04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 351–360

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः अभिमन्युका पराक्रम, छः महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उसके द्वारा वृन्दारक तथा दस हजार अन्य राजाओंके सहित कोसलनरेश बृहद्बलका वध धृतराष्ट्रउवाच

तथा प्रविष्टं तरुणं सौभद्रमपराजितम् ।

कुलानुरूपं कुर्वाणं संग्रामेष्वपलायिनम् ॥ १ ॥

आजानेयैः सुबलिभिर्यान्तमश्वैस्त्रिहायनैः ।

प्लवमानमिवाकाशे के शूराः समवारयन् ॥ २ ॥

धृतराष्ट्र बोले— संजय! कभी पराजित न होनेवाला तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाला तरुण, सुभद्राकुमार अभिमन्यु जब इस प्रकार जयद्रथकी सेनामें प्रवेश करके अपने कुलके अनुरूप पराक्रम प्रकट कर रहा था और तीन वर्षकी अवस्थावाले अच्छी जातिके बलवान् घोड़ोंद्वारा मानो आकाशमें तैरता हुआ आक्रमण करता था, उस समय किन शूरवीरोंने उसे रोका था? ॥ संजय उवाच

अभिमन्युः प्रविश्यैतांस्तावकान् निशितैः शरैः ।

अकरोत् पार्थिवान् सर्वान् विमुखान् पाण्डुनन्दनः ॥ ३ ॥

संजयने कहा- राजन्! पाण्डुकुलनन्दन अभिमन्युने उस सेनामें प्रविष्ट होकर आपके इन सभी राजाओंको अपने तीखे बाणोंद्वारा युद्धसे विमुख कर दिया ॥ ३ ॥

तं तु द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिश्च स बृहद्बलः ।

कृतवर्मा च हार्दिक्यः षड् रथाः पर्यवारयन् ॥ ४ ॥

तब द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्बल और हृदिकपुत्र कृतवर्मा-इन छः महारथियोंने उसे चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४ ॥

दृष्ट्वा तु सैन्धवे भारमतिमात्रं समाहितम् ।

सैन्यं तव महाराज युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ५ ॥

महाराज! सिंधुराज जयद्रथपर बहुत भार आया देख आपकी सेनाने राजा युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ ५ ॥

सौभद्रमितरे वीरमभ्यवर्षन् शराम्बुभिः ।

तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महाबलाः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 352

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तथा कुछ अन्य महाबली योद्धाओंने अपने चार हाथके धनुष खींचते हुए वहाँ सुभद्राकुमार वीर अभिमन्युपर बाणरूपी जलकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ६ ॥

तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् सर्वविद्यासु निष्ठितान् ।

व्यष्टम्भयद् रणे बाणैः सौभद्रः परवीरहा ॥ ७ ॥

परंतु शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अभिमन्युने सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण उन समस्त महाधनुर्धरोंको रणक्षेत्रमें अपने बाणोंद्वारा स्तब्ध कर दिया ॥ ७ ॥

द्रोणं पञ्चाशताविध्यद् विंशत्या च बृहद्बलम् ।

अशीत्या कृतवर्माणं कृपं षष्ट्या शिलीमुखैः ॥ ८ ॥

रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराकर्णसमचोदितैः ।

अविध्यद् दशभिर्बाणैरश्वत्थामानमार्जुनिः ॥ ९ ॥

अर्जुनकुमार अभिमन्युने द्रोणको पचास, बृहद्बलको बीस, कृतवर्माको अस्सी, कृपाचार्यको साठ और अश्वत्थामाको कानतक खींचकर छोड़े हुए स्वर्णमय पंखयुक्त, महावेगशाली दस बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥

स कर्णं कर्णिना कर्णे पीतेन च शितेन च ।

फाल्गुनिर्द्विषतां मध्ये विव्याध परमेषुणा ॥ १० ॥

अर्जुनकुमारने शत्रुओंके मध्यमें खड़े हुए कर्णके कानमें पानीदार पैने और उत्तम बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ १० ॥

पातयित्वा कृपस्याश्वांस्तथोभौ पार्ष्णिसारथी ।

अथैनं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ११ ॥

कृपाचार्यके चारों घोड़ों तथा उनके दो पार्श्वरक्षकोंको धराशायी करके छातीमें दस बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥

ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् ।

पुत्राणां तव वीराणां पश्यतामवधीद् बली ॥ १२ ॥

तदनन्तर बलवान् अभिमन्युने कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वीर वृन्दारकको आपके वीर पुत्रोंके देखते - देखते मार डाला ॥ १२ ॥

तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ।

वरं वरममित्राणामारुजन्तमभीतवत् ॥ १३

तब शत्रुदलके प्रधान- प्रधान वीरोंका बेखटके वध करते हुए अभिमन्युको अश्वत्थामाने पचीस बाण मारे ||

स तु बाणैः शितैस्तूर्णं प्रत्यविध्यत मारिष ।

पश्यतां धार्तराष्ट्राणामश्वत्थामानमार्जुनिः ॥ १४ ॥

आर्य! अर्जुनकुमारने भी आपके पुत्रोंके देखते -देखते तुरंत ही अश्वत्थामाको पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ॥

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षष्ट्या शराणां तं द्रौणिस्तिग्मधारैः सुतेजनैः ।

उग्रैर्नाकम्पयद् विद्ध्वा मैनाकमिव पर्वतम् ॥ १५ ॥

तब द्रोणपुत्रने तीखी धारवाले तेज और भयंकर साठ बाणोंद्वारा अभिमन्युको बींध डाला; परंतु बींधकर भी वह मैनाक पर्वतके समान स्थित अभिमन्युको कम्पित न कर सका ॥ १५ ॥

स तु द्रौणिं त्रिसप्तत्या हेमपुङ्खैरजिह्मगैः ।

प्रत्यविध्यन्महातेजा बलवानपकारिणम् ॥ १६ ॥

महातेजस्वी बलवान् अभिमन्युने सुवर्णमय पंखसे युक्त तिहत्तर बाणोंद्वारा अपने अपकारी अश्वत्थामाको पुनः घायल कर दिया ॥ १६ ॥

तस्मिन् द्रोणो बाणशतं पुत्रगृद्धी न्यपातयत् ।

अश्वत्थामा तथाष्टौ च परीप्सन् पितरं रणे ॥ १७ ॥

तब अपने पुत्रके प्रति स्नेह रखनेवाले द्रोणाचार्यने अभिमन्युको सौ बाण मारे । साथ ही अश्वत्थामाने भी अपने पिताकी रक्षा करते हुए रणक्षेत्रमें उसपर आठ बाण चलाये ॥ १७ ॥

कर्णो द्वाविंशतिं भल्लान् कृतवर्मा च विंशतिम् ।

बृहद्बलस्तु पञ्चाशत् कृपः शारद्वतो दश ॥ १८ ॥

तत्पश्चात् कर्णने बाईस, कृतवर्माने बीस, बृहद्बलने पचास तथा शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने अभिमन्युको दस भल्ल मारे ॥ १८ ॥

तांस्तु प्रत्यवधीत् सर्वान् दशभिर्दशभिः शरैः ।

तैरर्द्यमानः सौभद्रः सर्वतो निशितैः शरैः ॥ १ ९ ॥

उन सबके चलाये हुए तीखे बाणोंद्वारा सब ओरसे पीड़ित हुए सुभद्राकुमारने उन सभीको दस - दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १ ९ ॥

तं कोसलानामधिपः कर्णिनाताडयद्धृदि ।

स तस्याश्वान् ध्वजं चापं सूतं चापातयत् क्षितौ ॥ २० ॥

तत्पश्चात् कोसलनरेश बृहद्बलने एक बाणद्वारा अभिमन्युकी छातीमें चोट पहुँचायी । यह देख अभिमन्युने उनके चारों घोड़ों तथा ध्वज, धनुष एवं सारथिको भी पृथ्वीपर मार गिराया ॥ २० ॥

अथ कोसलराजस्तु विरथः खड्गचर्मभृत् ।

इयेष फाल्गुनेः कायाच्छिरो हर्तुं सकुण्डलम् ॥ २१ ॥

रथहीन होनेपर कोसलनरेशने हाथमें ढाल और तलवार ले ली तथा अभिमन्युके शरीरसे उसके कुण्डलयुक्त मस्तकको काट लेनेका विचार किया ॥ २१ ॥

स कोसलानामधिपं राजपुत्रं बृहद्बलम् ।

हृदि विव्याध बाणेन स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 354

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इतनेहीमें अभिमन्युने एक बाणद्वारा कोसलनरेश राजपुत्र बृहद्बलके हृदयमें गहरी चोट पहुँचायी । इससे उनका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया और वे गिर पड़े ॥ २२ ॥

बभञ्ज च सहस्राणि दश राज्ञां महात्मनाम् ।

सृजतामशिवा वाचः खड्गकार्मुकधारिणाम् ॥ २३ ॥

इसके बाद अशुभ वचन बोलनेवाले तथा खड्ग एवं धनुष धारण करनेवाले दस हजार महामनस्वी राजाओंका भी उसने संहार कर डाला ॥ २३ ॥

तथा बृहद्बलं हत्वा सौभद्रो व्यचरद् रणे ।

व्यष्टम्भयन्महेष्वासो योधांस्तव शराम्बुभिः ॥ २४ ॥

इस प्रकार महाधनुर्धर अभिमन्यु बृहद्बलका वध करके आपके योद्धाओंको अपने बाणरूपी जलकी वर्षा से स्तब्ध करता हुआ रणक्षेत्रमें विचरने लगा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि बृहद्बलवधे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें बृहद्बलवधविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः अभिमन्युद्वारा अश्वकेतु, भोज और कर्णके मन्त्री आदिका वध एवं छः महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उन महारथियोंद्वारा अभिमन्युके धनुष, रथ, ढाल और तलवारका नाश संजय उवाच

स कर्णं कर्णिना कर्णे पुनर्विव्याध फाल्गुनिः ।

शरैः पञ्चाशता चैनमविध्यत् कोपयन् भृशम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर अर्जुनकुमार अभिमन्युने एक बाणद्वारा कर्णके कानमें पुनः चोट पहुँचायी और उसे क्रोध दिलाते हुए उसने पचास बाण मारकर अत्यन्त घायल कर दिया ॥ १ ॥

प्रतिविव्याध राधेयस्तावद्भिरथ तं पुनः ।

शरैराचितसर्वाङ्गो बह्वशोभत भारत ॥ २ ॥

भरतनन्दन! तब राधापुत्र कर्णने भी अभिमन्युको उतने ही बाणोंसे बींध डाला । उसका सारा अंग बाणोंसे व्याप्त होनेके कारण वह बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २ ॥

कर्णं चाप्यकरोत् क्रुद्धो रुधिरोत्पीडवाहिनम् कर्णोऽपि विबभौ शूरः शरैश्छिन्नोऽसृगाप्लुतः ॥ ३ ॥

( संध्यानुगतपर्यन्तः शरदीव दिवाकरः । ) फिर क्रोधमें भरे हुए अभिमन्युने कर्णको भी बाणोंसे क्षत- विक्षत करके उसे रक्तकी धारा बहानेवाला बना दिया। उस समय शूरवीर कर्ण भी बाणोंसे छिन्न - भिन्न और खूनसे लथपथ हो बड़ी शोभा पाने लगा, मानो शरत्कालका सूर्य संध्याके समय सम्पूर्णरूपसे लाल दिखायी दे रहा हो ॥ ३ ॥

तावुभौ शरचित्राङ्गौ रुधिरेण समुक्षितौ ।

बभूवतुर्महात्मानौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ४ ॥

उन दोनोंके शरीर बाणोंसे व्याप्त होनेके कारण विचित्र दिखायी देते थे । दोनों ही रक्तसे भींग गये तथा वे दोनों महामनस्वी वीर फूलोंसे भरे हुए पलाश- वृक्षके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

अथ कर्णस्य सचिवान् षट् शूरांश्चित्रयोधिनः ।

साश्वसूतध्वजरथान् सौभद्रो निजघान ह ॥ ५ ॥

पृष्ठ 356

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तदनन्तर सुभद्राकुमारने कर्णके विचित्र युद्ध करनेवाले छः शूरवीर मन्त्रियोंको उनके घोड़े, सारथि, रथ तथा ध्वजसहित मार डाला ॥ ५ ॥

तथेतरान् महेष्वासान् दशभिर्दशभिः शरैः ।

प्रत्यविध्यदसम्भ्रान्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ६ ॥

इतना ही नहीं, उसने बिना किसी घबराहटके दस - दस बाणोंद्वारा अन्य महाधनुर्धरोंको

भी आहत कर दिया । वह अद्भुत - सी बात थी ॥ ६ ॥

मागधस्य तथा पुत्रं हत्वा षड्भिरजिह्मगैः ।

साश्वं ससूतं तरुणमश्वकेतुमपातयत् ॥ ७ ॥

इसी प्रकार उसने मगधराजके तरुण पुत्र अश्वकेतुको छः बाणोंद्वारा मारकर उसे घोड़ों और सारथिसहित रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ७ ॥

मार्तिकावतकं भोजं ततः कुञ्जरकेतनम् ।

क्षुरप्रेण समुन्मथ्य ननाद विसृजन् शरान् ॥ ८ ॥

तत्पश्चात् हाथीके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले मार्तिकावतक नरेश भोजको एक क्षुरप्रद्वारा नष्ट करके अभिमन्युने बाणोंकी वर्षा करते हुए सिंहनाद किया ॥ ८ ॥

तस्य दौःशासनिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।

सूतमेकेन विव्याध दशभिश्चार्जुनात्मजम् ॥ ९ ॥

तब दुःशासनकुमारने चार बाणोंद्वारा अभिमन्युके चारों घोड़ोंको घायल करके एकसे सारथिको और दस बाणोंद्वारा स्वयं अभिमन्युको बींध डाला ॥ ९ ॥

ततो दौःशासनिं कार्ष्णिर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ।

संरम्भाद् रक्तनयनो वाक्यमुच्चैरथाब्रवीत् ॥ १० ॥

यह देख अर्जुनकुमारने क्रोधसे लाल आँखें करके सात बाणोंद्वारा दुःशासनपुत्रको बींध डाला और उच्च स्वरसे यह बात कही- ॥ १० ॥

पिता तवाहवं त्यक्त्वा गतः कापुरुषो यथा ।

दिष्ट्या त्वमपि जानीषे योद्धुं न त्वद्य मोक्ष्यसे ॥ ११ ॥

‘ अरे! तेरा पिता कायरकी भाँति युद्ध छोड़कर भाग गया है । सौभाग्यकी बात है कि तू भी युद्ध करना जानता है; किंतु आज तू जीवित नहीं छूट सकेगा' ॥ ११ ॥

एतावदुक्त्वा वचनं कर्मारपरिमार्जितम् ।

नाराचं विससर्जास्मै तं द्रौणिस्त्रिभिराच्छिनत् ॥ १२ ॥

यह वचन कहकर अभिमन्युने कारीगरके माँजे हुए एक नाराचको दुःशासनपुत्रपर चलाया; परंतु अश्वत्थामाने तीन बाण मारकर उसे बीचमें ही काट दिया ॥ १२ ॥

तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा शल्यं त्रिभिरताडयत् ।

तं शल्यो नवभिर्बाणैर्गार्ध्रपत्रैरताडयत् ॥ १३ ॥

हृद्यसम्भ्रान्तवद् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ।

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तब अर्जुनकुमारने अश्वत्थामाका ध्वज काटकर शल्यको तीन बाण मारे । राजन्! शल्यने भी मनमें तनिक भी सम्भ्रम या घबराहटका अनुभव न करते हुए- से गीधके पंखसे

युक्त नौ बाणोंद्वारा अभिमन्युको आहत कर दिया । वह एक अद्भुत- सी बात हुई ॥ १३३ ॥

तस्यार्जुनिर्ध्वजं छित्त्वा हत्वोभौ पार्ष्णिसारथी ॥ १४ ॥

तं विव्याधायसैः षड्भिः सोपाक्रामद् रथान्तरम् । उस समय अभिमन्युने शल्यके ध्वजको काटकर उनके दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी मार डाला और उनको भी लोहेके बने हुए छः बाणोंसे बींध दिया; फिर तो शल्य भागकर दूसरे रथपर चले गये ॥ १४ ॥

शत्रुंजयं चन्द्रकेतुं मेघवेगं सुवर्चसम् ॥ १५ ॥

सूर्यभासं च पञ्चैतान् हत्वा विव्याध सौबलम् ।

तं सौबलस्त्रिभिर्विद्ध्वा दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् शत्रुंजय, चन्द्रकेतु, मेघवेग, सुवर्चा और सूर्यभास- इन पाँच वीरोंको मारकर अभिमन्युने सुबलपुत्र शकुनिको भी घायल कर दिया । तब शकुनिने भी तीन बाणोंसे अभिमन्युको घायल करके दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ १५-१६ ॥

सर्व एनं विमथ्नीमः पुरैकैकं हिनस्ति नः ।

अथाब्रवीत् पुनर्द्रोणं कर्णो वैकर्तनो रणे ॥ १७ ॥

' राजन्! यह एक- एकके साथ युद्ध करके हमें मारे, इसके पहले ही हम सब लोग मिलकर इस अभिमन्युको मथ डालें । ' तदनन्तर विकर्तनपुत्र कर्णने रणक्षेत्रमें पुनः द्रोणाचार्यसे पूछा— ॥ १७ ॥

पुरा सर्वान् प्रमथ्नाति ब्रूह्यस्य वधमाशु नः ।

ततो द्रोणो महेष्वासः सर्वांस्तान् प्रत्यभाषत ॥ १८ ॥

‘ आचार्य! अभिमन्यु हमलोगोंको मार डाले ' इसके पहले ही हमें शीघ्र यह बताइये कि इसका वध किस प्रकार होगा? ' तब महाधनुर्धर द्रोणाचार्यने उन सबसे कहा— ॥ १८ ॥

अस्ति वास्यान्तरं किंचित् कुमारस्याथ पश्यत ।

अण्वप्यस्यान्तरं ह्यद्य चरतः सर्वतोदिशम् ॥ १ ९ ॥

‘ देखो, क्या इस कुमार अभिमन्युमें कहीं कोई दुर्बलता या छिद्र है? सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरते हुए अभिमन्युमें आज कोई छोटा-सा भी छिद्र हो तो देखो ॥ १ ९ ॥

शीघ्रतां नरसिंहस्य पाण्डवेयस्य पश्यत ।

धनुर्मण्डलमेवास्य रथमार्गेषु दृश्यते ॥ २० ॥

संदधानस्य विशिखान् शीघ्रं चैव विमुञ्चतः । 'इस पुरुषसिंह पाण्डवपुत्रकी शीघ्रता तो देखो । शीघ्रतापूर्वक बाणोंका संधान करते और छोड़ते समय रथके मार्गोंमें इसके धनुषका मण्डलमात्र दिखायी देता है ॥ २० ॥

आरुजन्नपि मे प्राणान् मोहयन्नपि सायकैः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 358

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प्रहर्षयति मां भूयः सौभद्रः परवीरहा ।

अति मां नन्दयत्येष सौभद्रो विचरन् रणे ॥ २२ ॥

' शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला सुभद्राकुमार अभिमन्यु यद्यपि अपने बाणोंद्वारा मेरे प्राणोंको अत्यन्त कष्ट दे रहा है, मुझे मूर्च्छित किये देता है, तथापि बारंबार मेरा हर्ष बढ़ा रहा है । रणक्षेत्रमें विचरता हुआ सुभद्राका यह पुत्र मुझे अत्यन्त आनन्दित कर रहा है ॥ २१-२२ ॥

अन्तरं यस्य संरब्धा न पश्यन्ति महारथाः ।

अस्यतो लघुहस्तस्य दिशः सर्वा महेषुभिः ॥ २३ ॥

न विशेषं प्रपश्यामि रणे गाण्डीवधन्वनः । ' क्रोधमें भरे हुए महारथी इसके छिद्रको नहीं देख पाते हैं । यह शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाता हुआ अपने महान् बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त कर रहा है । मैं युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुन और इस अभिमन्युमें कोई अन्तर नहीं देख पाता हूँ' ॥ २३ ॥

अथ कर्णः पुनर्द्रोणमाहार्जुनिशराहतः ॥ २४ ॥

स्थातव्यमिति तिष्ठामि पीड्यमानोऽभिमन्युना । तदनन्तर कर्णने अभिमन्युके बाणोंसे आहत होकर पुनः द्रोणाचार्यसे कहा–' आचार्य! मैं अभिमन्युके बाणोंसे पीड़ित होता हुआ भी केवल इसलिये यहाँ खड़ा हूँ कि युद्धके मैदानमें डटे रहना ही क्षत्रियका धर्म है ( अन्यथा मैं कभी भाग गया होता ) ॥ २४ ॥

तेजस्विनः कुमारस्य शराः परमदारुणाः ॥ २५ ॥

क्षिण्वन्ति हृदयं मेऽद्य घोराः पावकतेजसः ।

तमाचार्योऽब्रवीत् कर्णं शनकैः प्रहसन्निव ॥ २६ ॥

‘ तेजस्वी कुमार अभिमन्युके ये अत्यन्त दारुण और अग्निके समान तेजस्वी घोर बाण आज मेरे वक्षःस्थलको विदीर्ण किये देते हैं । ' यह सुनकर द्रोणाचार्य ठहाका मारकर हँसते हुए - से धीरे - धीरे कर्णसे इस प्रकार बोले— ॥ २५-२६ ॥

अभेद्यमस्य कवचं युवा चाशुपराक्रमः ।

उपदिष्टा मया चास्य पितुः कवचधारणा ॥ २७ ॥

तामेष निखिलां वेत्ति ध्रुवं परपुरंजयः ।

शक्यं त्वस्य धनुश्छेत्तुं ज्यां च बाणैः समाहितैः ॥ २८ ॥

‘ कर्ण! अभिमन्युका कवच अभेद्य है । यह तरुण वीर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाला है । मैंने इसके पिताको कवच धारण करनेकी विधि बतायी है । शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह वीर कुमार निश्चय ही वह सारी विधि जानता है (अतः इसका कवच तो अभेद्य ही है ); परंतु मनोयोगपूर्वक चलाये हुए बाणोंसे इसके धनुष और प्रत्यंचाको काटा जा सकता है ॥ २७-२८ ॥ अभीपूंश्च हयांश्चैव तथोभौ पार्ष्णिसारथी ।

पृष्ठ 359

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एतत् कुरु महेष्वास राधेय यदि शक्यते ॥ २ ९ ॥ ‘ साथ ही इसके घोड़ोंकी वागडोरोंको, घोड़ोंको तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंको भी नष्ट किया जा सकता है । महाधनुर्धर राधापुत्र! यदि कर सको तो यही करो ॥ २ ९ ॥

अथैनं विमुखीकृत्य पश्चात् प्रहरणं कुरु ।

सधनुष्को न शक्योऽयमपि जेतुं सुरासुरैः ॥ ३० ॥

' अभिमन्युको युद्धसे विमुख करके पीछे इसके ऊपर प्रहार करो, धनुष लिये रहनेपर तो इसे सम्पूर्ण देवता और असुर भी जीत नहीं सकते ॥ ३० ॥

विरथं विधनुष्कं च कुरुष्वैनं यदीच्छसि ।

तदाचार्यवचः श्रुत्वा कर्णो वैकर्तनस्त्वरन् ॥ ३१ ॥

अस्यतो लघुहस्तस्य पृषत्कैर्धनुराच्छिनत् ।

अश्वानस्यावधीद् भोजो गौतमः पार्ष्णिसारथी ॥ ३२ ॥

' यदि तुम इसे परास्त करना चाहते हो तो इसके रथ और धनुषको नष्ट कर दो । ' आचार्यकी यह बात सुनकर विकर्तनपुत्र कर्णने बड़ी उतावलीके साथ अपने बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाते हुए अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले अभिमन्युके धनुषको काट दिया । भोजवंशी कृतवर्माने उसके घोड़े मार डाले और कृपाचार्यने दोनों पार्श्वरक्षकोंका काम तमाम कर दिया ॥ ३१-३२ ॥

शेषास्तु च्छिन्नधन्वानं शरवर्षैरवाकिरन् ।

त्वरमाणास्त्वराकाले विरथं षण्महारथाः ॥ ३३ ॥

शरवर्षैरकरुणा बालमेकमवाकिरन् । शेष महारथी धनुष कट जानेपर अभिमन्युके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे । इस प्रकार शीघ्रता करनेके अवसरपर शीघ्रता करनेवाले छः निर्दय महारथी एक रथहीन बालकपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ३३ ॥

स च्छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालयन् ॥ ३४ ॥

खड्गचर्मधरः श्रीमानुत्पपात विहायसा । धनुष कट जाने और रथ नष्ट हो जानेपर तेजस्वी वीर अभिमन्यु अपने धर्मका पालन करते हुए ढाल और तलवार हाथमें लेकर आकाशमें उछल पड़ा ॥ ३४ ॥

मार्गैः सकौशिकाद्यैश्च लाघवेन बलेन च ॥ ३५ ॥

आर्जुनिर्व्यचरद् व्योम्नि भृशं वै पक्षिराडिव । अर्जुनकुमार अभिमन्यु कौशिक आदि मार्गों ( पैतरों ) द्वारा तथा शीघ्रकारिता और बल-पराक्रमसे पक्षिराज गरुड़की भाँति भूतलकी अपेक्षा आकाशमें ही अधिक विचरण करने लगा ॥ ३५ ॥

मय्येव निपतत्येष सासिरित्यूर्ध्वदृष्टयः ॥ ३६ ॥

विव्यधुस्तं महेष्वासं समरे छिद्रदर्शिनः ।

पृष्ठ 360

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समरांगणमें छिद्र देखनेवाले योद्धा ' जान पड़ता है यह मेरे ही ऊपर तलवार लिये टूटा पड़ता है ' इस आशंकासे ऊपरकी ओर दृष्टि करके महाधनुर्धर अभिमन्युको बींधने लगे ॥ ३६ ॥

तस्य द्रोणोऽच्छिनन्मुष्टौ खड्गं मणिमयत्सरुम् ॥ ३७ ॥

क्षुरप्रेण महातेजास्त्वरमाणः सपत्नजित् । उस समय शत्रुओंपर विजय पानेवाले महातेजस्वी द्रोणाचार्यने शीघ्रता करते हुए एक क्षुरप्रके द्वारा अभिमन्युकी मुट्ठीमें स्थित हुए मणिमय मूठसे युक्त खड्गको काट डाला ॥ ३७ ॥

राधेयो निशितैर्बाणैर्व्यधमच्चर्म चोत्तमम् ॥ ३८ ॥

व्यसिचर्मेषुपूर्णाङ्गः सोऽन्तरिक्षात् पुनः क्षितिम् ।

आस्थितश्चक्रमुद्यम्य द्रोणं क्रुद्धोऽभ्यधावत ॥ ३ ९ ॥

राधानन्दन कर्णने अपने पैने बाणोंद्वारा उसके उत्तम ढालके टुकड़े -टुकड़े कर डाले । ढाल और तलवारसे वंचित हो जानेपर बाणोंसे भरे हुए शरीरवाला अभिमन्यु पुनः आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया और चक्र हाथमें ले कुपित हो द्रोणाचार्यकी ओर दौड़ा ॥ ३८-३९ ॥