04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 651–660
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660
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सज्यं सज्यं धनुश्चास्य चिच्छेद निशितैः शरैः । तब द्रोणाचार्य पुनः बड़ी उतावलीके साथ दूसरा धनुष हाथमें लेकर खड़े हो गये; परंतु ज्यों ही वे धनुषपर डोरी चढ़ाते, त्यों ही सात्यकि अपने तीखे बाणोंद्वारा उसे काट देते थे ॥ ३८३ ॥
एवमेकशतं छिन्नं धनुषां दृढधन्विना ॥ ३ ९ ॥ न चान्तरं तयोर्दृष्टं संधाने छेदनेऽपि च । इस प्रकार सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले सात्यकिने आचार्यके एक सौ धनुष काट डाले; परंतु कब वे संधान करते हैं और सात्यकि कब उस धनुषको काट देते हैं, उन दोनोंके इस कार्यमें किसीको कोई अन्तर नहीं दिखायी दिया ॥ ३ ९ ३ ॥ ततोऽस्य संयुगे द्रोणो दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् ॥ ४० ॥
युयुधानस्य राजेन्द्र मनसैतदचिन्तयत् । राजेन्द्र! तदनन्तर रणक्षेत्रमें सात्यकिके उस अमानुषिक पराक्रमको देखकर द्रोणाचार्यने मन- ही- मन इस प्रकार विचार किया ॥ ४० ॥
एतदस्त्रबलं रामे कार्तवीर्ये धनंजये ॥ ४१ ॥
भीष्मे च पुरुषव्याघ्रे यदिदं सात्वतां वरे ।
तं चास्य मनसा द्रोणः पूजयामास विक्रमम् ॥ ४२ ॥
सात्वतकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिमें जो यह अस्त्रबल दिखायी देता है, ऐसा तो केवल परशुराममें, कार्तवीर्य अर्जुनमें, धनंजयमें तथा पुरुषसिंह भीष्ममें ही देखा - सुना गया है । द्रोणाचार्यने मन- ही- मन उनके पराक्रमकी बड़ी प्रशंसा की ॥ ४१-४२ ॥
लाघवं वासवस्येव सम्प्रेक्ष्य द्विजसत्तमः ।
तुतोषास्त्रविदां श्रेष्ठस्तथा देवाः सवासवाः ॥ ४३ ॥
इन्द्रके समान सात्यकिके उस हस्तलाघव तथा पराक्रमको देखकर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर द्रोणाचार्य और इन्द्र आदि देवता भी बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४३ ॥
न तामालक्षयामासुर्लघुतां शीघ्रचारिणः ।
देवाश्च युयुधानस्य गन्धर्वाश्च विशाम्पते ॥ ४४ ॥
सिद्धचारणसंघाश्च विदुर्द्रोणस्य कर्म तत् । प्रजानाथ! रणभूमिमें शीघ्रतापूर्वक विचरनेवाले सात्यकिकी उस फुर्तीको देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों और चारणसमूहोंने पहले कभी नहीं देखा था । वे जानते थे कि केवल द्रोणाचार्य ही वैसा पराक्रम कर सकते हैं ( परंतु उस दिन उन्होंने सात्यकिका पराक्रम भी प्रत्यक्ष देख लिया ) ॥ ४४३ ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ॥ ४५ ॥
अस्त्रैरस्त्रविदां श्रेष्ठो योधयामास भारत ।
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भारत! तत्पश्चात् अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ क्षत्रियसंहारक द्रोणाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर विभिन्न अस्त्रोंद्वारा युद्ध आरम्भ किया ॥ ४५३ ॥
तस्यास्त्राण्यस्त्रमायाभिः प्रतिहत्य स सात्यकिः ॥ ४६ ॥
जघान निशितैर्बाणैस्तदद्भुतमिवाभवत् । सात्यकिने अपने अस्त्रोंकी मायासे आचार्यके अस्त्रोंका निवारण करके उन्हें तीखे
बाणोंसे घायल कर दिया । वह अद्भुत- सी घटना हुई ॥ ४६६ ॥
तस्यातिमानुषं कर्म दृष्ट्वान्यैरसमं रणे ॥ ४७ ॥
युक्तं योगेन योगज्ञास्तावकाः समपूजयन् । उस रणक्षेत्रमें सात्यकिके उस युक्तियुक्त अलौकिक कर्मको, जिसकी दूसरोंसे कोई तुलना नहीं थी, देखकर आपके रणकौशलवेत्ता सैनिक उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४७ ॥
यदस्त्रमस्यति द्रोणस्तदेवास्यति सात्यकिः ॥ ४८ ॥
तमाचार्योऽप्यसम्भ्रान्तोऽयोधयच्छत्रुतापनः । द्रोणाचार्य जिस अस्त्रका प्रयोग करते, उसीका सात्यकि भी करते थे । शत्रुओंको संताप देनेवाले आचार्य द्रोण भी घबराहट छोड़कर सात्यकिसे युद्ध करते रहे ॥ ४८३ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज धनुर्वेदस्य पारगः ॥ ४ ९ ॥ वधाय युयुधानस्य दिव्यमस्त्रमुदैरयत् । महाराज! तदनन्तर धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्यने कुपित हो सात्यकिके वधके लिये एक दिव्यास्त्र प्रकट किया ॥ ४ ९ ॥ तदाग्नेयं महाघोरं रिपुघ्नमुपलक्ष्य सः ॥ ५० ॥
दिव्यमस्त्रं महेष्वासो वारुणं समुदैरयत् । शत्रुओंका नाश करनेवाले उस अत्यन्त भयंकर आग्नेयास्त्रको देखकर महाधनुर्धर सात्यकिने भी वारुण नामक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ५०३ ॥
हाहाकारो महानासीद् दृष्ट्वा दिव्यास्त्रधारिणौ ॥ ५१ ॥
न विचेरुस्तदाकाशे भूतान्याकाशगाम्यपि । उन दोनोंको दिव्यास्त्र धारण किये देख वहाँ महान् हाहाकार मच गया । उस समय आकाशचारी प्राणी भी आकाशमें विचरण नहीं करते थे ॥ ५१ ॥
अस्त्रे ते वारुणाग्नेये ताभ्यां बाणसमाहिते ॥ ५२ ॥
न यावदभ्यपद्येतां व्यावर्तदथ भास्करः । वे वारुण और आग्नेय दोनों अस्त्र उन दोनोंके द्वारा अपने बाणोंमें स्थापित होकर जबतक एक - दूसरेके प्रभावसे प्रतिहत नहीं हो गये, तभीतक भगवान् सूर्य दक्षिणसे पश्चिमके आकाशमें ढल गये ॥ ५२ ॥
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ततो युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ ५३ ॥
नकुलः सहदेवश्च पर्यरक्षन्त सात्यकिम् । तब राजा युधिष्ठिर, पाण्डुकुमार भीमसेन, नकुल और सहदेव सब ओरसे सात्यकिकी रक्षा करने लगे ॥ ५३३ ॥
धृष्टद्युम्नमुखैः सार्धं विराटश्च सकेकयः ॥ ५४ ॥
मत्स्याः शाल्वेयसेनाश्च द्रोणमाजग्मुरञ्जसा । धृष्टद्युम्न आदि वीरोंके साथ विराट, केकयराजकुमार, मत्स्यदेशीय सैनिक तथा शाल्वदेशकी सेनाएँ — से सब- के - सब अनायास ही द्रोणाचार्यपर चढ़ आये ॥ ५४३ ॥
दुःशासनं पुरस्कृत्य राजपुत्राः सहस्रशः ॥ ५५ ॥
द्रोणमभ्युपपद्यन्त सपत्नैः परिवारितम् । उधरसे सहस्रों राजकुमार दुःशासनको आगे करके शत्रुओंसे घिरे हुए द्रोणाचार्यके पास उनकी रक्षाके लिये आ पहुँचे ॥ ५५३ ॥
ततो युद्धमभूद् राजंस्तेषां तव च धन्विनाम् ॥ ५६ ॥
रजसा संवृते लोके शरजालसमावृते । राजन्! तदनन्तर पाण्डवोंके और आपके धनुर्धरोंका परस्पर युद्ध होने लगा । उस समय सब लोग धूलसे आवृत और बाणसमूहसे आच्छादित हो गये थे ॥ ५६३ ॥
सर्वमाविग्नमभवन्न प्राज्ञायत किंचन ।
सैन्येन रजसा ध्वस्ते निर्मर्यादमवर्तत ॥ ५७ ॥
वहाँका सब कुछ उद्विग्न हो रहा था । सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे ध्वस्त होनेके कारण
किसीको कुछ ज्ञात नहीं होता था । वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध चल रहा था ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणसात्यकियुद्धे अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमेंद्रोण और सात्यकिका युद्धविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥
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एकोनशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा तीव्र गतिसे कौरव सेनामें प्रवेश, विन्द और अनुविन्दका वध तथा अद्भुत जलाशयका निर्माण संजय उवाच ( वर्तमाने तदा युद्धे द्रोणस्य सह पाण्डुभिः ॥ )
विवर्तमाने त्वादित्ये तत्रास्तशिखरं प्रति ।
रजसा कीर्यमाणे च मन्दीभूते दिवाकरे ॥ १ ॥
तिष्ठतां युध्यमानानां पुनरावर्ततामपि ।
भज्यतां जयतां चैव जगाम तदहः शनैः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! जब द्रोणाचार्यका पाण्डवोंके साथ युद्ध हो रहा था और सूर्य अस्ताचलके शिखरकी ओर ढल चुके थे, उस समय धूलसे आवृत होनेके कारण दिवाकरकी रश्मियाँ मन्द दिखायी देने लगी थीं । योद्धाओंमेंसे कोई तो खड़े थे, कोई युद्ध करते थे, कोई भागकर पुनः पीछे लौटते थे और कोई विजयी हो रहे थे । इस प्रकार उन सब लोगोंका वह दिन धीरे- धीरे बीतता चला जा रहा था ॥ १-२ ॥
तथा तेषु विषक्तेषु सैन्येषु जयगृद्धिषु ।
अर्जुनो वासुदेवश्च सैन्धवायैव जग्मतुः ॥ ३ ॥
विजयकी अभिलाषा रखनेवाली वे समस्त सेनाएँ जब युद्धमें इस प्रकार अनुरक्त हो रही थीं, तब अर्जुन और श्रीकृष्ण सिन्धुराज जयद्रथको प्राप्त करनेके लिये ही आगे बढ़ते चले गये ॥ ३ ॥
रथमार्गप्रमाणं तु कौन्तेयो निशितैः शरैः ।
चकार यत्र पन्थानं ययौ येन जनार्दनः ॥ ४ ॥
कुन्तीकुमार अर्जुन अपने तीखे बाणोंद्वारा वहाँ रथके जानेयोग्य रास्ता बना लेते थे, जिससे श्रीकृष्ण रथ लिये आगे बढ़ जाते थे ॥ ४ ॥
यत्र यत्र रथो याति पाण्डवस्य महात्मनः ।
तत्र तत्रैव दीर्यन्ते सेनास्तव विशाम्पते ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! महामना पाण्डुनन्दन अर्जुनका रथ जहाँ - जहाँ जाता था, वहीं - वहीं आपकी सेनामें दरार पड़ जाती थी ॥ ५ ॥
रथशिक्षां तु दाशार्हो दर्शयामास वीर्यवान् ।
उत्तमाधममध्यानि मण्डलानि विदर्शयन् ॥ ६ ॥
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दशार्हवंशी परम पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम, मध्यम और अधम तीनों प्रकारके मण्डल दिखाते हुए अपनी उत्तम रथ शिक्षाका प्रदर्शन करते थे ॥ ६ ॥
ते तु नामाङ्किताः पीताः कालज्वलनसंनिभाः ।
स्नायुनद्धाः सुपर्वाणः पृथवो दीर्घगामिनः ॥ ७ ॥
वैणवाश्चायसाश्चोग्रा ग्रसन्तौ विविधानरीन् ।
रुधिरं पतगैः सार्धं प्राणिनां पपुराहवे ॥ ८ ॥
अर्जुनके बाणोंपर उनका नाम अंकित था । उनपर पानी चढ़ाया गया था । वे कालाग्निके समान भयंकर, ताँतमें बँधे हुए, सुन्दर पंखवाले, मोटे तथा दूरतक जानेवाले थे । उनमेंसे कुछ तो बाँसके बने हुए थे और कुछ लोहेके । वे सभी भयंकर थे और नाना प्रकारके शत्रुओंका संहार करते हुए पक्षियोंके साथ उड़कर युद्धस्थलमें प्राणियोंका रक्त पीते थे ॥ ७-८ ॥
रथस्थितोऽग्रतः क्रोशं यानस्यत्यर्जुनः शरान् ।
रथे क्रोशमतिक्रान्ते तस्य ते घ्नन्ति शात्रवान् ॥ ९ ॥
रथपर बैठे हुए अर्जुन अपने आगे एक कोसकी दूरीतक जिन बाणोंको फेंकते थे, वे बाण उनके शत्रुओंका जबतक संहार करते, तबतक उनका रथ एक कोस और आगे निकल जाता था ॥ ९ ॥
तार्क्ष्यमारुतरंहोभिर्वाजिभिः साधुवाहिभिः ।
तदागच्छद्धृषीकेशः कृत्स्नं विस्मापयन् जगत् ॥ १० ॥
उस समय भगवान् हृषीकेश अच्छी प्रकारसे रथका भार वहन करनेवाले गरुड़ एवं वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्को आश्चर्यचकित करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ १० ॥
न तथा गच्छति रथस्तपनस्य विशाम्पते ।
नेन्द्रस्य न तु रुद्रस्य नापि वैश्रवणस्य च ॥ ११ ॥
प्रजानाथ! सूर्य, इन्द्र, रुद्र तथा कुबेरका भी रथ वैसी तीव्र गतिसे नहीं चलता था, जैसे अर्जुनका चलता था ॥ ११ ॥
नान्यस्य समरे राजन् गतपूर्वस्तथा रथः ।
यथा ययावर्जुनस्य मनोऽभिप्रायशीघ्रगः ॥ १२ ॥
राजन्! समरभूमिमें दूसरे किसीका रथ पहले कभी उस प्रकार तीव्र गतिसे नहीं चला था, जैसे अर्जुनका रथ मनकी अभिलाषाके अनुरूप शीघ्र गति से चलता था ॥ १२ ॥
प्रविश्य तु रणे राजन् केशवः परवीरहा ।
सेनामध्ये हयांस्तूर्णं चोदयामास भारत ॥ १३ ॥
महाराज! भरतनन्दन! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने रणभूमिमें सेनाके भीतर प्रवेश करके अपने घोड़ोंको तीव्र वेगसे हाँका ॥ १३ ॥
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ततस्तस्य रथौघस्य मध्यं प्राप्य हयोत्तमाः ।
कृच्छ्रेण रथमूहस्तं क्षुत्पिपासासमन्विताः ॥ १४ ॥
तदनन्तर रथियोंके समूहके मध्यभागमें पहुँचकर भूख और प्याससे पीड़ित हुए वे उत्तम घोड़े बड़ी कठिनाईसे उस रथका भार वहन कर पाते थे ॥ १४ ॥
क्षताश्च बहुभिः शस्त्रैर्युद्धशौण्डैरनेकशः ।
मण्डलानि विचित्राणि विचेरुस्ते मुहुर्मुहुः ॥ १५ ॥
युद्धकुशल योद्धाओंने बहुत- से शस्त्रोंद्वारा उन्हें अनेक बार घायल कर दिया और वे क्षत- विक्षत हो बारंबार विचित्र मण्डलाकार गतिसे विचरण करते रहे ॥
हतानां वाजिनागानां रथानां च नरैः सह ।
उपरिष्टादतिक्रान्ताः शैलाभानां सहस्रशः ॥ १६ ॥
रणभूमिमें सहस्रों पर्वताकार हाथी, घोड़े, रथ और पैदल मनुष्य मरे पड़े थे । उन सबको अर्जुनके घोड़े ऊपर- ही - ऊपर लाँघ जाते थे ॥ १६ ॥
(श्रमेण महता युक्तास्ते हया वातरंहसः । मन्दवेगगता राजन् संवृत्तास्तत्र संयुगे ॥ ) राजन्! वे वायुके समान वेगशाली अश्व उस युद्धस्थलमें अधिक परिश्रमसे थक जानेके कारण मन्दगतिसे चलने लगे ।
एतस्मिन्नन्तरे वीरावावन्त्यौ भ्रातरौ नृप ।
सहसेनौ समार्च्छतां पाण्डवं क्लान्तवाहनम् ॥ १७ ॥
नरेश्वर! इसी बीचमें अवन्तीके वीर राजकुमार दोनों भाई विन्द और अनुविन्द थके हुए घोड़ोंवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनका सामना करनेके लिये अपनी सेनाके साथ आये ॥ १७ ॥
तावर्जुनं चतुःषष्ट्या सप्तत्या च जनार्दनम् ।
शराणां च शतैरश्वानविध्येतां मुदान्वितौ ॥ १८ ॥
उन दोनोंने अर्जुनको चौंसठ और श्रीकृष्णको सत्तर बाण मारे तथा उनके घोड़ोंको सौ
बाणोंसे घायल कर दिया । ऐसा करके उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १८ ॥
तावर्जुनो महाराज नवभिर्नतपर्वभिः ।
आजघान रणे क्रुद्धो मर्मज्ञो मर्मभेदिभिः ॥ १ ९ ॥
महाराज! मर्मको जाननेवाले अर्जुनने रणक्षेत्रमें कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले नौ मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन दोनोंको चोट पहुँचायी ॥ १ ९ ॥
ततस्ती तु शरौघेण बीभत्सुं सहकेशवम् ।
आच्छादयेतां संरब्धौ सिंहनादं च चक्रतुः ॥ २० ॥
तब उन दोनों भाइयोंने कुपित हो श्रीकृष्णसहित अर्जुनको अपने बाणसमूहोंसे आच्छादित कर दिया और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ २० ॥
तयोस्तु धनुषी चित्रे भल्लाभ्यां श्वेतवाहनः ।
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चिच्छेद समरे तूर्णं ध्वजौ च कनकोज्ज्वलौ ॥ २१ ॥
तदनन्तर श्वेत घोड़ोंवाले अर्जुनने समराङ्गणमें दो बाणोंद्वारा उनके दोनों विचित्र धनुषों और सुवर्णके समान प्रकाशित होनेवाले दोनों ध्वजोंको भी तुरंत ही काट डाला ॥ २१ ॥
अथान्ये धनुषी राजन् प्रगृह्य समरे तदा ।
पाण्डवं भृशसंक्रुद्धावर्दयामासतुः शरैः ॥ २२ ॥
राजन्! फिर वे दोनों भाई अत्यन्त कुपित हो उठे और उस समय समरांगणमें दूसरे धनुष लेकर उन्होंने बाणोंद्वारा पाण्डुकुमार अर्जुनको गहरी पीड़ा दी ॥ २२ ॥
तयोस्तु भृशसंक्रुद्धः शराभ्यां पाण्डुनन्दनः ।
धनुषी चिच्छिदे तूर्णं भूय एव धनंजयः ॥ २३ ॥
यह देख पाण्डुनन्दन धनंजय अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और दो बाण मारकर तुरंत ही उन्होंने उन दोनोंके धनुष पुनः काट डाले ॥ २३ ॥
तथान्यैर्विशिखैस्तूर्णं रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ।
जघानाश्वांस्तथा सूतौ पाष्ण च सपदानुगौ ॥ २४ ॥
फिर सुवर्णमय पंखोंवाले और शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए दूसरे बाणोंद्वारा उनके घोड़ोंको एवं दोनों सारथियों, पार्श्वरक्षकों तथा पदानुगामी सेवकोंको भी शीघ्र ही मार डाला ॥ २४ ॥
ज्येष्ठस्य च शिरः कायात् क्षुरप्रेण न्यकृन्तत ।
स पपात हतः पृथ्व्यां वातरुग्ण इव द्रुमः ॥ २५ ॥
इसके बाद एक क्षुरप्रद्वारा बड़े भाई विन्दका मस्तक धड़से काट दिया । विन्द आँधीके उखाड़े हुए वृक्षके समान मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २५ ॥
विन्दं तु निहतं दृष्ट्वा ह्यनुविन्दः प्रतापवान् ।
हताश्वं रथमुत्सृज्य गदां गृह्य महाबलः ॥ २६ ॥
अभ्यवर्तत संग्रामे भ्रातुर्वधमनुस्मरन् । विन्दको मारा गया देख महाबली और प्रतापी अनुविन्द अपने भाईके वधका बारंबार चिन्तन करता हुआ अश्वहीन रथको त्यागकर हाथमें गदा ले संग्राम- भूमिमें डटा रहा ॥ २६ ३ ॥ गदया रथिनां श्रेष्ठो नृत्यन्निव महारथः ॥ २७ ॥
अनुविन्दस्तु गदया ललाटे मधुसूदनम् ।
स्पृष्ट्वा नाकम्पयत् क्रुद्धो मैनाकमिव पर्वतम् ॥ २८ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी अनुविन्दने कुपित हो नृत्य-सा करते हुए गदाद्वारा मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णके ललाटमें आघात किया; परंतु मैनाकपर्वतके समान श्रीकृष्णको कम्पित न कर सका ॥ २७-२८ ॥ तस्यार्जुनः शरैः षड्भिर्ग्रावां पादौ भुजौ शिरः ।
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निचकर्त स संछिन्नः पपाताद्रिचयो यथा ॥ २ ९ ॥ तब अर्जुनने छः बाणोंद्वारा उसकी गर्दन, दोनों पैरों, दोनों भुजाओं तथा मस्तकको भी काट डाला । इस प्रकार छिन्न-भिन्न होकर वह पर्वतसमूहके समान धराशायी हो गया ॥ २ ९ ॥
ततस्तौ निहतौ दृष्ट्वा तयो राजन् पदानुगाः ।
अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धाः किरन्तः शतशः शरान् ॥ ३० ॥
राजन्! तब उन दोनों भाइयोंको मारा गया देख उनके सेवकगण अत्यन्त कुपित हो अर्जुनपर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए टूट पड़े ॥ ३० ॥
तानर्जुनः शरैस्तूर्णं निहत्य भरतर्षभ ।
व्यरोचत यथा वह्निर्दावं दग्ध्वा हिमात्यये ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ! अर्जुन बाणोंद्वारा तुरंत ही उन सबका संहार करके ग्रीष्म ऋतुमें वनको जलाकर प्रकाशित होनेवाले अग्निदेवके समान सुशोभित हुए ॥ ३१ ॥
तयोः सेनामतिक्राम्य कृच्छ्रादिव धनंजयः ।
विबभौ जलदं हित्वा दिवाकर इवोदितः ॥ ३२ ॥
उन दोनोंकी सेनाका बड़ी कठिनाईसे उल्लंघन करके अर्जुन मेघोंका आवरण भेदकर उदित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ॥ ३२ ॥
तं दृष्ट्वा कुरवस्त्रस्ताः प्रहृष्टाश्चाभवन् पुनः ।
अभ्यवर्तन्त पार्थं च समन्ताद् भरचर्षभ ॥ ३३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्हें देखकर कौरव - सैनिक पहले तो भयभीत हुए । फिर प्रसन्न भी हो गये । वे चारों ओरसे कुन्तीकुमारका सामना करनेके लिये डट गये ॥ ३३ ॥
श्रान्तं चैनं समालक्ष्य ज्ञात्वा दूरे च सैन्धवम् ।
सिंहनादेन महता सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ३४ ॥
अर्जुनको थका हुआ देख और सिन्धुराज जयद्रथको उनसे बहुत दूर जानकर आपके सैनिकोंने महान् सिंहनाद करते हुए उन्हें सब ओरसे घेर लिया ॥ ३४ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा सुसंरब्धानुत्स्मयन् पुरुषर्षभः ।
शनकैरिव दाशार्हमर्जुनो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
उन सबको क्रोधमें भरा देख पुरुषशिरोमणि अर्जुनने मुसकराते हुए धीरे - धीरे भगवान् श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ३५ ॥
शरार्दिताश्च ग्लानाश्च हया दूरे च सैन्धवः ।
किमिहानन्तरं कार्यं ज्यायिष्ठं तव रोचते ॥ ३६ ॥
‘ मेरे घोड़े बाणोंसे पीड़ित हो बहुत थक गये हैं और सिन्धुराज जयद्रथ अभी बहुत दूर है । अतः इस समय यहाँ कौन--सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है ॥ ३६ ॥
ब्रूहि कृष्ण यथातत्त्वं त्वं हि प्राज्ञतमः सदा ।
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भवन्नेत्रा रणे शत्रून् विजेष्यन्तीह पाण्डवाः ॥ ३७ ॥
' श्रीकृष्ण! आप ही सदा सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं । अतः मुझे यथार्थ बात बताइये । आपको नायक बनाकर ही पाण्डव इस रणक्षेत्रमें शत्रुओंपर विजयी होंगे ॥ ३७ ॥
मम त्वनन्तरं कृत्यं यद् वै तत् त्वं निबोध मे ।
हयान् विमुच्य हि सुखं विशल्यान् कुरु माधव ॥ ३८ ॥
‘ माधव! मेरी दृष्टिमें इस समय जो कर्तव्य है, वह बताता हूँ, आप मुझसे सुनिये ।
घोड़ोंको खोलकर इन्हें सुख पहुँचानेके लिये इनके शरीरसे बाण निकाल दीजिये ' ॥ ३८ ॥
एवमुक्तस्तु पार्थेन केशवः प्रत्युवाच तम् ।
ममाप्येतन्मतं पार्थ यदिदं ते प्रभाषितम् ॥ ३ ९ ॥
अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ' पार्थ! तुमने इस समय जो बात कही है, यही मुझे भी अभीष्ट है ' ॥ ३ ९ ॥ अर्जुन उवाच
अहमावारयिष्यामि सर्वसैन्यानि केशव ।
त्वमप्यत्र यथान्यायं कुरु कार्यमनन्तरम् ॥ ४० ॥
अर्जुन बोले — केशव! मैं इन समस्त सेनाओंको रोक रखूँगा । आप भी यहाँ इस समय करनेयोग्य यथोचित कार्य सम्पन्न करें ॥ ४० ॥
संजय उवाच
सोऽवतीर्य रथोपस्थादसम्भ्रान्तो धनंजयः ।
गाण्डीवं धनुरादाय तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ४१ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! अर्जुन बिना किसी घबराहटके रथकी बैठकसे उतर पड़े और गाण्डीव धनुष हाथमें लेकर पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ ४१ ॥
तमभ्यधावन् क्रोशन्तः क्षत्रिया जयकाङ्क्षिणः ।
इदं छिद्रमिति ज्ञात्वा धरणीस्थं धनंजयम् ॥ ४२ ॥
धनंजयको धरतीपर खड़ा जान ' यही अवसर है ' ऐसा कहते हुए विजयाभिलाषी क्षत्रिय हल्ला मचाते हुए उनकी ओर दौड़े ॥ ४२ ॥
तमेकं रथवंशेन महता पर्यवारयन् ।
विकर्षन्तश्च चापानि विसृजन्तश्च सायकान् ॥ ४३ ॥
उन सबने महान् रथसमूहके द्वारा एकमात्र अर्जुनको चारों ओर घेर लिया । वे सब - के-सब धनुष खींचते और उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करते ॥ ४३ ॥
शस्त्राणि च विचित्राणि क्रुद्धास्तत्र व्यदर्शयन् ।
छादयन्तः शरैः पार्थं मेघा इव दिवाकरम् ॥ ४४ ॥
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जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको आच्छादित करते हुए कुपित कौरव- सैनिक वहाँ विचित्र अस्त्र- शस्त्रोंका प्रदर्शन करने लगे ॥ ४४ ॥
अभ्यद्रवन्त वेगेन क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ।
नरसिंहं रथोदाराः सिंहं मत्ता इव द्विपाः ॥ ४५ ॥
जैसे मतवाले हाथी सिंहपर धावा करते हों, उसी प्रकार वे श्रेष्ठ रथी क्षत्रिय क्षत्रियशिरोमणि नरसिंह अर्जुनपर बड़े वेगसे टूट पड़े थे ॥ ४५ ॥
तत्र पार्थस्य भुजयोर्महद्बलमदृश्यत ।
यत् क्रुद्धो बहुलाः सेनाः सर्वतः समवारयत् ॥ ४६ ॥
उस समय वहाँ अर्जुनकी दोनों भुजाओंका महान् बल देखनेमें आया । उन्होंने कुपित होकर उन विशाल सेनाओंको सब ओर जहाँ - की- तहाँ रोक दिया ॥ ४६ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतो विभुः ।
इषुभिर्बहुभिस्तूर्णं सर्वानेव समावृणोत् ॥ ४७ ॥
शक्तिशाली अर्जुनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके सम्पूर्ण अस्त्रोंका सब ओरसे निवारण करके अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा तुरंत उन सबको ही आच्छादित कर दिया ॥ ४७ ॥
तत्रान्तरिक्षे बाणानां प्रगाढानां विशाम्पते ।
संघर्षण महार्चिष्मान् पावकः समजायत ॥ ४८ ॥
प्रजानाथ! वहाँ अन्तरिक्षमें ठसाठस भरे हुए बाणोंकी रगड़से भारी लपटोंसे युक्त आग प्रकट हो गयी ॥ ४८ ॥
तत्र तत्र महेष्वासैः श्वसद्भिः शोणितोक्षितैः ।
हयैर्नागैश्च सम्भिन्नैर्नदद्भिश्चारिकर्षणैः ॥ ४ ९ ॥
संरब्धैश्चारिभिर्वीरैः प्रार्थयद्भिर्जयं मृधे ।
एकस्थैर्बहुभिः क्रुद्धैरूष्मेव समजायत ॥ ५० ॥
तदनन्तर जहाँ-तहाँ हाँफते और खूनसे लथपथ हुए महाधनुर्धर योद्धाओं, अर्जुनके शत्रुनाशक बाणोंद्वारा विदीर्ण हो चीत्कार करते हुए हाथियों और घोड़ों तथा युद्धमें विजयकी अभिलाषा लिये रोषावेशमें भरकर एक जगह कुपित खड़े हुए बहुतेरे वीर शत्रुओंके जमघटसे उस स्थानपर गर्मी - सी होने लगी ॥ ४ ९ -५० ॥ शरोर्मिणं ध्वजावर्तं नागनक्रं दुरत्ययम् पदातिमत्स्यकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥ ५१ ॥
असंख्येयमपारं च रथोर्मिणमतीव च ।
उष्णीषकमठं छत्रपताकाफेनमालिनम् ॥ ५२ ॥
रणसागरमक्षोभ्यं मातङ्गाङ्गशिलाचितम् ।
वेलाभूतस्तदा पार्थः पत्रिभिः समवारयत् ॥ ५३ ॥