05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 61–70

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

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गीताप्रेस, गोरखपुर शोकाकुल युधिष्ठिरकी देवर्षि नारदके द्वारा सान्त्वना

पृष्ठ 62

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गीताप्रेस गोरखपुर महाभारतकी समाप्तिपर महाराज युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें प्रवेश

पृष्ठ 63

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गीताप्रेस, गोरखपुर कपोतके द्वारा व्याधका आतिथ्य सत्कार

पृष्ठ 64

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गीताप्रेस, गोरखपुर कौशिक ब्राह्मणको सावित्रीदेवीका प्रत्यक्ष दर्शन

पृष्ठ 65

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1001 गीताप्रेस गोरखपुर वैश्य तुलाधारके द्वारा मुनि जाजलिका सत्कार

पृष्ठ 66

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गीताप्रेस, गोरखपुर नारदजीको भगवान्के विश्वरूपका दर्शन

पृष्ठ 67

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100 गीताप्रेस गोरखपुर भगवान् हयग्रीव वेदोंको रसातलसे लाकर ब्रह्माजीको लौटा रहे हैं

पृष्ठ 68

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गीताप्रेस, गोरखपुर इन्द्रकी ब्राह्मणवेषमें दैत्यराज प्रह्लादसे भेंट

पृष्ठ 69

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नरेश्वर! जब आप यह समृद्धिशाली राज्य छोड़कर हाथमें खपड़ा लिये घर- घर भीख माँगनेकी नीचातिनीच वृत्तिका आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करने लगेंगे, तब लोग आपको क्या कहेंगे? ॥ ७ ॥

सर्वारम्भान् समुत्सृज्य हतस्वस्तिरकिंचनः ।

कस्मादाशंससे भैक्ष्यं कर्तुं प्राकृतवत् प्रभो ॥ ८ ॥

प्रभो! आप सारे उद्योग छोड़कर कल्याणके साधनोंसे हीन और अकिंचन हुए साधारण पुरुषोंके समान भीख माँगनेकी इच्छा क्यों करते हैं? ॥ ८ ॥

अस्मिन् राजकुले जातो जित्वा कृत्स्नां वसुंधराम् ।

धर्मार्थावखिलौ हित्वा वनं मौढ्यात् प्रतिष्ठसे ॥ ९ ॥

इस राजकुलमें जन्म लेकर सारे भूमण्डलपर विजय प्राप्त करके अब सम्पूर्ण धर्म और अर्थ दोनोंको छोड़कर आप मोहके कारण ही वनमें जानेको उद्यत हुए हैं ॥ ९ ॥

यदीमानि हवींषीह विमथिष्यन्त्यसाधवः ।

भवता विप्रहीणानि प्राप्तं त्वामेव किल्बिषम् ॥ १० ॥

यदि आपके त्याग देनेपर यज्ञकी इन संचित सामग्रियोंको दुष्ट लोग नष्ट कर देंगे तो इसका पाप आपको ही लगेगा ( अर्थात् आपने यज्ञ- याग छोड़ दिये हैं, अतः आपको आदर्श मानकर दूसरे लोग भी इस कर्मसे उदासीन हो जायँगे, उस दशामें इस धर्मकृत्यका उच्छेद हो जायगा और इसका दोष आपके सिर ही लगेगा) ॥ १० ॥

आकिंचन्यं मुनीनां च इति वै नहुषोऽब्रवीत् ।

कृत्वा नृशंसं ह्यधने धिगस्त्वधनतामिह ॥ ११ ॥

राजा नहुषने निर्धनावस्थामें क्रूरतापूर्ण कर्म करके यह दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट किया था कि ‘ इस जगत्में निर्धनताको धिक्कार है! सर्वस्व त्यागकर निर्धन या अकिंचन हो जाना यह मुनियोंका ही धर्म है, राजाओंका नहीं ' ॥

अश्वस्तनमृषीणां हि विद्यते वेद तद् भवान् ।

यं त्विमं धर्ममित्याहुर्धनादेष प्रवर्तते ॥ १२ ॥

आप भी इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि दूसरे दिनके लिये संग्रह न करके प्रतिदिन माँगकर खाना यह ऋषि - मुनियोंका ही धर्म है । जिसे राजाओंका धर्म कहा गया है, वह तो धनसे ही सम्पन्न होता है ॥ १२ ॥

धर्मं संहरते तस्य धनं हरति यस्य सः ।

ह्रियमाणे धने राजन् वयं कस्य क्षमेमहि ॥ १३ ॥

राजन्! जो मनुष्य जिसका धन हर लेता है, वह उसके धर्मका भी संहार कर देता है । यदि हमारे धनका अपहरण होने लगे तो हम किसको और कैसे क्षमा कर सकते हैं? ॥ १३ ॥

अभिशस्तं प्रपश्यन्ति दरिद्रं पार्श्वतः स्थितम् ।

पृष्ठ 70

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दरिद्रं पातकं लोके न तच्छंसितुमर्हति ॥ १४ ॥

दरिद्र मनुष्य पासमें खड़ा हो तो लोग इस तरह उसकी ओर देखते हैं, मानो वह कोई पापी या कलंकित हो; अतः दरिद्रता इस जगत्में एक पातक है । आप मेरे आगे उसकी प्रशंसा न करें ॥ १४ ॥

पतितः शोच्यते राजन् निर्धनश्चापि शोच्यते ।

विशेषं नाधिगच्छामि पतितस्याधनस्य च ॥ १५ ॥

राजन्! जैसे पतित मनुष्य शोचनीय होता है, वैसे ही निर्धन भी होता है; मुझे पतित और निर्धनमें कोई अन्तर नहीं जान पड़ता ॥ १५ ॥

अर्थेभ्यो हि विवृद्धेभ्यः सम्भृतेभ्यस्ततस्ततः ।

क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ १६ ॥

जैसे पर्वतोंसे बहुत -सी नदियाँ बहती रहती हैं, उसी प्रकार बढ़े हुए संचित धनसे सब प्रकारके शुभ कर्मोंका अनुष्ठान होता रहता है ॥ १६ ॥

अर्थाद् धर्मश्च कामश्च स्वर्गश्चैव नराधिप ।

प्राणयात्रापि लोकस्य विना ह्यर्थं न सिद्धयति ॥ १७ ॥

नरेश्वर! धनसे ही धर्म, काम और स्वर्गकी सिद्धि होती है । लोगोंके जीवनका निर्वाह भी बिना धनके नहीं होता ॥ १७ ॥

अर्थेन हि विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः ।

विच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ १८ ॥

जैसे गर्मीमें छोटी - छोटी नदियाँ सूख जाती हैं, उसी प्रकार धनहीन हुए मन्दबुद्धि मनुष्यकी सारी क्रियाएँ छिन्न - भिन्न हो जाती हैं ॥ १८ ॥

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।

यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ १ ९ ॥

जिसके पास धन होता है, उसीके बहुत - से मित्र होते हैं; जिसके पास धन है, उसीके भाई- बन्धु हैं; संसारमें जिसके पास धन है, वही पुरुष कहलाता है और जिसके पास धन है, वही पण्डित माना जाता है ॥

अधनेनार्थकामेन नार्थः शक्यो विधित्सितुम् ।

अर्थैरर्था निबध्यन्ते गजैरिव महागजाः ॥ २० ॥

निर्धन मनुष्य यदि धन चाहता है तो उसके लिये धनकी व्यवस्था असम्भव हो जाती है ( परंतु धनीका धन बढ़ता रहता है ), जैसे जंगलमें एक हाथीके पीछे बहुत - से हाथी चले आते हैं उसी प्रकार धनसे ही धन बँधा चला आता है ॥ २० ॥

धर्मः कामश्च स्वर्गश्च हर्षः क्रोधः श्रुतं दमः ।

अर्थादेतानि सर्वाणि प्रवर्तन्ते नराधिप ॥ २१ ॥