04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2821–2830

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2821–2830

पृष्ठ 2821

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ययौ दैत्यविनाशाय ह्लादयन् सुरपुङ्गवान् । तदनन्तर अपने पार्षदों तथा मातृकागणोंके साथ कुमार कार्तिकेयने देवेश्वरोंको आनन्द प्रदान करते हुए दैत्योंके विनाशके लिये प्रस्थान किया ॥ ५४३ ॥

सा सेना नैरृती भीमा सघण्टोच्छ्रितकेतना ॥ ५५ ॥

सभेरीशङ्खमुरजा सायुधा सपताकिनी ।

शारदी द्यौरिवाभाति ज्योतिर्भिरिव शोभिता ॥ ५६ ॥

नैर्ऋतों ( भूतगणों ) -की वह भयंकर सेना घंटा, भेरी, शंख और मृदंगकी ध्वनिसे गूँज रही थी । उसकी ऊँचे उठी हुई पताकाएँ फहरा रही थीं । अस्त्र - शस्त्रों और पताकाओंसे सम्पन्न वह विशाल वाहिनी नक्षत्रोंसे सुशोभित शरत्कालके आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥

ततो देवनिकायास्ते नानाभूतगणास्तथा ।

वादयामासुरव्यग्रा भेरीः शङ्खांश्च पुष्कलान् ॥ ५७ ॥

पटहान् झर्झरांश्चैव क्रकचान् गोविषाणकान् ।

आडम्बरान् गोमुखांश्च डिण्डिमांश्च महास्वनान् ॥ ५८ ॥

तदनन्तर वे देवसमूह तथा नाना प्रकारके भूतगण शान्तचित्त हो भेरी, बहुत - से शंख, पटह, झाँझ, क्रकच, गोशृंग, आडम्बर, गोमुख और भारी आवाज करनेवाले नगाड़े बजाने लगे ॥ ५७-५८ ॥

तुष्टुवुस्ते कुमारं तु सर्वे देवाः सवासवाः ।

जगुश्च देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ५ ९ ॥

फिर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता कुमारकी स्तुति करने लगे । देवगन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ ५ ९ ॥

ततः प्रीतो महासेनस्त्रिदशेभ्यो वरं ददौ ।

रिपून् हन्तास्मि समरे ये वो वधचिकीर्षवः ॥ ६० ॥

इससे प्रसन्न होकर कुमार महासेनने देवताओंको यह वर दिया कि ' जो आपलोगोंका वध करना चाहते हैं, आपके उन समस्त शत्रुओंका मैं समरांगणमें संहार कर डालूँगा' ॥ ६० ॥

प्रतिगृह वरं देवास्तस्माद् विबुधसत्तमात् ।

प्रीतात्मानो महात्मानो मेनिरे निहतान् रिपून् ॥ ६१ ॥

उन सुरश्रेष्ठ कुमारसे वह वर पाकर महामनस्वी देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने शत्रुओंको मरा हुआ ही मानने लगे ॥ ६१ ॥

सर्वेषां भूतसंघानां हर्षान्नादः समुत्थितः ।

अपूरयत लोकांस्त्रीन् वरे दत्ते महात्मना ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 2822

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महात्मा कुमारके वर देनेपर सम्पूर्ण भूतसमुदायोंने जो हर्षनाद किया, वह तीनों लोकोंमें गूँज उठा ॥ ६२ ॥

स निर्ययौ महासेनो महत्या सेनया वृतः ।

वधाय युधि दैत्यानां रक्षार्थं च दिवौकसाम् ॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् विशाल सेनासे घिरे हुए स्वामी महासेन युद्धमें दैत्योंका वध और देवताओंकी रक्षा करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ६३ ॥

व्यवसायो जयो धर्मः सिद्धिर्लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः ।

महासेनस्य सैन्यानामग्रे जग्मुर्नराधिप ॥ ६४ ॥

नरेश्वर! उस समय व्यवसाय ( दृढ़ निश्चय ), विजय, धर्म, सिद्धि, लक्ष्मी, धृति और स्मृति – ये सब - के - सब महासेनके सैनिकोंके आगे- आगे चलने लगे ॥

स तया भीमया देवः शूलमुद्गरहस्तया ।

ज्वलितालातधारिण्या चित्राभरणवर्मया ॥ ६५ ॥

गदामुसलनाराचशक्तितोमरहस्तया ।

दृप्तसिंहनिनादिन्या विनद्य प्रययौ गृहः ॥ ६६ ॥

वह सेना बड़ी भयंकर थी । उसने हाथोंमें शूल, मुद्गर, जलते हुए काठ, गदा, मुसल, नाराच, शक्ति और तोमर धारण कर रखे थे । सारी सेना विचित्र आभूषणों और कवचोंसे सुसज्जित थी तथा दर्पयुक्त सिंहके समान दहाड़ रही थी, उस सेनाके साथ सिंहनाद करके कुमार कार्तिकेय युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥

तं दृष्ट्वा सर्वदैतेया राक्षसा दानवास्तथा ।

व्यद्रवन्त दिशः सर्वा भयोद्विग्नाः समन्ततः ॥ ६७ ॥

उन्हें देखकर सम्पूर्ण दैत्य, दानव और राक्षस भयसे उद्विग्न हो सारी दिशाओंमें सब ओर भाग गये ॥ ६७ ॥

अभ्यद्रवन्त देवास्तान् विविधायुधपाणयः ।

दृष्ट्वा च स ततः क्रुद्धः स्कन्दस्तेजोबलान्वितः ॥ ६८ ॥

शक्त्यस्त्रं भगवान् भीमं पुनः पुनरवाकिरत् ।

आदधच्चात्मनस्तेजो हविषेद्ध इवानलः ॥ ६ ९ ॥

देवता अपने हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र ले उन दैत्योंका पीछा करने लगे । यह सब देखकर तेज और बलसे सम्पन्न भगवान् स्कन्द कुपित हो उठे और शक्ति नामक भयानक अस्त्रका बारंबार प्रयोग करने लगे । उन्होंने उसमें अपना तेज स्थापित कर दिया था और वे उस समय घीसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥

अभ्यस्यमाने शक्त्यस्त्रे स्कन्देनामिततेजसा ।

उल्काज्वाला महाराज पपात वसुधातले ॥ ७० ॥

पृष्ठ 2823

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महाराज! अमित तेजस्वी स्कन्दके द्वारा शक्तिका बारंबार प्रयोग होनेसे पृथ्वीपर प्रज्वलित उल्का गिरने लगी ॥

संह्रादयन्तश्च तथा निर्घाताश्चापतन् क्षितौ ।

यथान्तकालसमये सुघोराः स्युस्तथा नृप ॥ ७१ ॥

नरेश्वर! जैसे प्रलयके समय अत्यन्त भयंकर वज्र भारी गड़गड़ाहटके साथ पृथ्वीपर गिरने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय भी भीषण गर्जनाके साथ वज्रपात होने लगा ॥

क्षिप्ता ह्येका यदा शक्तिः सुघोरानलसूनुना ।

ततः कोट्यो विनिष्पेतुः शक्तीनां भरतर्षभ ॥ ७२ ॥

भरतश्रेष्ठ! अग्निकुमारने जब एक बार अत्यन्त भयंकर शक्ति छोड़ी, तब उससे करोड़ों शक्तियाँ प्रकट होकर गिरने लगीं ॥ ७२ ॥

ततः प्रीतो महासेनो जघान भगवान् प्रभुः ।

दैत्येन्द्रं तारकं नाम महाबलपराक्रमम् ॥ ७३ ॥

वृतं दैत्यायुतैर्वीरैर्बलिभिर्दशभिर्नृप । इससे प्रभावशाली भगवान् महासेन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न उस दैत्यराज तारकको मार गिराया, जो एक लाख बलवान् एवं वीर दैत्योंसे घिरा हुआ था ॥ ७३ ॥

महिषं चाष्टभिः पद्मैर्वृतं संख्ये निजघ्निवान् ॥ ७४ ॥

त्रिपादं चायुतशतैर्जघान दशभिर्वृतम् ।

ह्रदोदरं निखर्वैश्च वृतं दशभिरीश्वरः ॥ ७५ ॥

जघानानुचरैः सार्धं विविधायुधपाणिभिः । साथ ही उन्होंने युद्धस्थलमें आठ पद्म दैत्योंसे घिरे हुए महिषासुरका, दस लाख असुरोंसे सुरक्षित त्रिपादका और दस निखर्व दैत्य - योद्धाओंसे घिरे हुए ह्रदोदरका भी नाना प्रकारके आयुधधारी अनुचरोंसहित वध कर डाला ॥ तथाकुर्वन्त विपुलं नादं वध्यत्सु शत्रुषु ॥ ७६ ॥

कुमारानुचरा राजन् पूरयन्तो दिशो दश ।

ननृतुश्च ववल्गुश्च जहसुश्च मुदान्विताः ॥ ७७ ॥

राजन्! जब शत्रु मारे जाने लगे, उस समय कुमारके अनुचर दसों दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े जोर- जोरसे गर्जना करने लगे । इतना ही नहीं, वे आनन्दमग्न होकर नाचने, कूदने तथा जोर - जोरसे हँसने लगे ॥ ७६-७७ ॥

शक्त्यस्त्रस्य तु राजेन्द्र ततोऽर्चिर्भिः समन्ततः ।

त्रैलोक्यं त्रासितं सर्वं जृम्भमाणाभिरेव च ॥ ७८ ॥

राजेन्द्र! उस शक्तिनामक अस्त्रकी सब ओर फैलती हुई ज्वालाओंसे सारी त्रिलोकी थर्रा उठी ॥ ७८ ॥

पृष्ठ 2824

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दग्धाः सहस्रशो दैत्या नादैः स्कन्दस्य चापरे ।

पताकयावधूताश्च हताः केचित् सुरद्विषः ॥ ७९ ॥

सहस्रों दैत्य उस शक्तिकी आगमें जलकर भस्म हो गये । कितने ही स्कन्दके सिंहनादोंसे ही डरकर अपने प्राण खो बैठे तथा कुछ देवद्रोही उनकी पताकासे ही कम्पित होकर मर गये ॥ ७ ९ ॥

केचिद् घण्टारवत्रस्ता निषेदुर्वसुधातले ।

केचित् प्रहरणैश्छिन्ना विनिष्पेतुर्गतायुषः ॥ ८० ॥

कुछ दैत्य उनके घंटानादसे संत्रस्त होकर धरतीपर बैठ गये और कुछ उनके आयुधोंसे छिन्न- भिन्न हो गतायु होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८० ॥

एवं सुरद्विषोऽनेकान् बलवानाततायिनः ।

जघान समरे वीरः कार्तिकेयो महाबलः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार महाबली शक्तिशाली वीर कार्तिकेयने समरांगणमें अनेक आततायी देवद्रोहियोंका संहार कर डाला ॥

बाणो नामाथ दैतेयो बलेः पुत्रो महाबलः ।

क्रौञ्चं पर्वतमाश्रित्य देवसंघानबाधत ॥ ८२ ॥

राजा बलिका महाबली पुत्र बाणासुर क्रौंच पर्वतका आश्रय लेकर देवसमूहोंको कष्ट पहुँचाया करता था ॥ ८२ ॥

तमभ्ययान्महासेनः सुरशत्रुमुदारधीः ।

स कार्तिकेयस्य भयात् क्रौञ्चं शरणमीयिवान् ॥ ८३ ॥

उदारबुद्धि महासेनने उस दैत्यपर भी आक्रमण किया । तब वह कार्तिकेयके भयसे क्रौंच पर्वतकी शरणमें जा छिपा ॥

ततः क्रौञ्चं महामन्युः क्रौञ्चनादनिनादितम् ।

शक्त्या बिभेद भगवान् कार्तिकेयोऽग्निदत्तया ॥ ८४ ॥

इससे भगवान् कार्तिकेयको महान् क्रोध हुआ । उन्होंने अग्निकी दी हुई शक्तिसे क्रौंच पक्षियोंके कोलाहलसे गूँजते हुए क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ॥ ८४ ॥

स शालस्कन्धशबलं त्रस्तवानरवारणम् ।

प्रोड्डीनोद्भ्रान्तविहगं विनिष्पतितपन्नगम् ॥ ८५ ॥

गोलाङ्गूलर्क्षसंघैश्च द्रवद्भिरनुनादितम् ।

कुरङ्गमविनिर्घोषनिनादितवनान्तरम् ॥ ८६ ॥

विनिष्पतद्भिः शरभैः सिंहैश्च सहसा द्रुतैः ।

शोच्यामपि दशां प्राप्तो रराजेव स पर्वतः ॥ ८७ ॥

क्रौंच पर्वत शालवृक्षके तनोंसे भरा हुआ था । वहाँके वानर और हाथी संत्रस्त हो उठे थे, पक्षी भयसे व्याकुल होकर उड़ चले थे, सर्प धराशायी हो गये थे, गोलांगूल जातिके वानरों

पृष्ठ 2825

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और रीछोंके समुदाय भाग रहे थे तथा उनके चीत्कारसे वह पर्वत गूँज उठा था, हरिणोंके आर्तनादसे उस पर्वतका वनप्रान्त प्रतिध्वनित हो रहा था, गुफासे निकलकर सहसा भागनेवाले सिंहों और शरभोंके कारण वह पर्वत बड़ी शोचनीय दशामें पड़ गया था तो भी वह सुशोभित - सा ही हो रहा था ॥

विद्याधराः समुत्पेतुस्तस्य शृङ्गनिवासिनः ।

किन्नराश्च समुद्विग्नाः शक्तिपातरवोद्धताः ॥ ८८ ॥

उस पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले विद्याधर और किन्नर शक्तिके आघातजनित शब्दसे उद्विग्न होकर आकाशमें उड़ गये ॥ ८८ ॥

ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशः ।

प्रदीप्तात् पर्वतश्रेष्ठाद् विचित्राभरणस्रजः ॥ ८९ ॥

तत्पश्चात् उस जलते हुए श्रेष्ठ पर्वतसे विचित्र आभूषण और माला धारण करनेवाले सैकड़ों और हजारों दैत्य निकल पड़े ॥ ८ ९ ॥

तान् निजघ्नुरतिक्रम्य कुमारानुचरा मृधे ।

स चैव भगवान् क्रुद्धो दैत्येन्द्रस्य सुतं तदा ॥ ९० ॥

सहानुजं जघानाशु वृत्रं देवपतिर्यथा । कुमारके पार्षदोंने युद्धमें आक्रमण करके उन सब दैत्योंको मार गिराया । साथ ही भगवान् कार्तिकेयने कुपित होकर वृत्रासुरको मारनेवाले देवराज इन्द्रके समान दैत्यराजके उस पुत्रको उसके छोटे भाईसहित शीघ्र ही मार डाला ॥ बिभेद क्रौञ्चं शक्त्या च पावकिः परवीरहा ॥ ९ १ ॥ बहुधा चैकधा चैव कृत्वाऽऽत्मानं महाबलः । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली अग्निपुत्र कार्तिकेयने अपने - आपको एक और अनेक रूपोंमें प्रकट करके शक्तिद्वारा क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ॥ शक्तिः क्षिप्ता रणे तस्य पाणिमेति पुनः पुनः ॥ ९ २ ॥

एवंप्रभावो भगवांस्ततो भूयश्च पावकिः ।

शौर्यादिगुणयोगेन तेजसा यशसा श्रिया ॥ ९३ ॥

क्रौञ्चस्तेन विनिर्भिन्नो दैत्याश्च शतशो हताः । रणभूमिमें बार- बार चलायी हुई उनकी शक्ति शत्रुका संहार करके पुनः उनके हाथमें लौट आती थी । अग्निपुत्र कार्तिकेयका ऐसा ही प्रभाव है, बल्कि इससे भी बढ़कर है । वे शौर्यकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दुगुने तेज, यश और श्रीसे सम्पन्न हैं । उन्होंने क्रौंच पर्वतको विदीर्ण करके सैकड़ों दैत्योंको मार गिराया ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ ततः स भगवान् देवो निहत्य विबुधद्विषः ॥ ९ ४ ॥ सभाज्यमानो विबुधैः परं हर्षमवाप ह ।

पृष्ठ 2826

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तदनन्तर भगवान् स्कन्ददेव देवशत्रुओंका संहार करके देवताओंसे सेवित हो अत्यन्त आनन्दित हुए ॥ ततो दुन्दुभयो राजन् नेदुः शङ्खाश्च भारत ॥ ९ ५ ॥

मुमुचुर्देवयोषाश्च पुष्पवर्षमनुत्तमम् ।

योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९ ६ ॥

भरतवंशी नरेश! तत्पश्चात् दुन्दुभियाँ बज उठीं, शंखोंकी ध्वनि होने लगी, सैकड़ों और हजारों देवांगनाएँ योगीश्वर स्कन्ददेवपर उत्तम फूलोंकी वर्षा करने लगीं ॥

दिव्यगन्धमुपादाय ववौ पुण्यश्च मारुतः ।

गन्धर्वास्तुष्टुवुश्चैनं यज्वानश्च महर्षयः ॥ ९ ७ ॥

दिव्य फूलोंकी सुगन्ध लेकर पवित्र वायु चलने लगी । गन्धर्व और यज्ञपरायण महर्षि उनकी स्तुति करने लगे ॥

केचिदेनं व्यवस्यन्ति पितामहसुतं प्रभुम् ।

सनत्कुमारं सर्वेषां ब्रह्मयोनिं तमग्रजम् ॥ ९८ ॥

कोई उनके विषयमें यह निश्चय करने लगे कि ' ये ब्रह्माजीके पुत्र, सबके अग्रज एवं ब्रह्मयोनि सनत्कुमार हैं ' ॥

केचिन्महेश्वरसुतं केचित् पुत्रं विभावसोः ।

उमायाः कृत्तिकानां च गङ्गायाश्च वदन्त्युत ॥ ९९ ॥

कोई उन्हें महादेवजीका, कोई अग्निका, कोई पार्वतीका, कोई कृत्तिकाओंका और कोई गंगाजीका पुत्र बताने लगे ॥ ९९ ॥

एकधा च द्विधा चैव चतुर्धा च महाबलम् ।

योगिनामीश्वरं देवं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १०० ॥

उन महाबली योगेश्वर स्कन्ददेवको लोग एक, दो, चार, सौ तथा सहस्रों रूपोंमें देखते और जानते हैं ॥

एतत् ते कथितं राजन् कार्तिकेयाभिषेचनम् ।

शृणु चैव सरस्वत्यास्तीर्थवर्यस्य पुण्यताम् ॥ १०१ ॥

राजन्! यह मैंने तुम्हें कार्तिकेयके अभिषेकका प्रसंग सुनाया है । अब तुम सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थकी पावनताका वर्णन सुनो ॥ १०१ ॥

बभूव तीर्थप्रवरं हतेषु सुरशत्रुषु ।

कुमारेण महाराज त्रिविष्टपमिवापरम् ॥ १०२ ॥

महाराज! कुमार कार्तिकेयके द्वारा देवशत्रुओंके मारे जानेपर वह श्रेष्ठ तीर्थ दूसरे स्वर्गके समान सुखदायक हो गया ॥ १०२ ॥

ऐश्वर्याणि च तत्रस्थो ददावीशः पृथक् पृथक् ।

ददौ नैरृतमुख्येभ्यस्त्रैलोक्यं पावकात्मजः ॥ १०३ ॥

पृष्ठ 2827

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वहीं रहकर स्वामी स्कन्दने पृथक् -पृथक् ऐश्वर्य प्रदान किये। अग्निकुमारने अपनी सेनाके मुख्य- मुख्य अधिकारियोंको तीनों लोक सौंप दिये ॥ १०३ ॥

एवं स भगवांस्तस्मिंस्तीर्थे दैत्यकुलान्तकः ।

अभिषिक्तो महाराज देवसेनापतिः सुरैः ॥ १०४ ॥

महाराज! इस प्रकार दैत्यकुलविनाशक देवसेनापति भगवान् स्कन्दका उस तीर्थमें देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया ॥ १०४ ॥

तैजसं नाम तत् तीर्थं यत्र पूर्वमपां पतिः ।

अभिषिक्तः सुरगणैर्वरुणो भरतर्षभ ॥ १०५ ॥

भरतश्रेष्ठ! वह तैजस नामका तीर्थ है, जहाँ पहले जलके स्वामी वरुणदेवका देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया था ॥ १०५ ॥

अस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा स्कन्दं चाभ्यर्च्य लाङ्गली ।

ब्राह्मणेभ्यो ददौ रुक्मं वासांस्याभरणानि च ॥ १०६ ॥

उस श्रेष्ठ तीर्थमें हलधारी बलरामने स्नान करके स्कन्ददेवका पूजन किया और ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र एवं आभूषण दिये ॥ १०६ ॥

उषित्वा रजनीं तत्र माधवः परवीरहा ।

पूज्य तीर्थवरं तच्च स्पृष्ट्वा तोयं च लाङ्गली ॥ १०७ ॥

हृष्टः प्रीतमनाश्चैव ह्यभवन्माधवोत्तमः । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी हलधर वहाँ रातभर रहे और उस श्रेष्ठ तीर्थका पूजन एवं उसके जलमें स्नान करके हर्षसे खिल उठे । उन यदुश्रेष्ठ बलरामका मन वहाँ प्रसन्न हो गया था ॥ १०७ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिमृच्छसि ।

यथाभिषिक्तो भगवान् स्कन्दो देवैः समागतैः ॥ १०८ ॥

( सेनानीश्च कृतो राजन् बाल एव महाबलः । ) राजन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया । समागत देवताओंद्वारा किस प्रकार भगवान् स्कन्दका अभिषेक हुआ और किस प्रकार बाल्यावस्थामें ही वे महाबली कुमार सेनापति बना दिये गये, यह सब कुछ बता दिया गया ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने तारकवधे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा एवं सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें तारकासुरका वधविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 2828

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( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल १०८३ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2829

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः वरुणका अभिषेक तथा अग्नितीर्थ, ब्रह्मयोनि और कुबेरतीर्थकी उत्पत्तिका प्रसंग जनमेजय उवाच

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् श्रुतवानस्मि तत्त्वतः ।

अभिषेकं कुमारस्य विस्तरेण यथाविधि ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा–ब्रह्मन्! आज मैंने आपके मुखसे कुमारके विधिपूर्वक अभिषेकका यह अद्भुत वृत्तान्त यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक सुना है ॥ १ ॥

यच्छ्रुत्वा पूतमात्मानं विजानामि तपोधन ।

प्रहृष्टानि च रोमाणि प्रसन्नं च मनो मम ॥ २ ॥

तपोधन! उसे सुनकर मैं अपने - आपको पवित्र हुआ समझता हूँ । हर्षसे मेरे रोयें खड़े हो गये हैं और मेरा मन प्रसन्नतासे भर गया है ॥ २ ॥

अभिषेकं कुमारस्य दैत्यानां च वधं तथा ।

श्रुत्वा मे परमा प्रीतिर्भूयः कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥

कुमारके अभिषेक और उनके द्वारा दैत्योंके वधका वृत्तान्त सुनकर मुझे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ है और पुनः मेरे मनमें इस विषयको सुननेकी उत्कण्ठा जाग्रत् हो गयी है ॥

अपां पतिः कथं ह्यस्मिन्नभिषिक्तः पुरा सुरैः ।

तन्मे ब्रूहि महाप्राज्ञ कुशलो ह्यसि सत्तम ॥ ४ ॥

साधुशिरोमणे! महाप्राज्ञ! इस तीर्थमें देवताओंने पहले जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किस प्रकार किया था, वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन्निदं चित्रं पूर्वकल्पे यथातथम् ।

आदौ कृतयुगे राजन् वर्तमाने यथाविधि ॥ ५ ॥

वरुणं देवताः सर्वा यमेत्येदमथाब्रुवन् । वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! इस विचित्र प्रसंगको यथार्थरूपसे सुनो । पूर्वकल्पकी बात है, जब आदि कृतयुग चल रहा था, उस समय सम्पूर्ण देवताओंने वरुणके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ५३ ॥

यथास्मान् सुरराट् शक्रो भयेभ्यः पाति सर्वदा ॥ ६ ॥

तथा त्वमपि सर्वासां सरितां वै पतिर्भव ।

पृष्ठ 2830

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‘ जैसे देवराज इन्द्र सदा भयसे हमलोगोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी समस्त सरिताओंके अधिपति हो जाइये ( और हमारी रक्षा कीजिये ) ॥ ६३ ॥

वासश्च ते सदा देव सागरे मकरालये ॥ ७ ॥

समुद्रोऽयं तव वशे भविष्यति नदीपतिः ।

सोमेन सार्धं च तव हानिवृद्धी भविष्यतः ॥ ८ ॥

‘ देव! मकरालय समुद्रमें आपका सदा निवासस्थान होगा और यह नदीपति समुद्र सदा आपके वशमें रहेगा । चन्द्रमाके साथ आपकी भी हानि और वृद्धि होगी ' ॥

एवमस्त्विति तान् देवान् वरुणो वाक्यमब्रवीत् ।

समागम्य ततः सर्वे वरुणं सागरालयम् ॥ ९ ॥

अपां पतिं प्रचक्रुर्हि विधिदृष्टेन कर्मणा । तब वरुणने उन देवताओंसे कहा – ' एवमस्तु' । इस प्रकार उनकी अनुमति पाकर सब देवता इकट्ठे होकर उन्होंने समुद्रनिवासी वरुणको शास्त्रीय विधिके अनुसार जलका राजा बना दिया ॥ ९ ३ ॥ अभिषिच्य ततो देवा वरुणं यादसां पतिम् ॥ १० ॥

जग्मुः स्वान्येव स्थानानि पूजयित्वा जलेश्वरम् । जलजन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणका अभिषेक और पूजन करके सम्पूर्ण देवता अपने - अपने स्थानको ही चले गये ॥ १०३ ॥

अभिषिक्तस्ततो देवैर्वरुणोऽपि महायशाः ॥ ११ ॥

सरितः सागरांश्चैव नदांश्चापि सरांसि च ।

पालयामास विधिना यथा देवान् शतक्रतुः ॥ १२ ॥

देवताओंद्वारा अभिषिक्त होकर महायशस्वी वरुण देवगणोंकी रक्षा करनेवाले इन्द्रके समान सरिताओं, सागरों, नदों और सरोवरोंका भी विधिपूर्वक पालन करने लगे ॥

ततस्तत्राप्युपस्पृश्य दत्त्वा च विविधं वसु ।

अग्नितीर्थं महाप्राज्ञो जगामाथ प्रलम्बहा ॥ १३ ॥

प्रलम्बासुरका वध करनेवाले महाज्ञानी बलरामजी उस तीर्थमें स्नान और भाँति-भाँतिके धनका दान करके अग्नितीर्थमें गये ॥ १३ ॥

नष्टो न दृश्यते यत्र शमीगर्भे हुताशनः ।

लोकालोकविनाशे च प्रादुर्भूते तदानघ ॥ १४ ॥

उपतस्थुः सुरा यत्र सर्वलोकपितामहम् ।

अग्निः प्रणष्टो भगवान् कारणं च न विद्महे ॥ १५ ॥

सर्वभूतक्षयो मा भूत् सम्पादय विभोऽनलम् ।