्! कुरुराज! तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, मैं उसे पूर्ण करूँगा; क्योंकि मेरे प्राण, राज्य और धन सब तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ही हैं ॥ दुर्योधन उवाच
सैनापत्येन वरये त्वामहं मातुलातुलम् ।
सोऽस्मान् पाहि युधां श्रेष्ठ स्कन्दो देवानिवाहवे ॥ २ ९ ॥
दुर्योधनने कहा — योद्धाओंमें श्रेष्ठ मामाजी! आप अनुपम वीर हैं । अतः मैं सेनापति-पद ग्रहण करनेके लिये आपका वरण करता हूँ। जैसे स्कन्दने युद्धस्थलमें देवताओंकी रक्षा की थी, उसी प्रकार आप हमलोगोंका पालन कीजिये ॥
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शल्यका कौरवोंके सेनापतिपदपर अभिषेक
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अभिषिच्यस्व राजेन्द्र देवानामिव पावकिः ।
जहि शत्रून् रणे वीर महेन्द्रो दानवानिव ॥ ३० ॥
राजाधिराज! वीर! जैसे स्कन्दने देवताओंका सेनापतित्व स्वीकार किया था, उसी प्रकार आप भी हमारे सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक कराइये तथा दानवोंका वध करनेवाले देवराज इन्द्रके समान रणभूमिमें हमारे शत्रुओंका संहार कीजिये ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्यदुर्योधनसंवादे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शल्य और दुर्योधनका संवादविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
१. धनुर्वेदके दस अंग इस प्रकार हैं – व्रत, प्राप्ति, धृति, पुष्टि, स्मृति, क्षेप, शत्रुभेदन, चिकित्सा, उद्दीपन और कृष्टि । २. दीक्षा, शिक्षा, आत्मरक्षा और इसका साधन –ये धनुर्वेदके चार चरण कहे गये हैं ।
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सप्तमोऽध्यायः राजा शल्यके वीरोचित उद्गार तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको शल्यवधके लिये उत्साहित करना संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो मद्रराजः प्रतापवान् ।
दुर्योधनं तदा राजन् वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! राजा दुर्योधनकी यह बात सुनकर प्रतापी मद्रराज शल्यने उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
दुर्योधन महाबाहो शृणु वाक्यविदां वर ।
यावेतौ मन्यसे कृष्णौ रथस्थौ रथिनां वरौ ॥ २ ॥
न मे तुल्यावुभावेत बाहुवीर्ये कथंचन । ' वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु दुर्योधन! तुम रथपर बैठे हुए जिन दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुनको रथियोंमें श्रेष्ठ समझते हो, ये दोनों बाहुबलमें किसी प्रकार मेरे समान नहीं हैं ॥ २ '' ॥ उद्यतां पृथिवीं सर्वां ससुरासुरमानवाम् ॥ ३ ॥
योधयेयं रणमुखे संक्रुद्धः किमु पाण्डवान् । ' मैं युद्धके मुहानेपर कुपित हो अपने सामने युद्धके लिये आये हुए देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सारे भूमण्डलके साथ युद्ध कर सकता हूँ। फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ३ ॥
विजेष्यामि रणे पार्थान् सोमकांश्च समागतान् ॥ ४ ॥
अहं सेनाप्रणेता ते भविष्यामि न संशयः ।
तं च व्यूहं विधास्यामि न तरिष्यन्ति यं परे ॥ ५ ॥
इति सत्यं ब्रवीम्येष दुर्योधन न संशयः । ‘ मैं रणभूमिमें कुन्तीके सभी पुत्रों और सामने आये हुए सोमकोंपर भी विजय प्राप्त कर लूँगा । इसमें भी संदेह नहीं कि मैं तुम्हारा सेनापति होऊँगा और ऐसे व्यूहका निर्माण करूँगा, जिसे शत्रु लाँघ नहीं सकेंगे । दुर्योधन! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ । इसमें कोई संशय नहीं है ' ॥ ४-५३ ॥ एवमुक्तस्ततो राजा मद्राधिपतिमञ्जसा ॥ ६ ॥
अभ्यषिञ्चत सेनाया मध्ये भरतसत्तम ।
विधिना शास्त्रदृष्टेन क्लिष्टरूपो विशाम्पते ॥ ७ ॥
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भरतश्रेष्ठ! प्रजानाथ! उनके ऐसा कहनेपर क्लेशसे दबे हुए राजा दुर्योधनने शास्त्रीय विधिके अनुसार सेनाके मध्यभागमें मद्रराज शल्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ ६-७ ॥
अभिषिक्ते ततस्तस्मिन् सिंहनादो महानभूत् ।
तव सैन्येऽभ्यवाद्यन्त वादित्राणि च भारत ॥ ८ ॥
भारत! उनका अभिषेक हो जानेपर आपकी सेनामें बड़े जोरसे सिंहनाद होने लगा और भाँति - भाँतिके बाजे बज उठे ॥ ८ ॥
हृष्टाश्चासंस्तथा योधा मद्रकाश्च महारथाः ।
तुष्टुवुश्चैव राजानं शल्यमाहवशोभिनम् ॥ ९ ॥
मद्रदेशके महारथी योद्धा हर्षमें भर गये और संग्राममें शोभा पानेवाले राजा शल्यकी स्तुति करने लगे – ॥ ९ ॥
जय राजंश्चिरञ्जीव जहि शत्रून् समागतान् ।
तव बाहुबलं प्राप्य धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ १० ॥
निखिलाः पृथिवीं सर्वां प्रशासन्तु हतद्विषः । ‘ राजन्! आप चिरंजीवी हों । सामने आये हुए शत्रुओंका संहार कर डालें । आपके बाहुबलको पाकर धृतराष्ट्रके सभी महाबली पुत्र शत्रुओंका नाश करके सारी पृथ्वीका शासन करें ॥ १०३ ॥
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं ससुरासुरमानवान् ॥ ११ ॥
मर्त्यधर्माण इह तु किमु सृञ्जयसोमकान् । 'आप रणभूमिमें सम्पूर्ण देवताओं, असुरों और मनुष्योंको जीत सकते हैं । फिर यहाँ मरणधर्मा सृजयों और सोमकोंपर विजय पाना कौन बड़ी बात है? ' ॥ ११३ ॥
एवं सम्पूज्यमानस्तु मद्राणामधिपो बली ॥ १२ ॥
हर्षं प्राप तदा वीरो दुरापमकृतात्मभिः । उनके द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होनेपर बलवान् वीर मद्रराज शल्यको वह हर्ष प्राप्त हुआ जो अकृतात्मा ( युद्धकी शिक्षासे रहित) पुरुषोंके लिये दुर्लभ है ॥ १२३ ॥
शल्य उवाच अद्य चाहं रणे सर्वान् पञ्चालान् सह पाण्डवैः ॥ १३ ॥
निहनिष्यामि वा राजन् स्वर्गं यास्यामि वा हतः । शल्यने कहा — राजन्! आज मैं रणभूमिमें पाण्डवों सहित समस्त पांचालोंको मार डालूँगा या स्वयं ही मारा जाकर स्वर्गलोकमें जा पहुँचूँगा ॥ १३३ ॥
अद्य पश्यन्तु मां लोका विचरन्तमभीतवत् ॥ १४ ॥
अद्य पाण्डुसुताः सर्वे वासुदेवः ससात्यकिः ।
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पञ्चालाश्चेदयश्चैव द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सर्वे चापि प्रभद्रकाः ।
विक्रमं मम पश्यन्तु धनुषश्च महद् बलम् ॥ १६ ॥
आज सब लोग मुझे रणभूमिमें निर्भय विचरते देखें, आज समस्त पाण्डव, श्रीकृष्ण, सात्यकि, पांचाल और चेदिदेशके योद्धा, द्रौपदीके सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा समस्त प्रभद्रकगण मेरा पराक्रम तथा मेरे धनुषका महान् बल अपनी आँखों देख लें ॥ १४ –१६ ॥
लाघवं चास्त्रवीर्यं च भुजयोश्च बलं युधि ।
अद्य पश्यन्तु मे पार्थाः सिद्धाश्च सह चारणैः ॥ १७ ॥
यादृशं मे बलं बाह्वोः सम्पदस्त्रेषु या च मे ।
अद्य मे विक्रमं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ १८ ॥
प्रतीकारपरा भूत्वा चेष्टन्तां विविधाः क्रियाः । आज कुन्तीके सभी पुत्र तथा चारणोंसहित सिद्धगण भी युद्धमें मेरी फुर्ती, अस्त्र- बल और बाहुबलको देखें । मेरी दोनों भुजाओंमें जैसा बल है तथा अस्त्रोंका मुझे जैसा ज्ञान है, उसके अनुसार आज मेरा पराक्रम देखकर पाण्डव महारथी उसके प्रतीकारमें तत्पर हो नाना प्रकारके कार्योंके लिये सचेष्ट हों ॥ १७-१८३ ॥ अद्य सैन्यानि पाण्डूनां द्रावयिष्ये समन्ततः ॥ १ ९ ॥
द्रोणभीष्मावति विभो सूतपुत्रं च संयुगे ।
विचरिष्ये रणे युध्यन् प्रियार्थं तव कौरव ॥ २० ॥
कुरुनन्दन! आज मैं पाण्डवोंकी सेनाओंको चारों ओर भगा दूँगा । प्रभो! युद्धस्थलमें तुम्हारा प्रिय करनेके लिये आज मैं द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सूतपुत्र कर्णसे भी बढ़कर पराक्रम दिखाता और जूझता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरण करूँगा ॥ १ ९-२० ॥ संजय उवाच
अभिषिक्ते तथा शल्ये तव सैन्येषु मानद ।
न कर्णव्यसनं किंचिन्मेनिरे तत्र भारत ॥ २१ ॥
संजय कहते हैं - मानद! भरतनन्दन! इस प्रकार आपकी सेनाओंमें राजा शल्यका अभिषेक होनेपर समस्त योद्धाओंको कर्णके मारे जानेका थोड़ा- सा भी दुःख नहीं रह गया ॥ २१ ॥
हृष्टाः सुमनसश्चैव बभूवुस्तत्र सैनिकाः ।
मेनिरे निहतान् पार्थान् मद्रराजवशं गतान् ॥ २२ ॥
वे सब- के - सब प्रसन्नचित्त होकर हर्षसे भर गये और यह मानने लगे कि कुन्तीके पुत्र मद्रराज शल्यके वशमें पड़कर अवश्य ही मारे जायँगे ॥ २२ ॥