04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2571–2580

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2571–2580

पृष्ठ 2571

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हार्दिक्यस्त्वरितो राजन् प्रत्यगृह्णादभीतवत् । राजन्! दुःसह एवं दुर्जय महाधनुर्धर सात्यकिको आक्रमण करते देख कृतवर्माने शीघ्रतापूर्वक एक निर्भय वीरकी भाँति उन्हें रोका ॥ ७० ॥

तौ समेतौ महात्मानौ वार्ष्णेयौ वरवाजिनौ ॥ ७१ ॥

हार्दिक्यः सात्यकिश्चैव सिंहाविव बलोत्कटौ । श्रेष्ठ घोड़ोंवाले वे महामनस्वी वृष्णिवंशी वीर सात्यकि और कृतवर्मा दो बलोन्मत्त सिंहोंके समान एक- दूसरेसे भिड़ गये ॥ ७१३ ॥

इषुभिर्विमलाभासैश्छादयन्तौ परस्परम् ॥ ७२ ॥

अर्चिर्भिरिव सूर्यस्य दिवाकरसमप्रभौ । सूर्यके समान तेजस्वी वे दोनों वीर दिनकरकी किरणोंके सदृश निर्मल कान्तिवाले बाणोंद्वारा एक- दूसरेको आच्छादित करने लगे ॥ ७२ ॥

चापमार्गबलोद्भूतान् मार्गणान् वृष्णिसिंहयोः ॥ ७३ ॥

आकाशगानपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान् । वृष्णिवंशके उन दोनों सिंहोंके धनुषद्वारा बलपूर्वक चलाये हुए शीघ्रगामी बाणोंको हमने टिड्डीदलोंके समान आकाशमें व्याप्त हुआ देखा था ॥ ७३ ॥

सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्चास्य त्रिभिः शरैः ॥ ७४ ॥

चापमेकेन चिच्छेद हार्दिक्यो नतपर्वणा । कृतवर्माने दस बाणोंसे सात्यकिको तथा तीनसे उनके घोड़ोंको घायल करके झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उनके धनुषको भी काट दिया ॥ ७४३ ॥

तन्निकृत्तं धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः ॥ ७५ ॥

अन्यदादत्त वेगेन वेगवत्तरमायुधम् । उस कटे हुए श्रेष्ठ धनुषको फेंककर शिनिप्रवर सात्यकिने उससे भी अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष शीघ्रतापूर्वक हाथमें ले लिया ॥ ७५३ ॥

तदादाय धनुः श्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् ॥ ७६ ॥

हार्दिक्यं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । उस श्रेष्ठ धनुषको लेकर सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें अग्रगण्य सात्यकिने कृतवर्माकी छातीमें दस बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७६ ॥

ततो रथं युगेषां च च्छित्त्वा भल्लैः सुसंयतैः ॥ ७७ ॥

अश्वांस्तस्यावधीत् तूर्णमुभौ च पार्ष्णिसारथी । तत्पश्चात् सुसंयत भल्लोंके प्रहारसे उसके रथ, जूए और ईषादण्ड ( हरसे ) -को काटकर शीघ्र ही घोड़ों तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी मार डाला ॥ ७७३ ॥

ततस्तं विरथं दृष्ट्वा कृपः शारद्वतः प्रभो ॥ ७८ ॥

पृष्ठ 2572

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अपोवाह ततः क्षिप्रं रथमारोप्य वीर्यवान् । प्रभो! कृतवर्माको रथहीन हुआ देख शरद्वान्‌के पराक्रमी पुत्र कृपाचार्य उसे शीघ्र ही अपने रथपर बिठाकर वहाँसे दूर हटा ले गये ॥ ७८३ ॥

मद्रराजे हते राजन् विरथे कृतवर्मणि ॥ ७९ ॥

दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् । राजन्! जब मद्रराज मारे गये और कृतवर्मा भी रथहीन हो गया, तब दुर्योधनकी सारी सेना पुनः युद्धसे मुँह मोड़कर भागने लगी ॥ ७ ९ ॥ तत् परे नान्वबुध्यन्त सैन्येन रजसा वृते ॥ ८० ॥

बलं तु हतभूयिष्ठं तत् तदाऽऽसीत् पराङ्मुखम् । परंतु वहाँ सब ओर धूल छा रही थी, इसलिये शत्रुओंको इस बातका पता न चला । अधिकांश योद्धाओंके मारे जानेसे उस समय वह सारी सेना युद्धसे विमुख हो गयी थी ॥ ८० ॥

ततो मुहूर्तात् तेऽपश्यन् रजो भीमं समुत्थितम् ॥ ८१ ॥

विविधैः शोणितस्रावैः प्रशान्तं पुरुषर्षभ । पुरुषप्रवर! तदनन्तर दो ही घड़ीमें उन सबने देखा कि धरतीकी जो धूल ऊपर उड़ रही थी, वह नाना प्रकारके रक्तका स्रोत बहनेसे शान्त हो गयी है ॥ ८१३६३ ॥

ततो दुर्योधनो दृष्ट्वा भग्नं स्वबलमन्तिकात् ॥ ८२ ॥

जवेनापततः पार्थानेकः सर्वानवारयत् । उस समय दुर्योधनने यह देखकर कि मेरी सेना मेरे पाससे भाग गयी है, वेगसे आक्रमण करनेवाले समस्त पाण्डवयोद्धाओंको अकेले ही रोका ॥ ८२३ ॥

पाण्डवान् सरथान् दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ॥ ८३ ॥

आनर्तं च दुराधर्षं शितैर्बाणैरवारयत् । रथसहित पाण्डवोंको, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको तथा दुर्जय वीर आनर्तनरेशको सामने देखकर उसने तीखे बाणोंद्वारा उन सबको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ८३३ ॥

तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवागतम् ॥ ८४ ॥

अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्योऽपि न्यवर्तत । जैसे मरणधर्मा मनुष्य पास आयी हुई अपनी मौतको नहीं टाल सकते, उसी प्रकार वे शत्रुपक्षके सैनिक दुर्योधनको लाँघकर आगे न बढ़ सके । इसी समय कृतवर्मा भी दूसरे रथपर आरूढ़ हो पुनः वहीं लौट आया ॥ ८४ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः ॥ ८५ ॥

चतुर्भिर्निजघानाश्वान् पत्रिभिः कृतवर्मणः ।

विव्याध गौतमं चापि षड्भिर्भल्लैः सुतेजनैः ॥ ८६ ॥

पृष्ठ 2573

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तब महारथी राजा युधिष्ठिरने बड़ी उतावलीके साथ चार बाण मारकर कृतवर्माके चारों घोड़ोंका संहार कर डाला तथा छः तेज धारवाले भल्लोंसे कृपाचार्यको भी घायल कर दिया ॥ ८५-८६ ॥

अश्वत्थामा ततो राज्ञा हताश्वं विरथीकृतम् ।

तमपोवाह हार्दिक्यं स्वरथेन युधिष्ठिरात् ॥ ८७ ॥

इसके बाद अश्वत्थामा अपने रथके द्वारा घोड़ोंके मारे जानेसे रथहीन हुए कृतवर्माको राजा युधिष्ठिरके पाससे दूर हटा ले गया ॥ ८७ ॥

ततः शारद्वतः षड्भिः प्रत्यविद्धयद् युधिष्ठिरम् ।

विव्याध चाश्वान्निशितैस्तस्याष्टाभिः शिलीमुखैः ॥ ८८ ॥

तब कृपाचार्यने छः बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको बींध डाला और आठ पैने बाणोंसे उनके घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ ८८ ॥

एवमेतन्महाराज युद्धशेषमवर्तत ।

तव दुर्मन्त्रिते राजन् सह पुत्रस्य भारत ॥ ८ ९ ॥

महाराज! भरतवंशी नरेश! इस प्रकार पुत्रसहित आपकी कुमन्त्रणासे इस युद्धका अन्त हुआ ॥ ८९ ॥

तस्मिन् महेष्वासवरे विशस्ते संग्राममध्ये कुरुपुङ्गवेन । पार्थाः समेताः परमप्रहृष्टाः शङ्खान् प्रदध्मुर्हतमीक्ष्य शल्यम् ॥ ९ ० ॥ कुरुकुलशिरोमणि युधिष्ठिरके द्वारा युद्धमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर शल्यके मारे जानेपर कुन्तीके सभी पुत्र एकत्र हो अत्यन्त हर्षमें भर गये और शल्यको मारा गया देख शंख बजाने लगे ॥ ९ ० ॥ युधिष्ठिरं च प्रशशंसुराजौ पुरा कृते वृत्रवधे यथेन्द्रम् । चक्रुश्च नानाविधवाद्यशब्दान् निनादयन्तो वसुधां समेताः ॥ ९ १ ॥ जैसे पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध करनेपर देवताओंने इन्द्रकी स्तुति की थी, उसी प्रकार सब पाण्डवोंने रणभूमिमें युधिष्ठिरकी भूरि- भूरि प्रशंसा की और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए वे सब लोग नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि फैलाने लगे ॥ ९ १ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्यवधे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शल्यका वधविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

पृष्ठ 2574

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( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ९ ४ श्लोक हैं। ) Papa

पृष्ठ 2575

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अष्टादशोऽध्यायः मद्रराजके अनुचरोंका वध और कौरव सेनाका पलायन संजय उवाच

शल्येऽथ निहते राजन् मद्रराजपदानुगाः ।

रथाः सप्तशता वीरा निर्ययुर्महतो बलात् ॥ १ ॥

दुर्योधनस्तु द्विरदमारुह्याचलसंनिभम् ।

छत्रेण ध्रियमाणेन वीज्यमानश्च चामरैः ॥ २ ॥

न गन्तव्यं न गन्तव्यमिति मद्रानवारयत् ।

दुर्योधनेन ते वीरा वार्यमाणाः पुनः पुनः ॥ ३ ॥

युधिष्ठिरं जिघांसन्तः पाण्डूनां प्राविशन् बलम् । संजय कहते हैं— राजन! मद्रराज शल्यके मारे जानेपर उनके अनुगामी सात सौ वीर रथी विशाल कौरव - सेनासे निकल पड़े । उस समय दुर्योधन पर्वताकार हाथीपर आरूढ़ हो सिरपर छत्र धारण किये चामरोंसे वीजित होता हुआ वहाँ आया और ' न जाओ, न जाओ ’ ऐसा कहकर उन मद्रदेशीय वीरोंको रोकने लगा; परंतु दुर्योधनके बारंबार रोकनेपर भी वे वीर योद्धा युधिष्ठिरके वधकी इच्छासे पाण्डवोंकी सेनामें जा घुसे ॥ १–३३ ॥ ते तु शूरा महाराज कृतचित्ताश्च योधने ॥ ४ ॥

धनुःशब्दं महत् कृत्वा सहायुध्यन्त पाण्डवैः । महाराज! उन शूरवीरोंने युद्ध करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया था, अतः धनुषकी गम्भीर टंकार करके पाण्डवोंके साथ संग्राम आरम्भ कर दिया ॥ ४३ ॥

श्रुत्वा च निहतं शल्यं धर्मपुत्रं च पीडितम् ॥ ५ ॥

मद्रराजप्रिये युक्तैर्मद्रकाणां महारथैः ।

आजगाम ततः पार्थो गाण्डीवं विक्षिपन् धनुः ॥ ६ ॥

पूरयन् रथघोषेण दिशः सर्वा महारथः । शल्य मारे गये और मद्रराजका प्रिय करनेमें लगे हुए मद्रदेशीय महारथियोंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पीड़ित कर रखा है; यह सुनकर कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुन गाण्डीव धनुषकी टंकार करते और रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ ५-६ ॥ ततोऽर्जुनश्च भीमश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ७ ॥

सात्यकिश्च नरव्याघ्रो द्रौपदेयाश्च सर्वशः ।

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पञ्चालाः सह सोमकैः ॥ ८ ॥

युधिष्ठिरं परीप्सन्तः समन्तात् पर्यवारयन् ।

पृष्ठ 2576

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तदनन्तर अर्जुन, भीमसेन, माद्रीपुत्र पाण्डुकुमार नकुल, सहदेव, पुरुषसिंह सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, पांचाल और सोमक वीर- इन सबने युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ ७-८३ ॥ ते समन्तात् परिवृताः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥

क्षोभयन्ति स्म तां सेनां मकराः सागरं यथा । युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए पुरुषप्रवर पाण्डव उस सेनाको उसी प्रकार क्षुब्ध करने लगे, जैसे मगर समुद्रको ॥ ९ ३ ॥ वृक्षानिव महावाताः कम्पयन्ति स्म तावकान् ॥ १० ॥

पुरोवातेन गङ्गेव क्षोभ्यमाणा महानदी ।

अक्षोभ्यत तदा राजन् पाण्डूनां ध्वजिनी ततः ॥ ११ ॥

जैसे महावायु ( आँधी ) वृक्षोंको हिला देती है, उसी प्रकार पाण्डववीरोंने आपके सैनिकोंको कम्पित कर दिया । राजन्! जैसे पूर्वी हवा महानदी गंगाको क्षुब्ध कर देती है, उसी प्रकार उन सैनिकोंने पाण्डवोंकी सेनामें भी हलचल मचा दी ॥ १०-११ ॥

प्रस्कन्द्य सेनां महतीं महात्मानो महारथाः ।

बहवश्चक्रुशुस्तत्र क्व स राजा युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥

भ्रातरो वास्य ते शूरा दृश्यने नेह केन च । वे बहुसंख्यक महामनस्वी मद्रमहारथी विशाल पाण्डव सेनाको मथकर जोर- जोरसे पुकार- पुकारकर कहने लगे —' कहाँ है वह राजा युधिष्ठिर? अथवा उसके वे शूरवीर भाई? वे सब यहाँ दिखायी क्यों नहीं देते? ॥ १२३ ॥

धृष्टद्युम्नोऽथ शैनेयो द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १३ ॥

पञ्चालाश्च महावीर्याः शिखण्डी च महारथः । ' धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके सभी पुत्र, महापराक्रमी पांचाल और महारथी शिखण्डी - ये सब कहाँ हैं? ' ॥ एवं तान् वादिनः शूरान् द्रौपदेया महारथाः ॥ १४ ॥

अभ्यघ्नन् युयुधानश्च मद्रराजपदानुगान् । ऐसी बातें कहते हुए उन मद्रराजके अनुगामी वीर योद्धाओंको द्रौपदीके महारथी पुत्रों और सात्यकिने मारना आरम्भ किया ॥ १४ ॥

चक्रैर्विमथितैः केचित् केचिच्छिन्नैर्महाध्वजैः ॥ १५ ॥

ते दृश्यन्तेऽपि समरे तावका निहताः परैः । समरांगणमें आपके वे सैनिक शत्रुओंद्वारा मारे जाने लगे । कुछ योद्धा छिन्न - भिन्न हुए रथके पहियों और कुछ कटे हुए विशाल ध्वजोंके साथ ही धराशायी होते दिखायी देने लगे ॥ १५३ ॥

पृष्ठ 2577

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आलोक्य पाण्डवान् युद्धे योधा राजन् समन्ततः ॥ १६ ॥

वार्यमाणा ययुर्वेगात् पुत्रेण तव भारत । राजन्! भरतनन्दन! वे योद्धा युद्धमें सब ओर फैले हुए पाण्डवोंको देखकर आपके पुत्रके मना करनेपर भी वेगपूर्वक आगे बढ़ गये ॥ १६३ ॥

दुर्योधनश्च तान् वीरान् वारयामास सान्त्वयन् ॥ १७ ॥

न चास्य शासनं केचित्तत्र चक्रुर्महारथाः । दुर्योधनने उन वीरोंको सान्त्वना देते हुए बहुत मना किया, किंतु वहाँ किन्हीं महारथियोंने उसकी इस आज्ञाका पालन नहीं किया ॥ १७३ ॥

ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् ॥ १८ ॥

दुर्योधनं महाराज वचनं वचनक्षमः ।

महाराज! तब प्रवचनपटु गान्धारराजपुत्र शकुनिने दुर्योधनसे यह बात कही- ॥ १८

३ ॥

किं नः सम्प्रेक्षमाणानां मद्राणां हन्यते बलम् ॥ १ ९ ॥

न युक्तमेतत् समरे त्वयि तिष्ठति भारत । ‘ भारत! हमलोगोंके देखते - देखते मद्रदेशकी यह सेना क्यों मारी जाती है? तुम्हारे रहते ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये ॥ १ ९ ॥ सहितैश्चापि योद्धव्यमित्येष समयः कृतः ॥ २० ॥

अथ कस्मात् परानेव घ्नतो मर्षयसे नृप । ‘ यह शपथ ली जा चुकी है कि ' हम सब लोग एक साथ होकर लड़ें । ' नरेश्वर! ऐसी दशामें शत्रुओंको अपनी सेनाका संहार करते देखकर भी तुम क्यों सहन करते हो? ' ॥ २० १ ॥ दुर्योधन उवाच वार्यमाणा मया पूर्वं नैते चक्रुर्वचो मम ॥ २१ ॥

एते विनिहताः सर्वे प्रस्कन्नाः पाण्डुवाहिनीम् । दुर्योधनने कहा- मैंने पहले ही इन्हें बहुत मना किया था, परंतु इन लोगोंने मेरी बात नहीं मानी और पाण्डवसेनामें घुसकर ये प्रायः सब- के - सब मारे गये ॥ शकुनिरुवाच न भर्तुः शासनं वीरा रणे कुर्वन्त्यमर्षिताः ॥ २२ ॥

अलं क्रोद्धुमथैतेषां नायं काल उपेक्षितुम् ।

यामः सर्वे च सम्भूय सवाजिरथकुञ्जराः ॥ २३ ॥

परित्रातुं महेष्वासान् मद्रराजपदानुगान् ।

अन्योन्यं परिरक्षामो यत्नेन महता नृप ॥ २४ ॥

पृष्ठ 2578

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शकुनि बोला- नरेश्वर! युद्धस्थलमें रोषामर्षके वशीभूत हुए वीर स्वामीकी आज्ञाका पालन नहीं करते हैं; वैसी दशामें इनपर क्रोध करना उचित नहीं है । यह इनकी उपेक्षा करनेका समय नहीं है । हम सब लोग एक साथ हो मद्रराजके महाधनुर्धर सेवकोंकी रक्षाके लिये हाथी, घोड़े और रथसहित चलें तथा महान् प्रयत्नपूर्वक एक - दूसरेकी रक्षा करें ॥ २२ —२४ ॥ संजय उवाच

एवं सर्वेऽनुसंचिन्त्य प्रययुर्यत्र सैनिकाः ।

एवमुक्तस्तदा राजा बलेन महता वृतः ॥ २५ ॥

प्रययौ सिंहनादेन कम्पयन्निव मेदिनीम् । संजय कहते हैं — राजन्! ऐसा विचारकर सब लोग वहीं गये, जहाँ वे सैनिक मौजूद थे । शकुनिके वैसा कहनेपर राजा दुर्योधन विशाल सेनाके साथ सिंहनाद करता और पृथ्वीको कँपाता हुआ- सा आगे बढ़ा ॥ २५३ ॥

हत विद्धयत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत ॥ २६ ॥

इत्यासीत् तुमुलः शब्दस्तव सैन्यस्य भारत । भारत! उस समय आपकी सेनामें ' मार डालो, घायल करो, पकड़ लो, प्रहार करो और टुकड़े - टुकड़े कर डालो' यह भयंकर शब्द गूँज रहा था ॥ २६३ ॥

पाण्डवास्तु रणे दृष्ट्वा मद्रराजपदानुगान् ॥ २७ ॥

सहितानभ्यवर्तन्त गुल्ममास्थाय मध्यमम् । रणभूमिमें मद्रराजके सेवकोंको एक साथ धावा करते देख पाण्डवोंने मध्यम गुल्म ( सेना ) -का आश्रय ले उनका सामना किया ॥ २७३ ॥

ते मुहूर्ताद् रणे वीरा हस्ताहस्ति विशाम्पते ॥ २८ ॥

निहताः प्रत्यदृश्यन्त मद्रराजपदानुगाः । प्रजानाथ! वे मद्रराजके अनुगामी वीर रणभूमिमें दो ही घड़ीके भीतर हाथों - हाथ मारे गये दिखायी दिये || ततो नः सम्प्रयातानां हता मद्रास्तरस्विनः ॥ २ ९ ॥ हृष्टाः किलकिलाशब्दमकुर्वन् सहिताः परे । वहाँ हमारे पहुँचते ही मद्रदेशके वे वेगशाली वीर कालके गालमें चले गये और शत्रुसैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो एक साथ किलकारियाँ भरने लगे ॥ २ ९ ॥ उत्थितानि कबन्धानि समदृश्यन्त सर्वशः ॥ ३० ॥

पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलम् । सब ओर कबन्ध खड़े दिखायी दे रहे थे और सूर्यमण्डलके बीचसे वहाँ बड़ी भारी उल्का गिरी ॥

पृष्ठ 2579

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रथैर्भग्नैर्युगाक्षैश्च निहतैश्च महारथैः ॥ ३१ ॥

अश्वैर्निपतितैश्चैव संछन्नाभूद् वसुन्धरा । टूटे- फूटे रथों, जूओं और धुरोंसे मारे गये महारथियोंसे तथा धराशायी हुए घोड़ोंसे भूमि ढक गयी थी ॥ ३१३ ॥

वातायमानैस्तुरगैर्युगासक्तैस्ततस्ततः ॥ ३२ ॥

अदृश्यन्त महाराज योधास्तत्र रणाजिरे । महाराज! वहाँ समरांगणमें बहुत - से योद्धा जूएमें बँधे हुए वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा इधर- उधर ले जाये जाते दिखायी देते थे ॥ ३२ ॥

भग्नचक्रान् रथान् केचिदहरंस्तुरगा रणे ॥ ३३ ॥

रथार्धं केचिदादाय दिशो दश विबभ्रमुः । कुछ घोड़े रणभूमिमें टूटे पहियोंवाले रथोंको लिये जा रहे थे और कितने ही अश्व आधे ही रथको लेकर दसों दिशाओंमें चक्कर लगाते थे ॥ ३३ ॥

तत्र तत्र व्यदृश्यन्त योक्त्रैः श्लिष्टाः स्म वाजिनः ॥ ३४ ॥

रथिनः पतमानाश्च दृश्यने स्म नरोत्तमाः ।

गगनात् प्रच्युताः सिद्धाः पुण्यानामिव संक्षये ॥ ३५ ॥

जहाँ- तहाँ जोतोंसे जुड़े हुए घोड़े और नरश्रेष्ठ रथी गिरते दिखायी दे रहे थे, मानो सिद्ध ( पुण्यात्मा) पुरुष पुण्यक्षय होनेपर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हों ॥

निहतेषु च शूरेषु मद्रराजानुगेषु वै ।

अस्मानापततश्चापि दृष्ट्वा पार्था महारथाः ॥ ३६ ॥

अभ्यवर्तन्त वेगेन जयगृद्धाः प्रहारिणः ।

बाणशब्दरवान् कृत्वा विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः ॥ ३७ ॥

मद्रराजके उन शूरवीर सैनिकोंके मारे जानेपर हमें आक्रमण करते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले महारथी पाण्डवयोद्धा शंखध्वनिके साथ बाणोंकी सनसनाहट फैलाते हुए हमारा सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आये ॥ ३६-३७ ॥

अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्ष्यप्रहारिणः ।

शरासनानि धुन्वानाः सिंहनादान् प्रचुक्रुशुः ॥ ३८ ॥

हमारे पास पहुँचकर लक्ष्य वेधनेमें सफल और प्रहारकुशल पाण्डव- सैनिक अपने धनुष हिलाते हुए जोर- जोर से सिंहनाद करने लगे ॥ ३८ ॥

ततो हतमभिप्रेक्ष्य मद्रराजबलं महत् ।

मद्रराजं च समरे दृष्ट्वा शूरं निपातितम् ॥ ३ ९ ॥

दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् । मद्रराजकी वह विशाल सेना मारी गयी तथा शूरवीर मद्रराज शल्य पहले ही समरभूमिमें धराशायी किये जा चुके हैं, यह सब अपनी आँखों देखकर दुर्योधनकी सारी

पृष्ठ 2580

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सेना पुनः पीठ दिखाकर भाग चली ॥

वध्यमानं महाराज पाण्डवैर्जितकाशिभिः ।

दिशो भेजेऽथ सम्भ्रान्तं भ्रामितं दृढधन्विभिः ॥ ४० ॥

महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले दृढ़ धनुर्धर पाण्डवोंकी मार खाकर कौरव - सेना घबरा उठी और भ्रान्त - सी होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगी ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अठारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

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