04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2871–2880

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2871–2880

पृष्ठ 2871

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राजर्षे किमभिप्रेतं येनेयं कृष्यते क्षितिः ॥ ५ ॥

इन्द्रने प्रश्न किया — राजन्! यह महान् प्रयत्नके साथ क्या हो रहा है? राजर्षे! आप क्या चाहते हैं, जिसके कारण यह भूमि जोत रहे हैं? ॥ ५ ॥

कुरुरुवाच

इह ये पुरुषाः क्षेत्रे मरिष्यन्ति शतक्रतो ।

ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान् ॥ ६ ॥

कुरुने कहा- शतक्रतो! जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मरेंगे, वे पुण्यात्माओंके पापरहित लोकोंमें जायँगे ॥ ६ ॥

अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं पुनः ।

राजर्षिरप्यनिर्विण्णः कर्षत्येव वसुंधराम् ॥ ७ ॥

तब इन्द्र उनका उपहास करके स्वर्गलोकमें चले गये । राजर्षि कुरु उस कार्यसे उदासीन न होकर वहाँकी भूमि जोतते ही रहे ॥ ७ ॥

आगम्यागम्य चैवैनं भूयोभूयोऽवहस्य च ।

शतक्रतुरनिर्विण्णं पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह ॥ ८ ॥

शतक्रतु इन्द्र अपने कार्यसे विरत न होनेवाले कुरुके पास बारंबार आते और उनसे पूछ - पूछकर प्रत्येक बार उनकी हँसी उड़ाकर स्वर्गलोकमें चले जाते थे ॥

यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष वसुधां नृपः ।

ततः शक्रोऽब्रवीद् देवान् राजर्षेर्यच्चिकीर्षितम् ॥ ९ ॥

जब राजा कुरु कठोर तपस्यापूर्वक पृथ्वीको जोतते ही रह गये, तब इन्द्रने देवताओंसे राजर्षि कुरुकी वह चेष्टा बतायी ॥ ९ ॥

एतच्छ्रुत्वाब्रुवन् देवाः सहस्राक्षमिदं वचः ।

वरेण च्छन्द्यतां शक्र राजर्षिर्यदि शक्यते ॥ १० ॥

यह सुनकर देवताओंने सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे कहा - ' शक्र! यदि सम्भव हो तो राजर्षि कुरुको वर देकर अपने अनुकूल किया जाय ॥ १० ॥

यदि ह्यत्र प्रमीता वै स्वर्गं गच्छन्ति मानवाः ।

अस्माननिष्ट्वा क्रतुभिर्भागो नो न भविष्यति ॥ ११ ॥

‘ यदि यहाँ मरे हुए मानव यज्ञोंद्वारा हमारा पूजन किये बिना ही स्वर्गलोकमें चले जायँगे, तब तो हमलोगोंका भाग सर्वथा नष्ट हो जायगा ' ॥ ११ ॥

आगम्य च ततः शक्रस्तदा राजर्षिमब्रवीत् ।

अलं खेदेन भवतः क्रियतां वचनं मम ॥ १२ ॥

मानवा ये निराहारा देहं त्यक्ष्यन्त्यतन्द्रिताः ।

युधि वा निहताः सम्यगपि तिर्यग्गता नृप ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2872

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ते स्वर्गभाजो राजेन्द्र भविष्यन्ति महामते । तब इन्द्रने वहाँसे आकर राजर्षि कुरुसे कहा–' नरेश्वर! आप व्यर्थ कष्ट क्यों उठाते हैं? मेरी बात मान लीजिये । महामते! राजेन्द्र! जो मनुष्य और पशु- पक्षी यहाँ निराहार रहकर देह त्याग करेंगे अथवा युद्धमें मारे जायँगे, वे स्वर्गलोकके भागी होंगे ' ॥ १२-१३ ॥ तथास्त्विति ततो राजा कुरुः शक्रमुवाच ह ॥ १४ ॥

ततस्तमभ्यनुज्ञाप्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।

जगाम त्रिदिवं भूयः क्षिप्रं बलनिषूदनः ॥ १५ ॥

तब राजा कुरुने इन्द्रसे कहा – ' देवराज! ऐसा ही हो' तदनन्तर कुरुसे विदा ले बलसूदन इन्द्र फिर शीघ्र ही प्रसन्नचित्तसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १४-१५ ॥

एवमेतद् यदुश्रेष्ठ कृष्टं राजर्षिणा पुरा ।

शक्रेण चाभ्यनुज्ञातं ब्रह्माद्यैश्च सुरैस्तथा ॥ १६ ॥

यदुश्रेष्ठ! इस प्रकार प्राचीनकालमें राजर्षि कुरुने इस क्षेत्रको जोता और इन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवताओंने इसे वर देकर अनुगृहीत किया ॥ १६ ॥

नातः परतरं पुण्यं भूमेः स्थानं भविष्यति ।

इह तप्स्यन्ति ये केचित्तपः परमकं नराः ॥ १७ ॥

देहत्यागेन ते सर्वे यास्यन्ति ब्रह्मणः क्षयम् । भूतलका कोई भी स्थान इससे बढ़कर पुण्यदायक नहीं होगा। जो मनुष्य यहाँ रहकर बड़ी भारी तपस्या करेंगे, वे सब लोग देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जायँगे ॥ ये पुनः पुण्यभाजो वै दानं दास्यन्ति मानवाः ॥ १८ ॥

तेषां सहस्रगुणितं भविष्यत्यचिरेण वै जो पुण्यात्मा मानव वहाँ दान देंगे, उनका वह दान शीघ्र ही सहस्रगुना हो जायगा ॥ १८ ॥

ये चेह नित्यं मनुजा निवत्स्यन्ति शुभैषिणः ॥ १ ९ ॥ यमस्य विषयं ते तु न द्रक्ष्यन्ति कदाचन । जो मानव शुभकी इच्छा रखकर यहाँ नित्य निवास करेंगे, उन्हें कभी यमका राज्य नहीं देखना पड़ेगा ॥ १ ९ ३ ॥ यक्ष्यन्ति ये च क्रतुभिर्महद्भिर्मनुजेश्वराः ॥ २० ॥

तेषां त्रिविष्टपे वासो यावद्भूमिर्धरिष्यति । जो नरेश्वर यहाँ बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे, वे जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करेंगे ॥ २० ॥

अपि चात्र स्वयं शक्रो जगौ गाथां सुराधिपः ॥ २१ ॥

कुरुक्षेत्रनिबद्धां वै तां शृणुष्व हलायुध ।

पृष्ठ 2873

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हलायुध! स्वयं देवराज इन्द्रने कुरुक्षेत्रके सम्बन्धमें यहाँ जो गाथा गायी है, उसे आप सुनिये ॥ २१ ॥

पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद् वायुना समुदीरिताः ।

अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥ २२ ॥

' कुरुक्षेत्रसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूलियाँ भी यदि ऊपर पड़ जायँ तो वे पापी मनुष्यको भी परमपदकी प्राप्ति कराती हैं ॥ २२ ॥

सुरर्षभा ब्राह्मणसत्तमाश्च तथा नृगाद्या नरदेवमुख्याः । इष्ट्वा महार्हैः क्रतुभिर्नृसिंहाः संत्यज्य देहान् सुगतिं प्रपन्नाः ॥ २३ ॥

‘ श्रेष्ठ देवताओ! यहाँ ब्राह्मणशिरोमणि तथा नृप आदि मुख्य-मुख्य पुरुषसिंह नरेश महान् यज्ञोंका अनुष्ठान करके देहत्यागके पश्चात् उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं ॥ तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते ॥ २४ ॥

‘तरन्तुक, अरन्तुक, रामह्रद ( परशुराम कुण्ड ) तथा मचक्रुक– इनके बीचका जो भूभाग है, यही समन्तपंचक एवं कुरुक्षेत्र है । इसे प्रजापतिकी उत्तरवेदी कहते हैं ॥ २४ ॥

शिवं महापुण्यमिदं दिवौकसां सुसम्मतं सर्वगुणैः समन्वितम् । अतश्च सर्वे निहता नृपा रणे यास्यन्ति पुण्यां गतिमक्षयां सदा ॥ २५ ॥

‘यह महान् पुण्यप्रद, कल्याणकारी, देवताओंका प्रिय एवं सर्वगुणसम्पन्न तीर्थ है । अतः यहाँ रणभूमिमें मारे गये सम्पूर्ण नरेश सदा पुण्यमयी अक्षय गति प्राप्त करेंगे ' ॥

इत्युवाच स्वयं शक्रः सह ब्रह्मादिभिस्तदा ।

तच्चानुमोदितं सर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ २६ ॥

ब्रह्मा आदि देवताओंसहित साक्षात् इन्द्रने ऐसी बातें कही थीं तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीने इन सारी बातोंका अनुमोदन किया था ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुरुक्षेत्रकथने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुरुक्षेत्रकी महिमाका वर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा

पृष्ठ 2874

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हुआ ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 2875

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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना वैशम्पायन उवाच

कुरुक्षेत्रं ततो दृष्ट्वा दत्त्वा दायांश्च सात्वतः ।

आश्रमं सुमहद् दिव्यमगमज्जनमेजय ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सात्वतवंशी बलरामजी कुरुक्षेत्रका दर्शन कर वहाँ बहुत- सा धन दान करके उस स्थानसे एक महान् एवं दिव्य आश्रममें गये ॥

मधूकाम्रवणोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसंकुलम् ।

चिरबिल्वयुतं पुण्यं पनसार्जुनसंकुलम् ॥ २ ॥

तं दृष्ट्वा यादवश्रेष्ठः प्रवरं पुण्यलक्षणम् ।

पप्रच्छ तानृषीन् सर्वान् कस्याश्रमवरस्त्वयम् ॥ ३ ॥

महुआ और आमके वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे । पाकड़ और बरगदके वृक्ष वहाँ अपनी छाया फैला रहे थे । चिलबिल, कटहल और अर्जुन ( समूह ) -के पेड़ चारों ओर भरे हुए थे । पुण्यदायक लक्षणोंसे युक्त उस पुण्यमय श्रेष्ठ आश्रमका दर्शन करके यादवश्रेष्ठ बलरामजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा कि ' यह सुन्दर आश्रम किसका है? ' ॥ २-३ ॥

ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन् हलायुधम् ।

शृणु विस्तरशो राम यस्यायं पूर्वमाश्रमः ॥ ४ ॥

राजन्! तब वे सभी ऋषि महात्मा हलधरसे बोले — ' बलरामजी! पहले यह आश्रम जिसके अधिकारमें था, उसकी कथा विस्तारपूर्वक सुनिये – ॥ ४ ॥

अत्र विष्णुः पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम् ।

अत्रास्य विधिवद् यज्ञाः सर्वे वृत्ताः सनातनाः ॥ ५ ॥

‘ प्राचीनकालमें यहाँ भगवान् विष्णुने उत्तम तपस्या की है, यहीं उनके सभी सनातन यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥

अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमारब्रह्मचारिणी ।

योगयुक्ता दिवं याता तपः सिद्धा तपस्विनी ॥ ६ ॥

‘ यहीं कुमारावस्थासे ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाली एक सिद्ध ब्राह्मणी रहती थी, जो

तपःसिद्ध तपस्विनी थी । वह योगयुक्त होकर स्वर्गलोकमें चली गयी ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2876

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बभूव श्रीमती राजन् शाण्डिल्यस्य महात्मनः ।

सुता धृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ॥ ७ ॥

' राजन्! नियमपूर्वक व्रतधारण और ब्रह्मचर्यपालन करनेवाली वह तेजस्विनी साध्वी महात्मा शाण्डिल्यकी सुपुत्री थी ॥ ७ ॥

सा तु तप्त्वा तपो घोरं दुश्चरं स्त्रीजनेन ह ।

गता स्वर्गं महाभागा देवब्राह्मणपूजिता ॥ ८ ॥

‘ स्त्रियोंके लिये जो अत्यन्त दुष्कर था, ऐसा घोर तप करके देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हुई वह महान् सौभाग्यशालिनी देवी स्वर्गलोकको चली गयी थी ' ॥

श्रुत्वा ऋषीणां वचनमाश्रमं तं जगाम ह ।

ऋषींस्तानभिवाद्याथ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः ॥ ९ ॥

संध्याकार्याणि सर्वाणि निर्वर्त्यारुरुहेऽचलम् । ऋषियोंका वचन सुनकर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले बलरामजी उस आश्रममें गये । वहाँ हिमालयके पार्श्वभागमें उन ऋषियोंको प्रणाम करके संध्या- वन्दन आदि सब कार्य करनेके अनन्तर वे हिमालयपर चढ़ने लगे ॥ ९ ३ ॥ नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो बली ॥ १० ॥

पुण्यं तीर्थवरं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः ।

प्रभावं च सरस्वत्याः प्लक्षप्रस्रवणं बलः ॥ ११ ॥

जिनकी ध्वजापर तालका चिह्न सुशोभित होता है, वे बलरामजी उस पर्वतपर थोड़ी ही दूर गये थे कि उनकी दृष्टि एक पुण्यमय उत्तम तीर्थपर पड़ी । वह सरस्वतीकी उत्पत्तिका स्थान प्लक्षप्रस्रवण नामक तीर्थ था । उसका दर्शन करके बलरामजीको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ १०-११ ॥

सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् ।

हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥ १२ ॥

आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ ।

संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥ १३ ॥

तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह ।

मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥ १४ ॥

फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थमें गये । महाबली हलधरने वहाँके निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जलमें गोता लगाकर ब्राह्मणोंको दान दे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया । तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुणके पवित्र आश्रमपर गये ॥ १२–१४ ॥

इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक् प्रीतिमाप्नुवन् ।

तं देशं कारपवनाद् यमुनायां जगाम ह ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2877

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2877 का मूल पृष्ठ
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स्नात्वा तत्र च धर्मात्मा परां प्रीतिमवाप्य च ।

ऋषिभिश्चैव सिद्धैश्च सहितो वै महाबलः ॥ १६ ॥

उपविष्टः कथाः शुभ्राः शुश्राव यदुपुङ्गवः । जहाँ पूर्वकालमें इन्द्र, अग्नि और अर्यमाने बड़ी प्रसन्नता प्राप्त की थी, वह स्थान यमुनाके तटपर है । कारपवनसे उस तीर्थमें जाकर महाबली धर्मात्मा बलरामने स्नान करके बड़ा हर्ष प्राप्त किया । फिर वे यदुपुंगव बलभद्र ऋषियों और सिद्धोंके साथ बैठकर उत्तम कथाएँ सुनने लगे ॥ १५-१६ ॥ तथा तु तिष्ठतां तेषां नारदो भगवानृषिः ॥ १७ ॥

आजगामाथ तं देशं यत्र रामो व्यवस्थितः । इस प्रकार वे लोग वहीं ठहरे हुए थे, तबतक देवर्षि भगवान् नारद भी उनके पास उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ बलरामजी विराजमान थे ॥ १७३ ॥

जटामण्डलसंवीतः स्वर्णचीरो महातपाः ॥ १८ ॥

हेमदण्डधरो राजन् कमण्डलुधरस्तथा ।

कच्छपीं सुखशब्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम् ॥ १ ९ ॥

राजन्! महातपस्वी नारद जटामण्डलसे मण्डित हो सुनहरा चीर धारण किये हुए थे । उन्होंने कमण्डलु, सोनेका दण्ड तथा सुखदायक शब्द करनेवाली कच्छपी नामक मनोरम वीणा भी ले रखी थी ॥ १८-१९ ॥

नृत्ये गीते च कुशलो देवब्राह्मणपूजितः ।

प्रकर्ता कलहानां च नित्यं च कलहप्रियः ॥ २० ॥

वे नृत्य - गीतमें कुशल, देवताओं तथा ब्राह्मणोंसे सम्मानित, कलह करानेवाले तथा सदैव कलहके प्रेमी हैं ॥ २० ॥

तं देशमगमद् यत्र श्रीमान् रामो व्यवस्थितः ।

प्रत्युत्थाय च तं सम्यक् पूजयित्वा यतव्रतम् ॥ २१ ॥

देवर्षिं पर्यपृच्छत् स यथा वृत्तं कुरून् प्रति । वे उस स्थानपर गये, जहाँ तेजस्वी बलराम बैठे हुए थे । उन्होंने उठकर नियम और व्रतका पालन करनेवाले देवर्षिका भलीभाँति पूजन करके उनसे कौरवोंका समाचार पूछा ॥ २१ ॥

ततोऽस्याकथयद् राजन् नारदः सर्वधर्मवित् ॥ २२ ॥

सर्वमेतद् यथावृत्तमतीव कुरुसंक्षयम् । राजन्! तब सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता नारदजीने उनसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता दिया कि कुरुकुलका अत्यन्त संहार हो गया है ॥ २२ ॥

ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥ २३ ॥

किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।

पृष्ठ 2878

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श्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन ॥ २४ ॥

विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे । तब रोहिणीनन्दन बलरामने दीनवाणीमें नारदजीसे पूछा– ' तपोधन! जो राजा लोग वहाँ उपस्थित हुए थे, उन सब क्षत्रियोंकी क्या अवस्था हुई है, यह सब तो मैंने पहले ही सुन लिया था । इस समय कुछ विशेष और विस्तृत समाचार जाननेके लिये मेरे मनमें अत्यन्त उत्सुकता हुई है ' ॥ नारद उवाच पूर्वमेव हतो भीष्मो द्रोणः सिन्धुपतिस्तथा ॥ २५ ॥

हतो वैकर्तनः कर्णः पुत्राश्चास्य महारथाः ।

भूरिश्रवा रौहिणेय मद्रराजश्च वीर्यवान् ॥ २६ ॥

नारदजीने कहा- रोहिणीनन्दन! भीष्मजी तो पहले ही मारे गये । फिर सिंधुराज जयद्रथ, द्रोण, वैकर्तन कर्ण तथा उसके महारथी पुत्र भी मारे गये हैं । भूरिश्रवा तथा पराक्रमी मद्रराज शल्य भी मार डाले गये ॥

एते चान्ये च बहवस्तत्र तत्र महाबलाः ।

प्रियान् प्राणान् परित्यज्य जयार्थं कौरवस्य वै ॥ २७ ॥

राजानो राजपुत्राश्च समरेष्वनिवर्तिनः । ये तथा और भी बहुत- से महाबली राजा और राजकुमार जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे, कुरुराज दुर्योधनकी विजयके लिये अपने प्यारे प्राणोंका परित्याग करके स्वर्गलोकमें चले गये हैं ॥ २७ ॥

अहतांस्तु महाबाहो शृणु मे तत्र माधव ॥ २८ ॥

धार्तराष्ट्रबले शेषास्त्रयः समितिमर्दनाः ।

कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ २ ९ ॥

महाबाहु माधव! जो वहाँ नहीं मारे गये हैं, उनके नाम भी मुझसे सुन लो । दुर्योधनकी सेनामें कृपाचार्य, कृतवर्मा और पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-ये शत्रुदलका मर्दन करनेवाले तीन ही वीर शेष रह गये हैं ॥ २८-२९ ॥

तेऽपि वै विद्रुता राम दिशो दश भयात् तदा ।

दुर्योधने हते शल्ये विद्रुतेषु कृपादिषु ॥ ३० ॥

ह्रदं द्वैपायनं नाम विवेश भृशदुःखितः । परंतु बलरामजी! जब शल्य मारे गये, तब ये तीनों भी भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें पलायन कर गये थे । शल्यके मारे जाने और कृप आदिके भाग जानेपर दुर्योधन बहुत दुःखी हुआ और भागकर द्वैपायनसरोवरमें जा छिपा ॥ ३० ॥

शयानं धार्तराष्ट्रं तु सलिले स्तम्भिते तदा ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 2879

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2879 का मूल पृष्ठ
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पाण्डवाः सह कृष्णेन वाग्भिरुग्राभिरार्दयन् । जब दुर्योधन जलको स्तम्भित करके उसके भीतर सो रहा था, उस समय पाण्डवलोग भगवान् श्रीकृष्णके साथ वहाँ आ पहुँचे और अपनी कठोर बातोंसे उसे कष्ट पहुँचाने लगे ॥ ३१३ ॥

स तुद्यमानो बलवान् वाग्भी राम समन्ततः ॥ ३२ ॥

उत्थितः स ह्रदाद् वीरः प्रगृह्य महतीं गदाम् । बलराम! जब सब ओरसे कड़वी बातोंद्वारा उसे व्यथित किया जाने लगा, तब वह बलवान् वीर विशाल गदा हाथमें लेकर सरोवरसे उठ खड़ा हुआ ॥ ३२ ॥

स चाप्युपगतो योद्धुं भीमेन सह साम्प्रतम् ॥ ३३ ॥

भविष्यति तयोरद्य युद्धं राम सुदारुणम् ।

यदि कौतूहलं तेऽस्ति व्रज माधव मा चिरम् ।

पश्य युद्धं महाघोरं शिष्ययोर्यदि मन्यसे ॥ ३४ ॥

इस समय वह भीमके साथ युद्ध करनेके लिये उनके पास जा पहुँचा है । राम! आज उन दोनोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होगा, माधव! यदि तुम्हारे मनमें भी उसे देखनेका कौतूहल हो तो शीघ्र जाओ । यदि ठीक समझो तो अपने दोनों शिष्योंका वह महाभयंकर युद्ध अपनी आँखोंसे देख लो ॥ ३३-३४ ॥ वैशम्पायन उवाच

नारदस्य वचः श्रुत्वा तानभ्यर्च्य द्विजर्षभान् ।

सर्वान् विसर्जयामास ये तेनाभ्यागताः सह ॥ ३५ ॥

गम्यतां द्वारकां चेति सोऽन्वशादनुयायिनः । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! नारदजीकी बात सुनकर बलरामजीने अपने साथ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें विदा कर दिया और सेवकोंको आज्ञा दे दी कि तुम लोग द्वारका चले जाओ ॥ ३५३ ॥

सोऽवतीर्याचलश्रेष्ठात् प्लक्षप्रस्रवणाच्छुभात् ॥ ३६ ॥

ततः प्रीतमना रामः श्रुत्वा तीर्थफलं महत् ।

विप्राणां संनिधौ श्लोकमगायदिममच्युतः ॥ ३७ ॥

फिर वे प्लक्षप्रस्रवण नामक शुभ पर्वतशिखरसे नीचे उतर आये और तीर्थ- सेवनका महान् फल सुनकर प्रसन्नचित्त हो अच्युत बलरामने ब्राह्मणोंके समीप इस श्लोकका गान किया— ॥ ३६-३७ ॥ सरस्वतीवाससमा कुतो रतिः सरस्वतीवाससमाः कुतो गुणाः । सरस्वतीं प्राप्य दिवं गता जनाः

पृष्ठ 2880

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2880 का मूल पृष्ठ
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सदा स्मरिष्यन्ति नदीं सरस्वतीम् ॥ ३८ ॥

‘ सरस्वती नदीके तटपर निवास करनेमें जो सुख और आनन्द है, वह अन्यत्र कहाँसे मिल सकता है? सरस्वतीतटपर निवास करनेमें जो गुण हैं, वे अन्यत्र कहाँ हैं? सरस्वतीका सेवन करके स्वर्गलोकमें पहुँचे हुए मनुष्य सदा सरस्वती नदीका स्मरण करते रहेंगे ' ॥ ३८ ॥

सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या सरस्वती लोकशुभावहा सदा । सरस्वतीं प्राप्य जनाः सुदुष्कृतं सदा न शोचन्ति परत्र चेह च ॥ ३ ९ ॥ ‘ सरस्वती सब नदियोंमें पवित्र है । सरस्वती सदा सम्पूर्ण जगत्का कल्याण करनेवाली है । सरस्वतीको पाकर मनुष्य इहलोक और परलोकमें कभी पापोंके लिये शोक नहीं करते हैं' ॥ ३ ९ ॥

ततो मुहुर्मुहुः प्रीत्या प्रेक्षमाणः सरस्वतीम् ।

हयैर्युक्तं रथं शुभ्रमातिष्ठत परंतपः ॥ ४० ॥

तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजी बारंबार प्रेमपूर्वक सरस्वती नदीकी ओर देखते हुए घोड़ोंसे जुते उज्ज्वल रथपर आरूढ़ हुए ॥ ४० ॥

स शीघ्रगामिना तेन रथेन यदुपुङ्गवः ।

दिदृक्षुरभिसम्प्राप्तः शिष्ययुद्धमुपस्थितम् ॥ ४१ ॥

उसी शीघ्रगामी रथके द्वारा तत्काल उपस्थित हुए दोनों शिष्योंका युद्ध देखनेके लिये यदुपुंगव बलरामजी उनके पास जा पहुँचे ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥