05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 331–340

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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राजन्! परावसुकी बात सुनकर भृगुवंशी परशुरामने पुनः शस्त्र उठा लिया। पहले उन्होंने जिन सैकड़ों क्षत्रियोंको छोड़ दिया था, वे ही बढ़कर महापराक्रमी भूपाल बन बैठे थे ॥ ६० ॥

स पुनस्ताञ्जघानाशु बालानपि नराधिप ॥ ६१ ॥

गर्भस्थैस्तु मही व्याप्ता पुनरेवाभवत् तदा ।

जातं जातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह ॥ ६२ ॥

अरक्षंश्च सुतान् कांश्चित् तदा क्षत्रिययोषितः । नरेश्वर! उन्होंने पुनः उन सबके छोटे - छोटे बच्चों- तकको शीघ्र ही मार डाला । जो बच्चे गर्भमें रह गये थे, उन्हींसे पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी। परशुरामजी एक- एक गर्भके उत्पन्न होनेपर पुनः उसका वध कर डालते थे । उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रोंको बचा सकी थीं ॥ ६१-६२३ ॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥ ६३ ॥

दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत् ततः । इस प्रकार शक्तिशाली परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे हीन करके अश्वमेध यज्ञ किया और उसकी समाप्ति होनेपर दक्षिणाके रूपमें यह सारी पृथ्वी उन्होंने कश्यपजीको दे दी ॥ ६३ ॥

स क्षत्रियाणां शेषार्थं करेणोद्दिश्य कश्यपः ॥ ६४ ॥

स्रुक्प्रग्रहवता राजंस्ततो वाक्यमथाब्रवीत् ।

गच्छ तीरं समुद्रस्य दक्षिणस्य महामुने ॥ ६५ ॥

न ते मद् विषये राम वस्तव्यमिह कर्हिचित् । राजन्! तदनन्तर कुछ क्षत्रियोंको बचाये रखनेकी इच्छासे कश्यपजीने स्रुक् लिये हुए हाथसे संकेत करते हुए यह बात कही - ' महामुने! अब तुम दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाओ । अब कभी मेरे राज्यमें निवास न करना ' ॥ ६४-६५३ ॥ ततः शूर्पारकं देशं सागरस्तस्य निर्ममे ॥ ६६ ॥

सहसा जामदग्न्यस्य सोऽपरान्तमहीतलम् । (यह सुनकर परशुरामजी चले गये ) समुद्रने सहसा जमदग्निकुमार परशुरामजीके लिये जगह खाली करके शूर्पारक देशका निर्माण किया; जिसे अपरान्तभूमि भी कहते हैं ॥ ६६ || कश्यपस्तां महाराज प्रतिगृह्य वसुन्धराम् ॥ ६७ ॥

कृत्वा ब्राह्मणसंस्थां वै प्रविष्टः सुमहद् वनम् । महाराज! कश्यपने पृथ्वीको दानमें लेकर उसे ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया और वे स्वयं विशाल वनके भीतर चले गये ॥ ६७३ ॥

पृष्ठ 332

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ततः शूद्राश्व वैश्याश्च यथा स्वैरप्रचारिणः ॥ ६८ ॥

अवर्तन्त द्विजाग्ग्राणां दारेषु भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! फिर तो स्वेच्छाचारी वैश्य और शूद्र श्रेष्ठ द्विजोंकी स्त्रियोंके साथ अनाचार करने लगे ॥ ६८३ ॥

अराजके जीवलोके दुर्बला बलवत्तरैः ॥ ६ ९ ॥ पीड्यन्ते न हि विप्रेषु प्रभुत्वं कस्यचित् तदा । सारे जीवजगत्में अराजकता फैल गयी । बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको पीड़ा देने लगे । उस समय ब्राह्मणोंमेंसे किसीकी प्रभुता कायम न रही ॥ ६ ९ ॥ ततः कालेन पृथिवी पीड्यमाना दुरात्मभिः ॥ ७० ॥

विपर्ययेण तेनाशु प्रविवेश रसातलम् ।

अरक्ष्यमाणा विधिवत् क्षत्रियैर्धर्मरक्षिभिः ॥ ७१ ॥

कालक्रमसे दुरात्मा मनुष्य अपने अत्याचारोंसे पृथ्वीको पीड़ित करने लगे । इस उलट-फेरसे पृथ्वी शीघ्र ही रसातलमें प्रवेश करने लगी; क्योंकि उस समय धर्मरक्षक क्षत्रियोंद्वारा विधिपूर्वक पृथिवीकी रक्षा नहीं की जा रही थी ॥ ७०-७१ ॥

तां दृष्ट्वा द्रवतीं तत्र संत्रासात् स महामनाः ।

ऊरुणा धारयामास कश्यपः पृथिवीं ततः ॥ ७२ ॥

भयके मारे पृथ्वीको रसातलकी ओर भागती देख महामनस्वी कश्यपने अपने ऊरुओंका सहारा देकर उसे रोक दिया ॥ ७२ ॥

धृता तेनोरुणा येन तेनोर्वीति मही स्मृता ।

रक्षणार्थं समुद्दिश्य ययाचे पृथिवी तदा ॥ ७३ ॥

प्रसाद्य कश्यपं देवी वरयामास भूमिपम् । कश्यपजीने ऊरुसे इस पृथ्वीको धारण किया था; इसलिये यह उर्वी नामसे प्रसिद्ध हुई । उस समय पृथ्वीदेवीने कश्यपजीको प्रसन्न करके अपनी रक्षाके लिये यह वर माँगा कि मुझे भूपाल दीजिये ॥ ७३ ॥

पृथिव्युवाच सन्ति ब्रह्मन् मया गुप्ताः स्रीषु क्षत्रियपुङ्गवा ॥ ७४ ॥

हैहयानां कुले जातास्ते संरक्षन्तु मां मुने । पृथ्वी बोली– ब्रह्मन्! मैंने स्त्रियोंमें कई क्षत्रियशिरोमणियोंको छिपा रखा है । मुने! वे सब हैहयकुलमें उत्पन्न हुए हैं, जो मेरी रक्षा कर सकते हैं ॥ ७४३ ॥

अस्ति पौरवदायादो विदूरथसुतः प्रभो ॥ ७५ ॥

ऋक्षैः संवर्धितो विप्र ऋक्षवत्यथ पर्वते ।

पृष्ठ 333

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प्रभो! उनके सिवा पुरुवंशी विदूरथका भी एक पुत्र जीवित है, जिसे ऋक्षवान् पर्वतपर रीछोंने पालकर बड़ा किया है ॥ ७५३ ॥

तथानुकम्पमानेन यज्वनाथामितौजसा ॥ ७६ ॥

पराशरेण दायादः सौदासस्याभिरक्षितः ।

सर्वकर्माणि कुरुते शूद्रवत् तस्य स द्विजः ॥ ७७ ॥

सर्वकर्मेत्यभिख्यातः स मां रक्षतु पार्थिवः । इसी प्रकार अमित शक्तिशाली यज्ञपरायण महर्षि पराशरने दयावश सौदासके पुत्रकी जान बचायी है, वह राजकुमार द्विज होकर भी शूद्रोंके समान सब कर्म करता है; इसलिये

‘ सर्वकर्मा ' नामसे विख्यात है । वह राजा होकर मेरी रक्षा करे ॥ ७६-७७३ ॥

शिबिपुत्रो महातेजा गोपतिर्नाम नामतः ॥ ७८ ॥

वने संवर्धितो गोभिः सोऽभिरक्षतु मां मुने । राजा शिबिका एक महातेजस्वी पुत्र बचा हुआ है, जिसका नाम है गोपति । उसे वनमें

गौओंने पाल - पोसकर बड़ा किया है । मुने! आपकी आज्ञा हो तो वही मेरी रक्षा करे ॥ ७८

|| प्रतर्दनस्य पुत्रस्तु वत्सो नाम महाबलः ॥ ७९ ॥

वत्सैः संवर्धितों गोष्ठे स मां रक्षतु पार्थिवः । प्रतर्दनका महाबली पुत्र वत्स भी राजा होकर मेरी रक्षा कर सकता है । उसे गोशालामें बछड़ोंने पाला था, इसलिये उसका नाम ' वत्स ' हुआ है ॥ ७ ९ ३ ॥ दधिवाहनपौत्रस्तु पुत्रो दिविरथस्य च ॥ ८० ॥

गुप्तः स गौतमेनासीद् गङ्गाकूलेऽभिरक्षितः । दधिवाहनका पौत्र और दिविरथका पुत्र भी गङ्गातटपर महर्षि गौतमके द्वारा सुरक्षित है ॥ ८० ॥

बृहद्रथो महातेजा भूरिभूतिपरिष्कृतः ॥ ८१ ॥

गोलाङ्गुलैर्महाभागो गृध्रकूटेऽभिरक्षितः । महातेजस्वी महा भाग बृहद्रथ महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न है । उसे गृध्रकूट पर्वतपर लंगूरोंने बचाया था ॥ ८१ ॥

मरुत्तस्यान्ववाये च रक्षिताः क्षत्रियात्मजाः ॥ ८२ ॥

मरुत्पतिसमा वीर्ये समुद्रेणाभिरक्षिताः । राजा मरुत्तके वंशमें भी कई क्षत्रिय बालक सुरक्षित हैं, जिनकी रक्षा समुद्रने की है । उन सबका पराक्रम देवराज इन्द्रके तुल्य है ॥ ८२ ॥

एते क्षत्रियदायादास्तत्र तत्र परिश्रुताः ॥ ८३ ॥

द्योकारहेमकारादिजातिं नित्यं समाश्रिताः ।

पृष्ठ 334

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ये सभी क्षत्रिय बालक जहाँ -तहाँ विख्यात हैं । वे सदा शिल्पी और सुनार आदि जातियोंके आश्रित होकर रहते हैं ॥ ८३ ॥

यदि मामभिरक्षन्ति ततः स्थास्यामि निश्चला ॥ ८४ ॥

एतेषां पितरश्चैव तथैव च पितामहाः ।

मदर्थं निहता युद्धे रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ८५ ॥

यदि वे क्षत्रिय मेरी रक्षा करें तो मैं अविचल भावसे स्थिर हो सकूँगी । इन बेचारोंके बाप -दादे मेरे ही लिये युद्धमें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले परशुरामजीके द्वारा मारे गये हैं ॥ ८४-८५ ॥ तेषामपचितिश्चैव मया कार्या महामुने ।

न ह्यहं कामये नित्यमतिक्रान्तेन रक्षणम् ।

वर्तमानेन वर्तेयं तत् क्षिप्रं संविधीयताम् ॥ ८६ ॥

महामुने! मुझे उन राजाओंसे उऋण होनेके लिये उनके इन वंशजोंका सत्कार करना चाहिये । मैं धर्मकी मर्यादाको लाँघनेवाले क्षत्रियके द्वारा कदापि अपनी रक्षा नहीं चाहती । जो अपने धर्ममें स्थित हो, उसीके संरक्षणमें रहूँ, यही मेरी इच्छा है; अतः आप इसकी शीघ्र व्यवस्था करें ॥ ८६ ॥

वासुदेव उवाच

ततः पृथिव्या निर्दिष्टांस्तान् समानीय कश्यपः ।

अभ्यषिञ्चन्महीपालान् क्षत्रियान् वीर्यसम्मतान् ॥ ८७ ॥

श्रीकृष्ण कहते हैं - राजन्! तदनन्तर पृथ्वीके बताये हुए उन सब पराक्रमी क्षत्रिय भूपालोंको बुलाकर कश्यपजीने उनका भिन्न -भिन्न राज्योंपर अभिषेक कर दिया ॥ ८७ ॥

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च येषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ।

एवमेतत् पुरावृत्तं यन्मां पृच्छसि पाण्डव ॥ ८८ ॥

उन्हींके पुत्र - पौत्र बढ़े, जिनके वंश इस समय प्रतिष्ठित हैं । पाण्डुनन्दन! तुमने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, वह पुरातन वृत्तान्त ऐसा ही है ॥ ८८ ॥

वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवंस्तं च यदुप्रवीरो युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम् । रथेन तेनाशु ययौ महात्मा दिशः प्रकाशन् भगवानिवार्कः ॥ ८ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरसे इस प्रकार वार्तालाप करते हुए यदुकुल - तिलक महात्मा श्रीकृष्ण उस रथके द्वारा भगवान् सूर्यके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैलाते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ते चले गये ॥ ८ ९ ॥

पृष्ठ 335

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि रामोपाख्याने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें परशुरामोपाख्यानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥

पृष्ठ 336

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण प्रभावका सविस्तर वर्णन वैशम्पायन उवाच

ततो रामस्य तत् कर्मं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ।

विस्मयं परमं गत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! परशुरामजीका वह अलौकिक कर्म सुनकर राजा

युधिष्ठिरको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे भगवान् श्रीकृष्णसे बोले – ॥ १ ॥

अहो रामस्य वार्ष्णेय शक्रस्येव महात्मनः ।

विक्रमो वसुधा येन क्रोधान्निःक्षत्रिया कृता ॥ २ ॥

‘ वृष्णिनन्दन! महात्मा परशुरामका पराक्रम तो इन्द्रके समान अत्यन्त अद्भुत है, जिन्होंने क्रोध करके यह सारी पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी ॥ २ ॥

गोभिः समुद्रेण तथा गोलाङ्गुलर्क्षवानरैः ।

गुप्ता रामभयोद्विगग्नाः क्षत्रियाणां कुलोद्वहाः ॥ ३ ॥

‘ क्षत्रियोंके कुलका भार वहन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष परशुरामजीके भयसे उद्विग्न हो छिपे हु थे और गाय, समुद्र, लंगूर, रीछ तथा वानरोंद्वारा उनकी रक्षा हुई थी ॥ ३ ॥

अहो धन्यो नृलोकोऽयं सभाग्याश्च नरा भुवि ।

यत्र कर्मेदृशं धर्म्यं द्विजेन कृतमित्युत ॥ ४ ॥

' अहो! यह मनुष्यलोक धन्य है और इस भूतलके मनुष्य बड़े भाग्यवान् हैं, जहाँ द्विजवर परशुरामजीने ऐसा धर्मसंगत कार्य किया ' ॥ ४ ॥

तथावृत्तौ कथां तात तावच्युतयुधिष्ठिरौ ।

जग्मतुर्यत्र गाङ्गेयः शरतल्पगतः प्रभुः ॥ ५ ॥

तात! युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण इस प्रकार बातचीत करते हुए उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ प्रभावशाली गङ्गानन्दन भीष्म बाणशय्यापर सोये हुए थे ॥ ५ ॥

ततस्ते ददृशुर्भीष्मं शरप्रस्तरशायिनम् ।

स्वरश्मिजालसंवीतं सायंसूर्यसमप्रभम् ॥ ६ ॥

उन्होंने देखा कि भीष्मजी शरशय्यापर सो रहे हैं और अपनी किरणोंसे घिरे हुए सायंकालिक सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं ॥ ६ ॥

उपास्यमानं मुनिभिर्देवैरिव शतक्रतुम् ।

देशे परमधर्मिष्ठे नदीमोघवतीमनु ॥ ७ ॥

जैसे देवता इन्द्रकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार बहुत- से महर्षि ओघवती नदीके तटपर परम धर्ममय स्थानमें उनके पास बैठे हुए थे ॥ ७ ॥

पृष्ठ 337

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दूरादेव तमालोक्य कृष्णो राजा च धर्मजः ।

चत्वारः पाण्डवाश्चैव ते च शारद्वतादयः ॥ ८ ॥

अवस्कन्द्याथ वाहेभ्यः संयम्य प्रचलं मनः ।

एकीकृत्येन्द्रियग्राममुपतस्थुर्महामुनीन् ॥ ९ ॥

श्रीकृष्ण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, अन्य चारों पाण्डव तथा कृपाचार्य आदि सब लोग दूरसे ही उन्हें देखकर अपने - अपने रथसे उतर गये और चंचल मनको काबूमें करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको एकाग्र कर वहाँ बैठे हुए महामुनियोंकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ८ - ९ ॥

अभिवाद्य तु गोविन्दः सात्यकिस्ते च पार्थिवाः ।

व्यासादीनृषिमुख्यांश्च गाङ्गेयमुपतस्थिरे ॥ १० ॥

श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा अन्य राजाओंने व्यास आदि महर्षियोंको प्रणाम करके गङ्गानन्दन भीष्मको मस्तक झुकाया ॥ १० ॥

ततो वृद्धं तथा दृष्ट्वा गाङ्गेयं यदुकौरवाः ।

परिवार्य ततः सर्वे निषेदुः पुरुषर्षभाः ॥ ११ ॥

तदनन्तर वे सभी यदुवंशी और कौरव नरश्रेष्ठ बूढ़े गङ्गानन्दन भीष्मजीका दर्शन करके उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ११ ॥

ततो निशाम्य गाङ्गेयं शाम्यमानमिवानलम् ।

किंचिद् दीनमना भीष्ममिति होवाच केशवः ॥ १२ ॥

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मन- ही- मन कुछ दुखी हो बुझती हुई आगके समान दिखायी देनेवाले गङ्गानन्दन भीष्मको सुनाकर इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि यथा पुरा ।

कच्चिन्न व्याकुला चैव बुद्धिस्ते वदतां वर ॥ १३ ॥

‘ वक्ताओंमें श्रेष्ठ भीष्मजी! क्या आपकी सारी ज्ञानेन्द्रियाँ पहलेकी ही भाँति प्रसन्न हैं? आपकी बुद्धि व्याकुल तो नहीं हुई है? ॥ १३ ॥

शराभिघातदुःखात् ते कच्चिद् गात्रं न दूयते ।

मानसादपि दुःखाद्धि शारीरं बलवत्तरम् ॥ १४ ॥

‘ आपको बाणोंकी चोट सहनेका जो कष्ट उठाना पड़ा है उससे आपके शरीरमें विशेष पीड़ा तो नहीं हो रही है? क्योंकि मानसिक दुःखसे शारीरिक दुःख अधिक प्रबल होता है-उसे सहना कठिन हो जाता है ॥ १४ ॥

वरदानात् पितुः कामं छन्दमृत्युरसि प्रभो ।

शान्तनोर्धर्मनित्यस्य न त्वेतन्मम कारणम् ॥ १५ ॥

‘ प्रभो! आपने निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले पिता शान्तनुके वरदानसे मृत्युको अपने अधीन कर लिया है । जब आपकी इच्छा हो तभी मृत्यु हो सकती है अन्यथा नहीं । यह आपके पिताके वरदानका ही प्रभाव है, मेरा नहीं ॥ १५ ॥

पृष्ठ 338

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सुसूक्ष्मोऽपि तु देहे वै शल्यो जनयते रुजम् ।

किं पुनः शरसंघातैश्चित्तस्य तव पार्थिव II १६ ॥

‘ राजन्! यदि शरीरमें कोई महीन - से- महीन भी काँटा गड़ जाय तो वह भारी वेदना पैदा करता है । फिर जो बाणोंके समूहसे चुन दिया गया है, उस आपके शरीरकी पीड़ाके विषयमें तो कहना ही क्या है? ॥ १६ ॥

कामं नैतत् तवाख्येयं प्राणिनां प्रभवाप्ययौ ।

उपदेष्टुं भवान् शक्तो देवानामपि भारत ॥ १७ ॥

‘ भरतनन्दन! अवश्य ही आपके सामने यह कहना उचित न होगा कि ‘ सभी प्राणियोंके जन्म और मरण प्रारब्धके अनुसार नियत हैं। अतः आपको दैवका विधान समझकर अपने मनमें कोई दुःख नहीं मानना चाहिये । ' आपको कोई क्या उपदेश देगा? आप तो देवताओंको भी उपदेश देनेमें समर्थ हैं ॥ १७ ॥

यच्च भूतं भविष्यं च भवच्च पुरुषर्षभ ।

सर्वं तज्ज्ञानवृद्धस्य तव भीष्म प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥

' पुरुषप्रवर भीष्म! आप ज्ञानमें सबसे बढ़े - चढ़े हैं । आपकी बुद्धिमें भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ १८ ॥

संहारश्चैव भूतानां धर्मस्य च फलोदयः ।

विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि धर्ममयो निधिः ॥ १ ९ ॥

‘ महामते! प्राणियोंका संहार कब होता है? धर्मका क्या फल है? और उसका उदय कब होता है? ये सारी बातें आपको ज्ञात हैं; क्योंकि आप धर्मके प्रचुर भण्डार हैं ॥ १ ९ ॥

त्वां हि राज्ये स्थितं स्फीते समग्राङ्गमरोगिणम् ।

स्त्रीसहस्रैः परिवृतं पश्यामीवोर्ध्वरेतसम् ॥ २० ॥

‘ आप एक समृद्धिशाली राज्यके अधिकारी थे, आपके संपूर्ण अङ्ग ठीक थे, किसी अङ्गमें कोई न्यूनता नहीं थी; आपको कोई रोग भी नहीं था और आप हजारों स्त्रियोंके बीचमें रहते थे, तो भी मैं आपको ऊर्ध्वरता ( अखण्ड ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न ) ही देखता हूँ ॥ २० ॥

ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् त्रिषु लोकेषु पार्थिव ।

सत्यधर्मान्महावीर्याच्छूराद् धर्मैकतत्परात् ॥ २१ ॥

मृत्युमावार्य तपसा शरसंस्तरशायिनः ।

निसर्गप्रभवं किंचिन्न च तातानुशुश्रुम ॥ २२ ॥

‘ तात! पृथ्वीनाथ! मैंने तीनों लोकोंमें सत्यवादी, एकमात्र धर्ममें तत्पर, शूरवीर, महापराक्रमी तथा बाण- शय्यापर शयन करनेवाले आप शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा दूसरे किसी ऐसे प्राणीको ऐसा नहीं सुना है, जिसने शरीरके लिये स्वभावसिद्ध मृत्युको अपनी तपस्यासे रोक दिया हो ॥ २१-२२ ॥

पृष्ठ 339

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सत्ये तपसि दाने च यज्ञाधिकरणे तथा ।

धनुर्वेदे च वेदे च नीत्यां चैवानुरक्षणे ॥ २३ ॥

अनृशंस शुचिं दान्तं सर्वभूतहिते रतम् ।

महारथं त्वत्सदृशं न कंचिदनुशुश्रुम ॥ २४ ॥

' सत्य, तप, दान और यज्ञके अनुष्ठानमें, वेद, धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें, प्रजाके पालनमें, कोमलतापूर्ण बर्ताव, बाहर- भीतरकी शुद्धि, मन और इन्द्रियोंके संयम तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसाधनमें आपके समान मैंने दूसरे किसी महारथीको नहीं सुना है ॥ २३-२४ ॥

त्वं हि देवान् सगन्धर्वानसुरान् यक्षराक्षसान् ।

शक्तस्त्वेकरथेनैव विजेतुं नात्र संशयः ॥ २५ ॥

आप सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, असुर, यक्ष और राक्षसोंको एकमात्र रथके द्वारा ही जीत सकते थे, इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥

स त्वं भीष्म महाबाहो वसूनां वासवोपमः ।

नित्यं विप्रैः समाख्यातों नवमोऽनवमो गुणैः ॥ २६ ॥

‘ महाबाहो भीष्म! आप वसुओंमें वासव ( इन्द्र) के समान हैं । ब्राह्मणोंने सदा आपको आठ वसुओंके अंशसे उत्पन्न नवाँ वसु बताया है । आपके समान गुणोंमें कोई नहीं ॥ २६ ॥

अहं च त्वाभिजानामि यस्त्वं पुरुषसत्तम ।

त्रिदशेष्वपि विख्यातस्त्वं शक्त्या पुरुषोत्तमः ॥ २७ ॥

पुरुषप्रवर! आप कैसे हैं और क्या हैं, यह मैं जानता हूँ। आप पुरुषोंमें उत्तम और अपनी शक्तिके लिये देवताओंमें भी विख्यात हैं ॥ २७ ॥

मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुतः ।

भवतो वा गुणैर्युक्तः पृथिव्यां पुरुषः क्वचित् ॥ २८ ॥

' नरेन्द्र! मनुष्योंमें आपके समान गुणोंसे युक्त पुरुष इस पृथ्वीपर न तो मैंने कहीं देखा है और न सुना ही है ॥ २८ ॥

त्वं हि सर्वगुणै राजन् देवानप्यतिरिच्यसे ।

तपसा हि भवान् शक्तः स्रष्टुं लोकांश्चराचरान् ॥ २ ९ ॥

‘ राजन्! आप अपने सम्पूर्ण गुणोंके द्वारा तो देवताओंसे भी बढ़कर हैं तथा तपस्याके द्वारा चराचर लोकोंकी भी सृष्टि कर सकते हैं ॥ २ ९ ॥

किं पुनश्चात्मनो लोकानुत्तमानुत्तमैर्गुणैः ।

तदस्य तप्यमानस्य ज्ञातीनां संक्षयेन वै ॥ ३० ॥

ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य शोकं भीष्म व्यपानुद ।

पृष्ठ 340

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' फिर अपने लिये उत्तम गुणसम्पन्न लोकोंकी सृष्टि करना आपके लिये कौन बड़ी बात है? अतः भीष्म! आपसे यह निवेदन है कि ये ज्येष्ठ पाण्डव अपने कुटुम्बीजनोंके वधसे

बहुत संतप्त हो रहे हैं । आप इनका शोक दूर करें ॥ ३०३ ॥

ये हि धर्माः समाख्याताश्चातुर्वर्ण्यस्य भारत ॥ ३१ ॥

चातुराश्रम्यसंयुक्ताः सर्वे ते विदितास्तव ।

चातुर्विद्ये च ये प्रोक्ताश्चातुर्होत्रे च भारत ॥ ३२ ॥

‘ भारत! शास्त्रोंमें चारों वर्णों और आश्रमोंके लिये जो-जो धर्म बताये गये हैं, वे सब आपको विदित हैं । चारों विद्याओंमें जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है तथा चारों होताओंके जो कर्तव्य बताये गये हैं, वे भी आपको ज्ञात हैं ॥ ३१-३२ ॥

योगे सांख्ये च नियता ये च धर्माः सनातनाः ।

चातुर्वर्ण्यस्य यश्चोक्तो धर्मो न स्म विरुध्यते ॥ ३३ ॥

सेव्यमानः सवैयाख्यो गाङ्गेय विदितस्तव । 'गङ्गानन्दन! योग और सांख्यमें जो सनातन धर्म नियत हैं तथा चारों वर्णोंके लिये जो अविरोधी धर्म बताया गया है, जिसका सभी लोग सेवन करते हैं, वह सब आपको व्याख्यासहित ज्ञात है ॥ ३३ ॥

प्रतिलोमप्रसूतानां वर्णानां चैव यः स्मृतः ॥ ३४ ॥

देशजातिकुलानां च जानीषे धर्मलक्षणम् ।

वेदोक्तो यश्च शिष्टोक्तः सदैव विदितस्तव ॥ ३५ ॥

विलोम कमसे उत्पन्न हुए वर्णसंकरोंका जो धर्म है, उससे भी आप अपरिचित नहीं हैं । देश, जाति और कुलके धर्मोंका क्या लक्षण है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं । वेदोंमें प्रतिपादित तथा शिष्ट पुरुषोंद्वारा कथित धर्मोंको भी आप सदासे ही जानते हैं ॥ ३४-३५ ॥

इतिहासपुराणार्थाः कार्त्स्न्येन विदितास्तव ।

धर्मशास्त्रं च सकलं नित्यं मनसि ते स्थितम् ॥ ३६ ॥

‘ इतिहास और पुराणोंके अर्थ आपको पूर्णरूपसे ज्ञात हैं । सारा धर्मशास्त्र सदा आपके मनमें स्थित है ॥ ३६ ॥

ये च केचन लोकेऽस्मिन्नर्थाः संशयकारकाः ।

तेषां छेत्ता नास्ति लोके त्वदन्यः पुरुषर्षभ ॥ ३७ ॥

' पुरुषप्रवर! संसारमें जो कोई संदेहग्रस्त विषय हैं, उनका समाधान करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ ३७ ॥

स पाण्डवेयस्य मनःसमुत्थितं नरेन्द्र शोकं व्यपकर्ष मेधया । भवद्विधा ह्युत्तमबुद्धिविस्तरा