04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2931–2940
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2931–2940
पृष्ठ 2931
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तथा त्वां निहतामित्रं वयं नन्दाम भारत ॥ १५ ॥
‘ भारत! निश्चय ही वृत्रासुरके मारे जानेपर वन्दीजनोंने जिस प्रकार इन्द्रका अभिनन्दन किया था, उसी प्रकार हम शत्रुओंका वध करनेवाले आपका अभिनन्दन करते हैं ॥ १५ ॥
दुर्योधनवधे यानि रोमाणि हृषितानि नः ।
अद्यापि न विकृष्यन्ते तानि तद् विद्धि भारत ॥ १६ ॥
‘ भरतनन्दन! दुर्योधनके वधके समय हमारे शरीरमें जो रोंगटे खड़े हुए थे, वे अब भी
ज्यों - के - त्यों हैं, गिर नहीं रहे हैं । इन्हें आप देख लें ' ॥ १६ ॥
इत्यब्रुवन् भीमसेनं वातिकास्तत्र सङ्गताः ।
तान् हृष्टान् पुरुषव्याघ्रान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ॥ १७ ॥
ब्रुवतोऽसदृशं तत्र प्रोवाच मधुसूदनः । प्रशंसा करनेवाले वीरगण वहाँ एकत्र होकर भीमसेनसे उपर्युक्त बातें कह रहे थे । भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि पुरुषसिंह पांचाल और पाण्डव अयोग्य बातें कह रहे हैं, तब वे वहाँ उन सबसे बोले – ॥ न न्याय्यं निहतं शत्रुं भूयो हन्तुं नराधिपाः ॥ १८ ॥
असकृद् वाग्भिरुग्राभिर्निहतो ह्येष मन्दधीः । 'नरेश्वरो! मरे हुए शत्रुको पुनः मारना उचित नहीं है । तुमलोगोंने इस मन्दबुद्धि दुर्योधनको बारंबार कठोर वचनोंद्वारा घायल किया है ॥ १८३ ॥
तदैवैष हतः पापो यदैव निरपत्रपः ॥ १ ९ ॥ लुब्धः पापसहायश्च सुहृदां शासनातिगः । ‘ यह निर्लज्ज पापी तो उसी समय मर चुका था जब लोभमें फँसा और पापियोंको अपना सहायक बनाकर सुहृदोंके शासनसे दूर रहने लगा ॥ १ ९ ३ ॥ बहुशो विदुरद्रोणकृपगाङ्गेयसृञ्जयैः ॥ २० ॥
पाण्डुभ्यः प्रार्थ्यमानोऽपि पित्र्यमंशं न दत्तवान् । ‘ विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म तथा सृजयोंके बारंबार प्रार्थना करनेपर भी इसने पाण्डवोंको उनका पैतृक भाग नहीं दिया ॥ २०३३ ॥
नैष योग्योऽद्य मित्रं वा शत्रुर्वा पुरुषाधमः ॥ २१ ॥
किमनेनातिभुग्नेन वाग्भिः काष्ठसधर्मणा ।
रथेष्वारोहत क्षिप्रं गच्छामो वसुधाधिपाः ॥ २२ ॥
दिष्ट्या हतोऽयं पापात्मा सामात्यज्ञातिबान्धवः । ‘ यह नराधम अब किसी योग्य नहीं है । न यह किसीका मित्र है और न शत्रु। राजाओ! यह तो सूखे काठके समान कठोर है । इसे कटुवचनोंद्वारा अधिक झुकानेकी चेष्टा करनेसे क्या लाभ? अब शीघ्र अपने रथोंपर बैठो । हम सब लोग छावनीकी ओर चलें । सौभाग्यसे यह पापात्मा अपने मन्त्री, कुटुम्ब और भाई- बन्धुओंसहित मार डाला गया' ॥ २१-२२ ॥
पृष्ठ 2932
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रुत्वा त्वधिक्षेपं कृष्णाद् दुर्योधनो नृपः ॥ २३ ॥
अमर्षवशमापन्न उदतिष्ठद् विशाम्पते ।
स्फिग्देशेनोपविष्टः स दोर्भ्यां विष्टभ्य मेदिनीम् ॥ २४ ॥
प्रजानाथ! श्रीकृष्णके मुखसे यह आक्षेपयुक्त वचन सुन राजा दुर्योधन अमर्षके वशीभूत होकर उठा और दोनों हाथ पृथ्वीपर टेककर चूतड़के सहारे बैठ गया ॥
दृष्टिं भ्रुसङ्कटां कृत्वा वासुदेवे न्यपातयत् ।
अर्धोन्नतशरीरस्य रूपमासीन्नृपस्य तु ॥ २५ ॥
क्रुद्धस्याशीविषस्येव च्छिन्नपुच्छस्य भारत । तत्पश्चात् उसने श्रीकृष्णकी ओर भौंहें टेढ़ी करके देखा, उसका आधा शरीर उठा हुआ था । उस समय राजा दुर्योधनका रूप उस कुपित विषधरके समान जान पड़ता था, जो पूँछ कट जानेके कारण अपने आधे शरीरको ही उठाकर देख रहा हो ॥ २५३ ॥
प्राणान्तकरिणीं घोरां वेदनामप्यचिन्तयन् ॥ २६ ॥
दुर्योधनो वासुदेवं वाग्भिरुग्राभिरार्दयत् । उसे प्राणोंका अन्त कर देनेवाली भयंकर वेदना हो रही थी, तो भी उसकी चिन्ता न करते हुए दुर्योधनने अपने कठोर वचनोंद्वारा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥ २६३ ॥
कंसदासस्य दायाद न ते लज्जास्त्यनेन वै ॥ २७ ॥
अधर्मेण गदायुद्धे यदहं विनिपातितः । ‘ ओ कंसके दासके बेटे! मैं जो गदायुद्धमें अधर्मसे मारा गया हूँ, इस कुकृत्यके कारण क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती है? ॥ २७३ ॥
ऊरू भिन्धीति भीमस्य स्मृतिं मिथ्या प्रयच्छता ॥ २८ ॥
किं न विज्ञातमेतन्मे यदर्जुनमवोचथाः । ' भीमसेनको मेरी जाँघें तोड़ डालनेका मिथ्या स्मरण दिलाते हुए तुमने अर्जुनसे जो कुछ कहा था, क्या वह मुझे ज्ञात नहीं है? ॥ २८३ ॥
घातयित्वा महीपालानृजुयुद्धान् सहस्रशः ॥ २ ९ ॥ जिह्यैरुपायैर्बहुभिर्न ते लज्जा न ते घृणा । ‘ सरलतासे धर्मानुकूल युद्ध करनेवाले सहस्रों भूमिपालोंको बहुत-से कुटिल उपायोंद्वारा मरवाकर न तुम्हें लज्जा आती है और न इस बुरे कर्मसे घृणा ही होती है ॥ अहन्यहनि शूराणां कुर्वाणः कदनं महत् ॥ ३० ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य घातितस्ते पितामहः । ‘ जो प्रतिदिन शूरवीरोंका भारी संहार मचा रहे थे, उन पितामह भीष्मका तुमने शिखण्डीको आगे रखकर वध कराया ॥ ३०३ ॥
पृष्ठ 2933
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अश्वत्थाम्नः सनामानं हत्वा नागं सुदुर्मते ॥ ३१ ॥
आचार्यो न्यासितः शस्त्रं किं तन्न विदितं मया । ' दुर्मते! अश्वत्थामाके सदृश नामवाले एक हाथीको मारकर तुमलोगोंने द्रोणाचार्यके हाथसे शस्त्र नीचे डलवा दिया था, क्या वह मुझे ज्ञात नहीं है? ॥ ३१३ ॥
स चानेन नृशंसेन धृष्टद्युम्नेन वीर्यवान् ॥ ३२ ॥
पात्यमानस्त्वया दृष्टो न चैनं त्वमवारयः । ‘ इस नृशंस धृष्टद्युम्नने पराक्रमी आचार्यको उस अवस्थामें मार गिराया, जिसे तुमने अपनी आँखों देखा; किंतु मना नहीं किया ॥ ३२ ॥
वधार्थं पाण्डुपुत्रस्य याचितां शक्तिमेव च ॥ ३३ ॥
घटोत्कचे व्यंसयतः कस्त्वत्तः पापकृत्तमः । ‘ पाण्डुपुत्र अर्जुनके वधके लिये माँगी हुई इन्द्रकी शक्तिको तुमने घटोत्कचपर छुड़वा दिया । तुमसे बढ़कर महापापी कौन हो सकता है? ॥ ३३३ ॥
छिन्नहस्तः प्रायगतस्तथा भूरिश्रवा बली ॥ ३४ ॥
त्वयाभिसृष्टेन हतः शैनेयेन महात्मना । ‘ बलवान् भूरिश्रवाका हाथ कट गया था और वे आमरण अनशनका व्रत लेकर बैठे हुए थे । उस दशामें तुमसे ही प्रेरित होकर महामना सात्यकिने उनका वध किया ॥ कुर्वाणश्चोत्तमं कर्म कर्णः पार्थजिगीषया ॥ ३५ ॥
व्यंसनेनाश्वसेनस्य पन्नगेन्द्रस्य वै पुनः ।
पुनश्च पतिते चक्रे व्यसनार्तः पराजितः ॥ ३६ ॥
पातितः समरे कर्णश्चक्रव्यग्रोऽग्रणीर्नृणाम् । ' मनुष्योंमें अग्रगण्य कर्ण अर्जुनको जीतनेकी इच्छासे उत्तम पराक्रम कर रहा था । उस समय नागराज अश्वसेनको जो कर्णके बाणके साथ अर्जुनके वधके लिये जा रहा था, तुमने अपने प्रयत्नसे विफल कर दिया । फिर जब कर्णके रथका पहिया गड्ढेमें गिर गया और वह उसे उठानेमें व्यग्रतापूर्वक संलग्न हुआ, उस समय उसे संकटसे पीड़ित एवं पराजित जानकर तुमलोगोंने मार गिराया ॥ ३५-३६३ ॥ यदि मां चापि कर्णं च भीष्मद्रोणौ च संयुतौ ॥ ३७ ॥
ऋजुना प्रतियुध्येथा न ते स्याद् विजयो ध्रुवम् । ‘ यदि मेरे, कर्णके तथा भीष्म और द्रोणाचार्यके साथ मायारहित सरलभावसे तुम युद्ध करते तो निश्चय ही तुम्हारे पक्षकी विजय नहीं होती ॥ ३७३३ ॥
त्वया पुनरनार्येण जिह्ममार्गेण पार्थिवाः ॥ ३८ ॥
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो वयं चान्ये च घातिताः ।
पृष्ठ 2934
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
'परंतु तुम-जैसे अनार्यने कुटिल मार्गका आश्रय लेकर स्वधर्म-पालनमें लगे हुए हमलोगोंका तथा दूसरे राजाओंका भी वध करवाया है' ॥ ३८३ ॥
वासुदेव उवाच हतस्त्वमसि गान्धारे सभ्रातृसुतबान्धवः ॥ ३ ९ ॥
सगणः ससुहृच्चैव पापं मार्गमनुष्ठितः ।
तवैव दुष्कृतैर्वीरौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ ॥ ४० ॥
कर्णश्च निहतः संख्ये तव शीलानुवर्तकः । भगवान् श्रीकृष्ण बोले- गान्धारीनन्दन! तुमने पापके रास्तेपर पैर रखा था; इसीलिये तुम भाई, पुत्र, बान्धव, सेवक और सुहृद्गणोंसहित मारे गये हो । वीर भीष्म और द्रोणाचार्य तुम्हारे दुष्कर्मोंसे ही मारे गये हैं। कर्ण भी तुम्हारे स्वभावका ही अनुसरण करनेवाला था; इसलिये युद्धमें मारा गया ॥ ३ ९-४०३ ॥ याच्यमानं मया मूढ पित्र्यमंशं न दित्ससि ॥ ४१ ॥
पाण्डवेभ्यः स्वराज्यं च लोभाच्छकुनिनिश्चयात् । ओ मूर्ख! तुम शकुनिकी सलाह मानकर मेरे माँगनेपर भी पाण्डवोंको उनकी पैतृक सम्पत्ति, उनका अपना राज्य लोभवश नहीं देना चाहते थे ॥ ४१३ ॥
विषं ते भीमसेनाय दत्तं सर्वे च पाण्डवाः ॥ ४२ ॥
प्रदीपिता जतुगृहे मात्रा सह सुदुर्मते ।
सभायां याज्ञसेनी च कृष्टा द्यूते रजस्वला ॥ ४३ ॥
तदैव तावद् दुष्टात्मन् वध्यस्त्वं निरपत्रप । सुदुर्मते! तुमने जब भीमसेनको विष दिया, समस्त पाण्डवोंको उनकी माताके साथ लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया और निर्लज्ज! दुष्टात्मन्! द्यूतक्रीड़ाके समय भरी सभामें रजस्वला द्रौपदीको जब तुमलोग घसीट लाये, तभी तुम वधके योग्य हो गये थे ॥ अनक्षज्ञं च धर्मज्ञं सौबलेनाक्षवेदिना ॥ ४४ ॥
निकृत्या यत् पराजैषीस्तस्मादसि हतो रणे । तुमने द्यूतक्रीड़ाके जानकार सुबलपुत्र शकुनिके द्वारा उस कलाको न जाननेवाले धर्मज्ञ युधिष्ठिरको, जो छलसे पराजित किया था, उसी पापसे तुम रणभूमिमें मारे गये हो ॥ ४४ जयद्रथेन पापेन यत् कृष्णा क्लेशिता वने ॥ ४५ ॥
यातेषु मृगयां चैव तृणबिन्दोरथाश्रमम् ।
अभिमन्युश्च यद् बाल एको बहुभिराहवे ॥ ४६ ॥
त्वद्दोषैर्निहतः पाप तस्मादसि हतो रणे ।
पृष्ठ 2935
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जब पाण्डव शिकारके लिये तृणबिन्दुके आश्रमपर चले गये थे, उस समय पापी जयद्रथने वनके भीतर द्रौपदीको जो क्लेश पहुँचाया और पापात्मन्! तुम्हारे ही अपराधसे बहुत - से योद्धाओंने मिलकर युद्धस्थलमें जो अकेले बालक अभिमन्युका वध किया था, इन्हीं सब कारणोंसे आज तुम भी रणभूमिमें मारे गये हो ॥ ४५-४६३ ॥
( कुर्वाणं कर्म समरे पाण्डवानर्थकाङ्क्षिणम् ।
यच्छिखण्ड्यवधीद् भीष्मं मित्रार्थे न व्यतिक्रमः ॥
भीष्म पाण्डवोंके अनर्थकी इच्छा रखकर समरभूमिमें पराक्रम प्रकट कर रहे थे । उस समय अपने मित्रोंके हितके लिये शिखण्डीने जो उनका वध किया है, वह कोई दोष या अपराधकी बात नहीं है ।
स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा आचार्यस्त्वत्प्रियेप्सया ।
पार्षतेन हतः संख्ये वर्तमानोऽसतां पथि ॥
आचार्य द्रोण तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे अपने धर्मको पीछे करके असाधु पुरुषोंके मार्गपर चल रहे थे; अतः युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नने उनका वध किया है ।
प्रतिज्ञामात्मनः सत्यां चिकीर्षन् समरे रिपुम् ।
हतवान् सात्वतो विद्वान् सौमदत्तिं महारथम् ॥
विद्वान् सात्वतवंशी सात्यकिने अपनी सच्ची प्रतिज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे समरांगणमें अपने शत्रु महारथी भूरिश्रवाका वध किया था ।
अर्जुनः समरे राजन् युध्यमानः कदाचन ।
निन्दितं पुरुषव्याघ्रः करोति न कथंचन ॥
राजन्! समरभूमिमें युद्ध करते हुए पुरुषसिंह अर्जुन कभी किसी प्रकार भी कोई निन्दित कार्य नहीं करते हैं!
लब्ध्वापि बहुशश्छिद्रं वीरवृत्तमनुस्मरन् ।
न जघान रणे कर्णं मैवं वोचः सुदुर्मते ॥
दुर्मते! अर्जुनने वीरोचित सदाचारका विचार करके बहुत- से छिद्र ( प्रहार करनेके अवसर) पाकर भी युद्धमें कर्णका वध नहीं किया है; अतः तुम उनके विषयमें ऐसी बात न कहो।
देवानां मतमाज्ञाय तेषां प्रियहितेप्सया ।
नार्जुनस्य महानागं मया व्यंसितमस्त्रजम् ॥
देवताओंका मत जानकर उनका प्रिय और हित करनेकी इच्छासे मैंने अर्जुनपर महानागास्त्रका प्रहार नहीं होने दिया । उसे विफल कर दिया ।
त्वं च भीष्मश्च कर्णश्च द्रोणो द्रौणिस्तथा कृपः ।
विराटनगरे तस्य आनृशंस्याच्च जीविताः ॥
पृष्ठ 2936
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तुम, भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य विराटनगरमें अर्जुनकी दयालुतासे ही जीवित बच गये ।
स्मर पार्थस्य विक्रान्तं गन्धर्वेषु कृतं तदा ।
अधर्मः कोऽत्र गान्धारे पाण्डवैर्यत् कृतं त्वयि ॥
याद करो, अर्जुनके उस पराक्रमको; जो उन्होंने तुम्हारे लिये उन दिनों गन्धर्वोंपर प्रकट किया था । गान्धारीनन्दन! पाण्डवोंने यहाँ तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, उसमें कौन-|-सा अधर्म है । स्वबाहुबलमास्थाय स्वधर्मेण परंतपाः । जितवन्तो रणे वीरा पापोऽसि निधनं गतः || ) शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर पाण्डवोंने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर क्षत्रियधर्मके
अनुसार विजय पायी है । तुम पापी हो, इसीलिये मारे गये हो ।
यान्यकार्याणि चास्माकं कृतानीति प्रभाषसे ॥ ४७ ॥
वैगुण्येन तवात्यर्थं सर्वं हि तदनुष्ठितम् । तुम जिन्हें हमारे किये हुए अनुचित कार्य बता रहे हो, वे सब तुम्हारे महान् दोषसे ही किये गये हैं ॥ ४७ ॥
बृहस्पतेरुशनसो नोपदेशः श्रुतस्त्वया ॥ ४८ ॥
वृद्धा नोपासिताश्चैव हितं वाक्यं न ते श्रुतम् । तुमने बृहस्पति और शुक्राचार्यके नीतिसम्बन्धी उपदेशको नहीं सुना है, बड़े -बूढ़ोंकी उपासना नहीं की है और उनके हितकर वचन भी नहीं सुने हैं ॥ लोभेनातिबलेन त्वं तृष्णया च वशीकृतः ॥ ४ ९ ॥ कृतवानस्यकार्याणि विपाकस्तस्य भुज्यताम् । तुमने अत्यन्त प्रबल लोभ और तृष्णाके वशीभूत होकर न करनेयोग्य कार्य किये हैं; अतः उनका परिणाम अब तुम्हीं भोगो ॥ ४ ९ ॥ दुर्योधनउवाच अधीतं विधिवद् दत्तं भूः प्रशास्ता ससागरा ॥ ५० ॥
मूर्ध्नि स्थितममित्राणां को नु स्वन्ततरो मया । दुर्योधनने कहा- मैंने विधिपूर्वक अध्ययन किया, दान दिये, समुद्रोंसहित पृथ्वीका शासन किया और शत्रुओंके मस्तकपर पैर रखकर मैं खड़ा रहा। मेरे समान उत्तम अन्त ( परिणाम ) किसका हुआ है? ॥ ५० ॥
यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुपश्यताम् ॥ ५१ ॥
तदिदं निधनं प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया ।
पृष्ठ 2937
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपने धर्मपर दृष्टि रखनेवाले क्षत्रिय - बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वही यह मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ है? ॥ ५१३ ॥
देवार्हा मानुषा भोगाः प्राप्ता असुलभा नृपैः ॥ ५२ ॥
ऐश्वर्यं चोत्तमं प्राप्तं को नुनु स्वन्ततरो मया । जो दूसरे राजाओंके लिये दुर्लभ हैं, वे देवताओंको ही सुलभ होनेवाले मानवभोग मुझे प्राप्त हुए हैं । मैंने उत्तम ऐश्वर्य पा लिया है; अतः मुझसे उत्कृष्ट अन्त और किसका हुआ है? ॥ ५२३ ॥
ससुहृत् सानुगश्चैव स्वर्गं गन्ताहमच्युत ॥ ५३ ॥
यूयं निहतसंकल्पाः शोचन्तो वर्तयिष्यथ । अच्युत! मैं सुहृदों और सेवकोंसहित स्वर्गलोकमें जाऊँगा और तुमलोग भग्नमनोरथ होकर शोचनीय जीवन बिताते रहोगे ॥ ५३ ॥
(न मे विषादो भीमेन पादेन शिर आहतम् । काका वा कङ्कगृध्रा वा निधास्यन्ति पदं क्षणात् II ) भीमसेनने अपने पैरसे जो मेरे सिरपर आघात किया है, इसके लिये मुझे कोई खेद नहीं है; क्योंकि अभी क्षणभरके बाद कौए, कंक अथवा गृध्र भी तो इस शरीरपर अपना पैर रखेंगे । संजय उवाच अस्य वाक्यस्य निधने कुरुराजस्य धीमतः ॥ ५४ ॥
अपतत् सुमहद् वर्षं पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् । संजय कहते हैं — राजन्! बुद्धिमान् कुरुराज दुर्योधनकी यह बात पूरी होते ही उसके ऊपर पवित्र सुगंधवाले पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ॥ ५४३ ॥
अवादयन्त गन्धर्वा वादित्रं सुमनोहरम् ॥ ५५ ॥
जगुश्चाप्सरसो राज्ञो यशः सम्बद्धमेव च । गन्धर्वगण अत्यन्त मनोहर बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ राजा दुर्योधनके सुयशसम्बधी गीत गाने लगीं ॥ सिद्धाश्च मुमुचुर्वाचः साधु साध्विति पार्थिव ॥ ५६ ॥
ववौ च सुरभिर्वायुः पुण्यगन्धो मृदुः सुखः ।
व्यराजंश्च दिशः सर्वा नभो वैदूर्यसंनिभम् ॥ ५७ ॥
राजन्! उस समय सिद्धगण बोल उठे - ' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' । फिर पवित्र गन्धवाली मनोहर, मृदुल एवं सुखदायक हवा चलने लगी । सारी दिशाओंमें प्रकाश छा गया और आकाश नीलमके समान चमक उठा ॥ ५६-५७ ॥ अत्यद्भुतानि ते दृष्ट्वा वासुदेवपुरोगमाः ।
पृष्ठ 2938
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दुर्योधनस्य पूजां तु दृष्ट्वा व्रीडामुपागमन् ॥ ५८ ॥
श्रीकृष्ण आदि सब लोग ये अद्भुत बातें और दुर्योधनकी यह पूजा देखकर बहुत लज्जित हुए ॥ ५८ ॥
हतांश्चाधर्मतः श्रुत्वा शोकार्ताः शुशुचुर्हि ते ।
भीष्मं द्रोणं तथा कर्णं भूरिश्रवसमेव च ॥ ५ ९ ॥
भीष्म, द्रोण, कर्ण और भूरिश्रवाको अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर सब लोग शोकसे व्याकुल हो खेद प्रकट करने लगे ॥ ५ ९ ॥
तांस्तु चिन्तापरान् दृष्ट्वा पाण्डवान् दीनचेतसः ।
प्रोवाचेदं वचः कृष्णो मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ ६० ॥
पाण्डवोंको दीनचित्त एवं चिन्तामग्न देख मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर घोष करनेवाले श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा- ॥ ६० ॥
नैष शक्योऽतिशीघ्रास्त्रस्ते च सर्वे महारथाः ।
ऋजुयुद्धेन विक्रान्ता हन्तुं युष्माभिराहवे ॥ ६१ ॥
'यह दुर्योधन अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला था, अतः इसे कोई जीत नहीं सकता था और वे भीष्म, द्रोण आदि महारथी भी बड़े पराक्रमी थे । उन्हें धर्मानुकूल सरलतापूर्वक युद्धके द्वारा आपलोग नहीं मार सकते थे ॥
नैष शक्यः कदाचित् तु हन्तुं धर्मेण पार्थिवः ।
ते वा भीष्ममुखाः सर्वे महेष्वासा महारथाः ॥ ६२ ॥
' यह राजा दुर्योधन अथवा वे भीष्म आदि सभी महाधनुर्धर महारथी कभी धर्मयुद्धके द्वारा नहीं मारे जा सकते थे ॥ ६२ ॥
मयानेकैरुपायैस्तु मायायोगेन चासकृत् ।
हतास्ते सर्व एवाजौ भवतां हितमिच्छता ॥ ६३ ॥
‘ आपलोगोंका हित चाहते हुए मैंने ही बारंबार मायाका प्रयोग करके अनेक उपायोंसे युद्धस्थलमें उन सबका वध किया ॥ ६३ ॥
यदि नैवंविधं जातु कुर्यां जिह्ममहं रणे ।
कुतो वो विजयो भूयः कुतो राज्यं कुतो धनम् ॥ ६४ ॥
‘ यदि कदाचित् युद्धमें मैं इस प्रकार कपटपूर्ण कार्य नहीं करता तो फिर तुम्हें विजय कैसे प्राप्त होती, राज्य कैसे हाथमें आता और धन कैसे मिल सकता था? ॥ ६४ ॥
ते हि सर्वे महात्मानश्चत्वारोऽतिरथा भुवि ।
न शक्या धर्मतो हन्तुं लोकपालैरपि स्वयम् ॥ ६५ ॥
‘ भीष्म, द्रोण, कर्ण और भूरिश्रवा – ये चारों महामना इस भूतलपर अतिरथीके रूपमें विख्यात थे । साक्षात् लोकपाल भी धर्मयुद्ध करके उन सबको नहीं मार सकते थे ॥ ६५ ॥
तथैवायं गदापाणिर्धार्तराष्ट्रो गतक्लमः ।
पृष्ठ 2939
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
न शक्यो धर्मतो हन्तुं कालेनापीह दण्डिना ॥ ६६ ॥
‘ यह गदाधारी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन भी युद्धसे थकता नहीं था, इसे दण्डधारी काल भी धर्मानुकूल युद्धके द्वारा नहीं मार सकता था ॥ ६६ ॥
न च वो हृदि कर्तव्यं यदयं घातितो रिपुः ।
मिथ्यावध्यास्तथोपायैर्बहवः शत्रवोऽधिकाः ॥ ६७ ॥
‘ इस प्रकार जो यह शत्रु मारा गया है इसके लिये तुम्हें अपने मनमें विचार नहीं करना चाहिये? बहुतेरे अधिक शक्तिशाली शत्रु नाना प्रकारके उपायों और कूटनीतिके प्रयोगोंद्वारा मारनेके योग्य होते हैं ॥ ६७ ॥
पूर्वैरनुगतो मार्गो देवैरसुरघातिभिः ।
सद्भिश्चानुगतः पन्थाः स सर्वैरनुगम्यते ॥ ६८ ॥
' असुरोंका विनाश करनेवाले पूर्ववर्ती देवताओंने इस मार्गका आश्रय लिया है । श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे चले हैं, उसका सभी लोग अनुसरण करते हैं ॥ ६८ ॥
कृतकृत्याश्च सायाह्ने निवासं रोचयामहे ।
साश्वनागरथाः सर्वे विश्रमामो नराधिपाः ॥ ६ ९ ॥
‘ अब हमलोगोंका कार्य पूरा हो गया, अतः सायंकालके समय विश्राम करनेकी इच्छा हो रही है । राजाओ! हम सब लोग घोड़े, हाथी एवं रथसहित विश्राम करें' ॥ ६ ९ ॥
वासुदेववचः श्रुत्वा तदानीं पाण्डवैः सह ।
पञ्चाला भृशसंहृष्टा विनेदुः सिंहसंघवत् ॥ ७० ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उस समय पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल अत्यन्त प्रसन्न हुए और सिंहसमुदायके समान दहाड़ने लगे ॥ ७० ॥
ततः प्राध्मापयन् शङ्खान् पाञ्चजन्यं च माधवः ।
हृष्टा दुर्योधनं दृष्ट्वा निहतं पुरुषर्षभ ॥ ७१ ॥
पुरुषप्रवर! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग दुर्योधनको मारा गया देख
हर्षमें भरकर अपने - अपने शंख बजाने लगे । श्रीकृष्णने पांचजन्य शंख बजाया ॥
( देवदत्तं प्रहृष्टात्मा शङ्खप्रवरमर्जुनः ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः । प्रसन्नचित्त अर्जुनने देवदत्त नामक श्रेष्ठ शंखकी ध्वनि की । कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने
अनन्तविजय तथा भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनने पौण्ड्र नामक महान् शंख बजाया ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥
धृष्टद्युम्नस्तथा जैत्रं सात्यकिर्नन्दिवर्धनम् ।
तेषां नादेन महता शङ्खानां भरतर्षभ ॥
आपुपूरे नभः सर्वं पृथिवी च चचाल ह ॥
पृष्ठ 2940
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नकुल और सहदेवने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये । धृष्टद्युम्नने जैत्र और सात्यकिने नन्दिवर्धन नामक शंखकी ध्वनि फैलायी । भरतश्रेष्ठ! उन महान् शंखोंके शब्दसे सारा आकाश भर गया और धरती डोलने लगी ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
पाण्डुसैन्येष्ववाद्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥
अस्तुवन् पाण्डवानन्ये गीर्भिश्च स्तुतिमङ्गलैः । ) तत्पश्चात् पाण्डवसेनाओंमें शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाये जाने लगे । उन सबकी मिली- जुली आवाज बड़ी भयानक जान पड़ती थी । उस समय अन्य बहुत - से मनुष्य स्तुति एवं मंगलमय वचनोंद्वारा पाण्डवोंका स्तवन करने लगे । इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि कृष्णपाण्डवदुर्योधनसंवादे एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें श्रीकृष्ण, पाण्डव और दुर्योधनका संवादविषयक इकसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं । )