04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 621–630
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
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किं न पश्यसि बाणौघान् क्रोशमात्रे किरीटिनः ।
पश्चाद् रथस्य पतितान् क्षिप्तान् शीघ्रं हि गच्छतः ॥ २१ ॥
क्या तुम देखते नहीं हो कि मेरे चलाये हुए बाणसमूह शीघ्रगामी अर्जुनके रथके एक कोस पीछे पड़े हैं ॥ २१ ॥
न चाहं शीघ्रयानेऽद्य समर्थो वयसान्वितः ।
सेनामुखे च पार्थानामेतद् बलमुपस्थितम् ॥ २२ ॥
मैं बूढ़ा हो गया । अतः अब मैं शीघ्रतापूर्वक रथ चलानेमें असमर्थ हूँ । इधर मेरी सेनाके सामने यह कुन्तीकुमारोंकी भारी सेना उपस्थित है ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरश्च मे ग्राह्य मिषतां सर्वधन्विनाम् ।
एवं मया प्रतिज्ञातं क्षत्रमध्ये महाभुज ॥ २३ ॥
महाबाहो! मैंने क्षत्रियोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की है कि समस्त धनुर्धरोंके देखते - देखते युधिष्ठिरको कैद कर लूँगा ॥ २३ ॥
धनंजयेन चोत्सृष्टो वर्तते प्रमुखे नृप ।
तस्माद् व्यूहमुखं हित्वा नाहं योत्स्यामि फाल्गुनम् ॥ २४ ॥
नरेश्वर! इस समय युधिष्ठिर अर्जुनसे रहित होकर मेरे सामने खड़े हैं । ऐसी अवस्थामें मैं व्यूहका द्वार छोड़कर अर्जुनके साथ युद्ध करनेके लिये नहीं जाऊँगा ॥ २४ ॥
तुल्याभिजनकर्माणं शत्रुमेकं सहायवान् ।
गत्वा योधय मा भैस्त्वं त्वं ह्यस्य जगतः पतिः ॥ २५ ॥
तुम्हारे शत्रु अर्जुन भी तो तुम्हारे -जैसे ही कुल और पराक्रमसे युक्त हैं । इस समय वे अकेले हैं और तुम सहायकोंसे सम्पन्न हो । ( वे राज्यसे च्युत हो गये हैं और तुम ) इस सम्पूर्ण
जगत्के स्वामी हो । अतः डरो मत । जाकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ २५ ॥
राजा शूरः कृती दक्षो वैरमुत्पाद्य पाण्डवैः ।
वीर स्वयं प्रयाह्यत्र यत्र पार्थो धनंजयः ॥ २६ ॥
तुम राजा, शूरवीर, विद्वान् और युद्धकुशल हो । वीर! तुमने ही पाण्डवोंके साथ वैर बाँधा है । अतः जहाँ कुन्तीकुमार अर्जुन गये हैं, वहाँ उनसे युद्ध करनेके लिये स्वयं ही शीघ्रतापूर्वक जाओ ॥ २६ ॥
दुर्योधन उवाच
कथं त्वामप्यतिक्रान्तः सर्वशस्त्रभृतां बरम् ।
धनंजयो मया शक्य आचार्य प्रतिबाधितुम् ॥ २७ ॥
दुर्योधन बोला – आचार्य! आप सम्पूर्ण शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ हैं । जो आपको भी लाँघकर आगे बढ़ गया, वह अर्जुन मेरे द्वारा कैसे रोका जा सकता है? ॥ अपि शक्यो रणे जेतुं वज्रहस्तः पुरंदरः ।
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नार्जुनः समरे शक्यो जेतुं परपुरंजयः ॥ २८ ॥
युद्धमें वज्रधारी इन्द्रको भी जीता जा सकता है; परंतु समरांगणमें शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले अर्जुनको जीतना असम्भव है ॥ २८ ॥
येन भोजश्च हार्दिक्यो भवांश्च त्रिदशोपमः ।
अस्त्रप्रतापेन जितौ श्रुतायुश्च निबर्हितः ॥ २ ९ ॥
सुदक्षिणश्च निहतः स च राजा श्रुतायुधः ।
श्रुतायुश्चाच्युतायुश्च म्लेच्छाश्चायुतशो हताः ॥ ३० ॥
तं कथं पाण्डवं युद्धे दहन्तमिव पावकम् ।
प्रतियोत्स्यामि दुर्धर्षं तमहं शस्त्रकोविदम् ॥ ३१ ॥
जिसने भोजवंशी कृतवर्मा तथा देवताओंके समान तेजस्वी आपको भी अपने अस्त्रके प्रतापसे पराजित कर दिया, श्रुतायुका संहार कर डाला, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा राजा श्रुतायुधको भी मार डाला, श्रुतायु, अच्युतायु तथा सहस्रों म्लेच्छ सैनिकोंके भी प्राण ले लिये, युद्धमें अग्निके समान शत्रुओंको दग्ध करनेवाले और अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता उस दुर्धर्ष वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ मैं कैसे युद्ध कर सकूँगा? ॥ २ ९ –३१ ॥
क्षमं च मन्यसे युद्धं मम तेनाद्य संयुगे ।
परवानस्मि भवति प्रेष्यवद् रक्ष मद्यशः ॥ ३२ ॥
यदि आज युद्धस्थलमें आप अर्जुनके साथ मेरा युद्ध करना उचित मानते हैं तो मैं एक
सेवककी भाँति आपकी आज्ञाके अधीन हूँ । आप मेरे यशकी रक्षा कीजिये ॥ ३२ ॥
द्रोणउवाच
सत्यं वदसि कौरव्य दुराधर्षो धनंजयः ।
अहं तु तत् करिष्यामि यथैनं प्रसहिष्यसि ॥ ३३ ॥
द्रोणाचार्यने कहा – कुरुनन्दन! तुम ठीक कहते हो । अर्जुन अवश्य दुर्जय वीर हैं ।
परंतु मैं एक ऐसा उपाय कर दूँगा, जिससे तुम उनका वेग सह सकोगे ॥ ३३ ॥
अद्भुतं चाद्य पश्यन्तु लोके सर्वधनुर्धराः ।
विषक्तं त्वयि कौन्तेयं वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३४ ॥
आज संसारके सम्पूर्ण धनुर्धर भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही कुन्तीकुमार अर्जुनको तुम्हारे साथ युद्धमें उलझे रहनेकी अद्भुत घटना देखें ॥ ३४ ॥
एष ते कवचं राजंस्तथा बध्नामि काञ्चनम् ।
यथा न बाणा नास्त्राणि प्रहरिष्यन्ति ते रणे ॥ ३५ ॥
राजन्! मैं यह सुवर्णमय कवच तुम्हारे शरीरमें इस प्रकार बाँध देता हूँ, जिससे युद्धस्थलमें छूटनेवाले बाण और अन्य अस्त्र तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकेंगे ॥ ३५ ॥
यदि त्वां सासुरसुराः सयक्षोरगराक्षसाः ।
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योधयन्ति त्रयो लोकाः सनरा नास्ति ते भयम् ॥ ३६ ॥
यदि मनुष्योंसहित देवता, असुर, यक्ष, नाग, राक्षस तथा तीनों लोकके प्राणी तुमसे युद्ध करते हों तो भी आज तुम्हें कोई भय नहीं होगा ॥ ३६ ॥
न कृष्णो न च कौन्तेयो न चान्यः शस्त्रभृद् रणे ।
शरानर्पयितुं कश्चित् कवचे तव शक्ष्यति ॥ ३७ ॥
इस कवचके रहते हुए श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा दूसरे कोई शस्त्रधारी योद्धा भी तुम्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचानेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ ३७ ॥
स त्वं कवचमास्थाय क्रुद्धमद्य रणेऽर्जुनम् ।
त्वरमाणः स्वयं याहि न त्वासौ विसहिष्यति ॥ ३८ ॥
अतः तुम यह कवच धारण करके शीघ्रतापूर्वक रणक्षेत्रमें कुपित हुए अर्जुनका सामना
करनेके लिये स्वयं ही जाओ । वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे ॥ ३८ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा त्वरन् द्रोणः स्पृष्ट्वाम्भा वर्म भास्वरम् ।
आबबन्धाद्भुततमं जपन् मन्त्रं यथाविधि ॥ ३ ९ ॥
रणे तस्मिन् सुमहति विजयाय सुतस्य ते ।
विसिस्मापयिषुर्लोकान् विद्यया ब्रह्मवित्तमः ॥ ४० ॥
संजय कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने अपनी विद्याके प्रभावसे सब लोगोंको आश्चर्यमें डालनेकी इच्छा रखते हुए तुरंत आचमन करके उस महायुद्धमें आपके पुत्र दुर्योधनकी विजयके लिये उसके शरीरमें विधिपूर्वक मन्त्रजपके साथ - साथ वह अत्यन्त तेजस्वी अद्भुत कवच बाँध दिया ॥ ३ ९ -४० ॥ द्रोणउवाच
करोतु स्वस्ति ते ब्रह्म ब्रह्मा चापि द्विजातयः ।
सरीसृपाश्च ये श्रेष्ठास्तेभ्यस्ते स्वस्ति भारत ॥ ४१ ॥
द्रोणाचार्य बोले — भरतनन्दन! परब्रह्म परमात्मा तुम्हारा कल्याण करें । ब्रह्माजी तथा ब्राह्मण तुम्हारा मंगल करें । जो श्रेष्ठ सर्प हैं, उनसे भी तुम्हारा कल्याण हो ॥ ४१ ॥
ययातिर्नाहुषश्चैव धुन्धुमारो भगीरथः ।
तुभ्यं राजर्षयः सर्वे स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ॥ ४२ ॥
नहुषपुत्र ययाति, धुन्धुमार और भगीरथ आदि सभी राजर्षि सदा तुम्हारी भलाई करें ॥ ४२ ॥
स्वस्ति तेऽस्त्वेकपादेभ्यो बहुपादेभ्य एव च ।
स्वस्त्यस्त्वपादकेभ्यश्च नित्यं तव महारणे ॥ ४३ ॥
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इस महायुद्धमें एक पैरवाले, अनेक पैरवाले तथा पैरोंसे रहित प्राणियोंसे तुम्हारा नित्य मंगल हो ॥ ४३ ॥
स्वाहा स्वधा शची चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ।
लक्ष्मीररुन्धती चैव कुरुतां स्वस्ति तेऽनघ ॥ ४४ ॥
निष्पाप नरेश! स्वाहा, स्वधा और शची आदि देवियाँ तुम्हारा सदा कल्याण करें । लक्ष्मी और अरुन्धती भी तुम्हारा मंगल करें ॥ ४४ ॥
असितो देवलश्चैव विश्वामित्रस्तथाङ्गिराः ।
वसिष्ठः कश्यपश्चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते नृप ॥ ४५ ॥
नरेश्वर! असित, देवल, विश्वामित्र, अंगिरा, वसिष्ठ तथा कश्यप तुम्हारा भला करें ॥ ४५ ॥
धाता विधाता लोकेशो दिशश्च सदिगीश्वराः ।
स्वस्ति तेऽद्य प्रयच्छन्तु कार्तिकेयश्च षण्मुखः ॥ ४६ ॥
धाता, विधाता, लोकनाथ ब्रह्मा, दिशाएँ, दिक्पाल तथा षडानन कार्तिकेय भी आज तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ ४६ ॥
विवस्वान् भगवान् स्वस्ति करोतु तव सर्वशः ।
दिग्गजाश्चैव चत्वारः क्षितिश्च गगनं ग्रहाः ॥ ४७ ॥
भगवान् सूर्य सब प्रकारसे तुम्हारा मंगल करें । चारों दिग्गज, पृथ्वी, आकाश और ग्रह तुम्हारा भला करें ॥
अधस्ताद् धरणीं योऽसौ सदा धारयते नृप ।
शेषश्च पन्नगश्रेष्ठः स्वस्ति तुभ्यं प्रयच्छतु ॥ ४८ ॥
राजन्! जो सदा इस पृथ्वीके नीचे रहकर इसे अपने मस्तकपर धारण करते हैं, वे पन्नगश्रेष्ठ भगवान् शेषनाग तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ ४८ ॥
गान्धारे युधि विक्रम्य निर्जिताः सुरसत्तमाः ।
पुरा वृत्रेण दैत्येन भिन्नदेहाः सहस्रशः ॥ ४ ९ ॥
गान्धारीनन्दन! प्राचीन कालकी बात है, वृत्रासुरने युद्धमें पराक्रमपूर्वक सहस्रों श्रेष्ठ देवताओंके शरीरको विदीर्ण करके उन्हें परास्त कर दिया था ॥ ४ ९ ॥
हृततेजोबलाः सर्वे तदा सेन्द्रा दिवौकसः ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुर्वृत्राद् भीता महासुरात् ॥ ५० ॥
उस समय तेज और बलसे हीन हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता महान् असुर वृत्रसे भयभीत हो ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ५० ॥
देवा ऊचुः प्रमर्दितानां वृत्रेण देवानां देवसत्तम ।
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गतिर्भव सुरश्रेष्ठ त्राहि नो महतो भयात् ॥ ५१ ॥
देवता बोले – देवप्रवर! सुरश्रेष्ठ! वृत्रासुरने जिन्हें सब प्रकारसे कुचल दिया है, उन
देवताओंके लिये आप आश्रयदाता हों । महान् भयसे हमारी रक्षा करें ॥
अथ पार्श्वे स्थितं विष्णुं शक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।
प्राह तथ्यमिदं वाक्यं विषण्णान् सुरसत्तमान् ॥ ५२ ॥
तब अपने पास खड़े हुए भगवान् विष्णु तथा विषादमें भरे हुए इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंसे ब्रह्माजीने यह यथार्थ बात कही- ॥ ५२ ॥
रक्ष्या मे सततं देवाः सहेन्द्राः सद्विजातयः ।
त्वष्टुः सुदुर्धरं तेजो येन वृत्रो विनिर्मितः ॥ ५३ ॥
‘ देवताओ! इन्द्र आदि देवता और ब्राह्मण सदा ही मेरे रक्षणीय हैं । परंतु वृत्रासुरका जिससे निर्माण हुआ है, वह त्वष्टा प्रजापतिका अत्यन्त दुर्धर्ष तेज है ॥ ५३ ॥
त्वष्ट्रा पुरा तपस्तप्त्वा वर्षायुतशतं तदा ।
वृत्रो विनिर्मितो देवाः प्राप्यानुज्ञां महेश्वरात् ॥ ५४ ॥
' देवगण! प्राचीन कालमें त्वष्टा प्रजापतिने दस लाख वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् शंकरसे वरदान पाकर वृत्रासुरको उत्पन्न किया था ॥ ५४ ॥
स तस्यैव प्रसादाद् वो हन्यादेव रिपुर्बली ।
नागत्वा शंकरस्थानं भगवान् दृश्यते हरः ॥ ५५ ॥
‘ वह बलवान् शत्रु भगवान् शंकरके ही प्रसादसे निश्चय ही तुम सब लोगोंको मार सकता है । अतः भगवान् शंकरके निवासस्थानपर गये बिना उनका दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥
दृष्ट्वा जेष्यथ वृत्रं तं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् ।
यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षयज्ञविनाशनः ॥ ५६ ॥
पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः । ‘ उनका दर्शन पाकर तुमलोग वृत्रासुरको जीत सकोगे । अतः शीघ्र ही मन्दराचलको चलो, जहाँ तपस्याके उत्पत्तिस्थान, दक्षयज्ञविनाशक तथा भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले सर्वभूतेश्वर पिनाकधारी भगवान् शिव विराजमान हैं ' ॥ ५६३ ॥
ते गत्वा सहिता देवा ब्रह्मणा सह मन्दरम् ॥ ५७ ॥
अपश्यंस्तेजसां राशिं सूर्यकोटिसमप्रभम् । ' तब एकत्र हुए उन सब देवताओंने ब्रह्माजीके साथ मन्दराचलपर जाकर करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् तेजोराशि भगवान् शिवका दर्शन किया ॥ ५७३ ॥
सोऽब्रवीत् स्वागतं देवा ब्रुत किं करवाण्यहम् ॥ ५८ ॥
अमोघं दर्शनं मह्यं कामप्राप्तिरतोऽस्तु वः ।
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उस समय भगवान् शिवने कहा – ' देवताओ! तुम्हारा स्वागत है । बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? मेरा दर्शन अमोघ है । अतः तुम्हें अपने अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति हो ’ ॥ एवमुक्तास्तु ते सर्वे प्रत्यूचुस्तं दिवौकसः ॥ ५ ९ ॥ तेजो हृतं नो वृत्रेण गतिर्भव दिवौकसाम् ।
मूर्तीरीक्षस्व नो देव प्रहारैर्जर्जरीकृताः ।
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म गतिर्भव महेश्वर ॥ ६० ॥
उनके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवता इस प्रकार बोले— ' देव! वृत्रासुरने हमारा तेज हर लिया है । आप देवताओंके आश्रयदाता हों । महेश्वर! आप हमारे शरीरोंकी दशा देखिये । हम वृत्रासुरके प्रहारोंसे जर्जर हो गये हैं, इसलिये आपकी शरणमें आये हैं । आप हमें आश्रय दीजिये ' ॥ ५ ९ -६० || शर्वउवाच
विदितं वो यथा देवाः कृत्येयं सुमहाबला ।
त्वष्टुस्तेजोभवा घोरा दुर्निवार्याकृतात्मभिः ॥ ६१ ॥
भगवान् शिव बोले- देवताओ! तुम्हें विदित हो कि यह प्रजापति त्वष्टाके तेजसे उत्पन्न हुई अत्यन्त प्रबल एवं भयंकर कृत्या है । जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये इस कृत्याका निवारण करना अत्यन्त कठिन है ॥ ६१ ॥
अवश्यं तु मया कार्यं साह्यं सर्वदिवौकसाम् ।
ममेदं गात्रजं शक्र कवचं गृह्य भास्वरम् ॥ ६२ ॥
तथापि मुझे सम्पूर्ण देवताओंकी सहायता अवश्य करनी चाहिये । अतः इन्द्र! मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए इस तेजस्वी कवचको ग्रहण करो ॥ ६२ ॥
बधानानेन मन्त्रेण मानसेन सुरेश्वर ।
वधायासुरमुख्यस्य वृत्रस्य सुरघातिनः ॥ ६३ ॥
सुरेश्वर! मेरे बताये हुए इस मन्त्रका मानसिक जप करके असुरमुख्य देवशत्रु वृत्रका वध करनेके लिये इसे अपने शरीरमें बाँध लो ॥ ६३ ॥
द्रोणउवाच
इत्युक्त्वा वरदः प्रादाद् वर्म तन्मन्त्रमेव च ।
स तेन वर्मणा गुप्तः प्रायाद् वृत्रचमूं प्रति ॥ ६४ ॥
द्रोणाचार्य कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर वरदायक भगवान् शंकरने वह कवच और उसका मन्त्र उन्हें दे दिया । उस कवचसे सुरक्षित हो इन्द्र वृत्रासुरकी सेनाका सामना करनेके लिये गये ॥ ६४ ॥
नानाविधैश्च शस्त्रौघैः पात्यमानैर्महारणे ।
न संधिः शक्यते भेत्तुं वर्मबन्धस्य तस्य तु ॥ ६५ ॥
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उस महान् युद्धमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंके समुदाय उनके ऊपर चलाये गये; परंतु उनके द्वारा इन्द्रके उस कवच - बन्धनकी सन्धि भी नहीं काटी जा सकी ॥
ततो जघान समरे वृत्रं देवपतिः स्वयम् ।
तं च मन्त्रमयं बन्धं वर्म चाङ्गिरसे ददौ ॥ ६६ ॥
तदनन्तर देवराज इन्द्रने स्वयं ही समरांगणमें वृत्रासुरको मार डाला । इसके बाद उन्होंने वह कवच तथा उसे बाँधनेकी मन्त्रयुक्त विधि अंगिराको दे दी ॥ ६६ ॥
अङ्गिराः प्राह पुत्रस्य मन्त्रज्ञस्य बृहस्पतेः ।
बृहस्पतिरथोवाच आग्निवेश्याय धीमते ॥ ६७ ॥
अंगिराने अपने मन्त्रज्ञ पुत्र बृहस्पतिको उसका उपदेश दिया और बृहस्पतिने परम बुद्धिमान् आग्निवेश्यको यह विद्या प्रदान की ॥ ६७ ॥
आग्निवेश्यो मम प्रादात् तेन बध्नामि वर्म ते ।
तवाद्य देहरक्षार्थं मन्त्रेण नृपसत्तम ॥ ६८ ॥
आग्निवेश्यने मुझे उसका उपदेश किया था । नृपश्रेष्ठ! उसी मन्त्रसे आज तुम्हारे शरीरकी रक्षाके लिये मैं यह कवच बाँध रहा हूँ ॥ ६८ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो द्रोणस्तव पुत्रं महाद्युतिम् ।
पुनरेव वचः प्राह शनैराचार्यपुङ्गवः ॥ ६ ९ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! वहाँ आपके महातेजस्वी पुत्रसे यह प्रसंग सुनाकर आचार्यशिरोमणि द्रोणने पुनः धीरेसे यह बात कही— ॥ ६ ९ ॥
ब्रह्मसूत्रेण बध्नामि कवचं तव भारत ।
हिरण्यगर्भेण यथा बद्धं विष्णोः पुरा रणे ॥ ७० ॥
‘ भारत! जैसे पूर्वकालमें रणक्षेत्रमें भगवान् ब्रह्माने श्रीविष्णुके शरीर में कवच बाँधा था, उसी प्रकार मैं भी ब्रह्मसूत्रसे तुम्हारे इस कवचको बाँधता हूँ ॥ ७० ॥
यथा च ब्रह्मणा बद्धं संग्रामे तारकामये ।
शक्रस्य कवचं दिव्यं तथा बध्नाम्यहं तव ॥ ७१ ॥
‘ तारकामय संग्राममें ब्रह्माजीने इन्द्रके शरीर में जिस प्रकार दिव्य कवच बाँधा था, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे शरीरमें बाँध रहा हूँ ॥ ७१ ॥
बद्ध्वा तु कवचं तस्य मन्त्रेण विधिपूर्वकम् ।
प्रेषयामास राजानं युद्धाय महते द्विजः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार मन्त्रके द्वारा राजा दुर्योधनके शरीरमें विधिपूर्वक कवच बाँधकर विप्रवर द्रोणाचार्यने उसे महान् युद्धके लिये भेजा ॥ ७२ ॥
स संनद्धो महाबाहुराचार्येण महात्मना ।
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रथानां च सहस्रेण त्रिगर्तानां प्रहारिणाम् ॥ ७३ ॥
तथा दन्तिसहस्रेण मत्तानां वीर्यशालिनाम् ।
अश्वानां नियुतेनैव तथान्यैश्च महारथैः ॥ ७४ ॥
वृतः प्रायान्महाबाहुरर्जुनस्य रथं प्रति ।
नानावादित्रघोषेण यथा वैरोचनिस्तथा ॥ ७५ ॥
महामना आचार्यके द्वारा अपने शरीरमें कवच बँध जानेपर महाबाहु दुर्योधन प्रहार करनेमें कुशल एक सहस्र त्रिगर्तदेशीय रथियों, एक सहस्र पराक्रमशाली मतवाले हाथीसवारों, एक लाख घुड़सवारों तथा अन्य महारथियोंसे घिरकर नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनिके साथ अर्जुनके रथकी ओर चला । ठीक उसी तरह, जैसे राजा बलि ( इन्द्रके साथ युद्धके लिये ) यात्रा करते हैं ॥ ७३–७४ ॥
ततः शब्दो महानासीत् सैन्यानां तव भारत ।
अगाधं प्रस्थितं दृष्ट्वा समुद्रमिव कौरवम् ॥ ७६ ॥
भारत! उस समय अगाध समुद्रके समान कुरुनन्दन दुर्योधनको युद्धके लिये प्रस्थान करते देख आपकी सेनामें बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ॥ ७६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनकवचबन्धने चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका कवच- बन्धनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
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पञ्चनवतितमोऽध्यायः द्रोण और धृष्टद्युम्नका भीषण संग्राम तथा उभय पक्षके प्रमुख वीरोंका परस्पर संकुल युद्ध संजय उवाच
प्रविष्टयोर्महाराज पार्थवार्ष्णेययो रणे ।
दुर्योधने प्रयाते च पृष्ठतः पुरुषर्षभे ॥ १ ॥
जवेनाभ्यद्रवन् द्रोणं महता निःस्वनेन च ।
पाण्डवाः सोमकैः सार्धं ततो युद्धमवर्तत ॥ २ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! उस रणक्षेत्रमें जब श्रीकृष्ण और अर्जुन कौरव- सेनाके भीतर प्रवेश कर गये तथा पुरुषप्रवर दुर्योधन उनका पीछा करता हुआ आगे बढ़ गया, तब
सोमकोंसहित पाण्डवोंने बड़ी भारी गर्जनाके साथ द्रोणाचार्यपर वेगपूर्वक धावा किया ।
फिर तो वहाँ बड़े जोरसे युद्ध होने लगा ॥ १-२ ॥
तद् युद्धमभवत् तीव्रं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च व्यूहस्य पुरतोऽद्भुतम् ॥ ३ ॥
व्यूहके द्वारपर होनेवाला कौरवों तथा पाण्डवोंका वह अद्भुत युद्ध अत्यन्त तीव्र एवं भयंकर था । उसे देखकर लोगोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे ॥ ३ ॥
राजन् कदाचिन्नास्माभिर्दृष्टं तादृङ् न च श्रुतम् ।
यादृङ् मध्यगते सूर्ये युद्धमासीद् विशाम्पते ॥ ४ ॥
राजन्! प्रजानाथ! वहाँ मध्याह्नकालमें जैसा वह युद्ध हुआ था, वैसा न तो मैंने कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ४ ॥
धृष्टद्युम्नमुखाः पार्था व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
द्रोणस्य सैन्यं ते सर्वे शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ५ ॥
धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवपक्षीय सब प्रहारकुशल योद्धा अपनी सेनाका व्यूह बनाकर द्रोणाचार्यकी सेनापर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५ ॥
वयं द्रोणं पुरस्कृत्य सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
पार्षतप्रमुखान् पार्थानभ्यवर्षाम सायकैः ॥ ६ ॥
उस समय हमलोग सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यको आगे करके धृष्टद्युम्न आदि पाण्डव - सैनिकोंपर बाण- वर्षा कर रहे थे ॥ ६ ॥
महामेघाविवोदीर्णौ मिश्रवातौ हिमात्यये ।
सेनाग्रे प्रचकाशेते रुचिरे रथभूषिते ॥ ७ ॥
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रथोंसे विभूषित हुई वे दोनों प्रधान एवं सुन्दर सेनाएँ हेमन्तके अन्त ( शिशिर ) -में उठे हुए वायुयुक्त दो महामेघोंके समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ ७ ॥
समेत्य तु महासेने चक्रतुर्वेगमुत्तमम् ।
जाह्नवीयमुने नद्यौ प्रावृषीवोल्बणोदके ॥ ८ ॥
वे दोनों विशाल सेनाएँ परस्पर भिड़कर विजयके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़नेका प्रयत्न करने लगीं; मानो वर्षा -ऋतुमें जलकी बाढ़ आनेसे बड़ी हुई गंगा और यमुना दोनों नदियाँ बड़े वेगसे मिल रही हों ॥ ८ ॥
नानाशस्त्रपुरोवातो द्विपाश्वरथसंवृतः ।
गदाविद्युन्महारौद्रः संग्रामजलदो महान् ॥ ९ ॥
भारद्वाजानिलोद्भूतः शरधारासहस्रवान् ।
अभ्यवर्षन्महासैन्यः पाण्डुसेनाग्निमुद्धतम् ॥ १० ॥
उस समय महान् सैन्यदलसे संयुक्त एवं हाथी, घोड़े और रथोंसे भरा हुआ वह संग्राम महान् मेघके समान जान पड़ता था । नाना प्रकारके शस्त्र पूर्ववात ( पुरवैया ) -के तुल्य चल रहे थे। गदाएँ विद्युत्के समान प्रकाशित होती थीं । देखने में वह संग्राम- मेघ बड़ा भयंकर जान पड़ता था । द्रोणाचार्य वायुके समान उसे संचालित कर रहे थे तथा उससे बाणरूपी जलकी सहस्रों धाराएँ गिर रही थीं और इस प्रकार वह अग्निके समान उठी हुई पाण्डव- सेनापर सब ओरसे वर्षा कर रहा था ॥ ९ -१० ॥
समुद्रमिव धर्मान्ते विशन् घोरो महानिलः ।
व्यक्षोभयदनीकानि पाण्डवानां द्विजोत्तमः ॥ ११ ॥
जैसे ग्रीष्म- ऋतुके अन्तमें बड़े जोरसे उठी हुई भयंकर वायु महासागरमें क्षोभ उत्पन्न करके वहाँ ज्वारका दृश्य उपस्थित कर देती है, उसी प्रकार विप्रवर द्रोणाचार्यने पाण्डव- सेनामें हलचल मचा दी ॥ ११ ॥
तेऽपि सर्वप्रयत्नेन द्रोणमेव समाद्रवन् ।
बिभित्सन्तो महासेतुं वार्योघाः प्रबला इव ॥ १२ ॥
पाण्डव- योद्धाओंने भी सारी शक्ति लगाकर द्रोणपर ही धावा किया था; मानो पानीके प्रखर प्रवाह किसी महान् पुलको तोड़ डालना चाहते हों ॥ १२ ॥
वारयामास तान् द्रोणो जलौघमचलो यथा ।
पाण्डवान् समरे क्रुद्धान् पञ्चलांश्च सकेकयान् ॥ १३ ॥
जैसे सामने खड़ा हुआ पर्वत आती हुर्ह जलराशिको रोक देता है, उसी प्रकार समरांगणमें द्रोणाचार्यने कुपित हुए पाण्डवों, पांचालों तथा केकयोंको रोक दिया था ॥ १३ ॥
अथापरे च राजानः परिवृत्य समन्ततः ।
महाबला रणे शूराः पञ्चालानन्ववारयन् ॥ १४ ॥