04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2641–2650
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2641–2650
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ते कीर्यमाणा भीमेन पुत्रास्तव महारणे ॥ ८ ॥
भीमसेनमपाकर्षन् प्रवणादिव कुञ्जरम् । उस महासमरमें जब भीमसेन आपके पुत्रोंपर बाणोंका प्रहार करने लगे, तब वे भीमसेनको उसी प्रकार दूरतक खींच ले गये, जैसे शिकारी नीचे स्थानसे हाथीको खींचते हैं ॥ ८३ ॥
ततः क्रुद्धो रणे भीमः शिरो दुर्मर्षणस्य ह ॥ ९ ॥
क्षुरप्रेण प्रमथ्याशु पातयामास भूतले । तब रणभूमिमें क्रुद्ध हुए भीमसेनने एक क्षुरप्रसे दुर्मर्षणका मस्तक शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीपर काट गिराया ॥ ततोऽपरेण भल्लेन सर्वावरणभेदिना ॥ १० ॥
श्रुतान्तमवधीद् भीमस्तव पुत्रं महारथः । तत्पश्चात् समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले दूसरे भल्लके द्वारा महारथी भीमसेनने आपके पुत्र श्रुतान्तका अन्त कर दिया ॥ १०३ ॥
जयत्सेनं ततो विद्ध्वा नाराचेन हसन्निव ॥ ११ ॥
पातयामास कौरव्यं रथोपस्थादरिंदमः । फिर हँसते - हँसते उन शत्रुदमन वीरने कुरुवंशी जयत्सेनको नाराचसे घायल करके उसे रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ११३ ॥
स पपात रथाद् राजन् भूमौ तूर्णं ममार च ॥ १२ ॥
श्रुतर्वा तु ततो भीमं क्रुद्धो विव्याध मारिष ।
शतेन गृध्रवाजानां शराणां नतपर्वणाम् ॥ १३ ॥
राजन्! जयत्सेन रथसे पृथ्वीपर गिरा और तुरंत मर गया । मान्यवर नरेश! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए श्रुतर्वाने गीधकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले सौ बाणोंसे भीमसेनको बींध डाला ॥ १२-१३ ॥
ततः क्रुद्धो रणे भीमो जैत्रं भूरिबलं रविम् ।
त्रीनेतांस्त्रिभिरानर्च्छद् विषाग्निप्रतिमैः शरैः ॥ १४ ॥
यह देख भीमसेन क्रोधसे जल उठे और उन्होंने रणभूमिमें विष और अग्निके समान भयंकर तीन बाणोंद्वारा जैत्र, भूरिबल और रवि- इन तीनोंपर प्रहार किया ॥ १४ ॥
ते हता न्यपतन् भूमौ स्वन्दनेभ्यो महारथाः ।
वसन्ते पुष्पशबला निकृत्ता इव किंशुकाः ॥ १५ ॥
उन बाणोंद्वारा मारे गये वे तीनों महारथी वसन्त--ऋतुमें कटे हुए पुष्पयुक्त पलाशके वृक्षोंकी भाँति रथोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १५ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन तीक्ष्णेन च परंतपः ।
दुर्विमोचनमाहत्य प्रेषयामास मृत्यवे ॥ १६ ॥
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इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमसेनने दूसरे तीखे भल्लसे दुर्विमोचनको मारकर मृत्युके लोकमें भेज दिया ॥ १६ ॥
स हतः प्रापतद् भूमौ स्वरथाद् रथिनां वरः ।
गिरेस्तु कूटजो भग्नो मारुतेनेव पादपः ॥ १७ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ दुर्विमोचन उस भल्लकी चोट खाकर अपने रथसे भूमिपर गिर पड़ा, मानो पर्वतके शिखरपर उत्पन्न हुआ वृक्ष वायुके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो ॥ १७ ॥
दुष्प्रधर्षं ततश्चैव सुजातं च सुतं तव ।
एकैकं न्यहनत् संख्ये द्वाभ्यां द्वाभ्यां चमूमुखे ॥ १८ ॥
तदनन्तर भीमसेनने आपके पुत्र दुष्प्रधर्ष और सुजातको रणक्षेत्रमें सेनाके मुहानेपर दो - दो बाणोंसे मार गिराया ॥ १८ ॥
तौ शिलीमुखविद्धाङ्गौ पेततू रथसत्तमौ ।
ततः पतन्तं समरे अभिवीक्ष्य सुतं तव ॥ १ ९ ॥
भल्लेन पातयामास भीमो दुर्विषहं रणे ।
स पपात हतो वाहात् पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥ २० ॥
वे दोनों महारथी वीर बाणोंसे सारा शरीर बिंध जानेके कारण रणभूमिमें गिर पड़े । तत्पश्चात् आपके पुत्र दुर्विषहको संग्राममें चढ़ाई करते देख भीमसेनने एक भल्लसे मार गिराया । उस भल्लकी चोट खाकर दुर्विषह सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते- देखते रथसे नीचे जा गिरा ॥ १ ९ -२० ॥
दृष्ट्वा तु निहतान् भ्रातॄन् बहूनेकेन संयुगे ।
अमर्षवशमापन्नः श्रुतर्वा भीममभ्ययात् ॥ २१ ॥
युद्धस्थलमें एकमात्र भीमके द्वारा अपने बहुत से भाइयोंको मारा गया देख श्रुतर्वा अमर्षके वशीभूत हो भीमसेनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ॥ २१ ॥
विक्षिपन् सुमहच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ।
विसृजन् सायकांश्चैव विषाग्निप्रतिमान् बहून् ॥ २२ ॥
वह अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको खींचकर उसके द्वारा विष और अग्निके समान भयंकर बहुतेरे बाणोंकी वर्षा कर रहा था ॥ २२ ॥
स तु राजन् धनुश्छित्त्वा पाण्डवस्य महामृधे ।
अथैनं छिन्नधन्वानं विंशत्या समवाकिरत् ॥ २३ ॥
राजन्! उसने उस महासमरमें पाण्डुपुत्रके धनुषको काटकर कटे हुए धनुषवाले भीमसेनको बीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २३ ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय भीमसेनो महाबलः ।
अवाकिरत् तव सुतं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २४ ॥
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तब महाबली भीमसेन दूसरा धनुष लेकर आपके पुत्रपर बाणोंकी वर्षा करने लगे और बोले — ' खड़ा रह, खड़ा रह ’' ॥ २४ ॥
महदासीत् तयोर्युद्धं चित्ररूपं भयानकम् ।
यादृशं समरे पूर्व जम्भवासवयोर्युधि ॥ २५ ॥
उस समय उन दोनोंमें विचित्र, भयानक और महान् युद्ध होने लगा । पूर्वकालमें रणक्षेत्रमें जम्भ और इन्द्रका जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही उन दोनोंका भी हुआ ॥ २५ ॥
तयोस्तत्र शितैर्मुक्तैर्यमदण्डनिभैः शरैः ।
समाच्छन्ना धरा सर्वा खं दिशो विदिशस्तथा ॥ २६ ॥
उन दोनोंके छोड़े हुए यमदण्डके समान तीखे बाणोंसे सारी पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ और विदिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ २६ ॥
ततः श्रुतर्वा संक्रुद्धो धनुरादाय सायकैः ।
भीमसेनं रणे राजन् बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २७ ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए श्रुतर्वाने धनुष लेकर अपने बाणोंसे रणभूमिमें भीमसेनकी दोनों भुजाओं और छातीमें प्रहार किया ॥ २७ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज तव पुत्रेण धन्विना ।
भीमः संचुक्षुभे क्रुद्धः पर्वणीव महोदधिः ॥ २८ ॥
महाराज! आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा अत्यन्त घायल कर दिये जानेपर भीमसेनका क्रोध भड़क उठा और वे पूर्णिमाके दिन उमड़ते हुए महासागरके समान बहुत ही क्षुब्ध हो उठे ॥ २८ ॥
ततो भीमो रुषाविष्टः पुत्रस्य तव मारिष ।
सारथिं चतुरश्चाश्वान् शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ २ ९ ॥
आर्य! फिर रोषसे आविष्ट हुए भीमसेनने अपने बाणोंद्वारा आपके पुत्रके सारथि और चारों घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ २ ९ ॥
विरथं तं समालक्ष्य विशिखैर्लोमवाहिभिः ।
अवाकिरदमेयात्मा दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ ३० ॥
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भीमसेन श्रुतर्वाको रथहीन हुआ देख अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए उसके ऊपर पक्षियोंके पंखसे युक्त होकर उड़नेवाले बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
श्रुतर्वा विरथो राजन्नाददे खड्गचर्मणी ।
अथास्याददतः खड्गं शतचन्द्रं च भानुमत् ॥ ३१ ॥
क्षुरप्रेण शिरः कायात् पातयामास पाण्डवः ।
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राजन्! रथहीन हुए श्रुतर्वाने अपने हाथोंमें ढाल और तलवार ले ली । वह सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त ढाल तथा अपनी प्रभासे चमकती हुई तलवार ले ही रहा था कि पाण्डुपुत्र भीमसेनने एक क्षुरप्रद्वारा उसके मस्तकको धड़से काट गिराया ॥ ३१३ ॥
छिन्नोत्तमाङ्गस्य ततः क्षुरप्रेण महात्मना ॥ ३२ ॥
पपात कायः स रथाद् वसुधामनुनादयन् । महामनस्वी भीमसेनके क्षुरप्रसे मस्तक कट जानेपर उसका धड़ वसुधाको प्रतिध्वनित करता हुआ रथसे नीचे गिर पड़ा ॥ ३२३ ॥
तस्मिन् निपतिते वीरे तावका भयमोहिताः ॥ ३३ ॥
अभ्यद्रवन्त संग्रामे भीमसेनं युयुत्सवः । उस वीरके गिरते ही आपके सैनिक भयसे व्याकुल होनेपर भी संग्राममें जूझनेकी इच्छासे भीमसेनकी ओर दौड़े ॥ ३३ ॥
तानापतत एवाशु हतशेषाद् बलार्णवात् ॥ ३४ ॥
दंशितान् प्रतिजग्राह भीमसेनः प्रतापवान् । मरनेसे बचे हुए सैन्यसमूहसे निकलकर शीघ्रतापूर्वक अपने ऊपर आक्रमण करते हुए उन कवचधारी योद्धाओंको प्रतापी भीमसेनने आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३४ ॥
ते तु तं वै समासाद्य परिवव्रुः समन्ततः ॥ ३५ ॥
ततस्तु संवृतो भीमस्तावकान् निशितैः शरैः ।
पीडयामास तान् सर्वान् सहस्राक्ष इवासुरान् ॥ ३६ ॥
वे योद्धा भीमसेनके पास पहुँचकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये । तब जैसे इन्द्र असुरोंको नष्ट करते हैं, उसी प्रकार घिरे हुए भीमसेनने पैने बाणोंद्वारा आपके उन समस्त सैनिकोंको पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ ३५-३६ ॥
ततः पञ्चशतान् हत्वा सवरूथान् महारथान् ।
जघान कुञ्जरानीकं पुनः सप्तशतं युधि ॥ ३७ ॥
हत्वा शतसहस्राणि पत्तीनां परमेषुभिः ।
वाजिनां च शतान्यष्टौ पाण्डवः स्म विराजते ॥ ३८ ॥
तदनन्तर भीमसेनने आवरणोंसहित पाँच सौ विशाल रथोंका संहार करके युद्धमें सात सौ हाथियोंकी सेनाको पुनः मार गिराया । फिर उत्तम बाणोंद्वारा एक लाख पैदलों और सवारोंसहित आठ सौ घोड़ोंका वध करके पाण्डव भीमसेन विजयश्रीसे सुशोभित होने लगे ॥ ३७-३८ ॥
भीमसेनस्तु कौन्तेयो हत्वा युद्धे सुतांस्तव ।
मेने कृतार्थमात्मानं सफलं जन्म च प्रभो ॥ ३ ९ ॥
प्रभो! इस प्रकार कुन्तीपुत्र भीमसेनने युद्धमें आपके पुत्रोंका विनाश करके अपने-आपको कृतार्थ और जन्मको सफल हुआ समझा ॥ ३ ९ ॥
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तं तथा युद्धयमानं च विनिघ्नन्तं च तावकान् ।
ईक्षितुं नोत्सहन्ते स्म तव सैन्या नराधिप ॥ ४० ॥
नरेश्वर! इस तरह युद्ध और आपके पुत्रोंका वध करते हुए भीमसेनको आपके सैनिक देखनेका भी साहस नहीं कर पाते थे ॥ ४० ॥
विद्राव्य च कुरून् सर्वांस्तांश्च हत्वा पदानुगान् ।
दोर्भ्यां शब्दं ततश्चक्रे त्रासयानो महाद्विपान् ॥ ४१ ॥
समस्त कौरवोंको भगाकर और उनके अनुगामी सैनिकोंका संहार करके भीमसेनने बड़े- बड़े हाथियोंको डराते हुए अपनी दोनों भुजाओंद्वारा ताल ठोंकनेका शब्द किया ॥ ४१ ॥
हतभूयिष्ठयोधा तु तव सेना विशाम्पते ।
किंचिच्छेषा महाराज कृपणं समपद्यत ॥ ४२ ॥
प्रजानाथ! महाराज! आपकी सेनाके अधिकांश योद्धा मारे गये और बहुत थोड़े सैनिक शेष रह गये; अतः वह सेना अत्यन्त दीन हो गयी थी ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि एकादशधार्तराष्ट्रवधे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वधविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २६ ॥
Fara
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सप्तविंशोऽध्यायः श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत, अर्जुनद्वारा सत्यकर्मा, सत्येषु तथा पैंतालीस पुत्रों और सेनासहित सुशर्माका वध तथा भीमके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्र सुदर्शनका अन्त संजय उवाच
दुर्योधनो महाराज सुदर्शश्चापि ते सुतः ।
हतशेषौ तदा संख्ये वाजिमध्ये व्यवस्थितौ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! उस समय आपके पुत्र दुर्योधन और सुदर्शन ये — दो ही बच गये थे । दोनों ही घुड़सवारोंके बीचमें खड़े थे ॥ १ ॥
ततो दुर्योधनं दृष्ट्वा वाजिमध्ये व्यवस्थितम् ।
उवाच देवकीपुत्रः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ २ ॥
तदनन्तर दुर्योधनको घुड़सवारोंके बीचमें खड़ा देख देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार अर्जुनसे इस प्रकार कहा- ॥ २ ॥
शत्रवो हतभूयिष्ठा ज्ञातयः परिपालिताः ।
गृहीत्वा संजयं चासी निवृत्तः शिनिपुङ्गवः ॥ ३ ॥
परिश्रान्तश्च नकुलः सहदेवश्च भारत ।
योधयित्वा रणे पापान् धार्तराष्ट्रान् सहानुगान् ॥ ४ ॥
‘ भरतनन्दन! शत्रुओंके अधिकांश योद्धा मारे गये और अपने कुटुम्बी जनोंकी रक्षा हुई । उधर देखो, वे शिनिप्रवर सात्यकि संजयको कैद करके उसे साथ लिये लौटे आ रहे हैं । रणभूमिमें सेवकोंसहित धृतराष्ट्रके पापी पुत्रोंसे युद्ध करके दोनों भाई नकुल और सहदेव भी बहुत थक गये हैं ॥ ३-४ ॥
दुर्योधनमभित्यज्य त्रय एते व्यवस्थिताः ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्चैव महारथः ॥ ५ ॥
‘ उधर कृपाचार्य, कृतवर्मा और महारथी अश्वत्थामा – ये तीनों युद्धभूमिमें दुर्योधनको छोड़कर कहीं अन्यत्र स्थित हैं ॥ ५ ॥
असौ तिष्ठति पाञ्चाल्यः श्रिया परमया युतः ।
दुर्योधनबलं हत्वा सह सर्वैः प्रभद्रकैः ॥ ६ ॥
'इधर, सम्पूर्ण प्रभद्रकोंसहित दुर्योधनकी सेनाका संहार करके पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न अपनी सुन्दर कान्तिसे सुशोभित हो रहे हैं ॥ ६ ॥
असौ दुर्योधनः पार्थ वाजिमध्ये व्यवस्थितः ।
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छत्रेण ध्रियमाणेन प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥
‘ पार्थ! वह रहा दुर्योधन, जो छत्र धारण किये घुड़सवारोंके बीचमें खड़ा है और बारंबार इधर ही देख रहा है ॥ ७ ॥
प्रतिव्यूह्य बलं सर्वं रणमध्ये व्यवस्थितः ।
एनं हत्वा शितैर्बाणैः कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ ८ ॥
'वह अपनी सारी सेनाका व्यूह बनाकर युद्धभूमिमें खड़ा है । तुम इसे पैने बाणोंसे मारकर कृतकृत्य हो जाओगे ॥ ८ ॥
गजानीकं हतं दृष्ट्वा त्वां च प्राप्तमरिंदम ।
यावन्न विद्रवन्त्येते तावज्जहि सुयोधनम् ॥ ९ ॥
‘ शत्रुदमन! गजसेनाका वध और तुम्हारा आगमन हुआ देख ये कौरव - योद्धा जबतक भाग नहीं जाते तभीतक दुर्योधनको मार डालो ॥ ९ ॥
यातु कश्चित्तु पाञ्चाल्यं क्षिप्रमागम्यतामिति ।
परिश्रान्तबलस्तात नैष मुच्येत किल्बिषी ॥ १० ॥
' अपने दलका कोई पुरुष पांचालराज धृष्टद्युम्नके पास जाय और कहे कि ‘ आप शीघ्रतापूर्वक चलें । ' तात! यह पापात्मा दुर्योधन अब बच नहीं सकता, क्योंकि इसकी सारी सेना थक गयी है ॥ १० ॥
हत्वा तव बलं सर्वं संग्रामे धृतराष्ट्रजः ।
जितान् पाण्डुसुतान् मत्वा रूपं धारयते महत् ॥ ११ ॥
' दुर्योधन समझता है कि ' संग्रामभूमिमें तुम्हारी सारी सेनाका संहार करके पाण्डवोंको पराजित कर दूँगा । ' इसीलिये वह अत्यन्त उग्र रूप धारण कर रहा है ॥
निहतं स्वबलं दृष्ट्वा पीडितं चापि पाण्डवैः ।
ध्रुवमेष्यति संग्रामे वधायैवात्मनो नृपः ॥ १२ ॥
‘ परंतु अपनी सेनाको पाण्डवोंद्वारा पीड़ित एवं मारी गयी देख राजा दुर्योधन निश्चय ही अपने विनाशके लिये ही युद्धस्थलमें पदार्पण करेगा' ॥ १२ ॥
एवमुक्तः फाल्गुनस्तु कृष्णं वचनमब्रवीत् ।
धृतराष्ट्रसुताः सर्वे हता भीमेन माधव ॥ १३ ॥
यावेतावास्थितौ कृष्ण तावद्य न भविष्यतः । भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुन उनसे इस प्रकार बोले— ' माधव! धृतराष्ट्रके प्रायः सभी पुत्र भीमसेनके हाथसे मारे गये हैं । श्रीकृष्ण! ये जो दो पुत्र खड़े हैं, इनका भी आज अन्त हो जायगा ॥ १३३ ॥
तो भीष्मो हतो द्रोणः कर्णो वैकर्तनो हतः ॥ १४ ॥
मद्रराजो हतः शल्यो हतः कृष्ण जयद्रथः ।
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' श्रीकृष्ण! भीष्म मारे जा चुके, द्रोणका भी अन्त हो गया, वैकर्तन कर्ण भी मार डाला गया, मद्रराज शल्यका भी वध हो गया और जयद्रथ भी यमलोक पहुँच गया ॥ Q श्रीकृष्ण दुर्योधनकी ओर संकेत करते हुए उसे मारनेके लिये अर्जुनको प्रेरित कर रहे हैं हयाः पञ्चशताः शिष्टाः शकुनेः सौबलस्य च ॥ १५ ॥
रथानां तु ते शिष्टे द्वे एव तु जनार्दन ।
दन्तिनां च शतं साग्रं त्रिसाहस्राः पदातयः ॥ १६ ॥
‘ सुबलपुत्र शकुनिके पास पाँच सौ घुड़सवारोंकी सेना अभी शेष है । जनार्दन! उसके पास दो सौ रथ, सौसे कुछ अधिक हाथी और तीन हजार पैदल सैनिक भी शेष रह गये हैं ॥ १५-१६ ॥
अश्वत्थामा कृपश्चैव त्रिगर्ताधिपतिस्तथा ।
उलूकः शकुनिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ १७ ॥
एतद् बलमभूच्छेषं धार्तराष्ट्रस्य माधव ।
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‘ माधव! दुर्योधनकी सेनामें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रिगर्तराज सुशर्मा, उलूक, शकुनि और सात्वतवंशी कृतवर्मा — ये थोड़े से ही वीर सैनिक शेष रह गये हैं ॥ मोक्षो न नूनं कालात् तु विद्यते भुवि कस्यचित् ॥ १८ ॥
तथा विनिहते सैन्ये पश्य दुर्योधनं स्थितम् ।
अद्याह्ना हि महाराजो हतामित्रो भविष्यति ॥ १ ९ ॥
'निश्चय ही इस पृथ्वीपर किसीको भी कालसे छुटकारा नहीं मिलता, तभी तो इस प्रकार अपनी सेनाका संहार होनेपर भी दुर्योधन युद्धके लिये खड़ा है, उसे देखिये । आजके दिन महाराज युधिष्ठिर शत्रुहीन हो जायँगे ॥
न हि मे मोक्ष्यते कश्चित् परेषामिह चिन्तये ।
ये त्वद्य समरं कृष्ण न हास्यन्ति मदोत्कटाः ॥ २० ॥
तान् वै सर्वान् हनिष्यामि यद्यपि स्युर्न मानुषाः । ' श्रीकृष्ण! मैं सोचता हूँ कि आज शत्रुदलका कोई भी योद्धा यहाँ मेरे हाथसे बचकर नहीं जा सकेगा । जो मदोन्मत्त वीर आज युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायँगे, उन सबको, वे मनुष्य न होकर देवता या दैत्य ही क्यों न हों, मैं मार डालूँगा ॥ २० ॥
अद्य युद्धे सुसंक्रुद्धो दीर्घं राज्ञा प्रजागरम् ॥ २१ ॥
अपनेष्यामि गान्धारं घातयित्वा शितैः शरैः । ' आज मैं अत्यन्त कुपित हो गान्धारराज शकुनिको पैने बाणोंसे मरवाकर राजा युधिष्ठिरके दीर्घकालीन जागरणरूपी रोगको दूर कर दूँगा ॥ २१३ ॥
निकृत्या वै दुराचारो यानि रत्नानि सौबलः ॥ २२ ॥
सभायामहरद् द्यूते पुनस्तान्याहराम्यहम् । 'दुराचारी सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें छल करके जिन रत्नोंको हर लिया था, उन सबको मैं वापस ले लूँगा ॥ अद्य ता अपि रोत्स्यन्ति सर्वा नागपुरे स्त्रियः ॥ २३ ॥
श्रुत्वा पतींश्च पुत्रांश्च पाण्डवैर्निहतान् युधि । 'आज हस्तिनापुरकी वे सारी स्त्रियाँ भी युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे अपने पतियों और पुत्रोंको मारा गया सुनकर फूट- फूटकर रोयेंगी ॥ २३३ ॥
समाप्तमद्य वै कर्म सर्वं कृष्ण भविष्यति ॥ २४ ॥
अद्य दुर्योधनो दीप्तां श्रियं प्राणांश्च मोक्ष्यति । ' श्रीकृष्ण! आज हमलोगोंका सारा कार्य समाप्त हो जायगा। आज दुर्योधन अपनी उज्ज्वल राजलक्ष्मी और प्राणोंको भी खो बैठेगा ॥ २४ ॥
नापयाति भयात् कृष्ण संग्रामाद् यदि चेन्मम ॥ २५ ॥
निहतं विद्धि वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रं सुबालिशम् ।
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‘ वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! यदि वह मेरे भयसे युद्धसे भाग न जाय, तो मेरे द्वारा उस मूढ़ दुर्योधनको आप मारा गया ही समझें ॥ २५३ ॥
मम ह्येतदशक्तं वै वाजिवृन्दमरिंदम ॥ २६ ॥
सोढुं ज्यातलनिर्घोषं याहि यावन्निहन्म्यहम् ।
‘ शत्रुदमन! यह घुड़सवारोंकी सेना मेरे गाण्डीव धनुषकी टंकारको नहीं सह सकेगी ।
आप घोड़े बढ़ाइये, मैं अभी इन सबको मारे डालता हूँ' ॥ २६३ ॥
एवमुक्तस्तु दाशार्हः पाण्डवेन यशस्विना ॥ २७ ॥
अचोदयद्धयान् राजन् दुर्योधनबलं प्रति । राजन्! यशस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके ऐसा कहनेपर दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णने दुर्योधनकी सेनाकी ओर घोड़े बढ़ा दिये ॥ २७३ ॥
तदनीकमभिप्रेक्ष्य त्रयः सज्जा महारथाः ॥ २८ ॥
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव सहदेवश्च मारिष ।
प्रययुः सिंहनादेन दुर्योधनजिघांसया ॥ २ ९ ॥
मान्यवर! उस सेनाको देखकर तीन महारथी भीमसेन, अर्जुन और सहदेव युद्ध-सामग्रीसे सुसज्जित हो दुर्योधनके वधकी इच्छासे सिंहनाद करते हुए आगे बढ़े ॥ २८-२९ ॥
तान् प्रेक्ष्य सहितान् सर्वान् जवेनोद्यतकार्मुकान् ।
सौबलोऽभ्यद्रवद् युद्धे पाण्डवानाततायिनः ॥ ३० ॥
उन सबको बड़े वेगसे धनुष उठाये एक साथ आक्रमण करते देख सुबलपुत्र शकुनि रणभूमिमें आततायी पाण्डवोंकी ओर दौड़ा ॥ ३० ॥
सुदर्शनस्तव सुतो भीमसेनं समभ्ययात् ।
सुशर्मा शकुनिश्चैव युयुधाते किरीटिना ॥ ३१ ॥
आपका पुत्र सुदर्शन भीमका सामना करने लगा । सुशर्मा और शकुनिने किरीटधारी अर्जुनके साथ युद्ध छेड़ दिया ॥
सहदेवं तव सुतो हयपृष्ठगतोऽभ्ययात् ।
ततो हि यत्नतः क्षिप्रं तव पुत्रो जनाधिप ॥ ३२ ॥
प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद् भृशम् । नरेश्वर! घोड़ेकी पीठपर बैठा हुआ आपका पुत्र दुर्योधन सहदेवके सामने आया । उसने बड़े यत्नसे सहदेवके मस्तकपर शीघ्रतापूर्वक प्रासका प्रहार किया ॥ सोपाविशद् रथोपस्थे तव पुत्रेण ताडितः ॥ ३३ ॥
रुधिराप्लुतसर्वाङ्ग आशीविष इव श्वसन् । आपके पुत्रद्वारा ताड़ित होकर सहदेव फुफकारते हुए विषधर सर्पके समान लंबी साँस
खींचते हुए रथके पिछले भागमें बैठ गये । उनका सारा शरीर लहूलुहान हो गया ॥ ३३३ ॥