05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2301–2310
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2301–2310
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ऋषि कहते हैं कि ' भगवान् नारायण सूर्यके समान तेजस्वी, अन्तर्यामी पुरुष, अज्ञानान्धकारसे परे, सर्वव्यापी, सर्वगामी, ईश्वर, वरदाता और सर्वसमर्थ हैं ' ॥ ५७ ॥
ततोऽथ वरदो देवस्तान् सर्वानमरान् स्थितान् ।
अशरीरो बभाषेदं वाक्यं खस्थो महेश्वरः ॥ ५८ ॥
यज्ञभाग निश्चित हो जानेपर उन वरदायक देवता महेश्वर नारायणदेवने आकाशमें बिना शरीरके ही स्थित हो वहाँ खड़े हुए उन समस्त देवताओंसे यह बात कही- ॥ ५८ ॥
येन यः कल्पितो भागः स तथा मामुपागतः ।
प्रीतोऽहं प्रदिशाम्यद्य फलमावृत्तिलक्षणम् ॥ ५ ९ ॥
‘ देवताओ! जिसने जो भाग हमारे लिये निश्चित किया था, वह उसी रूपमें मुझे प्राप्त हो गया । इससे प्रसन्न होकर आज मैं तुम्हें पुनरावृत्तिरूप फल प्रदान करता हूँ ॥ ५ ९ ॥
एतद् वो लक्षणं देवा मत्प्रसादसमुद्भवम् ।
स्वयं यज्ञैर्यजमानाः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ६० ॥
युगे युगे भविष्यध्वं प्रवृत्तिफलभागिनः । ‘ देवताओ! मेरी कृपासे तुम्हारा ऐसा ही लक्षण होगा। तुम प्रत्येक युगमें उत्तम दक्षिणाओंसे संयुक्त यज्ञोंद्वारा यजन करके प्रवृत्तिरूप धर्मफलके भागी होओगे ॥ ६० ॥
यज्ञैर्ये चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः ॥ ६१ ॥
कल्पयिष्यन्ति वो भागांस्ते नरा वेदकल्पितान् । ‘ देवगण! सम्पूर्ण लोकोंमें जो मनुष्य यज्ञोंद्वारा यजन करेंगे, वे तुम्हारे लिये वेदके कथनानुसार यज्ञभाग निश्चित करेंगे ॥ ६१३ ॥
यो मे यथा कल्पितवान् भागमस्मिन् महाक्रतौ ॥ ६२ ॥
स तथा यज्ञभागार्हो वेदसूत्रे मया कृतः । ‘ इस महान् यज्ञमें जिस देवताने मेरे लिये जैसा भाग निश्चित किया है, वह वैदिक सूत्रमें मेरेद्वारा वैसे ही यज्ञभागका अधिकारी बनाया गया ॥ ६२ ॥
यूयं लोकान् भावयध्वं यज्ञभागफलोचिताः ॥ ६३ ॥
सर्वार्थचिन्तका लोके यथाधीकारनिर्मिताः । ' तुमलोग यज्ञमें भाग लेकर यजमानको उसका फल देनेमें प्रवृत्त हो जगत्में अपने अधिकारके अनुसार सबके सभी मनोरथोंका चिन्तन करते हुए सब लोगोंको उन्नतिशील बनाओ ॥ ६३ ॥
याः क्रियाः प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृताः ॥ ६४ ॥
आभिराप्यायितबला लोकान् वै धारयिष्यथ ।
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‘प्रवृत्ति- फलसे समादृत होनेवाली जिन यज्ञ -क्रियाओंका जगत्में प्रचार होगा, उन्हींसे तुम्हारे बलकी वृद्धि होगी और बलिष्ठ होकर तुमलोग सम्पूर्ण लोकोंका भरण- पोषण करोगे ॥ ६४ ॥
यूयं हि भाविता यज्ञैः सर्वयज्ञेषु मानवैः ॥ ६५ ॥
मां ततो भावयिष्यध्वमेषा वो भावना मम । ' सम्पूर्ण यज्ञोंमें मनुष्य तुम्हारा यजन करके तुम्हें उन्नतिशील एवं पुष्ट बनायेंगे, फिर तुमलोग भी मुझे इसी प्रकार परिपुष्ट करोगे । यही तुम्हारे लिये मेरा उपदेश है ॥ ६५३ ॥
इत्यर्थं निर्मिता वेदा यज्ञाश्चौषधिभिः सह ॥ ६६ ॥
एभिः सम्यक् प्रयुक्तैर्हि प्रीयन्ते देवताः क्षितौ ।
‘ इसीके लिये मैंने वेदों तथा ओषधियों ( अन्न-फल आदि) सहित यज्ञोंकी सृष्टि की है ।
इनका भलीभाँति पृथ्वीपर अनुष्ठान होनेसे सम्पूर्ण देवता तृप्त होंगे ॥ ६६३ ॥
निर्माणमेतद् युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम् ॥ ६७ ॥
मया कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षयादिह ।
चिन्तयध्वं लोकहितं यथाधीकारमीश्वराः ॥ ६८ ॥
‘ देवश्रेष्ठगण! मैंने प्रवृत्तिप्रधान गुणके सहित तुमलोगोंकी सृष्टि की है, अतः लोकेश्वरो! जबतक कल्पका अन्त न हो जाय, तबतक तुमलोग अपने अधिकारके अनुसार लोगोंका हितचिन्तन करते रहो ॥
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥ ६ ९ ॥
‘ मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ -ये सात ऋषि ब्रह्माजीके द्वारा मनसे उत्पन्न किये गये हैं ॥ ६ ९ ॥
एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः ।
प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ॥ ७० ॥
‘ ये प्रधान वेदवेत्ता और प्रवृत्ति - धर्मावलम्बी हैं । इन सबको वेदाचार्य माना गया है और प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित किया गया है ॥ ७० ॥
अयं क्रियावतां पन्था व्यक्तीभूतः सनातनः ।
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ॥ ७१ ॥
‘ यह कर्मपरायण पुरुषोंके लिये सनातन मार्ग प्रकट हुआ है । इस पद्धतिसे लोकोंकी सृष्टि करनेवाले प्रभावशाली पुरुषको अनिरुद्ध कहा गया है ॥ ७१ ॥
सनः सनत्सुजातश्च सनकः ससनन्दनः ।
सनत्कुमारः कपिलः सप्तमश्च सनातनः ॥ ७२ ॥
सप्तैते मानसाः प्रोक्ता ऋषयो ब्रह्मणः सुताः ।
स्वयमागतविज्ञाना निवृत्तिं धर्ममास्थिताः ॥ ७३ ॥
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- ‘ सन, सनत्सुजात, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल तथा सातवें सनातन– ये सात ऋषि भी ब्रह्माके मानस पुत्र कहे गये हैं । इन्हें स्वयं विज्ञान प्राप्त है और ये निवृत्तिधर्ममें स्थित हैं ॥ ७२-७३ ॥
एते योगविदो मुख्याः सांख्यज्ञानविशारदाः ।
आचार्या धर्मशास्त्रेषु मोक्षधर्मप्रवर्तकाः ॥ ७४ ॥
' ये प्रमुख योगवेत्ता, सांख्यज्ञान- विशारद, धर्मशास्त्रोंके आचार्य तथा मोक्षधर्मके प्रवर्तक हैं ॥ ७४ ॥
यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात् त्रिगुणो महान् ।
तस्मात् परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः ॥ ७५ ॥
' पूर्वकालमें अव्यक्त प्रकृतिसे जो त्रिगुणात्मक महान् अहंकार प्रकट हुआ था, उससे अत्यन्त परे जिसकी स्थिति है, वह समष्टि चेतन क्षेत्रज्ञ माना गया है ॥ ७५ ॥
सोऽहं क्रियावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः ।
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन् यस्मिंश्च कर्मणि ॥ ७६ ॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुते महत् । ‘ वह क्षेत्रज्ञ मैं हूँ । जो कर्मपरायण मनुष्य हैं, वे पुनरावृत्तिशील हैं; अतः उनके लिये यह निवृत्तिमार्ग दुर्लभ है । जिस प्राणीका जिस प्रकार निर्माण हुआ है तथा वह जिस - जिस प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप कर्ममें संलग्न होता है, वह उसीके महान् फलका भागी होता है ॥ ७६ ॥
एष लोकगुरुर्ब्रह्मा जगदादिकरः प्रभुः ॥ ७७ ॥
एष माता पिता चैव युष्माकं च पितामहः ।
मयानुशिष्टो भविता सर्वभूतवरप्रदः ॥ ७८ ॥
‘ ये लोकगुरु ब्रह्मा जगत्के आदि स्रष्टा और प्रभु हैं । ये ही तुम्हारे माता- पिता और पितामह हैं । मेरी आज्ञाके अनुसार ये सम्पूर्ण भूतोंको वर प्रदान करनेवाले होंगे ॥ ७७-७८ ॥
अस्य चैवात्मजो रुद्रो ललाटाद् यः समुत्थितः ।
ब्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वभूतधरः प्रभुः ॥ ७९ ॥
‘ इनके ललाटसे जो रुद्र उत्पन्न हुए हैं, वे भी इन (ब्रह्माजी ) के ही पुत्र हैं। ब्रह्माजीकी आज्ञासे वे सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ होंगे ॥ ७ ९ ॥
गच्छध्वं स्वानधीकारांश्चिन्तयध्वं यथाविधि ।
प्रवर्तन्तां क्रियाः सर्वाः सर्वलोकेषु मा चिरम् ॥ ८० ॥
' तुम सब लोग जाओ और अपने- अपने अधिकारोंका विधिपूर्वक पालन करो । समस्त लोकोंमें सम्पूर्ण वैदिक क्रियाएँ अविलम्ब प्रचलित हो जानी चाहिये ॥ ८० ॥
प्रदिश्यन्तां च कर्माणि प्राणिनां गतयस्तथा ।
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परिनिष्ठितकालानि आयूंषीह सुरोत्तमाः ॥ ८१ ॥
' सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग प्राणियोंको उनके कर्म, उन कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली गति तथा नियत कालतककी आयु प्रदान करो ॥ ८१ ॥
इदं कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तितः ।
अहिंस्या यज्ञपशवो युगेऽस्मिन् न तदन्यथा ॥ ८२ ॥
' यह सत्ययुग नामक श्रेष्ठ समय चल रहा है । इस युगमें यज्ञ- पशुओंकी हिंसा नहीं की जाती । अहिंसा - धर्मके विपरीत यहाँ कुछ भी नहीं होता है ॥ ८२ ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मो भविष्यत्यत्र वै सुराः ततस्त्रेतायुगं नाम त्रयी यत्र भविष्यति ॥ ८३ ॥
‘ देवताओ! इस सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त सम्पूर्ण धर्मका पालन होगा । तदनन्तर त्रेतायुग आयेगा, जिसमें वेदत्रयीका प्रचार होगा ॥ ८३ ॥
प्रोक्षिता यत्र पशवो वधं प्राप्स्यन्ति वै मखे ।
यत्र पादश्चतुर्थो वै धर्मस्य न भविष्यति ॥ ८४ ॥
'उस युगमें यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये गये पशुओंका वध किया जायगा* और धर्मका एक पाद— चतुर्थ अंश कम हो जायगा ॥ ८४ ॥
ततो वै द्वापरं नाम मिश्रः कालो भविष्यति ।
द्विपादहीनो धर्मश्च युगे तस्मिन् भविष्यति ॥ ८५ ॥
'उसके बाद द्वापर युगका आगमन होगा । वह समय धर्म और अधर्मके सम्मिश्रणसे युक्त होगा । उस युगमें धर्मके दो चरण नष्ट हो जायँगे ॥ ८५ ॥
ततस्तिष्येऽथ सम्प्राप्ते युगे कलिपुरस्कृते ।
एकपादस्थितो धर्मो यत्र तत्र भविष्यति ॥ ८६ ॥
‘ तदनन्तर पुष्य नक्षत्रमें कलियुगका पदार्पण होगा । उस समय यत्र- तत्र धर्मका एक चरण ही शेष रह जायगा ' ॥ ८६ ॥
देवा देवर्षयश्चोचुस्तमेवंवादिनं गुरुम् ।
एकपादस्थिते धर्मे यत्र क्वचन गामिनि ॥ ८७ ॥
कथं कर्तव्यमस्माभिर्भगवंस्तद् वदस्व नः । तब देवताओं और देवर्षियोंने उपर्युक्त बात कहनेवाले गुरुस्वरूप भगवान्से कहा —' भगवन्! जब कलियुगमें जहाँ- कहीं भी धर्मका एक ही चरण अवशिष्ट रहेगा, तब हमें क्या करना होगा? यह बताइये ' ॥ ८७३ ॥
श्रीभगवानुवाच यत्र वेदाश्च यज्ञाश्च तपः सत्यं दमस्तथा ॥ ८८ ॥
अहिंसाधर्मसंयुक्ताः प्रचरेयुः सुरोत्तमाः ।
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स वो देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ॥ ८ ९ ॥ श्रीभगवान् बोले – सुरश्रेष्ठगण! जहाँ वेद, यज्ञ, तप, सत्य, इन्द्रियसंयम और अहिंसाधर्म प्रचलित हों, उसी देशका तुम्हें सेवन करना चाहिये । ऐसा करनेसे तुम्हें अधर्म अपने एक पैरसे भी नहीं छू सकेगा ॥ व्यास उवाच
तेऽनुशिष्टा भगवता देवाः सर्षिगणास्तथा ।
नमस्कृत्वा भगवते जग्मुर्देशान् यथेप्सितान् ॥ ९ ० ॥
व्यासजी कहते हैं - शिष्यो! भगवान्का यह उपदेश पाकर ऋषियोंसहित देवता उन्हें नमस्कार करके अपने अभीष्ट देशोंको चले गये ॥ ९ ० ॥
गतेषु त्रिदिवौकःसु ब्रह्मकः पर्यवस्थितः ।
दिदृक्षुर्भगवन्तं तमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥ ९ १ ॥
स्वर्गवासी देवताओंके चले जानेपर अकेले ब्रह्माजी ही वहाँ खड़े रहे । वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित भगवान् श्रीहरिका दर्शन करना चाहते थे ॥ ९ १ ॥
तं देवो दर्शयामास कृत्वा हयशिरो महत् ।
साङ्गानावर्तयन् वेदान् कमण्डलुत्रिदण्डधृक् ॥ ९ २ ॥
तब भगवान्ने महान् हयग्रीवरूप धारण करके ब्रह्माजीको दर्शन दिया । वे कमण्डलु और त्रिदण्ड धारण करके छहों अंगोंसहित वेदोंकी आवृत्ति कर रहे थे ॥ ९ २ ॥
ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् ।
लोककर्ता प्रभुर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ ९ ३ ॥
मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ।
स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ॥ ९ ४ ॥
उस समय अमित पराक्रमी भगवान् हयग्रीवका दर्शन करके सम्पूर्ण जगत्के हितकी कामनासे लोककर्ता भगवान् ब्रह्माने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उन वरदायक देवताके सम्मुख वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये । तब भगवान्ने उनको हृदयसे लगाकर यह बात सुनायी ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ श्रीभगवानुवाच
लोककार्यगतीः सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि ।
धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः ॥ ९ ५ ॥
श्रीभगवान् बोले – ब्रह्मन्! तुम सम्पूर्ण लोकोंके समस्त कर्मों और उनसे मिलनेवाली गतियोंका विधिपूर्वक चिन्तन करो; क्योंकि तुम्हीं सम्पूर्ण प्राणियोंके धाता हो, तुम्हीं सबके प्रभु हो और तुम्हीं इस जगत्के गुरु हो ॥ ९ ५ ॥ त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ।
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यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति ॥ ९ ६ ॥
प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिकः ।
एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ९ ७ ॥
तुमपर यह भार रखकर मैं अनायास ही धैर्य धारण करूँगा । जब कभी तुम्हारे लिये देवताओंका कार्य असह्य हो जायगा, तब मैं आत्मज्ञानका उपदेश देनेके लिये तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा । ऐसा कहकर भगवान् हयग्रीव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ६- ९ ७ ॥
तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वलोकमचिराद् गतः ।
एवमेष महाभागः पद्मनाभः सनातनः ॥ ९८ ॥
यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा ।
निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम् ।
प्रवृत्तिधर्मान् विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ॥ ९९ ॥
भगवान्का यह उपदेश पाकर ब्रह्मा भी शीघ्र ही अपने लोकको चले गये । इस प्रकार ये महाभाग सनातन पुरुष भगवान् पद्मनाभ यज्ञोंमें अग्रभोक्ता और सदा ही यज्ञके पोषक एवं प्रवर्तक बताये गये हैं । वे कभी अक्षयधर्मी महात्माओंके निवृत्तिधर्मका आश्रय लेते हैं और कभी लोककी विचित्र चित्तवृत्ति करके प्रवृत्तिधर्मका विधान करते हैं ॥ ९ ८- ९९ ॥ स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम् । युगान्ते प्रसुप्तः सुसंक्षिप्य लोकान् युगादौ प्रबुद्धो जगद्ध्युत्ससर्ज ॥ १०० ॥
वे ही भगवान् नारायण प्रजाके आदि, मध्य और अन्त हैं । वे ही धाता, धेय, कर्ता और कार्य हैं । वे ही युगान्तके समय सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके सो जाते हैं और वे ही कल्पके आदिमें जाग्रत् हो सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ १०० ॥
तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने ।
अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम् ॥ १०१ ॥
शिष्यो! तुम उन्हीं अजन्मा, विश्वरूप, सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय निर्गुण परमात्मा नारायणदेवको नमस्कार करो ॥ १०१ ॥
महाभूताधिपतये रुद्राणां पतये तथा ।
आदित्यपतये चैव वसूनां पतये तथा ॥ १०२ ॥
वे ही महाभूतोंके अधिपति तथा रुद्रों, आदित्यों और वसुओंके स्वामी हैं । उन्हें नमस्कार करो ॥ १०२ ॥
अश्विभ्यां पतये चैव मरुतां पतये तथा ।
वेदयज्ञाधिपतये वेदाङ्गपतयेऽपि च ॥ १०३ ॥
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वे अश्विनीकुमारोंके पति, मरुद्गणोंके पालक, वेद और यज्ञोंके अधिपति तथा
वेदांगोंके भी स्वामी हैं । उन्हें प्रणाम करो ॥ १०३ ॥
समुद्रवासिने नित्यं हरये मुञ्जकेशिने ।
शान्ताय सर्वभूतानां मोक्षधर्मानुभाषिणे ॥ १०४ ॥
जो सदा समुद्रमें निवास करते हैं, जिनका केश मूँजके समान है तथा जो समस्त प्राणियोंको मोक्षधर्मका उपदेश देते हैं, उन शान्तस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार करो ॥ १०४ ॥
तपसां तेजसां चैव पतये यशसामपि ।
वचसां पतये नित्यं सरितां पतये तथा ॥ १०५ ॥
जो तप, तेज, यश, वाणी तथा सरिताओंके स्वामी एवं नित्य संरक्षक हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार करो ॥ १०५ ॥
कपर्दिने वराहाय एकशृङ्गाय धीमते ।
विवस्वतेऽश्वशिरसे चतुर्मूर्तिधृते सदा ॥ १०६ ॥
जो जटाजूटधारी, एक सींगवाले वराह, बुद्धिमान् विवस्वान्, हयग्रीव तथा चतुर्मूर्तिधारी हैं, उन श्रीनारायण - देवको सदा नमस्कार करो ॥ १०६ ॥
गुह्याय ज्ञानदृश्याय अक्षराय क्षराय च ।
एष देवः संचरति सर्वत्रगतिरव्ययः ॥ १०७ ॥
जिनका स्वरूप गुह्य है, जो ज्ञानरूपी नेत्रसे ही देखे जाते हैं तथा अक्षर और क्षररूप हैं, उन श्रीहरिको प्रणाम करो । ये अविनाशी नारायणदेव सर्वत्र संचरण करते हैं; इनकी सर्वत्र गति है ॥ १०७ ॥
एष चैतत् परं ब्रह्म ज्ञेयो विज्ञानचक्षुषा ।
एवमेतत् पुरा दृष्टं मया वै ज्ञानचक्षुषा ॥ १०८ ॥
ये ही परब्रह्म हैं। विज्ञानमय नेत्रसे ही इनका दर्शन एवं ज्ञान हो सकता है । पूर्वकालमें मैंने ज्ञानदृष्टिसे ही इनका इस प्रकार साक्षात्कार किया था ॥ १०८ ॥
कथितं तच्च वै सर्वं मया पृष्टेन तत्त्वतः ।
क्रियतां मद्वचः शिष्याः सेव्यतां हरिरीश्वरः ।
गीयतां वेदशब्दैश्च पूज्यतां च यथाविधि । १० ९ ॥
शिष्यो! तुमलोगोंके पूछनेपर मैंने ये सारी बातें यथार्थरूपसे कही हैं । तुम मेरी बात मानो और सर्वेश्वर श्रीहरिका सेवन करो । वेदमन्त्रोंद्वारा उन्हींकी महिमाका गान और उन्हींका विधिपूर्वक पूजन करो ॥ १० ९ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तास्तु वयं तेन वेदव्यासेन धीमता ।
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सर्वे शिष्याः सुतश्चास्य शुकः परमधर्मवित् ॥ ११० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! परम बुद्धिमान् वेदव्यासने हम सब शिष्योंको तथा अपने परम धर्मज्ञ पुत्र शुकदेवको ऐसा ही उपदेश दिया ॥ ११० ॥
स चास्माकमुपाध्यायः सहास्माभिर्विशाम्पते ।
चतुर्वेदोद्गताभिस्तमृग्भिः समभितुष्टुवे ॥ १११ ॥
प्रजानाथ! फिर हमारे उपाध्याय व्यासने हमारे साथ चारों वेदोंकी ऋचाओंद्वारा उन नारायणदेवका स्तवन किया ॥ १११ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
एवं मेऽकथयद् राजन् पुरा द्वैपायनो गुरुः ॥ ११२ ॥
राजन्! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया । पूर्वकालमें मेरे गुरु व्यासजीने मुझे ऐसा ही उपदेश दिया था ॥ ११२ ॥
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चैनं परिकीर्तयेत् ।
नमो भगवते कृत्वा समाहितमतिर्नरः ॥ ११३ ॥
भवत्यरोगो मतिमान् बलरूपसमन्वितः ।
आतुरो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११४ ॥
जो प्रतिदिन इसे सुनता है और जो भगवान्को नमस्कार करके एकाग्रचित्त हो सदा इसका पाठ करता है, वह बुद्धिमान्, बलवान्, रूपवान् तथा रोगरहित होता है । रोगी रोगसे और बँधा हुआ पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ११३-११४ ॥
कामान् कामी लभेत् कामं दीर्घं चायुरवाप्नुयात् ।
ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥ ११५ ॥
कामनावाला पुरुष मनोवांछित कामनाओंको पाता है तथा बड़ी भारी आयु प्राप्त कर लेता है । ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता और क्षत्रिय विजयी होता है ॥ ११५ ॥
वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ।1
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥ ११६ ॥
वैश्य इसको पढ़ने और सुननेसे महान् लाभका भागी होता है । शूद्र सुख पाता है ।
पुत्रहीनको पुत्र और कन्याको मनोवांछित पतिकी प्राप्ति होती है ॥ ११६ ॥
लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनयेत् सुतम् ।
वन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ॥ ११७ ॥
जिसका गर्भ अटक गया हो, वह इसको सुननेसे उस संकटसे छूट जाती है । गर्भवती स्त्री यथासमय पुत्र पैदा करती है । वन्ध्या भी प्रसवको प्राप्त होती है तथा उसका वह प्रसव पुत्र- पौत्र एवं समृद्धिसे सम्पन्न होता है ॥ ११७ ॥
क्षेमेण गच्छेदध्वानमिदं यः पठते पथि ।
यो यं कामं कामयते स तमाप्नोति च ध्रुवम् ॥ ११८ ॥
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जो मार्गमें इसका पाठ करता है, वह कुशलतापूर्वक अपनी यात्रा पूरी करता है । इसे पढ़ने और सुननेवाला पुरुष जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है ॥ ११८ ॥
इदं महर्षेर्वचनं विनिश्चितं महात्मनः पुरुषवरस्य कीर्तितम् । समागमं चर्षिदिवौकसामिमं निशम्य भक्ताः सुसुखं लभन्ते ॥ ११ ९ ॥ पुरुषप्रवर महात्मा महर्षि व्यासके कहे हुए इस सिद्धान्तभूत वचनको तथा ऋषियों और देवताओंके समागम- सम्बन्धी इस वृत्तान्तको श्रवण करके भक्तजन उत्तम सुख पाते हैं ॥ ११ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीनसौचालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३४० ॥
* पशुवधसे यहाँ क्या अभिप्राय है, ठीक समझमें नहीं आया ।
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एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना जनमेजय उवाच
अस्तौषीद् यैरिमं व्यासः सशिष्यो मधुसूदनम् ।
नामभिर्विविधैरेषां निरुक्तं भगवन् मम ॥ १ ॥
वक्तुमर्हसि शुश्रूषोः प्रजापतिपतेहरेः ।
श्रुत्वा भवेयं यत् पूतः शरच्चन्द्र इवामलः ॥ २ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन्! शिष्योंसहित महर्षि व्यासने जिन नाना प्रकारके नामोंद्वारा इन मधुसूदनका स्तवन किया था, उनका निर्वचन ( व्युत्पत्ति) मुझे बतानेकी कृपा करें । मैं प्रजापतियोंके पति भगवान् श्रीहरिके नामोंकी व्याख्या सुनना चाहता हूँ; क्योंकि उन्हें सुनकर मैं शरच्चन्द्रके समान निर्मल एवं पवित्र हो जाऊँगा ॥ १-२ ॥ वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् यथाऽऽचष्ट फाल्गुनस्य हरिः प्रभुः ।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनो नाम्नां निरुक्तं गुणकर्मजम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! भगवान् श्रीहरिने अर्जुनपर प्रसन्न होकर उनसे गुण और कर्मके अनुसार स्वयं अपने नामोंकी जैसी व्याख्या की थी, वही तुम्हें सुना रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
नामभिः कीर्तितैस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
पृष्टवान् केशवं राजन् फाल्गुनः परवीरहा ॥ ४ ॥
नरेश्वर! जिन नामोंके द्वारा उन महात्मा केशवका कीर्तन किया जाता है, शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने श्रीकृष्णसे उनके विषयमें इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥
अर्जुनउवाच
भगवन् भूतभव्येश सर्वभूतसृगव्यय ।
लोकधाम जगन्नाथ लोकानामभयप्रद ॥ ५ ॥
यानि नामानि ते देव कीर्तितानि महर्षिभिः ।
वेदेषु सपुराणेषु यानि गुह्यानि कर्मभिः ॥ ६ ॥
तेषां निरुक्तं त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि केशव ।