04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2991–3000

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2991–3000

पृष्ठ 2991

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तृतीयोऽध्यायः अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना संजय उवाच

कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम् ।

अश्वत्थामा महाराज दुःखशोकसमन्वितः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! कृपाचार्यका वचन धर्म और अर्थसे युक्त तथा मंगलकारी था । उसे सुनकर अश्वत्थामा दुःख और शोक में डूब गया ॥ १ ॥

दह्यमानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्निना यथा ।

क्रूरं मनस्ततः कृत्वा तावुभौ प्रत्यभाषत ॥ २ ॥

उसके हृदयमें शोककी आग प्रज्वलित हो उठी । वह उससे जलने लगा और अपने मनको कठोर बनाकर कृपाचार्य और कृतवर्मा दोनोंसे बोला- ॥ २ ॥

पुरुषे पुरुषे बुद्धिर्या या भवति शोभना ।

तुष्यन्ति च पृथक् सर्वे प्रज्ञया ते स्वया स्वया ॥ ३ ॥

' मामाजी! प्रत्येक मनुष्यमें जो पृथक् - पृथक् बुद्धि होती है, वही उसे सुन्दर जान पड़ती है । अपनी - अपनी उसी बुद्धिसे वे सब लोग अलग- अलग संतुष्ट रहते हैं ॥ ३ ॥

सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं बुद्धिमत्तरम् ।

सर्वस्यात्मा बहुमतः सर्वात्मानं प्रशंसति ॥ ४ ॥

‘ सभी लोग अपने - आपको अधिक बुद्धिमान् समझते हैं । सबको अपनी ही बुद्धि अधिक महत्त्वपूर्ण जान पड़ती है और सब लोग अपनी ही बुद्धिकी प्रशंसा करते हैं ॥

सर्वस्य हि स्वका प्रज्ञा साधुवादे प्रतिष्ठिता ।

परबुद्धिं च निन्दन्ति स्वां प्रशंसन्ति चासकृत् ॥ ५ ॥

' सबकी दृष्टिमें अपनी ही बुद्धि धन्यवाद पानेके योग्य ऊँचे पदपर प्रतिष्ठित जान पड़ती है । सब लोग दूसरोंकी बुद्धिकी निन्दा और अपनी बुद्धिकी बारंबार सराहना करते हैं ॥ ५ ॥

कारणान्तरयोगेन योगे येषां समागतिः ।

अन्योन्येन च तुष्यन्ति बहु मन्यन्ति चासकृत् ॥ ६ ॥

' यदि किन्हीं दूसरे कारणोंके संयोगसे एक समुदायमें जिनके -जिनके विचार परस्पर मिल जाते हैं, वे एक - दूसरे से संतुष्ट होते हैं और बारंबार एक- दूसरेके प्रति अधिक सम्मान प्रकट करते हैं ॥ ६ ॥

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तस्यैव तु मनुष्यस्य सा सा बुद्धिस्तदा तदा ।

कालयोगे विपर्यासं प्राप्यान्योन्यं विपद्यते ॥ ७ ॥

‘ किंतु समयके फेरसे उसी मनुष्यकी वही - वही बुद्धि विपरीत होकर परस्पर विरुद्ध हो जाती है ॥ ७ ॥

विचित्रत्वात् तु चित्तानां मनुष्याणां विशेषतः ।

चित्तवैक्लव्यमासाद्य सा सा बुद्धिः प्रजायते ॥ ८ ॥

‘ सभी प्राणियोंके विशेषतः मनुष्योंके चित्त एक- दूसरेसे विलक्षण तथा भिन्न -भिन्न प्रकारके होते हैं; अतः विभिन्न घटनाओंके कारण जो चित्तमें व्याकुलता होती है, उसका आश्रय लेकर भिन्न - भिन्न प्रकारकी बुद्धि पैदा हो जाती है ॥ ८ ॥

यथा हि वैद्यः कुशलो ज्ञात्वा व्याधिं यथाविधि ।

भैषज्यं कुरुते योगात् प्रशमार्थमिति प्रभो ॥ ९ ॥

एवं कार्यस्य योगार्थं बुद्धिं कुर्वन्ति मानवाः ।

प्रज्ञया हि स्वया युक्तास्तां च निन्दन्ति मानवाः ॥ १० ॥

'प्रभो! जैसे कुशल वैद्य विधिपूर्वक रोगकी जानकारी प्राप्त करके उसकी शान्तिके लिये योग्यतानुसार औषध प्रदान करता है, इसी प्रकार मनुष्य कार्यकी सिद्धिके लिये अपनी विवेकशक्तिसे विचार करके किसी निश्चयात्मक बुद्धिका आश्रय लेते हैं; परंतु दूसरे लोग उसकी निन्दा करने लगते हैं ॥ ९ -१० ॥

अन्यया यौवने मर्त्यो बुद्धया भवति मोहितः ।

मध्येऽन्यया जरायां तु सोऽन्यां रोचयते मतिम् ॥ ११ ॥

' मनुष्य जवानीमें किसी और ही प्रकारकी बुद्धिसे मोहित होता है, मध्यम अवस्थामें दूसरी ही बुद्धिसे वह प्रभावित होता है; किंतु वृद्धावस्थामें उसे अन्य प्रकारकी ही बुद्धि अच्छी लगने लगती है ॥ ११ ॥

व्यसनं वा महाघोरं समृद्धिं चापि तादृशीम् ।

अवाप्य पुरुषो भोज कुरुते बुद्धिवैकृतम् ॥ १२ ॥

‘ भोज *! मनुष्य जब किसी अत्यन्त घोर संकटमें पड़ जाता है अथवा उसे किसी महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति हो जाती है, तब उस संकट और समृद्धिको पाकर उसकी बुद्धिमें क्रमशः शोक एवं हर्षरूपी विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १२

एकस्मिन्नेव पुरुषे सा सा बुद्धिस्तदा तदा ।

भवत्यकृतधर्मत्वात् सा तस्यैव न रोचते ॥ १३ ॥

‘ उस विकारके कारण एक ही पुरुषमें उसी समय भिन्न -भिन्न प्रकारकी बुद्धि ( विचारधारा) उत्पन्न हो जाती है; परंतु अवसरके अनुरूप न होनेपर उसकी अपनी ही बुद्धि उसीके लिये अरुचिकर हो जाती है ॥ निश्चित्य तु यथाप्रज्ञं यां मतिं साधु पश्यति ।

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तया प्रकुरुते भावं सा तस्योद्योगकारिका ॥ १४ ॥

' मनुष्य अपने विवेकके अनुसार किसी निश्चयपर पहुँचकर जिस बुद्धिको अच्छा समझता है, उसीके द्वारा कार्य- सिद्धिकी चेष्टा करता है । वही बुद्धि उसके उद्योगको सफल बनानेवाली होती है ॥ १४ ॥

सर्वो हि पुरुषो भोज साध्वेतदिति निश्चितः ।

कर्तुमारभते प्रीतो मारणादिषु कर्मसु ॥ १५ ॥

'कृतवर्मन्! सभी मनुष्य 'यह अच्छा कार्य है ' ऐसा निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक कार्य आरम्भ करते हैं और हिंसा आदि कर्मोंमें भी लग जाते हैं ॥ १५ ॥

सर्वे हि बुद्धिमाज्ञाय प्रज्ञां वापि स्वकां नराः ।

चेष्टन्ते विविधां चेष्टां हितमित्येव जानते ॥ १६ ॥

' सब लोग अपनी ही बुद्धि अथवा विवेकका आश्रय लेकर तरह- तरहकी चेष्टाएँ करते हैं और उन्हें अपने लिये हितकर ही समझते हैं ॥ १६ ॥

उपजाता व्यसनजा येयमद्य मतिर्मम ।

युवयोस्तां प्रवक्ष्यामि मम शोकविनाशिनीम् ॥ १७ ॥

‘ आज संकटमें पड़नेसे मेरे अंदर जो बुद्धि पैदा हुई है, उसे मैं आप दोनोंको बता रहा हूँ । वह मेरे शोकका विनाश करनेवाली है ॥ १७ ॥

प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा कर्म तासु विधाय च ।

वर्णे वर्णे समाधत्ते ह्येकैकं गुणभाग् गुणम् ॥ १८ ॥

‘ गुणवान् प्रजापति ब्रह्माजी प्रजाओंकी सृष्टि करके उनके लिये कर्मका विधान करते हैं और प्रत्येक वर्णमें एक-एक विशेष गुणकी स्थापना कर देते हैं ॥ १८ ॥

ब्राह्मणे वेदमग्रयं तु क्षत्रिये तेज उत्तमम् ।

दाक्ष्यं वैश्ये च शूद्रे च सर्ववर्णानुकूलताम् ॥ १ ९ ॥

‘ वे ब्राह्मणमें सर्वोत्तम वेद, क्षत्रियमें उत्तम तेज, वैश्यमें व्यापारकुशलता तथा शूद्रमें सब वर्णोंके अनुकूल चलनेकी वृत्तिको स्थापित कर देते हैं ॥ १ ९ ॥

अदान्तो ब्राह्मणोऽसाधुर्निस्तेजाः क्षत्रियोऽधमः ।

अदक्षो निन्द्यते वैश्यः शूद्रश्च प्रतिकूलवान् ॥ २० ॥

' मन और इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला ब्राह्मण अच्छा नहीं माना जाता । तेजोहीन क्षत्रिय अधम समझा जाता है, जो व्यापारमें कुशल नहीं है, उस वैश्यकी निन्दा की जाती है और अन्य वर्णोंके प्रतिकूल चलनेवाले शूद्रको भी निन्दनीय माना जाता है ॥ २० ॥

सोऽस्मि जातः कुले श्रेष्ठे ब्राह्मणानां सुपूजिते ।

मन्दभाग्यतयास्म्येतं क्षत्रधर्ममनुष्ठितः ॥ २१ ॥

‘ मैं ब्राह्मणोंके परम सम्मानित श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, तथापि दुर्भाग्यके कारण इस क्षत्रिय - धर्मका अनुष्ठान करता हूँ ॥ २१ ॥

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क्षत्रधर्मं विदित्वाहं यदि ब्राह्मण्यमाश्रितः ।

प्रकुर्यां सुमहत् कर्म न मे तत् साधुसम्मतम् ॥ २२ ॥

' यदि क्षत्रियके धर्मको जानकर भी मैं ब्राह्मणत्वका सहारा लेकर कोई दूसरा महान् कर्म करने लगूँ तो सत्पुरुषोंके समाजमें मेरे उस कार्यका सम्मान नहीं होगा ॥

धारयंश्च धनुर्दिव्यं दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे ।

पितरं निहतं दृष्ट्वा किं नु वक्ष्यामि संसदि ॥ २३ ॥

मैं दिव्य धनुष और दिव्य अस्त्रोंको धारण करता हूँ तो भी युद्धमें अपने पिताको अन्यायपूर्वक मारा गया देखकर यदि उसका बदला न लूँ तो वीरोंकी सभामें क्या कहूँगा? ॥

सोऽहमद्य यथाकामं क्षत्रधर्ममुपास्य तम् ।

गन्तास्मि पदवीं राज्ञः पितुश्चापि महात्मनः ॥ २४ ॥

‘ अतः आज मैं अपनी रुचिके अनुसार उस क्षत्रियधर्मका सहारा लेकर अपने महात्मा पिता तथा राजा दुर्योधनके पथका अनुसरण करूँगा ॥ २४ ॥

अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विश्वस्ता जितकाशिनः ।

विमुक्तयुग्यकवचा हर्षेण च समन्विताः ॥ २५ ॥

जयं मत्वाऽऽत्मनश्चैव श्रान्ता व्यायामकर्शिताः । ‘ आज अपनी जीत हुई जान विजयसे सुशोभित होनेवाले पांचाल योद्धा बड़े हर्षमें भरकर कवच उतार, जूओंमें जुते हुए घोड़ोंको खोलकर बेखटके सो रहे होंगे । वे थके तो होंगे ही, विशेष परिश्रमके कारण चूर- चूर हो गये होंगे ॥ तेषां निशि प्रसुप्तानां सुस्थानां शिबिरे स्वके ॥ २६ ॥

अवस्कन्दं करिष्यामि शिबिरस्याद्य दुष्करम् । ' रातमें सुस्थिर चित्तसे सोये हुए उन पांचालोंके अपने ही शिविरमें घुसकर मैं उन सबका संहार कर डालूँगा । समूचे शिविरका ऐसा विनाश करूँगा जो दूसरोंके लिये दुष्कर है ॥ तानवस्कन्द्य शिबिरे प्रेतभूतविचेतसः ॥ २७ ॥

सूदयिष्यामि विक्रम्य मघवानिव दानवान् । ‘जैसे इन्द्र दानवोंपर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार मैं भी शिविरमें मुर्दोंके समान अचेत पड़े हुए पांचालोंकी छातीपर चढ़कर उन्हें पराक्रमपूर्वक मार डालूँगा ॥ २७३ ॥

अद्य तान् सहितान् सर्वान् धृष्टद्युम्नपुरोगमान् ॥ २८ ॥

सूदयिष्यामि विक्रम्य कक्षं दीप्त इवानलः ।

निहत्य चैव पञ्चालान् शान्तिं लब्धास्मि सत्तम ॥ २ ९ ॥

‘साधुशिरोमणे! जैसे जलती हुई आग सूखे जंगल या तिनकोंकी राशिको जला डालती है, उसी प्रकार आज मैं एक साथ सोये हुए धृष्टद्युम्न आदि समस्त पांचालोंपर आक्रमण

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करके उन्हें मौतके घाट उतार दूँगा । उनका संहार कर लेनेपर ही मुझे शान्ति मिलेगी ॥

पञ्चालेषु भविष्यामि सूदयन्नद्य संयुगे ।

पिनाकपाणिः संक्रुद्धः स्वयं रुद्रः पशुष्विव ॥ ३० ॥

‘ जैसे प्रलयके समय क्रोधमें भरे हुए साक्षात् पिनाकधारी रुद्र समस्त पशुओं (प्राणियों) -पर आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार आज युद्धमें मैं पांचालोंका विनाश करता हुआ उनके लिये कालरूप हो जाऊँगा ॥ ३० ॥

अद्याहं सर्वपञ्चालान् निहत्य च निकृत्य च ।

अर्दयिष्यामि संहृष्टो रणे पाण्डुसुतांस्तथा ॥ ३१ ॥

‘ आज मैं रणभूमिमें समस्त पांचालोंको मारकर उनके टुकड़े -टुकड़े करके हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न हो पाण्डवोंको भी कुचल डालूँगा ॥ ३१ ॥

अद्याहं सर्वपञ्चालैः कृत्वा भूमिं शरीरिणीम् ।

प्रहृत्यैकैकशस्तेषु भविष्याम्यनृणः पितुः ॥ ३२ ॥

‘ आज समस्त पांचालोंके शरीरोंसे रणभूमिको शरीरधारिणी बनाकर एक-एक पांचालपर भरपूर प्रहार करके मैं अपने पिताके ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा ॥ ३२ ॥

दुर्योधनस्य कर्णस्य भीष्मसैन्धवयोरपि ।

गमयिष्यामि पञ्चालान् पदवीमद्य दुर्गमाम् ॥ ३३ ॥

‘ आज पांचालोंको दुर्योधन, कर्ण, भीष्म तथा जयद्रथके दुर्गम मार्गपर भेजकर छोडूंगा ॥ ३३ ॥

अद्य पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नस्य वै निशि ।

नचिरात् प्रमथिष्यामि पशोरिव शिरो बलात् ॥ ३४ ॥

' आज रातमें मैं शीघ्र ही पांचालराज धृष्टद्युम्नके सिरको पशुके मस्तककी भाँति बलपूर्वक मरोड़ डालूँगा ॥

अद्य पाञ्चालपाण्डूनां शयितानात्मजान् निशि ।

खड्गेन निशितेनाजौ प्रमथिष्यामि गौतम ॥ ३५ ॥

‘ गौतम! आज रातके युद्धमें सोये हुए पांचालों और पाण्डवोंके पुत्रोंको भी मैं अपनी तीखी तलवारसे टूक- टूक कर दूँगा ॥ ३५ ॥

अद्य पाञ्चालसेनां तां निहत्य निशि सौप्तिके ।

कृतकृत्यः सुखी चैव भविष्यामि महामते ॥ ३६ ॥

‘ महामते! आज रातको सोते समय उस पांचाल- सेनाका वध करके मैं कृतकृत्य एवं सुखी हो जाऊँगा ' ॥ इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्राणायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

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इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक तीसरा अ हुआ ॥ ३ ॥

* भोजका अर्थ है भोजवंशी कृतवर्मा ।

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चतुर्थोऽध्यायः कृपाचार्यका कल प्रातःकाल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना कृप उवाच

दिष्ट्या ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत ।

न त्वां वारयितुं शक्तो वज्रपाणिरपि स्वयम् ॥ १ ॥

कृपाचार्य बोले — तात! तुम अपनी टेकसे टलने वाले नहीं हो, सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे मनमें बदला लेनेका दृढ़ विचार उत्पन्न हुआ । तुम्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इस कार्यसे रोक नहीं सकते ॥ १ ॥

अनुयास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ ।

अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वजः ॥ २ ॥

आज रातमें कवच और ध्वजा खोलकर विश्राम करो । कल सबेरे हम दोनों एक साथ होकर तुम्हारे पीछे - पीछे चलेंगे ॥ २ ॥

अहं त्वामनुयास्यामि कृतवर्मा च सात्वतः ।

परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय दंशितौ ॥ ३ ॥

जब तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ोगे, उस समय मैं और सात्वतवंशी कृतवर्मा दोनों ही कवच धारण करके रथोंपर आरूढ़ हो तुम्हारे साथ चलेंगे ॥ ३ ॥

आवाभ्यां सहितः शत्रून् श्वो निहन्ता समागमे ।

विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पञ्चालान् सपदानुगान् ॥ ४ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! कल सबेरेके संग्राममें हम दोनोंके साथ रहकर तुम अपने शत्रु पांचालों और उनके सेवकोंको बलपूर्वक मार डालना ॥ ४ ॥

शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विश्रमस्व निशामिमाम् ।

चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम् ॥ ५ ॥

तात! तुम पराक्रम दिखाकर शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हो, अतः इस रातमें विश्राम कर लो । तुम्हें जागते हुए बहुत देर हो गयी है, अब इस रातमें सो लो ॥ ५ ॥

विश्रान्तश्च विनिद्रश्च स्वस्थचित्तश्च मानद ।

समेत्य समरे शत्रून् वधिष्यसि न संशयः ॥ ६ ॥

मानद! थकावट दूर करके नींद पूरी कर लेनेसे तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा । फिर तुम समरभूमिमें जाकर शत्रुओंका वध कर सकोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥

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न हि त्वां रथिनां श्रेष्ठं प्रगृहीतवरायुधम् ।

जेतुमुत्सहते शश्वदपि देवेषु वासवः ॥ ७ ॥

तुम रथियोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अपने हाथमें उत्तम आयुध ले रखा है । तुम्हें देवताओंके राजा इन्द्र भी कभी जीतनेका साहस नहीं कर सकते हैं ॥ ७ ॥

कृपेण सहितं यान्तं गुप्तं च कृतवर्मणा ।

को द्रौणिं युधि संरब्धं योधयेदपि देवराट् ॥ ८ ॥

जब कृतवर्मासे सुरक्षित हो द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मुझ कृपाचार्यके साथ कुपित होकर युद्धके लिये प्रस्थान करेगा, उस समय कौन वीर, वह देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उसका सामना कर सकता है? ॥ ८ ॥

ते वयं निशि विश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वराः ।

प्रभातायां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान् ॥ ९ ॥

अतः हमलोग रातमें विश्राम करके निद्रारहित और विगतज्वर हो प्रातःकाल अपने शत्रुओंका संहार करेंगे ॥ ९ ॥

तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशयः ।

सात्वतोऽपि महेष्वासो नित्यं युद्धेषु कोविदः ॥ १० ॥

इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे और मेरे पास भी दिव्यास्त्र हैं तथा महाधनुर्धर कृतवर्मा भी युद्ध करनेकी कलामें सदा ही कुशल हैं ॥ १० ॥

ते वयं सहितास्तात सर्वान् शत्रून् समागतान् ।

प्रसह्य समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्कलाम् ॥ ११ ॥

तात! हम सब लोग एक साथ होकर समरांगणमें सामने आये हुए समस्त शत्रुओंका संहार करके अत्यन्त हर्षका अनुभव करेंगे ॥ ११ ॥

विश्रमस्व त्वमव्यग्रः स्वप चेमां निशां सुखम् ।

अहं च कृतवर्मा च त्वां प्रयान्तं नरोत्तमम् ॥ १२ ॥

अनुयास्याव सहितौ धन्विनौ परतापनौ ।

रथिनं त्वरया यान्तं रथमास्थाय दंशितौ ॥ १३ ॥

तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो । कल सबेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे । बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आरूढ़ हो यात्रा करेंगे ॥ १२-१३ ॥

स गत्वा शिबिरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे ।

ततः कर्तासि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत् ॥ १४ ॥

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उस अवस्थामें शत्रुओंके शिविरमें जाकर युद्धके लिये अपने नामकी घोषणा करके सामने आकर जूझते हुए उन शत्रुओंका बड़ा भारी संहार मचा देना ॥ १४ ॥

कृत्वा च कदनं तेषां प्रभाते विमलेऽहनि ।

विहरस्व यथा शक्रः सूदयित्वा महासुरान् ॥ १५ ॥

जैसे इन्द्र बड़े - बड़े असुरोंका विनाश करके सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार तुम भी कल प्रातःकाल निर्मल दिन निकल आनेपर उन शत्रुओंका विनाश करके इच्छानुसार विहार करो ॥ १५ ॥

त्वं हि शक्तो रणे जेतुं पञ्चालानां वरूथिनीम् ।

दैत्यसेनामिव क्रुद्धः सर्वदानवसूदनः ॥ १६ ॥

जैसे सम्पूर्ण दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्र कुपित होनेपर दैत्योंकी सेनाको जीत लेते हैं, उसी प्रकार तुम भी रणभूमिमें पांचालोंकी विशाल वाहिनीपर विजय पानेमें समर्थ हो ॥ १६ ॥

मया त्वां सहितं संख्ये गुप्तं च कृतवर्मणा ।

न सहेत विभुः साक्षाद् वज्रपाणिरपि स्वयम् ॥ १७ ॥

युद्धस्थलमें जब तुम मेरे साथ खड़े होओगे और कृतवर्मा तुम्हारी रक्षामें लगे होंगे, उस समय हाथमें वज्र लिये हुए साक्षात् देवसम्राट् इन्द्र भी तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे ॥ १७ ॥

न चाहं समरे तात कृतवर्मा न चैव हि ।

अनिर्जित्य रणे पाण्डून् न च यास्यामि कर्हिचित् ॥ १८ ॥

तात! समरांगणमें मैं और कृतवर्मा पाण्डवोंको परास्त किये बिना कभी पीछे नहीं हटेंगे ॥ १८ ॥

हत्वा च समरे क्रुद्धान् पञ्चालान् पाण्डुभिः सह ।

निवर्तिष्यामहे सर्वे हता वा स्वर्गगा वयम् ॥ १ ९ ॥

समरांगणमें कुपित हुए पांचालोंको पाण्डवोंसहित मारकर ही हम सब लोग पीछे हटेंगे अथवा स्वयं ही मारे जाकर स्वर्गलोककी राह लेंगे ॥ १ ९ ॥

सर्वोपायैः सहायास्ते प्रभाते वयमाहवे ।

सत्यमेतन्महाबाहो प्रब्रवीमि तवानघ ॥ २० ॥

निष्पाप महाबाहु वीर! कल प्रातःकाल हमलोग सभी उपायोंसे युद्धमें तुम्हारे सहायक होंगे । मैं तुमसे यह सच्ची बात कह रहा हूँ ॥ २० ॥

एवमुक्तस्ततो द्रौणिर्मातुलेन हितं वचः ।

अब्रवीन्मातुलं राजन् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २१ ॥

राजन्! मामाके इस प्रकार हितकारक वचन कहनेपर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने क्रोधसे लाल आँखें करके उनसे कहा- ॥ २१ ॥

आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च ।

पृष्ठ 3000

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अर्थांश्चिन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः ।

तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेऽद्य चतुष्टयम् ॥ २२ ॥

' मामाजी! जो मनुष्य शोकसे आतुर हो, अमर्षसे भरा हुआ हो, नाना प्रकारके कार्योंकी चिन्ता कर रहा हो अथवा किसी कामनामें आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है? देखिये, ये चारों बातें आज मेरे ऊपर एक साथ आ पड़ी हैं ॥ २२ ॥

यस्य भागश्चतुर्थो मे स्वप्नमह्नाय नाशयेत् ।

किं नाम दुःखं लोकेऽस्मिन् पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ २३ ॥

हृदयं निर्दहन्मेऽद्य रात्र्यहानि न शाम्यति । ' इन चारोंका एक चौथाई भाग जो क्रोध है, वही मेरी निद्राको तत्काल नष्ट किये देता है । अपने पिताके वधकी घटनाका बारंबार स्मरण करके इस संसारमें कौन- सा ऐसा दुःख है, जिसका मुझे अनुभव न होता हो । वह दुःखकी आग रात - दिन मेरे हृदयको जलाती हुई अबतक बुझ नहीं पा रही है ॥ २३३ ॥

यथा च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः ॥ २४ ॥

प्रत्यक्षमपि ते सर्वं तन्मे मर्माणि कृन्तति ।

कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तमपि जीवति ॥ २५ ॥

‘ इन पापियोंने विशेषतः मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है । वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है । ऐसी अवस्थामें मेरे जैसा वीर इस जगत्में दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है? ॥ २४-२५ ॥

द्रोणो हतेति यद् वाचः पञ्चालानां शृणोम्यहम् ।

धृष्टद्युम्नमहत्वा तु नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २६ ॥

‘ द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ' यह बात जब मैं पांचालोंके मुखसे सुनता आ रहा हूँ, तब धृष्टद्युम्नका वध किये बिना जीवित नहीं रह सकता ॥

स मे पितुर्वधाद् वध्यः पञ्चाला ये च संगताः ।

विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मया श्रुतः ॥ २७ ॥

स पुनर्हृदयं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् । 'धृष्टद्युम्न तो पिताजीका वध करनेके कारण मेरा वध्य होगा और उसके संगी - साथी जो पांचाल हैं, वे भी उसका साथ देनेके कारण मारे जायँगे । इधर जिसकी जाँघें तोड़ डाली गयी हैं, उस राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने अपने कानों सुना है, वह किस क्रूर मनुष्यके भी हृदयको शोक- दग्ध नहीं कर देगा? ॥ २७ ॥

कस्य ह्यकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत् ॥ २८ ॥

नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृग् वचः पुनः । ' टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनकी वैसी बात पुनः सुनकर किस निष्ठुरके भी नेत्रोंसे आँसू नहीं बह चलेगा? ॥ २८३ ॥