05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 121–130
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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सप्तदशोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा युधिष्ठिरउवाच
असंतोषः प्रमादश्च मदो रागोऽप्रशान्तता ।
बलं मोहोऽभिमानश्चाप्युद्वेगश्चैव सर्वशः ॥ १ ॥
एभिः पाप्मभिराविष्टो राज्यं त्वमभिकांक्षसे ।
निरामिषो विनिर्मुक्तः प्रशान्तः सुसुखी भव ॥ २ ॥
युधिष्ठिर बोले- भीमसेन! असंतोष, प्रमाद, मद, राग, अशान्ति, बल, मोह, अभिमान तथा उद्वेग — ये सभी पाप तुम्हारे भीतर घुस गये हैं, इसीलिये तुम्हें राज्यकी इच्छा होती है । भाई! सकाम कर्म और बन्धनसे* रहित होकर सर्वथा मुक्त, शान्त एवं सुखी हो जाओ ॥ १-२ ॥
य इमामखिलां भूमिं शिष्यादेको महीपतिः ।
तस्याप्युदरमेकं वै किमिदं त्वं प्रशंससि ॥ ३ ॥
जो सम्राट् इस सारी पृथ्वीका अकेला ही शासन करता है, उसके पास भी एक ही पेट होता है; अतः तुम किसलिये इस राज्यकी प्रशंसा करते हो? ॥ ३ ॥
नाह्ना पूरयितुं शक्यां न मासैर्भरतर्षभ ।
अपूर्णां पूरयन्निच्छामायुषापि न शक्नुयात् ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस इच्छाको एक दिनमें या कई महीनोंमें भी पूर्ण नहीं किया जा सकता । इतना ही नहीं, सारी आयु प्रयत्न करनेपर भी इस अपूरणीय इच्छाकी पूर्ति होनी असम्भव है ॥ ४ ॥
यथेद्धः प्रज्वलत्यग्निरसमिद्धः प्रशाम्यति ।
अल्पाहारतया त्वग्निं शमयौदर्यमुत्थितम् ॥ ५ ॥
जैसे आगमें जितना ही ईंधन डालो, वह प्रज्वलित होती जायगी और ईंधन न डाला जाय तो वह अपने - आप आप बुझ जाती है । इसी प्रकार तुम भी अपना आहार कम करके इस जगी हुई जठराग्निको शान्त करो ॥ ५ ॥
आत्मोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु ।1
जयोदरं पृथिव्या ते श्रेयो निर्जितया जितम् ॥ ६ ॥
अज्ञानी मनुष्य अपने पेटके लिये ही बहुत हिंसा करता है; अतः तुम पहले अपने पेटको ही जीतो । फिर ऐसा समझा जायगा कि इस जीती हुई पृथ्वीके द्वारा तुमने
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कल्याणपर विजय पा ली है ॥ ६ ॥
मानुषान् कामभोगांस्त्वमैश्वर्यं च प्रशंससि ।
अभोगिनोऽबलाश्चैव यान्ति स्थानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥
भीमसेन! तुम मनुष्योंके कामभोग और ऐश्वर्यकी बड़ी प्रशंसा करते हो; परंतु जो भोगरहित हैं और तपस्या करते - करते निर्बल हो गये हैं, वे ऋषि-मुनि ही सर्वोत्तम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥
योगः क्षेमश्च राष्ट्रस्य धर्माधर्मौ त्वयि स्थितौ ।
मुच्यस्व महतो भारात् त्यागमेवाभिसंश्रय ॥ ८ ॥
राष्ट्रके योग और क्षेम, धर्म तथा अधर्म सब तुममें ही स्थित हैं । तुम इस महान् भारसे मुक्त हो जाओ और त्यागका ही आश्रय लो ॥ ८ ॥
एकोदरकृते व्याघ्रः करोति विघसं बहु ।
तमन्येऽप्युपजीवन्ति मन्दा लोभवशा मृगाः ॥ ९ ॥
बाघ एक ही पेटके लिये बहुत से प्राणियोंकी हिंसा करता है, दूसरे लोभी और मूर्ख पशु भी उसीके सहारे जीवन निर्वाह करते हैं ॥ ९ ॥
विषयान् प्रतिसंगृह्य संन्यासं कुरुते यतिः ।
न च तुष्यन्ति राजानः पश्य बुद्धयन्तरं यथा ॥ १० ॥
यत्नशील साधक विषयोंका परित्याग करके संन्यास ग्रहण कर लेता है तो वह संतुष्ट हो जाता है । परंतु विषयभोगोंसे सम्पन्न समृद्धिशाली राजा कभी संतुष्ट नहीं होते । देखो, इन दोनोंके विचारोंमें कितना अन्तर है? ॥ १० ॥
पत्राहारैरश्मकुट्टैर्दन्तोलूखलिकैस्तथा ।
अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च तैरयं नरको जितः ॥ ११ ॥
जो लोग पत्ते खाकर रहते हैं, जो पत्थरपर पीसकर अथवा दाँतोंसे ही चबाकर भोजन करनेवाले हैं ( अर्थात् जो चक्कीका पीसा और ओखलीका कूटा नहीं खाते हैं ) तथा जो पानी या हवा पीकर रह जाते हैं, उन तपस्वी पुरुषोंने ही नरकपर विजय पायी है ॥ ११ ॥
यस्त्विमां वसुधां कृत्स्नां प्रशासेदखिलां नृपः ।
तुल्याश्मकांचनो यश्च स कृतार्थो न पार्थिवः ॥ १२ ॥
जो राजा इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करता है और जो सब कुछ छोड़कर पत्थर और सोनेको समान समझनेवाला है – इन दोनोंमेंसे वह त्यागी मुनि ही कृतार्थ होता है, राजा नहीं ॥ १२ ॥
संकल्पेषु निरारम्भो निराशो निर्ममो भव ।
अशोकं स्थानमातिष्ठ इह चामुत्र चाव्ययम् ॥ १३ ॥
अपने मनोरथोंके पीछे बड़े- बड़े कार्योंका आरम्भ न करो । आशा तथा ममता न रखो और उस शोकरहित पदका आश्रय लो जो इहलोक और परलोकमें भी अविनाशी
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है ॥ १३ ॥
निरामिषा न शोचन्ति शोचसि त्वं किमामिषम् ।
परित्यज्यामिषं सर्वं मृषावादात् प्रमोक्ष्यसे ॥ १४ ॥
जिन्होंने भोगोंका परित्याग कर दिया है वे तो कभी शोक नहीं करते हैं; फिर तुम क्यों भोगोंकी चिन्ता करते हो? सारे भोगोंका परित्याग कर देनेपर तुम मिथ्यावादसे छूट जाओगे ॥ १४ ॥
पन्थानौ पितृयानश्च देवयानश्च विश्रुतौ ।
ईजानाः पितृयानेन देवयानेन मोक्षिणः ॥ १५ ॥
देवयान और पितृयान- ये दो परलोकके प्रसिद्ध मार्ग हैं । जो सकाम यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले हैं वे पितृयानसे जाते हैं और मोक्षके अधिकारी देवयानमार्गसे ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण स्वाध्यायेन महर्षयः ।
विमुच्य देहांस्ते यान्ति मृत्योरविषयं गताः ॥ १६ ॥
महर्षिगण तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्यायके बलसे देहत्यागके पश्चात् ऐसे लोकमें पहुँच जाते हैं जहाँ मृत्युका प्रवेश नहीं है ॥ १६ ॥
आमिषं बन्धनं लोके कर्मेहोक्तं तथामिषम् ।
ताभ्यां विमुक्तः पापाभ्यां पदमाप्नोति तत् परम् ॥ १७ ॥
इस जगत्में ममता और आसक्तिके बन्धनको आमिष कहा गया है । सकाम कर्म भी आमिष कहलाता है । इन दोनों आमिषस्वरूप पापोंसे जो मुक्त हो गया है वही परमपदको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
अपि गाथां पुरा गीतां जनकेन वदन्त्युत ।
निर्द्वन्द्वेन विमुक्तेन मोक्षं समनुपश्यता ॥ १८ ॥
इस विषयमें पूर्वकालमें राजा जनककी कही हुई एक गाथाका लोग उल्लेख किया करते हैं । राजा जनक समस्त द्वन्द्वोंसे रहित और जीवन्मुक्त पुरुष थे । उन्होंने मोक्षस्वरूप परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लिया था ।
अनन्तं बत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किंचन ।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन ॥ १ ९ ॥
(उनकी वह गाथा इस प्रकार है - ) दूसरोंकी दृष्टिमें मेरे पास बहुत धन है; परंतु उसमेंसे कुछ भी मेरा नहीं है । सारी मिथिलामें आग लग जाय तो भी मेरा कुछ नहीं जलेगा ॥ १ ९ ॥
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोचन् शोचतो जनान् ।
जगतीस्थानिवाद्रिस्थो मन्दबुद्धीनवेक्षते ॥ २० ॥
जैसे पर्वतकी चोटीपर चढ़ा हुआ मनुष्य धरती पर खड़े हुए प्राणियोंको केवल देखता है उनकी परिस्थितिसे प्रभावित नहीं होता, उसी प्रकार बुद्धिकी अट्टालिकापर चढ़ा हुआ
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मनुष्य उन शोक करनेवाले मन्दबुद्धि लोगोंको देखता है, किंतु स्वयं उनकी भाँति दुखी नहीं होता ॥ २० ॥
दृश्यं पश्यति यः पश्यन् स चक्षुष्मान् स बुद्धिमान् ।
अज्ञातानां च विज्ञानात् सम्बोधाद् बुद्धिरुच्यते ॥ २१ ॥
जो स्वयं द्रष्टारूपसे पृथक् रहकर इस दृश्य - प्रपंचको देखता है, वही आँखवाला है और वही बुद्धिमान् है । अज्ञात तत्त्वोंका ज्ञान एवं सम्यग् बोध करानेके कारण अन्तःकरणकी एक वृत्तिको बुद्धि कहते हैं ॥ २१ ॥
यस्तु वाचं विजानाति बहुमानमियात् स वै ।
ब्रह्मभावप्रपन्नानां वैद्यानां भावितात्मनाम् ॥ २२ ॥
जो ब्रह्मभावको प्राप्त हुए शुद्धात्मा विद्वानोंका -सा बोलना जान लेता है, उसे अपने ज्ञानपर बड़ा अभिमान हो जाता है ( जैसे कि तुम हो ) ॥ २२ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ २३ ॥
जब पुरुष प्राणियोंकी पृथक् - पृथक् सत्ताको एकमात्र परमात्मामें ही स्थित देखता है और उस परमात्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार हुआ मानता है, उस समय वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
ते जनास्तां गतिं यान्ति नाविद्वांसोऽल्पचेतसः ।
नाबुद्धयो नातपसः सर्वं बुद्धौ प्रतिष्ठितम् ॥ २४ ॥
बुद्धिमान् और तपस्वी ही उस गतिको प्राप्त होते हैं। जो अज्ञानी, मन्दबुद्धि, शुद्धबुद्धिसे रहित और तपस्यासे शून्य हैं - वे नहीं । क्योंकि सब कुछ बुद्धिमें ही प्रतिष्ठित है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका वाक्यविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
* आमिषं बन्धनं लोके कर्मेहोक्तं तथामिषम् । ताभ्यां विमुक्तः पापाभ्यां पदमाप्नोति तत्परम् ॥ ( १७।१७ )
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अष्टादशोऽध्यायः अर्जुनका राजा जनक और उनकी रानीका दृष्टान्त देते हुए युधिष्ठिरको संन्यास ग्रहण करनेसे रोकना वैशम्पायन उवाच
तूष्णीम्भूतं तु राजानं पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत् ।
संतप्तः शोकदुःखाभ्यां राजवाक्छल्यपीडितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब राजा युधिष्ठिर ऐसा कहकर चुप हो गये, तब राजाके वाग्बाणोंसे पीड़ित हो शोक और दुःखसे संतप्त हुए अर्जुन फिर उनसे बोले ॥ १ ॥
अर्जुनउवाच
कथयन्ति पुरावृत्तमितिहासमिमं जनाः ।
विदेहराज्ञः संवादं भार्यया सह भारत ॥ २ ॥
अर्जुनने कहा- भारत! विज्ञ पुरुष विदेहराज जनक और उनकी रानीका संवादरूप यह प्राचीन इतिहास कहा करते हैं ॥ २ ॥
उत्सृज्य राज्यं भिक्षार्थं कृतबुद्धिं नरेश्वरम् ।
विदेहराजमहिषी दुःखिता यदभाषत ॥ ३ ॥
एक समय राजा जनकने भी राज्य छोड़कर भिक्षासे जीवन- निर्वाह कर लेनेका निश्चय कर लिया था । उस समय विदेहराजकी महारानीने दुखी होकर जो कुछ कहा था, वही आपको सुना रहा हूँ ॥ ३ ॥
धनान्यपत्यं दाराश्च रत्नानि विविधानि च ।
पन्थानं पावकं हित्वा जनको मौढ्यमास्थितः ॥ ४ ॥
तं ददर्श प्रिया भार्या भैक्ष्यवृत्तिमकिंचनम् ।
धानामुष्टिमुपासीनं निरीहं गतमत्सरम् ॥ ५ ॥
तमुवाच समागत्य भर्तारमकुतोभयम् ।
क्रुद्धा मनस्विनी भार्या विविक्ते हेतुमद् वचः ॥ ६ ॥
कहते हैं, एक दिन राजा जनकपर मूढ़ता छा गयी और वे धन, संतान, स्त्री, नाना प्रकारके रत्न, सनातन मार्ग और अग्निहोत्रका भी त्याग करके अकिंचन हो गये । उन्होंने भिक्षुवृत्ति अपना ली और वे मुट्ठीभर भुना हुआ जौ खाकर रहने लगे । उन्होंने सब प्रकारकी चेष्टाएँ छोड़ दीं । उनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्याका भाव नहीं रह गया था । इस प्रकार निर्भय स्थितिमें पहुँचे हुए अपने स्वामीको उनकी भार्याने देखा और उनके पास आकर
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कुपित हुई उस मनस्विनी एवं प्रिय रानीने एकान्तमें यह युक्तियुक्त बात कही— ॥ ४— ६ ॥
कथमुत्सृज्य राज्यं स्वं धनधान्यसमन्वितम् ।
कापालीं वृत्तिमास्थाय धानामुष्टिर्न ते वरः ॥ ७ ॥
‘ राजन्! आपने धन- धान्यसे सम्पन्न अपना राज्य छोड़कर यह खपड़ा लेकर भीख माँगनेका धंधा कैसे अपना लिया? यह मुट्ठीभर जौ आपको शोभा नहीं दे रहा है ॥ ७ ॥
प्रतिज्ञा तेऽन्यथा राजन् विचेष्टा चान्यथा तव ।
यद् राज्यं महदुत्सृज्य स्वल्पे तुष्यसि पार्थिव ॥ ८ ॥
‘नरेश्वर! आपकी प्रतिज्ञा तो कुछ और थी और चेष्टा कुछ और ही दिखायी देती है ।
भूपाल! आपने विशाल राज्य छोड़कर थोड़ी - सी वस्तुमें संतोष कर लिया ॥ ८ ॥
नैतेनातिथयो राजन् देवर्षिपितरस्तथा ।
अद्य शक्यास्त्वया भर्तुं मोघस्तेऽयं परिश्रमः ॥ ९ ॥
‘ राजन्! इस मुट्ठीभर जौसे देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अतिथियोंका आप भरण-पोषण नहीं कर सकते, अतः आपका यह परिश्रम व्यर्थ है ॥ ९ ॥
देवतातिथिभिश्चैव पितृभिश्चैव पार्थिव ।
सर्वैरेतैः परित्यक्तः परिव्रजसि निष्क्रियः ॥ १० ॥
' पृथ्वीनाथ! आप सम्पूर्ण देवताओं, अतिथियों और पितरोंसे परित्यक्त होकर अकर्मण्य हो घर छोड़ रहे हैं ॥
यस्त्वं त्रैविद्यवृद्धानां ब्राह्मणानां सहस्रशः ।
भर्ता भूत्वा च लोकस्य सोऽद्य तैर्भृतिमिच्छसि ॥ ११ ॥
‘ तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े - चढ़े सहस्रों ब्राह्मणों तथा इस सम्पूर्ण जगत्का भरण - पोषण करनेवाले होकर भी आज आप उन्हींके द्वारा अपना भरण- पोषण चाहते हैं ॥
श्रियं हित्वा प्रदीप्तां त्वं श्ववत् सम्प्रति वीक्ष्यसे ।
अपुत्रा जननी तेऽद्य कौसल्या चापतिस्त्वया ॥ १२ ॥
‘ इस जगमगाती हुई राजलक्ष्मीको छोड़कर इस समय आप दर- दर भटकनेवाले कुत्तेके समान दिखायी देते हैं । आज आपके जीते -जी आपकी माता पुत्रहीन और यह अभागिनी कौसल्या पतिहीन हो गयी ॥ १२ ॥
अमी च धर्मकामास्त्वां क्षत्रियाः पर्युपासते ।
त्वदाशामभिकांक्षन्तः कृपणाः फलहेतुकाः ॥ १३ ॥
‘ ये धर्मकी इच्छा रखनेवाले क्षत्रिय जो सदा आपकी सेवामें बैठे रहते हैं, आपसे बड़ी-बड़ी आशाएँ रखते हैं, इन बेचारोंको सेवाका फल चाहिये ॥ १३ ॥
तांश्च त्वं विफलान् कुर्वन् कं नु लोकं गमिष्यसि ।
राजन् संशयिते मोक्षे परतन्त्रेषु देहिषु ॥ १४ ॥
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‘ राजन्! मोक्षकी प्राप्ति संशयास्पद है और प्राणी प्रारब्धके अधीन हैं । ऐसी दशामें उन अर्थार्थी सेवकोंको यदि आप विफल-मनोरथ करते हैं तो पता नहीं किस लोकमें जायँगे? ॥ १४ ॥
नैव तेऽस्ति परो लोको नापरः पापकर्मणः ।
धर्म्यान् दारान् परित्यज्य यस्त्वमिच्छसि जीवितुम् ॥ १५ ॥
‘ आप अपनी धर्मपत्नीका परित्याग करके जो अकेला जीवन बिताना चाहते हैं, इससे आप पापकर्मा बन गये हैं; अतः आपके लिये न यह लोक सुखद होगा, न परलोक ॥ १५ ॥
स्रजो गन्धानलंकारान् वासांसि विविधानि च ।
किमर्थमभिसंत्यज्य परिव्रजसि निष्क्रियः ॥ १६ ॥
‘ बताइये तो सही, इन सुन्दर- सुन्दर मालाओं, सुगन्धित पदार्थों, आभूषणों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंको छोड़कर किसलिये कर्महीन होकर घरका परित्याग कर रहे हैं? ॥ १६ ॥
निपानं सर्वभूतानां भूत्वा त्वं पावनं महत् ।
आढ्यो वनस्पतिर्भूत्वा सोऽन्यांस्त्वं पर्युपाससे ॥ १७ ॥
‘ आप सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये पवित्र एवं विशाल प्याऊके समान थे - सभी आपके पास अपनी प्यास बुझाने आते थे । आप फलोंसे भरे हुए वृक्षके समान थे — कितने ही प्राणियोंकी भूख मिटाते थे, परंतु वे ही आप अब ( भूख- प्यास मिटानेके लिये ) दूसरोंका मुँह जोह रहे हैं ॥
खादन्ति हस्तिनं न्यासैः क्रव्यादा बहवोऽप्युत ।
बहवः कृमयश्चैव किं पुनस्त्वामनर्थकम् ॥ १८ ॥
‘ यदि हाथी भी सारी चेष्टा छोड़कर एक जगह पड़ जाय तो मांसभक्षी जीव- जन्तु और कीड़े धीरे- धीरे उसे खा जाते हैं । फिर सब पुरुषार्थोंसे शून्य आप-जैसे मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ १८ ॥
य इमां कुण्डिकां भिन्द्यात् त्रिविष्टब्धं च यो हरेत् ।
वासश्चापि हरेत् तस्मिन् कथं ते मानसं भवेत् ॥ १ ९ ॥
' यदि आपकी कोई यह कुण्डी फोड़ दे, त्रिदण्ड उठा ले जाय और ये वस्त्र भी चुरा ले जाय तो उस समय आपके मनकी कैसी अवस्था होगी? ॥ १ ९ ॥
यस्त्वयं सर्वमुत्सृज्य धानामुष्टेरनुग्रहः ।
यदानेन समं सर्वं किमिदं ह्यवसीयसे ॥ २० ॥
‘ यदि सब कुछ छोड़कर भी आप मुट्ठीभर जौके लिये दूसरोंकी कृपा चाहते हैं तो राज्य आदि अन्य सब वस्तुएँ भी तो इसीके समान हैं। फिर उस राज्यके त्यागकी क्या विशेषता रही? ॥ २० ॥
धानामुष्टेरिहार्थश्चेत् प्रतिज्ञा ते विनश्यति ।
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का वाहं तव को मे त्वं कश्च ते मय्यनुग्रहः ॥ २१ ॥
' यदि यहाँ मुट्ठीभर जौकी आवश्यकता बनी ही रह गयी तो सब कुछ त्याग देनेकी जो आपने प्रतिज्ञा की थी, वह नष्ट हो गयी । ( सर्वत्यागी हो जानेपर ) मैं आपकी कौन हूँ और आप मेरे कौन हैं तथा आपका मुझपर अनुग्रह भी क्या है? ॥ २१ ॥
प्रशाधि पृथिवीं राजन् यदि तेऽनुग्रहो भवेत् ।
प्रासादं शयनं यानं वासांस्याभरणानि च ॥ २२ ॥
' राजन्! यदि आपका मुझपर अनुग्रह हो तो इस पृथ्वीका शासन कीजिये और राजमहल, शय्या, सवारी, वस्त्र तथा आभूषणोंको भी उपयोगमें लाइये ॥ २२ ॥
श्रिया विहीनैरधनैस्त्यक्तमित्रैरकिंचनैः ।
सौखिकैः सम्भृतानर्थान् यः संत्यजति किं नु तत् ॥ २३ ॥
' श्रीहीन, निर्धन, मित्रोंद्वारा त्यागे हुए, अकिंचन एवं सुखकी अभिलाषा रखनेवाले लोगोंकी भाँति सब प्रकारसे परिपूर्ण राजलक्ष्मीका जो परित्याग करता है उससे उसे क्या लाभ? ॥ २३ ॥
योऽत्यन्तं प्रतिगृह्णीयाद् यश्च दद्यात् सदैव हि ।
तयोस्त्वमन्तरं विद्धि श्रेयांस्ताभ्यां क उच्यते ॥ २४ ॥
'जो बराबर दूसरोंसे दान लेता (भिक्षा ग्रहण करता ) तथा जो निरन्तर स्वयं ही दान करता रहता है, उन दोनोंमें क्या अन्तर है और उनमेंसे किसको श्रेष्ठ कहा जाता है? यह आप समझिये ॥ २४ ॥
सदैव याचमानेषु तथा दम्भान्वितेषु च ।
एतेषु दक्षिणा दत्ता दावाग्नाविव दुर्हुतम् ॥ २५ ॥
'सदा ही याचना करनेवालेको और दम्भीको दी हुई दक्षिणा दावानलमें दी गयी आहुतिके समान व्यर्थ है ॥
जातवेदा यथा राजन् नादग्ध्वैवोपशाम्यति ।
सदैव याचमानो हि तथा शाम्यति न द्विजः ॥ २६ ॥
‘ राजन्! जैसे आग लकड़ीको जलाये बिना नहीं बुझती, उसी प्रकार सदा ही याचना करनेवाला ब्राह्मण ( याचनाका अन्त किये बिना ) कभी शान्त नहीं हो सकता ॥ २६ ॥
सतां वै ददतोऽन्नं च लोकेऽस्मिन् प्रकृतिर्ध्रुवा ।
न चेद् राजा भवेद् दाता कुतः स्युर्मोक्षकांक्षिणः ॥ २७ ॥
‘ इस संसारमें दाताका अन्न ही साधु पुरुषोंकी जीविकाका निश्चित आधार है । यदि दान करनेवाला राजा न हो तो मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले साधु- संन्यासी कैसे जी सकते हैं? ॥ २७ ॥
अन्नाद् गृहस्था लोकेऽस्मिन् भिक्षवस्तत एव च ।
अन्नात् प्राणः प्रभवति अन्नदः प्राणदो भवेत् ॥ २८ ॥
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' इस जगत्में अन्नसे गृहस्थ और गृहस्थोंसे भिक्षुओंका निर्वाह होता है । अन्नसे प्राणशक्ति प्रकट होती है; अतः अन्नदाता प्राणदाता होता है ॥ २८ ॥
गृहस्थेभ्योऽपि निर्मुक्ता गृहस्थानेव संश्रिताः ।
प्रभवं च प्रतिष्ठां च दान्ता विन्दन्त आसते ॥ २ ९ ॥
‘ जितेन्द्रिय संन्यासी गृहस्थ आश्रमसे अलग होकर भी गृहस्थोंके ही सहारे जीवन धारण करते हैं । वहींसे वह प्रकट होते हैं और वहीं उन्हें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥
त्यागान्न भिक्षुकं विद्यान्न मौढ्यान्न च याचनात् ।
ऋजुस्तु योऽर्थं त्यजति न सुखं विद्धि भिक्षुकम् ॥ ३० ॥
‘ केवल त्यागसे, मूढ़तासे और याचना करनेसे किसीको भिक्षु नहीं समझना चाहिये । जो सरलभावसे स्वार्थका त्याग करता है और सुखमें आसक्त नहीं होता उसे ही भिक्षु समझिये ॥ ३० ॥
असक्तः सक्तवद् गच्छन् निःसंगो मुक्तबन्धनः ।
समः शत्रौ च मित्रे च स वै मुक्तो महीपते ॥ ३१ ॥
‘ पृथ्वीनाथ! जो आसक्तिरहित होकर आसक्तकी भाँति विचरता है, जो संगरहित एवं सब प्रकारके बन्धनोंको तोड़ चुका है तथा शत्रु और मित्रमें जिसका समान भाव है, वह सदा मुक्त ही है ॥ ३१ ॥
परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।
सिता बहुविधैः पाशैः संचिन्वन्तो वृथामिषम् ॥ ३२ ॥
' बहुत -से मनुष्य दान लेने ( पेट पालने ) - के लिये मूड़ मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहन लेते हैं और घरसे निकल जाते हैं । वे नाना प्रकारके बन्धनोंमें बँधे होनेके कारण व्यर्थ भोगोंकी ही खोज करते रहते हैं * ॥३२ ॥
त्रयीं च नाम वार्तां च त्यक्त्वा पुत्रान् व्रजन्ति ये ।
त्रिविष्टब्धं च वासश्च प्रतिगृह्णन्त्यबुद्धयः ॥ ३३ ॥
'बहुत -से मूर्ख मनुष्य तीनों वेदोंके अध्ययन, इनमें बताये गये कर्म, कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य तथा अपने पुत्रोंका परित्याग करके चल देते हैं और त्रिदण्ड एवं भगवा वस्त्र धारण कर लेते हैं ॥ ३३ ॥
अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।
धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्यर्थमिति मे मितिः ॥ ३४ ॥
‘ यदि हृदयका कषाय ( राग आदि दोष ) दूर न हुआ हो तो काषाय ( गेरुआ ) वस्त्र धारण करना स्वार्थ - साधनकी चेष्टाके लिये ही समझना चाहिये । मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धर्मका ढोंग रखनेवाले मथमुंडोंके लिये यह जीविका चलानेका एक धंधामात्र है ॥ ३४ ॥
काषायैरजिनैश्चीरैर्नग्नान् मुण्डान् जटाधरान् ।
बिभ्रत् साधून् महाराज जय लोकान् जितेन्द्रियः ॥ ३५ ॥
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‘ महाराज! आप तो जितेन्द्रिय होकर नंगे रहनेवाले, मूड़ मुड़ाने और जटा रखानेवाले साधुओंका गेरुआ वस्त्र, मृगचर्म एवं वल्कल वस्त्रोंके द्वारा भरण-पोषण करते हुए पुण्यलोकोंपर विजय प्राप्त कीजिये ॥ ३५ ॥
अग्न्याधेयानि गुर्वर्थं क्रतूनपि सुदक्षिणान् ।
ददात्यहरहः पूर्वं को नु धर्मरतस्ततः ॥ ३६ ॥
‘ जो प्रतिदिन पहले गुरुके लिये अग्निहोत्रार्थ समिधा लाता है; फिर उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ एवं दान करता रहता है, उससे बढ़कर धर्मपरायण कौन होगा? ' ॥ ३६ ॥
अर्जुनउवाच
तत्त्वज्ञो जनको राजा लोकेऽस्मिन्निति गीयते ।
सोऽप्यासीन्मोहसम्पन्नो मा मोहवशमन्वगाः ॥ ३७ ॥
अर्जुन कहते हैं - महाराज! राजा जनकको इस जगत्में 'तत्त्वज्ञ' कहा जाता है; किंतु वे भी मोहमें पड़ गये थे । ( रानीके इस तरह समझानेपर राजाने संन्यासका विचार छोड़ दिया । अतः ) आप भी मोहके वशीभूत न होइये ॥ ३७ ॥
एवं धर्ममनुक्रान्ताः सदा दानतपःपराः ।
आनृशंस्यगुणोपेताः कामक्रोधविवर्जिताः ॥ ३८ ॥
प्रजानां पालने युक्ता दानमुत्तममास्थिताः ।
इष्टाँल्लोकानवाप्स्यामो गुरुवृद्धोपचायिनः ॥ ३ ९ ॥
यदि हमलोग सदा दान और तपस्यामें तत्पर हो इसी प्रकार धर्मका अनुसरण करेंगे, दया आदि गुणोंसे सम्पन्न रहेंगे, काम- क्रोध आदि दोषोंको त्याग देंगे, उत्तम दान - धर्मका आश्रय ले प्रजापालनमें लगे रहेंगे तथा गुरुजनों और वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करते रहेंगे तो हम अपने अभीष्ट लोक प्राप्त कर लेंगे ॥ ३८-३९ ॥
देवतातिथिभूतानां निर्वपन्तो यथाविधि ।
स्थानमिष्टमवाप्स्यामो ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ॥ ४० ॥
इसी प्रकार देवता, अतिथि और समस्त प्राणियोंको विधिपूर्वक उनका भाग अर्पण करते हुए यदि हम ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी बने रहेंगे तो हमें अभीष्ट स्थानकी प्राप्ति अवश्य होगी ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनका वाक्यविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
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