05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 261–270

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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राजन्! वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुए वे पाँचों भाई रथपर बैठकर मूर्तिमान् पाँच महाभूतोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३७ ॥

आस्थाय तु रथं शुभ्रं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।

अन्वयात् पृष्ठतो राजन् युयुत्सुः पाण्डवाग्रजम् ॥ ३८ ॥

नरेश्वर! मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए शुभ्र रथपर आरूढ़ हो युयुत्सु ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके पीछे - पीछे चले ॥ ३८ ॥

रथं हेममयं शुभ्रं शैब्यसुग्रीवयोजितम् ।

सह सात्यकिना कृष्णः समास्थायान्वयात् कुरून् ॥ ३ ९ ॥

शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए सुन्दर सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सात्यकिसहित श्रीकृष्ण भी कौरवोंके पीछे - पीछे गये ॥ ३ ९ ॥

नरयानेन तु ज्येष्ठः पिता पार्थस्य भारत ।

अग्रतो धर्मराजस्य गान्धारीसहितो ययौ ॥ ४० ॥

भरतनन्दन! कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरके ज्येष्ठ पिता ( ताऊ) गान्धारीसहित पालकीमें बैठकर उनके आगे - आगे जा रहे थे ॥ ४० ॥

कुरुस्त्रियश्च ताः सर्वाः कुन्ती कृष्णा तथैव च ।

यानैरुच्चावचैर्जग्मुर्विदुरेण पुरस्कृताः ॥ ४१ ॥

इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुलकी वे सभी स्त्रियाँ यथायोग्य भिन्न-भिन्न सवारियोंपर चढ़कर चल रही थीं । इनके पीछे विदुरजी थे, जो इन सबकी देखभाल करते थे ॥ ४१ ॥

ततो रथाश्च बहुला नागाश्वसमलंकृताः ।

पादाताश्च हयाश्चैव पृष्ठतः समनुव्रजन् ॥ ४२ ॥

तदनन्तर इन सबके पीछे हाथी और घोड़ोंसे विभूषित बहुतसे रथी, पैदल और घुड़सवार सैनिक चल रहे थे ॥ ४२ ॥

ततो वैतालिकैः सूतैर्मागधैश्च सुभाषितैः ।

स्तूयमानो ययौ राजा नगरं नागसाह्वयम् ॥ ४३ ॥

इस प्रकार वैतालिकों, सूतों और मागधोंद्वारा सुन्दर वाणीमें अपनी स्तुति सुनते हुए राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया ॥ ४३ ॥

तत् प्रयाणं महाबाहोर्बभूवाप्रतिमं भुवि ।

आकुलाकुलमुत्क्रुष्टं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४४ ॥

महाबाहु युधिष्ठिरकी यह सामूहिक यात्रा (जुलूस) इस भूतलपर अनुपम थी । उसमें हृष्ट - पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे । भीड़ - पर- भीड़ बढ़ती चली जाती थी और बड़े जोरसे जयघोष एवं कोलाहल हो रहा था ॥ ४४ ॥

अभियाने तु पार्थस्य नरैर्नगरवासिभिः ।

पृष्ठ 262

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नगरं राजमार्गाश्च यथावत्समलङ्कृताः ॥ ४५ ॥

राजा युधिष्ठिरकी इस यात्राके समय नगरनिवासी मनुष्योंने समूचे नगर तथा वहाँकी सड़कोंको अच्छी तरहसे सजा दिया था ॥ ४५ ॥

पाण्डुरेण च माल्येन पताकाभिश्च मेदिनी ।

संस्कृतो राजमार्गोऽभूद्धूपनैश्च प्रधूपितः ॥ ४६ ॥

सफेद मालाओं तथा पताकाओंसे नगरभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी । राजमार्गको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था और धूपोंकी सुगन्ध फैलायी गयी थी ॥ ४६ ॥

अथ चूर्णैश्च गन्धानां नानापुष्पप्रियङ्गुभिः ।

माल्यदामभिरासक्तै राजवेश्माभिसंवृतम् ॥ ४७ ॥

राजमहलके आस - पास चारों ओर सुगन्धित चूर्ण बिखेरे गये थे, नाना प्रकारके फूलों, बेलों और पुष्पहारोंकी बन्दनवारोंसे उसे अच्छी तरह सुसज्जित किया गया था ॥ ४७ ॥

कुम्भाश्च नगरद्वारि वारिपूर्णा नवा दृढाः ।

सिताः सुमनसो गौराः स्थापितास्तत्र तत्र ह ॥ ४८ ॥

नगरके द्वारपर जलसे भरे हुए नूतन एवं सुदृढ़ कलश रखे गये थे और जगह - जगह सफेद फूलोंके गुच्छे रख दिये गये थे ॥ ४८ ॥

तथा स्वलंकृतद्वारं नगरं पाण्डुनन्दनः ।

स्तूयमानः शुभैर्वाक्यैः प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥ ४ ९ ॥

अपने सुहृदोंसे घिरे हुए पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार सजे सजाये द्वारवाले नगर —हस्तिनापुरमें प्रवेश किया। उस समय सुन्दर वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरप्रवेशे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका नगरप्रवेशविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

Face

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः नगर - प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा वध वैशम्पायन उवाच

प्रवेशने तु पार्थानां जनानां पुरवासिनाम् ।

दिदृक्षूणां सहस्राणि समाजग्मुः सहस्रशः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुन्ती- पुत्रोंके हस्तिनापुरमें प्रवेश करते समय उन्हें देखनेके लिये दस लाख नगरनिवासी सड़कोंपर एकत्र हो गये ॥ १ ॥

स राजमार्गः शुशुभे समलंकृतचत्वरः ।

यथा चन्द्रोदये राजन् वर्धमानो महोदधिः ॥ २ ॥

राजन्! जैसे चन्द्रोदय होनेपर महासागर उमड़ने लगता है, उसी प्रकार जिसके चौराहे खूब सजाये गये थे, वह राजमार्ग मनुष्योंकी उमड़ती हुई भीड़से बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २ ॥

गृहाणि राजमार्गेषु रत्नवन्ति महान्ति च ।

प्राकम्पन्तेव भारेण स्त्रीणां पूर्णानि भारत ॥ ३ ॥

भरतनन्दन! सड़कोंके आस- पास जो रत्नविभूषित विशाल भवन थे, वे स्त्रियोंसे भरे होने के कारण उनके भारी भारसे काँपते हुए - से जान पड़ते थे ॥ ३ ॥

ताः शनैरिव सव्रीडं प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् ।

भीमसेनार्जुनौ चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ४ ॥

वे नारियाँ लजाती हुई- सी धीरे- धीरे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा पाण्डुपुत्र माद्रीकुमार नकुल सहदेवकी प्रशंसा करने लगीं ॥ ४ ॥

धन्या त्वमसि पाञ्चालि या त्वं पुरुषसत्तमान् ।

उपतिष्ठसि कल्याणि महर्षीनिव गौतमी ॥ ५ ॥

तव कर्माण्यमोघानि व्रतचर्या च भाविनि । वे बोलीं — ‘ कल्याणि! पाञ्चालराजकुमारी! तुम धन्य हो, जो इन पाँच महान् पुरुषोंकी सेवामें उसी प्रकार उपस्थित रहती हो, जैसे गौतमवंशमें उत्पन्न हुई जटिला अनेक महर्षियोंकी सेवा करती हैं । भाविनि! तुम्हारे सभी पुण्यकर्म अमोघ हैं और समस्त व्रतचर्या सफल है ' ॥ ५३ ॥

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इति कृष्णां महाराज प्रशशंसुस्तदा स्त्रियः ॥ ६ ॥

प्रशंसावचनैस्तासां मिथः शब्दैश्च भारत ।

प्रीतिजैश्च तदा शब्दैः पुरमासीत् समाकुलम् ॥ ७ ॥

महाराज! इस प्रकार उस समय सारी स्त्रियाँ द्रुपदकुमारी कृष्णाकी प्रशंसा करती थीं । भारत! एक दूसरीके प्रति कहे जानेवाले उनके प्रशंसा- वचनों और प्रीतिजनित शब्दोंसे उस समय सारा नगर व्याप्त हो रहा था ॥ ६-७ ॥

तमतीत्य यथायुक्तं राजमार्गं युधिष्ठिरः ।

अलंकृतं शोभमानमुपायाद् राजवेश्म ह ॥ ८ ॥

राजन्! उस सजे सजाये शोभासम्पन्न राजमार्गको यथोचित रूपसे लाँघकर राजा युधिष्ठिर राजभवनके समीप जा पहुँचे ॥ ८ ॥

ततः प्रकृतयः सर्वाः पौरा जानपदास्तदा ।

ऊचुः कर्णसुखा वाचः समुपेत्य ततस्ततः ॥ ९ ॥

तदनन्तर मन्त्री - सेनापति आदि प्रकृतिवर्गके सभी लोग, नगरवासी और जनपदनिवासी मनुष्य इधर- उधरसे आकर कानोंको सुख देनेवाली बातें कहने लगे- ॥ ९ ॥

दिष्ट्या जयसि राजेन्द्र शत्रून् शत्रुनिषूदन ।

दिष्ट्या राज्यं पुनः प्राप्तं धर्मेण च बलेन च ॥ १० ॥

' शत्रुओंका संहार करनेवाले राजेन्द्र! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप विजयी हो रहे हैं, आपने धर्मके प्रभाव तथा बलसे अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया — यह बड़े हर्षका विषय है ॥ १० ॥

भव नस्त्वं महाराज राजेह शरदां शतम् ।

प्रजाः पालय धर्मेण यथेन्द्रस्त्रिदिवं तथा ॥ ११ ॥

‘ महाराज! आप सैकड़ों वर्षोंतक हमारे राजा बने रहें । जैसे इन्द्र स्वर्गलोकका पालन करते हैं, उसी प्रकार आप भी धर्मपूर्वक अपनी प्रजाकी रक्षा करें ' ॥ ११ ॥

एवं राजकुलद्वारि मङ्गलैरभिपूजितः ।

आशीर्वादान् द्विजैरुक्तान् प्रतिगृह्य समन्ततः ॥ १२ ॥

प्रविश्य भवनं राजा देवराजगृहोपमम् ।

श्रद्धाविजयसंयुक्तं रथात् पश्चादवातरत् ॥ १३ ॥

इस प्रकार राजकुलके द्वारपर माङ्गलिक द्रव्योंद्वारा पूजित हो ब्राह्मणोंके दिये हुए आशीर्वाद सब ओरसे ग्रहण करके राजा युधिष्ठिर देवराज इन्द्रके महलके समान राजभवनमें प्रविष्ट हुए, जो श्रद्धा और विजयसे सम्पन्न था । वहाँ पहुँचकर वे रथसे नीचे उतरे ॥

प्रविश्याभ्यन्तरं श्रीमान् दैवतान्यभिगम्य च ।

पूजयामास रत्नैश्च गन्धमाल्यैश्च सर्वशः ॥ १४ ॥

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राजमहलके भीतर प्रवेश करके श्रीमान् नरेशने कुलदेवताओंका दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदिसे सर्वथा उनकी पूजा की ॥ १४ ॥

निश्चक्राम ततः श्रीमान् पुनरेव महायशाः ।

ददर्श ब्राह्मणांश्चैव सोऽभिरूपानवस्थितान् ॥ १५ ॥

इसके बाद महायशस्वी श्रीमान् राजा युधिष्ठिर महलसे बाहर निकले । वहाँ उन्हें बहुत- से ब्राह्मण खड़े दिखायी दिये, जो हाथमें मङ्गलद्रव्य लिये खड़े थे ॥ १५ ॥

स संवृतस्तदा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः ।

शुशुभे विमलश्चन्द्रस्तारागणवृतो यथा ॥ १६ ॥

जैसे तारोंसे घिरे हुए निर्मल चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार आशीर्वाद देनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १६ ॥

तांस्तु वै पूजयामास कौन्तेयो विधिवद् द्विजान् ।

धौम्यं गुरुं पुरस्कृत्य ज्येष्ठं पितरमेव च ॥ १७ ॥

कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने गुरु धौम्य तथा ताऊ धृतराष्ट्रको आगे करके उन सभी ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ १७ ॥

सुमनोमोदकै रत्नैर्हिरण्येन च भूरिणा ।

गोभिर्वस्त्रैश्च राजेन्द्र विविधैश्च किमिच्छकैः ॥ १८ ॥

राजेन्द्र! इन्होंने फूल, मिठाई, रत्न, बहुत- से सुवर्ण, गौओं, वस्त्रों तथा उनकी इच्छा पूछ - पूछ कर मँगाये हुए नाना प्रकारके मनोवाञ्छित पदार्थोंद्वारा उन सबका यथोचित सत्कार किया ॥ १८ ॥

ततः पुण्याहघोषोऽभूद् दिवं स्तब्ध्वेव भारत ।

सुहृदां प्रीतिजननः पुण्यः श्रुतिसुखावहः ॥ १ ९ ॥

भारत! इसके बाद पुण्याहवाचनका गम्भीर घोष होने लगा, जो आकाशको स्तब्ध- सा किये देता था । वह पवित्र शब्द कानोंको सुख देनेवाला तथा सुहृदोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला था ॥ १ ९ ॥

हंसवद् विदुषां राजन् द्विजानां तत्र भारती ।

शुश्रुवे वेदविदुषां पुष्कलार्थपदाक्षरा ॥ २० ॥

राजन्! उस समय वेदवेत्ता विद्वान् ब्राह्मणोंने हंसके समान हर्ष- गद्गद स्वरसे जो प्रचुर अर्थ, पद एवं अक्षरोंसे युक्त वाणी कही थी, वह वहाँ सबको स्पष्ट सुनायी दे रही थी ॥ २० ॥

ततो दुन्दुभिनिर्घोषः शंखानां च मनोरमः ।

जयं प्रवदतां तत्र स्वनः प्रादुरभून्नृप ॥ २१ ॥

नरेश्वर! तदनन्तर दुन्दुभियों और शंखोंकी मनोरम ध्वनि होने लगी, जय -जयकार करनेवालोंका गम्भीर घोष वहाँ प्रकट होने लगा ॥ २१ ॥

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निःशब्दे च स्थिते तत्र ततो विप्रजने पुनः ।

राजानं ब्राह्मणच्छद्मा चार्वाको राक्षसोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥

जब सब ब्राह्मण चुपचाप खड़े हो गये, तब ब्राह्मणका वेष बनाकर आया हुआ चार्वाक नामक राक्षस राजा युधिष्ठिरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ २२ ॥

तत्र दुर्योधनसखा भिक्षुरूपेण संवृतः ।

साक्षः शिखी त्रिदण्डी च धृष्टो विगतसाध्वसः ॥ २३ ॥

वह दुर्योधनका मित्र था । उसने संन्यासी ब्राह्मणके वेषमें अपने असली रूपको छिपा रखा था । उसके हाथमें अक्षमाला थी और मस्तकपर शिखा । उसने त्रिदण्ड धारण कर रखा था । वह बड़ा ढीठ और निर्भय था ॥ २३ ॥

वृतः सर्वैस्तथा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः ।

परःसहस्रै राजेन्द्र तपोनियमसंवृतैः ॥ २४ ॥

स दुष्टः पापमाशंसुः पाण्डवानां महात्मनाम् ।

अनामन्त्र्यैव तान् विप्रांस्तमुवाच महीपतिम् ॥ २५ ॥

राजेन्द्र! तपस्या और नियममें लगे रहनेवाले और आशीर्वाद देनेके इच्छुक उन समस्त ब्राह्मणोंसे, जिनकी संख्या हजारसे भी अधिक थी, घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवोंका विनाश चाहता था । उसने उन सब ब्राह्मणोंसे अनुमति लिये बिना ही राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ २४-२५ ॥ चार्वाक उवाच

इमे प्राहुर्द्विजाः सर्वे समारोप्य वचो मयि ।

धिग् भवन्तं कुनृपतिं ज्ञातिघातिनमस्तु वै ॥ २६ ॥

किं तेन स्याद्धि कौन्तेय कृत्वेमं ज्ञातिसंक्षयम् ।

घातयित्वा गुरूंश्चैव मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥ २७ ॥

चार्वाक बोला — राजन्! ये सब ब्राह्मण मुझपर अपनी बात कहनेका भार रखकर मेरेद्वारा ही तुमसे कह रहे हैं— ' कुन्तीनन्दन! तुम अपने भाई- बन्धुओंका वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो । तुम्हें धिक्कार है! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार यह बन्धु-बान्धवोंका विनाश करके गुरुजनोंकी हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं ' ॥ २६-२७ ॥

इति ते वै द्विजाः श्रुत्वा तस्य दुष्टस्य रक्षसः ।

विव्यथुश्चक्रुशुश्चैव तस्य वाक्यप्रधर्षिताः ॥ २८ ॥

वे ब्राह्मण उस दुष्ट राक्षसकी यह बात सुनकर उसके वचनोंसे तिरस्कृत हो व्यथित हो उठे और मन - ही - मन उसके कथनकी निन्दा करने लगे ॥ २८ ॥

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे स च राजा युधिष्ठिरः ।

पृष्ठ 267

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व्रीडिताः परमोद्विग्नास्तूष्णीमासन् विशाम्पते ॥ २ ९ ॥ प्रजानाथ! इसके बाद वे सभी ब्राह्मण तथा राजा युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और लज्जित हो गये । प्रतिवादके रूपमें उनके मुँहसे एक शब्द भी नहीं निकला । वे सभी कुछ देरतक चुप रहे ॥ २ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच

प्रसीदन्तु भवन्तो मे प्रणतस्याभियाचतः ।

प्रत्यासन्नव्यसनिनं न मां धिक्कर्तुमर्हथ ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने कहा –ब्राह्मणो! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके विनीतभावसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों । इस समय मुझपर सब ओरसे बड़ी भारी विपत्ति आ गयी है; अतः आपलोग मुझे धिक्कार न दें ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो राजन् ब्राह्मणास्ते सर्व एव विशाम्पते ।

ऊचुर्नैतद् वचोऽस्माकं श्रीरस्तु तव पार्थिव ॥ ३१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! प्रजानाथ! उनकी यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे — ' महाराज! यह हमारी बात नहीं कह रहा है । हम तो यह आशीर्वाद देते हैं कि ‘ आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे " ॥ ३१ ॥

जज्ञुश्चैव महात्मानस्ततस्तं ज्ञानचक्षुषा ।

ब्राह्मणा वेदविद्वांसस्तपोभिर्विमलीकृताः ॥ ३२ ॥

उन वेदवेत्ता ब्राह्मणोंका अन्तःकरण तपस्यासे निर्मल हो गया था । उन महात्माओंने ज्ञानदृष्टिसे उस राक्षसको पहचान लिया ॥ ३२ ॥

ब्राह्मणाऊचुः

एष दुर्योधनसखा चार्वाको नाम राक्षसः ।

परिव्राजकरूपेण हितं तस्य चिकीर्षति ॥ ३३ ॥

वयं ब्रूमो न धर्मात्मन् व्येतु ते भयमीदृशम् ।

उपतिष्ठतु कल्याणं भवन्तं भ्रातृभिः सह ॥ ३४ ॥

ब्राह्मण बोले — धर्मात्मन्! यह दुर्योधनका मित्र चार्वाक नामक राक्षस है, जो संन्यासीके रूपमें यहाँ आकर उसका हित करना चाहता है । हमलोग आपसे कुछ नहीं कहते हैं। आपका इस तरहका भय दूर हो जाना चाहिये । हम आशीर्वाद देते हैं कि ' भाइयोंसहित आपको कल्याणकी प्राप्ति हो' ॥ ३३-३४ ॥ वैशम्पायन उवाच ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे हुंकारैः क्रोधमूर्च्छिताः ।

पृष्ठ 268

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निर्भर्त्सयन्तः शुचयो निजघ्नुः पापराक्षसम् ॥ ३५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर क्रोधसे आतुर हुए उन सभी शुद्धात्मा ब्राह्मणोंने उस पापात्मा राक्षसको बहुत फटकारा और अपने हुङ्कारोंसे उसे नष्ट कर दिया ॥ ३५ ॥

स पपात विनिर्दग्धस्तेजसा ब्रह्मवादिनाम् ।

महेन्द्राशनिनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥ ३६ ॥

ब्रह्मवादी महात्माओंके तेजसे दग्ध होकर वह राक्षस गिर पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रसे जलकर कोई अंकुरयुक्त वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ ३६ ॥

पूजिताश्च ययुर्विप्रा राजानमभिनन्द्य तम् ।

राजा च हर्षमापेदे पाण्डवः ससुहृज्जनः ॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् राजाद्वारा पूजित हुए वे ब्राह्मण उनका अभिनन्दन करके चले गये और पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपने सुहृदोंसहित बड़े हर्षको प्राप्त हुए ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवधेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चार्वाकका वधविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 269

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्र तु राजानं तिष्ठन्तं भ्रातृभिः सह ।

उवाच देवकीपुत्रः सर्वदर्शी जनार्दनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर सर्वदर्शी देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ भाइयोंसहित खड़े हुए राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ १ ॥

वासुदेव उवाच

ब्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीयाः सदा मम ।

एते भूमिचरा देवा वाग्विषाः सुप्रसादकाः ॥ २ ॥

श्रीकृष्ण बोले- तात! इस संसारमें ब्राह्मण मेरे लिये सदा ही पूजनीय हैं । ये पृथ्वीपर विचरनेवाले देवता हैं । कुपित होने पर इनकी वाणीमें विषका -सा प्रभाव होता है । ये सहज ही प्रसन्न होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते हैं ॥ २ ॥

पुरा कृतयुगे राजंश्चार्वाको नाम राक्षसः ।

तपस्तेपे महाबाहो बदर्यां बहुवार्षिकम् ॥ ३ ॥

राजन्! महाबाहो! पहले सत्ययुग की बात है, चार्वाक राक्षसने बहुत वर्षोंतक बदरिकाश्रममें तपस्या की ॥ ३ ॥

वरेण च्छन्द्यमानश्च ब्रह्मणा च पुनः पुनः ।

अभयं सर्वभूतेभ्यो वरयामास भारत ॥ ४ ॥

भरतनन्दन! जब ब्रह्माजीने उससे बारंबार वर माँगनेका अनुरोध किया, तब उसने यही वर माँगा कि मुझे किसी भी प्राणीसे भय न हो ॥ ४ ॥

द्विजावमानादन्यत्र प्रादाद् वरमनुत्तमम् ।

अभयं सर्वभूतेभ्यो ददौ तस्मै जगत्पतिः ॥ ५ ॥

जगदीश्वर ब्रह्माजीने उसे यह परम उत्तम वर देते हुए कहा कि ' तुम्हें ब्राह्मणका अपमान करनेके सिवा और कहीं किसीसे भय नहीं है ' इस तरह उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी ओरसे अभयदान दे दिया ॥ ५ ॥

स तु लब्धवरः पापो देवानमितविक्रमः ।

राक्षसस्तापयामास तीव्रकर्मा महाबलः ॥ ६ ॥

वर पाकर वह अमित पराक्रमी महाबली और दुःसह कर्म करनेवाला पापात्मा राक्षस देवताओंको संताप देने लगा ॥ ६ ॥

पृष्ठ 270

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ततो देवाः समेताश्च ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ।

वधाय रक्षसस्तस्य बलविप्रकृतास्तदा ॥ ७ ॥

तब उसके बलसे तिरस्कृत हुए सब देवताओंने एकत्र हो ब्रह्माजीसे उसके वधके लिये प्रार्थना की ॥ ७ ॥

तानुवाच ततो देवो विहितस्तत्र वै मया ।

यथास्य भविता मृत्युरचिरेणेति भारत ॥ ८ ॥

भरतनन्दन! तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा- ' मैंने ऐसा विधान कर दिया है जिससे शीघ्र ही उस राक्षसकी मृत्यु हो जायगी ॥ ८ ॥

राजा दुर्योधनो नाम सखास्य भविता नृषु ।

तस्य स्नेहावबद्धोऽसौ ब्राह्मणानवमंस्यते ॥ ९ ॥

' मनुष्योंमें राजा दुर्योधन उसका मित्र होगा और उसीके स्नेहसे बँधकर वह राक्षस ब्राह्मणोंका अपमान कर बैठेगा ॥ ९ ॥

तत्रैनं रुषिता विप्रा विप्रकारप्रधर्षिताः ।

धक्ष्यन्ति वाग्बलाः पापं ततो नाशं गमिष्यति ॥ १० ॥

‘ उसके विरुद्धाचरणसे तिरस्कृत हो रोषमें भरे हुए वाक्शक्तिसे सम्पन्न ब्राह्मण वहीं

उस पापीको जला देंगे । इससे उसका नाश हो जायगा' ॥ १० ॥

स एष निहतः शेते ब्रह्मदण्डेन राक्षसः ।

चार्वाको नृपतिश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ॥ ११ ॥

नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! अब आप शोक न करें । यह वही राक्षस चार्वाक ब्रह्मदण्डसे मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ॥ ११ ॥

हतास्ते क्षत्रधर्मेण ज्ञातयस्तव पार्थिव ।

स्वर्गताश्च महात्मानो वीराः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ १२ ॥

राजन्! आपने क्षत्रियधर्मके अनुसार भाई- बन्धुओंका वध किया है । वे महामनस्वी क्षत्रियशिरोमणि वीर स्वर्गलोकमें चले गये हैं ॥ १२ ॥

स त्वमातिष्ठ कार्याणि मा तेऽभूद् ग्लानिरच्युत ।

शत्रून् जहि प्रजा रक्ष द्विजांश्च परिपूजय ॥। १३ ॥

अच्युत! अब आप अपने कर्तव्यका पालन करें । आपके मनमें ग्लानि न हो । आप शत्रुओंको मारिये, प्रजाकी रक्षा कीजिये और ब्राह्मणोंका आदर सत्कार करते रहिये ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवरदानादिकथने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥