04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 3091–3100

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3091–3100

पृष्ठ 3091

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उस दिव्य एवं उत्तम मणिको मस्तकपर धारण करके शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर चन्द्रोदयकी शोभासे युक्त उदयाचलके समान सुशोभित हुए ॥ ३६ ॥

उत्तस्थौ पुत्रशोकार्ता ततः कृष्णा मनस्विनी ।

कृष्णं चापि महाबाहुः परिपप्रच्छ धर्मराट् ॥ ३७ ॥

तब पुत्रशोकसे पीड़ित हुई मनस्विनी कृष्णा अनशन छोड़कर उठ गयी और महाबाहु धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्णसे एक बात पूछी ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि द्रौपदीसान्त्वनायां षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें द्रौपदीकी सान्त्वनाविषयक सोलहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥

पृष्ठ 3092

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सप्तदशोऽध्यायः अपने समस्त पुत्रों और सैनिकोंके मारे जानेके विषयमें युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे पूछना और उत्तरमें श्रीकृष्णके द्वारा महादेवजीकी महिमाका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच

हतेषु सर्वसैन्येषु सौप्तिके तै रथैस्त्रिभिः ।

शोचन् युधिष्ठिरो राजा दाशार्हमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! रातको सोते समय उन तीन महारथियोंने पाण्डवोंकी सारी सेनाओंका जो संहार कर डाला था, उसके लिये शोक करते हुए राजा युधिष्ठिरने दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेणाकृतकर्मणा ।

द्रौणिना निहताः सर्वे मम पुत्रा महारथाः ॥ २ ॥

‘ श्रीकृष्ण! नीच एवं पापात्मा द्रोणकुमारने कोई विशेष तप या पुण्यकर्म भी तो नहीं किया था, जिससे उसमें अलौकिक शक्ति आ जाती । फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्रोंका वध कैसे कर डाला? ॥ २ ॥

तथा कृतास्त्रविक्रान्ताः सहस्रशतयोधिनः ।

द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिताः ॥ ३ ॥

' द्रुपदके पुत्र तो अस्त्र- विद्याके पूरे पण्डित, पराक्रमी तथा लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ थे तो भी द्रोणपुत्रने उन्हें मार गिराया, यह कितने आश्चर्यकी बात है? ॥ ३ ॥

यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् ।

निजघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ॥ ४ ॥

‘ महाधनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धमें जिसके सामने मुँह नहीं दिखाते थे, उसी रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाने कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥

किं नु तेन कृतं कर्म तथायुक्तं नरर्षभ ।

यदेकः समरे सर्वानवधीन्नो गुरोः सुतः ॥ ५ ॥

‘ नरश्रेष्ठ! आचार्यपुत्रने ऐसा कौन- सा उपयुक्त कर्म किया था, जिससे उसने अकेले ही समरांगणमें हमारे सभी सैनिकोंका वध कर डाला' ॥ ५ ॥

श्रीभगवानुवाच

नूनं स देवदेवानामीश्वरेश्वरमव्ययम् ।

जगाम शरणं द्रौणिरेकस्तेनावधीद् बहून् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 3093

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श्रीभगवान् बोले— राजन्! निश्चय ही अश्वत्थामाने ईश्वरोंके भी ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान् शिवकी शरण ली थी, इसीलिये उसने अकेले ही बहुत - से वीरोंका विनाश कर डाला ॥ ६ ॥

प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि ।

वीर्यं च गिरिशो दद्याद् येनेन्द्रमपि शातयेत् ॥ ७ ॥

पर्वतपर शयन करनेवाले महादेवजी तो प्रसन्न होनेपर अमरत्व भी दे सकते हैं । वे उपासकको इतनी शक्ति दे देते हैं, जिससे वह इन्द्रको भी नष्ट कर सकता है ॥

वेदाहं हि महादेवं तत्त्वेन भरतर्षभ ।

यानि चास्य पुराणानि कर्माणि विविधानि च ॥ ८ ॥

भरतश्रेष्ठ! मैं महादेवजीको यथार्थरूपसे जानता हूँ । उनके जो नाना प्रकारके प्राचीन कर्म हैं, उनसे भी मैं पूर्ण परिचित हूँ ॥ ८ ॥

आदिरेष हि भूतानां मध्यमन्तश्च भारत ।

विचेष्टते जगच्चेदं सर्वमस्यैव कर्मणा ॥ ९ ॥

भरतनन्दन! ये भगवान् शिव सम्पूर्ण भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं । उन्हींके प्रभावसे यह सारा जगत् भाँति - भाँतिकी चेष्टाएँ करता है ॥ ९ ॥

एवं सिसृक्षुर्भूतानि ददर्श प्रथमं विभुः ।

पितामहोऽब्रवीच्चैनं भूतानि सृज मा चिरम् ॥ १० ॥

प्रभावशाली ब्रह्माजीने प्राणियोंकी सृष्टि करनेकी इच्छासे सबसे पहले महादेवजीको ही देखा था । तब पितामह ब्रह्माने उनसे कहा – ' प्रभो! आप अविलम्ब सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि कीजिये ' ॥ १० ॥

हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा भूतानां दोषदर्शिवान् ।

दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नोऽम्भसि महातपाः ॥ ११ ॥

यह सुन महादेवजी ‘ तथास्तु' कहकर भूतगणोंके नाना प्रकारके दोष देख जलमें मग्न हो गये और महान् तपका आश्रय ले दीर्घकालतक तपस्या करते रहे ॥ ११ ॥

सुमहान्तं ततः कालं प्रतीक्ष्यैनं पितामहः ।

स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसा परम् ॥ १२ ॥

इधर पितामह ब्रह्माने सुदीर्घकालतक उनकी प्रतीक्षा करके अपने मानसिक संकल्पसे दूसरे सर्वभूतस्रष्टाको उत्पन्न किया ॥ १२ ॥

सोऽब्रवीत् पितरं दृष्ट्वा गिरिशं सुप्तमम्भसि ।

यदि मे नाग्रजोऽस्त्यन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजाः ॥ १३ ॥

उस विराट् पुरुष या स्रष्टाने महादेवजीको जलमें सोया देख अपने पिता ब्रह्माजीसे कहा — ‘ यदि दूसरा कोई मुझसे ज्येष्ठ न हो तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा' ॥ १३ ॥

तमब्रवीत् पिता नास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः ।

पृष्ठ 3094

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स्थाणुरेष जले मग्नो विस्रब्धः कुरु वैकृतम् ॥ १४ ॥

यह सुनकर पिता ब्रह्माने स्रष्टासे कहा – ' तुम्हारे सिवा दूसरा कोई अग्रज पुरुष नहीं है । ये स्थाणु ( शिव ) हैं भी तो पानीमें डूबे हुए हैं; अतः तुम निश्चिन्त होकर सृष्टिका कार्य आरम्भ करो ' ॥ १४ ॥

भूतान्यन्वसृजत् सप्त दक्षादींस्तु प्रजापतीन् ।

यैरिमं व्यकरोत् सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १५ ॥

तब स्रष्टाने सात प्रकारके प्राणियों और दक्ष आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया, जिनके द्वारा उन्होंने इस चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका विस्तार किया ॥ १५ ॥

ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् ।

बिभक्षयिषवो राजन् सहसा प्राद्रवंस्तदा ॥ १६ ॥

राजन्! सृष्टि होते ही समस्त प्रजा भूखसे पीड़ित हो प्रजापतिको ही खा जानेकी इच्छासे सहसा उनके पास दौड़ी गयी ॥ १६ ॥

स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् ।

आभ्यो मां भगवांस्त्रातु वृत्तिरासां विधीयताम् ॥ १७ ॥

जब प्रजा प्रजापतिको अपना आहार बनानेके लिये उद्यत हुई, तब वे आत्मरक्षाके लिये बड़े वेगसे भागकर पितामह ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले — ‘ भगवन्! आप मुझे इन प्रजाओंसे बचाइये और इनके लिये कोई जीविका - वृत्ति नियत कर दीजिये ' ॥ १७ ॥

ततस्ताभ्यो ददावन्नमोषधीः स्थावराणि च ।

जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम् ॥ १८ ॥

तब ब्रह्माजीने उन प्रजाओंको अन्न और ओषधि आदि स्थावर वस्तुएँ जीवन -निर्वाहके लिये दीं और अत्यन्त बलवान् हिंसक जन्तुओंके लिये दुर्बल जंगम प्राणियोंको ही आहार निश्चित कर दिया ॥ १८ ॥

विहितान्नाः प्रजास्तास्तु जग्मुः सृष्टा यथागतम् ।

ततो ववृधिरे राजन् प्रीतिमत्यः स्वयोनिषु ॥ १ ९ ॥

जिनकी सृष्टि हुई थी, उनके लिये जब भोजनकी व्यवस्था कर दी गयी, तब वे प्रजावर्गके लोग जैसे आये थे, वैसे लौट गये । राजन्! तदनन्तर सारी प्रजा अपनी ही योनियोंमें प्रसन्नतापूर्वक रहती हुई उत्तरोत्तर बढ़ने लगी ॥ १ ९ ॥

भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरावपि ।

उदतिष्ठज्जलाज्ज्येष्ठः प्रजाश्चेमा ददर्श सः ॥ २० ॥

जब प्राणिसमुदायकी भलीभाँति वृद्धि हो गयी और लोकगुरु ब्रह्मा भी संतुष्ट हो गये, तब वे ज्येष्ठ पुरुष शिव जलसे बाहर निकले । निकलनेपर उन्होंने इन समस्त प्रजाओंको देखा ॥ २० ॥

पृष्ठ 3095

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बहुरूपाः प्रजाः सृष्टा विवृद्धाश्च स्वतेजसा ।

चुक्रोध भगवान् रुद्रो लिङ्गं स्वं चाप्यविध्यत ॥ २१ ॥

अनेक रूपवाली प्रजाकी सृष्टि हो गयी और वह अपने ही तेजसे भलीभाँति बढ़ भी गयी । यह देखकर भगवान् रुद्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया ॥ २१ ॥

तत् प्रविद्धं तथा भूमौ तथैव प्रत्यतिष्ठत ।

तमुवाचाव्ययो ब्रह्मा वचोभिः शमयन्निव ॥ २२ ॥

इस प्रकार भूमिपर डाला गया वह लिंग उसी रूपमें प्रतिष्ठित हो गया । तब अविनाशी ब्रह्माने अपने वचनोंद्वारा उन्हें शान्त करते हुए- से कहा— ॥ २२ ॥

किं कृतं सलिले शर्व चिरकालस्थितेन ते ।

किमर्थं चेदमुत्पाद्य लिङ्गं भूमौ प्रवेशितम् ॥ २३ ॥

‘ रुद्रदेव! आपने दीर्घकालतक जलमें स्थित रहकर कौन -सा कार्य किया है? और इस लिंगको उत्पन्न करके किसलिये पृथ्वीपर डाल दिया है? ' ॥ २३ ॥

सोऽब्रवीज्जातसंरम्भस्तथा लोकगुरुर्गुरुम् ।

प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः किं करिष्याम्यनेन वै ॥ २४ ॥

यह प्रश्न सुनकर कुपित हुए जगद्गुरु शिवने ब्रह्माजीसे कहा -' प्रजाकी सृष्टि तो दूसरेने कर डाली; फिर इस लिंगको रखकर मैं क्या करूँगा ॥ २४ ॥

तपसाधिगतं चान्नं प्रजार्थं मे पितामह ।

ओषध्यः परिवर्तेरन् यथैवं सततं प्रजाः ॥ २५ ॥

‘ पितामह! मैंने जलमें तपस्या करके प्रजाके लिये अन्न प्राप्त किया है; वे अन्नरूप ओषधियाँ प्रजाओंके ही समान निरन्तर विभिन्न अवस्थाओंमें परिणत होती रहेंगी ' ॥

एवमुक्त्वा स सक्रोधो जगाम विमना भवः ।

गिरेर्मुञ्जवतः पादं तपस्तप्तुं महातपाः ॥ २६ ॥

ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी महादेवजी उदास मनसे मुंजवान् पर्वतकी घाटीपर तपस्या करनेके लिये चले गये ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

Fara

पृष्ठ 3096

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अष्टादशोऽध्यायः महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना श्रीभगवानुवाच

ततो देवयुगेऽतीते देवा वै समकल्पयन् ।

यज्ञं वेदप्रमाणेन विधिवद् यष्टुमीप्सवः ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले – तदनन्तर सत्ययुग बीत जाने पर देवताओंने विधिपूर्वक भगवान्का यजन करनेकी इच्छासे वैदिक प्रमाणके अनुसार यज्ञकी कल्पना की ॥

कल्पयामासुरथ ते साधनानि हवींषि च ।

भागार्हा देवताश्चैव यज्ञियं द्रव्यमेव च ॥ २ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञके साधनों, हविष्यों, यज्ञभागके अधिकारी देवताओं और यज्ञोपयोगी द्रव्योंकी कल्पना की ॥

ता वै रुद्रमजानन्त्यो याथातथ्येन देवताः ।

नाकल्पयन्त देवस्य स्थाणोर्भागं नराधिप ॥ ३ ॥

नरेश्वर! उस समय देवता भगवान् रुद्रको यथार्थ- रूपसे नहीं जानते थे; इसलिये उन्होंने ‘ स्थाणु ’ नामधारी भगवान् शिवके भागकी कल्पना नहीं की ॥ ३ ॥

सोऽकल्प्यमाने भागे तु कृत्तिवासा मखेऽमरैः ।

ततः साधनमन्विच्छन् धनुरादौ ससर्ज ह ॥ ४ ॥

जब देवताओंने यज्ञमें उनका कोई भाग नियत नहीं किया, तब व्याघ्रचर्मधारी भगवान् शिवने उनके दमनके लिये साधन जुटानेकी इच्छा रखकर सबसे पहले धनुषकी सृष्टि की ॥

लोकयज्ञः क्रियायज्ञो गृहयज्ञः सनातनः ।

पञ्चभूतनृयज्ञश्च जज्ञे सर्वमिदं जगत् ॥ ५ ॥

लोकयज्ञ, क्रियायज्ञ, सनातन गृहयज्ञ, पंचभूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ- ये पाँच प्रकारके यज्ञ हैं । इन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है ॥ ५ ॥

लोकयज्ञैर्नृयज्ञैश्च कपर्दी विदधे धनुः ।

धनुः सृष्टमभूत् तस्य पञ्चकिष्कुप्रमाणतः ॥ ६ ॥

मस्तकपर जटाजूट धारण करनेवाले भगवान् शिवने लोकयज्ञ और मनुष्ययज्ञोंसे एक धनुषका निर्माण किया । उनका वह धनुष पाँच हाथ लंबा बनाया गया था ॥ ६ ॥

वषट्कारोऽभवज्ज्या तु धनुषस्तस्य भारत ।

यज्ञाङ्गानि च चत्वारि तस्य संनहनेऽभवन् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 3097

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भरतनन्दन! वषट्कार उस धनुषकी प्रत्यंचा था । यज्ञके चारों अंग स्नान, दान, होम और जप उन भगवान् शिवके लिये कवच हो गये ॥ ७ ॥

ततः क्रुद्धो महादेवस्तदुपादाय कार्मुकम् ।

आजगामाथ तत्रैव यत्र देवाः समीजिरे ॥ ८ ॥

तदनन्तर कुपित हुए महादेवजी उस धनुषको लेकर उसी स्थानपर आये, जहाँ देवतालोग यज्ञ कर रहे थे ॥ ८ ॥

तमात्तकार्मुकं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमव्ययम् ।

विव्यथे पृथिवी देवी पर्वताश्च चकम्पिरे ॥ ९ ॥

उन ब्रह्मचारी एवं अविनाशी रुद्रको हाथमें धनुष उठाये देख पृथ्वीदेवीको बड़ी व्यथा हुई और पर्वत भी काँपने लगे ॥

न ववौ पवनश्चैव नाग्निर्जज्वाल वैधितः ।

व्यभ्रमच्चापि संविग्नं दिवि नक्षत्रमण्डलम् ॥ १० ॥

हवाकी गति रुक गयी, आग समिधा और घी आदिसे जलानेकी चेष्टा की जानेपर भी प्रज्वलित नहीं होती थी और आकाशमें नक्षत्रोंका समूह उद्विग्न होकर घूमने लगा ॥

न बभौ भास्करश्चापि सोमः श्रीमुक्तमण्डलः ।

तिमिरेणाकुलं सर्वमाकाशं चाभवद् वृतम् ॥ ११ ॥

सूर्य भी पूर्णतः प्रकाशित नहीं हो रहे थे, चन्द्रमण्डल भी श्रीहीन हो गया था तथा सारा आकाश अन्धकारसे व्याप्त हो रहा था ॥ ११ ॥

अभिभूतास्ततो देवा विषयान्न प्रजज्ञिरे ।

न प्रत्यभाच्च यज्ञः स देवतास्त्रेसिरे तथा ॥ १२ ॥

उससे अभिभूत होकर देवता किसी विषयको पहचान नहीं पाते थे, वह यज्ञ भी अच्छी

तरह प्रतीत नहीं होता था । इससे सारे देवता भयसे थर्रा उठे ॥ १२ ॥

ततः स यज्ञं विव्याध रौद्रेण हृदि पत्रिणा ।

अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावकः ॥ १३ ॥

तदनन्तर रुद्रदेवने भयंकर बाणके द्वारा उस यज्ञके हृदयमें आघात किया । तब अग्निसहित यज्ञ मृगका रूप धारण करके वहाँसे भाग निकला ॥ १३ ॥

स तु तेनैव रूपेण दिवं प्राप्य व्यराजत ।

अन्वीयमानो रुद्रेण युधिष्ठिर नभस्तले ॥ १४ ॥

वह उसी रूपसे आकाशमें पहुँचकर ( मृगशिरा नक्षत्रके रूपमें ) प्रकाशित होने लगा । युधिष्ठिर! आकाश- मण्डलमें रुद्रदेव उस दशामें भी ( आर्द्रा नक्षत्रके रूपमें ) उसके पीछे लगे रहते हैं ॥ १४ ॥

अपक्रान्ते ततो यज्ञे संज्ञा न प्रत्यभात् सुरान् ।

नष्टसंज्ञेषु देवेषु न प्राज्ञायत किंचन ॥ १५ ॥

पृष्ठ 3098

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यज्ञके वहाँसे हट जानेपर देवताओंकी चेतना लुप्त सी हो गयी । चेतना लुप्त होनेसे देवताओंको कुछ भी प्रतीत नहीं होता था ॥ १५ ॥

त्र्यम्बकः सवितुर्बाहू भगस्य नयने तथा ।

पूष्णश्च दशनान् क्रुद्धो धनुष्कोट्या व्यशातयत् ॥ १६ ॥

उस समय कुपित हुए त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवने अपने धनुषकी कोटिसे सविताकी दोनों बाँहें काट डालीं, भगकी आँखें फोड़ दीं और पूषाके सारे दाँत तोड़ डाले ॥

प्राद्रवन्त ततो देवा यज्ञाङ्गानि च सर्वशः ।

केचित् तत्रैव घूर्णन्तो गतासव इवाभवन् ॥ १७ ॥

तदनन्तर सम्पूर्ण देवता और यज्ञके सारे अंग वहाँसे पलायन कर गये । कुछ वहीं चक्कर काटते हुए प्राणहीन- से हो गये ॥ १७ ॥

स तु विद्राव्य तत् सर्वं शितिकण्ठोऽवहस्य च ।

अवष्टभ्य धनुष्कोटिं रुरोध विबुधांस्ततः ॥ १८ ॥

वह सब कुछ दूर हटाकर भगवान् नीलकण्ठने देवताओंका उपहास करते हुए धनुषकी कोटिका सहारा ले उन सबको रोक दिया ॥ १८ ॥

ततो वागमरैरुक्ता ज्यां तस्य धनुषोऽच्छिनत् ।

अथ तत् सहसा राजंश्छिन्नज्यं व्यस्फुरद् धनुः ॥ १ ९ ॥

तत्पश्चात् देवताओंद्वारा प्रेरित हुई वाणीने महादेवजीके धनुषकी प्रत्यंचा काट डाली । राजन्! सहसा प्रत्यंचा कट जानेपर वह धनुष उछलकर गिर पड़ा ॥ १ ९ ॥

ततो विधनुषं देवा देवश्रेष्ठमुपागमन् ।

शरणं सह यज्ञेन प्रसादं चाकरोत् प्रभुः ॥ २० ॥

तब देवता यज्ञको साथ लेकर धनुषरहित देवश्रेष्ठ महादेवजीकी शरणमें गये । उस समय भगवान् शिवने उन सबपर कृपा की ॥ २० ॥

ततः प्रसन्नो भगवान् स्थाप्य कोपं जलाशये ।

स जलं पावको भूत्वा शोषयत्यनिशं प्रभो ॥ २१ ॥

इसके बाद प्रसन्न हुए भगवान्ने अपने क्रोधको समुद्रमें स्थापित कर दिया । प्रभो! वह क्रोध वडवानल बनकर निरन्तर उसके जलको सोखता रहता है ॥ २१ ॥

भगस्य नयने चैव बाहू च सवितुस्तथा ।

प्रादात् पूष्णश्च दशनान् पुनर्यज्ञांश्च पाण्डव ॥ २२ ॥

पाण्डुनन्दन! फिर भगवान् शिवने भगको आँखें, सविताको दोनों बाँहें, पूषाको दाँत और देवताओंको यज्ञ प्रदान किये ॥ २२ ॥

ततः सुस्थमिदं सर्वं बभूव पुनरेव हि ।

सर्वाणि च हवींष्यस्य देवा भागमकल्पयन् ॥ २३ ॥

पृष्ठ 3099

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तदनन्तर यह सारा जगत् पुनः सुस्थिर हो गया । देवताओंने सारे हविष्योंमेंसे महादेवजीके लिये भाग नियत किया ॥ २३ ॥

तस्मिन् क्रुद्धेऽभवत् सर्वमसुस्थं भुवनं प्रभो ।

प्रसन्ने च पुनः सुस्थं प्रसन्नोऽस्य च वीर्यवान् ॥ २४ ॥

राजन्! भगवान् शंकरके कुपित होनेपर सारा जगत् डाँवाडोल हो गया था और उनके प्रसन्न होनेपर वह पुनः सुस्थिर हो गया । वे ही शक्तिशाली भगवान् शिव अश्वत्थामापर प्रसन्न हो गये थे ॥ २४ ॥

ततस्ते निहताः सर्वे तव पुत्रा महारथाः ।

अन्ये च बहवः शूराः पाञ्चालस्य पदानुगाः ॥ २५ ॥

इसीलिये उसने आपके सभी महारथी पुत्रों तथा पांचालराजका अनुसरण करनेवाले अन्य बहुत- से शूरवीरोंका वध किया है ॥ २५ ॥

न तन्मनसि कर्तव्यं न च तद् द्रौणिना कृतम् ।

महादेवप्रसादेन कुरु कार्यमनन्तरम् ॥ २६ ॥

अतः इस बातको आप मनमें न लावें । अश्वत्थामाने यह कार्य अपने बलसे नहीं,

महादेवजीकी कृपासे सम्पन्न किया है । अब आप आगे जो कुछ करना हो, वही कीजिये ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

Fara ॥ सौप्तिकपर्व सम्पूर्णम् ॥ अनुष्टुप् बड़े श्लोक बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर कुल उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये ७९ ० ॥ ( १४ ) १ ९ । ८० ९ ॥ दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये १ ------ १ सौप्तिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या ८१० ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् स्त्रीपर्व जलप्रदानिकपर्व प्रथमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका विलाप और संजयका उनको सान्त्वना देना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और ( उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये । जनमेजय उवाच

हते दुर्योधने चैव हते सैन्ये च सर्वशः ।

धृतराष्ट्रो महाराज श्रुत्वा किमकरोन्मुने ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा – मुने! दुर्योधन और उसकी सारी सेनाका संहार हो जानेपर महाराज धृतराष्ट्रने जब इस समाचारको सुना तो क्या किया? ॥ १ ॥

तथैव कौरवो राजा धर्मपुत्रो महामनाः ।

कृपप्रभृतयश्चैव किमकुर्वत ते त्रयः ॥ २ ॥

इसी प्रकार कुरुवंशी राजा महामनस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तथा कृपाचार्य आदि तीनों महारथियोंने भी इसके बाद क्या किया? ॥ २ ॥

अश्वत्थाम्नः श्रुतं कर्म शापादन्योन्यकारितात् ।

वृत्तान्तमुत्तरं ब्रूहि यदभाषत संजयः ॥ ३ ॥

अश्वत्थामाको श्रीकृष्णसे और पाण्डवोंको अश्वत्थामासे जो परस्पर शाप प्राप्त हुए थे, वहाँतक मैंने अश्वत्थामाकी करतूत सुन ली। अब उसके बादका वृत्तान्त बताइये कि संजयने धृतराष्ट्रसे क्या कहा? ॥ ३ ॥