04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2621–2630

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2621–2630

पृष्ठ 2621

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तब विजयाभिलाषी पाण्डवोंने भी तुरंत उसपर धावा कर दिया । पाण्डव युद्धसे पार होना चाहते थे; अतः उनके पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार सभी हथियार उठाये आगे बढ़े तथा शकुनिको सब ओरसे घेरकर उसे कोष्ठबद्ध करके नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ८६-८७ ॥

त्वदीयास्तांस्तु सम्प्रेक्ष्य सर्वतः समभिद्रुतान् ।

रथाश्वपत्तिद्विरदाः पाण्डवानभिदुद्रुवुः ॥ ८८ ॥

पाण्डव- सैनिकोंको सब ओरसे आक्रमण करते देख आपके रथी, घुड़सवार, पैदल और हाथीसवार भी पाण्डवोंपर टूट पड़े ॥ ८८ ॥

केचित् पदातयः पद्भिर्मुष्टिभिश्च परस्परम् ।

निजघ्नुः समरे शूराः क्षीणशस्त्रास्ततोऽपतन् ॥ ८ ९ ॥

कुछ शूरवीर पैदल योद्धा समरांगणमें पैदलोंके साथ भिड़ गये और अस्त्र- शस्त्रोंके क्षीण हो जानेपर एक- दूसरेको मुक्कोंसे मारने लगे । इस प्रकार लड़ते - लड़ते वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८९ ॥

रथेभ्यो रथिनः पेतुर्द्विपेभ्यो हस्तिसादिनः ।

विमानेभ्यो दिवो भ्रष्ट्राः सिद्धाः पुण्यक्षयादिव ॥ ९ ० ॥

जैसे सिद्ध पुरुष पुण्यक्षय होनेपर स्वर्गलोकके विमानोंसे नीचे गिर जाते हैं, उसी प्रकार वहाँ रथी रथोंसे और हाथीसवार हाथियोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९ ० ॥

एवमन्योन्यमायत्ता योधा जघ्नुर्महाहवे ।

पितॄन् भ्रातॄन् वयस्यांश्च पुत्रानपि तथा परे ॥ ९ १ ॥

इस प्रकार उस महायुद्धमें दूसरे दूसरे योद्धा परस्पर विजयके लिये प्रयत्नशील हो पिता, भाई, मित्र और पुत्रोंका भी वध करने लगे ॥ ९ १ ॥

एवमासीदमर्यादं युद्धं भरतसत्तम ।

प्रासासिबाणकलिले वर्तमाने सुदारुणे ॥ ९ २ ॥

भरतश्रेष्ठ! प्रास, खड्ग और बाणोंसे व्याप्त हुए उस अत्यन्त भयंकर रणक्षेत्रमें इस प्रकार मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था ॥ ९ २ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक तेईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २३ ॥

पृष्ठ 2622

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चतुर्विंशोऽध्यायः श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार संजय उवाच

तस्मिन् शब्दे मृदौ जाते पाण्डवैर्निहते बले ।

अश्वैः सप्तशतैः शिष्टैरुपावर्तत सौबलः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! जब पाण्डवयोद्धाओंने अधिकांश सेनाका संहार कर डाला और युद्धका कोलाहल कम हो गया, तब सुबलपुत्र शकुनि शेष बचे हुए सात सौ घुड़सवारोंके साथ कौरव सेनाके समीप चला गया ॥ १ ॥

स यात्वा वाहिनीं तूर्णमब्रवीत् त्वरयन् युधि ।

युद्धयध्वमिति संहृष्टाः पुनः पुनररिंदमाः ॥ २ ॥

अपृच्छत् क्षत्रियांस्तत्र क्व नु राजा महाबलः । वह तुरंत कौरव- सेनामें पहुँचकर सबको युद्धके लिये शीघ्रता करनेकी प्रेरणा देता हुआ बोला — ' शत्रुओंका दमन करनेवाले वीरो! तुम हर्ष और उत्साहके साथ युद्ध करो । ' ऐसा कहकर उसने वहाँ बारंबार क्षत्रियोंसे पूछा - ' महाबली राजा दुर्योधन कहाँ है? ' ॥ २३ ॥

शकुनेस्तद् वचः श्रुत्वा तमूचुर्भरतर्षभ ॥ ३ ॥

असौ तिष्ठति कौरव्यो रणमध्ये महाबलः ।

यत्रैतत् सुमहच्छत्रं पूर्णचन्द्रसमप्रभम् ॥ ४ ॥

यत्र ते सतनुत्राणा रथास्तिष्ठन्ति दंशिताः । भरतश्रेष्ठ! शकुनिकी वह बात सुनकर उन क्षत्रियोंने उसे यह उत्तर दिया — ' प्रभो! महाबली कुरुराज रणक्षेत्रके मध्यभागमें वहाँ खड़े हैं, जहाँ यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् विशाल छत्र तना हुआ है तथा जहाँ वे शरीर-रक्षक आवरणों एवं कवचोंसे सुसज्जित रथ खड़े हैं ॥ यत्रैष तुमुलः शब्दः पर्जन्यनिनदोपमः ॥ ५ ॥

तत्र गच्छ द्रुतं राजंस्ततो द्रक्ष्यसि कौरवम् । ‘ राजन्! जहाँ यह मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान भयानक शब्द गूँज रहा है, वहीं शीघ्रतापूर्वक चले जाइये, वहाँ आप कुरुराजका दर्शन कर सकेंगे ' ॥ ५३ ॥

एवमुक्तस्तु तैर्योधैः शकुनिः सौबलस्तदा ॥ ६ ॥

प्रययौ तत्र यत्रासौ पुत्रस्तव नराधिप ।

सर्वतः संवृतो वीरैः समरे चित्रयोधिभिः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2623

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नरेश्वर! तब उन योद्धाओंके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनि वहीं गया, जहाँ आपका पुत्र दुर्योधन समरांगणमें विचित्र युद्ध करनेवाले वीरोंद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ खड़ा था ॥ ६-७ ॥

ततो दुर्योधनं दृष्ट्वा रथानीके व्यवस्थितम् ।

स रथांस्तावकान् सर्वान् हर्षयन् शकुनिस्ततः ॥ ८ ॥

दुर्योधनमिदं वाक्यं हृष्टरूपो विशाम्पते ।

कृतकार्यमिवात्मानं मन्यमानोऽब्रवीन्नृपम् ॥ ९ ॥

प्रजानाथ! तदनन्तर दुर्योधनको रथसेनामें खड़ा देख आपके सम्पूर्ण रथियोंका हर्ष बढ़ाता हुआ शकुनि अपनेको कृतार्थ सा मानकर बड़े हर्षके साथ राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोला- ॥ ८- ९ ॥

जहि राजन् रथानीकमश्वाः सर्वे जिता मया ।

नात्यक्त्वा जीवितं संख्ये शक्यो जेतुं युधिष्ठिरः ॥ १० ॥

' राजन्! शत्रुकी रथसेनाका नाश कीजिये । समस्त घुड़सवारोंको मैंने जीत लिया है ।

राजा युधिष्ठिर अपने प्राणोंका परित्याग किये बिना जीते नहीं जा सकते ॥ १० ॥

हते तस्मिन् रथानीके पाण्डवेनाभिपालिते ।

गजानेतान् हनिष्यामः पदातींश्चेतरांस्तथा ॥ ११ ॥

'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा सुरक्षित इस रथ- सेनाका संहार हो जानेपर हम इन हाथीसवारों, पैदलों और घुड़सवारोंका भी वध कर डालेंगे ' ॥ ११ ॥

श्रुत्वा तु वचनं तस्य तावका जयगृद्धिनः ।

जवेनाभ्यपतन् हृष्टाः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ १२ ॥

विजयाभिलाषी शकुनिकी यह बात सुनकर आपके सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े वेगसे पाण्डव- सेनापर टूट पड़े ॥ १२ ॥

सर्वे विवृततूणीराः प्रगृहीतशरासनाः ।

शरासनानि धुन्वानाः सिंहनादान् प्रणेदिरे ॥ १३ ॥

सबके तरकसोंके मुँह खुल गये, सबने हाथमें धनुष ले लिये और सभी धनुष हिलाते हुए जोर- जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १३ ॥

ततो ज्यातलनिर्घोषः पुनरासीद् विशाम्पते ।

प्रादुरासीच्छराणां च सुमुक्तानां सुदारुणः ॥ १४ ॥

प्रजानाथ! तदनन्तर फिर प्रत्यंचाकी टंकार और अच्छी तरह छोड़े हुए बाणोंकी भयानक सनसनाहट प्रकट होने लगी ॥ १४ ॥

तान् समीपगतान् दृष्ट्वा जवेनोद्यतकार्मुकान् ।

उवाच देवकीपुत्रं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2624

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उन सबको बड़े वेगसे धनुष उठाये पास आया देखकर कुन्तीकुमार अर्जुनने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥

चोदयाश्वानसम्भ्रान्तः प्रविशैतद् बलार्णवम् ।

अन्तमद्य गमिष्यामि शत्रूणां निशितैः शरैः ॥ १६ ॥

अष्टादश दिनान्यद्य युद्धस्यास्य जनार्दन ।

वर्तमानस्य महतः समासाद्य परस्परम् ॥ १७ ॥

‘ जनार्दन! आप स्वस्थचित्त होकर इन घोड़ोंको हाँकिये और इस सैन्यसागरमें प्रवेश कीजिये । आज मैं तीखे बाणोंसे शत्रुओंका अन्त कर डालूँगा । परस्पर भिड़कर इस महान् संग्रामके आरम्भ हुए आज अठारह दिन हो गये ॥ १६-१७ ॥

अनन्तकल्पा ध्वजिनी भूत्वा ह्येषां महात्मनाम् ।

क्षयमद्य गता युद्धे पश्य दैवं यथाविधम् ॥ १८ ॥

‘ इन महामनस्वी कौरवोंके पास अपार सेना थी; परंतु युद्धमें इस समयतक प्रायः नष्ट हो गयी । देखिये, प्रारब्धका कैसा खेल है? ॥ १८ ॥

समुद्रकल्पं च बलं धार्तराष्ट्रस्य माधव ।

अस्मानासाद्य संजातं गोष्पदोपममच्युत ॥ १ ९ ॥

‘ माधव! अच्युत! दुर्योधनकी समुद्र जैसी अनन्त सेना हमलोगोंसे टक्कर लेकर आज गायकी खुरीके समान हो गयी है ॥ १ ९ ॥

हते भीष्मे तु संदध्याच्छिवं स्यादिह माधव ।

न च तत् कृतवान् मूढो धार्तराष्ट्रः सुबालिशः ॥ २० ॥

‘ माधव! यदि भीष्मके मारे जानेपर दुर्योधन सन्धि कर लेता तो यहाँ सबका कल्याण होता; परंतु उस अज्ञानी मूर्खने वैसा नहीं किया ॥ २० ॥

उक्तं भीष्मेण यद् वाक्यं हितं तथ्यं च माधव ।

तच्चापि नासौ कृतवान् वीतबुद्धिः सुयोधनः ॥ २१ ॥

'मधुकुलभूषण! भीष्मजीने जो सच्ची और हितकर बात बतायी थी, उसे भी उस बुद्धिहीन दुर्योधनने नहीं माना ॥

तस्मिंस्तु तुमुले भीष्मे प्रच्युते धरणीतले ।

न जाने कारणं किं तु येन युद्धमवर्तत ॥ २२ ॥

‘ तदनन्तर घमासान युद्ध आरम्भ हुआ और उसमें भीष्मजी पृथ्वीपर मार गिराये गये ।

फिर भी न जाने क्या कारण था, जिससे युद्ध चालू ही रह गया ॥ २२ ॥

मूढांस्तु सर्वथा मन्ये धार्तराष्ट्रान् सुबालिशान् ।

पतिते शान्तनोः पुत्रे येऽकार्षुः संयुगं पुनः ॥ २३ ॥

' मैं धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंको सर्वथा मूर्ख और नादान समझता हूँ, जिन्होंने शान्तनुनन्दन भीष्मजीके धराशायी होनेपर भी पुनः युद्ध जारी रखा ॥ २३ ॥

पृष्ठ 2625

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अनन्तरं च निहते द्रोणे ब्रह्मविदां वरे ।

राधेये च विकर्णे च नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ २४ ॥

‘तत्पश्चात् वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, राधापुत्र कर्ण और विकर्ण मारे गये तो भी यह मार- काट बंद नहीं हुई ॥ २४ ॥

अल्पावशिष्टे सैन्येऽस्मिन् सूतपुत्रे च पातिते ।

सपुत्रे वै नरव्याघ्रे नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ २५ ॥

‘ पुत्रसहित नरश्रेष्ठ सूतपुत्रके मार गिराये जानेपर जब कौरव सेना थोड़ी- सी ही बच रही थी तो भी यह युद्धकी आग नहीं बुझी ॥ २५ ॥

श्रुतायुषि हते वीरे जलसन्धे च पौरवे ।

श्रुतायुधे च नृपतौ नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ २६ ॥

' श्रुतायु, वीर जलसन्ध, पौरव तथा राजा श्रुतायुधके मारे जानेपर भी यह संहार बंद नहीं हुआ ॥ २६ ॥

भूरिश्रवसि शल्ये च शाल्वे चैव जनार्दन ।

आवन्त्येषु च वीरेषु नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ २७ ॥

‘ जनार्दन! भूरिश्रवा, शल्य, शाल्व तथा अवन्ति देशके वीर मारे गये तो भी यह युद्धकी ज्वाला शान्त न हो सकी ॥

जयद्रथे च निहते राक्षसे चाप्यलायुधे ।

बाह्लिके सोमदत्ते च नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ २८ ॥

'जयद्रथ, बाह्लिक, सोमदत्त तथा राक्षस अलायुध - ये सभी परलोकवासी हो गये तो भी यह युद्धकी प्यास न बुझ सकी ॥ २८ ॥

भगदत्ते हते शूरे काम्बोजे च सुदारुणे ।

दुःशासने च निहते नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ २ ९ ॥

‘ भगदत्त, शूरवीर काम्बोजराज सुदक्षिण तथा अत्यन्त दारुण दुःशासनके मारे जानेपर भी कौरवोंकी युद्ध - पिपासा शान्त नहीं हुई ॥ २ ९ ॥

दृष्ट्वा विनिहतान् शूरान् पृथङ्माण्डलिकान् नृपान् ।

बलिनश्च रणे कृष्ण नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ ३० ॥

' श्रीकृष्ण! विभिन्न मण्डलोंके स्वामी शूरवीर बलवान् नरेशोंको रणभूमिमें मारा गया देखकर भी यह युद्धकी आग बुझ न सकी ॥ ३० ॥

अक्षौहिणीपतीन् दृष्ट्वा भीमसेननिपातितान् ।

मोहाद् वा यदि वा लोभान्नैवाशाम्यत वैशसम् ॥ ३१ ॥

' भीमसेनके द्वारा धराशायी किये गये अक्षौहिणी- पतियोंको देखकर भी मोहवश अथवा लोभके कारण युद्ध बंद न हो सका ॥ ३१ ॥

को नु राजकुले जातः कौरवेयो विशेषतः ।

पृष्ठ 2626

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2626 का मूल पृष्ठ
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निरर्थकं महद् वैरं कुर्यादन्यः सुयोधनात् ॥ ३२ ॥

‘ राजाके कुलमें उत्पन्न होकर विशेषतः कुरुकुलकी संतान होकर दुर्योधनके सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो व्यर्थ ही ( अपने बन्धुओंके साथ) महान् वैर बाँधे ॥

गुणतोऽभ्यधिकान् ज्ञात्वा बलतः शौर्यतोऽपि वा ।

अमूढः को नु युद्धयेत जानन् प्राज्ञो हिताहितम् ॥ ३३ ॥

' दूसरोंको गुणसे, बलसे अथवा शौर्यसे भी अपनी अपेक्षा महान् जानकर भी अपने हित और अहितको समझनेवाला मूढ़ताशून्य कौन ऐसा बुद्धिमान् पुरुष होगा? जो उनके साथ युद्ध करेगा ॥ ३३ ॥

यन्न तस्य मनो ह्यासीत् त्वयोक्तस्य हितं वचः ।

प्रशमे पाण्डवैः सार्धं सोऽन्यस्य शृणुयात् कथम् ॥ ३४ ॥

‘ आपके द्वारा हितकारक वचन कहे जानेपर भी जिसका पाण्डवोंके साथ संधि करनेका मन नहीं हुआ, वह दूसरेकी बात कैसे सुन सकता है? ॥ ३४ ॥

येन शान्तनवो वीरो द्रोणो विदुर एव च ।

प्रत्याख्याताः शमस्यार्थे किं नु तस्याद्य भेषजम् ॥ ३५ ॥

‘ जिसने संधिके विषयमें वीर शान्तनुनन्दन भीष्म, द्रोणाचार्य और विदुरजीकी भी बात मानने से इनकार कर दी, उसके लिये अब कौन- सी दवा है? ॥ ३५ ॥

मौर्य्याद् येन पिता वृद्धः प्रत्याख्यातो जनार्दन ।

तथा माता हितं वाक्यं भाषमाणा हितैषिणी ॥ ३६ ॥

प्रत्याख्याता ह्यसत्कृत्य स कस्मै रोचयेद् वचः । ‘ जनार्दन! जिसने मूर्खतावश अपने वृद्ध पिताकी भी बात नहीं मानी और हितकी बात बतानेवाली अपनी हितैषिणी माताका भी अपमान करके उसकी आज्ञा माननेसे इनकार कर दिया, उसे दूसरे किसीकी बात क्यों रुचेगी? ॥ कुलान्तकरणो व्यक्तं जात एष जनार्दन ॥ ३७ ॥

तथास्य दृश्यते चेष्टा नीतिश्चैव विशाम्पते । 'जनार्दन! निश्चय ही यह अपने कुलका विनाश करनेवाला पैदा हुआ है । प्रजानाथ! इसकी नीति और चेष्टा ऐसी ही दिखायी देती है ॥ ३७३ ॥

नैष दास्यति नो राज्यमिति मे मतिरच्युत ॥ ३८ ॥

उक्तोऽहं बहुशस्तात विदुरेण महात्मना ।

न जीवन् दास्यते भागं धार्तराष्ट्रस्तु मानद ॥ ३ ९ ॥

' अच्युत! मैं समझता हूँ, यह अब भी हमें अपना राज्य नहीं देगा । तात! महात्मा विदुरने मुझसे अनेक बार कहा है कि ' मानद! दुर्योधन जीते -जी राज्यका भाग नहीं लौटायेगा ॥ ३८-३९ ॥ यावत् प्राणा धरिष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ।

पृष्ठ 2627

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2627 का मूल पृष्ठ
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तावद् युष्मास्वपापेषु प्रचरिष्यति पापकम् ॥ ४० ॥

' दुर्बुद्धि दुर्योधनके प्राण जबतक शरीरमें स्थित रहेंगे, तबतक तुम निष्पाप बन्धुओंपर भी वह पापपूर्ण बर्ताव ही करता रहेगा ॥ ४० ॥

न च युक्तोऽन्यथा जेतुमृते युद्धेन माधव ।

इत्यब्रवीत् सदा मां हि विदुरः सत्यदर्शनः ॥ ४१ ॥

‘ माधव! युद्धके सिवा और किसी उपायसे दुर्योधनको जीतना सम्भव नहीं है । ' यह बात सत्यदर्शी विदुरजी सदासे ही मुझे कहते आ रहे हैं ॥ ४१ ॥

तत् सर्वमद्य जानामि व्यवसायं दुरात्मनः ।

यदुक्तं वचनं तेन विदुरेण महात्मना ॥ ४२ ॥

' महात्मा विदुरने जो बात कही है, उसके अनुसार मैं उस दुरात्माके सम्पूर्ण निश्चयको आज जानता हूँ ॥

यो हि श्रुत्वा वचः पथ्यं जामदग्न्याद् यथातथम् ।

अवामन्यत दुर्बुद्धिर्ध्रुवं नाशमुखे स्थितः ॥ ४३ ॥

'जिस दुर्बुद्धिने यमदग्निनन्दन परशुरामजीके मुखसे यथार्थ एवं हितकारक वचन सुनकर भी उसकी अवहेलना कर दी, वह निश्चय ही विनाशके मुखमें स्थित है ॥ ४३ ॥

उक्तं हि बहुशः सिद्धैर्जातमात्रे सुयोधने ।

एनं प्राप्य दुरात्मानं क्षयं क्षत्रं गमिष्यति ॥ ४४ ॥

' दुर्योधनके जन्म लेते ही सिद्ध पुरुषोंने बारंबार कहा था कि ' इस दुरात्माको पाकर क्षत्रियजातिका विनाश हो जायगा' ॥ ४४ ॥

तदिदं वचनं तेषां निरुक्तं वै जनार्दन ।

क्षयं याता हि राजानो दुर्योधनकृते भृशम् ॥ ४५ ॥

‘ जनार्दन! उनकी वह बात यथार्थ हो गयी; क्योंकि दुर्योधनके कारण बहुत - से राजा नष्ट हो गये ॥

सोऽद्य सर्वान् रणे योधान् निहनिष्यामि माधव ।

क्षत्रियेषु हतेष्वाशु शून्ये च शिबिरे कृते ॥ ४६ ॥

वधाय चात्मनोऽस्माभिः संयुगं रोचयिष्यति ।

तदन्तं हि भवेद् वैरमनुमानेन माधव ॥ ४७ ॥

' माधव! आज मैं रणभूमिमें शत्रुपक्षके समस्त योद्धाओंको मार गिराऊँगा। इन क्षत्रियोंका शीघ्र ही संहार हो जानेपर जब सारा शिविर सूना हो जायगा, तब वह अपने वधके लिये हमलोगोंके साथ जूझना पसंद करेगा। माधव! मेरे अनुमानसे उसका वध होनेपर ही इस वैरका अन्त होगा ॥ ४७ ॥

एवं पश्यामि वार्ष्णेय चिन्तयन् प्रज्ञया स्वया ।

विदुरस्य च वाक्येन चेष्टया च दुरात्मनः ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 2628

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' वृष्णिनन्दन! मैं अपनी बुद्धिसे, विदुरजीके वाक्यसे और दुरात्मा दुर्योधनकी चेष्टासे भी सोच - विचारकर ऐसा ही होता देखता हूँ ॥ ४८ ॥

तस्माद् याहि चमूं वीर यावद्धन्मि शितैः शरैः ।

दुर्योधनं महाबाहो वाहिनीं चास्य संयुगे ॥ ४ ९ ॥

‘ अतः वीर! महाबाहो! आप कौरव सेनाकी ओर चलिये, जिससे मैं पैने बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें दुर्योधन और उसकी सेनाका संहार करूँ ॥ ४ ९ ॥

क्षेममद्य करिष्यामि धर्मराजस्य माधव ।

हत्वैतद् दुर्बलं सैन्यं धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ॥ ५० ॥

' माधव! आज मैं दुर्योधनके देखते - देखते इस दुर्बल सेनाका नाश करके धर्मराजका कल्याण करूँगा' ॥ ५० ॥

संजय उवाच

अभीषुहस्तो दाशार्हस्तथोक्तः सव्यसाचिना ।

तद् बलौघममित्राणामभीतः प्राविशद् बलात् ॥ ५१ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! सव्यसाची अर्जुनके ऐसा कहनेपर घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लिये दशार्हकुल -नन्दन श्रीकृष्णने निर्भय हो शत्रुओंके उस सैन्य - सागरमें बलपूर्वक प्रवेश किया ॥ ५१ ॥

कुन्तखड्गशरैर्घोरं शक्तिकण्टकसंकुलम् ।

गदापरिघपन्थानं रथनागमहाद्रुमम् ॥ ५२ ॥

हयपत्तिलताकीर्णं गाहमानो महायशाः ।

व्यचरत्तत्र गोविन्दो रथेनातिपताकिना ॥ ५३ ॥

वह सेना एक वनके समान थी । वह वन कुन्त, खड्ग और बाणोंसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था, शक्तिरूपी काँटोंसे भरा हुआ था, गदा और परिघ उसमें जानेके मार्ग थे, रथ और हाथी उसमें रहनेवाले बड़े - बड़े वृक्ष थे, घोड़े और पैदलरूपी लताओंसे वह व्याप्त हो रहा था, महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण ऊँची पताकावाले रथके द्वारा उस सैन्यवनमें प्रवेश करके सब ओर विचरने लगे ॥

ते हयाः पाण्डुरा राजन् वहन्तोऽर्जुनमाहवे ।

दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त दाशार्हेण प्रचोदिताः ॥ ५४ ॥

राजन्! श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये वे सफेद घोड़े युद्धस्थलमें अर्जुनको ढोते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें दिखायी पड़ते थे ॥ ५४ ॥

ततः प्रायाद् रथेनाजौ सव्यसाची परंतपः ।

किरन् शरशतांस्तीक्ष्णान् वारिधारा घनो यथा ॥ ५५ ॥

प्रादुरासीन्महान् शब्दः शराणां नतपर्वणाम् ।

पृष्ठ 2629

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2629 का मूल पृष्ठ
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फिर तो जैसे बादल पानीकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन युद्धस्थलमें सैकड़ों पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए रथके द्वारा आगे बढ़े । उस समय झुकी हुई गाँठवाले बाणोंका महान् शब्द प्रकट होने लगा ॥ ५५३ ॥

इषुभिश्छाद्यमानानां समरे सव्यसाचिना ॥ ५६ ॥

असज्जन्तस्तनुत्रेषु शरौघाः प्रापतन् भुवि । सव्यसाची अर्जुनद्वारा समरभूमिमें बाणोंसे आच्छादित होनेवाले सैनिकोंके कवचोंपर

उनके बाण अटकते नहीं थे । वे चोट करके पृथ्वीपर गिर जाते थे ॥ ५६३ ॥

इन्द्राशनिसमस्पर्शा गाण्डीवप्रेषिताः शराः ॥ ५७ ॥

नरान् नागान् समाहत्य हयांश्चापि विशाम्पते ।

अपतन्त रणे बाणाः पतङ्गा इव घोषिणः ॥ ५८ ॥

प्रजानाथ! इन्द्रके वज्रकी भाँति कठोर स्पर्शवाले बाण गाण्डीवसे प्रेरित हो मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका भी संहार करके शब्द करनेवाले टिड्डीदलोंके समान रणभूमिमें गिर पड़ते थे ॥ ५८ ॥

आसीत् सर्वमवच्छन्नं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः ।

न प्राज्ञायन्त समरे दिशो वा प्रदिशोऽपि वा ॥ ५ ९ ॥

गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उस रणभूमिकी सारी वस्तुएँ आच्छादित हो गयी थीं । दिशाओं अथवा विदिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो पाता था ॥ ५ ९ ॥

सर्वमासीज्जगत् पूर्णं पार्थनामाङ्कितैः शरैः ।

रुक्मपुङ्खैस्तैलधौतैः कर्मारपरिमार्जितैः ॥ ६० ॥

अर्जुनके नामसे अंकित, तेलके धोये और कारीगरके साफ किये सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा वहाँका सारा जगत् व्याप्त हो रथा था ॥ ६० ॥

ते दह्यमानाः पार्थेन पावकेनेव कुञ्जराः ।

पार्थं न प्रजहुर्घोरा वध्यमानाः शितैः शरैः ॥ ६१ ॥

दावानलके आगसे चलनेवाले हाथियोंके समान पार्थके पैने बाणोंकी मार खाकर दग्ध होते हुए वे घोर कौरवयोद्धा अर्जुनको छोड़कर हटते नहीं थे ॥ ६१ ॥

शरचापधरः पार्थः प्रज्वलन्निव भास्करः ।

ददाह समरे योधान् कक्षमग्निरिव ज्वलन् ॥ ६२ ॥

जैसे जलती हुई आग घास- फूसके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले धनुष- बाणधारी अर्जुनने समरांगणमें आपके योद्धाओंको दग्ध कर दिया ॥ ६२ ॥

यथा वनान्ते वनपैर्विसृष्टः कक्षं दहेत् कृष्णगतिः सुघोषः । भूरिद्रुमं शुष्कलतावितानं

पृष्ठ 2630

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2630 का मूल पृष्ठ
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भृशं समृद्धो ज्वलनः प्रतापी ॥ ६३ ॥

एवं स नाराचगणप्रतापी

शरार्चिरुच्चावचतिग्मतेजाः ।

ददाह सर्वां तव पुत्रसेना- ममृष्यमाणस्तरसा तरस्वी ॥ ६४ ॥

जैसे वनचरोंद्वारा वनके भीतर लगायी हुई आग धीरे- धीरे बढ़कर प्रज्वलित एवं महान् तापसे युक्त हो घास -फूसके ढेरको, बहुसंख्यक वृक्षोंको और सूखी हुई लतावल्लरियोंको भी जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार नाराचसमूहोंद्वारा ताप देनेवाले, बाणरूपी ज्वालाओंसे युक्त, वेगवान्, प्रचण्ड तेजस्वी और अमर्षमें भरे हुए अर्जुनने समरांगणमें आपके पुत्रकी सारी रथसेनाको शीघ्रतापूर्वक भस्म कर डाला ॥ ६३-६४ ॥ तस्येषवः प्राणहराः सुमुक्ता नासज्जन् वै वर्मसु रुक्मपुङ्खाः । न च द्वितीयं प्रमुमोच बाणं न ये वा परमद्विपे वा ॥ ६५ ॥

उनके अच्छी तरह छोड़े हुए सुवर्णमय पंखवाले प्राणान्तकारी बाण कवचोंपर नहीं अटकते थे । उन्हें छेदकर भीतर घुस जाते थे । वे मनुष्य, घोड़े अथवा विशालकाय हाथीपर भी दूसरा बाण नहीं छोड़ते थे ( एक ही बाणसे उसका काम तमाम कर देते थे ) ॥ ६५ ॥

अनेकरूपाकृतिभिर्हि बाणै- र्महारथानीकमनुप्रविश्य । स एवैकस्तव पुत्रस्य सेनां जघान दैत्यानिव वज्रपाणिः ॥ ६६ ॥

जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार एकमात्र अर्जुनने ही रथियोंकी विशाल सेनामें प्रवेश करके अनेक रूप- रंगवाले बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी सेनाका विनाश कर दिया ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥