04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 61–70
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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तृतीयोऽध्यायः भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन संजय उवाच
शरतल्पे महात्मानं शयानममितौजसम् ।
महावातसमूहेन समुद्रमिव शोषितम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! अमित तेजस्वी महात्मा भीष्म बाण- शय्यापर सो रहे थे ।
उस समय वे प्रलयकालीन महावायुसमूहसे सोख लिये गये समुद्रके समान जान पड़ते थे ॥
दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं सर्वक्षत्रान्तकं गुरुम् ।
दिव्यैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना ॥ २ ॥
जयाशा तव पुत्राणां सम्भग्ना शर्म वर्म च ।
अपाराणामिव द्वीपमगाधे गाधमिच्छताम् ॥ ३ ॥
समस्त क्षत्रियोंका अन्त करनेमें समर्थ गुरु एवं पितामह महाधनुर्धर भीष्मको सव्यसाची अर्जुनने अपने दिव्यास्त्रोंके द्वारा मार गिराया था । उन्हें उस अवस्थामें देखकर आपके पुत्रोंकी विजयकी आशा भंग हो गयी । उन्हें अपने कल्याणकी भी आशा नहीं रही । उनके रक्षाकवच भी छिन्न-भिन्न हो गये। कहीं पार न पानेवाले तथा अथाह समुद्रमें थाह चाहनेवाले कौरवोंके लिये भीष्मजी द्वीपके समान आश्रय थे, जो पार्थद्वारा धराशायी कर दिये गये थे ॥ २-३ ॥
स्रोतसा यामुनेनेव शरौघेण परिप्लुतम् ।
महेन्द्रेणेव मैनाकमसह्यं भुवि पातितम् ॥ ४ ॥
वे यमुनाके जलप्रवाहके समान बाणसमूहसे व्याप्त हो रहे थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो महेन्द्रने असह्य मैनाक पर्वतको धरतीपर गिरा दिया हो ॥ ४ ॥
नभश्युतमिवादित्यं पतितं धरणीतले ।
शतक्रतुमिवाचिन्त्यं पुरा वृत्रेण निर्जितम् ॥ ५ ॥
वे आकाशसे च्युत होकर पृथ्वीपर पड़े हुए सूर्यके समान तथा पूर्वकालमें वृत्रासुरसे पराजित हुए अचिन्त्य देवराज इन्द्रके सदृश प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥
मोहनं सर्वसैन्यस्य युधि भीष्मस्य पातनम् ।
ककुदं सर्वसैन्यानां लक्ष्म सर्वधनुष्मताम् ॥ ६ ॥
धनंजयशरैर्व्याप्तं पितरं ते महाव्रतम् ।
तं वीरशयने वीरं शयानं पुरुषर्षभम् ॥ ७ ॥
भीष्ममाधिरथिर्दृष्ट्वा भरतानां महाद्युतिः ।
अवतीर्य रथादार्तो बाष्पव्याकुलिताक्षरम् ॥ ८ ॥
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अभिवाद्याञ्जलिं बद्ध्वा वन्दमानोऽभ्यभाषत । उस युद्धस्थलमें भीष्मका गिराया जाना समस्त सैनिकोंको मोहमें डालनेवाला था । आपके ज्येष्ठ पिता महान व्रतधारी भीष्म समस्त सैनिकोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंके शिरोमणि थे । वे अर्जुनके बाणोंसे व्याप्त होकर वीरशय्यापर सो रहे थे । उन भरतवंशी वीर पुरुषप्रवर भीष्मको उस अवस्थामें देखकर अधिरथपुत्र महातेजस्वी कर्ण अत्यन्त आर्त होकर रथसे उतर पड़ा और अंजलि बाँध अभिवादनपूर्वक प्रणाम करके आँसूसे गद्गद -वाणीमें इस प्रकार बोला – ॥ ६–८ ३ ॥ कर्णोऽहमस्मि भद्रं ते वद मामभि भारत ॥ ९ ॥
पुण्यया क्षेम्यया वाचा चक्षुषा चावलोकय । ‘ भारत! आपका कल्याण हो । मैं कर्ण हूँ । आप अपनी पवित्र एवं मंगलमयी वाणीद्वारा मुझसे कुछ कहिये और कल्याणमयी दृष्टिद्वारा मेरी ओर देखिये ॥ न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित् समश्नुते ॥ १० ॥
यत्र धर्मपरो वृद्धः शेते भुवि भवानिह । ‘निश्चय ही इस लोकमें कोई भी अपने पुण्यकर्मोंका फल यहाँ नहीं भोगता है; क्योंकि आप वृद्धावस्थातक सदा धर्ममें ही तत्पर रहे हैं, तो भी यहाँ इस दशामें धरतीपर सो रहे हैं ॥ १०३ ॥
कोशसंचयने मन्त्रे व्यूहे प्रहरणेषु च ॥ ११ ॥
नाहमन्यं प्रपश्यामि कुरूणां कुरुपुङ्गव ।
बुद्धया विशुद्धया युक्तो यः कुरूंस्तारयेद् भयात् ॥ १२ ॥
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योधांस्तु बहुधा हत्वा पितृलोकं गमिष्यति । ‘ कुरुश्रेष्ठ! कोश- संग्रह, मन्त्रणा, व्यूह -रचना तथा अस्त्र- शस्त्रोंके प्रहारमें आपके समान कौरववंशमें दूसरा कोई मुझे नहीं दिखायी देता, जो अपनी विशुद्ध बुद्धिसे युक्त हो समस्त कौरवोंको भयसे उबार सके तथा यहाँ बहुत-से योद्धाओंका वध करके अन्तमें पितृ-लोकको प्राप्त हो ॥ अद्यप्रभृति संक्रुद्धा व्याघ्रा इव मृगक्षयम् ॥ १३ ॥
पाण्डवा भरतश्रेष्ठ करिष्यन्ति कुरुक्षयम् । ‘ भरतश्रेष्ठ! आजसे क्रोधमें भरे हुए पाण्डव उसी प्रकार कौरवोंका विनाश करेंगे, जैसे व्याघ्र हिरनोंका ॥ अद्य गाण्डीवघोषस्य वीर्यज्ञाः सव्यसाचिनः ॥ १४ ॥
कुरवः संत्रसिष्यन्ति वज्रपाणेरिवासुराः । ‘ आज गाण्डीवकी टंकार करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके पराक्रमको जाननेवाले कौरव उनसे उसी प्रकार डरेंगे, जैसे वज्रधारी इन्द्रसे असुर भयभीत होते हैं ॥ अद्य गाण्डीवमुक्ताना- मशनीनामिव स्वनः ॥ १५ ॥
त्रासयिष्यति बाणानां कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् । ‘ आज गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंका वज्रपातके समान शब्द कौरवों तथा अन्य राजाओंको भयभीत कर देगा ॥ १५३ ॥
समिद्धोऽग्निर्यथा वीर महाज्वालो द्रुमान् दहेत् ॥ १६ ॥
धार्तराष्ट्रान् प्रधक्ष्यन्ति तथा बाणाः किरीटिनः । ' वीर! जैसे बड़ी - बड़ी लपटोंसे युक्त प्रज्वलित हुई आग वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनके बाण धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा उनके सैनिकोंको जला डालेंगे ॥ १६३ ॥
येन येन प्रसरतो वाय्वग्नी सहितौ वने ॥ १७ ॥
तेन तेन प्रदहतो भूरिगुल्मतृणद्रुमान् । 'वायु और अग्निदेव- ये दोनों एक साथ वनमें जिस -जिस मार्गसे फैलते हैं, उसी-उसके द्वारा बहुत - से तृण, वृक्ष और लताओंको भस्म करते जाते हैं ॥ यादृशोऽग्निः समुद्भूस्तादृक् पार्थो न संशयः ॥ १८ ॥
यथा वायुर्नरव्याघ्र तथा कृष्णो न संशयः ।
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' पुरुषसिंह! जैसी प्रज्वलित अग्नि होती है, वैसे ही कुन्तीकुमार अर्जुन हैं—इसमें संशय नहीं है और जैसी वायु होती है, वैसे ही श्रीकृष्ण हैं, इसमें भी संशय नहीं है ॥ १८३ || नदतः पाञ्चजन्यस्य रसतो गाण्डिवस्य च ॥ १ ९ ॥ श्रुत्वा सर्वाणि सैन्यानि त्रासं यास्यन्ति भारत । ‘ भारत! बजते हुए पांचजन्य और टंकारते हुए गाण्डीव धनुषकी भयंकर ध्वनि सुनकर आज सारी कौरव सेनाएँ भयभीत हो उठेंगी ॥ १ ९ ३ ॥ कपिध्वजस्योत्यततो रथस्यामित्रकर्षिणः ॥ २० ॥
शब्दं सोढुं न शक्ष्यन्ति त्वामृते वीर पार्थिवाः । ' वीर! शत्रुसूदन कपिध्वज अर्जुनके उड़ते हुए रथकी घरघराहटको आपके सिवा दूसरे राजा नहीं सह सकेंगे ॥ २० ॥
को ह्यर्जुनं योधयितुं त्वदन्यः पार्थिवोऽर्हति ॥ २१ ॥
यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः ।
अमानुषैश्च संग्रामस्त्र्यम्बकेण महात्मना ॥ २२ ॥
तस्माच्चैव वरं प्राप्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
कोऽन्यः शक्तो रणे जेतुं पूर्वं यो न जितस्त्वया ॥ २३ ॥
' आपके सिवा दूसरा कौन राजा अर्जुनसे युद्ध कर सकता है? मनीषी पुरुष जिनके दिव्य कर्मोंका बखान करते हैं, जो मानवेतर प्राणियों - असुरों तथा दैत्योंसे भी संग्राम कर चुके हैं, त्रिनेत्रधारी महात्मा भगवान् शंकरके साथ भी जिन्होंने युद्ध किया है और उनसे वह उत्तम वर प्राप्त किया है, जो अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है, जिन्हें पहले आप भी जीत नहीं सके हैं, उन्हें आज दूसरा कौन युद्धमें जीत सकता है? ॥ २१–२३ ॥
जितो येन रणे रामो भवता वीर्यशालिना ।
क्षत्रियान्तकरो घोरो देवदानवदर्पहा ॥ २४ ॥
‘ आप अपने पराक्रमसे शोभा पानेवाले वीर थे । आपने देवताओं तथा दानवोंका दर्प दलन करनेवाले क्षत्रियहन्ता घोर परशुरामजीको भी युद्धमें जीत लिया है ॥ २४ ॥
तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्ड- ममृष्यमाणो भवता चानुशिष्टः । आशीविषं दृष्टिहरं सुघोरं शूरं शक्ष्याम्यस्त्रबलान्निहन्तुम् ॥ २५ ॥
‘ आज यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अमर्षमें भरकर दृष्टि हर लेनेवाले विषधर सर्पके समान अत्यन्त भयंकर युद्धकुशल शूरवीर पाण्डुपुत्र अर्जुनको अपने अस्त्रबलसे मार सकूँगा' ॥ २५ ॥
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णवाक्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेक पर्वमें कर्णवाक्यविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
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चतुर्थोऽध्यायः भीष्मजीका कर्णको प्रोत्साहन देकर युद्धके लिये भेजना तथा कर्णके आगमनसे कौरवोंका हर्षोल्लास संजय उवाच
तस्य लालप्यतः श्रुत्वा कुरुवृद्धः पितामहः ।
देशकालोचितं वाक्यमब्रवीत् प्रीतमानसः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार बहुत कुछ बोलते हुए कर्णकी बात सुनकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मने प्रसन्नचित्त होकर देश और कालके अनुसार यह बात कही —
समुद्र इव सिन्धूनां ज्योतिषामिव भास्करः ।
सत्यस्य च यथा सन्तो बीजानामिव चोर्वरा ॥ २ ॥
पर्जन्य इव भूतानां प्रतिष्ठा सुहृदां भव ।
बान्धवास्त्वानुजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः ॥ ३ ॥
‘ कर्ण! जैसे सरिताओंका आश्रय समुद्र, ज्योतिर्मय पदार्थोंका सूर्य, सत्यका साधु पुरुष, बीजोंका उर्वरा भूमि और प्राणियोंकी जीविकाका आधार मेघ है, उसी प्रकार तुम भी अपने सुहृदोंके आश्रयदाता बनो । जैसे देवता सहस्रलोचन इन्द्रका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त बन्धु बान्धव तुम्हारा आश्रय लेकर जीवन धारण करें ॥ २-३ ॥
मानहा भव शत्रूणां मित्राणां नन्दिवर्धनः ।
कौरवाणां भव गतिर्यथा विष्णुर्दिवौकसाम् ॥ ४ ॥
'तुम शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले और मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले होओ । जैसे भगवान् विष्णु देवताओंके आश्रय हैं, उसी प्रकार तुम कौरवोंके आधार बनो ॥ ४ ॥
स्वबाहुबलवीर्येण धार्तराष्ट्रजयैषिणा ।
कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजा निर्जितास्त्वया ॥ ५ ॥
‘ कर्ण! तुमने दुर्योधनके लिये विजयकी इच्छा रखकर अपनी भुजाओंके बल और पराक्रमसे राजपुरमें जाकर समस्त काम्बोजोंपर विजय पायी है ॥ ५ ॥
गिरिव्रजगताश्चापि नग्नजित्प्रमुखा नृपाः ।
अम्बष्ठाश्च विदेहाश्च गान्धाराश्च जितास्त्वया ॥ ६ ॥
'गिरिव्रजके निवासी नग्नजित् आदि नरेश, अम्बष्ठ, विदेह और गान्धारदेशीय क्षत्रियोंको भी तुमने परास्त किया है ॥ ६ ॥
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हिमवदुर्गनिलयाः किराता रणकर्कशाः ।
दुर्योधनस्य वशगास्त्वया कर्ण पुरा कृताः ॥ ७ ॥
' कर्ण! पूर्वकालमें तुमने हिमालयके दुर्गमें निवास करनेवाले रणकर्कश किरातोंको भी जीतकर दुर्योधनके अधीन कर दिया था ॥ ७ ॥
उत्कला मेकलाः पौण्ड्राः कलिङ्गान्ध्राश्च संयुगे ।
निषादाश्च त्रिगर्ताश्च बाह्लीकाश्च जितास्त्वया ॥ ८ ॥
‘ उत्कल, मेकल, पौण्ड्र, कलिंग, अंध्र, निषाद, त्रिगर्त और बाह्लीक आदि देशोंके राजाओंको भी तुमने परास्त किया है ॥ ८ ॥
तत्र तत्र च संग्रामे दुर्योधनहितैषिणा ।
बहवश्च जिताः कर्ण त्वया वीरा महौजसा ॥ ९ ॥
‘ कर्ण! इनके सिवा और भी जहाँ - तहाँ संग्राम- भूमिमें दुर्योधनका हित चाहनेवाले तुम महापराक्रमी शूरवीरने बहुत - से वीरोंपर विजय पायी है ॥ ९ ॥
यथा दुर्योधनस्तात सज्ञातिकुलबान्धवः ।
तथा त्वमपि सर्वेषां कौरवाणां गतिर्भव ॥ १० ॥
' तात! कुटुम्बी, कुल और बन्धु - बान्धवोंसहित दुर्योधन जैसे सब कौरवोंका आधार है, उसी प्रकार तुम भी कौरवोंके आश्रयदाता बनो ॥ १० ॥
शिवेनाभिवदामि त्वां गच्छ युध्यस्व शत्रुभिः ।
अनुशाधि कुरून् संख्ये धत्स्व दुर्योधने जयम् ॥ ११ ॥
' मैं तुम्हारा कल्याणचिन्तन करते हुए तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ, जाओ, शत्रुओंके साथ युद्ध करो । रणक्षेत्रमें कौरव सैनिकोंको कर्तव्यका आदेश दो और दुर्योधनको विजय प्राप्त कराओ ॥ ११ ॥
भवान् पौत्रसमोऽस्माकं यथा दुर्योधनस्तथा ।
तवापि धर्मतः सर्वे यथा तस्य वयं तथा ॥ १२ ॥
'दुर्योधनकी तरह तुम भी मेरे पौत्रके समान हो । धर्मतः जैसे मैं उसका हितैषी हूँ, उसी प्रकार तुम्हारा भी हूँ ॥
यौनात् सम्बन्धकाल्लोके विशिष्टं संगतं सताम् ।
सद्भिः सह नरश्रेष्ठ प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ १३ ॥
‘ नरश्रेष्ठ! संसारमें यौन ( कौटुम्बिक) - सम्बन्धकी अपेक्षा साधु पुरुषोंके साथ की हुई मैत्रीका सम्बन्ध श्रेष्ठ है; यह मनीषी महात्मा कहते हैं ॥ १३ ॥
स सत्यसंगतो भूत्वा ममेदमिति निश्चितः ।
कुरूणां पालय बलं यथा दुर्योधनस्तथा ॥ १४ ॥
' तुम सच्चे मित्र होकर और यह सब कुछ मेरा ही है, ऐसा निश्चित विचार रखकर दुर्योधनके ही समान समस्त कौरवदलकी रक्षा करो ' ॥ १४ ॥
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निशम्य वचनं तस्य चरणावभिवाद्य च ।
ययौ वैकर्तनः कर्णः समीपं सर्वधन्विनाम् ॥ १५ ॥
भीष्मजीका यह वचन सुनकर विकर्तनपुत्र कर्णने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और वह फिर सम्पूर्ण धनुर्धर सैनिकोंके समीप चला गया ॥ १५ ॥
सोऽभिवीक्ष्य नरौघाणां स्थानमप्रतिमं महत् ।
व्यूढप्रहरणोरस्कं सैन्यं तत् समबृंहयत् ॥ १६ ॥
वहाँ कर्णने कौरव सैनिकोंका वह अनुपम एवं विशाल स्थान देखा। समस्त सैनिक व्यूहाकारमें खड़े थे और अपने वक्षःस्थलके समीप अनेक प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंको बाँधे हुए थे । कर्णने उस समय सारी कौरव सेनाको उत्साहित किया ॥ १६ ॥
हृषिताः कुरवः सर्वे दुर्योधनपुरोगमाः ।
उपागतं महाबाहुं सर्वानीकपुरःसरम् ॥ १७ ॥
कर्णं दृष्ट्वा महात्मानं युद्धाय समुपस्थितम् । समस्त सेनाओंके आगे चलनेवाले महाबाहु, महामनस्वी कर्णको आया और युद्धके लिये उपस्थित हुआ देख दुर्योधन आदि समस्त कौरव हर्षसे खिल उठे ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवैः सिंहनादरवैरपि ।
धनुःशब्दैश्च विविधैः कुरवः समपूजयन् ॥ १८ ॥
उन समस्त कौरवोंने उस समय गर्जने, ताल ठोकने, सिंहनाद करने तथा नाना प्रकारसे धनुषकी टंकार फैलाने आदिके द्वारा कर्णका स्वागत- सत्कार किया ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णाश्वासे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें कर्णका आश्वासनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
Fard Face
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पञ्चमोऽध्यायः कर्णका दुर्योधनके समक्ष सेनापति पदके लिये द्रोणाचार्यका नाम प्रस्तावित करना संजय उवाच
रथस्थं पुरुषव्याघ्रं दृष्ट्वा कर्णमवस्थितम् ।
हृष्टो दुर्योधनो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! पुरुषसिंह कर्णको रथपर बैठा देख दुर्योधनने प्रसन्न होकर इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
सनाथमिव मन्येऽहं भवता पालितं बलम् ।
अत्र किं नु समर्थं यद्धितं तत् सम्प्रधार्यताम् ॥ २ ॥
‘ कर्ण! तुम्हारे द्वारा इस सेनाका संरक्षण हो रहा है, इससे मैं इसे सनाथ हुई- सी मानता हूँ । अब यहाँ हमारे लिये क्या करना उपयोगी और हितकर है, इसका निश्चय करो ' ॥ २ ॥
कर्णउवाच
ब्रूहि नः पुरुषव्याघ्र त्वं हि प्राज्ञतमो नृप ।
यथा चार्थपतिः कृत्यं पश्यते न तथेतरः ॥ ३ ॥
कर्णने कहा – पुरुषसिंह नरेश्वर! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो । स्वयं ही अपना विचार हमें बताओ; क्योंकि धनका स्वामी उसके सम्बन्धमें आवश्यक कर्तव्यका जैसा विचार करता है, वैसा दूसरा कोई नहीं कर सकता ॥ ३ ॥
ते स्म सर्वे तव वचः श्रोतुकामा नरेश्वर ।
नान्याय्यं हि भवान् वाक्यं ब्रूयादिति मतिर्मम ॥ ४ ॥
अतः नरेश्वर! हम सब लोग तुम्हारी ही बात सुनना चाहते हैं । मेरा विश्वास है कि तुम कोई ऐसी बात नहीं कहोगे, जो न्यायसंगत न हो ॥ ४ ॥
दुर्योधन उवाच
भीष्मः सेनाप्रणेताऽऽसीद् वयसा विक्रमेण च ।
श्रुतेन चोपसम्पन्नः सर्वैर्योधगणैस्तथा ॥ ५ ॥
तेनातियशसा कर्ण घ्नता शत्रुगणान् मम ।
सुयुद्धेन दशाहानि पालिताः स्मो महात्मना ॥ ६ ॥
दुर्योधनने कहा – कर्ण! पहले आयु, बल- पराक्रम और विद्यामें सबसे बढ़े - चढ़े पितामह भीष्म हमारे सेनापति थे । वे अत्यन्त यशस्वी महात्मा पितामह समस्त योद्धाओंको
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साथ ले उत्तम युद्ध - प्रणालीद्वारा मेरे शत्रुओंका संहार करते हुए दस दिनोंतक हमारा पालन करते आये हैं ॥ ५-६ ॥
तस्मिन्नसुकरं कर्म कृतवत्यास्थिते दिवम् ।
कं नु सेनाप्रणेतारं मन्यसे तदनन्तरम् ॥ ७ ॥
वे तो अत्यन्त दुष्कर कर्म करके अब स्वर्गलोकके पथपर आरूढ़ हो गये हैं । ऐसी दशामें उनके बाद तुम किसे सेनापति बनाये जानेयोग्य मानते हो? ॥ ७ ॥
न विना नायकं सेना मुहूर्तमपि तिष्ठति ।
आहवेष्वाहवश्रेष्ठ नेतृहीनेव नौर्जले ॥ ८ ॥
समरांगणके श्रेष्ठ वीर! सेनापतिके बिना कोई सेना दो घड़ी भी संग्राममें टिक नहीं सकती है । ठीक उसी तरह, जैसे मल्लाहके बिना नाव जलमें स्थिर नहीं रह सकती है ॥ ८ ॥
यथा ह्यकर्णधारा नौ रथश्चासारथिर्यथा ।
द्रवेद् यथेष्टं तद्वत् स्यादृते सेनापतिं बलम् ॥ ९ ॥
जैसे बिना नाविककी नाव जहाँ -कहीं भी जलमें बह जाती है और बिना सारथिका रथ चाहे जहाँ भटक जाता है, उसी प्रकार सेनापतिके बिना सेना भी जहाँ चाहे भाग सकती है ॥ ९ ॥
अदेशिको यथा सार्थः सर्वः कृच्छ्रं समृच्छति ।
अनायका तथा सेना सर्वान् दोषान् समर्छति ॥ १० ॥
जैसे कोई मार्गदर्शक न होनेपर यात्रियोंका सारा दल भारी संकटमें पड़ जाता है, उसी प्रकार सेनानायकके बिना सेनाको सब प्रकारकी कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है ॥ १० ॥
स भवान् वीक्ष्य सर्वेषु मामकेषु महात्मसु ।
पश्य सेनापतिं युक्तमनु शान्तनवादिह ॥ ११ ॥
अतः तुम मेरे पक्षके सब महामनस्वी वीरोंपर दृष्टि डालकर यह देखो कि भीष्मजीके बाद अब कौन उपयुक्त सेनापति हो सकता है ॥ ११ ॥
यं हि सेनाप्रणेतारं भवान् वक्ष्यति संयुगे ।
तं वयं सहिताः सर्वे करिष्यामो न संशयः ॥ १२ ॥
इस युद्धस्थलमें तुम जिसे सेनापतिपदके योग्य बताओगे, निःसंदेह हम सब लोग मिलकर उसीको सेनानायक बनायेंगे ॥ १२ ॥
कर्णउवाच
सर्व एव महात्मान इमे पुरुषसत्तमाः ।
सेनापतित्वमर्हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १३ ॥