05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1301–1310
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1301–1310
पृष्ठ 1301
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः आत्मतत्त्वका और बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थोंका विवेचन तथा उसके साक्षात्कारका उपाय मनुरुवाच
अक्षरात् खं ततो वायुस्ततो ज्योतिस्ततो जलम् ।
जलात् प्रसूता जगती जगत्यां जायते जगत् ॥ १ ॥
मनु कहते हैं - बृहस्पते! अविनाशी परमात्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे यह पृथ्वी उत्पन्न हुई है । इस पृथ्वीमें ही सम्पूर्ण पार्थिव जगत्की उत्पत्ति होती है ॥ १ ॥
एतैः शरीरैर्जलमेव गत्वा जलाच्च तेजः पवनोऽन्तरिक्षम् । खाद् वै निवर्तन्ति न भाविनस्ते मोक्षं च ते वै परमाप्नुवन्ति ॥ २ ॥
इन पूर्वोक्त शरीरोंके साथ ( पार्थिव शरीरके बाद) प्राणियोंका जलमें लय होता है; फिर वे जलसे अग्निमें, अग्निसे वायुमें और वायुसे आकाशमें लीन होते हैं । आकाशसे सृष्टिकालमें फिर वे पूर्वोक्त क्रमसे उत्पन्न होते हैं; परंतु जो ज्ञानी हैं, वे मोक्षस्वरूप
परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं । उनका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता ॥ २ ॥
ष्णं न शीतं मृदु नापि तीक्ष्णं नाम्लं कषायं मधुरं न तिक्तम् । न शब्दवन्नापि च गन्धवत्त- न्न रूपवत्तत् परमस्वभावम् ॥ ३ ॥
वह परमात्मतत्त्व न गर्म है न शीतल, न कोमल है न तीक्ष्ण, न खट्टा है न कसैला, न मीठा है न तीता । शब्द, गन्ध और रूपसे भी वह रहित है । उसका स्वरूप सबसे उत्कृष्ट एवं विलक्षण है ॥ ३ ॥
स्पर्शं तनुर्वेद रसं च जिह्वा घ्राणं च गन्धान् श्रवणौ च शब्दान् । रूपाणि चक्षुर्न च तत्परं यद् गृह्णन्त्यनध्यात्मविदो मनुष्याः ॥ ४ ॥
त्वचा स्पर्शका, जिह्वा रसका, घ्राणेन्द्रिय गन्धका, कान शब्दका और नेत्र रूपका ही अनुभव करते हैं । ये इन्द्रियाँ परमात्माको प्रत्यक्ष नहीं कर सकतीं । अध्यात्मज्ञानसे हीन
पृष्ठ 1302
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मनुष्य परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं कर सकते ॥ ४ ॥
निवर्तयित्वा रसनां रसेभ्यो
घ्राणं च गन्धाच्छ्रवणौ च शब्दात् ।
स्पर्शात् त्वचं रूपगुणात् तु चक्षु- स्ततः परं पश्यति स्वं स्वभावम् ॥ ५ ॥
अतः जो जिह्वाको रससे, नासिकाको गन्धसे, कानोंको शब्दसे, त्वचाको स्पर्शसे और नेत्रोंको रूपसे हटाकर अन्तर्मुखी बना लेता है, वही अपने मूलस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार कर सकता है ॥ ५ ॥
यतो गृहीत्वा हि करोति यच्च यस्मिंश्च तामारभते प्रवृत्तिम् । यस्मिंश्च यद् येन च यश्च कर्ता यत् कारणं ते समुदायमाहुः ॥ ६ ॥
महर्षिगण कहते हैं जो कर्ता जिस कारणसे, जिस फलके उद्देश्यसे, जिस देश या कालमें, जिस प्रिय या अप्रियके निमित्त, जिस राग या द्वेषसे प्रभावित हो प्रवृत्तिमार्गका आश्रय ले जिस कर्मको करता है, इन सबके समुदायका जो कारण है, वही सबका स्वरूपभूत परब्रह्म परमात्मा है ॥ ६ ॥
यद् व्याप्यभूद् व्यापकं साधकं च यन्मन्त्रवत् स्थास्यति चापि लोके । यः सर्वहेतुः परमात्मकारी तत् कारणं कार्यमतो यदन्यत् ॥ ७ ॥
श्रुतिके कथनानुसार जो व्यापक, व्याप्य और उनका साधन है, जो सम्पूर्ण लोकमें सदा ही स्थित रहनेवाला कूटस्थ, सबका कारण और स्वयं ही सब कुछ करनेवाला है, वही परम कारण है । उसके सिवा जो कुछ है, सब कार्यमात्र है ॥ ७ ॥
यथा हि कश्चित् सुकृतैर्मनुष्यः शुभाशुभं प्राप्नुतेऽथाविरोधात् । एवं शरीरेषु शुभाशुभेषु स्वकर्मजैर्ज्ञानमिदं निबद्धम् ॥ ८ ॥
जैसे कोई मनुष्य भलीभाँति किये हुए कर्मोंद्वारा बिना किसी प्रतीकारके विभिन्न देश और कालमें उनका शुभाशुभ फल पाता है, उसी प्रकार अपने कर्मानुसार प्राप्त उत्तम और अधम शरीरोंमें यह चिन्मय ज्ञान बिना किसी विरोधके स्थित रहता है ॥ ८ ॥
यथा प्रदीप्तः पुरतः प्रदीपः प्रकाशमन्यस्य करोति दीप्यन् । तथेह पञ्चेन्द्रियदीपवृक्षा
पृष्ठ 1303
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ज्ञानप्रदीप्ताः परवन्त एव ॥ ९ ॥
जिस प्रकार अग्निसे प्रज्वलित दीपक स्वयं प्रकाशित होता हुआ पासमें स्थित अन्य वस्तुओंको भी प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार इस शरीररूप वृक्षमें स्थित पाँच इन्द्रियाँ चैतन्यरूपी ज्ञानके प्रकाशसे प्रकाशित होकर विषयोंको प्रकाशित करती हैं ( उनका प्रकाश चिन्मय प्रकाशके ही अधीन होनेके कारण वे पराधीन हैं । स्वतः प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं हैं) ॥ ९ ॥
यथा च राज्ञा बहवो ह्यमात्याः पृथक् प्रमाणं प्रवदन्ति युक्ताः । तद्वच्छरीरेषु भवन्ति पञ्च ज्ञानैकदेशः परमः स तेभ्यः ॥ १० ॥
जैसे किसी राजाके द्वारा भिन्न -भिन्न कार्योंमें नियुक्त किये गये बहुत- से मन्त्री अपने पृथक् - पृथक् कार्योंकी जानकारी राजाको कराते हैं । उसी प्रकार शरीरोंमें स्थित पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अपने - अपने एकदेशीय विषयका परिचय राजस्थानीय बुद्धिको देती हैं । जैसे मन्त्रियोंसे राजा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार उन पाँचों इन्द्रियोंसे उनका प्रवर्तक वह ज्ञान श्रेष्ठ है ॥ १० ॥
यथार्चिषोऽग्नेः पवनस्य वेगो
मरीचयोऽर्कस्य नदीषु चापः ।
गच्छन्ति चायान्ति च संचरन्त्य- स्तद्वच्छरीराणि शरीरिणां तु ॥ ११ ॥
जैसे अग्निकी शिखाएँ, वायुका वेग, सूर्यकी किरणें और नदियोंका बहता हुआ जल— ये सदा आते -जाते रहते हैं, इसी प्रकार देहधारियोंके शरीर भी आवागमनके प्रवाहमें पड़े हुए हैं ॥ ११ ॥
यथा च कश्चित् परशुं गृहीत्वा धूमं न पश्येज्ज्वलनं च काष्ठे । तद्वच्छरीरोदरपाणिपादं छित्त्वा न पश्यन्ति ततो यदन्यत् ॥ १२ ॥
जैसे कोई मनुष्य कुल्हाड़ी लेकर लकड़ीको चीरे तो उसमें उसे न तो आग दिखायी देगी और न धुआँ ही प्रकट होगा, उसी प्रकार इस शरीरका पेट फाड़ने या हाथ - पैर काटनेसे कोई उसे नहीं देख पाता, जो अन्तर्यामी आत्मा शरीरसे भिन्न है ॥ १२ ॥
तान्येव काष्ठानि यथा विमथ्य धूमं च पश्येज्ज्वलनं च योगात् । तद्वत् सबुद्धिः सममिन्द्रियात्मा बुधः परं पश्यति तं स्वभावम् ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1304
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
परंतु उन्हीं काठोंका युक्तिपूर्वक मन्थन करनेपर जैसे अग्नि और धूम दोनों ही देखने में आते हैं, उसी प्रकार योगके द्वारा मन और इन्द्रियोंको बुद्धिके सहित समाहित कर लेनेवाला बुद्धिमान् ज्ञानी पुरुष इन सबसे परम श्रेष्ठ उस ज्ञानको और आत्माको साक्षात् कर लेता ॥ १३ ॥
यथात्मनोऽङ्गं पतितं पृथिव्यां
स्वप्नान्तरे पश्यति चात्मनोऽन्यत् ।
श्रोत्रादियुक्तः सुमनाः सुबुद्धि- र्लिङ्गात्तथा गच्छति लिङ्गमन्यत् ॥ १४ ॥
जैसे स्वप्नमें मनुष्य अपने शरीरके कटे हुए अंगको अपनेसे अलग और पृथ्वीपर पड़ा देखता है, उसी प्रकार दस इन्द्रिय, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धि– इन सत्रह तत्त्वोंके समुदायका अभिमानी शुद्ध मन और बुद्धिवाला मनुष्य शरीरको अपनेसे पृथक् जाने । जो ऐसा नहीं जानता, वही एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जन्म लेता रहता है ॥ १४ ॥
उत्पत्तिवृद्धिव्ययसंनिपातै- र्न युज्यतेऽसौ परमः शरीरी । अनेन लिङ्गेन तु लिङ्गमन्यद् गच्छत्यदृष्टः फलसंनियोगात् ॥ १५ ॥
आत्मा शरीरसे सर्वथा भिन्न है । वह इसके उत्पत्ति, वृद्धि, क्षय और मृत्यु आदि दोषोंसे कभी लिप्त नहीं होता । किंतु अज्ञानी मनुष्य पूर्वकृत कर्मोंके फलके सम्बन्धसे इस ऊपर बताये हुए सूक्ष्म शरीरके सहित दूसरे शरीरमें चला जाता है ॥ १५ ॥
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो न चापि संस्पर्शमुपैति किंचित् । न चापि तैः साधयते तु कार्यं ते तं न पश्यन्ति स पश्यते तान् ॥ १६ ॥
कोई भी इन चर्मचक्षुओंके द्वारा आत्माके स्वरूपको नहीं देख सकता । अपनी त्वचासे उसका स्पर्श भी नहीं कर सकता । भाव यह कि इन्द्रियोंद्वारा आत्माको जाननेका कोई कार्य नहीं किया जा सकता । वे इन्द्रियाँ उसे नहीं देखतीं; पर वह आत्मा उन सबको देखता है ॥ १६ ॥
यथा समीपे ज्वलतोऽनलस्य संतापजं रूपमुपैति कश्चित् । न चान्तरं रूपगुणं बिभर्ति तथैव तद् दृश्यति रूपमस्य ॥ १७ ॥
जैसे कोई लोहा आदि पदार्थ समीप जलती हुई आगकी गर्मीसे लाल रंगका हो जाता है और उसमें दाहकताका गुण भी थोड़ी मात्रामें आ जाता है; परंतु वह उसके वास्तविक
पृष्ठ 1305
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आन्तरिक रूप और गुणको धारण नहीं करता, उसी प्रकार आत्माका स्वरूप चैतन्यमात्र इन्द्रियादिके समूह शरीरमें दिखायी देता है, किंतु उनका समुदायभूत शरीर वास्तवमें चेतन नहीं होता । एवं समीपस्थ वस्तुका जैसा रूप होता है वैसा ही रूप उस अग्निका भी प्रतीत होने लगता है ॥ १७ ॥
तथा मनुष्यः परिमुच्य काय- मदृश्यमन्यद् विशते शरीरम् । विसृज्य भूतेषु महत्सु देहं तदाश्रयं चैव बिभर्ति रूपम् ॥ १८ ॥
इसी तरह मनुष्य अपने दृश्य शरीरका त्याग करके जब दूसरे अदृश्य शरीरमें प्रवेश करता है, तब पहलेके स्थूल शरीरको पञ्च महाभूतोंमें मिलनेके लिये छोड़कर दूसरे शरीरका आश्रय ले उसीको अपना स्वरूप मानकर धारण करता है ॥ १८ ॥
खं वायुमग्निं सलिलं तथोर्वीं समन्ततोऽभ्याविशते शरीरी । नानाश्रयाः कर्मसु वर्तमानाः श्रोत्रादयः पञ्च गुणान् श्रयन्ते ॥ १ ९ ॥ देहाभिमानी जीव जब शरीर छोड़ता है, तब उस शरीरमें जो आकाशका अंश होता है, वह सब प्रकारसे आकाशमें, वायुका अंश वायुमें, अग्निका अंश अग्निमें, जलका अंश जलमें तथा पृथ्वीका अंश पृथ्वीमें विलीन हो जाता है । किंतु इन नाना भूतोंके आश्रित जो श्रोत्र आदि तत्त्व हैं, वे विलीन न होकर अपने - अपने कर्मोंमें प्रवृत्त रहते हैं और दूसरे शरीरमें जाकर पाँचों भूतोंका आश्रय ले लेते हैं ॥ १ ९ ॥ श्रोत्रं खतो घ्राणमथो पृथिव्या- स्तेजोमयं रूपमथो विपाकः । जलाश्रयं स्वेदमुक्तं रसं च वाय्वात्मकः स्पर्शकृतो गुणश्च ॥ २० ॥
आकाशसे श्रोत्रेन्द्रिय ( और उसका विषय शब्द ), पृथ्वीसे घ्राणेन्द्रिय ( और उसका विषय गन्ध ) होता है तथा रूप और विपाक वे दोनों ( एवं नेत्र - इन्द्रिय ) —ये सब तेजोमय हैं । स्वेद एवं रस ( और रसना- ) इन्द्रिय - ये जलके आश्रित हैं । एवं स्पर्श करनेवाली इन्द्रिय और स्पर्श यह वायुस्वरूप है ॥ २० ॥
महत्सु भूतेषु वसन्ति पञ्च पञ्चेन्द्रियार्थाश्च तथेन्द्रियाणि । सर्वाणि चैतानि मनोऽनुगानि बुद्धिं मनोऽन्वेति मतिः स्वभावम् ॥ २१ ॥
पृष्ठ 1306
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पाँचों इन्द्रियोंके पाँचों विषय तथा पाँचों इन्द्रियाँ भी पञ्च सूक्ष्म महाभूतोंमें निवास करते हैं, ये शब्द आदि विषय, आकाश आदि भूत तथा श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ सब- के - सब मनके अनुगामी हैं । मन बुद्धिका अनुसरण करता है और बुद्धि आत्माका आश्रय लेकर रहती है ॥ २१ ॥
शुभाशुभं कर्म कृतं यदन्यत् तदेव प्रत्याददते स्वदेहे । मनोऽनुवर्तन्ति परावराणि जलौकसः स्रोत इवानुकूलम् ॥ २२ ॥
जब जीवात्मा अपने कर्मोंद्वारा उपार्जित नवीन शरीरमें स्थित होता है, उस समय वह पहले जो शुभाशुभ कर्म किये हुए हैं उन्हींका फल प्राप्त करता है । जैसे जल- जन्तु जलके अनुकूल प्रवाहका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार पूर्वकृत अच्छे और बुरे कर्म मनका अनुगमन करते हैं अर्थात् मनके द्वारा फल प्रदान करते हैं ॥ २२ ॥
चलं यथा दृष्टिपथं परैति सूक्ष्मं महद् रूपमिवाभिभाति । स्वरूपमालोचयते च रूपं परं तथा बुद्धिपथं परैति ॥ २३ ॥
जैसे शीघ्रगामी नौकापर बैठे हुए पुरुषकी दृष्टिमें पार्श्ववर्ती वृक्ष पीछेकी ओर वेगसे भागते हुए दिखायी देते हैं, उसी प्रकार कूटस्थ निर्विकारी आत्मा बुद्धिके विकारसे विकारवान्- सा प्रतीत होता है एवं जैसे चश्मे या दूरबीनसे महीन अक्षर मोटा दीखता है और छोटी आकृति बहुत बड़ी दिखायी देती है, उसी प्रकार सूक्ष्म आत्मतत्त्व भी बुद्धि, विवेक-समूह शरीरसे संयुक्त होनेके कारण शरीरके रूपमें प्रतीत होने लगता है । तथा जैसे स्वच्छ दर्पण अपने मुखका प्रतिबिम्ब दिखा देता है, उसी प्रकार शुद्ध बुद्धिमें आत्माके स्वरूपकी झाँकी उपलब्ध हो जाती है ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु-बृहस्पति- संवादविषयक दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥
पृष्ठ 1307
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः शरीर, इन्द्रिय और मन - बुद्धिसे अतिरिक्त आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन मनुरुवाच यदिन्द्रियैस्तूपहितं पुरस्तात् प्राप्तान् गुणात् संस्मरते चिराय । तेष्विन्द्रियेषूपहतेषु पश्चात् स बुद्धिरूपः परमः स्वभावः ॥ १ ॥
मनुजी कहते हैं - बृहस्पते! बुद्धिके साथ तद्रूप हुआ जो जीव नामक चेतनतत्त्व है, वह इन्द्रियोंद्वारा दीर्घकालतक पहलेके भोगे हुए विषयोंका कालान्तरमें स्मरण करता है । यद्यपि उस समय उन विषयोंका इन्द्रियोंसे सम्बन्ध नहीं है, उनका सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है तो भी वे बुद्धिमें संस्काररूपसे अंकित हैं; इसलिये उनका स्मरण होता है । ( इससे बुद्धिके अतिरिक्त उसके प्रकाशक चेतनकी सत्ता स्वतः सिद्ध हो जाती है ) ॥ १ ॥
यथेन्द्रियार्थान् युगपत् समस्ता- न्नोपेक्षते कृत्स्नमतुल्यकालम् ।
तथाचलं संचरते स विद्वां- स्तस्मात् स एकः परमः शरीरी ॥ २ ॥
वह एक समय अथवा अनेक समयोंमें भूत और भविष्यके सम्पूर्ण पदार्थोंकी, जो इस जन्ममें या दूसरे जन्मोंमें देखे गये हैं, सामान्य रूपसे उपेक्षा नहीं करता अर्थात् उन्हें प्रकाशित ही करता है तथा परस्पर विलग न होनेवाली तीनों अवस्थाओंमें विचरता रहता है; अतः वह सबको जाननेवाला साक्षी सर्वोत्कृष्ट देहका स्वामी आत्मा एक है ॥ २ ॥
रजस्तमः सत्त्वमथो तृतीयं गच्छत्यसौ स्थानगुणान् विरूपान् । तथेन्द्रियाण्याविशते शरीरी हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम् ॥ ३ ॥
बुद्धिके जो स्थान -जागरित आदि अवस्थाएँ हैं, वे सभी सत्त्व, रज और तम— इन तीन गुणोंसे विभक्त हैं । इन अवस्थाओंसे सम्बन्धित जो सुख-दुःख आदि गुण हैं, वे परस्पर विलक्षण हैं । उन सबको वह आत्मा बुद्धिके सम्बन्धसे अनुभव करता है । इन्द्रियोंमें भी उस जीवात्माका आवेश उसी प्रकार होता है जैसे काठमें लगी हुई आगमें वायुका अर्थात् वायु
पृष्ठ 1308
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जैसे अग्निमें प्रविष्ट होकर अग्निको उद्दीप्त कर देती है, इसी प्रकार आत्मा इन्द्रियोंको चेतना प्रदान करता है ॥ ३ ॥
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो न पश्यति स्पर्शनमिन्द्रियेन्द्रियम् । न श्रोत्रलिङ्गं श्रवणेन दर्शनं तथा कृतं पश्यति तद् विनश्यति ॥ ४ ॥
मनुष्य नेत्रोंद्वारा आत्माके रूपका दर्शन नहीं कर सकता । त्वचा नामक इन्द्रिय उसका स्पर्श नहीं कर सकती; क्योंकि वह इन्द्रियोंकी भी इन्द्रिय अर्थात् उनका प्रकाशक है । उस आत्माके स्वरूपका श्रवणेन्द्रियके द्वारा श्रवण नहीं हो सकता; क्योंकि वह शब्दरहित है । ज्ञानविषयक विचारसे जब आत्माका साक्षात्कार किया जाता है, तब उसके साधनोंका बाध हो जाता है ॥ ४ ॥
श्रोत्रादीनि न पश्यन्ति स्वं स्वमात्मानमात्मना ।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वज्ञस्तानि पश्यति ॥ ५ ॥
श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ स्वयं अपने द्वारा आपको नहीं जान सकतीं । आत्मा सर्वज्ञ और सबका साक्षी है । सर्वज्ञ होनेके कारण ही वह उन सबको जानता है ॥ ५ ॥
यथा हिमवतः पार्श्वं पृष्ठं चन्द्रमसो यथा ।
न दृष्टपूर्वं मनुजैर्न च तन्नास्ति तावता ॥ ६ ॥
तद्वद् भूतेषु भूतात्मा सूक्ष्मो ज्ञानात्मवानसौ ।
अदृष्टपूर्वश्चक्षुर्भ्यां न चासौ नास्ति तावता ॥ ७ ॥
जैसे मनुष्योंद्वारा हिमालय पर्वतका दूसरा पार्श्व तथा चन्द्रमाका पृष्ठ भाग देखा हुआ नहीं है तो भी इसके आधारपर यह नहीं कहा जा सकता कि उनके पार्श्व और पृष्ठ भागका अस्तित्व ही नहीं है । उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके भीतर रहनेवाला उनका अन्तर्यामी ज्ञानस्वरूप आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण कभी नेत्रोंद्वारा नहीं देखा गया है; अतः उतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता कि आत्मा है ही नहीं ॥ ६-७ ॥
पश्यन्नपि यथा लक्ष्म जगत् सोमे न विन्दति ।
एवमस्ति न चोत्पन्नं न च तन्न परायणम् ॥ ८ ॥
जैसे चन्द्रमामें जो कलंक है, वह जगत्का अर्थात् तद्गत पृथ्वीका ही चिह्न है; परंतु उसको देखकर भी मनुष्य ऐसा नहीं समझता कि वह जगत्का अर्थात् पृथ्वीका चिह्न है । इसी प्रकार सबको ‘ मैं हूँ ' इस रूपमें आत्माका ज्ञान है; परंतु यथार्थ ज्ञान नहीं है; इस कारण मनुष्य उसके परायण - आश्रित नहीं है ॥ ८ ॥
रूपवन्तमरूपत्वादुदयास्तमने बुधाः ।
धिया समनुपश्यन्ति तद्गताः सवितुर्गतिम् ॥ ९ ॥
तथा बुद्धिप्रदीपेन दूरस्थं सुविपश्चितः ।
पृष्ठ 1309
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रत्यासन्नं निनीषन्ति ज्ञेयं ज्ञानाभिसंहितम् ॥ १० ॥
रूपवान् पदार्थ अपनी उत्पत्तिसे पूर्व और नष्ट हो जानेके बाद रूपहीन ही रहते हैं, इस नियमसे जैसे बुद्धिमान् लोग उनकी अरूपताका निश्चय करते हैं तथा सूर्यके उदय और अस्तके द्वारा विद्वान् पुरुष बुद्धिसे जिस प्रकार न दिखायी देनेवाली सूर्यकी गतिका अनुमान कर लेते हैं, उसी प्रकार विवेकी मनुष्य बुद्धिरूप दीपकके द्वारा इन्द्रियातीत ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेते हैं और इस निकटवर्ती दृश्य-प्रपंचको उस ज्ञानस्वरूप परमात्मामें विलीन कर देना चाहते हैं ॥ ९ -१० ॥
न हि खल्वनुपायेन कश्चिदर्थोऽभिसिद्ध्यति ।
सूत्रजालैर्यथा मत्स्यान् बध्नन्ति जलजीविनः ॥ ११ ॥
मृगैर्मृगाणां ग्रहणं पक्षिणां पक्षिभिर्यथा ।
गजानां च गजैरेव ज्ञेयं ज्ञानेन गृह्यते ॥ १२ ॥
उचित उपाय किये बिना कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, जैसे जलमें रहनेवाले प्राणियोंसे जीविका चलानेवाले सूतके जाल बनाकर उनके द्वारा मछलियोंको बाँध लेते हैं, जैसे मृगोंके द्वारा मृगोंको, पक्षियोंद्वारा पक्षियोंको और हाथियोंद्वारा हाथियोंको पकड़ा जाता है, उसी प्रकार ज्ञेय वस्तुका ज्ञानके द्वारा ग्रहण होता है ॥ ११-१२ ॥
अहिरेव ह्यहेः पादान् पश्यतीति हि नः श्रुतम् ।
तद्वन्मूर्तिषु मूर्तिस्थं ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति ॥ १३ ॥
हमने सुना है कि सर्पके पैरोंको सर्प ही पहचानता है, उसी प्रकार मनुष्य समस्त शरीरोंमें शरीरस्थ ज्ञेयस्वरूप आत्माको ज्ञानके द्वारा ही जान सकता है ॥ १३ ॥
नोत्सहन्ते यथा वेत्तुमिन्द्रियैरिन्द्रियाण्यपि ।
तथैवेह परा बुद्धिः परं बोध्यं न पश्यति ॥ १४ ॥
जैसे इन्द्रियाँ भी इन्द्रियोंद्वारा किसी ज्ञेयको नहीं जान सकतीं, उसी प्रकार यहाँ परा बुद्धि भी उस परम बोध्य तत्त्वको स्वयं नहीं देख पाती है; किंतु ज्ञाता पुरुष ही बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात् करता है ॥ १४ ॥
यथा चन्द्रो ह्यमावास्यामलिङ्गत्वान्न दृश्यते ।
न च नाशोऽस्य भवति तथा विद्धि शरीरिणम् ॥ १५ ॥
जैस चन्द्रमा अमावास्याको प्रकाशहीन हो जानेके कारण दिखायी नहीं देता है; किंतु उस समय उसका नाश नहीं होता । उसी प्रकार शरीरधारी आत्माके विषयमें भी समझना चाहिये अर्थात् आत्मा अदृश्य होनेपर भी उसका अभाव नहीं है, ऐसा समझना चाहिये ॥ १५ ॥
क्षीणकोशो ह्यमावास्यां चन्द्रमा न प्रकाशते ।
तद्वन्मूर्तिविमुक्तोऽसौ शरीरी नोपलभ्यते ॥ १६ ॥
पृष्ठ 1310
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अपने प्रकाश्य स्थानसे वियुक्त हो जानेके कारण दिखायी नहीं देता है, उसी प्रकार देहधारी आत्मा शरीरसे वियुक्त होनेपर दृष्टिगोचर नहीं होता है ॥ १६ ॥
यथाऽऽकाशान्तरं प्राप्य चन्द्रमा भ्राजते पुनः ।
तद्वल्लिङ्गान्तरं प्राप्य शरीरी भ्राजते पुनः ॥ १७ ॥
फिर वही चन्द्रमा जैसे अन्यत्र आकाशमें स्थान पाकर पुनः प्रकाशित होने लगता है, उसी प्रकार जीवात्मा दूसरा शरीर धारण करके पुनः प्रकट हो जाता है ॥ १७ ॥
जन्म वृद्धिः क्षयश्चास्य प्रत्यक्षेणोपलभ्यते ।
सा तु चान्द्रमसी वृत्तिर्न तु तस्य शरीरिणः ॥ १८ ॥
जन्म, वृद्धि और क्षयका जो प्रत्यक्ष दर्शन होता है, वह चन्द्रमण्डलमें प्रतीत होनेवाली वृत्ति चन्द्रमाकी नहीं है । उसी प्रकार शरीरका ही जन्म आदि होता है, उस शरीरधारी आत्माका नहीं ॥ १८ ॥
उत्पत्तिवृद्धिवयसा यथा स इति गृह्यते ।
चन्द्र एव त्वमावास्यां तथा भवति मूर्तिमान् ॥ १ ९ ॥
जैसे किसी व्यक्तिका जन्म होता है, वह बढ़ता है और किशोर, यौवन आदि भिन्न -भिन्न अवस्थाओंमें पहुँच जाता है तो भी यही समझा जाता है कि यह वही व्यक्ति है तथा अमावास्याके बाद जब चन्द्रमा पुनः मूर्तिमान् होकर प्रकट होता है तो यही माना जाता है कि यह वही चन्द्रमा है ( उसी प्रकार दूसरे शरीरमें प्रवेश करनेपर भी वह देहधारी आत्मा वही है - ऐसा समझना चाहिये ) ॥ १ ९ ॥
नोपसर्पद् विमुञ्चद् वा शशिनं दृश्यते तमः ।
विसृजंश्चोपसर्पश्च तद्वत् पश्य शरीरिणम् ॥ २० ॥
जैसे अन्धकाररूप राहु चन्द्रमाकी ओर आता और उसे छोड़कर जाता हुआ नहीं दिखायी देता है, उसी प्रकार जीवात्मा भी शरीरमें आता और उसे छोड़कर जाता हुआ नहीं दीख पड़ता है ऐसा समझो ॥ २० ॥
यथा चन्द्रार्कसंयुक्तं तमस्तदुपलभ्यते ।
तद्वच्छरीरसंयुक्तः शरीरीत्युपलभ्यते ॥ २१ ॥
जैसे सूर्यग्रहणकालमें चन्द्रमा सूर्यसे संयुक्त होनेपर सूर्यमें छायारूपी राहुका दर्शन होता है, उसी प्रकार शरीरसे संयुक्त होनेपर शरीरधारी आत्माकी उपलब्धि होती है ॥
यथा चन्द्रार्कनिर्मुक्तः स राहुर्नोपलभ्यते ।
तद्वच्छरीरनिर्मुक्तः शरीरी नोपलभ्यते ॥ २२ ॥
जैसे चन्द्रमा- सूर्यसे अलग होनेपर सूर्यमें राहुकी उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार शरीरसे विलग होनेपर शरीरधारी आत्माका दर्शन नहीं होता ॥ २२ ॥
यथा चन्द्रो ह्यमावास्यां नक्षत्रैर्युज्यते गतः ।