05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 531–540
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540
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भीष्मजीने कहा - तात युधिष्ठिर! ब्राह्मणको मांस, मदिरा, शहद, नमक, तिल, बनायी हुई रसोई, घोड़ा तथा बैल, गाय, बकरा, भेड़ और भैंस आदि पशु - इन वस्तुओंका विक्रय तो सभी अवस्थाओंमें त्याग देना चाहिये; क्योंकि इनको बेचनेसे ब्राह्मण नरकमें पड़ता है ॥ ४-५ ॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट् ।
धेनुर्यज्ञश्च सोमश्च न विक्रेयाः कथंचन ॥ ६ ॥
पक्वेनामस्य निमयं न प्रशंसन्ति साधवः ।
निमयेत् पक्वमामेन भोजनार्थाय भारत ॥ ७ ॥
बकरा अग्निस्वरूप, भेड़ वरुणस्वरूप, घोड़ा सूर्यस्वरूप, पृथ्वी विराट्स्वरूप तथा गौ यज्ञ और सोमका स्वरूप है; अतः इनका विक्रय कभी किसी तरह नहीं करना चाहिये । भरतनन्दन! ब्राह्मणके लिये बनी - बनायी रसोई देकर बदलेमें कच्चा अन्न लेनेकी साधुपुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं; किंतु केवल भोजनके लिये कच्चा अन्न देकर उसके बदले पका-पकाया अन्न ले सकते हैं ॥
वयं सिद्धमशिष्यामो भवान् साधयतामिदम् ।
एवं संवीक्ष्य निमयेन्नाधर्मोऽस्ति कथंचन ॥ ८ ॥
' हम लोग बनी - बनायी रसोई पाकर भोजन कर लेंगे । आप यह कच्चा अन्न लेकर इसे पकाइये ' इस भावसे अच्छी तरह विचार करके यदि कच्चे अन्नसे पके - पकाये अन्नको बदल लिया जाय तो इसमें किसी प्रकार भी अधर्म नहीं होता ॥ ८ ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मः सनातनः ।
व्यवहारप्रवृत्तानां तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें व्यवहारपरायण मनुष्योंके लिये सनातन कालसे चला आता हुआ धर्म जैसा है, वैसा मैं तुम्हें बतला रहा हूँ सुनो ॥ ९ ॥
भवतेऽहं ददानीदं भवानेतत् प्रयच्छतु ।
रुचितो वर्तते धर्मो न बलात् सम्प्रवर्तते ॥ १० ॥
मैं आपको यह वस्तु देता हूँ, इसके बदलेमें आप मुझे वह वस्तु दे दीजिये, ऐसा कहकर दोनोंकी रुचिसे जो वस्तुओंकी अदला- बदली की जाती है, उसे धर्म माना जाता है । यदि बलात्कारपूर्वक अदला- बदली की जाय तो वह धर्म नहीं है ॥ १० ॥
इत्येवं सम्प्रवर्तन्ते व्यवहाराः पुरातनाः ।
ऋषीणामितरेषां च साधु चैतदसंशयम् ॥ ११ ॥
प्राचीन कालसे ऋषियों तथा अन्य सत्पुरुषोंके सारे व्यवहार ऐसे ही चले आ रहे हैं ।
यह सब ठीक है, इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
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अथ तात यदा सर्वाः शस्त्रमाददते प्रजाः ।
व्युत्क्रामन्ति स्वधर्मेभ्यः क्षत्रस्य क्षीयते बलम् ॥ १२ ॥
राजा त्राता तु लोकस्य कथं च स्यात् परायणम् ।
एतन्मे संशयं ब्रूहि विस्तरेण नराधिप ॥ १३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- तात! नरेश्वर! यदि सारी प्रजा शस्त्र धारण कर ले और अपने धर्मसे गिर जाय, उस समय क्षत्रियकी शक्ति तो क्षीण हो जायगी । फिर राजा राष्ट्रकी रक्षा कैसे कर सकता है और वह सब लोगोंको किस तरह शरण दे सकता है । मेरे इस संदेहका आप विस्तारपूर्वक समाधान करें ॥ १२-१३ ॥ भीष्म उवाच
दानेन तपसा यज्ञैरद्रोहेण दमेन च ।
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः क्षेममिच्छेयुरात्मनः ॥ १४ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! ब्राह्मण आदि सभी वर्गोंको दान, तप, यज्ञ, प्राणियोंके प्रति द्रोहका अभाव तथा इन्द्रिय- संयमके द्वारा अपने कल्याणकी इच्छा रखनी चाहिये ||
तेषां ये वेदबलिनस्तेऽभ्युत्थाय समन्ततः ।
राज्ञो बलं वर्धयेयुर्महेन्द्रस्येव देवताः ॥ १५ ॥
उनमेंसे जिन ब्राह्मणोंमें वेद-शास्त्रोंका बल हो, वे सब ओरसे उठकर राजाका उसी प्रकार बल बढ़ावें, जैसे देवता इन्द्रका बल बढ़ाते हैं ॥ १५ ॥
राज्ञोऽपि क्षीयमाणस्य ब्रह्मैवाहुः परायणम् ।
तस्माद् ब्रह्मबलेनैव समुत्थेयं विजानता ॥ १६ ॥
जिसकी शक्ति क्षीण हो रही हो, उस राजाके लिये ब्राह्मणको ही सबसे बड़ा सहायक बताया गया है; अतः बुद्धिमान् नरेशको ब्राह्मणके बलका आश्रय लेकर ही अपनी उन्नति करनी चाहिये ॥ १६ ॥
यदा भुविजयी राजा क्षेमं राष्ट्रेऽभिसंदधेत् ।
तदा वर्णा यथाधर्मं निविशेयुः कथंचन ॥ १७ ॥
जब भूतलपर विजयी राजा अपने राष्ट्रमें कल्याणमय शासन स्थापित करना चाहता हो, तब उसे चाहिये कि जिस किसी प्रकारसे सभी वर्णके लोगोंको अपने - अपने धर्मका पालन करनेमें लगाये रखे ॥ १७ ॥
उन्मर्यादे प्रवृत्ते तु दस्युभिः संकरे कृते ।
सर्वे वर्णा न दुष्येयुः शस्त्रवन्तो युधिष्ठिर ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! जब डाकू और लुटेरे धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हुए हों और प्रजामें वर्णसंकरता फैला रहे हों, उस समय इस अत्याचारको रोकनेके लिये यदि सभी वर्णोंके लोग हथियार उठा लें तो उन्हें कोई दोष नहीं लगता ॥ १८ ॥
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युधिष्ठिर उवाच
अथ चेत् सर्वतः क्षत्रं प्रदुष्येद् ब्राह्मणं प्रति ।
कस्तस्य ब्राह्मणस्त्राता को धर्मः किं परायणम् ॥ १ ९ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – पितामह! यदि क्षत्रिय जाति ही सब ओरसे ब्राह्मणोंके साथ दुर्व्यवहार करने लगे, उस समय उस ब्राह्मणकुलकी रक्षा कौन ब्राह्मण कर सकता है? उनके लिये कौन - सा धर्म ( कर्तव्य ) है तथा कौन- सा महान् आश्रय? ॥ १ ९ ॥ भीष्म उवाच
तपसा ब्रह्मचर्येण शस्त्रेण च बलेन च ।
अमायया मायया च नियन्तव्यं तदा भवेत् ॥ २० ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! उस समय ब्राह्मण अपने तपसे, ब्रह्मचर्यसे, शस्त्रसे, बलसे, निष्कपट व्यवहारसे अथवा भेदनीतिसे - जैसे भी सम्भव हो, उसी तरह क्षत्रिय जातिको दबानेका प्रयत्न करे ॥ २० ॥
क्षत्रियस्यातिवृत्तस्य ब्राह्मणेषु विशेषतः ।
ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात् क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम् ॥ २१ ॥
जब क्षत्रिय ही प्रजाके ऊपर, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणोंपर अत्याचार करने लगे तो उस समय उसे ब्राह्मण ही दबा सकता है; क्योंकि क्षत्रियकी उत्पत्ति ब्राह्मणसे ही हुई है ॥ २१ ॥
अद्भयोऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् ।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ २२ ॥
अग्नि जलसे, क्षत्रिय ब्राह्मणसे और लोहा पत्थरसे पैदा हुआ है । इनका तेज या प्रभाव सर्वत्र काम करता है; परंतु अपनी उत्पत्तिके मूल कारणोंसे मुकाबला पड़नेपर शान्त हो जाता है ॥ २२ ॥
यदा छिनत्त्ययोऽश्मानमग्निश्चापोऽभिगच्छति ।
क्षत्रं च ब्राह्मणं द्वेष्टि तदा नश्यन्ति ते त्रयः ॥ २३ ॥
जब लोहा पत्थर काटता है, अग्नि जलके पास जाती है और क्षत्रिय ब्राह्मणसे द्वेष करने लगता है, तब ये तीनों नष्ट हो जाते हैं ॥ २३ ॥
तस्माद् ब्रह्मणि शाम्यन्ति क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ।
समुदीर्णान्यजेयानि तेजांसि च बलानि च ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर! यद्यपि क्षत्रियोंके तेज और बल प्रचण्ड और अजेय होते हैं, तथापि ब्राह्मणसे टक्कर लेनेपर शान्त हो जाते हैं ॥ २४ ॥
ब्रह्मवीर्ये मृदुभूते क्षत्रवीर्ये च दुर्बले ।
दुष्टेषु सर्ववर्णेषु ब्राह्मणान् प्रति सर्वशः ॥ २५ ॥
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ये तत्र युद्धं कुर्वन्ति त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ।
ब्राह्मणान् परिरक्षन्तो धर्ममात्मानमेव च ॥ २६ ॥
मनस्विनो मन्युमन्तः पुण्यश्लोका भवन्ति ते ।
ब्राह्मणार्थं हि सर्वेषां शस्त्रग्रहणमिष्यते ॥ २७ ॥
जब ब्राह्मणकी शक्ति मन्द पड़ जाय, क्षत्रियका पराक्रम भी दुर्बल हो जाय और सभी वर्णोंके लोग सर्वथा ब्राह्मणोंसे दुर्भाव रखने लगें, उस समय जो लोग ब्राह्मणोंकी, धर्मकी तथा अपने आपकी रक्षाके लिये प्राणोंकी परवा न करके दुष्टोंके साथ क्रोधपूर्वक युद्ध करते हैं, उन मनस्वी पुरुषोंका पवित्र यश सब ओर फैल जाता है; क्योंकि ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये सबको शस्त्र ग्रहण करनेका अधिकार है ॥ २५–२७ ॥
अतिस्विष्टमधीतानां लोकानतितपस्विनाम् ।
अनाशनाग्न्योर्विशतां शूरा यान्ति परां गतिम् ॥ २८ ॥
अतिमात्रामें यज्ञ, वेदाध्ययन, तपस्या और उपवासव्रत करनेवालोंको तथा आत्मशुद्धिके लिये अग्निप्रवेश करनेवाले लोगोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, उनसे भी उत्तम लोक ब्राह्मणके लिये प्राण देनेवाले शूरवीरोंको प्राप्त होते हैं ॥ २८ ॥
ब्राह्मणस्त्रिषु वर्णेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति ।
एवमेवात्मनस्त्यागान्नान्यं धर्मं विदुर्जनाः ॥ २ ९ ॥
ब्राह्मण भी यदि तीनों वर्णोंकी रक्षाके लिये शस्त्र ग्रहण करे तो उसे दोष नहीं लगता । विद्वान् पुरुष इस प्रकार युद्धमें अपने शरीरके त्यागसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं मानते ॥ २ ९ ॥ तेभ्यो नमश्च भद्रं च ये शरीराणि जुह्वते ।
ब्रह्मद्विषो नियच्छन्तस्तेषां नोऽस्तु सलोकता ।
ब्रह्मलोकजितः स्वर्ग्यान् वीरांस्तान् मनुरब्रवीत् ॥ ३० ॥
जो लोग ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले दुराचारियोंको दबानेके लिये युद्धकी ज्वालामें अपने शरीरकी आहुति दे डालते हैं, उन वीरोंको नमस्कार है, उनका कल्याण हो । हम लोगोंको उन्हींके समान लोक प्राप्त हो । मनुजीने कहा है कि ' वे स्वर्गीय शूरवीर ब्रह्मलोकपर विजय पा जाते है ' ॥
यथाश्वमेधावभृथे स्नाताः पूता भवन्त्युत ।
दुष्कृतस्य प्रणाशेन ततः शस्त्रहता रणे ॥ ३१ ॥
जैसे अश्वमेध यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करनेवाले मनुष्य पापरहित एवं पवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार युद्धमें शस्त्रोंद्वारा मारे गये वीर अपने पाप नष्ट हो जानेके कारण पवित्र हो जाते हैं ॥ ३१ ॥
भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि ।
कारणाद् देशकालस्य देशकालः स तादृशः ॥ ३२ ॥
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देश- कालकी परिस्थितिके कारण कभी अधर्म तो धर्म हो जाता है और धर्म अधर्मरूपमें परिणत हो जाता है; क्योंकि वह वैसा ही देश काल है ॥ ३२ ॥
मैत्राः क्रूराणि कुर्वन्तो जयन्ति स्वर्गमुत्तमम् ।
धर्म्याः पापानि कुर्वाणा गच्छन्ति परमां गतिम् ॥ ३३ ॥
सबके प्रति मैत्रीका भाव रखनेवाले मनुष्य भी ( दूसरोंकी रक्षाके लिये किसी दुष्टके प्रति ) क्रूरतापूर्ण बर्ताव करके उत्तम स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं तथा धर्मात्मा पुरुष किसीकी रक्षाके लिये पाप ( हिंसा आदि ) करते हुए भी परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणस्त्रिषु कालेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति ।
आत्मत्राणे वर्णदोषे दुर्दम्यनियमेषु च ॥ ३४ ॥
अपनी रक्षाके लिये, अन्य वर्णोंमें यदि कोई बुराई आ रही हो तो उसे रोकनेके लिये तथा दुर्दान्त दुष्टोंका दमन करनेके लिये - इन तीन अवसरोंपर ब्राह्मण भी शस्त्र ग्रहण करे तो उसे दोष नहीं लगता ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अभ्युत्थिते दस्युबले क्षत्रार्थे वर्णसंकरे ।
सम्प्रमूढेषु वर्णेषु यद्यन्योऽभिभवेद् बली ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम ।
दस्युभ्योऽथ प्रजा रक्षेद् दण्डं धर्मेण धारयन् ॥ ३६ ॥
कार्यं कुर्यान्न वा कुर्यात् संवार्यो वा भवेन्न वा ।
तस्माच्छस्त्रं ग्रहीतव्यमन्यत्र क्षत्रबन्धुतः ॥ ३७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! नृपश्रेष्ठ! यदि डाकुओंका दल उत्तरोत्तर बढ़ रहा हो, समाजमें वर्णसंकरता फैल रही हो और क्षत्रियके प्रजापालनरूपी कार्यके लिये समस्त वर्णोंके लोग कोई उपाय न ढूँढ़ पाते हों, उस अवस्थामें यदि कोई बलवान् ब्राह्मण, वैश्य अथवा शूद्र धर्मकी रक्षाके निमित्त दण्ड धारण करके लुटेरोंके हाथसे प्रजाको बचा ले तो वह राजशासनका कार्य कर सकता है या नहीं । अथवा उसे इस कार्यसे रोकना चाहिये या नहीं? मेरा तो मत है कि क्षत्रियसे भिन्न वर्णके लोगोंको भी ऐसे अवसरोंपर अवश्य शस्त्र उठाना चाहिये ॥ ३५–३७ ॥ भीष्म उवाच
अपारे यो भवेत् पारमप्लवे यः प्लवो भवेत् ।
शूद्रो वा यदि वाप्यन्यः सर्वथा मानमर्हति ॥ ३८ ॥
भीष्मजी ने कहा- बेटा! जो अपार संकटसे पार लगा दे, नौकाके अभावमें डूबते हुएको जो नाव बनकर सहारा दे, वह शूद्र हो या कोई अन्य, सर्वथा सम्मानके योग्य
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है ॥ ३८ ॥
यमाश्रित्य नरा राजन् वर्तयेयुर्यथासुखम् ।
अनाथास्तप्यमानाश्च दस्युभिः परिपीडिताः ॥ ३ ९ ॥
तमेव पूजयेयुस्ते प्रीत्या स्वमिव बान्धवम् ।
अभीरभीक्ष्णं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति ॥ ४० ॥
डाकुओंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते हुए अनाथ मनुष्यगण जिसकी शरणमें जाकर सुखपूर्वक रह सकें, उसीको अपने बन्धु- वान्धवके समान मानकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसका आदर- सत्कार करना उनके लिये उचित है; क्योंकि कुरुनन्दन! जो निर्भय होकर बारंबार दूसरोंका संकट निवारण कर सके, वही राजोचित सम्मान पानेके योग्य है ॥ ३ ९ -४० ॥
किं तैर्येऽनडुहो नोह्याः किं धेन्वा वाप्यदुग्धया ।
वन्ध्यया भार्यया कोऽर्थः कोऽर्थो राज्ञाप्यरक्षता ॥ ४१ ॥
जो बोझ न ढो सकें, ऐसे बैलोंसे क्या लाभ? जो दूध न दे, ऐसी गाय किस कामकी? जो बाँझ हो, ऐसी स्त्रीसे क्या प्रयोजन है? और जो रक्षा न कर सके, ऐसे राजासे क्या लाभ है? ॥ ४१ ॥
यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
यथा ह्यनर्थः षण्ढो वा पार्थ क्षेत्रं यथोषरम् ॥ ४२ ॥
एवं विप्रोऽनधीयानो राजा यश्च न रक्षिता ।
मेघो न वर्षते यश्च सर्वथा ते निरर्थकाः ॥ ४३ ॥
कुन्तीनन्दन! जैसे काठका हाथी, चमड़ेका हिरन, हिजड़ा मनुष्य, ऊसर खेत तथा वर्षा न करनेवाला बादल - ये सब के सब व्यर्थ हैं, उसी प्रकार अपढ़ ब्राह्मण तथा रक्षा न करनेवाला राजा भी सर्वथा निरर्थक हैं ॥
नित्यं यस्तु सतो रक्षेदसतश्च निवर्तयेत् ।
स एव राजा कर्तव्यस्तेन सर्वमिदं धृतम् ॥ ४४ ॥
जो सदा सत्पुरुषोंकी रक्षा करे तथा दुष्टोंको दण्ड देकर दुष्कर्म करनेसे रोके, उसे ही राजा बनाना चाहिये; क्योंकि उसीके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् सुरक्षित होता है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अठहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७८ ॥
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एकोनाशीतितमोऽध्यायः ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता युधिष्ठिर उवाच
क्वसमुत्थाः कथंशीला ऋत्विजः स्युः पितामह ।
कथंविधाश्च राजेन्द्र तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- राजेन्द्र! वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! ऋत्विजोंकी उत्पत्ति किस निमित्तसे हुई है? उनके स्वभाव कैसे होने चाहिये? तथा वे किस - किस प्रकारके होते हैं? मुझे ये सब बातें बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
प्रतिकर्म पराचार ऋत्विजां स्म विधीयते ।
छन्दः सामादि विज्ञाय द्विजानां श्रुतमेव च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! जो ब्राह्मण छन्दःशास्त्र, ‘ ऋक्, ' साम' और ' यजुः ' नामक तीनों वेद तथा ऋषियोंके रचे हुए स्मृति और दर्शनशास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे ही ‘ ऋत्विज् ’ होने योग्य हैं, उन ऋत्विजोंका मुख्य आचार है— राजाके लिये ' शान्ति ’ ‘ पौष्टिक ’ आदि कर्मोंका अनुष्ठान ॥ २ ॥
ये त्वेकरतयो नित्यं धीराश्च प्रियवादिनः ।
परस्परस्य सुहृदः समन्तात् समदर्शिनः ॥ ३ ॥
जो सदा एकमात्र यजमानके ही हित- साधनमें तत्पर रहनेवाले, धीर, प्रियवादी, एक- दूसरेके सुहृद् तथा सब ओर समान दृष्टि रखनेवाले हैं, वे ही ऋत्विज् होनेके योग्य हैं ॥ ३ ॥
अनृशंसाः सत्यवाक्या अकुसीदा अथर्जवः ।
अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ॥ ४ ॥
यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते स पुरोहित उच्यते । जिनमें क्रूरताका' सर्वथा अभाव है, जो सत्यभाषण करनेवाले और सरल हैं, जो व्याज नहीं लेते तथा जिनमें द्रोह और अभिमानका अभाव है, जिनमें लज्जा, सहनशीलता, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह आदि गुण देखे जाते हैं, वे ही पुरोहित कहलाते हैं ॥ ४३ ॥
धीमान् सत्यधृतिर्दान्तो भूतानामविहिंसकः ।
अकामद्वेषसंयुक्तस्त्रिभिः शुक्लैः समन्वितः ॥५ ॥
अहिंसको ज्ञानतृप्तः स ब्रह्मासनमर्हति ।
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एते महर्त्विजस्तात सर्वे मान्या यथार्हतः ॥ ६ ॥
इसी तरह जो बुद्धिमान्, सत्यको धारण करने वाला, इन्द्रिय संयमी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला तथा राग-द्वेष आदि दोषोंसे दूर रहनेवाला है, जिसके शास्त्रज्ञान, सदाचार और कुल – ये तीनों अत्यन्त शुद्ध एवं निर्दोष हैं; जो अहिंसक और ज्ञान - विज्ञानसे तृप्त है, वही ब्रह्माके आसनपर बैठनेका अधिकारी है । तात! ये सभी महान् ऋत्विज् यथायोग्य सम्मानके पात्र हैं ॥ ५-६ ॥ युधिष्ठिर उवाच
यदिदं वेदवचनं दक्षिणासु विधीयते ।
इदं देयमिदं देयं न क्वचिद् व्यवतिष्ठते ॥ ७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — भारत! यह जो यज्ञसम्बन्धी दक्षिणाके विषयमें वेदवाक्य उपलब्ध होता है कि ' यह भी देना चाहिये, यह भी देना चाहिये ' यह वाक्य किसी सीमित वस्तुपर अवलम्बित नहीं है ॥ ७ ॥
नेदं प्रतिधनं शास्त्रमापद्धर्मानुशास्त्रतः ।
आज्ञा शास्त्रस्य घोरेयं न शक्तिं समवेक्षते ॥ ८ ॥
अतः दक्षिणामें दिये जानेवाले धनके विषयमें जो यह शास्त्र-वचन है, यह आपत्कालिक धर्मशास्त्रके अनुसार नहीं है । मेरी समझमें तो यह शास्त्रकी आज्ञा भयंकर है; क्योंकि यह इस बातकी ओर नहीं देखती कि दातामें कितने दानकी शक्ति है ॥ ८ ॥
श्रद्धावता च यष्टव्यमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ।
मिथ्योपेतस्य यज्ञस्य किमु श्रद्धा करिष्यति ॥ ९ ॥
दूसरी ओर वेदकी यह आज्ञा भी सुनी जाती है कि प्रत्येक श्रद्धालु पुरुषको यज्ञ करना चाहिये । यदि दरिद्र श्रद्धाके बलपर यज्ञमें प्रवृत्त हो और उचित दक्षिणा न दे सके तो वह यज्ञ मिथ्या भावसे युक्त होगा; उस दशामें उसकी न्यूनताकी पूर्ति श्रद्धा कैसे कर सकेगी? ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
न वेदानां परिभवान्न शाठ्येन न मायया ।
कश्चिन्महदवाप्नोति मा तेऽभूद् बुद्धिरीदृशी ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! वेदोंकी निन्दा करनेसे, शठतापूर्ण बर्तावसे तथा छल-कपटसे कोई भी महान् पद नहीं पाता है; अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी न हो ॥ १० ॥
यज्ञाङ्गं दक्षिणा तात वेदानां परिबृंहणम् ।
न यज्ञा दक्षिणाहीनास्तारयन्ति कथंचन ॥ ११ ॥
तात! दक्षिणा यज्ञोंका अङ्ग है । वही वेदोक्त यज्ञोंका विस्तार एवं उनमें न्यूनताकी पूर्ति करनेवाली है । दक्षिणाहीन यज्ञ किसी प्रकार भी यजमानका उद्धार नहीं कर
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सकते ॥ ११ ॥
शक्तिस्तु पूर्णपात्रेण सम्मिता न समाभवत् ।
अवश्यं तात यष्टव्यं त्रिभिर्वर्णैर्यथाविधि ॥ १२ ॥
जहाँ धनी और दरिद्रकी शक्तिका प्रश्न है, उधर भी शास्त्रकी दृष्टि है ही । दोनोंके लिये समान दक्षिणा नहीं रखी गयी है । ( दरिद्रकी ) शक्तिको पूर्णपात्रसे मापा गया है । अर्थात् जहाँ धनीके लिये बहुत धन देनेका विधान है, वहाँ दरिद्रके लिये एक पूर्णपात्र ही दक्षिणामें देनेका विधान कर दिया है; अतः तात! ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंके लोगोंको अवश्य ही विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२ ॥
सोमो राजा ब्राह्मणानामित्येषा वैदिकी स्थितिः ।
तं च विक्रेतुमिच्छन्ति न वृथा वृत्तिरिष्यते ॥ १३ ॥
वेदोंका यह सिद्धान्त है कि सोम ब्राह्मणोंका राजा है; परंतु यज्ञके लिये ब्राह्मणलोग उसे भी बेच देनेकी इच्छा रखते हैं । जहाँ यज्ञ आदि कोई अनिवार्य कारण उपस्थित न हो वहाँ व्यर्थ ही उदरपूर्तिके लिये सोमरसका विक्रय अभीष्ट नहीं है ॥ १३ ॥
तेन क्रीतेन यज्ञेन ततो यज्ञः प्रतायते ।
इत्येवं धर्मतो ध्यातमृषिभिर्धर्मचारिभिः ॥ १४ ॥
दक्षिणाद्वारा उस सोमरसके साथ खरीद किये हुए यज्ञ- साधनोंसे यजमानके यज्ञका विस्तार होता है । धर्मका आचरण करनेवाले ऋषियोंने इस विषयमें धर्मके अनुसार ऐसा ही विचार व्यक्त किया है ॥ १४ ॥
पुमान् यज्ञश्च सोमश्च न्यायवृत्तो यदा भवेत् ।
अन्यायवृत्तः पुरुषो न परस्य न चात्मनः ॥ १५ ॥
यज्ञकर्ता पुरुष, यज्ञ और सोमरस – ये तीनों जब न्याय - सम्पन्न होते हैं तब यज्ञका यथार्थरूपसे सम्पादन होता है । अन्यायपरायण पुरुष न दूसरेका भला कर सकता है, न अपना ही ॥ १५ ॥
शरीरवृत्तमास्थाय इत्येषा श्रूयते श्रुतिः ।
नातिसम्यक् प्रणीतानि ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ १६ ॥
शरीर- निर्वाहमात्रके लिये धन प्राप्त करके यज्ञमें प्रवृत्त हुए महामनस्वी ब्राह्मणोंद्वारा जो यज्ञ सम्पादित होते हैं, वे भी हिंसा आदि दोषोंसे युक्त होनेपर उत्तम फल नहीं देते हैं, ऐसा श्रुतिका सिद्धान्त सुननेमें आता है ॥
तपो यज्ञादपि श्रेष्ठमित्येषा परमा श्रुतिः ।
तत् ते तपः प्रवक्ष्यामि विद्वंस्तदपि मे शृणु ॥ १७ ॥
अतः यज्ञकी अपेक्षा भी तप श्रेष्ठ है, यह वेदका परम उत्तम वचन है । विद्वान् युधिष्ठिर! मैं तुम्हें तपका स्वरूप बताता हूँ, तुम मुझसे उसके विषयमें सुनो ॥ १७ ॥
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यं दमो घृणा ।
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एतत् तपो विदुर्धीरा न शरीरस्य शोषणम् ॥ १८ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रूरताको त्याग देना, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना तथा सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना- इन्हींको धीर पुरुषोंने तप माना है । केवल शरीरको सुखाना ही तप नहीं है ॥ १८ ॥
अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चाभिलङ्घनम् ।
अव्यवस्था च सर्वत्र तद् वै नाशनमात्मनः ॥ १ ९ ॥
वेदको अप्रामाणिक बताना, शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना तथा सर्वत्र अव्यवस्था पैदा करना —ये सब दुर्गुण अपना ही नाश करनेवाले हैं ॥ १ ९ ॥
निबोध देवहोतॄणां विधानं पार्थ यादृशम् ।
चित्तिः स्रुक् चित्तमाज्यं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ॥ २० ॥
कुन्तीनन्दन! दैवी सम्पदायुक्त होताओंके यज्ञ- सम्बन्धी उपकरण जिस प्रकारके होते हैं, उन्हें सुनो । उनके सहायक चित्ति ही स्रुक् है, चित्त ही आज्य ( घी ) है और उत्तम ज्ञान ही पवित्री है ॥ २० । |
सर्वं जिह्मं मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मणः पदम् ।
एतावान् ज्ञानविषयः किं प्रलापः करिष्यति ॥ २१ ॥
सारी कुटिलता मृत्युका स्थान है और सरलता परब्रह्मकी प्राप्तिका स्थान है । इतना ही ज्ञानका विषय है और सब प्रलापमात्र है, वह किस काम आयेगा? ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमेंउन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥