05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1491–1500

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1491–1500

पृष्ठ 1491

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मावमंस्था मया कर्म दुष्कृतं कृतमित्युत ॥ २७ ॥

आज जैसे तुम हो, कभी मैं भी ऐसा ही था और इस समय जिस दशामें हमलोग पड़े हुए हैं, कभी तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था होगी; अतः तुम यह समझकर कि मैंने बड़ा दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, मेरा अपमान न करो ॥ २७ ॥

सुखदुःखे हि पुरुषः पर्यायेणाधिगच्छति ।

पर्यायेणासि शक्रत्वं प्राप्तः शक्र न कर्मणा ॥ २८ ॥

प्रत्येक पुरुष बारी - बारी सुख और दुःख पाता है । इन्द्र! तुम भी अपने पराक्रमसे नहीं, कालक्रमसे ही इन्द्रपदको प्राप्त हुए हो ॥ २८ ॥

कालःकाले नयति मां त्वां च कालो नयत्ययम् ।

तेनाहं त्वं यथा नाद्य त्वं चापि न यथा वयम् ॥ २ ९ ॥

काल ही मुझे कुसमयकी ओर ले जा रहा है और यह काल ही तुम्हें अच्छे दिन दिखा रहा है; इसलिये आज जैसे तुम हो, वैसा मैं नहीं हूँ और जैसे हमलोग हैं, वैसे तुम नहीं हो ॥ २ ९ ॥

मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम् ।

नान्यो गुणसमाचारः पुरुषस्य सुखावहः ॥ ३० ॥

माता- पिताकी सेवा, देवताओंकी पूजा तथा अन्य सद्गुणयुक्त सदाचार भी बुरे दिनोंमें किसी पुरुषके लिये सुखदायक नहीं होता है ॥ ३० ॥

न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवाः ।

शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ॥ ३१ ॥

कालसे पीड़ित हुए मनुष्यको न विद्या, न तप, न दान, न मित्र और न बन्धु - बान्धव ही कष्टसे बचा पाते हैं ॥

नागामिनमनर्थं हि प्रतिघातशतैरपि ।

शक्नुवन्ति प्रतिव्योढुमृते बुद्धिबलान्नराः ॥ ३२ ॥

मनुष्य बुद्धि- बलके सिवा और किसी उपायसे सैकड़ों आघात करके भी आनेवाले अनर्थको नहीं रोक सकते ॥ ३२ ॥

पर्यायैर्हन्यमानानां परित्राता न विद्यते ।

इदं तु दुःखं यच्छक्र कर्ताहमिति मन्यसे ॥ ३३ ॥

कालक्रमसे जिनपर आघात होता है - स्वयं काल जिन्हें पीड़ा देता है, उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता । शक्र! तुम जो अपनेको इस परिस्थितिका कर्ता मानते हो, यही तुम्हारे लिये दुःखकी बात है ॥ ३३ ॥

यदि कर्ता भवेत् कर्ता न क्रियेत कदाचन ।

यस्मात्तु क्रियते कर्ता तस्मात् कर्ताप्यनीश्वरः ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1492

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यदि कार्य करनेवाला पुरुष स्वयं ही कर्ता होता तो उसको उत्पन्न करनेवाला दूसरा कोई कभी न होता । वह दूसरेके द्वारा उत्पन्न किया जाता है; इसलिये कालके सिवा दूसरा कोई कर्ता नहीं है ॥ ३४ ॥

कालेनाहं त्वामजयं कालेनाहं जितस्त्वया ।

गन्ता गतिमतां कालः कालः कलयति प्रजाः ॥ ३५ ॥

कालकी सहायता पाकर मैंने तुमपर विजय पायी थी और कालके ही सहयोगसे अब तुमने मुझे पराजित कर दिया है । काल ही जानेवाले प्राणियोंके साथ जाता या उन्हें गमनकी शक्ति प्रदान करता है और वही समस्त प्रजाका संहार करता है ॥ ३५ ॥

इन्द्र प्राकृतया बुद्धया प्रलयं नावबुद्धयसे ।

केचित् त्वां बहु मन्यन्ते श्रेष्ठ्यं प्राप्तं स्वकर्मणा ॥ ३६ ॥

इन्द्र! तुम्हारी बुद्धि साधारण है; इसलिये उसके द्वारा तुम एक न एक दिन अवश्य होनेवाले अपने विनाशकी बात नहीं समझ पाते । संसारमें कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो तुम्हें अपने ही पराक्रमसे श्रेष्ठताको प्राप्त हुआ मानते और तुम्हें अधिक महत्त्व देते हैं ॥ ३६ ॥

कथमस्मद्विधो नाम जानन् लोकप्रवृत्तयः ।

कालेनाभ्याहतः शोचेन्मुह्येद् वाप्यथ विभ्रमेत् ॥ ३७ ॥

किंतु मेरे - जैसा पुरुष जो जगत्की प्रवृत्तिको जानता है - उन्नति और अवनतिका कारण काल - प्रारब्ध ही है; ऐसा समझता है, वह तुम्हें महत्त्व कैसे दे सकता है? जो कालसे पीड़ित है, वह प्राणी शोकग्रस्त, मोहित अथवा भ्रान्त भी हो सकता है ॥ ३७ ॥

नित्यं कालपरीतस्य मम वा मद्विधस्य वा ।

बुद्धिर्व्यसनमासाद्य भिन्ना नौरिव सीदति ॥ ३८ ॥

मैं होऊँ या मेरे - जैसा दूसरा कोई पुरुष हो । जब काल ( प्रारब्ध) से आक्रान्त हो जाता है, तब सदा ही उसकी बुद्धि संकटमें पड़कर फटी हुई नौकाके समान शिथिल हो जाती है ॥ ३८ ॥

अहं च त्वं च ये चान्ये भविष्यन्ति सुराधिपाः ।

ते सर्वे शक्र यास्यन्ति मार्गमिन्द्रशतैर्गतम् ॥ ३ ९ ॥

इन्द्र! मैं, तुम या और जो लोग भी देवेश्वरके पदपर प्रतिष्ठित होंगे, वे सब- के - सब उसी मार्गपर जायँगे, जिसपर पहलेके सैकड़ों इन्द्र जा चुके हैं ॥ ३ ९ ॥

त्वामप्येवं सुदुर्धर्षं ज्वलन्तं परया श्रिया ।

काले परिणते कालः कालयिष्यति मामिव ॥ ४० ॥

यद्यपि आज तुम इस प्रकार दुर्धर्ष हो और अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो रहे हो; किंतु जब समय परिवर्तित होगा, अर्थात् जब तुम्हारा प्रारब्ध खराब होगा, तब मेरी ही भाँति तुम्हें भी काल अपना शिकार बना लेगा – इन्द्रपदसे भ्रष्ट कर देगा ॥ ४० ॥

बहूनीन्द्रसहस्राणि दैवतानां युगे युगे ।

पृष्ठ 1493

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अभ्यतीतानि कालेन कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ४१ ॥

युग- युगमें ( प्रत्येक मन्वन्तरमें ) इन्द्रोंका परिवर्तन होनेके कारण अबतक देवताओंके अनेक सहस्र इन्द्र कालके गालमें चले गये हैं; अतः कालका उल्लङ्घन करना किसीके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ ४१ ॥

इदं तु लब्ध्वा संस्थानमात्मानं बहु मन्यसे ।

सर्वभूतभवं देवं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ४२ ॥

न चेदमचलं स्थानमनन्तं वापि कस्यचित् ।

त्वं तु बालिशया बुद्धया ममेदमिति मन्यसे ॥ ४३ ॥

तुम इस शरीरको पाकर समस्त प्राणियोंको जन्म देनेवाले सनातन देव भगवान् ब्रह्माजीकी भाँति अपनेको बहुत बड़ा मानते हो; किंतु तुम्हारा यह इन्द्रपद आजतक ( किसीके लिये भी ) अविचल या अनन्त कालतक रहनेवाला नहीं सिद्ध हुआ— इसपर कितने ही आये और चले गये । केवल तुम्हीं अपनी मूढबुद्धिके कारण इसे अपना मानते हो ॥ ४२-४३ ॥

अविश्वस्ते विश्वसिषि मन्यसे वाध्रुवे ध्रुवम् ।

नित्यं कालपरीतात्मा भवत्येवं सुरेश्वर ॥ ४४ ॥

देवेश्वर! नाशवान् होनेके कारण जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस राज्यपर तुम विश्वास करते हो और जो अस्थिर है, उसे स्थिर मानते हो; किंतु इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि कालने जिसके हृदयपर अधिकार कर लिया हो, वह सदा ऐसी ही विपरीत भावनासे भावित होता है ॥ ४४ ॥

ममेयमिति मोहात् त्वं राजश्रियमभीप्ससि ।

नेयं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा सदा ॥ ४५ ॥

तुम मोहवश जिस राजलक्ष्मीको ' यह मेरी है ' ऐसा समझकर पाना चाहते हो, वह न तुम्हारी है, न हमारी है और न दूसरोंकी ही है । वह किसीके पास भी सदा स्थिर नहीं रहती ॥ ४५ ॥

अतिक्रम्य बहूनन्यांस्त्वयि तावदियं गता ।

कंचित् कालमियं स्थित्वा त्वयि वासव चञ्चला ॥ ४६ ॥

गौर्निपानमिवोत्सृज्य पुनरन्यं गमिष्यति । वासव! यह चञ्चला राजलक्ष्मी दूसरे बहुत - से राजाओंको लाँघकर इस समय तुम्हारे पास आयी है और कुछ कालतक तुम्हारे यहाँ ठहरकर फिर उसी तरह दूसरेके पास चली जायगी, जैसे गौ जल पीनेके स्थानका परित्याग करके चली जाती है ॥ ४६ ॥

राजलोका ह्यतिक्रान्ता यान्न संख्यातुमुत्सहे ॥ ४७ ॥

त्वत्तो बहुतराश्चान्ये भविष्यन्ति पुरंदर ।

पृष्ठ 1494

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पुरंदर! अबतक इसने जितने राजाओंका परित्याग किया है, उनकी गणना मैं नहीं कर सकता । तुम्हारे बाद भी बहुत - से नरेश इसके अधिकारी होंगे ॥ ४७३ ॥

सवृक्षौषधिरत्नेयं सहसत्त्ववनाकरा ॥ ४८ ॥

तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेयं पुरा मही । जिन लोगोंने पहले वृक्ष, ओषधि, रत्न, जीव - जन्तु, वन और खानोंसहित इस सारी पृथ्वीका उपभोग किया है, उन सबको मैं इस समय नहीं देखता हूँ ॥ पृथुरैलो मयो भीमो नरकः शम्बरस्तथा ॥ ४९ ॥

अश्वग्रीवः पुलोमा च स्वर्भानुरमितध्वजः ।

प्रह्लादो नमुचिर्दक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः ॥ ५० ॥

ह्रीनिषेवः सुहोत्रश्च भूरिहा पुष्पवान् वृषः ।

सत्येषुर्ऋषभो बाहुः कपिलाश्वो विरूपकः ॥ ५१ ॥

बाणः कार्तस्वरो वह्निर्विश्वदंष्ट्रोऽथ नैर्ऋतिः ।

संकोचोऽथ वरीताक्षो वराहाश्वो रुचिप्रभः ॥ ५२ ॥

विश्वजित् प्रतिरूपश्च वृषाण्डो विष्करो मधुः ।

हिरण्यकशिपुश्चैव कैटभश्चैव दानवः ॥ ५३ ॥

दैतेया दानवाश्चैव सर्वे ते नैर्ऋतैः सह ।

एते चान्ये च बहवः पूर्वे पूर्वतराश्च ये ॥ ५४ ॥

दैत्येन्द्रा दानवेन्द्राश्च यांश्चान्याननुशुश्रुम ।

बहवः पूर्वदैत्येन्द्राः संत्यज्य पृथिवीं गताः ॥ ५५ ॥

कालेनाभ्याहताः सर्वे कालो हि बलवत्तरः । पृथु, इलानन्दन पुरूरवा, मय, भीम, नरकासुर, शम्बरासुर, अश्वग्रीव, पुलोमा, स्वर्भानु, अमितध्वज, प्रह्लाद, नमुचि, दक्ष, विप्रचित्ति, विरोचन, ह्रीनिषेव, सुहोत्र, भूरिहा, पुष्पवान्, वृष, सत्येषु, ऋषभ, बाहु, कपिलाश्व, विरूपक, बाण, कार्तस्वर, वह्नि, विश्वदंष्ट्र, नैर्ऋति, संकोच, वरीताक्ष, वराहाश्व, रुचिप्रभ, विश्वजित्, प्रतिरूप, वृषाण्ड, विष्कर, मधु, हिरण्यकशिपु और कैटभ – ये तथा और भी बहुत - से दैत्य, दानव एवं राक्षस सभी इस पृथ्वीके स्वामी हो चुके हैं । पहलेके और बहुत पहलेके ये पूर्वोक्त तथा अन्य अनेक दैत्यराज, दानवराज एवं दूसरे दूसरे नरेश जिनका नाम हमलोग सुनते आ रहे हैं, कालसे पीड़ित हो सभी इस पृथ्वीको छोड़कर चले गये; क्योंकि काल ही सबसे बड़ा बलवान् हैं ॥ ४ ९ –५५३ ॥ सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं न त्वमेकः शतक्रतुः ॥ ५६ ॥

सर्वे धर्मपराश्चासन् सर्वे सततसत्रिणः ।

अन्तरिक्षचराः सर्वे सर्वेऽभिमुखयोधिनः ॥ ५७ ॥

पृष्ठ 1495

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केवल तुमने ही सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया हो, यह बात नहीं है । उन सभी राजाओंने सौ - सौ यज्ञ किये थे । सभी धर्मपरायण थे और सभी निरन्तर यज्ञमें संलग्न रहते थे । वे सभी आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखते थे और युद्धमें शत्रुके सामने डटकर लोहा लेनेवाले थे ॥

सर्वे संहननोपेताः सर्वे परिघबाहवः ।

सर्वे मायाशतधराः सर्वे ते कामरूपिणः ॥ ५८ ॥

वे सब - के - सब सुदृढ़ शरीरसे सुशोभित होते थे । उन सबकी भुजाएँ परिघ ( लोहदण्ड) के समान मोटी और मजबूत थीं । वे सभी सैकड़ों माया जानते और इच्छानुसार रूप धारण करते थे ॥ ५८ ॥

सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते पराजिताः ।

सर्वे सत्यव्रतपराः सर्वे कामविहारिणः ॥ ५ ९ ॥

वे सब लोग समराङ्गणमें पहुँचकर कभी पराजित होते नहीं सुने गये थे । सभी सत्यव्रतका पालन करनेमें तत्पर और इच्छानुसार विहार करनेवाले थे ॥ ५ ९ ॥

सर्वे वेदव्रतपराः सर्वे चैव बहुश्रुताः ।

सर्वे सम्मतमैश्वर्यमीश्वराः प्रतिपेदिरे ॥ ६० ॥

सभी वेदोक्त व्रतको धारण करनेवाले और बहुश्रुत विद्वान् थे। सभी लोकेश्वर थे और सबने मनोवाञ्छित ऐश्वर्य प्राप्त किया था ॥ ६० ॥

न चैश्वर्यमदस्तेषां भूतपूर्वो महात्मनाम् ।

सर्वे यथार्हदातारः सर्वे विगतमत्सराः ॥ ६१ ॥

उन महामना नरेशोंको पहले कभी भी ऐश्वर्यका मद नहीं हुआ था । वे सब - के--सब यथायोग्य दान करनेवाले और ईर्ष्या -द्वेषसे रहित थे ॥ ६१ ॥

सर्वे सर्वेषु भूतेषु यथावत् प्रतिपेदिरे ।

सर्वे दाक्षायणीपुत्राः प्राजापत्या महाबलाः ॥ ६२ ॥

वे सभी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ यथायोग्य बर्ताव करते थे । उन सबका जन्म दक्ष-कन्याओंके गर्भसे हुआ था और वे सभी महाबलशाली वीर प्रजापति कश्यपकी संतान थे ॥ ६२ ॥

ज्वलन्तः प्रतपन्तश्च कालेन प्रतिसंहृताः ।

त्वं चैवेमां यदा भुक्त्वा पृथिवीं त्यक्षसे पुनः ॥ ६३ ॥

न शक्ष्यसि तदा शक्र नियन्तुं शोकमात्मनः । इन्द्र! वे सभी नरेश अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले और प्रतापी थे, किंतु कालने उन सबका संहार कर दिया । तुम जब इस पृथ्वीका उपभोग करके पुनः इसे छोड़ोगे, तब अपने शोकको रोकनेमें समर्थ न हो सकोगे ॥ ६३ ॥

मुञ्चेच्छां कामभोगेषु मुञ्चेमं श्रीभवं मदम् ॥ ६४ ॥

एवं स्वराज्यनाशे त्वं शोकं सम्प्रसहिष्यसि ।

पृष्ठ 1496

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तुम काम--भोगकी इच्छाको छोड़ो और राजलक्ष्मीके इस मदको त्याग दो । इस दशामें यदि तुम्हारे राज्यका नाश हो जाय तो तुम उस शोकको सह सकोगे ॥ ६४३ ॥

शोककाले शुचो मा त्वं हर्षकाले च मा हृषः ॥ ६५ ॥

अतीतानागतं हित्वा प्रत्युत्पन्नेन वर्तय । तुम शोकका अवसर आनेपर शोक न करो और हर्षके समय हर्षित मत होओ । भूत और भविष्यकी चिन्ता छोड़कर वर्तमान कालमें जो वस्तु उपलब्ध हो, उसीसे जीवन -निर्वाह करो ॥ ६५३ ॥

मां चेदभ्यागतः कालः सदा युक्तमतन्द्रितः ॥ ६६ ॥

क्षमस्व नचिरादिन्द्र त्वामप्युपगमिष्यति । इन्द्र! मैं सदा सावधान रहता था, तथापि कभी आलस्य न करनेवाले कालका यदि मुझपर आक्रमण हो गया तो तुमपर भी शीघ्र ही उस कालका आक्रमण होगा । इस कटु सत्यके लिये मुझे क्षमा करना ॥ ६६ ॥

त्रासयन्निव देवेन्द्र वाग्भिस्तक्षसि मामिह ॥ ६७ ॥

संयते मयि नूनं त्वमात्मानं बहु मन्यसे । देवेन्द्र! इस समय भयभीत करते हुए- से तुम यहाँ अपने वाग्बाणोंसे मुझे छेदे डालते हो । मैं अपनेको संयममें रखकर शान्त बैठा हूँ; इसीलिये अवश्य तुम अपनेको बहुत बड़ा समझने लगे हो ॥ ६७३ ॥

कालः प्रथममायान्मां पश्चात् त्वामनुधावति ॥ ६८ ॥

तेन गर्जसि देवेन्द्र पूर्वं कालहते मयि । देवराज! जिस कालका पहले मुझपर धावा हुआ है, वही पीछे तुमपर भी चढ़ाई करेगा। मैं पहले कालसे पीड़ित हो गया हूँ; इसीलिये तुम सामने खड़े होकर गरज रहे हो ॥ ६८३ ॥

को हि स्थातुमलं लोके मम क्रुद्धस्य संयुगे ॥ ६ ९ ॥ कालस्तु बलवान् प्राप्तस्तेन तिष्ठसि वासव । अन्यथा संसारमें कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें कुपित होनेपर मेरे सामने ठहर सके । इन्द्र! बलवान् काल ( अदृष्ट ) ने मुझपर आक्रमण किया है, इसीसे तुम मेरे सम्मुख खड़े हुए हो ॥ ६९ ॥

यत् तद् वर्षसहस्रान्तं पूर्णं भवितुमर्हति ॥ ७० ॥

यथा मे सर्वगात्राणि न सुस्थानि महौजसः ।

अहमैन्द्राच्च्युतः स्थानात् त्वमिन्द्रः प्रकृतो दिवि ॥ ७१ ॥

देवताओंका वह सहस्रों वर्षका समय अब पूरा होना ही चाहता है, जबतक कि तुम्हें इन्द्रके पदपर रहना है । कालके ही प्रभावसे मुझ महाबली वीरके अब सारे अंग उतने स्वस्थ

पृष्ठ 1497

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1497 का मूल पृष्ठ
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नहीं रह गये हैं । मैं इन्द्रपदसे गिरा दिया गया और तुम स्वर्गमें इन्द्र बना दिये गये ||

सुचित्रे जीवलोकेऽस्मिन्नुपास्यः कालपर्ययात् ।

किं हि कृत्वा त्वमिन्द्रोऽद्य किं वा कृत्वा वयं च्युताः ॥ ७२ ॥

कालके उलट - फेरसे ही इस विचित्र जीवलोकमें तुम सबके आराध्य बन गये हो । भला बताओ तो तुम कौन- सा शुभ कर्म करके आज इन्द्र हो गये और हम कौन - सा अशुभ कर्म करके इन्द्रपदसे नीचे गिर गये ॥

कालः कर्ता विकर्ता च सर्वमन्यदकारणम् ।

नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ७३ ॥

विद्वान् प्राप्यैवमत्यर्थं न प्रहृष्येन्न च व्यथेत् । काल ( प्रारब्ध ) ही सबकी उत्पत्ति और संहारका कर्ता है । दूसरी सारी वस्तुएँ इसमें कारण नहीं मानी जा सकतीं; अतः विद्वान् पुरुष नाश -विनाश, ऐश्वर्य, सुख - दुःख, अभ्युदय या पराभव पाकर न तो अत्यन्त हर्ष माने और न अधिक व्यथित ही हो ॥ ७३ ॥

त्वमेव हीन्द्र वेत्थास्मान् वेदाहं त्वां च वासव ॥ ७४ ॥

किं कत्थसे मां किं च त्वं कालेन निरपत्रपः । इन्द्र! हम कैसे हैं, यह तुम्हीं अच्छी तरह जानते हो । वासव! मैं तुम्हें भली- भाँति जानता हूँ; फिर भी तुम लज्जाको तिलाञ्जलि दे क्यों मेरे सामने व्यर्थ आत्मश्लाघा कर रहे हो । वास्तवमें काल ही यह सब कुछ करा रहा है ॥ ७४ ॥

त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत् तदा पौरुषं मम ॥ ७५ ॥

समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् । पहले मैं जो पुरुषार्थ प्रकट कर चुका हूँ, उसको सबसे अधिक तुम्हीं जानते हो । कई बारके युद्धोंमें तुम मेरा पराक्रम देख चुके हो । इस समय एक ही दृष्टान्त देना काफी होगा ॥ ७५३ ॥

आदित्याश्चैव रुद्राश्च साध्याश्च वसुभिः सह ॥ ७६ ॥

मया विनिर्जिताः पूर्वं मरुतश्च शचीपते ।

त्वमेव शक्र जानासि देवासुरसमागमे ॥ ७७ ॥

शचीवल्लभ इन्द्र! पहले जब देवासुरसंग्राम हुआ था, उस समयकी बात तुम्हें अच्छी तरह याद होगी । मैंने अकेले ही समस्त आदित्यों, रुद्रों, साध्यों, वसुओं तथा मरुद्गणोंको परास्त किया था ॥ ७६-७७ ॥

समेता विबुधा भग्नास्तरसा समरे मया ।

पर्वताश्चासकृत् क्षिप्ताः सवनाः सवनौकसः ॥ ७८ ॥

सटङ्कशिखरा भग्नाः समरे मुर्ध्नि ते मया ।

किं नु शक्यं मया कर्तुं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ७९ ॥

पृष्ठ 1498

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1498 का मूल पृष्ठ
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मेरे वेगसे सब देवता युद्धका मैदान छोड़कर एक साथ ही भाग खड़े हुए थे । वन एवं वनवासियोंसहित कितने ही पर्वत, मैंने बारंबार तुमलोगोंपर चलाये थे । तुम्हारे सिरपर भी सुदृढ़ पाषाण और शिखरोंसहित बहुत- से पर्वत मैंने फोड़ डाले थे; किंतु इस समय मैं क्या कर सकता हूँ; क्योंकि कालका उल्लङ्घण करना बहुत कठिन है ॥ ७८-७९ ॥

न हि त्वां नोत्सहे हन्तुं सवज्रमपि मुष्टिना ।

न तु विक्रमकालोऽयं क्षमाकालोऽयमागतः ॥ ८० ॥

तुम्हारे हाथमें वज्र रहनेपर भी मैं केवल मुक्केसे मारकर तुम्हें यमलोक न पहुँचा सकूँ, ऐसी बात नहीं है । किंतु मेरे लिये यह पराक्रम दिखानेका नहीं, क्षमा करनेका समय आया है ॥ ८० ॥

तेन त्वां मर्षये शक्र दुर्मर्षणतरस्त्वया ।

तं मां परिणते काले परीतं कालवह्निना ॥ ८१ ॥

नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे । इन्द्र! यही कारण है कि मैं तुम्हारे सब अपराध चुपचाप सहे लेता हूँ । अब भी मेरा वेग तुम्हारे लिये अत्यन्त दुःसह है । किंतु जब समयने पलटा खाया है, कालरूपी अग्निने मुझे सब ओरसे घेर लिया है और मैं कालपाशसे निश्चितरूपसे बँध गया हूँ, तब तुम मेरे सामने खड़े होकर अपनी झूठी बड़ाई किये जा रहे हो ॥ ८१३ ॥

अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य दुरतिक्रमः ॥ ८२ ॥

बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं रशनया यथा । जैसे मनुष्य रस्सीसे किसी पशुको बाँध लेता है, उसी प्रकार यह भयंकर कालपुरुष मुझे अपने पाशमें बाँधे खड़ा है ॥ ८२३ ॥

लाभालाभौ सुखं दुःखं कामक्रोधौ भवाभवौ ॥ ८३ ॥

वधबन्धप्रमोक्षं च सर्वं कालेन लभ्यते । पुरुषको लाभ- हानि, सुख-दुःख, काम-क्रोध, अभ्युदयपराभव, वध, कैद और कैदसे छुटकारा — यह सब काल ( प्रारब्ध ) से ही प्राप्त होते हैं ॥ ८३ ॥

नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः ॥ ८४ ॥

सोऽयं पचति कालो मां वृक्षे फलमिवागतम् । न मैं कर्ता हूँ, न तुम कर्ता हो । जो वास्तवमें सदा कर्ता है, वह सर्वसमर्थ काल वृक्षपर लगे हुए फलके समान मुझे पका रहा है ॥ ८४ ॥

यान्येव पुरुषः कुर्वन् सुखैः कालेन युज्यते ॥ ८५ ॥

पुनस्तान्येव कुर्वाणो दुःखैः कालेन युज्यते । पुरुष कालका सहयोग पाकर जिन कर्मोंको करनेसे सुखी होता है, कालका सहयोग न मिलनेसे पुनः उन्हीं कर्मोंको करके वह दुःखका भागी होता है ॥ न च कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हति ॥ ८६ ॥

पृष्ठ 1499

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1499 का मूल पृष्ठ
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तेन शक्र न शोचामि नास्ति शोके सहायता । इन्द्र! जो कालके प्रभावको जानता है, वह उससे आक्रान्त होकर भी शोक नहीं करता; क्योंकि विपत्ति दूर करनेमें शोकसे कोई सहायता नहीं मिलती, इसलिये मैं शोक नहीं करता हूँ ॥ ८६ ॥

यदा हि शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति ॥ ८७ ॥

सामर्थ्यं शोचतो नास्तीत्यतोऽहं नाद्य शोचिमि । जब शोक करनेवाले पुरुषका शोक उसके संकटको दूर नहीं हटा पाता है, उलटे शोकग्रस्त मनुष्यकी शक्ति क्षीण हो जाती है, तब शोक क्यों किया जाय? यही सोचकर मैं शोक नहीं करता हूँ ॥ ८७३ ॥

एवमुक्तः सहस्राक्षो भगवान् पाकशासनः ॥ ८८ ॥

प्रतिसंहृत्य संरम्भमित्युवाच शतक्रतुः । बलिके ऐसा कहनेपर सहस्रनेत्रधारी पाकशासन शतक्रतु भगवान् इन्द्रने अपने क्रोधको रोककर इस प्रकार कहा— ॥ ८८३ ॥

सवज्रमुद्यतं बाहुं दृष्ट्वा पाशांश्च वारुणान् ॥ ८९ ॥

कस्येह न व्यथेद् बुद्धिर्मृत्योरपि जिघांसतः ।

सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ॥ ९० ॥

‘ दैत्यराज! मेरे हाथको वज्र एवं वरुणपाशसहित ऊपर उठा देखकर मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्युका भी दिल दहल जाता है; फिर दूसरा कौन है जिसकी बुद्धि व्यथित न हो । तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली और स्थिर है; इसलिये तनिक भी विचलित नहीं होती ॥ ८ ९ -९ ० ॥

ध्रुवं न व्यथसेऽद्य त्वं धैर्यात् सत्यपराक्रम ।

को हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत् ॥ ९ १ ॥

कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत् । ‘ सत्यपराक्रमी वीर! तुम निश्चय ही धैर्यके कारण व्यथित नहीं होते हो । इस सम्पूर्ण जगत्को विनाशकी ओर जाते देखकर कौन शरीरधारी पुरुष धन - वैभव, विषय - भोग अथवा अपने शरीरपर भी विश्वास कर सकता है? ॥ ९ १३३ ॥ अहमप्येवमेवैनं लोकं जानाम्यशाश्वतम् ॥ ९ २ ॥ कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे । ' मैं भी इसी प्रकार सर्वव्यापी, अविनाशी, घोर एवं गुह्य कालाग्निमें पड़े हुए इस जगत्को क्षणभंगुर ही जानता हूँ ॥ ९ २ ॥ न चात्र परिहारोऽस्ति कालस्पृष्टस्य कस्यचित् ॥ ९ ३ ॥ सूक्ष्माणां महतां चैव भूतानां परिपच्यताम् ।

पृष्ठ 1500

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‘ जो कालकी पकड़में आ चुका है, ऐसे किसी भी पुरुषके लिये उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं है । सूक्ष्मसे सूक्ष्म और महान् भूत भी कालग्निमें पकाये जा रहे हैं, उनका भी उससे छुटकारा होनेवाला नहीं है ॥ ९ ३ ॥ अनीशस्याप्रमत्तस्य भूतानि पचतः सदा ॥ ९ ४ ॥ अनिवृत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते । ‘ कालपर किसीका भी वश नहीं चलता । वह सदा सावधान रहकर सम्पूर्ण भूतोंको पकाता रहता है । वह कभी लौटनेवाला नहीं है। ऐसे कालके अधीन हुआ प्राणी उससे छुटकारा नहीं पाता है ॥ ९ ४ ॥ अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु ॥ ९ ५ ॥ प्रयत्नेनाप्यपक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित् । 'देहधारी जीव प्रमादमें पड़कर सोते हैं; किंतु काल सदा सावधान रहकर जागता रहता है । किसीके प्रयत्नसे भी कालको पीछे हटाया जा सका हो, ऐसा पहले कभी किसीने देखा नहीं है ॥ ९ ५३ ॥ पुराणः शाश्वतो धर्मः सर्वप्राणभृतां समः ॥ ९ ६ ॥ कालो न परिहार्यश्च न चास्यास्ति व्यतिक्रमः । ‘ काल पुरातन ( अनादि), सनातन, धर्मस्वरूप और समस्त प्राणियोंके प्रति समान दृष्टि रखनेवाला है । कालका किसीके द्वारा भी परिहार नहीं हो सकता और न उसका कोई उल्लङ्घन ही कर सकता है ॥ अहोरात्रांश्च मासांश्च क्षणान् काष्ठा लवान् कलाः ॥ ९ ७ ॥ सम्पीडयति यः कालो वृद्धि वार्धुषिको यथा । जैसे ऋण देनेवाला पुरुष व्याजका हिसाब जोड़कर ऋण लेनेवालोंको तंग करता है, उसी प्रकार वह काल दिन, रात, मास, क्षण, काष्ठा, लव और कला तकका हिसाब लगाकर प्राणियोंको पीड़ा देता रहता है ॥ ९ ७३ ॥ इदमद्य करिष्यामि श्वः कर्तास्मीति वादिनम् ॥ ९ ८ ॥ कालो हरति सम्प्राप्तो नदीवेग इव द्रुमम् । ‘ जैसे नदीका वेग सहसा बढ़कर किनारेके वृक्षका हरण कर लेता है । उसी प्रकार ' यह आज करूँगा और वह कल पूरा करूंगा। ' ऐसा कहनेवाले पुरुषका काल सहसा आकर हरण कर लेता है ॥ ९ ८१३ ॥ इदानीं तावदेवासौ मया दृष्टः कथं मृतः ॥ ९९ ॥

इति कालेन ह्रियतां प्रलापः श्रूयते नृणाम् । " अरे! अभी- अभी तो मैंने उसे देखा था । वह मर कैसे गया? ' इस प्रकार कालसे अपहृत होनेवालोंके लिये अन्य मनुष्योंका प्रलाप सुना जाता है ॥ ९९ ३ ॥