04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 421–430

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०३ श्लोक मिलाकर कुल ३५३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 422

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षष्टितमोऽध्यायः राजा भगीरथका चरित्र नारद उवाच भगीरथं च राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।

( परित्राणाय पूर्वेषां येन गङ्गावतारिता ।

यस्येन्द्रो बाहुवीर्येण प्रीतो राज्ञो महात्मनः ॥

योऽश्वमेधशतैरीजे समाप्तवरदक्षिणैः । हविर्मन्त्रान्नसम्पन्नैर्देवानामादधान्मुदम् ।

यस्येन्द्रो वितते यज्ञे सोमं पीत्वा मदोत्कटः ।

असुराणां सहस्राणि बहूनि च सुरेश्वरः ॥

अजयद् बाहुवीर्येण भगवाँल्लोकपूजितः । ) येन भागीरथी गङ्गा चयनैः काञ्चनैश्चिता ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं - संजय! हमारे सुननेमें आया है कि राजा भगीरथ भी मर गये, जिन्होंने अपने पूर्वजोंका उद्धार करनेके लिये इस भूतलपर गंगाजीको उतारा था । जिन महामना नरेशके बाहुबलसे इन्द्र बहुत प्रसन्न थे, जिन्होंने प्रचुर एवं उत्तम दक्षिणासे युक्त हविष्य, मन्त्र और अन्नसे सम्पन्न सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया और देवताओंका आनन्द बढ़ाया, जिनके महान् यज्ञमें इन्द्र सोमरस पीकर मदोन्मत्त हो उठे थे तथा जिनके यहाँ रहकर लोकपूजित भगवान् देवेन्द्रने अपने बाहुबलसे अनेक सहस्र असुरोंको पराजित किया, उन्हीं राजा भगीरथने यज्ञ करते समय गंगाके दोनों किनारोंपर सोनेकी ईंटोंके घाट बनवाये थे ॥

यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः ।

राज्ञश्च राजपुत्रांश्च ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ॥ २ ॥

इतना ही नहीं, उन्होंने कितने ही राजाओं तथा राजपुत्रोंको जीतकर उनके यहाँसे सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित दस लाख कन्याएँ लाकर उन्हें ब्राह्मणोंको दान किया था ॥ २ ॥

सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः ।

रथे रथे शतं नागाः सर्वे वै हेममालिनः ॥ ३ ॥

पृष्ठ 423

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वे सभी कन्याएँ रथोंमें बैठी थीं । उन सभी रथोंमें चार- चार घोड़े जुते थे । प्रत्येक रथके पीछे सोनेके हारोंसे अलंकृत सौ -सौ हाथी चलते थे ॥ ३ ॥

सहस्रमश्वाश्चैकैकं गजानां पृष्ठतोऽन्वयुः ।

अश्वे अश्वे शतं गावो गवां पश्चादजाविकम् ॥ ४ ॥

एक -एक हाथीके पीछे हजार - हजार घोड़े जा रहे थे और एक - एक घोड़ेके साथ सौ - सौ गौएँ एवं गौओंके पीछे भेड़ और बकरियोंके झुंड चलते थे ॥ ४ ॥

तेनाक्रान्ता जलौघेन दक्षिणा भूयसीर्ददत् ।

उपह्वरेऽतिव्यथिता तस्याङ्के निषसाद ह ॥ ५ ॥

राजा भगीरथ गंगाके तटपर भूयसी ( प्रचुर ) दक्षिणा देते हुए निवास करते थे । अतः उनके संकल्पकालिक जलप्रवाहसे आक्रान्त होकर गंगादेवी मानो अत्यन्त व्यथित हो उठीं और समीपवर्ती राजाके अंकमें आ बैठीं ॥ ५ ॥

तथा भागीरथी गङ्गा उर्वशी चाभवत् पुरा ।

दुहितृत्वं गता राज्ञः पुत्रत्वमगमत् तदा ॥ ६ ॥

इस प्रकार भगीरथकी पुत्री होनेसे गंगाजी भागीरथी कहलायीं और उनके ऊरुपर बैठनेके कारण उर्वशी नामसे प्रसिद्ध हुईं । राजाके पुत्रीभावको प्राप्त होकर उनका नरकसे त्राण करनेके कारण वे उस समय पुत्रभावको भी प्राप्त हुईं ॥ ६ ॥

तां तु गाथां जगुः प्रीता गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ।

पितृदेवमनुष्याणां शृण्वतां वल्गुवादिनः ॥ ७ ॥

सूर्यके समान तेजस्वी और मधुरभाषी गन्धर्वोंने प्रसन्न होकर देवताओं, पितरों और मनुष्योंके सुनते हुए यह गाथा गायी थी ॥ ७ ॥

भगीरथं यजमानमैक्ष्वाकुं भूरिदक्षिणम् ।

पृष्ठ 424

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गङ्गा समुद्रगा देवी वव्रे पितरमीश्वरम् ॥ ८ ॥

यज्ञ करते समय भूयसी दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकुवंशी ऐश्वर्यशाली राजा भगीरथको समुद्रगामिनी गंगादेवीने अपना पिता मान लिया था ॥ ८ ॥

तस्य सेन्द्रैः सुरगणैर्देवैर्यबः स्वलङ्कृतः ।

सम्यक्परिगृहीतश्च शान्तविघ्नो निरामयः ॥ ९ ॥

इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने उनके यज्ञको सुशोभित किया था । उसमें प्राप्त हुए हविष्यको भलीभाँति ग्रहण करके उसके विघ्नोंको शान्त करते हुए उसे निर्बाधरूपसे पूर्ण किया था ॥ ९ ॥

यो य इच्छेत विप्रो वै यत्र यत्रात्मनः प्रियम् ।

भगीरथस्तदा प्रीतस्तत्र तत्राददद् वशी ॥ १० ॥

जिस -जिस ब्राह्मणने जहाँ- जहाँ अपने मनको प्रिय लगनेवाली जिस -जिस वस्तुको पाना चाहा, जितेन्द्रिय राजाने वहीं- वहीं प्रसन्नतापूर्वक वह वस्तु उसे तत्काल समर्पित की ॥

नादेयं ब्राह्मणस्यासीद् यस्य यत्स्यात् प्रियं धनम् ।

सोऽपि विप्रप्रसादेन ब्रह्मलोकं गतो नृपः ॥ ११ ॥

उनके पास जो भी प्रिय धन था, वह ब्राह्मणके लिये अदेय नहीं था । राजा भगीरथ ब्राह्मणोंकी कृपासे ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए ॥ ११ ॥

येन यातौ मखमुखौ दिशाशाविह पादपाः ।

तेनावस्थातुमिच्छन्ति तं गत्वा राजमीश्वरम् ॥ १२ ॥

शत्रुओंकी दशा और आशाका हनन करनेवाले सृजय! राजा भगीरथने यज्ञोंमें प्रधान ज्ञानयज्ञ और ध्यानयज्ञको ग्रहण किया था । इसलिये किरणोंका पान करनेवाले महर्षिगण भी उस ब्रह्मलोकमें जितेन्द्रिय राजा भगीरथके निकट जाकर उसी स्थानपर रहनेकी इच्छा करते थे ॥

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १३ ॥

अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् । श्वैत्य सृजय! वे भगीरथ उपर्युक्त चारों बातोंमें तुमसे बहुत बढ़कर थे । तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा उनका पुण्य बहुत अधिक था । जब वे भी जीवित न रह सके, तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम यज्ञानुष्ठान और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो । नारदजीने राजा सृ॑जयसे यही बात कही ॥ १३३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥

पृष्ठ 425

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इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं )

पृष्ठ 426

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एकषष्टितमोऽध्यायः राजा दिलीपका उत्कर्ष नारद उवाच दिलीपं चेदैलविलं मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।

यस्य यज्ञशतेष्वासन् प्रयुतायुतशो द्विजाः ।

तन्त्रज्ञानार्थसम्पन्ना यज्वानः पुत्रपौत्रिणः ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं - संजय! इलविलाके पुत्र राजा दिलीपकी भी मृत्यु सुनी गयी है, जिनके सौ यज्ञोंमें लाखों ब्राह्मण नियुक्त थे । वे सभी ब्राह्मण वेदोंके कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डके तात्पर्यको जाननेवाले, यज्ञकर्ता तथा पुत्र - पौत्रोंसे सम्पन्न थे ॥ १ ॥

य इमां वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ।

ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ॥ २ ॥

पृथ्वीपति दिलीपने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें धन- धान्यसे सम्पन्न इस सारी पृथ्वीको ब्राह्मणोंके लिये दान कर दिया था ॥ २ ॥

दिलीपस्य तु यज्ञेषु कृतः पन्था हिरण्मयः ।

तं धर्म इव कुर्वाणाः सेन्द्रा देवाः समागमन् ॥ ३ ॥

राजा दिलीपके यज्ञोंमें सोनेकी सड़कें बनायी गयी थीं । इन्द्र आदि देवता मानो धर्मकी प्राप्तिके लिये उन्हें अलंकृत करते हुए उनके यहाँ पधारते थे ॥ ३ ॥

सहस्रं यत्र मातङ्गा गच्छन्ति पर्वतोपमाः ।

सौवर्णं चाभवत् सर्वं सदः परमभास्वरम् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 427

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वहाँ पर्वतोंके समान विशालकाय सहस्रों गजराज विचरा करते थे । राजाका सभामण्डप सोनेका बना हुआ था, जो सदा देदीप्यमान रहता था ॥ ४ ॥

रसानां चाभवन् कुल्या भक्ष्याणां चापि पर्वताः ।

सहस्रव्यामा नृपते यूपाश्चासन् हिरण्मयाः ॥ ५ ॥

वहाँ रसकी नहरें बहती थीं और अन्नके पहाड़ों-जैसे ढेर लगे हुए थे । राजन्! उनके यज्ञमें सहस्र व्याम - विस्तृत सुवर्णमय यूप सुशोभित होते थे ॥ ५ ॥

चषालं प्रचषालं च यस्य यूपे हिरण्मये ।

नृत्यन्तेऽप्सरसस्तस्य षट् सहस्राणि सप्त च ॥ ॥

उनके यूपमें सुवर्णमय *चषाल और प्रचषाल लगे हुए थे । उनके यहाँ तेरह हजार अप्सराएँ नृत्य करती थीं ॥

यत्र वीणां वादयति प्रीत्या विश्वावसुः स्वयम् ।

सर्वभूतान्यमन्यन्त राजानं सत्यशीलिनम् ॥ ७ ॥

उस समय वहाँ साक्षात् गन्धर्वराज विश्वावसु प्रेमपूर्वक वीणा बजाते थे । समस्त प्राणी राजा दिलीपको सत्यवादी मानते थे ॥ ७ ॥

रागखाण्डवभोज्यैश्च मत्ताः पथिषु शेरते ।

तदेतदद्भुतं मन्ये अन्यैर्न सदृशं नृपैः ॥ ८ ॥

यदप्सु युध्यमानस्य चक्रे न परिपेततुः । उनके यहाँ आये हुए अतिथि ' रागखाण्डव ' नामक मोदक और विविध भोज्यपदार्थ खाकर मतवाले हो सड़कोंपर लेट जाते थे । मेरे मतमें उनके यहाँ यह एक अद्भुत बात थी,

पृष्ठ 428

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जिसकी दूसरे राजाओंसे तुलना नहीं हो सकती थी । राजा दिलीप युद्ध करते समय जलमें भी चले जाते तो उनके रथके पहिये वहाँ डूबते नहीं थे ॥ राजानं दृढधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम् ॥ ९ ॥

येऽपश्यन् भूरिदाक्षिण्यं तेऽपि स्वर्गजितो नराः । सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले तथा प्रचुर दक्षिणा देनेवाले सत्यवादी राजा दिलीपका जो लोग दर्शन कर लेते थे, वे मनुष्य भी स्वर्गलोकके अधिकारी हो जाते थे ॥ पञ्च शब्दा न जीर्यन्ति खट्वाङ्गस्य निवेशने ॥ १० ॥

स्वाध्यायघोषो ज्याघोषः पिबताश्नीत खादत । खट्वांग ( दिलीप ) -के भवनमें ये पाँच प्रकारके शब्द कभी बंद नहीं होते थे— वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायका शब्द, धनुषकी प्रत्यंचाकी ध्वनि तथा अतिथियोंके लिये कहे जानेवाले ‘ खाओ, पीओ और अन्न ग्रहण करो ' ये तीन शब्द ॥ १०३ ॥

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥ ११ ॥

पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।

अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥ १२ ॥

श्वैत्य सृ॑जय! वे दिलीप धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य- इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े - चढ़े थे, तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तब औरोंकी क्या बात है? अतः जिसने कभी यज्ञ नहीं किया, दक्षिणाएँ नहीं बाँटीं, अपने उस पुत्रके लिये तुम शोक न करो - इस प्रकार नारदजीने कहा ॥ ११-१२ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक इकसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

* यज्ञीय यूप या स्तम्भके ऊपर लगाये जानेवाले काठके छल्लेको 'चषाल' कहते हैं, इसीका उत्कृष्ट रूप ' प्रचषाल' है ।

पृष्ठ 429

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द्विषष्टितमोऽध्यायः राजा मान्धाताकी महत्ता नारदउवाच

मान्धाता चेद्यौवनाश्वो मृतः सृञ्जय शुश्रुम ।

देवासुरमनुष्याणां त्रैलोक्यविजयी नृपः ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं— संजय! युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता भी मरे थे, यह सुना गया है । वे देवता, असुर और मनुष्य- तीनों लोकोंमें विजयी थे ॥ १ ॥

यं देवावश्विनौ गर्भात् पितुः पूर्वं चकर्षतुः ।

मृगयां विचरन् राजा तृषितः क्लान्तवाहनः ॥ २ ॥

पूर्वकालमें दोनों अश्विनीकुमार नामक देवताओंने उन्हें पिताके पेटसे निकाला था । एक समयकी बात है, राजा युवनाश्व वनमें शिकार खेलनेके लिये विचर रहे थे । वहाँ उनका घोड़ा थक गया और उन्हें भी प्यास लग गयी ॥ २ ॥

धूमं दृष्ट्वागमत् सत्रं पृषदाज्यमवाप सः ।

तं दृष्ट्वा युवनाश्वस्य जठरे सूनुतां गतम् ॥ ३ ॥

गर्भाद्धि जह्रतुर्देवावश्विनौ भिषजां वरौ । इतनेमें दूरसे उठता हुआ धूआँ देखकर वे उसी ओर चले और एक यज्ञमण्डपमें जा पहुँचे । वहाँ एक पात्रमें रखे हुए घृतमिश्रित अभिमन्त्रित जलको उन्होंने पी लिया । उस जलको युवनाश्वके पेटमें पुत्ररूपमें परिणत हुआ देख वैद्योंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार नामक देवताओंने उसे पिताके गर्भसे बाहर निकाला ॥ ३३ ॥

तं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देववर्चसम् ॥। ४ ॥

अन्योन्यमब्रुवन् देवाः कमयं धास्यतीति वै ।

मामेवायं धयत्वग्रे इति ह स्माह वासवः ॥ ५ ॥

देवताके समान तेजस्वी उस शिशुको पिताकी गोदमें शयन करते देख देवता आपसमें कहने लगे, यह किसका दूध पीयेगा? यह सुनकर इन्द्रने कहा–यह पहले मेरा ही दूध पीये ॥ ४-५ ॥

ततोऽङ्गुलिभ्यो हीन्द्रस्य प्रादुरासीत् पयोऽमृतम् ।

मां धास्यतीति कारुण्याद् यदिन्द्रो ह्यन्वकम्पयत् ॥ ६ ॥

तस्मात्तु मान्धातेत्येवं नाम तस्याद्भुतं कृतम् । तदनन्तर इन्द्रकी अंगुलियोंसे अमृतमय दूध प्रकट हो गया; क्योंकि इन्द्रने करुणावश ‘ मां धास्यति ' ( मेरा दूध पीयेगा) ऐसा कहकर उसपर कृपा की थी, इसलिये उसका ‘ मान्धाता ’ यह अद्भुत नाम निश्चित कर दिया गया ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 430

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ततस्तु धारां पयसो घृतस्य च महात्मनः ॥ ७ ॥

तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् ।

अपिबत् पाणिमिन्द्रस्य स चाप्यह्नाभ्यवर्धत ॥ ८ ॥

तत्पश्चात् महामना मान्धाताके मुखमें इन्द्रके हाथने दूध और घीकी धारा बहायी । वह बालक इन्द्रका हाथ पीने लगा और एक ही दिनमें बहुत बढ़ गया ॥ ७-८ ॥

सोऽभवद् द्वादशसमो द्वादशाहेन वीर्यवान् ।

इमां च पृथिवीं कृत्स्नामेकाह्ना स व्यजीजयत् ॥ ९ ॥

वह पराक्रमी राजकुमार बारह दिनोंमें ही बारह वर्षोंकी अवस्थावाले बालकके समान हो गया । ( राजा होनेपर) मान्धाताने एक ही दिनमें इस सारी पृथ्वीको जीत लिया ॥ ९ ॥

धर्मात्मा धृतिमान् वीरः सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।

जनमेजयं सुधन्वानं गयं पूरुं बृहद्रथम् ॥ १० ॥

असितं च नृगं चैव मान्धाता मनुजोऽजयत् । वे धर्मात्मा, धैर्यवान्, शूरवीर, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे । मानव मान्धाताने जनमेजय, सुधन्वा, गय, पूरु, बृहद्रथ, असित और नृगको भी जीत लिया ॥ १० ॥

उदेति च यतः सूर्यो यत्र च प्रतितिष्ठति ॥ ११ ॥

तत् सर्वं यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते । सूर्य जहाँसे उदय होते थे और जहाँ जाकर अस्त होते थे, वह सारा का सारा प्रदेश युवनाश्वपुत्र मान्धाताका क्षेत्र ( राज्य) कहलाता था ॥ ११३ ॥

सोऽश्वमेधशतैरिष्ट्वा राजसूयशतेन च ॥ १२ ॥

अददद् रोहितान् मत्स्यान् ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते ।

हैरण्यान् यो जनोत्सेधानायतान् शतयोजनम् ॥ १३ ॥

राजन्! उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ योजन विस्तृत रोहितक, मत्स्य तथा हिरण्यमय ( सोनेकी खानोंसे युक्त ) जनपदोंको, जो लोगोंमें ऊँची भूमिके रूपमें प्रसिद्ध थे, ब्राह्मणोंको दे दिया ॥ १२-१३ ॥

बहुप्रकारान् सुस्वादून् भक्ष्यभोज्यान्नपर्वतान् ।

अतिरिक्तं ब्राह्मणेभ्यो भुञ्जानो हीयते जनः ॥ १४ ॥

अनेक प्रकारके सुस्वादु भक्ष्य - भोज्य पदार्थोंके पर्वत भी उन्होंने ब्राह्मणोंको दे दिये । ब्राह्मणोंके भोजनसे भी जो अन्न बच गया, उसे दूसरे लोगोंको दिया गया । उस अन्नको

खानेवाले लोगोंकी ही वहाँ कमी रहती थी । अन्न कभी नहीं घटता था ॥ १४ ॥

भक्ष्यान्नपाननिचयाः शुशुभुस्त्वन्नपर्वताः ।

घृतह्रदाः सूपकूपाः दधिफेना गुडोदकाः ॥ १५ ॥

रुरुधुः पर्वतान् नद्यो मधुक्षीरवहाः शुभाः ।