04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 3071–3080
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3071–3080
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एतावदुक्त्वा द्रौणिर्मां युग्यानश्वान् धनानि च ।
आदायोपययौ काले रत्नानि विविधानि च ॥ ४० ॥
'मुझसे इतना ही कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा रथमें जोतने योग्य घोड़े, धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर वहाँसे यथासमय लौट गया ॥ ४० ॥
स संरम्भी दुरात्मा च चपलः क्रूर एव च ।
वेद चास्त्रं ब्रह्मशिरस्तस्माद् रक्ष्यो वृकोदरः ॥ ४१ ॥
'वह क्रोधी, दुष्टात्मा, चपल और क्रूर है । साथ ही उसे ब्रह्मास्त्रका भी ज्ञान है; अतः उससे भीमसेनकी रक्षा करनी चाहिये ' ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
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त्रयोदशोऽध्यायः श्रीकृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठिरका भीमसेनके पीछे जाना, भीमका गंगातटपर पहुँचकर अश्वत्थामाको ललकारना और अश्वत्थामाके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा युधां श्रेष्ठः सर्वयादवनन्दनः ।
सर्वायुधवरोपेतमारुरोह रथोत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! सम्पूर्ण यादवकुलको आनन्दित करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण ऐसा कहकर समस्त श्रेष्ठ आयुधोंसे सम्पन्न उत्तम रथपर आरूढ़ हुए ॥ १ ॥
युक्तं परमकाम्बोजैस्तुरगैर्हेममालिभिः ।
आदित्योदयवर्णस्य धुरं रथवरस्य तु ॥ २ ॥
दक्षिणामवहच्छेब्यः सुग्रीवः सव्यतोऽभवत् ।
पार्ष्णिवाहौ तु तस्यास्तां मेघपुष्पबलाहकौ ॥ ३ ॥
उसमें सोनेकी माला पहने हुए अच्छी जातिके काबुली घोड़े जुते हुए थे । उस श्रेष्ठ रथकी कान्ति उदयकालीन सूर्यके समान अरुण थी । उसकी दाहिनी धुरीका बोझ शैव्य ढो रहा था और बायींका सुग्रीव । उन दोनोंके पार्श्वभागमें क्रमशः मेघपुष्प और बलाहक जुते हुए थे ॥ २-३ ॥
विश्वकर्मकृता दिव्या रत्नधातुविभूषिता ।
उच्छ्रितेव रथे माया ध्वजयष्टिरदृश्यत ॥ ४ ॥
उस रथपर विश्वकर्माद्वारा निर्मित तथा रत्नमय धातुओंसे विभूषित दिव्य ध्वजा दिखायी दे रही थी, जो ऊँचे उठी हुई मायाके समान प्रतीत होती थी ॥ ४ ॥
वैनतेयः स्थितस्तस्यां प्रभामण्डलरश्मिवान् ।
तस्य सत्यवतः केतुर्भुजगारिरदृश्यत ॥ ५ ॥
उस ध्वजापर प्रभापुंज एवं किरणोंसे सुशोभित विनतानन्दन गरुड़ विराज रहे थे । सर्पोंके शत्रु गरुड़ सत्यवान् श्रीकृष्णके रथकी पताकाके रूपमें दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ५ ॥
अथारोहद्धृषीकेशः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
अर्जुनः सत्यकर्मा च कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण पहले उस रथपर सवार हुए । तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी अर्जुन तथा कुरुराज युधिष्ठिर उस रथपर बैठे ॥ ६ ॥
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अशोभेतां महात्मानौ दाशार्हमभितः स्थितौ ।
रथस्थं शार्ङ्गधन्वानमश्विनाविव वासवम् ॥ ७ ॥
वे दोनों महात्मा पाण्डव रथपर स्थित हुए शार्ङ्ग धनुषधारी दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णके समीप विराजमान हो इन्द्रके पास बैठे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥
तावुपारोप्य दाशार्हः स्यन्दनं लोकपूजितम् ।
प्रतोदेन जवोपेतान् परमाश्वानचोदयत् ॥ ८ ॥
उन दोनों भाइयोंको उस लोकपूजित रथपर चढ़ाकर दशार्हवंशी श्रीकृष्णने वेगशाली उत्तम अश्वोंको चाबुकसे हाँका ॥ ८ ॥
ते हयाः सहसोत्पेतुर्गृहीत्वा स्यन्दनोत्तमम् ।
आस्थितं पाण्डवेयाभ्यां यदूनामृषभेण च ॥ ९ ॥
वे घोड़े दोनों पाण्डवों तथा यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी सवारीमें आये हुए उस उत्तम रथको लेकर सहसा उड़ चले ॥ ९ ॥
वहतां शार्ङ्गधन्वानमश्वानां शीघ्रगामिनाम् ।
प्रादुरासीन्महान् शब्दः पक्षिणां पततामिव ॥ १० ॥
शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णकी सवारी ढोते हुए उन शीघ्रगामी अश्वोंका महान् शब्द उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रकट हो रहा था ॥ १० ॥
ते समार्च्छन्नरव्याघ्राः क्षणेन भरतर्षभ ।
भीमसेनं महेष्वासं समनुद्रुत्य वेगिताः ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे तीनों नरश्रेष्ठ बड़े वेगसे पीछे- पीछे दौड़कर क्षणभरमें महाधनुर्धर भीमसेनके पास जा पहुँचे ॥ ११ ॥
क्रोधदीप्तं तु कौन्तेयं द्विषदर्थे समुद्यतम् ।
नाशक्नुवन् वारयितुं समेत्यापि महारथाः ॥ १२ ॥
इस समय कुन्तीकुमार भीमसेन क्रोधसे प्रज्वलित हो शत्रुका संहार करनेके लिये तुले हुए थे । इसलिये वे तीनों महारथी उनसे मिलकर भी उन्हें रोक न सके ॥ १२ ॥
स तेषां प्रेक्षतामेव श्रीमतां दृढधन्विनाम् ।
ययौ भागीरथीतीरं हरिभिर्भृशवेगितैः ॥ १३ ॥
यत्र स्म श्रूयते द्रौणिः पुत्रहन्ता महात्मनाम् । उन सुदृढ़ धनुर्धर तेजस्वी वीरोंके देखते - देखते वे अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा भागीरथीके तटपर जा पहुँचे, जहाँ उन महात्मा पाण्डवोंके पुत्रोंका वध करनेवाला अश्वत्थामा बैठा सुना गया था ॥ १३३ ॥
स ददर्श महात्मानमुदकान्ते यशस्विनम् ॥ १४ ॥
कृष्णद्वैपायनं व्यासमासीनमृषिभिः सह ।
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तं चैव क्रूरकर्माणं घृताक्तं कुशचीरिणम् ॥ १५ ॥
रजसा ध्वस्तमासीनं ददर्श द्रौणिमन्तिके । वहाँ जाकर उन्होंने गंगाजीके जलके किनारे परम यशस्वी महात्मा श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासको अनेकों महर्षियोंके साथ बैठे देखा । उनके पास ही वह क्रूरकर्मा द्रोणपुत्र भी बैठा दिखायी दिया । उसने अपने शरीरमें घी लगाकर कुशका चीर पहन रखा था । उसके सारे अंगोंपर धूल छा रही थी ॥ १४-१५३ ॥ तमभ्यधावत् कौन्तेयः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ १६ ॥
भीमसेनो महाबाहुस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । कुन्तीकुमार महाबाहु भीमसेन बाणसहित धनुष लिये उसकी ओर दौड़े और बोले ——अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ १६३ ॥
स दृष्ट्वा भीमधन्वानं प्रगृहीतशरासनम् ॥ १७ ॥
भ्रातरौ पृष्ठतश्चास्य जनार्दनरथे स्थितौ ।
व्यथितात्माभवद् द्रौणिः प्राप्तं चेदममन्यत ॥ १८ ॥
अश्वत्थामाने देखा कि भयंकर धनुर्धर भीमसेन हाथमें धनुष लिये आ रहे हैं । उनके पीछे श्रीकृष्णके रथपर बैठे हुए दो भाई और हैं । यह सब देखकर द्रोणकुमारके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। उस घबराहटमें उसने यही करना उचित समझा ॥ १७-१८ ॥
स तद् दिव्यमदीनात्मा परमास्त्रमचिन्तयत् ।
जग्राह च स चैषीकां द्रौणिः सव्येन पाणिना ॥ १ ९ ॥
उदारहृदय अश्वत्थामाने उस दिव्य एवं उत्तम अस्त्रका चिन्तन किया । साथ ही बायें हाथसे एक सींक उठा ली ॥ १ ९ ॥
स तामापदमासाद्य दिव्यमस्त्रमुदैरयत् ।
अमृष्यमाणस्तान् शूरान् दिव्यायुधवरान् स्थितान् ॥ २० ॥
अपाण्डवायेति रुषा व्यसृजद् दारुणं वचः । दिव्य आयुध धारण करके खड़े हुए उन शूरवीरोंका आना वह सहन न कर सका । उस आपत्तिमें पड़कर उसने रोषपूर्वक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और मुखसे कठोर वचन निकाला कि ‘ यह अस्त्र समस्त पाण्डवोंका विनाश कर डाले ' ॥ २०३ ॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूल द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ॥ २१ ॥
सर्वलोकप्रमोहार्थं तदस्त्रं प्रमुमोच ह । नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्रने सम्पूर्ण लोकोंको मोहमें डालनेके लिये वह अस्त्र छोड़ दिया ॥ २१ ॥
ततस्तस्यामिषीकायां पावकः समजायत ।
प्रधक्ष्यन्निव लोकांस्त्रीन् कालान्तकयमोपमः ॥ २२ ॥
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तदनन्तर उस सींकमें काल, अन्तक और यमराजके समान भयंकर आग प्रकट हो गयी । उस समय ऐसा जान पड़ा कि वह अग्नि तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर डालेगी ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि ब्रह्मशिरोऽस्त्रत्यागे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अश्वत्थामाके द्वाराब्रह्मास्त्रका प्रयोगविषयक तेरहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३ ॥
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चतुर्दशोऽध्यायः अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण करनेके लिये अर्जुनके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग एवं वेदव्यासजी और देवर्षि नारदका प्रकट होना वैशम्पायन उवाच
इङ्गितेनैव दाशार्हस्तमभिप्रायमादितः ।
द्रौणेर्बुद्ध्वा महाबाहुरर्जुनं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! दशार्हनन्दन महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण अश्वत्थामाकी चेष्टासे ही उसके मनका भाव पहले ही ताड़ गये थे । उन्होंने अर्जुनसे कहा — ||
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अश्वत्थामा एवं अर्जुनके छोड़े हुए ब्रह्मास्त्रोंको शान्त करनेके लिये नारदजी और व्यासजीका आगमन
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अर्जुनार्जुन यद्दिव्यमस्त्रं ते हृदि वर्तते ।
द्रोणोपदिष्टं तस्यायं कालः सम्प्रति पाण्डव ॥ २ ॥
‘ अर्जुन! अर्जुन! पाण्डुनन्दन! आचार्य द्रोणका उपदेश किया हुआ जो दिव्य अस्त्र तुम्हारे हृदयमें विद्यमान है, उसके प्रयोगका अब यह समय आ गया है ॥ २ ॥
भ्रातॄणामात्मनश्चैव परित्राणाय भारत ।
विसृजैतत् त्वमप्याजावस्त्रमस्त्रनिवारणम् ॥ ३ ॥
‘ भरतनन्दन! भाइयोंकी और अपनी रक्षाके लिये तुम भी युद्धमें इस ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो । अश्वत्थामाके अस्त्रका निवारण इसीके द्वारा हो सकता है ' ॥ ३ ॥
केशवेनैवमुक्तोऽथ पाण्डवः परवीरहा ।
अवातरद् रथात् तूर्णं प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुपुत्र अर्जुन धनुष-बाण हाथमें लेकर तुरंत ही रथसे नीचे उतर गये ॥ ४ ॥
पूर्वमाचार्यपुत्राय ततोऽनन्तरमात्मने ।
भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्यः स्वस्तीत्युक्त्वा परंतपः ॥ ५ ॥
देवताभ्यो नमस्कृत्य गुरुभ्यश्चैव सर्वशः ।
उत्ससर्ज शिवं ध्यायन्नस्त्रमस्त्रेण शाम्यताम् ॥ ६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने सबसे पहले यह कहा कि ' आचार्यपुत्रका कल्याण हो ' । तत्पश्चात् अपने और सम्पूर्ण भाइयोंके लिये मंगल कामना करके उन्होंने देवताओं और सभी गुरुजनोंको नमस्कार किया । इसके बाद ' इस ब्रह्मास्त्रसे शत्रुका ब्रह्मास्त्र शान्त हो जाय' ऐसा संकल्प करके सबके कल्याणकी भावना करते हुए अपना दिव्य अस्त्र छोड़ दिया ॥ ५-६ ॥
ततस्तदस्त्रं सहसा सृष्टं गाण्डीवधन्वना ।
प्रजज्वाल महार्चिष्मद् युगान्तानलसंनिभम् ॥ ७ ॥
गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा छोड़ा गया वह ब्रह्मास्त्र सहसा प्रज्वलित हो उठा । उससे प्रलयाग्निके समान बड़ी - बड़ी लपटें उठने लगीं ॥ ७ ॥
तथैव द्रोणपुत्रस्य तदस्त्रं तिग्मतेजसः ।
प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमण्डलसंवृतम् ॥ ८ ॥
इसी प्रकार प्रचण्ड तेजस्वी द्रोणपुत्रका वह अस्त्र भी तेजोमण्डलसे घिरकर बड़ी - बड़ी ज्वालाओंके साथ जलने लगा ॥ ८ ॥
निर्घाता बहवश्चासन् पेतुरुल्काः सहस्रशः ।
महद् भयं च भूतानां सर्वेषां समजायत ॥ ९ ॥
उस समय बारंबार वज्रपातके समान शब्द होने लगे, आकाशसे सहस्रों उल्काएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं और समस्त प्राणियोंपर महान् भय छा गया ॥ ९ ॥
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सशब्दमभवद् व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम् ।
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ॥ १० ॥
सारा आकाश आगकी प्रचण्ड ज्वालाओंसे व्याप्त हो उठा और वहाँ जोर- जोरसे शब्द होने लगा । पर्वत, वन, और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी हिलने लगी ॥ १० ॥
ते त्वस्त्रतेजसी लोकांस्तापयन्ती व्यवस्थिते ।
महर्षी सहितौ तत्र दर्शयामासतुस्तदा ॥ ११ ॥
नारदः सर्वभूतात्मा भरतानां पितामहः । उन दोनों अस्त्रोंके तेज समस्त लोकोंको संतप्त करते हुए वहाँ स्थित हो गये । उस समय वहाँ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा नारद तथा भरतवंशके पितामह व्यास –इन दो महर्षियोंने एक साथ दर्शन दिया ॥ ११ ॥
उभौ शमयितुं वीरौ भारद्वाजधनंजयौ ॥ १२ ॥
तो मुनी सर्वधर्मज्ञी सर्वभूतहितैषिणी ।
दीप्तयोरस्त्रयोर्मध्ये स्थितौ परमतेजसौ ॥ १३ ॥
सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता तथा समस्त प्राणियोंके हितैषी वे दोनों परम तेजस्वी मुनि अश्वत्थामा और अर्जुन–इन दोनों वीरोंको शान्त करनेके लिये इनके प्रज्वलित अस्त्रोंके बीचमें खड़े हो गये ॥ १२-१३ ॥
तदन्तरमथाधृष्यावुपगम्य यशस्विनौ ।
आस्तामृषिवरौ तत्र ज्वलिताविव पावकौ ॥ १४ ॥
उन अस्त्रोंके बीचमें आकर वे दुर्धर्ष एवं यशस्वी महर्षिप्रवर दो प्रज्वलित अग्नियोंके समान वहाँ स्थित हो गये ॥ १४ ॥
प्राणभृद्भिरनाधृष्यौ देवदानवसम्मतौ ।
अस्त्रतेजः शमयितुं लोकानां हितकाम्यया ॥ १५ ॥
कोई भी प्राणी उन दोनोंका तिरस्कार नहीं कर सकता था । देवता और दानव दोनों ही उनका सम्मान करते थे । वे समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन अस्त्रोंके तेजको शान्त करानेके लिये वहाँ आये थे ॥ १५ ॥
ऋषी ऊचतुः नानाशस्त्रविदः पूर्वे येऽप्यतीता महारथाः ।
नैतदस्त्रं मनुष्येषु तैः प्रयुक्तं कथंचन ।
किमिदं साहसं वीरौ कृतवन्तौ महात्ययम् ॥ १६ ॥
उन दोनों ऋषियोंने उन दोनों वीरोंसे कहा- ' वीरो! पूर्वकालमें भी जो बहुत - से महारथी हो चुके हैं, वे नाना प्रकारके शस्त्रोंके जानकार थे, परंतु उन्होंने किसी प्रकार भी
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मनुष्योंपर इस अस्त्रका प्रयोग नहीं किया था । तुम दोनोंने यह महान् विनाशकारी दुःसाहस क्यों किया है? ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अर्जुनास्त्रत्यागे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अर्जुनके द्वाराब्रह्मास्त्रका प्रयोगविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥