महाभारत — खण्ड ५
Mahabharata - 5 · Gita Press, Gorakhpur · 2450 पृष्ठ · 245 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 36 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( पञ्चम खण्ड ) 1 शान्तिपर्व [ सचित्र, सरल हिन्दी अनुवादसहित ] गीताप्रेसमारखपुरGITA PRESS, GORAKHPUR… 1–10
- १४ ९- बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति १५०- इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना १५१- ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत… 11–20
- ३५३- महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन ३५४- अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन ३५५- अतिथिद्वारा नागराज… 21–30
- था । ४०-४१ । कुन्त्या हि सदृशौ पादौ कर्णस्येति मतिर्मम । सादृश्यहेतुमन्विच्छन् पृथायास्तस्य चैव ह । ४२ । कारणं नाधिगच्छामि कथंचिदपि चिन्तयन्… 31–40
- कर्ण परशुरामजीके शापके भयसे डर गया । अतः उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा— ‘ भार्गव! आप यह जान लें कि मैं ब्राह्मण और क्षत्रियसे भिन्न सूतजातिमें… 41–50
- ' परंतु भगवान् सूर्य एवं मैं दोनों ही स्नेहके कारण दिखाकर अपने पक्षमें करने या तुमलोगोंसे एकता ( मेल) करानेमें सफल न हो सके । ७… 51–60
- गीताप्रेस, गोरखपुर शोकाकुल युधिष्ठिरकी देवर्षि नारदके द्वारा सान्त्वना गीताप्रेस गोरखपुर महाभारतकी समाप्तिपर महाराज युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें प्रवेश… 61–70
- नरेश्वर! धनसे धर्मका पालन, कामनाकी पूर्ति, स्वर्गकी प्राप्ति, हर्षकी वृद्धि, क्रोधकी सफलता, शास्त्रोंका श्रवण और अध्ययन तथा शत्रुओंका दमन- ये सभी कार्य… 71–80
- हन्तव्यास्त इति प्राज्ञाः क्षत्रधर्मविदो विदुः । ७ । क्षत्रिय- धर्मके ज्ञाता विद्वान् पुरुष यह जानते और बताते हैं कि अपना राज्य ग्रहण करते समय जो कोई भी… 81–90
- द्वादशोऽध्यायः नकुलका गृहस्थ - धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नकुलो वाक्यमब्रवीत्… 91–100
- नन्दयैतान् महाराज मत्तानिव महाद्विपान् । उपपन्नेन वाक्येन सततं दुःखभागिनः । ७ । महाराज! उन्मत्त गजराजोंके समान आपके ये बन्धु सदा आपके लिये दुःख उठाते आये… 101–110
- दण्डनीत्यां प्रणीतायां सर्वे सिद्धयन्त्युपक्रमाः । कौन्तेय सर्वभूतानां तत्र मे नास्ति संशयः । २ ९… 111–120
- सप्तदशोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा युधिष्ठिरउवाच असंतोषः प्रमादश्च मदो रागोऽप्रशान्तता… 121–130
- पर्वमें अध्याय १७ श्लोक १७ देखना चाहिये । एकोनविंशोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा अपने मतकी यथार्थताका प्रतिपादन युधिष्ठिरउवाच वेदाहं तात शास्त्राणि अपराणि पराणि… 131–140
- कुन्तीनन्दन! इस प्रकार सम्पूर्ण जीव उस -उस धर्मका उसी -उसी प्रकारसे जब ठीक-ठीक पालन करते हैं, तब स्वयं आत्मासे परमात्माका साक्षात्कार कर लेते हैं; अतः… 141–150
- तमब्रवीत् समागम्य स राजा धर्मवित्तमम् । किमागमनमाचक्ष्व भगवन् कृतमेव तत् । ३० । राजाने उन धर्मज्ञ मुनिसे मिलकर पूछा — ' भगवन्! आपका शुभागमन किस उद्देश्यसे… 151–160
- पञ्चविंशोऽध्यायः सेनजित्के उपदेशयुक्त उद्गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच द्वैपायनवचः श्रुत्वा कुपिते च धनंजये… 161–170
- दुष्यन्त्याददतो भृत्या नित्यं दस्युभयादिव । दुर्लभं च धनं प्राप्य भृशं दत्त्वानुतप्यते । २२ । ‘ अपना वेतन यथासमय पाते हुए भी जब भृत्योंको संतोष नहीं होता,… 171–180
- सभी प्राणियोंके लिये बैठना, सोना, चलना - फिरना, उठना और खाना - पीना - ये सभी कार्य समयके अनुसार ही नियत रूपसे होते रहते हैं । २१… 181–190
- यः स्पर्धयायजच्छक्रं देवराजं पुरंदरम् । शक्रप्रियैषी यं विद्वान् प्रत्याचष्ट बृहस्पतिः । २० । संवर्तो याजयामास यवीयान् स बृहस्पतेः… 191–200
- ‘ सृजय! नहुषपुत्र राजा ययाति भी जीवित न रह सके- यह हमने सुना है । उन्होंने समुद्रोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर शम्यापातके * द्वारा पृथ्वीको नाप - नापकर… 201–210
- वे दोनों तपस्वी पृथ्वीतलपर विचरते और मानवीय भोगोंका उपभोग करते हुए यहाँ यथावत्रूपसे परिभ्रमण करने लगे । ७ । प्रीतिमन्तौ मुदा युक्तौ समयं चैव चक्रतुः… 211–220
- तदनन्तर शोकसे पड़ित हो उसकी माताएँ रोती हुई उस स्थानकी ओर दौड़ीं, जहाँ राजा सृजय विलाप करते थे । ततः स राजा सस्मार मामेव गतमानसः… 221–230
- कर्मणा कालयुक्तेन तथेदं चेष्टते जगत् । २२ । जैसे लोहार या बढ़ईका बनाया हुआ यन्त्र सदा उसके चालकके अधीन रहता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालयुक्त कर्मकी… 231–240
- यदि ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष कृच्छ्रव्रतके अनुसार भोजन करे तो छः वर्षोंमें वह शुद्ध हो जाता है और एक- एक मासमें एक-एक कृच्छ्रव्रतका निर्वाह करते हुए… 241–250
- ‘ परंतु जो पुरुष अपनी जाति, आश्रम तथा कुलके धर्मोंका सर्वथा परित्याग कर देते हैं और जो लोग धर्ममात्रको छोड़ बैठते हैं उनके लिये कोई धर्म (प्रायश्चित्त )… 251–260
- राजन्! वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुए वे पाँचों भाई रथपर बैठकर मूर्तिमान् पाँच महाभूतोंके समान दिखायी देते थे । ३७… 261–270
- इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चार्वाकको प्राप्त वरदान आदिका वर्णनविषयक उनतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ । ३९… 271–280
- २. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव तथा समाश्रय – ये छः राजाके नीतिसम्बन्धी गुण हैं । त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति… 281–290
- रेशमी पीताम्बर धारण किये भगवान् सुवर्णजटित नीलमके समान जान पड़ते हैं । १३-१४ । कौस्तुभेनोरसिस्थेन मणिनाभिविराजितम् । उद्यतेवोदयं शैलं सूर्येणाभिविराजितम्… 291–300
- बृहस्पतिश्च शुक्रश्च च्यवनश्च महामुनिः । सनत्कुमारः कपिलो वाल्मीकिस्तुम्बुरुः कुरुः । ८ । मौद्गल्यो भार्गवो रामस्तृणबिन्दुर्महामुनिः… 301–310
- पाप और पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनर्जन्मके भयसे मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्षरूप परमेश्वरको नमस्कार है । ५६… 311–320
- युधिष्ठिराय प्रोवाच जामदग्न्यस्य विक्रमम् । ७ । रास्तेमें चलते- चलते ही महाबाहु भगवान् यादवनन्दन श्रीकृष्ण युधिष्ठिरको जमदग्निकुमार परशुरामजीका पराक्रम… 321–330
- राजन्! परावसुकी बात सुनकर भृगुवंशी परशुरामने पुनः शस्त्र उठा लिया । पहले उन्होंने जिन सैकड़ों क्षत्रियोंको छोड़ दिया था, वे ही बढ़कर महापराक्रमी भूपाल बन… 331–340
- विमुह्यमानस्य नरस्य शान्तये । ३८ । ‘ नरेन्द्र! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके हृदयमें जो शोक उमड़ आया है, उसे आप अपनी बुद्धिके द्वारा दूर कीजिये… 341–350
- इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिराद्यागमने द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः । ५२… 351–360
- स्वयं किमर्थं तु भवान् श्रेयो न प्राह पाण्डवम् । किं ते विवक्षितं चात्र तदाशु वद माधव । २४ । माधव! तो भी मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप स्वयं ही पाण्डुपुत्र… 361–370
- पुनर्नयविचारेण त्रयीसंवरणेन च । २० । कुरुनन्दन! तुम सभी कार्योंमें सरलता एवं कोमलताका अवलम्बन करना, परंतु नीतिशास्त्रकी आलोचनासे यह ज्ञात होता है कि अपने… 371–380
- वह सहायकोंको पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है । २८ । अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः । राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव । २ ९… 381–390
- पाल्यमानास्तथान्योन्यं नरा धर्मेण भारत । खेदं परमुपाजग्मुस्ततस्तान् मोह आविशत् । १५ । भारत! सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित और पोषित होते थे… 391–400
- महातपस्वी सुब्रह्मण्य भगवान् पुरन्दरने जब इसका अध्ययन किया, उस समय इसमें दस हजार अध्याय थे । फिर उन्होंने भी इसका संक्षेप किया, जिससे यह पाँच हजार… 401–410
- *• शत्रुपर चढ़ाई करनेके चार अवसर ये हैं – ( १ ) अपने मित्रोंकी वृद्धि । ( २ ) अपने कोशका भरपूर संग्रह । ( ३ ) शत्रुके मित्रोंका नाश… 411–420
- एकषष्टितमोऽध्यायः आश्रम- धर्मका वर्णन भीष्म उवाच आश्रमाणां महाबाहो शृणु सत्यपराक्रम । चतुर्णामपि नामानि कर्माणि च युधिष्ठिर । १… 421–430
- पालयित्वा प्रजाः सर्वा धर्मेण वदतां वर । राजसूयाश्वमेधादीन् मखानन्यांस्तथैव च । १७ । आनयित्वा यथापाठं विप्रेभ्यो दत्तदक्षिणः… 431–440
- पञ्चषष्टितमोऽध्यायः इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद इन्द्र उवाच एवंवीर्यः सर्वधर्मोपपन्नः क्षात्रः श्रेष्ठः सर्वधर्मेषु धर्मः… 441–450
- कुरुनन्दन! जिन प्राणियोंपर बलात्कार हुआ हो और वे शरणमें आये हों, उनका संकटसे उद्धार करनेवाला पुरुष गार्हस्थ्य - धर्मके पालनसे मिलनेवाले पुण्यफलका भागी… 451–460
- अष्टषष्टितमोऽध्यायः वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन युधिष्ठिर उवाच किमाहुर्दैवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ… 461–470
- एकोनसप्ततितमोऽध्यायः राजाके प्रधान कर्तव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका वर्णन युधिष्ठिरउवाच पार्थिवेन विशेषेण किं कार्यमवशिष्यते… 471–480
- जिन वस्तुओंको त्रिवर्गके अन्तर्गत बताया गया है, उनको भी यहाँ एकचित्त होकर सुनो । क्षय, स्थान और वृद्धि - ये ही त्रिवर्ग हैं तथा धर्म, अर्थ और काम — इनको… 481–490
- एकसप्ततितमोऽध्यायः धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन युधिष्ठिरउवाच कथं राजा प्रजा रक्षन्नाधिबन्धेन युज्यते… 491–500
- त्रिसप्ततितमोऽध्यायः विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान भीष्म उवाच राज्ञा… 501–510
- तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठजीने घोर तपस्या करके उन राक्षसोंका विनाश कर डाला और राजाके लिये विजय पानेका मार्ग प्राप्त कर लिया । ७… 511–520
- पाँचवें महापथिक ( दूर देशके यात्री या समुद्र –यात्रा करनेवाले ) ब्राह्मण चाण्डालके तुल्य माने जाते हैं । ६… 521–530
- भीष्मजीने कहा - तात युधिष्ठिर! ब्राह्मणको मांस, मदिरा, शहद, नमक, तिल, बनायी हुई रसोई, घोड़ा तथा बैल, गाय, बकरा, भेड़ और भैंस आदि पशु - इन वस्तुओंका विक्रय… 531–540
- अशीतितमोऽध्यायः राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच यदप्यल्पतरं कर्म… 541–550
- श्रीकृष्ण! अक्रूर और उग्रसेनके अधिकारमें गये हुए राज्यको भाई- बन्धुओंमें फूट पड़नेके भयसे अन्यकी तो कौन कहे इतने शक्तिशाली होकर स्वयं भी आप किसी तरह वापस… 551–560
- आँखोंसे देखिये । दूसरोंकी देख - भालपर विश्वास न कीजिये । ३४ । ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे । अभूतिकामा भूतानां तादृशैर्मेऽभिसंहितम् । ३५… 561–570
- जिसका संकल्प स्थिर नहीं है, वह बुद्धिमान्, शास्त्रज्ञ और उपायोंका जानकार होनेपर भी किसी कार्यको दीर्घकालमें भी पूरा नहीं कर सकता । २८… 571–580
- कार्ये खलु विपन्ने त्वां सोऽधर्मस्तांश्च पीडयेत् । १३ । राजन्! तुमको किसीका कोई गुप्त धन ग्रहण नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह तुम्हारे कर्तव्य– न्यायधर्मका… 581–590
- सप्ताशीतितमोऽध्यायः राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय युधिष्ठिर उवाच राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम्… 591–600
- जो राजा इन पापियोंको नियन्त्रणमें नहीं रखता, वह स्वयं भी पापाचारी माना जाता है तथा जो पापियोंका दमन करता है, वह प्रजाके किये हुए धर्मका चौथाई भाग स्वयं… 601–610
- असृजन् सुमहद् भूतमयं धर्मो भविष्यति । १४ । लोक और परलोक दोनोंको दृष्टिमें रखकर महर्षियोंने स्वयं ही राजा नामक एक महान् शक्तिशाली मनुष्यकी सृष्टि की… 611–620
- अस्मिन् लोके परे चैव राजा स प्राप्नुते फलम् । ४१ । जिसमें निग्रह' और अनुग्रह- दोनों प्रतिष्ठित हों, वह राजा इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल पाता है । ४१… 621–630
- यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा ज्ञानं तत् प्रतिपद्यते । आत्मनो'मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीयते । २८ । जो कल्याणकारी उपदेश सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़ उस ज्ञानको… 631–640
- युञ्जीरन्नप्यनडुहः क्षन्तव्यं वा तदा भवेत् । ६ । चोर आदि अपराधियोंका धन लाया गया हो तो उसे अपने पास न रखे ( सार्वजनिक कार्योंमें लगा दे ) और यदि गौ छीनकर… 641–650
- शत्रवो निर्जिताः सर्वे ये तवाहितकारिणः । संयमो वियमश्चैव सुयमश्च महाबलः । राक्षसा दुर्जया लोके त्रयस्ते युद्धदुर्मदाः… 651–660
- नवनवतितमोऽध्यायः शूरवीरोंको स्वर्ग और कायरोंको नरककी प्राप्तिके विषयमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्… 661–670
- जो लोग डरपोक हों, वे यहींसे लौट जायँ और जो लोग भयानक संग्राम करते हुए शत्रुपक्षके प्रधान वीरका वध कर सकें, वे ही यहाँ ठहरें । ३३… 671–680
- भरतनन्दन! युद्ध करके जो विजय प्राप्त होती है, उसे निकृष्ट ही माना गया है । युद्धसम्बन्धी विजय अचानक प्राप्त होती है या दैवेच्छासे; यह बात विचारणीय ही होती… 681–690
- न चापि भूयः प्रकृतेर्विचारणा । ४० । शत्रुके प्रति सामनीतिका प्रयोग अच्छा नहीं माना जाता, बल्कि गुप्तरूपसे दण्डनीतिका प्रयोग ही श्रेष्ठ समझा जाता है… 691–700
- देखो, उनकी दीनता और देख लो उनकी मूर्खता, जो इस अनित्य जीवनके लिये मोहवश धनमें ही दृष्टि गड़ाये रहते हैं । ४३ । संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते… 701–710
- U कालकवृक्षीय मुनि राजा जनकका राजकुमार क्षेमदर्शीके साथ मेल करा रहे हैं धर्मात्मनां क्वचिल्लोके नान्यास्ति गतिरीदृशी… 711–720
- ये माता- पिता और गुरुजन ही तीनों लोक हैं, यही तीनों आश्रम हैं, यही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नियाँ हैं । ६… 721–730
- * देखिये कर्णपर्व अध्याय ६ ९ श्लोक ३८ से ४५ तक । १. गंगाके तटपर किसी सर्पिणीने सहस्रों अण्डे देकर रख दिये थे… 731–740
- मृगराज! मुझे तो संतोषके सिवा और कोई वस्तु रुचती ही नहीं है । मैं सुख, भोग और उनके आधारभूत ऐश्वर्यको नहीं चाहता । २५… 741–750
- द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य युधिष्ठिरउवाच किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत्… 751–760
- परोक्षमें परनिन्दा करनेवाला मनुष्य सैकड़ों मनुष्योंको जो कुछ दान देता है और होम करता है, उन सब अपने कर्मोंको तत्काल नष्ट कर देता है… 761–770
- सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुनः कुत्ता हो जाना भीष्म उवाच व्याघ्रश्चोटजमूलस्थस्तृप्तः सुप्तो हतैर्मृगैः… 771–780
- एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सेवकोंको उनके योग्य स्थानपर नियुक्त करने, कुलीन और सत्पुरुषोंका संग्रह करने, कोष बढ़ाने तथा सबकी देखभाल करनेके लिये राजाको… 781–790
- धारणाशक्ति, चतुरता, संयम, बुद्धि, शरीर, धैर्य, शौर्य तथा देश- कालकी परिस्थितिसे असावधान न रहना —ये आठ गुण थोड़े या अधिक धनको बढ़ानेके मुख्य साधन हैं… 791–800
- है । ४० । ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्त्वं चित्तं प्रजापतिः । भूतात्मा जीव इत्येवं नामभिः प्रोच्यतेऽष्टभिः । ४१… 801–810
- जागर्ति निरृतिर्देवी ज्योतींषि निर्ऋतेरपि । ४६ । व्यवसायसे दण्ड लेकर तेज जगत्की रक्षा करता हुआ सजग रहता है… 811–820
- तब महाबुद्धिमान् इन्द्र हाथ जोड़कर बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हुए और उनसे बोले — ‘ भगवन्! मैं अपने कल्याणका उपाय जानना चाहता हूँ '… 821–830
- उधर वह वनमें विचरनेवाला मृग अकेला ही अनेकों नदों, नदियों, गड्ढों और जंगलोंको बारंबार लाँघता हुआ आगे - आगे भागता जा रहा था… 831–840
- कृशउवाच दुर्लभोऽप्यथवा नास्ति योऽर्थी धृतिमवाप्नुयात् । स दुर्लभतरस्तात योऽर्थिनं नावमन्यते । १३… 841–850
- चाहिये । ३१ । कोशं दण्डं बलं मित्रं यदन्यदपि संचितम् । न कुर्वीतान्तरं राष्ट्रे राजा परिगतः क्षुधा । ३२… 851–860
- त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन्दा भीष्म उवाच स्वराष्ट्रात् परराष्ट्राच्च… 861–870
- तदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा । २१ । जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिके लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी… 871–880
- उसीकी जड़मे सौ दरवाजोंका बिल बनाकर पलित नामक एक परम बुद्धिमान् चूहा निवास करता था । २१ । शाखां तस्य समाश्रित्य वसति स्म सुखं पुरा… 881–890
- यदा पश्यामि चाण्डालमायान्तं शस्त्रपाणिनम् । ततश्छेत्स्यामि ते पाशान् प्राप्ते साधारणे भये । ९ ७… 891–900
- ‘ समय कारणके स्वरूपको बदल देता है; और स्वार्थ उस समयका अनुसरण करता रहता है । विद्वान् पुरुष उस स्वार्थको समझता है और साधारण लोग विद्वान् पुरुषके ही पीछे… 901–910
- एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद युधिष्ठिर उवाच उक्तो मन्त्रो महाबाहो विश्वासो… 911–920
- यदि आप कालको ही प्रमाण मानते हैं तो शोकसे मूर्च्छित हुए प्राणी क्यों महान् प्रलाप एवं हाहाकार करते हैं? फिर कर्म करनेवालोंके लिये विधि -निषेधरूपी धर्मके… 921–930
- श्लक्ष्णपूर्वाभिभाषी च कामक्रोधौ विवर्जयेत् । १३ । ‘ राजा केवल बातचीतमें ही अत्यन्त विनयशील हो, हृदयको छूरेके समान तीखा बनाये रखे; पहले मुसकराकर मीठे वचन… 931–940
- एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः 'ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन निर्वाह करे ' इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद युधिष्ठिर उवाच हीने परमके… 941–950
- विश्वामित्र बोले- भूखे हुए महर्षि अगस्त्येने वातापि नामक असुरको खा लिया था । मैं तो क्षुधाके कारण भारी आपत्तिमें पड़ गया हूँ; अतः यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य… 951–960
- हैं । ११ । आजिजीविषवो विद्यां यशःकामौ समन्ततः । ते सर्वे नृप पापिष्ठा धर्मस्य परिपन्थिनः । १२… 961–970
- चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कबूतरद्वारा अपनी भार्याका गुणगान तथा पतिव्रता स्त्रीकी प्रशंसा भीष्म उवाच अथ वृक्षस्य शाखायां विहङ्गः ससुहृज्जनः… 971–980
- सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः बहेलियेका वैराग्य भीष्म उवाच ततः स लुब्धकः पश्यन् क्षुधयापि परिप्लुतः । कपोतमग्निपतितं वाक्यं पुनरुवाच ह । १… 981–990
- एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण… 991–1000
- यथा दिवं पूर्णवपुर्निशाकरः । ३ ९ । इससे राजा जनमेजयका सारा पाप नष्ट हो गया और वे प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान होने लगे… 1001–1010
- गृध्रवाक्यात् कथं पुत्रं त्यजध्वं पितृपिण्डदम् । ६५ । सियार बोला — बन्धुओ! देखो तो सही, इस बालकका रंग कैसा सोनेके समान चमक रहा है… 1011–1020
- उस वृक्षकी लंबाई चार सौ हाथकी थी । छाया बड़ी सघन थी । उसपर तोते और मैनाओंके समूह बसेरा लेते थे । वह वृक्ष फल और फूल दोनोंसे ही भरा था । ७… 1021–1030
- सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान्के साथ वैर न करनेका उपदेश भीष्म उवाच ततो निश्चित्य मनसा शाल्मलिः क्षुभितस्तदा… 1031–1040
- भीष्म उवाच राग द्वेषस्तथा मोहो हर्षः शोकोऽभिमानिता । कामः क्रोधश्च दर्पश्च तन्द्री चालस्यमेव च । ६ । इच्छा द्वेषस्तथा तापः परवृद्ध्युपतापिता… 1041–1050
- द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन युधिष्ठिर उवाच सत्यं धर्मं प्रशंसन्ति विप्रर्षिपितृदेवताः… 1051–1060
- भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके अनुसार यहाँ नृशंस मनुष्यका परिचय दिया गया है । विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह सदा उससे बचकर रहे । १३… 1061–1070
- निवारण कर सकता है । जो अग्निको भ्रष्ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्चित्त है । ५ ९ -६१ । त्यजत्यकारणे यश्च पितरं मातरं गुरुम्… 1071–1080
- अश्मभिश्चाभ्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः । ५४ । घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः क्षुरधारैरयोमयैः । कुछ लोग पत्थर बरसाने लगे, कुछ जलते लुआठे चलाने लगे, दूसरे… 1081–1090
- कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन संततम् । ३३ । कामनासे युक्त हुए दूसरे मनुष्य समुद्रमें भी घुस जाते हैं… 1091–1100
- हंसोंका शिकार करने लगा । वह हिंसामें बड़ा प्रवीण था । उसमें दया नहीं थी । वह सदा प्राणियोंको मारनेकी ही ताकमें लगा रहता था । ३६-३७… 1101–1110
- गच्छ सौम्य पथानेन कृतकृत्यो भविष्यसि । । १४ । इतस्त्रियोजनं गत्वा राक्षसाधिपतिर्महान् । विरूपाक्ष इति ख्यातः सखा मम महाबलः । १५… 1111–1120
- महाराज! उन निशाचरोंने राक्षसराजसे कहा — ' प्रभो! इस नराधमका मांस दस्युओंको दे दिया जाय, आप हमें इसका पाप खानेके लिये न दें ' इस प्रकार समस्त राक्षसोंने… 1121–1130
- लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः । ३० । न तो बुद्धि धनकी प्राप्तिमें कारण है, न मूर्खता निर्धनतामें, वास्तवमें संसारचक्रकी गतिका वृत्तान्त कोई… 1131–1140
- कोई दुर्बल हो या बलवान्, शूरवीर हो या डरपोक तथा मूर्ख हो या विद्वान्, मृत्यु उसकी समस्त कामनाओंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसे उठा ले जाती है । २२… 1141–1150
- करेगा? । २० । अहो नु मम बालिश्यं योऽहं क्रीडनकस्तव । किं नैवं जातु पुरुषः परेषां प्रेष्यतामियात् । २१… 1151–1160
- सारी प्रजा काम-क्रोध आदिके प्रवाहमें पड़कर बही जा रही है; परंतु आप उधरसे उदासीन -जैसे जान पड़ते हैं तथा धर्म, अर्थ एवं काम- सम्बन्धी कार्योंके प्रति भी… 1161–1170
- मनुष्ययोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानि सर्वशः । मनुष्यत्वे च विप्रत्वं सर्व एवाभिनन्दति । ८ । ' मुने! सभी प्राणी सब प्रकारसे मनुष्ययोनि पानेकी इच्छा रखते हैं… 1171–1180
- इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः । १८१ । इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें एक सौइक्यासीवाँ… 1181–1190
- तस्मिन् वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः । प्रादुरभूदूर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं नभः । १४ । ' वायु और जलके उस संघर्षसे अत्यन्त तेजोमय महाबली अग्निदेवका… 1191–1200
- अग्निके वेगसे बहता हुआ प्राण गुदाके निकट जाकर प्रतिहत हो जाता है; फिर ऊपरकी ओर लौटकर समीपवर्ती अग्निको भी ऊपर उठा देता है । १३… 1201–1210
- अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन भृगुरुवाच असृजद् ब्राह्मणानेव पूर्वं ब्रह्मा प्रजापतीन्… 1211–1220
- स्वर्गमें अत्यन्त सुखदायिनी हवा चलती है । मनोहर सुगन्ध छायी रहती है । भूख, प्यास, परिश्रम, बुढ़ापा और पापके फलका कष्ट वहाँ कभी नहीं भोगना पड़ता है… 1221–1230
- एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते । यस्त्वेतान् नाचरेद् विद्वांस्तपस्तस्य प्रवर्धते । १८ । कपट, शठता, चोरी, निन्दा, दूसरोंके दोष देखना, दूसरोंको हानि… 1231–1240
- इन्द्रियाँ विषयोंको ग्रहण कराती हैं । मन संकल्प- विकल्प करता है । बुद्धि निश्चय करानेवाली है और क्षेत्रज्ञ ( आत्मा) साक्षीकी भाँति स्थित रहता है । १३… 1241–1250
- ध्यानयोगको जाननेवाला साधक ऐसे विक्षेपके समय खेद या क्लेशका अनुभव न करे; अपितु आलस्य और मात्सर्यका त्याग करके ध्यानके द्वारा मनको पुनः एकाग्र करनेका… 1251–1260
- तात! वरुण, कुबेर, इन्द्र और यमराज–इन चारों लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु तथा अन्य देवताओंके जो… 1261–1270
- वाग्वज्रा ब्राह्मणाः प्रोक्ताः क्षत्रिया बाहुजीविनः । वाग्युद्धं तदिदं तीव्रं मम विप्र त्वया सह । ४६… 1271–1280
- यदि मैं आज ब्राह्मणकी दी हुई वस्तु ग्रहण न करूँ तो किस प्रकार महान् पापसे निर्लिप्त रह सकूँगा । १०७ । तौ चोवाच स राजर्षिः कृतकार्यौ गमिष्यथः… 1281–1290
- विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुयात् । साधये गम्यतां चैव यथास्थानानि सिद्धये । ३१ । ब्रह्माजीने कहा- देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ… 1291–1300
- द्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय मनुरुवाच अक्षरात् खं ततो वायुस्ततो ज्योतिस्ततो… 1301–1310
- तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः फलैर्युज्यति कर्मणः । २३ । जैसे अमावास्याका अतिक्रमण करनेपर चन्द्रमा नक्षत्रोंसे संयुक्त होता है, उसी प्रकार जीवात्मा एक शरीरका त्याग… 1311–1320
- फिर कर्म सम्पन्न होता और उसका फल मिलता है । ६ । फलं कर्मात्मकं विद्यात् कर्म ज्ञेयात्मकं तथा । ज्ञेयं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम् । ७… 1321–1330
- भरतश्रेष्ठ! पहलेके लोगोमें मैथुनधर्मकी प्रवृत्ति नहीं हुई थी । इन सबको संकल्पसे ही संतान पैदा होती थी । ३८ । ततस्त्रेतायुगे काले संस्पर्शाज्जायते प्रजा… 1331–1340
- नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा… 1341–1350
- योगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है । सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पञ्चयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है… 1351–1360
- और आप भी कहाँसे आये हैं? यह भलीभाँति समझाकर बताइये । इसके सिवा जो परम तत्त्व है, उसका भी विवेचन कीजिये । ५ । कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम… 1361–1370
- जैसे लोहयुक्त सुवर्ण आगमें पकाकर शुद्ध किये बिना अपने स्वरूपसे प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार चित्तके राग आदि दोषोंका नाश हुए बिना उसमें ज्ञानस्वरूप आत्मा… 1371–1380
- परं तत् सर्वधर्मेभ्यस्तेन यान्ति परां गतिम् । ७ । यह जो ब्रह्मचर्य नामक गुण है, इसे तो शास्त्रोंमें ब्रह्मका स्वरूप ही बताया गया है… 1381–1390
- वर्णन करते हैं, उनका वह वर्णन युक्तिसंगत भी है । ५ । इन्द्रियाणां श्रमात् स्वप्नमाहुः सर्वगतं बुधाः मनसस्त्वप्रलीनत्वात् तत् तदाहुर्निदर्शनम् । ६… 1391–1400
- अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन… 1401–1410
- नरपतिरभिवीक्ष्य विस्मितः पुनरनुयोक्तुमिदं प्रचक्रमे । ४ ९ । पंचशिखका यह उपदेश जो भ्रम और वंचनासे रहित, सर्वथा निर्दोष तथा आत्माका साक्षात्कार करानेवाला… 1411–1420
- महाप्राज्ञ जनक अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता होनेके कारण निष्कामभावसे यज्ञ, दान, होम और पृथ्वीका पालन करते हुए भी उस अध्यात्मज्ञानमें ही तन्मय रहते थे… 1421–1430
- नामगोत्रसमायुक्तमात्मानं मन्यसे यदि । तन्मिथ्या गोत्रसद्भावे वर्तते देहबन्धनम् । यह सुनकर श्वेतकेतुने उससे कहा- ' भामिनि! वह तो कुछ कहेगा नहीं… 1431–1440
- जितेन्द्रिय पुरुष किसीके साथ वैर नहीं करता । उसका सबके साथ अच्छा बर्ताव होता है । वह निन्दा और स्तुतिमें समान भाव रखनेवाला, सदाचारी, शीलवान्,… 1441–1450
- यक्ष्यामहे विश्वरूपं कुमार । ( भीष्मजी कहते हैं - ) तब उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर परम निर्मल ज्ञाननिधि द्विजश्रेष्ठ महामुनि सनत्कुमारसे कहा –' कुमार!… 1451–1460
- तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् । ७ । ‘ वही यथासमय आलस्य छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाशित होता, वही अस्त होता और वही वर्षा करता था… 1461–1470
- यत् त्वमेवंगतो वज्रिन् यच्चाप्येवंगता वयम् । ३५ । वज्रधारी इन्द्र! आज तो तुम इस तरह समृद्धिशाली हो गये हो और हमलोग जो ऐसी अवस्थामें पहुँच गये हैं, यह न तो… 1471–1480
- जगाम दक्षिणामाशामुदीचीं तु पुरंदरः । ३७ । भीष्मजी कहते हैं - भारत! इन्द्रके ऐसा कहनेपर दैत्यराज बलि दक्षिणदिशाको चले गये और स्वयं इन्द्र उत्तरदिशाको । ३७… 1481–1490
- मावमंस्था मया कर्म दुष्कृतं कृतमित्युत । २७ । आज जैसे तुम हो, कभी मैं भी ऐसा ही था और इस समय जिस दशामें हमलोग पड़े हुए हैं, कभी तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था… 1491–1500
- नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च । १०० । जीवितं जीवलोकस्य कालेनागम्य नीयते । ‘ धन और भोग नष्ट हो जाते हैं… 1501–1510
- भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः । ३२ । उनमें श्रद्धा थी । वे क्रोधको जीत चुके थे । वे दानी थे… 1511–1520
- एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः जैगीषव्यका असित देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश युधिष्ठिर उवाच किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपराक्रमः… 1521–1530
- ( अब कालका विभाग इस प्रकार समझना चाहिये ) पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला गिननी चाहिये । तीस कलाका एक मुहूर्त होता है… 1531–1540
- कलियुग आनेपर तो कहीं वेदोंका दर्शन होता है और कहीं नहीं होता है । उस समय केवल अधर्मसे पीड़ित होकर यज्ञ और वेद लुप्त हो जाते हैं । ३६… 1541–1550
- राजा मित्रसहने महात्मा वसिष्ठको अपनी प्यारी रानी मदयन्ती देकर उसके साथ ही स्वर्गलोकमें पदार्पण किया था । ३० । सहस्रजिच्च राजर्षिः प्राणानिष्टान् महायशाः… 1551–1560
- जलरूपमिवाकाशे तथैवात्मनि पश्यति । अपां व्यतिक्रमे चास्य वह्निरूपं प्रकाशते । १ ९ । वह सम्पूर्ण आकाशमें जल-ही-जल-सा देखता है तथा आत्माको भी जलरूप अनुभव… 1561–1570
- अष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व व्यास उवाच एषा पूर्वतरा… 1571–1580
- चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः योगसे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन व्यास उवाच पृच्छतस्तव सत्पुत्र यथावदिह तत्त्वतः… 1581–1590
- द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य आश्रमका वर्णन शुक उवाच क्षरात्प्रभृति यः सर्गः सगुणानीन्द्रियाणि च… 1591–1600
- चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन भीष्म उवाच प्रोक्ता गृहस्थवृत्तिस्ते विहिता या मनीषिभिः… 1601–1610
- चाहिये । २५ । दानं हि भूताभयदक्षिणायाः सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह । तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति सोऽऽनन्त्यमाप्नोत्यभयं प्रजाभ्यः । २६… 1611–1620
- मन, बुद्धि और स्वभाव ( अहंभाव) -ये तीनों अपने कारणभूत पूर्वसंस्कारोंसे उत्पन्न हुए हैं । ये तीनों पाञ्चभौतिक होते हुए भी भूतोंके अन्य कार्य जो श्रोत्रादि… 1621–1630
- पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार -नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति शुक उवाच यस्माद् धर्मात् परो धर्मो विद्यते नेह… 1631–1640
- इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । २५२… 1641–1650
- षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके… 1651–1660
- लोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं ही अपने मनमें बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराते हुए समस्त लोकोंकी ओर देखने लगे । निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते… 1661–1670
- षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना युधिष्ठिरउवाच सूक्ष्मं साधु समादिष्टं भवता धर्मलक्षणम्… 1671–1680
- कभी - कभी वे विहंगम उड़कर पाँच- पाँच दिनतक बाहर ही रह जाते और छठे दिन वहाँ लौटते थे, तबतक भी जाजलि मुनि हिले - डुले नहीं । ३५… 1681–1690
- श्रुतिमें गौओंको अघ्न्या ( अवध्य ) कहा गया है, फिर कौन उन्हें मारनेका विचार करेगा? जो पुरुष गाय और बैलोंको मारता है, वह महान् पाप करता है । ४७… 1691–1700
- चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जाजलिको पक्षियोंका उपदेश तुलाधारउवाच सद्भिर्वा यदि वासद्भि पन्थानमिममास्थितम्… 1701–1710
- पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः । पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः । २१ । ‘ इसलिये पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे बड़ी… 1711–1720
- इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चिरकारिकोपाख्याने षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः । २६६… 1721–1730
- गच्छत्येव परित्यागी वानप्रस्थश्च गच्छति । गृहस्थो ब्रह्मचारी च उभौ तावपि गच्छतः । १३ । संन्यासी परमपदको प्राप्त कर सकता है, वानप्रस्थ भी वहीं जा सकता है… 1731–1740
- अनुत्तरीयवसनमनुपस्तीर्णशायिनम् । बाहूपधानं शाम्यन्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः । ३० । जिसके पास वस्त्रके नामपर एक लंगोटी मात्र है, ओढ़नेके लिये एक चादरतक… 1741–1750
- वे अपने - अपने कर्मोंसे ही परिपुष्ट थे । उनकी तपस्या घोर रूप धारण कर चुकी थी । वे आश्चर्यजनक सदाचारका पालन करते थे और उसका उन्हें पुरातन, शाश्वत एवं… 1751–1760
- अभ्यासमकरोद् धर्मे ततस्तुष्टास्तु देवताः । २८ । भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! मणिभद्रके ऐसा कहनेपर भी महायशस्वी कुण्डधारने बार- बार अपनी वही बात दुहरायी… 1761–1770
- लोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च । न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च । ६ । लोभ और मोहसे घिरे हुए तथा राग- द्वेषके वशीभूत हुए मनुष्यकी बुद्धि… 1771–1780
- तेषामष्टादशो देही यः शरीरे स शाश्वतः । २८ । अथवा सशरीरास्ते गुणाः सर्वे शरीरिणाम् । संश्रितास्तद् वियोगे हि सशरीरा न सन्ति ते । २ ९… 1781–1790
- अमृत और मृत्यु — ये दोनों इस शरीरमें ही विद्यमान हैं । मोहसे मृत्यु प्राप्त होती है और सत्यसे अमृतपदकी उपलब्धि होती है । २ ९ ३… 1791–1800
- अजेयः सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभीः । २६ । मेरे शरीरसे आगकी लपटें निकलती थीं और मैं ज्वालामालाओंसे घिरकर सदा आकाशमें निर्भय विचरता हुआ समस्त प्राणियोंके… 1801–1810
- स चैव तस्मिन् निवसत्यनीशो युगक्षये तपसा संवृतात्मा । ३८ । 'तदनन्तर वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षोंतक ) नरकमें विचरण करके फिर धूम्रवर्ण पाता है ( पशु -… 1811–1820
- भीष्म उवाच रथेनेन्द्रः प्रयातो वै सार्धं देवगणैः पुरा । ददर्शाथाग्रतो वृत्रं धिष्ठितं पर्वतोपमम् । ७… 1821–1830
- स्थापना वै सुमहती त्वया देव प्रवर्तिता । २६ । आपने सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये यह धर्मकी मर्यादा बाँधी है… 1831–1840
- भगवन् क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः । ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम् । २३ । ‘ भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जा रहे हैं? तत्त्वज्ञ… 1841–1850
- दक्ष उवाच एतन्मखेशाय सुवर्णपात्रे हविः समस्तं विधिमन्त्रपूतम् । विष्णोर्नयाम्यप्रतिमस्य भागं प्रभुर्विभुश्चाहवनीय एषः । २२… 1851–1860
- त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नमः । ७८ । आप तीन जटा और तीन मस्तक धारण करनेवाले हैं । आपके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल शोभा पाता है… 1861–1870
- स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः । गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकस्तारकामयः । १४४ । स्वाहा, स्वधा, वषट्- नमस्कार और नमो नमः आदि पद आपके ही नाम हैं… 1871–1880
- जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके शरीर आकाश आदि पाँच महाभूतोंसे उत्पन्न होते और फिर उन्हींमें लीन हो जाते… 1881–1890
- हैं । १६ । प्रियं हि हर्षजननं हर्ष उत्सेकवर्धनः । उत्सेको नरकायैव तस्मात् तान् संत्यजाम्यहम् । १७ । प्रिय वस्तु हर्षजनक होती है… 1891–1900
- अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अरिष्टनेमिका राजा सगरको वैराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश युधिष्ठिर उवाच कथं नु युक्तः पृथिवीं चरेदस्मद्विधो नृपः… 1901–1910
- भीष्म उवाच पुरा सोऽन्तर्जलगतः स्थाणुभूतो महाव्रतः । वर्षाणामभवद् राजन् प्रयुतान्यर्बुदानि च । २२… 1911–1920
- पापकर्मको अहिंसाका व्रत भी दूर नहीं कर सकता । ऐसा वेदशास्त्रोंके ज्ञाता, वेदका उपदेश देनेवाले ब्राह्मणोंका कथन है । १२-१३… 1921–1930
- चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराशरगीता - ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके… 1931–1940
- जब उत्तम कुलमें उत्पन्न, सम्मानित तथा शास्त्रके अर्थको जाननेवाले पुरुषोंका और असमर्थताके कारण कर्म - धर्मसे रहित एवं आत्मतत्त्वसे अनभिज्ञ मनुष्योंका भी… 1941–1950
- जो लोग देहको पाकर हठपूर्वक उसका परित्याग कर देते हैं, उनको पूर्ववत् ही यातनामय शरीरकी प्राप्ति होती है… 1951–1960
- शयानं यान्तमासीनं प्रवृत्तं विषयेषु च । शुभाशुभानि कर्माणि प्रपद्यन्ते नरं सदा । ३१ । मनुष्य सोता हो, बैठा हो, चलता हो या विषय - भोगमें लगा हो, उसके… 1961–1970
- क्रोधी मनुष्य' जो यज्ञ करता है, दान देता है, तप करता है अथवा जो हवन करता है, उसके उन सब कर्मोंके फलको यमराज हर लेते हैं… 1971–1980
- भीष्मजीने कहा- भारत! जो धानकी खुद्दी और तिलकी खली खाता तथा घी-तेलका परित्याग कर देता है, उसी योगीको योगबलकी प्राप्ति होती है । ४३… 1981–1990
- सत्पुरुष क्षमासे क्रोधका, संकल्पके त्यागसे कामका, सत्त्वगुणके सेवनसे निद्राका, प्रमादके त्यागसे भयका तथा अल्पाहारके सेवनद्वारा पाँचवें श्वास- दोषका नाश… 1991–2000
- द्वयधिकत्रिशततमोऽध्यायः वसिष्ठ और करालजनकका संवाद -क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति युधिष्ठिरउवाच किं तदक्षरमित्युक्तं यस्मान्नावर्तते… 2001–2010
- इसी प्रकार वह जलोदर, तृषारोग, ज्वर, गलगण्ड ( गलसूआ ), विषूचिका ( हैजा ), सफेद कोढ़, अग्निदाह, सिध्मा ( सफेद दाग या सेहुँवा ), अपस्मार ( मृगी ) आदि रोगोंका… 2011–2020
- वेदशास्त्रद्वयं चैव प्रमाणं तत् सनातनम् । ७ । वेदोंमें जो प्रमाण बताया गया है तथा शास्त्रमें कहे हुए जिस प्रमाणको पढ़ा और सुना जाता है, वह सब ठीक है;… 2021–2030
- एकत्वं च बहुत्वं च प्रकृतेरर्थतत्त्ववान् । एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्तनात् । ३५ । अर्थतत्त्वके ज्ञाता पुरुषको यह जानना चाहिये कि प्रलयकालमें… 2031–2040
- अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः क्षर - अक्षर और परमात्म - तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी… 2041–2050
- धर्म ही सत्पुरुषोंका कल्याण करनेवाला और धर्म ही उनका आश्रय है । तात! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक धर्मसे ही उत्पन्न हुए हैं । ६… 2051–2060
- ते वध्यमाना ह्यन्योन्यं गुणैर्हारिभिरव्ययैः । १४ । पृथ्वीनाथ! प्रवाहरूपसे सदा विद्यमान रहनेवाले इन मनोहर शब्द आदि विषयोंसे आविष्ट होकर सभी प्राणी प्रतिदिन… 2061–2070
- सत्त्वगुणके साथ रजोगुण, रजोगुणके साथ तमोगुण, तमोगुणके साथ सत्त्वगुण तथा सत्त्वगुणके साथ अव्यक्त ( जीवात्मा ) का सम्मिश्रण देखा जाता है ( यह दो तत्त्वोंका… 2071–2080
- सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्रमणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय याज्ञवल्क्य उवाच… 2081–2090
- गन्धर्वपते! आपने जो विश्वा और अविश्व इत्यादि कहकर यह प्रश्नावली उपस्थित की है, उसमें विश्वा अव्यक्त प्रकृतिका नाम है… 2091–2100
- करके वे धर्म - अधर्म, पुण्य- पाप, सत्य- असत्य तथा जन्म और मृत्युको व्यक्त ( बुद्धि आदि ) और अव्यक्त ( प्रकृति ) का कार्य मानकर सबको प्राकृत (प्रकृतिजन्य… 2101–2110
- श्रावितस्त्रिविधं मोक्षं न च राज्याद्धि चालितः । २७ । वे सांख्यशास्त्रके प्रमुख विद्वान् हैं और सारा सिद्धान्त उन्हें यथावत् रूपसे प्रत्यक्षकी भाँति ठीक-… 2111–2120
- यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदबिन्दवः । संश्लिष्टानि तथा राजन् प्राणिनामिह सम्भवः । ९ ७ । राजन्! जैसे काठके साथ लाह और धूलके साथ पानीकी बूंदें मिलकर एक हो… 2121–2130
- मैं समझती हूँ कि आपने पंचशिखाचार्यसे शास्त्रका श्रवण करके भी श्रवण नहीं किया है अथवा उनसे यदि कोई शास्त्र सुना है तो उसे सुनकर भी मिथ्या कर दिया है; या यह… 2131–2140
- बलगृध्रकुलपक्षिणां च संघाः । नरकदने रुधिरपा गुरुवचन- नुदमुपरतं विशसन्ति । २ ९ । परंतु जो गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करते हैं, उनके मरणके पश्चात् नरकमें… 2141–2150
- सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । स्वकर्मनिष्ठाफलसाक्षिकेण भूतानि कालः पचति प्रसह्य । ९ २ । यह कालरूपी रसोइया बलपूर्वक सब जीवोंको पका रहा है… 2151–2160
- चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन - संस्कारका वृत्तान्त भीष्म उवाच स लब्ध्वा परमं देवाद् वरं… 2161–2170
- ततो मुहूर्तादुत्थाय कृत्वा शौचमनन्तरम् । ४३ । स्त्रीभिः परिवृतो धीमान् ध्यानमेवान्वपद्यत । ४४… 2171–2180
- परमात्मभावको नहीं प्राप्त होता है । ४७ । नास्ति ते सुखदुःखेषु विशेषो नासि लोलुपः । नौत्सुक्यं नृत्यगीतेषु न राग उपजायते । ४८… 2181–2190
- ' शिष्यो! यदि तुम्हें यही अच्छा लगता है तो तुम पृथ्वीपर या देवलोकमें जहाँ चाहो जा सकते हो; परंतु प्रमाद न करना; क्योंकि वेदमें बहुत सी प्ररोचनात्मक… 2191–2200
- उस समय नारदजीने प्रसन्न होकर कहा -' वत्स! तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हो । बताओ, तुम्हें किस श्रेष्ठ वस्तुकी प्राप्ति कराऊँ? ' यह बात उन्होंने बड़े हर्षके… 2201–2210
- अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः । आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः । १४ । रूप, यौवन, जीवन, धन - संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोंका सहवास– ये… 2211–2220
- अब मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ मेरे आत्माको शान्ति मिलेगी तथा जहाँ मैं अक्षय, अविनाशी और सनातनरूपसे स्थित रहूँगा । ५१… 2221–2230
- आसीत् किल महाराज शुकाभिपतने तदा । महाराज! देवता, गन्धर्व, ऋषि, यक्ष, राक्षस और विद्याधरोंने उनका पूजन किया… 2231–2240
- ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, कर्दम, क्रोध, और विक्रीत —… 2241–2250
- ‘ उस राजाके दिवंगत होनेके बाद यह सनातन शास्त्र सर्वसाधारणकी दृष्टिसे लुप्त हो जायगा । इसके सम्बन्धमें सारी बातें मैंने तुमलोगोंको बता दीं ' । ५१… 2251–2260
- सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं- इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और… 2261–2270
- १४२ - लक्ष्मीनिवास, १४३ - विद्याके आश्रय, १४४ - कीर्तिके आधार, १४५ - सम्पत्तिके आश्रय, १४६ -सर्वावास ( सबके निवासस्थान), १४७ - वासुदेव, १४८- सर्वच्छन्दक (… 2271–2280
- एषोऽहं व्यक्तिमागत्य तिष्ठामि दिवि शाश्वतः । ततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत् पुनः । ७० । ‘ इस समय मैं सनातन परमात्मा ही व्यक्तरूप धारण करके आकाशमें स्थित… 2281–2290
- राजन्! तुम्हें भी सदा ही भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वे ही सम्पूर्ण जगत्के माता, पिता और गुरु हैं । १३१३… 2291–2300
- ऋषि कहते हैं कि ' भगवान् नारायण सूर्यके समान तेजस्वी, अन्तर्यामी पुरुष, अज्ञानान्धकारसे परे, सर्वव्यापी, सर्वगामी, ईश्वर, वरदाता और सर्वसमर्थ हैं ' । ५७… 2301–2310
- न ह्यन्यो वर्ण येन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो । ७ । अर्जुन बोले- भूत, वर्तमान और भविष्य- तीनों कालोंके स्वामी, सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा, अविनाशी,… 2311–2320
- ब्राह्मणानां मतिर्वाक्यं कर्म श्रद्धां तपांसि च । धारयन्ति महीं द्यां च शैक्यो वागमृतं तथा । १७… 2321–2330
- श्याम रेखासे आच्छन्न-सा दिखायी देता है । उसके शरीरमें खरगोशका- सा चिह्न मेघके समान श्यामवर्णका है । वह स्पष्टरूपसे प्रतीत होता है । ५८… 2331–2340
- ' धर्मकुलमें उत्पन्न हुए ये दोनों महाव्रती देवश्रेष्ठ नर और नारायण महान् तपस्यासे युक्त हैं । १२७ । अहं प्रसादजस्तस्य कुतश्चित् कारणान्तरे… 2341–2350
- तत्र ये पुरुषाः श्वेताः पञ्चेन्द्रियविवर्जिताः । प्रतिबुद्धाश्च ते सर्वे भक्ताश्च पुरुषोत्तमम् । ५३… 2351–2360
- 3 - यद्यपि नारदजी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं तथापि दक्षके शापवश उन्हें पुनः प्रजापतिसे जन्म ग्रहण करना पड़ा यह कथा हरिवंशमें आयी है… 2361–2370
- नृपश्रेष्ठ! ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ… 2371–2380
- केनैष धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा । ६ । एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो । एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे । ७… 2381–2390
- राजन्! जैसे सारे जल - प्रवाह समुद्रसे ही प्रसारको प्राप्त होते हैं और फिर उस समुद्रमें ही आकर मिल जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञानरूपी जलके महान् प्रवाह… 2391–2400
- सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै । ६४ । राजर्षे! सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत- शास्त्र -… 2401–2410
- द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम युधिष्ठिरउवाच धर्माः पितामहेनोक्ता मोक्षधर्माश्रिताः… 2411–2420
- विद्वन्! आप मुझे जैसी सलाह दे रहे हैं, अवश्य ऐसा ही करूँगा । साधो! वे भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जा रहे हैं… 2421–2430
- षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना नागउवाच अथ ब्राह्मणरूपेण… 2431–2440
- अनिर्देश्येन रूपेण द्वितीय इव भास्करः । १४ । घीकी आहुति डालनेसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान वह अपनी तेजोमयी किरणोंसे समस्त ज्योति- र्मण्डलको व्याप्त करके… 2441–2450