05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2321–2330

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2321–2330

पृष्ठ 2321

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ब्राह्मणानां मतिर्वाक्यं कर्म श्रद्धां तपांसि च ।

धारयन्ति महीं द्यां च शैक्यो वागमृतं तथा ॥ १७ ॥

जैसे छींका दूध, दही आदिको धारण करता है, उसी प्रकार ब्राह्मणोंकी बुद्धि, वाक्य, कर्म, श्रद्धा, तप और वचनामृत पृथ्वी और स्वर्गको धारण करते हैं ॥

नास्ति सत्यात् परो धर्मो नास्ति मातृसमो गुरुः ।

ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति प्रेत्य चेह च भूतये ॥ १८ ॥

सत्यसे बढ़कर दूसरा धर्म नहीं है । माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है तथा ब्राह्मणोंसे बढ़कर इहलोक और परलोकमें कल्याण करनेवाला और कोई नहीं है ॥ १८ ॥

नैषामुक्षा वहति नोत वाहा न गर्ग मथ्यति सम्प्रदाने । अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति येषां राष्ट्रे ब्राह्मणा वृत्तिहीनाः ॥ १ ९ ॥ जिनके राज्यमें ब्राह्मणोंके लिये कोई आजीविका न हो उन राजाओंकी सवारी, बैल और घोड़े नहीं रहते; दूसरोंको देनेके लिये उनके यहाँ दही- दूधके मटके नहीं मथे जाते हैं तथा वे अपनी मर्यादासे भ्रष्ट होकर लुटेरे हो जाते हैं ॥ १ ९ ॥ वेदपुराणेतिहासप्रामाण्यान्नारायणमुखोद्गताः सर्वात्मानः सर्वकर्तारः सर्वभावाश्च ब्राह्मणाश्च ॥ २० ॥

वेद, पुराण और इतिहासके प्रमाणसे यह सिद्ध है कि ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति भगवान् नारायणके मुखसे हुई है; अतः वे ब्राह्मण सर्वात्मा, सर्वकर्ता और सर्वभावस्वरूप हैं ॥ २० ॥

वाक्संयमकाले हितस्य वरप्रदस्य देवदेवस्य ब्राह्मणाः प्रथमं प्रादुर्भूता ब्राह्मणेभ्यश्च शेषा वर्णाः प्रादुर्भूताः ॥ २१ ॥

वाणीके संयमकालमें सबके हितैषी, वरदाता, देवाधिदेव ब्रह्माजीके द्वारा सबसे पहले ब्राह्मण उत्पन्न हुए । फिर ब्राह्मणोंसे शेष वर्णोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २१ ॥

इत्थं च सुरासुरविशिष्टा ब्राह्मणा य एव मया ब्रह्मभूतेन पुरा स्वयमेवोत्पादिताः सुरासुरमहर्षयो भूतविशेषाः स्थापिता निगृहीताश्च ॥ २२ ॥

इस प्रकार ब्राह्मण देवताओं और असुरोंसे भी श्रेष्ठ हैं । पूर्वकालमें मैंने स्वयं ही ब्रह्मारूप होकर उन ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था । देवता, असुर और महर्षि आदि जो भूतविशेष हैं, उन्हें ब्राह्मणोंने ही उनके अधिकारपर स्थापित किया और उनके द्वारा अपराध होनेपर उन्हें दण्ड भी दिया ॥ २२ ॥

अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गौतमाद्धरिश्मश्रुतामिन्द्रः प्राप्तः कौशिकनिमित्तं चेन्द्रो मुष्कवियोगं मेषवृषणत्वं चावाप ॥ २३ ॥

पृष्ठ 2322

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अहल्यापर बलात्कार करनेके कारण गौतमके शापसे इन्द्रको हरिश्मश्रु ( हरी दाढ़ी-मूछोंसे युक्त) होना पड़ा तथा विश्वामित्रके शापसे इन्द्रको अपना अण्डकोष खो देना पड़ा और उनके भेंड़ेके अण्डकोष जोड़े गये ॥ २३ ॥

अश्विनोर्ग्रहप्रतिषेधोद्यतवज्रस्य पुरन्दरस्य च्यवनेन स्तम्भितौ बाहू ॥ २४ ॥

अश्विनीकुमारोंके लिये नियत यज्ञभागका निषेध करनेके लिये वज्र उठाये हुए इन्द्रकी दोनों भुजाओंको महर्षि च्यवनने स्तम्भित कर दिया था ॥ २४ ॥

क्रतुवधप्राप्तमन्युना च दक्षेण भूयस्तपसा चात्मानं संयोज्य नेत्राकृतिरन्या ललाटे रुद्रस्योत्पादिता ॥ २५ ॥

इसी प्रकार दक्ष प्रजापतिने रुद्रद्वारा किये गये अपने यज्ञके विध्वंससे कुपित हो बड़ी भारी तपस्या की और रुद्रदेवके ललाटमें एक तीसरा नेत्र-चिह्न प्रकट कर दिया था ॥ २५ ॥

त्रिपुरवधार्थं दीक्षामुपगतस्य रुद्रस्य उशनसा जटाः शिरस उत्कृत्य प्रयुक्तास्ततः प्रादुर्भूता भुजगास्तैरस्य भुजगैः पीड्यमानः कण्ठो नीलतामुपगतः पूर्वे च मन्वन्तरे स्वायम्भुवे नारायणहस्तग्रहणान्नीलकण्ठत्वमेव च ॥ २६ ॥

जिस समय रुद्रने त्रिपुरनिवासी दैत्योंके वधके लिये दीक्षा ली थी, उस समय शुक्राचार्यने अपने मस्तकसे जटाएँ उखाड़कर उन्हींका महादेवजीपर प्रयोग किया । फिर तो उन जटाओंसे बहुतेरे सर्प उत्पन्न हुए, जिन्होंने रुद्रदेवके कण्ठमें डँसना आरम्भ किया । इससे उनका कण्ठ नीला हो गया तथा पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरमें नारायणने अपने हाथसे उनका कण्ठ पकड़ा था, इसलिये भी कण्ठका रंग नीला हो जानेसे वे रुद्रदेव नीलकण्ठ हो गये ॥ २६ ॥

अमृतोत्पादने पुरश्चरणतामुपगतस्याङ्गिरसो बृहस्यतेरुपस्पृशतो न प्रसादं गतवत्यः किलापः, अथ बृहस्पतिरपां चुक्रोध यस्मान्ममोपस्पृशतः कलुषीभूता न च प्रसादमुपगतास्तस्मादद्यप्रभृति झषमकरकच्छप- जन्तुभिःकलुषी भवतेति, तदा प्रभृत्यापो यादोभिः संकीर्णाः सम्प्रवृत्ताः ॥ २७ ॥

अंगिराके पुत्र बृहस्पतिने अमृत उत्पन्न करनेके समय पुरश्चरण आरम्भ किया । उस समय जब वे आचमन करने लगे, तब जल स्वच्छ नहीं हुआ । इससे बृहस्पति जलके प्रति कुपित हो उठे और बोले — ' मेरे आचमन करते समय भी तुम स्वच्छ न हुए, मैले ही बने रह गये; इसलिये आजसे मत्स्य, मकर और कछुए आदि जन्तुओं द्वारा तुम कलुषित होते रहो । ' तभीसे सारे जलाशय जल -जन्तुओंसे भरे रहने लगे ॥ २७ ॥

विश्वरूपो हि वै त्वाष्ट्रः पुरोहितो देवानामासीत्, स्वस्त्रीयोऽसुराणां स प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमदात् परोक्षमसुरेभ्यः ॥ २८ ॥

त्वष्टाके पुत्र विश्वरूप देवताओंके पुरोहित थे । वे असुरोंके भानजे लगते थे; अतः देवताओंको प्रत्यक्ष और असुरोंको परोक्षरूपसे यज्ञोंका भाग दिया करते थे ॥ २८ ॥

पृष्ठ 2323

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अथ हिरण्यकशिपुं पुरस्कृत्य विश्वरूपमातरं स्वसारमसुरा वरमयाचन्त हे स्वसरयं ते पुत्रस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपस्त्रिशिरा देवानां पुरोहितः प्रत्यक्षं देवेभ्यो भागमदात् परोक्षमस्माकं ततो देवा वर्धन्ते वयं क्षीयामस्तदेनं त्वं वारयितुमर्हसि तथा यथास्मान् भजेदिति ॥ २ ९ ॥ कुछ कालके अनन्तर हिरण्यकशिपुको आगे करके सब असुर विश्वरूपकी माताके पास गये और उनसे वर माँगने लगे — ' बहिन! यह तुम्हारा पुत्र विश्वरूप, जिसके तीन सिर हैं, देवताओंका पुरोहित बना हुआ है । यह देवताओंको तो प्रत्यक्ष भाग देता है और हमलोगोंको परोक्षरूपसे भाग समर्पित करता है । इससे देवता तो बढ़ते हैं और हमलोग निरन्तर क्षीण होते चले जा रहे हैं । तुम इसे मना कर दो, जिससे यह देवताओंको छोड़कर हमारा पक्ष ग्रहण करे ' ॥ २ ९ ॥ अथ विश्वरूपं नन्दनवनमुपगतं मातोवाच पुत्र किं परपक्षवर्धनस्त्वं मातुलपक्षं नाशयसि नार्हस्येवं कर्तुमिति स विश्वरूपो मातुर्वाक्यमनतिक्रमणीयमिति मत्वा सम्पूज्य हिरण्यकशिपुमगात् ॥ ३० ॥

तब एक दिन माताने नन्दनवनमें गये हुए विश्वरूपसे कहा- ' बेटा! क्यों तुम दूसरे पक्षकी वृद्धि करते हुए मामाके पक्षका नाश कर रहे हो? तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये । ' विश्वरूपने माताकी आज्ञाको अलंघनीय मानकर उसका सम्मान करके विदा कर दिया और वे स्वयं हिरण्यकशिपुके पास चले गये ॥ ३० ॥

हैरण्यगर्भाच्च वसिष्ठाद्धिरण्यकशिपुः शापं प्राप्तवान् यस्मात् त्वयान्यो वृतो होता -तस्मादसमाप्त यज्ञस्त्वमपूर्वात् सत्त्वजाताद् वधं प्राप्स्यसीतितच्छापदानाद्धिरण्यकशिपुः प्राप्तवान् वधम् ॥ ३१ ॥

( हिरण्यकशिपुने उन्हें अपना होता बना लिया) इधर ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठकी ओरसे हिरण्यकशिपुको शाप प्राप्त हुआ— 'तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरा होता चुन लिया है; इसलिये इस यज्ञकी समाप्ति होनेसे पहले ही किसी अभूतपूर्व प्राणीके हाथसे तुम्हारा वध हो जायगा। ' वसिष्ठजीके वैसा शाप देनेसे हिरण्यकशिपु वधको प्राप्त हुआ ॥ ३१ ॥

अथ विश्वरूपो मातृपक्षवर्धनोऽत्यर्थं तपस्य भवत् तस्य व्रतभङ्गार्थमिन्द्रो बह्वीः श्रीमत्योऽप्सरसो नियुयोज ताश्च दृष्ट्वा मनः क्षुभितं तस्याभवत् तासु चाप्सरःसु नचिरादेव सक्तोऽभवत् सक्तं चैनं ज्ञात्वा अप्सरस ऊचुर्गच्छामहे वयं यथागतमिति ॥ ३२ ॥

तदनन्तर विश्वरूप मातृपक्षकी वृद्धि करनेके लिये बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये । यह देख उनके व्रतको भंग करनेके लिये इन्द्रने बहुत- सी सुन्दरी अप्सराओंको नियुक्त कर दिया । उन अप्सराओंको देखते ही विश्वरूपका मन चंचल हो गया और वे तुरंत ही उनमें आसक्त हो गये । उन्हें आसक्त जानकर अप्सराओंने कहा —– ' अब हमलोग जहाँसे आयी हैं, वहीं जा रही हैं ' ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 2324

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तास्त्वाष्ट्र उवाच क्व गमिष्यथास्यतां तावन्मया सह श्रेयो भविष्यन्तीति तास्तमब्रुवन् वयं देवस्त्रियोऽप्सरस इन्द्रं देवं वरदं पुरा प्रभविष्णुं वृणीमह इति ॥ ३३ ॥

तब त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपने उनसे कहा — ' कहाँ जाओगी? अभी यहीं मेरे साथ रहो । इससे तुम्हारा भला होगा। ' यह सुनकर वे अप्सराएँ बोलीं- ' हम सब देवांगना – अप्सराएँ हैं । हमने पहलेसे ही वरदायक देवता प्रभावशाली इन्द्रका वरण कर लिया है' ॥ ३३ ॥

अथ ता विश्वरूपोऽब्रवीदद्यैव सेन्द्रा देवा न भविष्यन्तीति ततो मन्त्रान् जजाप तैर्मन्त्रैरवर्धत त्रिशिरा एकेनास्येन सर्वलोकेषु यथावद् द्विजैः क्रियावद्भियज्ञेषु सुहुतं सोमं पपावेकेनान्नमेकेन सेन्द्रान् देवानथेन्द्रस्तं विवर्धमानं सोमपानाप्यायितसर्वगात्रं दृष्ट्वा चिन्तामापेदे सह देवैः ॥ ३४ ॥

तब विश्वरूपने उनसे कहा- ' आज ही इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका अभाव हो जायगा । ' ऐसा कहकर वे मन्त्रोंका जप करने लगे । उन मन्त्रोंसे उनकी शक्ति बहुत बढ़ गयी । तीन सिरोंवाले विश्वरूप अपने एक मुखसे सारे संसारके क्रियानिष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा विधिपूर्वक यज्ञोंमें होमे गये सोमरसको पी लेते थे, दूसरेसे अन्न खाते थे और तीसरेसे इन्द्र आदि देवताओंके तेजको पी लेते थे । इन्द्रने देखा, विश्वरूपका सारा शरीर सोमपानसे परिपुष्ट हो रहा है । यह देखकर देवताओंसहित इन्द्रको बड़ी चिन्ता हुई ॥ ३४ ॥

ते देवाः सेन्द्रा ब्रह्माणमभिजग्मुस्त ऊचुर्विश्वरूपेण सर्वयज्ञेषु सुहुतः सोमः पीयते वयमभागाः संवृत्ता असुरपक्षो वर्धते वयं क्षीयामस्तदर्हसि नो विधातुं श्रेयोऽनन्तरमिति ॥ ३५ ॥

तदनन्तर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता ब्रह्माजीके पास गये और इस प्रकार बोले —‘भगवन्! विश्वरूप सम्पूर्ण यज्ञोंमें विधिपूर्वक होमे गये सोमरसको पी लेते हैं । हम यज्ञभागसे वंचित हो गये । असुरपक्ष बढ़ रहा है और हमलोग क्षीण होते जा रहे हैं; अतः आपको अब हमलोगोंका कल्याण साधन करना चाहिये ' ॥ ३५ ॥

तान् ब्रह्मोवाच ऋषिर्भार्गवस्तपस्तप्यते दधीचः स याच्यतां वरं स यथा कलेवरं जह्यात् तथा विधीयतां तस्यास्थिभिर्वज्रं क्रियतामिति ॥ ३६ ॥

तब ब्रह्माजीने उन देवताओंसे कहा-' भृगुवंशी दधीचि ऋषि तपस्या करते हैं । उनके पास जाकर ऐसा वर माँगो, जिससे वे अपने शरीरको त्याग दें । फिर उन्हींकी हड्डियोंसे वज्र नामक अस्त्रका निर्माण करो ' ॥ ततो देवास्तत्रागच्छन् यत्र दधीचो भगवानृषिस्तपस्तेपे सेन्द्रा देवास्तं तथाभिगम्यो - चुर्भगवंस्तपः सुकुशलमभिन्नं चेति ॥ ३७ ॥

तब देवता वहाँ गये, जहाँ भगवान् दधीचि ऋषि तपस्या करते थे । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उनके निकट जाकर इस प्रकार बोले — ' भगवन्! आपकी तपस्या सकुशल चल रही है न? उसमें कोई बाधा तो नहीं आती है? ' ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 2325

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तान् दधीच उवाच स्वागतं भवद्भय उच्यतां किं क्रियतामिति यद् वक्ष्यथ तत् करिष्यामि || ३८ ॥ दधीचिने इन देवताओंसे कहा - ' आपलोगोंका स्वागत है । बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आप जो कहेंगे, वही करूँगा' ॥ ३८ ॥

ते तमब्रुवन् शरीरपरित्यागं लोकहितार्थं भगवान् कर्तुमर्हतीति ॥ ३ ९ ॥ देवता बोले — ' भगवन्! आप लोकहितके लिये अपने शरीरका परित्याग कर दें' ॥ ३ ९ ॥ अथ दधीचस्तथैवाविमनाः सुखदुःखसमो महायोगी आत्मानं समाधाय शरीरपरित्यागं चकार ॥ ४० ॥

यह सुनकर दधीचिके मनमें पूर्ववत् सोत्साह बना रहा, तनिक भी उदासी नहीं हुई । वे सुख और दुःखमें समान भाव रखनेवाले महान् योगी थे । उन्होंने आत्माको परमात्मामें लगाकर अपने शरीरका परित्याग कर दिया ॥ ४० ॥

तस्य परमात्मन्यपसृते तान्यस्थीनि धाता संगृह्य वज्रमकरोत् तेन वज्रेणाभेद्येनाप्रधृष्येण ब्रह्मास्थिसम्भूतेन विष्णुप्रविष्टेनेन्द्रो विश्वरूपं जघान शिरसां चास्य च्छेदनमकरोत् तस्मादनन्तरं विश्वरूपगात्रमथनसम्भवं त्वष्ट्रोत्पादितमेवारिं वृत्रमिन्द्रो जघान ॥ ४१ ॥

उनके परमात्मामें लीन हो जानेपर उनकी उन अस्थियोंका संग्रह करके धाताने वज्रास्त्रका निर्माण किया । ब्राह्मणकी हड्डीसे बने हुए उस अभेद्य एवं दुर्जय वज्रसे, जिसमें भगवान् विष्णु प्रविष्ट हुए थे, इन्द्रने विश्वरूपका वध कर डाला और उनके तीनों सिरोंको काट दिया । तदनन्तर त्वष्टा प्रजापतिने विश्वरूपके शरीरका मन्थन करके जिसे उत्पन्न किया था, उस अपने वैरी वृत्रासुरका भी इन्द्रने उसी वज्रसे संहार कर डाला ॥ ४१ ॥

तस्यां द्वैधीभूतायां ब्रह्मवध्यायां भयादिन्द्रो देवराज्यं पर्यत्यजदप्सु सम्भवां च शीतलां मानससरोगतां नलिनीं प्रतिपेदे तत्र चैश्वर्ययोगादणुमात्रो भूत्वा बिसग्रन्थिं प्रविवेश ॥ ४२ ॥

अब इन्द्रके पास दोहरी ब्रह्महत्या उपस्थित हुई । उसके भयसे इन्द्रने देवराजपदका परित्याग कर दिया और मानसरोवरके जलमें उत्पन्न हुई एक शीतल कमलिनीके पास जा पहुँचे । वहाँ अणिमा आदि ऐश्वर्यके योगसे इन्द्र अणुमात्र रूप धारण करके कमलनालकी ग्रन्थिमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४२ ॥

अथ ब्रह्मवध्याभयप्रणष्टे त्रैलोक्यनाथे शचीपतौ जगदनीश्वरं बभूव देवान् रजस्तमश्चाविवेश मन्त्रा न प्रावर्तन्त महर्षीणां रक्षांसि प्रादुरभवन् ब्रह्म चोत्सादनं जगामानिन्द्राश्चाबला लोकाः सुप्रधृष्या बभूवुः ॥ ४३ ॥

ब्रह्महत्याके भयसे त्रिलोकीनाथ शचीपति इन्द्रके भागकर अदृश्य हो जानेपर इस जगत्का कोई ईश्वर नहीं रहा । देवताओंमें रजोगुण और तमोगुणका आवेश हो गया ।

पृष्ठ 2326

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महर्षियोंके मन्त्र अब कुछ काम नहीं दे रहे थे । राक्षस बढ़ गये । वेदोंका स्वाध्याय बंद हो गया । तीनों लोक इन्द्रसे अरक्षित होनेके कारण निर्बल एवं सुगमतासे जीत लेने योग्य हो गये ॥ ४३ ॥

अथ देवा ऋषयश्चायुषः पुत्रं नहुषं नाम देवराज्येऽभिषिषिचुर्नहुषः पञ्चभिः शतैज्र्ज्योतिषां ललाटे ज्वलद्भिः सर्वतेजोहरैस्त्रिविष्टपं पालयांबभूव ॥ ४४ ॥

तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंने आयुके पुत्र नहुषको देवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया । नहुषके ललाटमें समस्त प्राणियोंके तेजको हर लेनेवाली पाँच सौ प्रज्वलित ज्योतियाँ जगमगाती रहती थीं । उनके द्वारा वे स्वर्गके राज्यका पालन करने लगे ॥ ४४ ॥

अथ लोकाः प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्च हृष्टाश्च बभूवुः ॥ ४५ ॥

ऐसा होनेपर सब लोग स्वाभाविक स्थितिमें आ गये । सभी स्वस्थ एवं प्रसन्न हो गये ॥ ४५ ॥

अथोवाच नहुषः सर्वं मां शक्रोपभुक्तमुपस्थितमृते शचीमिति स एवमुक्त्वा शचीसमीपमगमदुवाचैनां सुभगेऽहमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति तं शची प्रत्युवाच प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सलः सोमवंशोद्भवश्च नार्हसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति ॥ ४६ ॥

कुछ कालके पश्चात् नहुषने देवताओंसे कहा -' इन्द्रके उपभोगमें आनेवाली अन्य सारी वस्तुएँ तो मेरी सेवामें उपस्थित हैं । केवल शची मुझे नहीं मिली हैं । ' ऐसा कहकर वे शचीके पास गये और उनसे बोले – ' सौभाग्यशालिनि! मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ। मेरी सेवा स्वीकार करो । ' शचीने उत्तर दिया- ' महाराज! आप स्वभावसे ही धर्मवत्सल और चन्द्रवंशके रत्न हैं । आपको परायी स्त्रीपर बलात्कार नहीं करना चाहिये ' ॥ ४६ ॥

तामथोवाच नहुष ऐन्द्रं पदमध्यास्यते मया - ऽहमिन्द्रस्य राज्यरत्नहरो नात्राधर्मः कश्चित् त्वमिन्द्रोप - भुक्तेति सा तमुवाचास्ति मम किंचिद् व्रतमपर्यवसितं तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति स शच्येवमभिहितो जगाम ॥ ४७ ॥

तब नहुषने शचीसे कहा -' देवि! इस समय मैं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हूँ । इन्द्रके राज्य और रत्न दोनोंका अधिकारी हो गया हूँ; अतः तुम्हारे साथ समागम करनेमें कोई अधर्म नहीं है; क्योंकि तुम इन्द्रके उपभोगमें आयी हुई वस्तु हो । ' यह सुनकर शचीने कहा – ' महाराज! मैंने एक व्रत ले रखा है । वह अभी समाप्त नहीं हुआ है । उसकी समाप्ति हो जानेपर कुछ ही दिनोंमें मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी । ' शचीके ऐसा कहनेपर नहुष चले गये ॥ ४७ ॥

अथ शची दुःखशोकार्ता भर्तृदर्शनलालसा नहुष- भयगृहीता बृहस्पतिमुपागच्छत् स च तामत्युद्विग्नां दृष्ट्वैव ध्यानं प्रविश्य भर्तृकार्यतत्परां ज्ञात्वा बृहस्पति-रुवाचानेनैव व्रतेन तपसा चान्विता देवीं वरदामुप श्रुतिमाह्वय तदा सा ते इन्द्रं दर्शयिष्यतीति साऽथ महानियमस्थिता देवीं वरदामुपश्रुतिं मन्त्रैराह्वयति सोपश्रुतिः शचीसमीपमगादुवाच चैनामियमस्मीति त्वयाऽऽहूतोपस्थिता किं ते प्रियं करवाणीति

पृष्ठ 2327

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तां मूर्ध्ना प्रणम्योवाच शची भगवत्यर्हसि मे भर्तारं दर्शयितुं त्वं सत्या ऋता चेति सैनां मानसं सरोऽनयत् तत्रेन्द्रं बिसग्रन्थिगतमदर्शयत् ॥ ४८ ॥

इसके बाद नहुषके भयसे डरी हुई शची दुःख - शोकसे आतुर तथा पतिके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो बृहस्पतिजीके पास गयीं । उन्हें अत्यन्त उद्विग्न देख बृहस्पतिजीने ध्यानस्थ होकर यह जान लिया कि यह अपने स्वामीके कार्यसाधनमें लगी हुई है । तब उन्होंने शचीसे कहा — ‘ देवि! इसी व्रत और तपस्यासे सम्पन्न हो तुम वरदायिनी देवी उपश्रुतिका आवाहन करो, तब वह तुम्हें इन्द्रका दर्शन करायेगी । ' गुरुका यह आदेश पाकर महान् नियममें तत्पर हुई शचीने मन्त्रोंद्वारा वरदायिनी देवी उपश्रुतिका आह्वान किया, तब उपश्रुतिदेवी शचीके -समीप आयीं और उनसे इस प्रकार बोलीं – ' इन्द्राणी! यह मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूँ । तुमने बुलाया और मैं तत्काल उपस्थित हो गयी । बोलो, मैं तुम्हारा कौन- सा प्रिय कार्य करूँ? ' शचीने देवीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कहा -' भगवति! आप मुझे मेरे पतिदेवके दर्शन करानेकी कृपा करें । आप ही ऋत और सत्य हैं। ' उपश्रुति शचीको मानसरोवरपर ले गयीं । वहाँ उसने मृणालकी ग्रन्थियोंमें छिपे हुए इन्द्रका उन्हें दर्शन करा दिया ॥ ४८ ॥

तामथ पत्नीं कृशां ग्लानां चेन्द्रो दृष्ट्वा चिन्तया- म्बभूव अहो मम दुःखमिदमुपगतं नष्टं हि मामिय-मन्विष्य यत्यत्न्यभ्यगमद् दुःखार्तेति तामिन्द्र उवाच कथं वर्तयसीति सा तमुवाच नहुषो मामाह्वयति पत्नीं कर्तुं कालश्चास्य मया कृत इति तामिन्द्र उवाच गच्छ नहुषस्त्वया वाच्योऽपूर्वेण मामृषियुक्तेन यानेन त्वमधिरूढ उद्वहस्वेति इन्द्रस्य महान्ति वाहनानि सन्ति मनःप्रियाण्यधिरूढानि मया त्वमन्येनोपयातुमर्हसीति सैवमुक्ता हृष्टा जगामेन्द्रोऽपि बिसग्रन्थिमेवाविवेश भूयः ॥ ४ ९ ॥ अपनी पत्नी शचीको दुर्बल और दुखी देख इन्द्र मन-ही-मन कहने लगे–' अहो! यह बड़े दुःखकी बात है कि मैं यहाँ छिपा हुआ बैठा हूँ और मेरी यह पत्नी दुःखसे आतुर हो मुझे ढूँढ़ती हुई यहाँतक आयी है । ' इस प्रकार खेद प्रकट करके इन्द्रने अपनी पत्नीसे कहा - ' देवि! कैसे दिन बिता रही हो? ' शची बोली- ' प्राणनाथ! राजा नहुष इन्द्र बना बैठा है और मुझे अपनी पत्नी बनानेके लिये बुला रहा है । इसके लिये मुझे कुछ ही दिनोंका समय मिला है और मैंने नियत समयके बाद उसकी बात माननेका वचन दे दिया है । ' ‘ तब इन्द्रने उनसे कहा ‘ जाओ और नहुषसे इस प्रकार कहो —'राजन्! आप ऋषियोंसे जुते हुए अपूर्व वाहनपर आरूढ़ होकर आइये और मुझे अपनी सेवामें ले चलिये । इन्द्रके पास मनको प्रिय लगनेवाले बड़े - बड़े वाहन हैं, किंतु उन सबपर मैं आरूढ़ हो चुकी हूँ, अतः आप उन सबसे भिन्न किसी और ही विलक्षण वाहनसे मेरे पास आइये । ' इन्द्रके इस प्रकार सुझाव देनेपर शची हर्षपूर्वक लौट गयीं और इन्द्र भी पुनः उस कमलनालकी ग्रन्थिमें ही प्रविष्ट हो गये ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 2328

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2328 का मूल पृष्ठ
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अथेन्द्राणीमभ्यागतां दृष्ट्वा तामुवाच नहुषः पूर्णः स काल इति तं यथोक्तं शच्यब्रवीच्छक्रेण स महर्षियुक्तं वाहनमधिरूढः शचीसमीपमुपागच्छत् ॥ ५० ॥

इन्द्राणीको आयी हुई देख नहुषने उससे कहा – ' देवि! तुमने जो समय दिया था, वह पूरा हो गया है। ' तब शचीने इन्द्रके बताये अनुसार सारी बातें कह सुनायीं । नहुष महर्षियोंसे जुते हुए वाहनपर आरूढ़ हो शचीके समीप चले ॥ ५० ॥

अथ मैत्रावरुणिः कुम्भयोनिरगस्त्य ऋषिवरो महर्षीन् धिक्क्रियमाणांस्तान् नहुषेणापश्यत् पद्भयां च तेनास्पृश्यत ततः स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीं सर्पो भव यावद्भूमिर्गिरयश्च तिष्ठेयुस्तावदिति स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद् यानादवापतत् ॥ ५१ ॥

इसी समय मित्रावरुणके पुत्र कुम्भज मुनिवर अगस्त्यने देखा कि नहुष महर्षियोंको तीव्र गतिसे चलनेके लिये धिक्कार और फटकार रहा है । उसने अगस्त्यके शरीरमें भी दोनों पैरोंसे धक्के दिये । तब अगस्त्यने नहुषसे कहा– ' न करने योग्य नीच कर्ममें प्रवृत्त हुए पापी नहुष! तू अभी पृथ्वीपर गिर जा तथा जबतक पृथ्वी और पर्वत स्थिर रहें, तबतकके लिये सर्प हो जा । ' महर्षिके इतना कहते ही नहुष उस वाहनसे नीचे गिर पड़ा ॥ ५१ अथानिन्द्रं पुनस्त्रैलोक्यमभवत् ततो देवा ऋषयश्च भगवन्तं विष्णुं शरणमिन्द्रार्थेऽभिजग्मुरूचुश्चैनं भगवन्निन्द्रं ब्रह्महत्याभिभूतं त्रातुमर्हसीति ततः स वरदस्तानब्रवीदश्वमेधं यज्ञं वैष्णवं शक्रोऽभियजतां ततः स्वस्थानं प्राप्स्यतीति ततो देवा ऋषयश्चेन्द्रं नापश्यन् यदा तदा शचीमूचुर्गच्छ सुभगे इन्द्रमानयस्वेति सा पुनस्तत्सरः समभ्यगच्छदिन्द्रश्च तस्मात् सरसः प्रत्युत्थाय बृहस्पतिमभिजगाम बृहस्पतिश्चाश्वमेधं महाक्रतुं शक्रायाहरत् तत्र कृष्णसारङ्गं मेध्यमश्वमुत्सृज्य वाहनं तमेव कृत्वा इन्द्रं मरुत्पतिं बृहस्पतिः स्वं स्थानं प्रापयामास ॥ ५२ ॥

नहुषका पतन हो जानेपर त्रिलोकीका राज्य पुनः बिना इन्द्रके हो गया, तब देवता और ऋषि इन्द्रके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उनसे बोले – ' भगवन्! ब्रह्महत्यासे पीड़ित हुए इन्द्रकी रक्षा कीजिये ' तब वरदायक भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे कहा — ' देवगण! इन्द्र विष्णुके उद्देश्यसे अश्वमेध यज्ञ करें । तब वे फिर अपना स्थान प्राप्त करेंगे । ' यह सुनकर देवता और महर्षि इन्द्रको ढूँढ़ने लगे । जब वे कहीं उनका पता न पा सके, तब वे शचीसे बोले – ' सुभगे! तुम्हीं जाओ और इन्द्रको यहाँ ले आओ । ' तब शची पुनः मानसरोवरपर गयीं । शचीके कहनेसे इन्द्र उस सरोवरसे निकलकर बृहस्पतिजीके पास आये । बृहस्पतिजीने इन्द्रके लिये अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया । उस यज्ञमें उन्होंने कृष्णसारंग नामक यज्ञिय अश्वको छोड़ा था । उसीको वाहन बनाकर बृहस्पतिने पुनः देवराज इन्द्रको अपने पदपर प्रतिष्ठित किया ॥ ५२ ॥

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ततः स देवराड् देवैर्ऋषिभिः स्तूयमानस्त्रिविष्ट- पस्थो निष्कल्मषो बभूव ह ब्रह्मवध्यां चतुर्षु स्थानेषु वनिताग्निवनस्पतिगोषु व्यभजदेवमिन्द्रो ब्रह्मतेजः-प्रभावोपबृंहितः शत्रुवधं कृत्वा स्वं स्थानं प्रापितः ॥ ५३ ॥

तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए देवराज इन्द्र निष्पाप हो स्वर्गलोकमें रहने लगे । अपनी ब्रह्महत्याको उन्होंने स्त्री, अग्नि, वृक्ष और गौ – इन चार स्थानोंमें विभक्त कर दिया । ब्रह्मतेजके प्रभावसे वृद्धिको प्राप्त हुए इन्द्रने शत्रुओंका वध करके पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लिया ॥ ५३ ॥

( नहुषस्य शापमोक्षनिमित्तं देवैर्ऋषिभिश्च याच्यमानोऽगस्त्यः प्राह । यावत् स्वकुलजः श्रीमान् धर्मराजो युधिष्ठिरः । कथयित्वा स्वकान् प्रश्नान् भीमं तं च विमोक्ष्यते ॥ ) उधर नहुषको शापसे छुटकारा दिलानेके लिये देवताओं और ऋषियोंके प्रार्थना करनेपर अगस्त्यने कहा- 'जब नहुषके कुलमें उत्पन्न हुए श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर उनके प्रश्नोंका उत्तर देकर भीमसेनको उनके बन्धनसे छुड़ा देंगे, तब नहुषको भी वे शापसे मुक्त कर देंगे ' ॥ आकाशगङ्गागतश्च पुरा भरद्वाजो महर्षिरुपास्पृशत् त्रीन् क्रमान् क्रमता विष्णुनाभ्यासादितः स भरद्वाजेन ससलिलेन पाणिनोरसि ताडितः सलक्षणोरस्कः संवृत्तः ॥ ५४ ॥

प्राचीन कालमें महर्षि भरद्वाज आकाश गंगाके जलमें खड़े हो आचमन कर रहे थे । उस समय तीन पगसे त्रिलोकीको नापते हुए भगवान् विष्णु उनके पासतक आ पहुँचे । तब भरद्वाजने जलसहित हाथसे उनकी छातीमें प्रहार किया । इससे उनकी छातीमें एक चिह्न बन गया ॥ ५४ ॥

भृगुणा महर्षिणा शप्तोऽग्निः सर्वभक्षत्वमुपानीतः ॥ ५५ ॥

महर्षि भृगुके शापसे अग्निदेव सर्वभक्षी हो गये ॥ ५५ ॥

अदितिर्वै देवानामन्नमपचदेतद् भुक्त्वासुरान् हनिष्यन्तीति तत्र बुधो व्रतचर्यासमाप्तावागच्छददितिं चावोचद् भिक्षां देहीति तत्र देवैः पूर्वमेतत् प्राश्यं नान्येनेत्यदितिर्भिक्षां नादादथ भिक्षाप्रत्याख्यान - रुषितेन बुधेन ब्रह्मभूतेनादितिः शप्ता अदितेरुदरे भविष्यति व्यथा विवस्वतो द्वितीयजन्मन्यण्डसंज्ञितस्य अण्डं मातुरदित्या मारितं स मार्तण्डो विवस्वानभवच्छ्राद्धदेवः ॥ ५६ ॥

अदितिने देवताओंके लिये इस उद्देश्यसे रसोई तैयार की थी कि वे इसे खाकर असुरोंका वध कर सकेंगे । इसी समय बुध अपनी व्रतचर्या समाप्त करके अदितिके पास गये और बोले — ' मुझे भिक्षा दीजिये । ' अदितिने सोचा यह अन्न पहले देवताओंको ही खाना चाहिये, दूसरे किसीको नहीं; इसलिये उन्होंने बुधको भिक्षा नहीं दी । भिक्षा न मिलनेसे रोषमें भरे हुए ब्राह्मण बुधने अदितिको यह शाप दिया कि ' अण्ड नामधारी विवस्वान्के

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दूसरे जन्मके समय अदितिके उदरमें पीड़ा होगी । ' माता अदितिके पेटका वह अण्ड उस पीड़ाद्वारा मारा गया । मृत अण्डसे प्रकट होनेके कारण श्राद्धदेवसंज्ञक विवस्वान् मार्तण्ड नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ५६ ॥

दक्षस्य या वै दुहितरः षष्टिरासंस्ताभ्यः कश्यपाय त्रयोदश प्रादाद् दश धर्माय दश मनवे सप्तविंशतिमिन्दवे तासु तुल्यासु नक्षत्राख्यां गतासु सोमो रोहिण्यामभ्यधिकं प्रीतिमानभूत् ततस्ताः शिष्टाः पत्न्य ईर्ष्यावत्यः पितुः समीपं गत्वेममर्थं शशंसुर्भगवन्नस्मासु तुल्यप्रभावासु सोमो रोहिणीं प्रत्यधिकं भजतीति सोऽब्रवीद् यक्ष्मैनमाविश्येतेति दक्षशापात् सोमं राजानं यक्ष्मा विवेश स यक्ष्मणाऽऽविष्टो दक्षमगाद् दक्षश्चैनमब्रवीन्न समं वर्तयसीति तत्रर्षयः सोममब्रुवन् क्षीयसे यक्ष्मणा पश्चिमायां दिशि समुद्रे हिरण्यसरस्तीर्थं तत्र गत्वा आत्मानमभिषेचयस्वेत्यथागच्छत् सोमस्तत्र हिरण्यसरस्तीर्थं गत्वा चात्मनः सेचनमकरोत् स्नात्वा चात्मानं पाप्मनो मोक्षयामास तत्र चावभासितस्तीर्थे यदा सोमस्तदा प्रभृति च तीर्थं तत् प्रभासमिति नाम्ना ख्यातं बभूव ॥ ५७ ॥

प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ थीं । उनमेंसे तेरहका विवाह उन्होंने कश्यपजीके साथ कर दिया । दस कन्याएँ धर्मको, दस मनुको और सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको दे डालीं । उन सत्ताईस कन्याओंकी नक्षत्र नामसे प्रसिद्धि हुई । यद्यपि वे सब की सब एक समान रूपवती थीं तो भी चन्द्रमा सबसे अधिक रोहिणीपर ही प्रेम करने लगे । यह देख शेष पत्नियोंके मनमें ईर्ष्या हुई और उन्होंने पिताके समीप जाकर यह बात बतायी — ' भगवन्! हम सब बहिनोंका प्रभाव एक- सा है तो भी चन्द्रदेव रोहिणीपर ही अधिक स्नेह रखते हैं । ' यह सुनकर दक्षने कहा – ' इनके भीतर यक्ष्माका प्रवेश होगा । ' इस प्रकार ब्राह्मण दक्षके शापसे राजा सोमके शरीरमें यक्ष्माने प्रवेश किया । यक्ष्मासे ग्रस्त होकर राजा सोम प्रजापति दक्षके पास गये । रोषका कारण पूछनेपर दक्षने उनसे कहा – ' तुम अपनी सभी पत्नियोंके प्रति समान बर्ताव नहीं करते हो, उसीका यह दण्ड है । ' वहाँ दूसरे ऋषियोंने सोमसे कहा — ' तुम यक्ष्मासे क्षीण होते चले जा रहे हो । अतः पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर जो हिरण्यसर नामक तीर्थ है, वहाँ जाकर अपने - आपको स्नान कराओ । ' तब सोमने हिरण्यसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान किया । स्नान करके उन्होंने अपने - आपको पापसे छुड़ाया । उस तीर्थमें वे दिव्य प्रभासे प्रभासित हो उठे थे, इसलिये उसी समयसे वह स्थान प्रभासतीर्थके नामसे विख्यात हो गया ॥ ५७ ॥

तच्छापादद्यापि क्षीयते सोमोऽमावास्यान्तरस्थः पौर्णमासीमात्रेऽधिष्ठितो शशलक्ष्ममेघलेखाप्रतिच्छन्नं वपुर्दर्शयति मेघसदृशं वर्णमगमत् तदस्य विमलमभवत् ॥ ५८ ॥

उसी शापसे आज भी चन्द्रमा कृष्णपक्षमें अमावास्यातक क्षीण होता रहता है और शुक्लपक्षमें पूर्णिमातक उसकी वृद्धि होती रहती है । उसका मण्डलाकार स्वरूप मेघकी