05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 581–590
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590
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कार्ये खलु विपन्ने त्वां सोऽधर्मस्तांश्च पीडयेत् ॥ १३ ॥
राजन्! तुमको किसीका कोई गुप्त धन ग्रहण नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह तुम्हारे कर्तव्य– न्यायधर्मका नाश करनेवाला होगा । यदि कहीं वास्तवमें तुम्हारे न्यायधर्मका नाश हुआ तो वह अधर्म तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियोंको बड़े कष्टमें डाल देगा ॥ १३ ॥
विद्रवेच्चैव राष्ट्रं ते श्येनात् पक्षिगणा इव ।
परिस्रवेच्च सततं नौर्विशीर्णेव सागरे । १४ ॥
फिर तो तुम्हें अन्यायी मानकर राष्ट्रकी सारी प्रजा तुमसे उसी प्रकार दूर भागेगी, जैसे बाज पक्षीके डरसे दूसरे पक्षी भागते हैं तथा जैसे टूटी हुई नाव समुद्रमें कहाँकी कहाँ बह जाती है, उसी प्रकार प्रजा धीरे- धीरे तुम्हारा राज्य छोड़कर अन्यत्र चली जायगी ॥ १४ ॥
प्रजाः पालयतोऽसम्यगधर्मेणेह भूपतेः ।
हार्दं भयं सम्भवति स्वर्गश्चास्य विरुद्धयते ॥ १५ ॥
जो राजा अन्याय एवं अधर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसके हृदयमें भय बना रहता है तथा उसका परलोक भी बिगड़ जाता है ॥ १५ ॥
अथ योऽधर्मतः पाति राजामात्योऽथ वाऽऽत्मजः ।
धर्मासने संनियुक्तो धर्ममूले नरर्षभ ॥ १६ ॥
कार्येष्वधिकृताः सम्यगकुर्वन्तो नृपानुगाः ।
आत्मानं पुरतः कृत्वा यान्त्यधः सहपार्थिवाः ॥ १७ ॥
नरश्रेष्ठ! धर्म ही जिसकी जड़ है, उस धर्मासन अथवा न्यायासनपर बैठकर जो राजा, मन्त्री अथवा राजकुमार धर्म- पूर्वक प्रजाकी रक्षा नहीं करता तथा राजाका अनुसरण करनेवाले राज्यके दूसरे अधिकारी भी यदि अपनेको सामने रखकर प्रजाके साथ उचित बर्ताव नहीं करते हैं तो वे राजाके साथ ही स्वयं भी नरकमें गिर जाते हैं ॥ १६-१७ ॥
बलात्कृतानां बलिभिः कृपणं बहु जल्पताम् ।
नाथो वै भूमिपो नित्यमनाथानां नृणां भवेत् ॥ १८ ॥
बलवानोंके बलात्कार ( अत्याचार ) से पीड़ित हो अत्यन्त दीनभावसे पुकार मचाते हुए अनाथ मनुष्योंको आश्रय देनेवाला उनका संरक्षक या स्वामी राजा ही होता है ॥
ततः साक्षिबलं साधु द्वैधवादकृतं भवेत् ।
असाक्षिकमनाथं वा परीक्ष्यं तद् विशेषतः ॥ १ ९ ॥
जब कोई अभियोग उपस्थित हो और उसमें उभय पक्षद्वारा दो प्रकारकी बातें कही जायँ, तब उसमें यथार्थताका निर्णय करनेके लिये साक्षीका बल श्रेष्ठ माना गया है ( अर्थात् मौकेका गवाह बुलाकर उससे सच्ची बात जाननेका प्रयत्न करना चाहिये ) । यदि कोई गवाह न हो तथा उस मामलेकी पैरवी करनेवाला कोई मालिक-मुख्तार न दिखायी दे तो राजाको स्वयं ही विशेष प्रयत्न करके उसकी छानबीन करनी चाहिये ॥ १ ९ ॥ अपराधानुरूपं च दण्डं पापेषु धारयेत् ।
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वियोजयेद् धनैरृद्धानधनानथ बन्धनैः ॥ २० ॥
तत्पश्चात् अपराधियोंको अपराधके अनुरूप दण्ड देना चाहिये । अपराधी धनी हो तो उसको उसकी सम्पत्तिसे वञ्चित कर दे और निर्धन हो तो उसे बन्दी बनाकर कारागारमें डाल दे ॥ २० ॥
विनयेच्चापि दुर्वृत्तान् प्रहारैरपि पार्थिवः ।
सान्त्वेनोपप्रदानेन शिष्टांश्च परिपालयेत् ॥ २१ ॥
जो अत्यन्त दुराचारी हों, उन्हें मार- पीटकर भी राजा राहपर लानेका प्रयत्न करे तथा जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उन्हें मीठी वाणीसे सान्त्वना देते हुए सुख - सुविधाकी वस्तुएँ अर्पित करके उनका पालन करे ॥ २१ ॥
राज्ञो वधं चिकीर्षेद् यस्तस्य चित्रो वधो भवेत् ।
आदीपकस्य स्तेनस्य वर्णसंकरिकस्य च ॥ २२ ॥
जो राजाका वध करनेकी इच्छा करे, जो गाँव या घरमें आग लगावे, चोरी करे अथवा व्यभिचारद्वारा वर्णसंकरता फैलानेका प्रयत्न करे, ऐसे अपराधीका वध अनेक प्रकारसे करना चाहिये ॥ २२ ॥
सम्यक् प्रणयतो दण्डं भूमिपस्य विशाम्पते ।
युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एव हि शाश्वतः ॥ २३ ॥
प्रजानाथ! जो भलीभाँति विचार करके अपराधीको उचित दण्ड देता है और अपने कर्त्तव्यपालनके लिये सदा उद्यत रहता है, उस राजाको वध और बन्धनका पाप नहीं लगता, अपितु उसे सनातन धर्मकी ही प्राप्ति होती है ॥
कामकारेण दण्डं तु यः कुर्यादविचक्षणः ।
स इहाकीर्तिसंयुक्तो मृतो नरकमृच्छति ॥ २४ ॥
जो अज्ञानी नरेश बिना विचारे स्वेच्छापूर्वक दण्ड देता है, वह इस लोकमें तो अपयशका भागी होता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है ॥ २४ ॥
न परस्य प्रवादेन परेषां दण्डमर्पयेत् ।
आगमानुगमं कृत्वा बध्नीयान्मोक्षयीत वा ॥ २५ ॥
राजा दूसरेके अपराधपर दूसरोंको दण्ड न दे, बल्कि शास्त्रके अनुसार विचार करके अपराध सिद्ध होता हो तो अपराधीको कैद करे और सिद्ध न होता हो तो उसे मुक्त कर दे ॥ २५ ॥
न तु हन्यान्नृपो जातु दूतं कस्याञ्चिदापदि ।
दूतस्य हन्ता निरयमाविशेत् सचिवैः सह ॥ २६ ॥
राजा कभी किसी आपत्तिमें भी किसीके दूतकी हत्या न करे। दूतका वध करनेवाला नरेश अपने मन्त्रियोंसहित नरकमें गिरता है ॥ २६ ॥
यथोक्तवादिनं दूतं क्षत्रधर्मरतो नृपः ।
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यो हन्यात् पितरस्तस्य भ्रूणहत्यामवाप्नुयुः ॥ २७ ॥
क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाला जो राजा अपने स्वामीके कथनानुसार यथार्थ बातें कहनेवाले दूतको मार डालता है, उसके पितरोंको भ्रूणहत्याके फलका भोग करना पड़ता ॥ २७ ॥
कुलीनः शीलसम्पन्नो वाग्मी दक्षः प्रियंवदः ।
यथोक्तवादी स्मृतिमान् दूतः स्यात् सप्तभिर्गुणैः ॥ २८ ॥
राजाके दूतको कुलीन, शीलवान्, वाचाल, चतुर, प्रिय वचन बोलनेवाला, संदेशको ज्यों का- त्यों कह देनेवाला तथा स्मरणशक्तिसे सम्पन्न- इस प्रकार सात गुणोंसे युक्त होना चाहिये ॥ २८ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तः प्रतिहारोऽस्य रक्षिता ।
शिरोरक्षश्च भवति गुणैरेतैः समन्वितः ॥ २ ९ ॥
राजाके द्वारकी रक्षा करनेवाले प्रतीहारी ( द्वारपाल) में भी ये ही गुण होने चाहिये । उसका शिरोरक्षक ( अथवा अङ्गरक्षक ) भी इन्हीं गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ २ ९ ॥
धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः संधिविग्रहिको भवेत् ।
मतिमान् धृतिमान् ह्रीमान् रहस्यविनिगूहिता ॥ ३० ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नः शुक्लोऽमात्यः प्रशस्यते ।
एतैरेव गुणैर्युक्तस्तथा सेनापतिर्भवेत् ॥ ३१ ॥
सन्धि- विग्रहके अवसरको जाननेवाला, धर्मशास्त्रका तत्त्वज्ञ, बुद्धिमान्, धीर, लज्जावान्, रहस्यको गुप्त रखनेवाला, कुलीन, साहसी तथा शुद्ध हृदयवाला मन्त्री ही उत्तम माना जाता है । सेनापति भी इन्हीं गुणोंसे युक्त होना चाहिये ॥ ३०-३१ ॥
व्यूहयन्त्रायुधानां च तत्त्वज्ञो विक्रमान्वितः ।
वर्षशीतोष्णवातानां सहिष्णुः पररन्ध्रवित् ॥ ३२ ॥
इनके सिवा वह व्यूहरचना ( मोर्चाबंदी ), यन्त्रोंके प्रयोग तथा नाना प्रकारके अन्यान्य अस्त्र- शस्त्रोंको चलानेकी कलाका तत्त्वज्ञ- विशेष जानकार हो, पराक्रमी हो, सर्दी, गर्मी, आँधी और वर्षाके कष्टको धैर्यपूर्वक सहनेवाला तथा शत्रुओंके छिद्रको समझनेवाला हो ॥ ३२ ॥
विश्वासयेत् परांश्चैव विश्वसेच्च न कस्यचित् ।
पुत्रेष्वपि हि राजेन्द्र विश्वासो न प्रशस्यते ॥ ३३ ॥
राजा दूसरोंके मनमें अपने ऊपर विश्वास पैदा करे; परंतु स्वयं किसीका भी विश्वास न करे । राजेन्द्र! अपने पुत्रोंपर भी पूरा - पूरा विश्वास करना अच्छा नहीं माना गया है ॥ ३३ ॥
एतच्छास्त्रार्थतत्त्वं तु मयाऽऽख्यातं तवानघ ।
अविश्वासो नरेन्द्राणां गुह्यं परममुच्यते ॥ ३४ ॥
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निष्पाप युधिष्ठिर! यह नीतिशास्त्रका तत्त्व है, जिसे मैंने तुम्हें बताया है । किसीपर भी पूरा विश्वास न करना नरेशोंका परम गोपनीय गुण बताया जाता है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अमात्यविभागे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मन्त्रीविभागविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
१. सेवा करनेको सदा तैयार रहना, कही हुई बातको ध्यानसे सुनना, उसे ठीक-ठीक समझना, याद रखना, किस कार्यका कैसा परिणाम होगा- इसपर तर्क करना, यदि अमुक प्रकारसे कार्य सिद्ध न हुआ तो क्या करना चाहिये? —इस तरह वितर्क करना, शिल्प और व्यवहारकी जानकारी रखना और तत्त्वका बोध होना — ये आठ गुण पौराणिक सूतमें होने चाहिये । २. शिकार, जूआ, परस्त्रीप्रसंग और मदिरापान – ये चार कामजनित दोष और मारना, गाली बकना तथा दूसरेकी चीज खराब कर देना — ये तीन क्रोधजनित दोष मिलकर सात दुर्व्यसन माने गये हैं ।
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षडशीतितमोऽध्यायः राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश युधिष्ठिरउवाच
कथंविधं पुरं राजा स्वयमावस्तुमर्हति ।
कृतं वा कारयित्वा वा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! राजाको स्वयं कैसे नगरमें निवास करना चाहिये? वह पहलेसे बनी हुई राजधानीमें रहे या नये नगरका निर्माण कराकर उसमें निवास करे, यह मुझे बताइये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
वस्तव्यं यत्र कौन्तेय सपुत्रज्ञातिबन्धुना ।
न्याय्यं तत्र परिप्रष्टुं वृत्तिं गुप्तिं च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- भारत! कुन्तीनन्दन! पुत्र, कुटुम्बीजन तथा बन्धुवर्गके साथ राजा जिस नगरमें निवास करे, उसमें जीवन निर्वाह तथा रक्षाकी व्यवस्थाके सम्बन्धमें तुम्हारा प्रश्न करना न्यायसङ्गत है ॥ २ ॥
तस्मात् ते वर्तयिष्यामि दुर्गकर्म विशेषतः ।
श्रुत्वा तथा विधातव्यमनुष्ठेयं च यत्नतः ॥ ३ ॥
इसलिये मैं तुम्हारे समक्ष दुर्गनिर्माणकी क्रियाका विशेषरूपसे वर्णन करूँगा । तुम इस विषयको सुनकर वैसा ही करना और प्रयत्नपूर्वक दुर्गका निर्माण कराना ॥
षड्विधं दुर्गमास्थाय पुराण्यथ निवेशयेत् ।
सर्वसम्पत्प्रधानं यद् बाहुल्यं चापि सम्भवेत् ॥ ४ ॥
जहाँ सब प्रकारकी सम्पत्ति प्रचुरमात्रामें भरी हुई हो तथा जो स्थान बहुत विस्तृत हो, वहाँ छः प्रकारके दुर्गोंका आश्रय लेकर राजाको नये नगर बसाने चाहिये ॥
धन्वदुर्गं महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च ।
मनुष्यदुर्गं अब्दुर्गं वनदुर्गं च तानि षट् ॥ ५ ॥
उन छहों दुर्गोंके नाम इस प्रकार हैं- धन्वदुर्ग-2, महीदुर्ग, गिरिदुर्ग-३, मनुष्यदुर्ग, जलदुर्ग, तथा वनदुर्ग ॥ ५ ॥
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यत्पुरं दुर्गसम्पन्नं धान्यायुधसमन्वितम् ।
दृढप्राकारपरिखं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ ६ ॥
विद्वांसः शिल्पिनो यत्र निचयाश्च सुसंचिताः ।
धार्मिकश्च जनो यत्र दाक्ष्यमुत्तममास्थितः ॥ ७ ॥
ऊर्जस्विनरनागाश्वं चत्वरापणशोभितम् ।
प्रसिद्धव्यवहारं च प्रशान्तमकुतोभयम् ॥ ८ ॥
सुप्रभं सानुनादं च सुप्रशस्तनिवेशनम् ।
शुराढ्यजनसम्पन्नं ब्रह्मघोषानुनादितम् ॥ ९ ॥
समाजोत्सवसम्पन्नं सदा पूजितदैवतम् ।
वश्यामात्यबलो राजा तत्पुरं स्वयमाविशेत् ॥ १० ॥
जिस नगरमें इनमेंसे कोई-न - कोई दुर्ग हो, जहाँ अन्न और अस्त्र- शस्त्रोंकी अधिकता हो, जिसके चारों ओर मजबूत चहारदीवारी और गहरी एवं चौड़ी खाई बनी हो, जहाँ हाथी, घोड़े और रथोंकी बहुतायत हो, जहाँ विद्वान् और कारीगर बसे हों, जिस नगरमें आवश्यक वस्तुओंके संग्रहसे भरे हुए कई भंडार हों, जहाँ धार्मिक तथा कार्यकुशल मनुष्योंका निवास हो, जो बलवान् मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे सम्पन्न हो, चौराहे तथा बाजार जिसकी शोभा बढ़ा रहे हों, जहाँका न्याय-विचार एवं न्यायालय सुप्रसिद्ध हो, जो सब प्रकारसे शान्तिपूर्ण हो, जहाँ कहींसे कोई भय या उपद्रव न हो, जिसमें रोशनीका अच्छा प्रबन्ध हो, संगीत और वाद्योंकी ध्वनि होती रहती हो, जहाँका प्रत्येक घर सुन्दर और सुप्रशस्त हो, जिसमें बड़े - बड़े शूरवीर और धनाढ्य लोग निवास करते हों, वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती हो तथा जहाँ सदा ही सामाजिक उत्सव और देवपूजनका क्रम चलता रहता हो, ऐसे नगरके भीतर अपने वशमें रहनेवाले मन्त्रियों तथा सेनाके साथ राजाको स्वयं निवास करना चाहिये ॥ ६— १० ॥
तत्र कोशं बलं मित्रं व्यवहारं च वर्धयेत् ।
पुरे जनपदे चैव सर्वदोषान् निवर्तयेत् ॥ ११ ॥
राजाको चाहिये कि वह उस नगरमें कोष, सेना, मित्रोंकी संख्या तथा व्यवहारको बढ़ावे । नगर तथा बाहरके ग्रामोंमें सभी प्रकारके दोषोंको दूर करे ॥ ११ ॥
भाण्डागारायुधागारं प्रयत्नेनाभिवर्धयेत् ।
निचयान् वर्धयेत् सर्वांस्तथा यन्त्रायुधालयान् ॥ १२ ॥
अन्नभण्डार तथा अस्त्र- शस्त्रोंके संग्रहालयको प्रयत्नपूर्वक बढ़ावे, सब प्रकारकी वस्तुओंके संग्रहालयोंकी भी वृद्धि करे, यन्त्रों तथा अस्त्र- शस्त्रोंके कारखानोंकी उन्नति करे ॥ १२ ॥
काष्ठलोहतुषाङ्गारदारुशृङ्गास्थिवैणवान् ।
मज्जा स्नेहवसा क्षौद्रमौषधग्राममेव च ॥ १३ ॥
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शणं सर्जरसं धान्यमायुधानि शरांस्तथा ।
चर्म स्नायुं तथा वेत्रं मुञ्जबल्वजबन्धनान् ॥ १४ ॥
काठ, लोहा, धानकी भूसी, कोयला, बाँस, लकड़ी, सींग, हड्डी, मज्जा, तेल, घी, चरबी, शहद, औषधसमूह, सन, राल, धान्य, अस्त्र- शस्त्र, बाण, चमड़ा, ताँत, बेंत तथा मूँज और बल्वजकी रस्सी आदि सामग्रियोंका संग्रह रखे ॥ १३-१४ ॥
आशयाश्चोदपानाश्च प्रभूतसलिलाकराः ।
निरोद्धव्याः सदा राज्ञा क्षीरिणश्च महीरुहाः ॥ १५ ॥
जलाशय ( तालाब, पोखरे आदि ), उदपान (कुँए, बावड़ी आदि ), प्रचुर जलराशिसे भरे हुए बड़े -बड़े तालाब तथा दूधवाले वृक्ष-इन सबकी राजाको सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १५ ॥
सत्कृताश्च प्रयत्नेन आचार्यर्त्विक्पुरोहिताः ।
महेष्वासाः स्थपतयः सांवत्सरचिकित्सकाः ॥ १६ ॥
आचार्य, ऋत्विज्, पुरोहित और महान् धनुर्धरोंका तथा घर बनानेवालोंका, वर्षफल बतानेवाले ज्यौतिषियोंका और वैद्योंका यत्नपूर्वक सत्कार करे ॥ १६ ॥
प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता दक्षाः शूरा बहुश्रुताः ।
कुलीनाः सत्त्वसम्पन्ना युक्ताः सर्वेषु कर्मसु ॥ १७ ॥
विद्वान्, बुद्धिमान्, जितेन्द्रिय, कार्यकुशल, शूर, बहुज्ञ, कुलीन तथा साहस और धैर्यसे सम्पन्न पुरुषोंको यथायोग्य समस्त कर्मोंमें लगावे ॥ १७ ॥
पूजयेद् धार्मिकान् राजा निगृह्णीयादधार्मिकान् ।
नियुञ्ज्याच्च प्रयत्नेन सर्ववर्णान् स्वकर्मसु ॥ १८ ॥
राजाको चाहिये कि धार्मिक पुरुषोंका सत्कार करे और पापियोंको दण्ड दे । वह सभी वर्णोंको प्रयत्नपूर्वक अपने - अपने कर्मोंमें लगावे ॥ १८ ॥
बाह्यमाभ्यन्तरं चैव पौरजानपदं तथा ।
चारैः सुविदितं कृत्वा ततः कर्म प्रयोजयेत् ॥ १ ९ ॥
गुप्तचरोंद्वारा नगर तथा छोटे ग्रामोंके बाहरी और भीतरी समाचारोंको अच्छी तरह जानकर फिर उसके अनुसार कार्य करे ॥ १ ९ ॥
चरान्मन्त्रं च कोशं च दण्डं चैव विशेषतः ।
अनुतिष्ठेत् स्वयं राजा सर्वं ह्यत्र प्रतिष्ठितम् ॥ २० ॥
गुप्तचरोंसे मिलने, गुप्त सलाह करने, खजानेकी जाँच- पड़ताल करने तथा विशेषतः अपराधियोंको दण्ड देनेका कार्य राजा स्वयं करे; क्योंकि इन्हींपर सारा राज्य प्रतिष्ठित है ॥ २० ॥
उदासीनारिमित्राणां सर्वमेव चिकीर्षितम् ।
पुरे जनपदे चैव ज्ञातव्यं चारचक्षुषा ॥ २१ ॥
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राजाको गुप्तचररूपी नेत्रोंके द्वारा देखकर सदा इस बातकी जानकारी रखनी चाहिये कि मेरे शत्रु, मित्र तथा तटस्थ व्यक्ति नगर और छोटे ग्रामोंमें कब क्या करना चाहते हैं? ॥ २१ ॥
ततस्तेषां विधातव्यं सर्वमेवाप्रमादतः ।
भक्तान् पूजयता नित्यं द्विषतश्च निगृह्णता ॥ २२ ॥
उनकी चेष्टाएँ जान लेनेके पश्चात् उनके प्रतीकारके लिये सारा कार्य बड़ी सावधानीके साथ करना चाहिये । राजाको उचित है कि वह अपने भक्तोंका सदा आदर करे और द्वेष रखनेवालोंको कैद कर ले ॥ २२ ॥
यष्टव्यं क्रतुभिर्नित्यं दातव्यं चाप्यपीडया ।
प्रजानां रक्षणं कार्यं न कार्यं धर्मबाधकम् ॥ २३ ॥
उसे प्रतिदिन नाना प्रकारके यज्ञ करना तथा दूसरोंको कष्ट न पहुँचाते हुए दान देना चाहिये । वह प्रजाजनोंकी रक्षा करे और कोई भी कार्य ऐसा न करे जिससे धर्ममें बाधा आती हो ॥ २३ ॥
कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च योषिताम् ।
योगक्षेमं च वृत्तिं च नित्यमेव प्रकल्पयेत् ॥ २४ ॥
दीन, अनाथ, वृद्ध तथा विधवा स्त्रियोंके योगक्षेम एवं जीविकाका सदा ही प्रबन्ध करे ॥ २४ ॥
आश्रमेषु यथाकालं चैलभाजनभोजनम् ।
सदैवोपहरेद् राजा सत्कृत्याभ्यर्च्य मान्य च ॥ २५ ॥
राजा आश्रमोंमें यथासमय वस्त्र, बर्तन और भोजन आदि सामग्री सदा ही भेजा करे, तथा सबको सत्कार, पूजन एवं सम्मानपूर्वक वे वस्तुएँ अर्पित करे ॥
आत्मानं सर्वकार्याणि तापसे राष्ट्रमेव च ।
निवेदयेत् प्रयत्नेन तिष्ठेत् प्रह्वश्च सर्वदा ॥ २६ ॥
अपने राज्यमें जो तपस्वी हों, उन्हें अपने शरीर- सम्बन्धी, सम्पूर्ण कार्यसम्बन्धी तथा राष्ट्रसम्बन्धी समाचार प्रयत्नपूर्वक बताया करे और उनके सामने सदा विनीतभावसे रहे ॥ २६ ॥
सर्वार्थत्यागिनं राजा कुले जातं बहुश्रुतम् ।
पूजयेत् तादृशं दृष्ट्वा शयनासनभोजनैः ॥ २७ ॥
जिसने सम्पूर्ण स्वार्थीका परित्याग कर दिया है, ऐसे कुलीन एवं बहुश्रुत विद्वान् तपस्वीको देखकर राजा शय्या, आसन और भोजन देकर उसका सम्मान करे ॥
तस्मिन् कुर्वीत विश्वासं राजा कस्याञ्चिदापदि ।
तापसेषु हि विश्वासमपि कुर्वन्ति दस्यवः ॥ २८ ॥
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कैसी भी आपत्तिका समय क्यों न हो? राजाको तो तपस्वीपर विश्वास करना ही चाहिये; क्योंकि चोर और डाकू भी तपस्वी महात्माओंपर विश्वास करते हैं ॥
तस्मिन् निधीनादधीत प्रज्ञां पर्याददीत च ।
न चाप्यभीक्ष्णं सेवेत भृशं वा प्रतिपूजयेत् ॥ २ ९ ॥
राजा उस तपस्वीके निकट अपने धनकी निधियोंको रखे और उससे सलाह भी लिया करे; परंतु बार- बार उसके पास जाना- आना और उसका सङ्ग न करे, तथा उसका अधिक सम्मान भी न करे ( अर्थात् गुप्तरूपसे ही उसकी सेवा और सम्मान करे । लोगोंपर इस बातको प्रकट न होने दे ) ॥ २ ९ ॥
अन्यः कार्यः स्वराष्ट्रेषु परराष्ट्रेषु चापरः ।
अटवीषु परः कार्यः सामन्तनगरेष्वपि ॥ ३० ॥
राजा अपने राज्यमें, दूसरोंके राज्योंमें, जंगलोंमें तथा अपने अधीन राजाओंके नगरोंमें भी एक- एक भिन्न- भन्न तपस्वीको अपना सुहृद् बनाये रखे ॥ ३० ॥
तेषु सत्कारमानाभ्यां संविभागांश्च कारयेत् ।
परराष्ट्राटवीस्थेषु यथा स्वविषये तथा ॥ ३१ ॥
उन सबको सत्कार और सम्मानके साथ आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करे । जैसे अपने राज्यके तपस्वीका आदर करे, वैसे ही दूसरे राज्यों तथा जंगलोंमें रहनेवाले तापसोंका भी सम्मान करना चाहिये ॥ ३१ ॥
ते कस्याञ्चिदवस्थायां शरणं शरणार्थिने ।
राज्ञे दद्युर्यथाकामं तापसाः संशितव्रताः ॥ ३२ ॥
वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शरणार्थी राजाको किसी भी अवस्थामें इच्छानुसार शरण दे सकते हैं ॥ ३२ ॥
एष ते लक्षणोद्देशः संक्षेपेण प्रकीर्तितः ।
यादृशे नगरे राजा स्वयमावस्तुमर्हति ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार राजाको स्वयं जैसे नगरमें निवास करना चाहिये, उसका लक्षण मैंने यहाँ संक्षेपसे बताया है ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गपरीक्षायां षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गपरीक्षाविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
१. धन्वदुर्गका दूसरा नाम मरुदुर्ग भी है । जिसके चारों ओर बालूका घेरा हो, उस किलेको धन्वदुर्ग कहते हैं ।
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२. समतल जमीनके अंदर बना हुआ किला या तहखाना महीदुर्ग कहलाता है । ३. पर्वतशिखरपर बना हुआ वह किला जो चारों ओरसे उत्तुंग पर्वतमालाओंद्वारा घिरा हुआ हो, गिरिदुर्ग कहलाता है । ४. फौजी किलेका ही नाम मनुष्यदुर्ग है । ५. जिसके चारों ओर जलका घेरा हो, वह जलदुर्ग कहलाता है । ६. जो स्थान कटवाँसी आदिके घने जंगलसे घिरा हुआ हो, उसे वनदुर्ग कहा गया है ।