04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 821–830

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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मेघजालनिभं सैन्यं तव पुत्रस्य मारिष ।

प्रत्यगृह्णाच्छिनेः पौत्रः शरैराशीविषोपमैः ॥ २३ ॥

माननीय नरेश! शिनिपौत्र सात्यकिने अपने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनवाली आपके पुत्रकी सेनाका अकेले ही सामना किया ॥ २३ ॥

प्रच्छाद्यमानः समरे शरजालैः स वीर्यवान् ।

असम्भ्रमन् महाराज तावकानवधीद् बहून् ॥ २४ ॥

महाराज! उस समरांगणमें पराक्रमी सात्यकि बाणोंके समूहसे आच्छादित हो गये थे, तो भी उन्होंने मनमें तनिक भी घबराहट नहीं आने दी और आपके बहुत - से सैनिकोंका संहार कर डाला ॥ २४ ॥

आश्चर्यं तत्र राजेन्द्र सुमहद् दृष्टवानहम् ।

न मोघः सायकः कश्चित् सात्यकेरभवत् प्रभो ॥ २५ ॥

शक्तिशाली राजेन्द्र! वहाँ सबसे महान् आश्चर्यकी बात मैंने यह देखी कि सात्यकिका कोई भी बाण व्यर्थ नहीं गया ॥ २५ ॥

रथनागाश्वकलिलः पदात्यूर्मिसमाकुलः ।

शैनेयवेलामासाद्य स्थितः सैन्यमहार्णवः ॥ २६ ॥

रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी तथा पैदलरूपी लहरोंसे व्याप्त हुई आपकी सागर- सदृश सेना सात्यकिरूपी तटभूमिके समीप आकर अवरुद्ध हो गयी ॥ २६ ॥

सम्भ्रान्तनरनागाश्वमावर्तत मुहुर्मुहुः ।

तत् सैन्यमिषुभिस्तेन वध्यमानं समन्ततः ॥ २७ ॥

सात्यकिके बाणोंद्वारा सब ओरसे मारी जाती हुई आपकी सेनाके पैदल, हाथी और घोड़े सभी घबरा गये और बारंबार चक्कर काटने लगे ॥ २७ ॥

बभ्राम तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव ।

पदातिनं रथं नागं सादिनं तुरगं तथा ॥ २८ ॥

अविद्धं तत्र नाद्राक्षं युयुधानस्य सायकैः । सर्दीसे पीड़ित हुई गायोंके समान आपकी सारी सेना वहीं चक्कर लगा रही थी । मैंने वहाँ एक भी पैदल, रथी, हाथी तथा सवारसहित घोड़ेको ऐसा नहीं देखा, जो युयुधानके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ २८३ ॥

न तादृक् कदनं राजन् कृतवांस्तत्र फाल्गुनः ॥ २ ९ ॥ यादृक् क्षयमनीकानामकरोत् सात्यकिर्नृप । राजन्! नरेश्वर! सात्यकिने आपके सैनिकोंका जैसा संहार किया था, वैसा वहाँ अर्जुनने भी नहीं किया था ॥ २ ९ ३ ॥ अत्यर्जुनं शिनेः पौत्रो युध्यते पुरुषर्षभः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 822

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वीतभीर्लाघवोपेतः कृतित्वं सम्प्रदर्शयन् । शिनिपौत्र पुरुषश्रेष्ठ सात्यकि निर्भय हो बड़ी फुर्तीसे अस्त्र चलाते और अपनी कुशलताका प्रदर्शन करते हुए अर्जुनसे भी अधिक पराक्रमपूर्वक युद्ध कर रहे थे ॥ ३० || ततो दुर्योधनो राजा सात्वतस्य त्रिभिः शरैः ॥ ३१ ॥

विव्याध सूतं निशितैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।

सात्यकिं च त्रिभिर्विद्ध्वा पुनरष्टाभिरेव च ॥ ३२ ॥

तब राजा दुर्योधनने तीन बाणोंसे सात्यकिके सारथिको और चार पैने बाणोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको घायल कर दिया । तत्पश्चात् सात्यकिको भी पहले तीन बाणोंसे बींधकर फिर आठ बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३१-३२ ॥

दुःशासनः षोडशभिर्विव्याध शिनिपुङ्गवम् ।

शकुनिः पञ्चविंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर दुःशासनने सोलह, शकुनिने पचीस और चित्रसेनने पाँच बाणोंद्वारा शिनिप्रवर सात्यकिको बींध डाला ॥ ३३ ॥

दुःसहः पञ्चदशभिर्विव्याधोरसि सात्यकिम् ।

उत्स्मयन् वृष्णिशार्दूलस्तथा बाणैः समाहतः ॥ ३४ ॥

तानविध्यन्महाराज सर्वानेव त्रिभिस्त्रिभिः । इसके बाद दुःसहने सात्यकिकी छातीमें पंद्रह बाण मारे । महाराज! इस प्रकार उन बाणोंसे आहत होकर वृष्णिवंशके सिंह सात्यकिने मुसकराते हुए ही उन सबको ही तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३४३ ॥

गाढविद्धानरीन् कृत्वा मार्गणैः सोऽतितेजनैः ॥ ३५ ॥

शैनेयः श्येनवत् संख्ये व्यचरल्लघुविक्रमः । उस युद्धस्थलमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम करनेवाले शिनिवंशी सात्यकि अपने अत्यन्त तेज बाणोंद्वारा शत्रुओंको गहरी चोट पहुँचाकर बाजके समान सब ओर विचरने लगे ॥ ३५ ॥ सौबलस्य धनुश्छित्त्वा हस्तावापं निकृत्य च ॥ ३६ ॥

दुर्योधनं त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत् स्तनान्तरे । उन्होंने सुबलपुत्र शकुनिके धनुष और दस्ताने काटकर दुर्योधनकी छातीमें तीन बाण मारे ॥ ३६ ॥

चित्रसेनं शतेनैव दशभिर्दुःसहं तथा ॥ ३७ ॥

दुःशासनं तु विंशत्या विव्याध शिनिपुङ्गवः ।

पृष्ठ 823

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फिर शिनिवंशके प्रमुख वीरने चित्रसेनको सौ, दुःसहको दस और दुःशासनको बीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३७३ ॥

अथान्यद् धनुरादाय श्यालस्तव विशाम्पते ॥ ३८ ॥

अष्टाभिः सात्यकिं विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ।

दुःशासनश्च दशभिर्दुःसहश्च त्रिभिः शरैः ॥ ३ ९ ॥

प्रजानाथ! तत्पश्चात् आपके सालेने दूसरा धनुष लेकर सात्यकिको पहले आठ बाण मारे । फिर पाँच बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया । दुःशासनने दस और दुःसहने भी तीन बाण मारे ॥ ३८-३९ ॥

दुर्मुखश्च द्वादशभी राजन् विव्याध सात्यकिम् ।

दुर्योधनस्त्रिसप्तत्या विद्ध्वा भारत माधवम् ॥ ४० ॥

ततोऽस्य निशितैर्बाणैस्त्रिभिर्विव्याध सारथिम् । राजन्! दुर्मुखने बारह बाणोंसे सात्यकिको क्षत- विक्षत कर दिया । भारत! इसके बाद दुर्योधनने तिहत्तर बाणोंसे युयुधानको घायल करके तीन पैने बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी बींध डाला ॥ ४०३ ॥

तान् सर्वान् सहितान् शूरान् यतमानान् महारथान् ॥ ४१ ॥

पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैः पुनर्विव्याध सात्यकिः । तब सात्यकिने एक साथ विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन समस्त शूरवीर महारथियोंको पुनः पाँच - पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ४१३ ॥

ततः स रथिनां श्रेष्ठस्तव पुत्रस्य सारथिम् ॥ ४२ ॥

आजघानाशु भल्लेन स हतो न्यपतद् भुवि । तत्पश्चात् रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने आपके पुत्रके सारथिके ऊपर शीघ्र ही एक भल्लका प्रहार किया । सारथि उसके द्वारा मारा जाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४२ ॥

पतिते सारथौ तस्मिंस्तव पुत्ररथः प्रभो ॥ ४३ ॥

वातायमानैस्तैरश्वैरपानीयत संगरात् । प्रभो! उस सारथिके धराशायी होनेपर आपके पुत्रका रथ हवाके समान तीव्र वेगसे भागनेवाले घोड़ोंद्वारा युद्धस्थलसे दूर हटा दिया गया ॥ ४३३ ॥

ततस्तव सुता राजन् सैनिकाश्च विशाम्पते ॥ ४४ ॥

राज्ञो रथमभिप्रेक्ष्य विद्रुताः शतशोऽभवन् । राजन्! प्रजानाथ! तदनन्तर आपके पुत्र और सैनिक राजा दुर्योधनके रथकी वैसी दशा देखकर सैकड़ोंकी संख्या में भाग खड़े हुए ॥ ४४३ ॥

विद्रुतं तत्र तत् सैन्यं दृष्ट्वा भारत सात्यकिः ॥ ४५ ॥

अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णै रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ।

पृष्ठ 824

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भारत! आपकी सेनाको भागती देख सात्यकिने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तीखे बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४५३ ॥

विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि सहस्रशः ॥ ४६ ॥

प्रययौ सात्यकी राजन् श्वेताश्वस्य रथं प्रति । राजन्! इस प्रकार आपके सहस्रों सैनिकोंको भगाकर सात्यकि श्वेतवाहन अर्जुनके रथकी ओर चल दिये ॥ ( तं प्रयान्तं महाबाहुं तावकाः प्रेक्ष्य मारिष । दृष्टं चादृष्टवत्कृत्वा क्रियामन्यां प्रयोजयन् ॥ ) आर्य! महाबाहु सात्यकिको आगे जाते देखकर आपके सैनिक उस देखी हुई घटनाको भी अनदेखी करके दूसरे काममें लग गये ।

तं शरानाददानं च रक्षमाणं च सारथिम् ।

आत्मानं पालयानं च तावकाः समपूजयन् ॥ ४७ ॥

सात्यकि बाणोंको ग्रहण करते हुए अपनी और सारथिकी भी रक्षा करते थे । उनके इस कार्यकी आपके सैनिकोंने भी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे दुर्योधनपलायने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका शत्रुसेनामें प्रवेश और दुर्योधनका पलायनविषयक एक सौ बीसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १२० ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४८३ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 825

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सात्यकिके द्वारा पाषाणयोधी म्लेच्छोंकी सेनाका संहार और दुःशासनका सेनासहित पलायन धृतराष्ट्रउवाच

सम्प्रमृद्य महत् सैन्यं यान्तं शैनेयमर्जुनम् ।

निर्हीका मम ते पुत्राः किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! मेरी विशाल सेनाको रौंदकर जाते हुए सात्यकि और अर्जुनको देखकर मेरे उन निर्लज्ज पुत्रोंने क्या किया? ॥ १ ॥

कथं वैषां तदा युद्धे धृतिरासीन्मुमूर्षताम् ।

शैनेयचरितं दृष्ट्वा यादृशं सव्यसाचिनः ॥ २ ॥

वे सब - के - सब मरना चाहते थे । उस समय युद्धस्थलमें अर्जुनके समान ही सात्यकिका चरित्र देखकर उनकी कैसी धारणा हुई थी? ॥ २ ॥

किं नु वक्ष्यन्ति ते क्षात्रं सैन्यमध्ये पराजिताः ।

कथं नु सात्यकिर्युद्धे व्यतिक्रान्तो महायशाः ॥ ३ ॥

वे सेना बीचमें परास्त होकर अपने क्षात्रबलका क्या वर्णन करेंगे? समरांगणमें महायशस्वी सात्यकि किस प्रकार सारी सेनाको लाँघकर आगे बढ़ गये? ॥ ३ ॥

कथं च मम पुत्राणां जीवतां तत्र संजय ।

शैनेयोऽभिययौ युद्धे तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४ ॥

संजय! युद्धस्थलमें मेरे पुत्रोंके जीते-जी शिनिनन्दन सात्यकि किस तरह आगे जा सके? संजय! यह सब मुझे बताओ ॥ ४ ॥

अत्यद्भुतमिदं तात त्वत्सकाशाच्छृणोम्यहम् ।

एकस्य बहुभिः सार्धं शत्रुभिस्तैर्महारथैः ॥ ५ ॥

तात! यह मैं तुम्हारे मुँहसे अत्यन्त विचित्र बात सुन रहा हूँ कि शत्रुदलके उन बहुसंख्यक महारथियोंके साथ एकमात्र सात्यकिका ऐसा घोर संग्राम हुआ ॥ ५ ॥

विपरीतमहं मन्ये मन्दभाग्यं सुतं प्रति ।

यत्रावध्यन्त समरे सात्वतेन महारथाः ॥ ६ ॥

मैं अपने भाग्यहीन पुत्रके लिये सब कुछ विपरीत ही मान रहा हूँ; क्योंकि समरांगणमें अकेले सात्यकिने बहुत - से महारथियोंका वध कर डाला है ॥ ६ ॥

एकस्य हि न पर्याप्तं यत्सैन्यं तस्य संजय ।

क्रुद्धस्य युयुधानस्य सर्वे तिष्ठन्तु पाण्डवाः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 826

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संजय! और सब पाण्डव तो दूर रहें, क्रोधमें भरे हुए अकेले सात्यकिके लिये भी मेरी सारी सेना पर्याप्त नहीं है ॥ ७ ॥

निर्जित्य समरे द्रोणं कृतिनं चित्रयोधिनम् ।

यथा पशुगणान् सिंहस्तद्वद्धन्ता सुतान् मम ॥ ८ ॥

जैसे सिंह पशुओंको मार डालता है, उसी प्रकार सात्यकि विचित्र युद्ध करनेवाले विद्वान् द्रोणाचार्यको भी युद्धमें परास्त करके मेरे पुत्रोंका वध कर डालेंगे ॥ ८ ॥

कृतवर्मादिभिः शूरैर्यत्तैर्बहुभिराहवे ।

युयुधानो न शकितो हन्तुं यत् पुरुषर्षभः ॥ ९ ॥

कृतवर्मा आदि बहुत - से शूरवीर समरांगणमें प्रयत्न करते ही रह गये; परंतु पुरुषप्रवर सात्यकि मारे न जा सके ॥ ९ ॥

नैतदीदृशकं युद्धं कृतवांस्तत्र फाल्गुनः ।

यादृशं कृतवान् युद्धं शिनेर्नप्ता महायशाः ॥ १० ॥

शिनिके महायशस्वी पौत्र सात्यकिने वहाँ जैसा युद्ध किया, वैसा तो अर्जुनने भी नहीं किया था ॥ १० ॥

संजय उवाच

तव दुर्मन्त्रिते राजन् दुर्योधनकृतेन च ।

शृणुष्वावहितो भूत्वा यत् ते वक्ष्यामि भारत ॥ ११ ॥

संजयने कहा — राजन्! आपकी खोटी सलाह और दुर्योधनकी काली करतूतसे यह सब कुछ हुआ है । भारत! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सावधान होकर सुनिये ॥ ११ ॥

ते पुनः संन्यवर्तन्त कृत्वा संशप्तकान् मिथः ।

परां युद्धे मतिं क्रूरां तव पुत्रस्य शासनात् ॥ १२ ॥

आपके पुत्रकी आज्ञासे युद्धके लिये अत्यन्त क्रूरतापूर्ण निश्चय करके परस्पर शपथ ले वे सभी पराजित योद्धा पुनः लौट आये ॥ १२ ॥

त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः ।

शककाम्बोजबाह्लीका यवनाः पारदास्तथा ॥ १३ ॥

कुलिन्दास्तङ्गणाम्बष्ठाः पैशाचाश्च सबर्बराः ।

पर्वतीयाश्च राजेन्द्र क्रुद्धाः पाषाणपाणयः ॥ १४ ॥

अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभाः पावकं यथा । तीन हजार घुड़सवार और हाथीसवार दुर्योधनको अपना अगुआ बनाकर चले । उनके साथ शक, काम्बोज, बाह्लीक, यवन, पारद, कुलिन्द, तंगण, अम्बष्ठ, पैशाच, बर्बर तथा पर्वतीय योद्धा भी थे । राजेन्द्र! वे सब-के-- -सब कुपित हो हाथोंमें पत्थर लिये सात्यकिकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे फतिंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं ॥ १३-१४३ ॥

पृष्ठ 827

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 827 का मूल पृष्ठ
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युक्ताश्च पर्वतीयानां रथाः पाषाणयोधिनाम् ॥ १५ ॥

शूराः पञ्चशता राजन् शैनेयं समुपाद्रवन् । राजन्! पत्थरोंद्वारा युद्ध करनेवाले पर्वतीयोंके पाँच सौ शूरवीर रथी युद्धके लिये सुसज्जित हो सात्यकिपर चढ़ आये ॥ १५३ ॥

ततो रथसहस्रेण महारथशतेन च ॥ १६ ॥

द्विरदानां सहस्रेण द्विसाहस्रैश्च वाजिभिः ।

शरवर्षाणि मुञ्चन्तो विविधानि महारथाः ॥ १७ ॥

अभ्यद्रवन्त शैनेयमसंख्येयाश्च पत्तयः । तत्पश्चात् एक हजार रथी, सौ महारथी, एक हजार हाथी और दो हजार घुड़सवारोंके साथ बहुत - से महारथी और असंख्य पैदल सैनिक सात्यकिपर नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए टूट पड़े ॥ १६-१७३ ॥ तांश्च संचोदयन् सर्वान् घ्नतैनमिति भारत ॥ १८ ॥

दुःशासनो महाराज सात्यकिं पर्यवारयत् । भरतवंशी महाराज! ' इस सात्यकिको मार डालो ', इस प्रकार उन समस्त सैनिकोंको प्रेरित करते हुए दुःशासनने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ १८३ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयचरितं महत् ॥ १ ९ ॥ यदेको बहुभिः सार्धमसम्भ्रान्तमयुध्यत । वहाँ हमने सात्यकिका अत्यन्त अद्भुत चरित्र देखा कि वे बिना किसी घबराहटके अकेले ही बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १ ९ ॥ अवधीच्च रथानीकं द्विरदानां च तद् बलम् ॥ २० ॥

सादिनश्चैव तान् सर्वान् दस्यूनपि च सर्वशः । उन्होंने रथसेना और गजसेनाका तथा उन समस्त घुड़सवारों एवं लुटेरे म्लेच्छोंका भी सब प्रकारसे संहार कर डाला ॥ २० ॥

तत्र चक्रैर्विमथितैर्भग्नैश्च परमायुधैः ॥ २१ ॥

अक्षैश्च बहुधा भग्नैरीषादण्डकबन्धुरैः ।

कुञ्जरैर्मथितैश्चापि ध्वजैश्च विनिपातितैः ॥ २२ ॥

वर्मभिश्च तथानीकैर्व्यवकीर्णा वसुंधरा । वहाँ चूर -चूर हुए चक्कों, टूटे हुए उत्तमोत्तम आयुधों टूक-टूक हुए धुरों, खण्डित हुए ईषादण्डों और बन्धुरों, मथे गये हाथियों, तोड़कर गिराये हुए ध्वजों, छिन्न -भिन्न कवचों और विनष्ट हुए सैनिकोंकी लाशोंसे वहाँकी पृथ्वी पट गयी थी ॥ २१-२२३ ॥ स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैरनुकर्षैश्च मारिष ॥ २३ ॥

संछन्ना वसुधा तत्र द्यौर्ग्रहैरिव भारत ।

पृष्ठ 828

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माननीय भरतनरेश! योद्धाओंके हारों, आभूषणों, वस्त्रों और अनुकर्षोंसे आच्छादित हुई वहाँकी भूमि तारोंसे व्याप्त हुए आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ २३३ ॥

गिरिरूपधराश्चापि पतिताः कुञ्जरोत्तमाः ॥ २४ ॥

अञ्जनस्य कुले जाता वामनस्य च भारत । भारत! अंजन और वामन नामक दिग्गजके कुलमें उत्पन्न हुए पर्वताकार श्रेष्ठ गजराज भी वहाँ धराशायी हो गये थे ॥ २४ ॥

सुप्रतीककुले जाता महापद्मकुले तथा ॥ २५ ॥

ऐरावतकुले चैव तथान्येषु कुलेषु च ।

जाता दन्तिवरा राजन् शेरते बहवो हताः ॥ २६ ॥

नरेश्वर! सुप्रतीक, महापद्म, ऐरावत तथा अन्य [ पुण्डरीक, पुष्पदन्त और सार्वभौम-( इन) दिग्गजोंके ] कुलोंमें उत्पन्न हुए बहुतेरे दंतार हाथी भी वहाँ धरतीपर लोट रहे थे ॥ २५-२६ ॥

वनायुजान् पर्वतीयान् काम्बोजान् बाह्निकानपि ।

तथा हयवरान् राजन् निजघ्ने तत्र सात्यकिः ॥ २७ ॥

राजन्! वहाँ सात्यकिने वनायु, काम्बोज ( काबुल) और बाह्लीक देशोंमें उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अश्वों तथा पहाड़ी घोड़ोंको भी मार गिराया ॥ २७ ॥

नानादेशसमुत्थांश्च नानाजातींश्च दन्तिनः ।

निजघ्ने तत्र शैनेयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २८ ॥

शिनिके उस वीर पौत्रने अनेक देशोंमें उत्पन्न हुए विभिन्न जातिके सैकड़ों और हजारों हाथियोंका भी संहार कर डाला ॥ २८ ॥

तेषु प्रकाल्यमानेषु दस्यून् दुःशासनोऽब्रवीत् ।

निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ॥ २९ ॥

वे हाथी जब कालके गालमें जा रहे थे, उस समय दुःशासनने लूट- पाट करनेवाले म्लेच्छोंसे इस प्रकार कहा- ' धर्मको न जाननेवाले योद्धाओ! इस तरह भाग जानेसे तुम्हें क्या मिलेगा? लौटो और युद्ध करो ' ॥ २ ९ ॥

तांश्चातिभग्नान् सम्प्रेक्ष्य पुत्रो दुःशासनस्तव ।

पाषाणयोधिनः शूरान् पर्वतीयानचोदयत् ॥ ३० ॥

इतनेपर भी उन्हें चोर-जोरसे भागते देख आपके पुत्र दुःशासनने पत्थरोंद्वारा युद्ध करनेवाले शूरवीर पर्वतीयोंको आज्ञा दी - ॥ ३० ॥

अश्मयुद्धेषु कुशला नैतज्जानाति सात्यकिः ।

अश्मयुद्धमजानन्तं घ्नतैनं युद्धकार्मुकम् ॥ ३१ ॥

‘ वीरो! तुमलोग प्रस्तरोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल हो । सात्यकिको इस कलाका ज्ञान नहीं है । प्रस्तरयुद्धको न जानते हुए भी युद्धकी इच्छा रखनेवाले इस शत्रुको तुमलोग मार

पृष्ठ 829

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डालो ॥ ३१ ॥

तथैव कुरवः सर्वे नाश्मयुद्धविशारदाः ।

अभिद्रवत मा भैष्ट न वः प्राप्स्यति सात्यकिः ॥ ३२ ॥

‘ इसी प्रकार समस्त कौरव भी प्रस्तरयुद्धमें प्रवीण नहीं हैं । अतः तुम डरो मत ।

आक्रमण करो । सात्यकि तुम्हें नहीं पा सकता' ॥ ३२ ॥

ते पर्वतीया राजानः सर्वे पाषाणयोधिनः ।

अभ्यद्रवन्त शैनेयं राजानमिव मन्त्रिणः ॥ ३३ ॥

जैसे मन्त्री राजाके पास जाते हैं, उसी प्रकार वे पाषाणयोधी समस्त पर्वतीय नरेश सात्यकिकी ओर दौड़े ॥ ३३ ॥

ततो गजशिरःप्रख्यैरुपलैः शैलवासिनः ।

उद्यतैर्युयुधानस्य पुरतस्तस्थुराहवे ॥ ३४ ॥

वे पर्वतनिवासी योद्धा हाथीके मस्तकके समान बड़े- बड़े प्रस्तर हाथमें लेकर समरांगणमें युयुधानके सामने युद्धके लिये तैयार होकर खड़े हो गये ॥ ३४ ॥

क्षेपणीयैस्तथाप्यन्ये सात्वतस्य वधैषिणः ।

चोदितास्तव पुत्रेण सर्वतो रुरुधुर्दिशः ॥ ३५ ॥

आपके पुत्र दुःशासनसे प्रेरित होकर सात्यकिके वधकी इच्छा रखनेवाले अन्य बहुतेरे सैनिकोंने भी क्षेपणीयास्त्र उठाकर सब ओरसे सात्यकिकी सम्पूर्ण दिशाओंको अवरुद्ध कर लिया ॥ ३५ ॥

तेषामापततामेव शिलायुद्धं चिकीर्षताम् ।

सात्यकिः प्रतिसंधाय निशितान् प्राहिणोच्छरान् ॥ ३६ ॥

प्रस्तरयुद्धकी इच्छा रखनेवाले उन योद्धाओंके आक्रमण करते ही सात्यकिने तेज किये हुए बाणोंका संधान करके उन्हें उनपर चलाया ॥ ३६ ॥

तामश्मवृष्टिं तुमुलां पर्वतीयैः समीरिताम् ।

चिच्छेदोरगसंकाशैर्नासचैः शिनिपुङ्गवः ॥ ३७ ॥

पर्वतीय सैनिकोंद्वारा की हुई उस भयंकर पाषाणवर्षाको शिनिप्रवर सात्यकिने अपने सर्पतुल्य नाराचोंद्वारा छिन्न- भिन्न कर दिया ॥ ३७ ॥

तैरश्मचूर्णैर्दीप्यद्भिः खद्योतानामिव व्रजैः ।

प्रायः सैन्यान्यहन्यन्त हाहाभूतानि मारिष ॥ ३८ ॥

माननीय नरेश! जुगनुओंकी जमातोंके समान उद्भासित होनेवाले उन प्रस्तरचूर्णौसे प्रायः सारी सेनाएँ आहत हो हाहाकार करने लगीं ॥ ३८ ॥

ततः पञ्चशतं शूराः समुद्यतमहाशिलाः ।

निकृत्तबाहवो राजन् निपेतुर्धरणीतले ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 830

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राजन्! तदनन्तर बड़े - बड़े प्रस्तरखण्ड उठाये हुए पाँच सौ शूरवीर अपनी भुजाओंके कट जानेसे धरतीपर गिर पड़े ॥ ३ ९ ॥

पुनर्दशशताश्चान्ये शतसाहस्रिणस्तथा ।

सोपलैर्बाहुभिश्छिन्नैः पेतुरप्राप्य सात्यकिम् ॥ ४० ॥

फिर एक हजार दूसरे योद्धा तथा एक लाख अन्य सैनिक सात्यकितक पहुँचने भी नहीं पाये थे कि अपने हाथमें लिये शिलाखण्डोंसे कटी हुई बाहुओंके साथ ही धराशायी हो गये ॥ ४० ॥

( सात्वतस्य च भल्लेन निष्पिष्टैस्तैस्तथाद्रिभिः ।

न्यपतन् निहता म्लेच्छास्तत्र तत्र गतासवः ॥

ते हन्यमानाः समरे सात्वतेन महात्मना । अश्मवृष्टिं महाघोरां पातयन्ति स्म सात्वते ॥ ) सात्यकिके भल्लसे चूर- चूर हुए शिलाखण्डोंद्वारा मारे गये म्लेच्छ प्राणशून्य होकर जहाँ - तहाँ पड़े थे । महामना सात्यकिद्वारा समरभूमिमें मारे जाते हुए वे म्लेच्छ सैनिक उनपर बड़ी भयंकर पत्थरोंकी वर्षा करते थे ।

पाषाणयोधिनः शूरान् यतमानानवस्थितान् ।

न्यवधीद् बहुसाहस्रांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४१ ॥

वे पाषाणोंद्वारा युद्ध करनेवाले शूरवीर विजयके लिये यत्नशील होकर रणक्षेत्रमें डटे हुए थे । उनकी संख्या अनेक सहस्र थी; परंतु सात्यकिने उन सबका संहार कर डाला । वह एक अद्भुत - सी घटना हुई ॥ ४१ ॥

ततः पुनर्व्यात्तमुखास्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः ।

अयोहस्ताः शूलहस्ता दरदास्तङ्गणाः खसाः ॥ ४२ ॥

लम्पाकाश्च कुलिन्दाश्च चिक्षिपुस्तांश्च सात्यकिः ।

नाराचैः प्रतिचिच्छेद प्रतिपत्तिविशारदः ॥ ४३ ॥

तदनन्तर पुनः हाथमें लोहेके गोले और त्रिशूल लिये मुँह फैलाये हुए दरद, तंगण, खस, लम्पाक और कुलिन्ददेशीय म्लेच्छोंने सात्यकिपर चारों ओरसे पत्थर बरसाने आरम्भ किये; परंतु प्रतीकार करनेमें निपुण सात्यकिने अपने नाराचोंद्वारा उन सबको छिन्न - भिन्न कर दिया ॥ ४२-४३ ॥

अद्रीणां भिद्यमानानामन्तरिक्षे शितैः शरैः ।

शब्देन प्राद्रवन् संख्ये रथाश्वगजपत्तयः ॥ ४४ ॥

आकाशमें तीखे बाणोंद्वारा टूटने - फूटनेवाले प्रस्तर-खण्डोंके शब्दसे भयभीत हो रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिक युद्धस्थलमें इधर- उधर भागने लगे ॥ ४४ ॥

अश्मचूर्णैरवाकीर्णा मनुष्यगजवाजिनः ।

नाशक्नुवन्नवस्थातुं भ्रमरैरिव दंशिताः ॥ ४५ ॥