04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2661–2670

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2661–2670

पृष्ठ 2661

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रथेन काञ्चनाङ्गेन सहदेवः समभ्ययात् । नरेश्वर! शकुनिको अपना अवशिष्ट भाग मानकर सहदेवने सुवर्णमय अंगोंवाले रथके द्वारा उसका पीछा किया ॥ ४७ ॥

अधिज्यं बलवत् कृत्वा व्याक्षिपन् सुमहद् धनुः ॥ ४८ ॥

स सौबलमभिद्रुत्य गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः ।

भृशमभ्यहनत् क्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ ४ ९ ॥

उन्होंने एक विशाल धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाकर शिलापर तेज किये हुए गीधके पंखोंवाले बाणोंद्वारा शकुनिपर आक्रमण किया और जैसे किसी विशाल गजराजको अंकुशोंसे मारा जाय, उसी प्रकार कुपित हो उसको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४८-४९ ॥

उवाच चैनं मेधावी विगृह्य स्मारयन्निव ।

क्षत्रधर्मे स्थिरो भूत्वा युध्यस्व पुरुषो भव ॥ ५० ॥

यत् तदा ह्यष्यसे मूढ ग्लहन्नक्षैः सभातले ।

फलमद्य प्रपश्यस्व कर्मणस्तस्य दुर्मते ॥ ५१ ॥

बुद्धिमान् सहदेवने उसपर आक्रमण करके कुछ याद दिलाते हुए - से इस प्रकार कहा ' ओ मूढ़! क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध कर और पुरुष बन। खोटी बुद्धिवाले शकुनि! तू सभामें पासे फेंककर जुआ खेलते समय जो उस दिन बहुत खुश हो रहा था, आज उस दुष्कर्मका महान् फल प्राप्त कर ले ॥ ५०-५१ ॥

निहतास्ते दुरात्मानो येऽस्मानवहसन् पुरा ।

दुर्योधनः कुलाङ्गारः शिष्टस्त्वं चास्य मातुलः ॥ ५२ ॥

अद्य ते निहनिष्यामि क्षरेणोन्मथितं शिरः ।

वृक्षात् फलमिवाविद्धं लगुडेन प्रमाथिना ॥ ५३ ॥

‘ जिन दुरात्माओंने पूर्वकालमें हमलोगोंकी हँसी उड़ायी थी, वे सब मारे गये । अब केवल कुलांगार दुर्योधन और उसका मामा तू— ये दो ही बच गये हैं । जैसे मथ डालनेवाले डंडेसे मारकर पेड़से फल तोड़ लिया जाता है, उसी प्रकार आज मैं क्षुरके द्वारा तेरा मस्तक काटकर तुझे मौतके हवाले कर दूँगा ' ॥ ५२-५३ ॥

एवमुक्त्वा महाराज सहदेवो महाबलः ।

संक्रुद्धो रणशार्दूलो वेगेनाभिजगाम तम् ॥ ५४ ॥

महाराज! ऐसा कहकर रणक्षेत्रमें सिंहके समान पराक्रम दिखानेवाले महाबली सहदेवने अत्यन्त कुपित हो बड़े वेगसे उसपर आक्रमण किया ॥ ५४ ॥

अभिगम्य सुदुर्धर्षः सहदेवो युधां पतिः ।

विकृष्य बलवच्चापं क्रोधेन प्रज्वलन्निव ॥ ५५ ॥

शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चास्य वाजिनः ।

छत्रं ध्वजं धनुश्चास्य च्छित्त्वा सिंह इवानदत् ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 2662

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योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेव अत्यन्त दुर्जय वीर हैं । उन्होंने क्रोधसे चलते हुए - से पास जाकर अपने धनुषको बलपूर्वक खींचा और दस बाणोंसे शकुनिको घायल करके चार बाणोंसे उसके घोड़ोंको भी बींध डाला । तत्पश्चात् उसके छत्र, ध्वज और धनुषको भी काटकर सिंहके समान गर्जना की ॥ ५५-५६ ॥

छिन्नध्वजधनुश्छत्रः सहदेवेन सौबलः ।

कृतो विद्धश्च बहुभिः सर्वमर्मसु सायकैः ॥ ५७ ॥

सहदेवने शकुनिके ध्वज, छत्र और धनुषको काट देनेके पश्चात् उसके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५७ ॥

ततो भूयो महाराज सहदेवः प्रतापवान् ।

शकुनेः प्रेषयामास शरवृष्टिं दुरासदाम् ॥ ५८ ॥

महाराज! तत्पश्चात् प्रतापी सहदेवने पुनः शकुनिपर दुर्जय बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ५८ ॥

ततस्तु क्रुद्धः सुबलस्य पुत्रो माद्रीसुतं सहदेवं विमर्दे । प्रासेन जाम्बूनदभूषणेन जिघांसुरेकोऽभिपपात शीघ्रम् ॥ ५ ९ ॥ इससे सुबलपुत्र शकुनिको बड़ा क्रोध हुआ । उसने उस संग्राममें माद्रीकुमार सहदेवको सुवर्णभूषित प्रासके द्वारा मार डालनेकी इच्छासे अकेले ही उनपर तीव्र गतिसे आक्रमण किया ॥ ५ ९ ॥ माद्रीसुतस्तस्य समुद्यतं तं प्रासं सुवृत्तौ च भुजौ रणाग्रे । भल्लैस्त्रिभिर्युगपत् संचकर्त ननाद चोच्चैस्तरसाऽऽजिमध्ये ॥ ६० ॥

माद्रीकुमारने शकुनिके उस उठे हुए प्रासको और उसकी दोनों सुन्दर गोल -गोल भुजाओंको भी युद्धके मुहानेपर तीन भल्लोंद्वारा एक साथ ही काट डाला और युद्धस्थलमें उच्चस्वरसे वेगपूर्वक गर्जना की ॥ ६० ॥

तस्याशुकारी सुसमाहितेन सुवर्णपुङ्खेन दृढायसेन । भल्लेन सर्वावरणातिगेन शिरः शरीरात् प्रममाथ भूयः ॥ ६१ ॥

तत्पश्चात् शीघ्रता करनेवाले सहदेवने अच्छी तरह संधान करके छोड़े गये सुवर्णमय पंखवाले लोहेके बने हुए सुदृढ़ भल्लके द्वारा, जो समस्त आवरणोंको छेद डालनेवाला था, शकुनिके मस्तकको पुनः धड़से काट गिराया ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 2663

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शरेण कार्तस्वरभूषितेन दिवाकराभेण सुसंहितेन । तोत्तमाङ्गो युधि पाण्डवेन पपात भूमौ सुबलस्य पुत्रः ॥ ६२ ॥

वह सुवर्णभूषित बाण सूर्यके समान तेजस्वी तथा अच्छी तरह संधान करके चलाया गया था । उसके द्वारा पाण्डुकुमार सहदेवने युद्धस्थलमें जब सुबलपुत्र शकुनिका मस्तक काट डाला, तब वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६२ ॥

स तच्छिरो वेगवता शरेण सुवर्णपुङ्खन शिलाशितेन । प्रावेरयत् कुपितः पाण्डुपुत्रो यत्तत् कुरूणामनयस्य मूलम् ॥ ६३ ॥

क्रोधमें भरे हुए पाण्डुपुत्र सहदेवने शिलापर तेज किये हुए और सुवर्णमय पंखवाले वेगवान् बाणसे शकुनिके उस मस्तकको काट गिराया, जो कौरवोंके अन्यायका मूल कारण था ॥ ६३ ॥

भुजौ सुवृत्तौ प्रचकर्त वीरः पश्चात् कबन्धं रुधिरावसिक्तम् । विस्पन्दमानं निपपात घोरं रथोत्तमात् पार्थिव पार्थिवस्य ॥ ६४ ॥

राजन्! वीर सहदेवने जब उसकी गोल-गोल सुन्दर दोनों भुजाएँ काट दीं, उसके पश्चात् राजा शकुनिका भयंकर धड़ लहूलुहान होकर श्रेष्ठ रथसे नीचे गिर पड़ा और छटपटाने लगा ॥ ६४ ॥

ह्यतोत्तमाङ्गं शकुनिं समीक्ष्य भूमौ शयानं रुधिरार्द्रगात्रम् । योधास्त्वदीया भयनष्टसत्त्वा दिशः प्रजग्मुः प्रगृहीतशस्त्राः ॥ ६५ ॥

शकुनिको मस्तकसे रहित एवं खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख आपके योद्धा भयके कारण अपना धैर्य खो बैठे और हथियार लिये हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ६५ ॥

प्रविद्रुताः शुष्कमुखा विसंज्ञा गाण्डीवघोषेण समाहताश्च । भयार्दिता भग्नरथाश्वनागाः पदातयश्चैव सधार्तराष्ट्राः ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 2664

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उनके मुख सूख गये थे । उनकी चेतना लुप्त सी हो रही थी । वे गाण्डीवकी टंकारसे मृतप्राय हो रहे थे; उनके रथ, घोड़े और हाथी नष्ट हो गये थे; अतः वे भयसे पीड़ित हो आपके पुत्र दुर्योधनसहित पैदल ही भाग चले ॥ ६६ ॥

ततो रथाच्छकुनिं पातयित्वा मुदान्विता भारत पाण्डवेयाः । शङ्खान् प्रदध्मुः समरेऽतिहृष्टाः सकेशवाः सैनिकान् हर्षयन्तः ॥ ६७ ॥

भरतनन्दन! रथसे शकुनिको गिराकर समरांगणमें श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव अत्यन्त हर्षमें भरकर सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए प्रसन्नतापूर्वक शंखनाद करने लगे ॥ तं चापि सर्वे प्रतिपूजयन्तो दृष्ट्वा ब्रुवाणाः सहदेवमाजौ । दिष्ट्या हतो नैकृतिको महात्मा सहात्मजो वीर रणे त्वयेति ॥ ६८ ॥

सहदेवको देखकर युद्धक्षेत्रमें सब लोग उनकी पूजा ( प्रशंसा) करते हुए इस प्रकार कहने लगे — ' वीर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने रणभूमिमें कपटद्यूतके विधायक महामना शकुनिको पुत्रसहित मार डाला है ' ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शकुन्युलूकवधेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शकुनि और उलूकका वधविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २८ ॥

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पृष्ठ 2665

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(ह्रदप्रवेशपर्व) एकोनत्रिंशोऽध्यायः बची हुई समस्त कौरव सेनाका वध, संजयका कैदसे छूटना, दुर्योधनका सरोवरमें प्रवेश तथा युयुत्सुका राजमहिलाओंके साथ हस्तिनापुरमें जाना संजय उवाच

ततः क्रुद्धा महाराज सौबलस्य पदानुगाः ।

त्यक्त्वा जीवितमाक्रन्दे पाण्डवान् पर्यवारयन् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — महाराज! तदनन्तर शकुनिके अनुचर क्रोधमें भर गये और प्राणोंका मोह छोड़कर उन्होंने उस महासमरमें पाण्डवोंको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥

तानर्जुनः प्रत्यगृह्णात् सहदेवजये धृतः ।

भीमसेनश्च तेजस्वी क्रुद्धाशीविषदर्शनः ॥ २ ॥

उस समय सहदेवकी विजयको सुरक्षित रखनेका दृढ़ निश्चय लेकर अर्जुनने उन समस्त सैनिकोंको आगे बढ़नेसे रोका । उनके साथ तेजस्वी भीमसेन भी थे, जो कुपित हुए विषधर सर्पके समान दिखायी देते थे ॥ २ ॥

शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां सहदेवं जिघांसताम् ।

संकल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३ ॥

सहदेवको मारनेकी इच्छासे शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथमें लेकर आक्रमण करनेवाले उन समस्त योद्धाओंका संकल्प अर्जुनने गाण्डीव धनुषके द्वारा व्यर्थ कर दिया ॥ ३ ॥

संगृहीतायुधान् बाहून् योधानामधिधावताम् ।

भल्लैश्चिच्छेद बीभत्सुः शिरांस्यपि हयानपि ॥ ४ ॥

सहदेवपर धावा करनेवाले उन योद्धाओंकी अस्त्र- शस्त्रयुक्त भुजाओं, मस्तकों और उनके घोड़ोंको भी अर्जुनने भल्लोंसे काट गिराया ॥ ४ ॥

ते हयाः प्रत्यपद्यन्त वसुधां विगतासवः ।

चरता लोकवीरेण प्रहताः सव्यसाचिना ॥ ५ ॥

रणभूमिमें विचरते हुए विश्वविख्यात वीर सव्यसाची अर्जुनके द्वारा मारे गये वे घोड़े और घुड़सवार प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥

ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा स्वबलसंक्षयम् ।

पृष्ठ 2666

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हतशेषान् समानीय क्रुद्धो रथगणान् बहून् ॥ ६ ॥

कुञ्जरांश्च हयांश्चैव पादातांश्च समन्ततः ।

उवाच सहितान् सर्वान् धार्तराष्ट्र इदं वचः ॥ ७ ॥

अपनी सेनाका इस प्रकार संहार होता देख राजा दुर्योधनको बड़ा क्रोध हुआ । उसने मरनेसे बचे हुए बहुत- से रथियों, हाथीसवारों, घुड़सवारों और पैदलोंको सब ओरसे एकत्र करके उन सबसे इस प्रकार कहा– ॥

समासाद्य रणे सर्वान् पाण्डवान् ससुहृद्गणान् ।

पाञ्चाल्यं चापि सबलं हत्वा शीघ्रं न्यवर्तत ॥ ८ ॥

‘ वीरो! तुम सब लोग रणभूमिमें समस्त पाण्डवों तथा उनके मित्रोंसे भिड़कर उन्हें मार डालो और पांचालराज धृष्टद्युम्नका भी सेनासहित संहार करके शीघ्र लौट आओ ' ॥ ८ ॥

तस्य ते शिरसा गृह्य वचनं युद्धदुर्मदाः ।

अभ्युद्ययू रणे पार्थांस्तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ९ ॥

राजन्! आपके पुत्रकी आज्ञासे उसके उस वचनको शिरोधार्य करके वे रणदुर्मद योद्धा युद्धके लिये आगे बढ़े ॥

तानभ्यापततः शीघ्रं हतशेषान् महारणे ।

शरैराशीविषाकारैः पाण्डवाः समवाकिरन् ॥ १० ॥

उस महासमरमें शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करनेवाले मरनेसे बचे हुए उन सैनिकोंपर समस्त पाण्डवोंने विषधर सर्पके समान आकारवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥

तत् सैन्यं भरतश्रेष्ठ मुहूर्तेन महात्मभिः ।

अवध्यत रणं प्राप्य त्रातारं नाभ्यविन्दत ॥ ११ ॥

प्रतिष्ठमानं तु भयान्नावतिष्ठति दंशितम् । भरतश्रेष्ठ! वह सेना युद्धस्थलमें आकर महात्मा पाण्डवोंद्वारा दो ही घड़ीमें मार डाली गयी । उस समय उसे कोई भी अपना रक्षक नहीं मिला । वह युद्धके लिये कवच बाँधकर प्रस्थित तो हुई, किंतु भयके मारे वहाँ टिक न सकी ॥ ११ ॥

अश्वैर्विपरिधावद्भिः सैन्येन रजसा वृते ॥ १२ ॥

न प्राज्ञायन्त समरे दिशः सप्रदिशस्तथा । चारों ओर दौड़ते हुए घोड़ों तथा सेनाके द्वारा उड़ायी हुई धूलसे वहाँका सारा प्रदेश छा गया था । अतः समरभूमिमें दिशाओं तथा विदिशाओंका कुछ पता नहीं चलता था ॥ १२३ || ततस्तु पाण्डवानीकान्निःसृत्य बहवो जनाः ॥ १३ ॥

अभ्यघ्नंस्तावकान् युद्धे मुहूर्तादिव भारत ।

ततो निःशेषमभवत् तत् सैन्यं तव भारत ॥ १४ ॥

पृष्ठ 2667

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भारत! पाण्डव- सेनासे बहुत- से सैनिकोंने निकलकर युद्धमें एक ही मुहूर्तके भीतर आपके सम्पूर्ण योद्धाओंका संहार कर डाला । भरतनन्दन! उस समय आपकी वह सेना

सर्वथा नष्ट हो गयी । उसमेंसे एक भी योद्धा बच न सका ॥ १३-१४ ॥

अक्षौहिण्यः समेतास्तु तव पुत्रस्य भारत ।

एकादश हता युद्धे ताः प्रभो पाण्डुसृञ्जयैः ॥ १५ ॥

प्रभो! भरतवंशी नरेश! आपके पुत्रके पास ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ थीं; परन्तु युद्धमें पाण्डवों और सृजयोंने उन सबका विनाश कर डाला ॥ १५ ॥

तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु महात्मसु ।

एको दुर्योधनो राजन्नदृश्यत भृशं क्षतः ॥ १६ ॥

राजन्! आपके दलके उन सहस्रों महामनस्वी राजाओंमें एकमात्र दुर्योधन ही उस समय दिखायी देता था; परंतु वह भी बहुत घायल हो चुका था ॥ १६ ॥

ततो वीक्ष्य दिशः सर्वा दृष्ट्वा शून्यां च मेदिनीम् ।

विहीनः सर्वयोधैश्च पाण्डवान् वीक्ष्य संयुगे ॥ १७ ॥

मुदितान् सर्वतः सिद्धान् नर्दमानान् समन्ततः ।

बाणशब्दरवांश्चैव श्रुत्वा तेषां महात्मनाम् ॥ १८ ॥

दुर्योधनो महाराज कश्मलेनाभिसंवृतः ।

अपयाने मनश्चक्रे विहीनबलवाहनः ॥ १ ९ ॥

उस समय उसे सम्पूर्ण दिशाएँ और सारी पृथ्वी सूनी दिखायी दी । वह अपने समस्त योद्धाओंसे हीन हो चुका था । महाराज! दुर्योधनने युद्धस्थलमें पाण्डवोंको सर्वथा प्रसन्न, सफलमनोरथ और सब ओरसे सिंहनाद करते देख तथा उन महामनस्वी वीरोंके बाणोंकी सनसनाहट सुनकर शोकसे संतप्त हो वहाँसे भाग जानेका विचार किया । उसके पास न तो सेना थी और न कोई सवारी ही ॥ १७–१९ ॥ धृतराष्ट्रउवाच

निहते मामके सैन्ये निःशेषे शिबिरे कृते ।

पाण्डवानां बले सूत किं नु शेषमभूत् तदा ॥ २० ॥

धृतराष्ट्रने पूछा— सूत! जब मेरी सेना मार डाली गयी और सारी छावनी सूनी कर दी गयी, उस समय पाण्डवोंकी सेनामें कितने सैनिक शेष रह गये थे? ॥

एतन्मे पृच्छतो ब्रूहि कुशलो ह्यसि संजय ।

यच्च दुर्योधनो मन्दः कृतवांस्तनयो मम ॥ २१ ॥

बलक्षयं तथा दृष्ट्वा स एकः पृथिवीपतिः ।

पृष्ठ 2668

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संजय! मैं यह बात पूछ रहा हूँ, तुम मुझे बताओ; क्योंकि यह सब बतानेमें तुम कुशल हो । अपनी सेनाका संहार हुआ देखकर अकेले बचे हुए मेरे मूर्ख पुत्र राजा दुर्योधनने क्या किया? ॥ २१३ ॥

संजय उवाच रथानां द्वे सहस्रे तु सप्त नागशतानि च ॥ २२ ॥

पञ्च चाश्वसहस्राणि पत्तीनां च शतं शताः ।

एतच्छेषमभूद् राजन् पाण्डवानां महद् बलम् ॥ २३ ॥

संजयने कहा- राजन्! पाण्डवोंकी विशाल सेनामें से केवल दो हजार रथ, सात सौ हाथी, पाँच हजार घोड़े और दस हजार पैदल बच गये थे ॥ २२-२३ ॥

परिगृह्य हि यद् युद्धे धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ।

एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः ॥ २४ ॥

इन सबको साथ लेकर सेनापति धृष्टद्युम्न युद्धभूमिमें खड़े थे । उधर राजा दुर्योधन अकेला हो गया था ॥ २४ ॥

नापश्यत् समरे कंचित् सहायं रथिनां वरः ।

नर्दमानान् परान् दृष्ट्वा स्वबलस्य च संक्षयम् ॥ २५ ॥

तथा दृष्ट्वा महाराज एकः स पृथिवीपतिः ।

हतं स्वहयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद् भयात् ॥ २६ ॥

महाराज! रथियोंमें श्रेष्ठ दुर्योधनने जब समरभूमिमें अपने किसी सहायकको न देखकर शत्रुओंको गर्जते देखा और अपनी सेनाके विनाशपर दृष्टिपात किया, तब वह अकेला भूपाल अपने मरे हुए घोड़ेको वहीं छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग चला ॥ २५-२६ ॥

एकादशचमूभर्ता पुत्रो दुर्योधनस्तव ।

गदामादाय तेजस्वी पदातिः प्रस्थितो ह्रदम् ॥ २७ ॥

जो किसी समय ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका सेनापति था, वही आपका तेजस्वी पुत्र दुर्योधन अब गदा लेकर पैदल ही सरोवरकी ओर भागा जा रहा था ॥ २७ ॥

नातिदूरं ततो गत्वा पद्भ्यामेव नराधिपः ।

सस्मार वचनं क्षत्तुर्धर्मशीलस्य धीमतः ॥ २८ ॥

अपने पैरोंसे ही थोड़ी ही दूर जानेके पश्चात् राजा दुर्योधनको धर्मशील बुद्धिमान् विदुरजीकी कही हुई बातें याद आने लगीं ॥ २८ ॥

इदं नूनं महाप्राज्ञो विदुरो दृष्टवान् पुरा ।

महद् वैशसमस्माकं क्षत्रियाणां च संयुगे ॥ २९ ॥

पृष्ठ 2669

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वह मन- ही- मन सोचने लगा कि हमारा और इन क्षत्रियोंका जो महान् संहार हुआ है, इसे महाज्ञानी विदुरजीने अवश्य पहले ही देख और समझ लिया था ॥

एवं विचिन्तयानस्तु प्रविविक्षुर्हृदं नृपः ।

दुःखसंतप्तहृदयो दृष्ट्वा राजन् बलक्षयम् ॥ ३० ॥

राजन्! अपनी सेनाका संहार देखकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा दुर्योधनका हृदय दुःख और शोकसे संतप्त हो उठा था । उसने सरोवरमें प्रवेश करनेका विचार किया ॥ ३० ॥

पाण्डवास्तु महाराज धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।

अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धास्तव राजन् बलं प्रति ॥ ३१ ॥

शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां बलानामभिगर्जताम् ।

संकल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३२ ॥

महाराज! धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवोंने अत्यन्त कुपित होकर आपकी सेनापर धावा किया था तथा शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथमें लेकर गर्जना करनेवाले आपके योद्धाओंका सारा संकल्प अर्जुनने अपने गाण्डीव धनुषसे व्यर्थ कर दिया था ॥ ३१-३२ ॥

तान् हत्वा निशितैर्बाणैः सामात्यान् सह बन्धुभिः ।

रथे श्वेतहये तिष्ठन्नर्जुनो बह्वशोभत ॥ ३३ ॥

अपने पैने बाणोंसे बन्धुओं और मन्त्रियोंसहित उन योद्धाओंका संहार करके श्वेत घोड़ोंवाले रथपर स्थित हुए अर्जुनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३३ ॥

सुबलस्य हते पुत्रे सवाजिरथकुञ्जरे ।

महावनमिव च्छिन्नमभवत् तावकं बलम् ॥ ३४ ॥

घोड़े, रथ और हाथियोंसहित सुबलपुत्रके मारे जानेपर आपकी सेना कटे हुएविशाल वनके समान प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥

अनेकशतसाहस्रे बले दुर्योधनस्य ह ।

नान्यो महारथो राजन् जीवमानो व्यदृश्यत ॥ ३५ ॥

द्रोणपुत्रादृते वीरात् तथैव कृतवर्मणः ।

कृपाच्च गौतमाद् राजन् पार्थिवाच्च तवात्मजात् ॥ ३६ ॥

राजन्! दुर्योधनकी कई लाख सेनामेंसे द्रोणपुत्र वीर अश्वत्थामा, कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा आपके पुत्र राजा दुर्योधनके अतिरिक्त दूसरा कोई महारथी जीवित नहीं दिखायी देता था ॥ ३५-३६ ॥

धृष्टद्युम्नस्तु मां दृष्ट्वा हसन् सात्यकिमब्रवीत् ।

किमनेन गृहीतेन नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ ३७ ॥

उस समय मुझे कैदमें पड़ा हुआ देखकर हँसते हुए धृष्टद्युम्नने सात्यकिसे कहा –‘इसको कैद करके क्या करना है? इसके जीवित रहनेसे अपना कोई लाभ नहीं

पृष्ठ 2670

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है ' ॥ ३७ ॥

धृष्टद्युम्नवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता महारथः ।

उद्यम्य निशितं खड्गं हन्तुं मामुद्यतस्तदा ॥ ३८ ॥

धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर शिनिपौत्र महारथी सात्यकि तीखी तलवार उठाकर उसी क्षण मुझे मार डालनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ३८ ॥

तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।

मुच्यतां संजयो जीवन्न हन्तव्यः कथंचन ॥ ३ ९ ॥

उस समय महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी सहसा आकर बोले – ' संजयको जीवित छोड़ दो । यह किसी प्रकार वधके योग्य नहीं है ' ॥ ३ ९ ॥

द्वैपायनवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता कृताञ्जलिः ।

ततो मामब्रवीन्मुक्त्वा स्वस्ति संजय साधय ॥ ४० ॥

हाथ जोड़े हुए शिनिपौत्र सात्यकिने व्यासजीकी वह बात सुनकर मुझे कैदसे मुक्त

करके कहा — ' संजय! तुम्हारा कल्याण हो । जाओ, अपना अभीष्ट साधन करो ' ॥ ४० ॥

अनुज्ञातस्त्वहं तेन न्यस्तवर्मा निरायुधः ।

प्रातिष्ठं येन नगरं सायाह्ने रुधिरोक्षितः ॥ ४१ ॥

उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैंने कवच उतार दिया और अस्त्र - शस्त्रोंसे रहित हो सायंकालके समय नगरकी ओर प्रस्थित हुआ । उस समय मेरा सारा शरीर रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ४१ ॥

क्रोशमात्रमपक्रान्तं गदापाणिमवस्थितम् ।

एकं दुर्योधनं राजन्नपश्यं भृशविक्षतम् ॥ ४२ ॥

राजन्! एक कोस आनेपर मैंने भागे हुए दुर्योधनको गदा हाथमें लिये अकेला खड़ा देखा । उसके शरीरपर बहुत - से घाव हो गये थे ॥ ४२ ॥

स तु मामश्रुपूर्णाक्षो नाशक्नोदभिवीक्षितुम् ।

उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तथा दीनमवस्थितम् ॥ ४३ ॥

मुझपर दृष्टि पड़ते ही उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये । वह अच्छी तरह मेरी ओर देख न सका । मैं उस समय दीनभावसे खड़ा था । वह मेरी उस अवस्थापर दृष्टिपात करता रहा ॥ ४३ ॥

तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे ।

मुहूर्तं नाशकं वक्तुमतिदुःखपरिप्लुतः ॥ ४४ ॥

मैं भी युद्धक्षेत्रमें अकेले शोकमग्न हुए दुर्योधनको देखकर अत्यन्त दुःखशोकमें डूब गया और दो घड़ीतक कोई बात मुँहसे न निकाल सका ॥ ४४ ॥

( यस्य मूर्धाभिषिक्तानां सहस्रं मणिमौलिनाम् ।

आहृत्य च करं सर्वं स्वस्य वै वशमागतम् ॥