04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2851–2860
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2851–2860
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राजेन्द्र! जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर ये मुनिश्रेष्ठ देवल फिर सोचने लगे — ' मैंने इन्हें अभी- अभी समुद्रतटपर देखा है, फिर ये आश्रममें कैसे उपस्थित हैं?' ॥ २३ ॥
एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः ॥ २४ ॥
उत्पपाताश्रमात् तस्मादन्तरिक्षं विशाम्पते ।
जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जेगीषव्यस्य देवलः ॥ २५ ॥
प्रजानाथ! ऐसा विचार करते हुए वे मन्त्रशास्त्रके पारंगत विद्वान् मुनि उस आश्रमसे आकाशकी ओर उड़ चले । उस समय भिक्षु जैगीषव्यकी परीक्षा लेनेके लिये उन्होंने ऐसा किया ॥ २४-२५ ॥
सोऽन्तरिक्षचरान् सिद्धान् समपश्यत् समाहितान् ।
जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत ॥ २६ ॥
ऊपर जाकर उन्होंने बहुत-से अन्तरिक्षचारी एकाग्रचित्तवाले सिद्धोंको देखा । साथ ही उन सिद्धोंके द्वारा पूजे जाते हुए जैगीषव्य मुनिका भी उन्हें दर्शन हुआ ॥
ततोऽसितः सुसंरब्धो व्यवसायी दृढव्रतः ।
अपश्यद् वै दिवं यान्तं जैगीषव्यं स देवलः ॥ २७ ॥
तदनन्तर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले दृढ़निश्चयी असित देवल मुनि रोषावेशमें भर गये । फिर उन्होंने जैगीषव्यको स्वर्गलोकमें जाते देखा ॥ २७ ॥
तस्मात् तु पितृलोकं तं व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत ।
पितृलोकाच्च तं यान्तं याम्यं लोकमपश्यत ॥ २८ ॥
स्वर्गलोकसे उन्हें पितृलोकमें और पितृलोकसे यमलोकमें जाते देखा ॥ २८ ॥
तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिप्लुतम् ।
व्रजन्तमन्वपश्यत् स जैगीषव्यं महामुनिम् ॥ २ ९ ॥
वहाँसे भी ऊपर उठकर महामुनि जैगीषव्य जलमय चन्द्रलोकमें जाते दिखायी दिये ॥ २ ९ ॥
लोकान् समुत्पतन्तं तु शुभानेकान्तयाजिनाम् ।
ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्ततश्चाप्युत्पपात ह ॥ ३० ॥
फिर वे एकान्ततः यज्ञ करनेवाले पुरुषोंके उत्तम लोकोंकी ओर उड़ते दिखायी दिये ।
वहाँसे वे अग्निहोत्रियोंके लोकोंमें गये ॥ ३० ॥
दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः ।
तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशूयाजिनाम् ॥ ३१ ॥
उन लोकोंसे ऊपर उठकर वे बुद्धिमान् मुनि उन तपोधनोंके लोकमें गये, जो दर्श और पौर्णमास यज्ञ करते हैं । वहाँसे वे पशुयाग करनेवालोंके लोकोंमें जाते दिखायी दिये ॥ ३१ ॥
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व्रजन्तं लोकममलमपश्यद् देवपूजितम् ।
चातुर्मास्यैर्बहुविधैर्यजन्ते ये तपोधनाः ॥ ३२ ॥
जो तपस्वी नाना प्रकारके चातुर्मास यज्ञ करते हैं, उनके निर्मल लोकोंमें जाते हुए
जैगीषव्यको देवल मुनिने देखा । वे वहाँ देवताओंसे पूजित हो रहे थे ॥ ३२ ॥
तेषां स्थानं ततो यातं तथाग्निष्टोमयाजिनाम् ।
अग्निष्टुतेन च तथा ये यजन्ति तपोधनाः ॥ ३३ ॥
तत् स्थानमनुसम्प्राप्तमन्वपश्यत देवलः । वहाँसे अग्निष्टोमयाजी तथा अग्निष्टुत् यज्ञके द्वारा यज्ञ करनेवाले तपोधनोंके लोकमें पहुँचे हुए जैगीषव्यको देवल मुनिने देखा ॥ ३३३ ॥
वाजपेयं क्रतुवरं तथा बहुसुवर्णकम् ॥ ३४ ॥
आहरन्ति महाप्राज्ञास्तेषां लोकेष्वपश्यत । जो महाप्राज्ञ पुरुष बहुत- सी सुवर्णमयी दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ वाजपेय यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, उनके लोकोंमें भी उन्होंने जैगीषव्यका दर्शन किया ॥ ३४३ ॥
यजन्ते राजसूयेन पुण्डरीकेण चैव ये ॥ ३५ ॥
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः । जो राजसूय और पुण्डरीक यज्ञके द्वारा यजन करते हैं, उनके लोकोंमें भी देवलने जैगीषव्यको देखा ॥ ३५३ ॥
अश्वमेधं क्रतुवरं नरमेधं तथैव च ॥ ३६ ॥
आहरन्ति नरश्रेष्ठास्तेषां लोकेष्वपश्यत । जो नरश्रेष्ठ क्रतुओंमें उत्तम अश्वमेध तथा नरमेधका अनुष्ठान करते हैं, उनके लोकोंमें भी उनका दर्शन किया ॥ ३६३ ॥
सर्वमेधं च दुष्प्रापं तथा सौत्रामणिं च ये ॥ ३७ ॥
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः । जो लोग दुर्लभ सर्वमेध तथा सौत्रामणि यज्ञ करते हैं, उनके लोकोंमें भी देवलने जैगीषव्यको देखा ॥ द्वादशाहैश्च सत्रैश्च यजन्ते विविधैर्नृप ॥ ३८ ॥
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः । नरेश्वर! जो नाना प्रकारके द्वादशाह यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, उनके लोकोंमें भी देवलने जैगीषव्यका दर्शन किया ॥ मैत्रावरुणयोर्लोकानादित्यानां तथैव च ॥ ३ ९ ॥ सलोकतामनुप्राप्तमपश्यत ततोऽसितः ।
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तत्पश्चात् असितने मित्र, वरुण और आदित्योंके लोकोंमें पहुँचे हुए जैगीषव्यको देखा ॥ ३ ९ ३ ॥ रुद्राणां च वसूनां च स्थानं यच्च बृहस्पतेः ॥ ४० ॥
तानि सर्वाण्यतीतानि समपश्यत् ततोऽसितः । तदनन्तर रुद्र, वसु और बृहस्पतिके जो स्थान हैं, उन सबको लाँघकर ऊपर उठे हुए जैगीषव्यका असित देवलने दर्शन किया ॥ ४० ॥
आरुह्य च गवां लोकं प्रयातो ब्रह्मसत्रिणाम् ॥ ४१ ॥
लोकानपश्यद् गच्छन्तं जैगीषव्यं ततोऽसितः । इसके बाद असितने गौओंके लोकमें जाकर जैगीषव्यको ब्रह्मसत्र करनेवालोंके लोकों में जाते देखा ॥ त्रीँल्लोकानपरान् विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसा ॥ ४२ ॥
पतिव्रतानां लोकांश्च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत । तत्पश्चात् देवलने देखा कि विप्रवर जैगीषव्य मुनि अपने तेजसे ऊपर-ऊपरके तीन लोकोंको लाँघकर पतिव्रताओंके लोकमें जा रहे हैं ॥ ४२ ॥
ततो मुनिवरं भूयो जैगीषव्यमथासितः ॥ ४३ ॥
नान्वपश्यत लोकस्थमन्तर्हितमरिंदम । शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! इसके बाद असितने मुनिवर जैगीषव्यको पुनः किसी
लोकमें स्थित नहीं देखा । वे अदृश्य हो गये थे ॥ ४३३ ॥
सोऽचिन्तयन्महाभागो जैगीषव्यस्य देवलः ॥ ४४ ॥
प्रभावं सुव्रतत्वं च सिद्धिं योगस्य चातुलाम् । तत्पश्चात् महाभाग देवलने जैगीषव्यके प्रभाव, उत्तम व्रत और अनुपम योगसिद्धिके विषयमें विचार किया ॥ असितोऽपृच्छत तदा सिद्धाँल्लोकेषु सत्तमान् ॥ ४५ ॥
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा धीरस्तान् ब्रह्मसत्रिणः ।
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसध्वं महौजसम् ॥ ४६ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे । इसके बाद धैर्यवान् असितने उन लोकोंमें रहनेवाले ब्रह्मयाजी सिद्धों और साधु पुरुषोंसे हाथ जोड़कर विनीतभावसे पूछा — ' महात्माओ! मैं महातेजस्वी जैगीषव्यको अब देख नहीं रहा हूँ । आप उनका पता बतावें । मैं उनके विषयमें सुनना चाहता हूँ । इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ' ॥ ४५-४६३ ॥ सिद्धा ऊचुः शृणु देवल भूतार्थं शंसतां नो दृढव्रत ॥ ४७ ॥
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जैगीषव्यः स वै लोकं शाश्वतं ब्रह्मणो गतः । सिद्धोंने कहा— दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवल! सुनो । हम तुम्हें वह बात बता रहे हैं, जो हो चुकी है । जैगीषव्य मुनि सनातन ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ४७ || वैशम्पायन उवाच स श्रुत्वा वचनं तेषां सिद्धानां ब्रह्मसत्रिणाम् ॥ ४८ ॥
असितो देवलस्तूर्णमुत्पपात पपात च ।
ततः सिद्धास्त ऊचुर्हि देवलं पुनरेव ह ॥ ४ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उन ब्रह्मयाजी सिद्धोंकी बात सुनकर देवलमुनि तुरंत ऊपरकी ओर उछले, परंतु नीचे गिर पड़े। तब उन सिद्धोंने पुनः देवलसे कहा ॥ ४८-४९ ॥
न देवलगतिस्तत्र तव गन्तुं तपोधन ।
ब्रह्मणः सदने विप्र जैगीषव्यो यदाप्तवान् ॥ ५० ॥
‘ तपोधन देवल! विप्रवर! जहाँ जैगीषव्य गये हैं, उस ब्रह्मलोकमें जानेकी शक्ति तुममें नहीं है ' ॥ ५० ॥
वैशम्पायन उवाच
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सिद्धानां देवलः पुनः ।
आनुपूर्व्येण लोकांस्तान् सर्वानवततार ह ॥ ५१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उन सिद्धोंकी बात सुनकर देवलमुनि पुनः क्रमशः उन सभी लोकोंमें होते हुए नीचे उतर आये ॥ ५१ ॥
स्वमाश्रमपदं पुण्यमाजगाम पतत्त्रिवत् ।
प्रविशन्नेव चापश्यज्जैगीषव्यं स देवलः ॥ ५२ ॥
पक्षीकी तरह उड़ते हुए वे अपने पुण्यमय आश्रमपर आ पहुँचे । आश्रमके भीतर प्रवेश करते ही देवलने जैगीषव्य मुनिको वहाँ बैठा देखा ॥ ५२ ॥
ततो बुद्धया व्यगणयद् देवलो धर्मयुक्तया ।
दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ॥ ५३ ॥
तब देवलने जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर धर्मयुक्त बुद्धिसे उसपर विचार किया ॥ ५३ ॥
ततोऽब्रवीन्महात्मानं जैगीषव्यं स देवलः ।
विनयावनतो राजन्नुपसर्प्य महामुनिम् ॥ ५४ ॥
राजन्! इसके बाद महामुनि महात्मा जैगीषव्यके पास जाकर देवलने विनीतभावसे कहा— ॥ ५४ ॥
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मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः ॥ ५५ ॥
विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः ।
संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः ॥ ५६ ॥
सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा । ‘ भगवन्! मैं मोक्षधर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ । ' उनकी वह बात सुनकर महातपस्वी जैगीषव्यने उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर उन्हें ज्ञानका उपदेश किया । साथ ही योगकी उत्तम विधि बताकर शास्त्रके अनुसार कर्तव्य - अकर्तव्यका भी उपदेश दिया । इतना ही नहीं, उन्होंने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनके संन्यासग्रहणसम्बन्धी समस्त कार्य ( दीक्षा और संस्कार आदि ) किये ॥ ५५-५६३ ॥ संन्यासकृतबुद्धिं तं भूतानि पितृभिः सह ॥ ५७ ॥
ततो दृष्ट्वा प्ररुरुदुः कोऽस्मान् संविभजिष्यति । उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर पितरोंसहित समस्त प्राणी यह कहते हुए रोने लगे ‘ कि अब हमें कौन विभागपूर्वक अन्नदान करेगा ' ॥ ५७३ ॥
देवलस्तु वचः श्रुत्वा भूतानां करुणं तथा ॥ ५८ ॥
दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्तुं मनो दधे । दसों दिशाओंमें विलाप करते हुए उन प्राणियोंका करुणायुक्त वचन सुनकर देवलने मोक्षधर्म ( संन्यास ) -को त्याग देनेका विचार किया ॥ ५८३ ॥
ततस्तु फलमूलानि पवित्राणि च भारत ॥ ५ ९ ॥
पुष्पाण्योषधयश्चैव रोरूयन्ति सहस्रशः ।
पुनर्नो देवलः क्षूद्रो नूनं छेत्स्यति दुर्मतिः ॥ ६० ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दत्त्वा नावबुध्यते । भारत! यह देख फल - मूल, पवित्री (कुश), पुष्प और ओषधियाँ - ये सहस्रों पदार्थ यह कहकर बारंबार रोने लगे कि ' यह खोटी बुद्धिवाला क्षुद्र देवल निश्चय ही फिर हमारा उच्छेद करेगा । तभी तो यह सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देकर भी अब अपनी प्रतिज्ञाको स्मरण नहीं करता है ' ॥ ५ ९ -६० ॥ ततो भूयो व्यगणयत् स्वबुद्धया मुनिसत्तमः ॥ ६१ ॥
मोक्षे गार्हस्थ्यधर्मे वा किं नु श्रेयस्करं भवेत् । तब मुनिश्रेष्ठ देवल पुनः अपनी बुद्धिसे विचार करने लगे मोक्ष और गार्हस्थ्यधर्म इनमेंसे कौन - सा मेरे लिये श्रेयस्कर होगा ॥ ६१३ ॥
इति निश्चित्य मनसा देवलो राजसत्तम ॥ ६२ ॥
त्यक्त्वा गार्हस्थ्यधर्मं स मोक्षधर्ममरोचयत् ।
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नृपश्रेष्ठ! देवलने मन- ही- मन इस बातपर निश्चित विचार करके गार्हस्थ्यधर्मको त्यागकर अपने लिये मोक्षधर्मको पसंद किया ॥ ६२ ॥
एवमादीनि संचिन्त्य देवलो निश्चयात् ततः ॥ ६३ ॥
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं परं योगं च भारत । भारत! इन सब बातोंको सोच- विचारकर देवलने जो संन्यास लेनेका ही निश्चय किया, उससे उन्होंने परमसिद्धि और उत्तम योगको प्राप्त कर लिया ॥ ६३३ ॥
ततो देवाः समागम्य बृहस्पतिपुरोगमाः ॥ ६४ ॥
जैगीषव्ये तपश्चास्य प्रशंसन्ति तपस्विनः । तब बृहस्पति आदि सब देवता और तपस्वी वहाँ आकर जैगीषव्य मुनिके तपकी प्रशंसा करने लगे ॥ ६४ ॥
अथाब्रवीदृषिवरो देवान् वै नारदस्तथा ॥ ६५ ॥
जैगीषव्ये तपो नास्ति विस्मापयति योऽसितम् । तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ नारदने देवताओंसे कहा- ' जैगीषव्यमें तपस्या नहीं है; क्योंकि ये असित मुनिको अपना प्रभाव दिखाकर आश्चर्यमें डाल रहे हैं ' ॥ ६५३ ॥
तमेवंवादिनं धीरं प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः ॥ ६६ ॥
नैवमित्येव शंसन्तो जैगीषव्यं महामुनिम् ।
नातः परतरं किंचित् तुल्यमस्ति प्रभावतः ॥ ६७ ॥
तेजसस्तपसश्चास्य योगस्य च महात्मनः । ऐसा कहनेवाले ज्ञानी नारदमुनिको देवताओंने महामुनि जैगीषव्यकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार उत्तर दिया- ' आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये; क्योंकि प्रभाव, तेज, तपस्या और योगकी दृष्टिसे इन महात्मासे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ' ॥ ६६-६७३ ॥
एवं प्रभावो धर्मात्मा जैगीषव्यस्तथासितः ।
तयोरिदं स्थानवरं तीर्थं चैव महात्मनोः ॥ ६८ ॥
धर्मात्मा जैगीषव्य तथा असितमुनिका ऐसा ही प्रभाव था । उन दोनों महात्माओंका यह श्रेष्ठ स्थान ही तीर्थ है ॥ तत्राप्युपस्पृश्य ततो महात्मा दत्त्वा च वित्तं हलभृद् द्विजेभ्यः । अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा जगाम सोमस्य महत् सुतीर्थम् ॥ ६ ९ ॥ पारमार्थिक कर्म करनेवाले महात्मा हलधर वहाँ भी स्नान करके ब्राह्मणोंको धन -दान दे धर्मका फल पाकर सोमके महान् एवं उत्तम तीर्थमें गये ॥ ६ ९ ॥
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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन वैशम्पायन उवाच
यत्रेजिवानुडुपती राजसूयेन भारत ।
तस्मिंस्तीर्थे महानासीत् संग्रामस्तारकामयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतनन्दन! वही सोम- तीर्थ है, जहाँ नक्षत्रोंके स्वामी
चन्द्रमाने राजसूययज्ञ किया था । उसी तीर्थमें महान् तारकामय संग्राम हुआ था ॥ १ ॥
तत्राप्युपस्पृश्य बले दत्त्वा दानानि चात्मवान् ।
सारस्वतस्य धर्मात्मा मुनेस्तीर्थं जगाम ह ॥ २ ॥
धर्मात्मा एवं मनस्वी बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान एवं दान करके सारस्वत मुनिके तीर्थमें गये ॥ २ ॥
तत्र द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
वेदानध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ॥ ३ ॥
प्राचीनकालमें जब बारह वर्षोंतक अनावृष्टि हो गयी थी, सारस्वत मुनिने वहीं उत्तम ब्राह्मणोंको वेदाध्ययन कराया था ॥ ३ ॥
जनमेजय उवाच
कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
ऋषीनध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ॥ ४ ॥
जनमेजयने पूछा- मुने! प्राचीनकालमें सारस्वत मुनिने बारह वर्षोंकी अनावृष्टिके समय उत्तम ब्राह्मणोंको किस प्रकार वेदोंका अध्ययन कराया था? ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
आसीत् पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान् महातपाः ।
दधीच इति विख्यातो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—महाराज! पूर्वकालमें एक बुद्धिमान् महातपस्वी मुनि रहते थे,
जो ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय थे । उनका नाम था दधीच ॥ ५ ॥
तस्यातितपसः शक्रो बिभेति सततं विभो ।
न स लोभयितुं शक्यः फलैर्बहुविधैरपि ॥ ६ ॥
प्रभो! उनकी भारी तपस्यासे इन्द्र सदा डरते रहते थे । नाना प्रकारके फलोंका प्रलोभन देनेपर भी उन्हें लुभाया नहीं जा सकता था ॥ ६ ॥
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प्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत् पाकशासनः ।
दिव्यामप्सरसं पुण्यां दर्शनीयामलम्बुषाम् ॥ ७ ॥
तब इन्द्रने मुनिको लुभानेके लिये एक पवित्र दर्शनीय एवं दिव्य अप्सरा भेजी, जिसका नाम था अलम्बुषा ॥ ७ ॥
तस्य तर्पयतो देवान् सरस्वत्यां महात्मनः ।
समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भाविनी ॥ ८ ॥
महाराज! एक दिन, जब महात्मा दधीच सरस्वती नदीमें देवताओंका तर्पण कर रहे थे, वह माननीय अप्सरा उनके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥ ८ ॥
तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः ।
रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत् सा जग्राह निम्नगा ॥ ९ ॥
उस दिव्यरूपधारिणी अप्सराको देखकर उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका वीर्य
सरस्वतीके जलमें गिर पड़ा । उस वीर्यको सरस्वती नदीने स्वयं ग्रहण कर लिया ॥ ९ ॥
कुक्षौ चाप्यदधाद् हृष्टा तद् रेतः पुरुषर्षभ ।
सा दधार च तं गर्भं पुत्रहेतोर्महानदी ॥ १० ॥
पुरुषप्रवर! उस महानदीने हर्षमें भरकर पुत्रके लिये उस वीर्यको अपनी कुक्षिमें रख लिया और इस प्रकार वह गर्भवती हो गयी ॥ १० ॥
सुषुवे चापि समये पुत्रं सा सरितां वरा ।
जगाम पुत्रमादाय तमृषिं प्रति च प्रभो ॥ ११ ॥
प्रभो! समय आनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने एक पुत्रको जन्म दिया और उसे लेकर वह ऋषिके पास गयी ॥ ११ ॥
ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् ।
ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् ॥ १२ ॥
राजेन्द्र! ऋषियोंकी सभा में बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ दधीचको देखकर उन्हें उनका वह पुत्र सौंपती हुई सरस्वती नदी इस प्रकार बोली- ॥ १२ ॥
ब्रह्मर्षे तव पुत्रोऽयं त्वद्भक्त्या धारितो मया ।
दृष्ट्वा तेऽप्सरसं रेतो यत् स्कन्नं प्रागलम्बुषाम् ॥ १३ ॥
तत् कुक्षिणा वै ब्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् ।
न विनाशमिदं गच्छेत् त्वत्तेज इति निश्चयात् ॥ १४ ॥
प्रतिगृह्णीष्व पुत्रं स्वं मया दत्तमनिन्दितम् ।
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'ब्रह्मर्षे! यह आपका पुत्र है । इसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण किया था । ब्रह्मर्षे! पहले अलम्बुषा नामक अप्सराको देखकर जो आपका वीर्य स्खलित हुआ था, उसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण कर लिया था; क्योंकि मेरे मनमें यह विचार हुआ था कि आपका यह तेज नष्ट न होने पावे । अतः आप मेरे दिये हुए अपने इस अनिन्दनीय पुत्रको ग्रहण कीजिये' ॥ १३-१४३ ॥ इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् ॥ १५ ॥
स्वसुतं चाप्यजिघ्रत् तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ।
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम ॥ १६ ॥
सरस्वत्यै वरं प्रादात् प्रीयमाणो महामुनिः ।
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा । उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस पुत्रको ग्रहण कर लिया और वे बड़े प्रसन्न हुए । भरतभूषण! उन द्विजश्रेष्ठने बड़े प्रेमसे अपने उस पुत्रका मस्तक सूँघा और दीर्घ- कालतक छातीसे लगाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महामुनिने सरस्वतीको वर दिया — ' सुभगे! तुम्हारे जलसे तर्पण करनेपर विश्वेदेव, पितृगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय सभी तृप्ति - लाभ करेंगे ' ॥ १५-१७३ ॥ इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् ॥ १८ ॥
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव । राजन्! ऐसा कहकर अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल हृदयसे मुनिने प्रेमपूर्वक उत्तम वाणीद्वारा
सरस्वती देवीका स्तवन किया । उस स्तुतिको तुम यथार्थरूपसे सुनो ॥ १८३ ॥
प्रस्रुतासि महाभागे सरसो ब्रह्मणः पुरा ॥ १ ९ ॥
जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनयः संशितव्रताः ।
मम प्रियकरी चापि सततं प्रियदर्शने ॥ २० ॥
तस्मात् सारस्वतः पुत्रो महांस्ते वरवर्णिनि ।
तवैव नाम्ना प्रथितः पुत्रस्ते लोकभावनः ॥ २१ ॥
‘ महाभागे! तुम पूर्वकालमें ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो । सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि तुम्हारी महिमाको जानते हैं । प्रियदर्शने! तुम सदा मेरा भी प्रिय करती रही हो; अतः वरवर्णिनि! तुम्हारा यह लोकभावन महान् पुत्र तुम्हारे ही नामपर ‘ सारस्वत' कहलायेगा ॥ १ ९ –२१ ॥
सारस्वत इति ख्यातो भविष्यति महातपाः ।
एष द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजर्षभान् ॥ २२ ॥
सारस्वतो महाभागे वेदानध्यापयिष्यति ।