05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 81–90
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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हन्तव्यास्त इति प्राज्ञाः क्षत्रधर्मविदो विदुः ॥ ७ ॥
क्षत्रिय- धर्मके ज्ञाता विद्वान् पुरुष यह जानते और बताते हैं कि अपना राज्य ग्रहण करते समय जो कोई भी उसमें बाधक या विरोधी खड़े हों, उन्हें मार डालना चाहिये ॥ ७ ॥
ते सदोषा हतास्माभी राज्यस्य परिपन्थिनः ।
तान् हत्वा भुङ्क्ष्व धर्मेण युधिष्ठिर महीमिमाम् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर! जो लोग हमारे राज्यके बाधक या लुटेरे थे, वे सभी अपराधी ही थे; अतः हमने उन्हें मार डाला । उन्हें मारकर धर्मतः प्राप्त हुई इस पृथ्वीका आप उपभोग कीजिये ॥ ८ ॥
यथा हि पुरुषः खात्वा कूपमप्राप्य चोदकम् ।
पङ्कदिग्धो निवर्तेत कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ ९ ॥
जैसे कोई मनुष्य परिश्रम करके कुँआ खोदे और वहाँ जल न मिलनेपर देहमें कीचड़ लपेटे हुए वहाँसे निराश लौट आये, उसी प्रकार हमारा किया- कराया यह सारा पराक्रम व्यर्थ होना चाहता है ॥ ९ ॥
यथाऽऽरुह्य महावृक्षमपहृत्य ततो मधु ।
अप्राश्य निधनं गच्छेत् कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १० ॥
जैसे कोई विशाल वृक्षपर आरूढ़ हो वहाँसे मधु उतार लाये परंतु उसे खानेके पूर्व ही उसकी मृत्यु हो जाय; हमारा यह प्रयत्न भी वैसा ही हो रहा है ॥ १० ॥
यथा महान्तमध्वानमाशया पुरुषः पतन् ।
स निराशो निवर्तेत कर्मेतन्नस्तथोपमम् ॥ ११ ॥
जैसे कोई मनुष्य मनमें कोई आशा लेकर बहुत बड़ा मार्ग तै करे और वहाँ पहुँचनेपर निराश लौटे, हमारा यह कार्य भी उसी तरह निष्फल हो रहा है ॥ ११ ॥
यथा शत्रून् घातयित्वा पुरुषः कुरुनन्दन ।
आत्मानं घातयेत् पश्चात् कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! जैसे कोई मनुष्य शत्रुओंका वध करनेके पश्चात् अपनी भी हत्या कर डाले, हमारा यह कर्म भी वैसा ही है ॥ १२ ॥
यथान्नं क्षुधितो लब्ध्वा न भुञ्जीयाद् यदृच्छया ।
कामीव कामिनीं लब्ध्वा कर्मेदं नस्तथोपमम् ॥ १३ ॥
जैसे भूखा मनुष्य भोजन और कामी पुरुष कामिनीको पाकर दैववश उसका उपभोग न करे, हमारा यह कर्म भी वैसा ही निष्फल हो रहा है ॥ १३ ॥
वयमेवात्र गर्ह्या हि यद् वयं मन्दचेतसम् ।
त्वां राजन्ननुगच्छामो ज्येष्ठोऽयमिति भारत ॥ १४ ॥
भरतवंशी नरेश! हमलोग ही यहाँ निन्दाके पात्र हैं कि आप जैसे अल्पबुद्धि पुरुषको बड़ा भाई समझकर आपके पीछे - पीछे चलते हैं ॥ १४ ॥
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वयं हि बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः ।
क्लीबस्य वाक्ये तिष्ठामो यथैवाशक्तयस्तथा ॥ १५ ॥
हम बाहुबलसे सम्पन्न, अस्र- शस्त्रोंके विद्वान् और मनस्वी हैं तो भी असमर्थ पुरुषोंके समान एक कायर भाईकी आज्ञामें रहते हैं ॥ १५ ॥
अगतीकगतीनस्मान् नष्टार्थानर्थसिद्धये ।
कथं वै नानुपश्येयुर्जनाः पश्यत यादृशम् ॥ १६ ॥
हमलोग पहले अशरण मनुष्योंको शरण देनेवाले थे; किंतु अब हमारा ही अर्थ नष्ट हो गया है । ऐसी दशामें अर्थसिद्धिके लिये हमारा आश्रय लेनेवाले लोग हमारी इस दुर्बलतापर कैसे दृष्टि नहीं डालेंगे? बन्धुओ! मेरा कथन कैसा है? इसपर विचार करो ॥ १६ ॥
आपत्काले हि संन्यासः कर्तव्य इति शिष्यते ।
जरयाभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यंसितेन वा ॥ १७ ॥
शास्त्रका उपदेश यह है कि आपत्तिकालमें या बुढ़ापेसे जर्जर हो जानेपर अथवा शत्रुओंद्वारा धन - सम्पत्तिसे वञ्चित कर दिये जानेपर मनुष्यको संन्यास ग्रहण करना चाहिये ॥ १७ ॥
तस्मादिह कृतप्रज्ञास्त्यागं न परिचक्षते ।
धर्मव्यतिक्रमं चैव मन्यन्ते सूक्ष्मदर्शिनः ॥ १८ ॥
अतः ( जब कि हमारे ऊपर पूर्वोक्त संकट नहीं आया है ) विद्वान् पुरुष ऐसे अवसरमें त्याग या संन्यासकी प्रशंसा नहीं करते हैं । सूक्ष्मदर्शी पुरुष तो ऐसे समयमें क्षत्रियके लिये संन्यास लेना उलटे धर्मका उल्लंघन मानते हैं ॥ १८ ॥
कथं तस्मात् समुत्पन्नास्तन्निष्ठास्तदुपाश्रयाः ।
तदेव निन्दां भाषेयुर्धाता तत्र न गर्ह्यते ॥ १ ९ ॥
इसलिये जिनकी क्षात्रधर्मके लिए उत्पत्ति हुई है, जो क्षात्रधर्ममें ही तत्पर रहते हैं, तथा क्षात्रधर्मका ही आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, वे क्षत्रिय स्वयं ही उस क्षात्रधर्मकी निन्दा कैसे कर सकते हैं? इसके लिये उस विधाताकी ही निन्दा क्यों न की जाय, जिन्होंने क्षत्रियोंके लिये युद्धधर्मका विधान किया है ॥ १ ९ ॥
श्रिया विहीनैरधनैर्नास्तिकैः सम्प्रवर्तितम् ।
वेदवादस्य विज्ञानं सत्याभासमिवानृतम् ॥ २० ॥
श्रीहीन, निर्धन एवं नास्तिकोंने वेदके अर्थवादवाक्यों द्वारा प्रतिपादित विज्ञानका आश्रय ले सत्य - सा प्रतीत होनेवाले मिथ्या मतका प्रचार किया है ( वैसे वचनोंद्वारा क्षत्रियका संन्यासमें अधिकार नहीं सिद्ध होता है ) ॥ २० ॥
शक्यं तु मौनमास्थाय बिभ्रताऽऽत्मानमात्मना ।
धर्मच्छद्म समास्थाय च्यवितुं न तु जीवितुम् ॥ २१ ॥
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धर्मका बहाना लेकर अपनेद्वारा केवल अपना पेट पालते हुए मौनी बाबा बनकर बैठ जानेसे कर्तव्यसे भ्रष्ट होना ही सम्भव है, जीवनको सार्थक बनाना नहीं ॥ २१ ॥
शक्यं पुनररण्येषु सुखमेकेन जीवितुम् ।
अबिभ्रता पुत्रपौत्रान् देवर्षीनतिथीन् पितॄन् ॥ २२ ॥
जो पुत्रों और पौत्रोंके पालनमें असमर्थ हो, देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको तृप्त न कर सकता हो और अतिथियोंको भोजन देनेकी भी शक्ति न रखता हो, ऐसा मनुष्य ही अकेला जंगलोंमें रहकर सुखसे जीवन बिता सकता है ( आप- जैसे शक्तिशाली पुरुषोंका यह काम नहीं है ) ॥ २२ ॥
मृगाः स्वर्गजितो न वराहा न पक्षिणः ।
अथान्येन प्रकारेण पुण्यमाहुर्न तं जनाः ॥ २३ ॥
सदा ही वनमें रहनेपर भी न तो ये मृग स्वर्गलोकपर अधिकार पा सके हैं, न सूअर और पक्षी ही । पुण्यकी प्राप्ति तो अन्य प्रकारसे ही बतलायी गयी है । श्रेष्ठ पुरुष केवल वनवासको ही पुण्यकारक नहीं मानते ॥ २३ ॥
यदि संन्यासतः सिद्धिं राजा कश्चिदवाप्नुयात् ।
पर्वताश्च द्रुमाश्चैव क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २४ ॥
यदि कोई राजा संन्याससे सिद्धि प्राप्त कर ले, तब तो पर्वत और वृक्ष बहुत जल्दी सिद्धि पा सकते हैं ॥ २४ ॥
एते हि नित्यसंन्यासा दृश्यन्ते निरुपद्रवाः ।
अपरिग्रहवन्तश्च सततं ब्रह्मचारिणः ॥ २५ ॥
क्योंकि ये नित्य संन्यासी, उपद्रवशून्य, परिग्रहरहित तथा निरन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले देखे जाते हैं ॥ २५ ॥
अथ चेदात्मभाग्येषु नान्येषां सिद्धिमश्नुते ।
तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥ २६ ॥
यदि अपने भाग्यमें दूसरोंके कर्मोंसे प्राप्त हुई सिद्धि नहीं आती, तब तो सभीको कर्म ही करना चाहिये । अकर्मण्य पुरुषको कभी कोई सिद्धि नहीं मिलती ॥ २६ ॥
औदकाः सृष्टयश्चैव जन्तवः सिद्धिमाप्नुयुः ।
तेषामात्मैव भर्तव्यो नान्यः कश्चन विद्यते ॥ २७ ॥
( यदि अपने शरीरमात्रका भरण- पोषण करनेसे सिद्धि मिलती हो, तब तो ) जलमें रहनेवाले जीवों तथा स्थावर प्राणियोंको भी सिद्धि प्राप्त कर लेनी चाहिये; क्योंकि उन्हें केवल अपना ही भरण- पोषण करना रहता है । उनके पास दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जिसके भरण - पोषणका भार वे उठाते हों ॥ २७ ॥
अवेक्षस्व यथा स्वैः स्वैः कर्मभिर्व्यापृतं जगत् ।
तस्मात् कर्मैव कर्तव्यं नास्ति सिद्धिरकर्मणः ॥ २८ ॥
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देखिये और विचार कीजिये कि सारा संसार किस तरह अपने कर्मोंमें लगा हुआ है; अतः आपको भी क्षत्रियोचित कर्तव्यका ही पालन करना चाहिये । जो कर्मोंको छोड़ बैठता है, उसे कभी सिद्धि नहीं मिलती ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीमवाक्ये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीमसेनका वचनविषयक दसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
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एकादशोऽध्यायः अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ - धर्मके पालनपर जोर देना अर्जुन उवाच
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
तापसैः सह संवादं शक्रस्य भरतर्षभ ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा- भरतश्रेष्ठ! इसी विषयमें जानकार लोग तापसोंके साथ जो इन्द्रका संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥
केचिद् गृहान् परित्यज्य वनमभ्यागमन् द्विजाः ।
अजातश्मश्रवो मन्दाः कुले जाताः प्रवव्रजुः ॥ २ ॥
एक समय कुछ मन्दबुद्धि कुलीन ब्राह्मण- बालक घरको छोड़कर वनमें चले आये ।
अभी उन्हें मूँछ- दाढ़ीतक नहीं आयी थी, उसी अवस्थामें उन्होंने घर त्याग दिया ॥ २ ॥
धर्मोऽयमिति मन्वानाः समृद्धा ब्रह्मचारिणः ।
त्यक्त्वा भ्रातॄन् पितॄंश्चैव तानिन्द्रोऽन्वकृपायत ॥ ३ ॥
यद्यपि वे सब- के - सब धनी थे, तथापि भाई- बन्धु और माता- पिताको छोड़कर इसीको धर्म मानते हुए वनमें आकर ब्रह्मचर्यका पालन करने लगे । एक दिन इन्द्रदेवने उनपर कृपा की ॥ ३ ॥
तानाबभाषे भगवान् पक्षी भूत्वा हिरण्मयः ।
सुदुष्करं मनुष्यैश्च यत् कृतं विघसाशिभिः ॥ ४ ॥
पुण्यं भवति कर्मेदं प्रशस्तं चैव जीवितम् ।
सिद्धार्थास्ते गतिं मुख्यां प्राप्ता धर्मपरायणाः ॥ ५ ॥
भगवान् इन्द्र सुवर्णमय पक्षीका रूप धारण करके वहाँ आये और उनसे इस प्रकार कहने लगे — ‘ यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंने जो कर्म किया है, वह दूसरोंसे होना अत्यन्त कठिन है । उनका यह कर्म बड़ा पवित्र और जीवन बहुत उत्तम है । वे धर्मपरायण पुरुष सफलमनोरथ हो श्रेष्ठ गतिको प्राप्त हुए हैं ' ॥ ४-५ ॥ ऋषय ऊचुः
अहो बतायं शकुनिर्विघसाशान् प्रशंसति ।
अस्मान् नूनमयं शास्ति वयं च विघसाशिनः ॥ ६ ॥
ऋषि बोले — अहो! यह पक्षी तो विघसाशी ( यज्ञशेष अन्न भोजन करनेवाले ) पुरुषोंकी प्रशंसा करता है । निश्चय ही यह हमलोगोंकी बड़ाई करता है; क्योंकि यहाँ हमलोग ही
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विघसाशी हैं ॥ ६ ॥
शकुनिरुवाच
नाहं युष्मान् प्रशंसामि पंकदिग्धान् रजस्वलान् ।
उच्छिष्टभोजिनो मन्दानन्ये वै विघसाशिनः ॥ ७ ॥
उस पक्षीने कहा — अरे! देहमें कीचड़ लपेटे और धूल पोते हुए जूठन' खानेवाले तुम-जैसे मूर्खोंकी मैं प्रशंसा नहीं कर रहा हूँ । विघसाशी तो दूसरे ही होते हैं ॥ ऋषय ऊचुः
इदं श्रेयः परमिति वयमेवाभ्युपास्महे ।
शकुने ब्रूहि यच्छ्रेयो भृशं ते श्रद्दधामहे ॥ ८ ॥
ऋषि बोले- पक्षी! यही श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी साधन है, ऐसा समझकर ही हम इस मार्गपर चल रहे हैं । तुम्हारी दृष्टिमें जो श्रेष्ठ धर्म हो, उसे तुम्हीं बताओ । हम तुम्हारी बातपर अधिक श्रद्धा करते हैं ॥ ८ ॥
शकुनिरुवाच
यदि मां नाभिशंकध्वं विभज्यात्मानमात्मना ।
ततोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं हितं वचः ॥ ९ ॥
पक्षीने कहा- यदि आपलोग मुझपर संदेह न करें तो मैं स्वयं ही अपने आपको वक्ताके रूपमें विभक्त करके आपलोगोंको यथावत्रूपसे हितकी बात बताऊँगा ॥ ९ ॥
ऋषय ऊचुः
शृणुमस्ते वचस्तात पन्थानो विदितास्तव ।
नियोगे चैव धर्मात्मन् स्थातुमिच्छाम शाधि नः ॥ १० ॥
ऋषि बोले — तात! हम तुम्हारी बात सुनेंगे । तुम्हें सब मार्ग विदित हैं। धर्मात्मन्! हम
तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहना चाहते हैं । तुम हमें उपदेश दो ॥ १० ॥
शकुनिरुवाच
चतुष्पदां गौः प्रवरा लोहानां काञ्चनं वरम् ।
शब्दानां प्रवरो मन्त्रो ब्राह्मणो द्विपदां वरः ॥ ११ ॥
पक्षीने कहा— चौपायोंमें गौ श्रेष्ठ है, धातुओंमें सोना उत्तम है, शब्दोंमें मन्त्र उत्कृष्ट है और मनुष्योंमें ब्राह्मण प्रधान है ॥ ११ ॥
मन्त्रोऽयं जातकर्मादिर्ब्राह्मणस्य विधीयते ।
जीवतोऽपि यथाकालं श्मशाननिधनादिभिः ॥ १२ ॥
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ब्राह्मणोंके लिये मन्त्रयुक्त जातकर्म आदि संस्कारका विधान है । वह जबतक जीवित रहे, समय - समयपर उसके आवश्यक संस्कार होते रहने चाहिये, मरनेपर भी यथासमय श्मशानभूमिमें अन्त्येष्टिसंस्कार तथा घरपर श्राद्ध आदि वैदिक विधिके अनुसार सम्पन्न होने चाहिये ॥ १२ ॥
कर्माणि वैदिकान्यस्य स्वर्ग्यः पन्थास्त्वनुत्तमः ।
अथ सर्वाणि कर्माणि मन्त्रसिद्धानि चक्षते ॥ १३ ॥
आम्नायदृढवादीनि तथा सिद्धिरिहेष्यते ।
मासार्धमासा ऋतव आदित्यशशितारकम् ॥ १४ ॥
ईहन्ते सर्वभूतानि तदिदं कर्मसंज्ञितम् ।
सिद्धिक्षेत्रमिदं पुण्यमयमेवाश्रमो महान् ॥ १५ ॥
वैदिक कर्म ही ब्राह्मणके लिये स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाले उत्तम मार्ग हैं । इसके सिवा, मुनियोंने समस्त कर्मोंको वैदिक मन्त्रोंद्वारा ही सिद्ध होनेवाला बताया है । वेदमें इन कर्मोंका प्रतिपादन दृढ़तापूर्वक किया गया है; इसलिये उन कर्मोंके अनुष्ठानसे ही यहाँ अभीष्ट - सिद्धि होती है । मास, पक्ष, ऋतु, सूर्य, चन्द्रमा और तारोंसे उपलक्षित जो यज्ञ होते हैं, उन्हें यथासम्भव सम्पन्न करनेकी चेष्टा प्रायः सभी प्राणी करते हैं । यज्ञोंका सम्पादन ही कर्म कहलाता है । जहाँ ये कर्म किये जाते हैं, वह गृहस्थ आश्रम ही सिद्धिका पुण्यमय क्षेत्र है और यही सबसे महान् आश्रम है ॥ १३-१५ ॥
अथ ये कर्म निन्दन्तो मनुष्याः कापथं गताः ।
मूढानामर्थहीनानां तेषामेनस्तु विद्यते ॥ १६ ॥
जो मनुष्य कर्मकी निन्दा करते हुए कुमार्गका आश्रय लेते हैं, उन पुरुषार्थहीन मूढ़ पुरुषोंको पाप लगता है ॥ १६ ॥
देववंशान् पितृवंशान् ब्रह्मवंशांश्च शाश्वतान् ।
संत्यज्य मूढा वर्तन्ते ततो यान्त्यश्रुतीपथम् ॥ १७ ॥
देवसमूह और पितृसमूहोंका यजन तथा ब्रह्मवंश ( वेद- शास्त्र आदिके स्वाध्यायद्वारा ऋषि- मुनियों ) -की तृप्ति –ये तीन ही सनातन मार्ग हैं। जो मूर्ख इनका परित्याग करके और किसी मार्गसे चलते हैं, वे वेदविरुद्ध पथका आश्रय लेते हैं ॥ १७ ॥
एतद्वोऽस्तु तपोयुक्तं ददामीत्यृषिचोदितम् ।
तस्मात् तत् तद् व्यवस्थानं तपस्वितप उच्यते ॥ १८ ॥
मन्त्रद्रष्टा ऋषिने एक मन्त्रमें कहा है कि ' यह यज्ञरूप कर्म तुम सब यजमानोंद्वारा सम्पादित हो, परंतु यह होना चाहिये तपस्यासे युक्त । तुम इसका अनुष्ठान करोगे तो मैं तुम्हें मनोवांछित फल प्रदान करूँगा। ' अतः उन -उन वैदिक कर्मोंमें पूर्णतः संलग्न हो जाना ही तपस्वीका ' तप ' कहलाता है ॥ १८ ॥
देववंशान् ब्रह्मवंशान् पितृवंशांश्च शाश्वतान् ।
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संविभज्य गुरोश्चर्यां तद् वै दुष्करमुच्यते ॥ १ ९ ॥ हवन- कर्मके द्वारा देवताओंको, स्वाध्यायद्वारा ब्रह्मर्षियोंको तथा श्राद्धद्वारा सनातन पितरोंको उनका भाग समर्पित करके गुरुकी परिचर्या करना दुष्कर व्रत कहलाता ॥ १९ ॥
देवा वै दुष्करं कृत्वा विभूतिं परमां गताः ।
तस्माद् गार्हस्थ्यमुद्बोढुं दुष्करं प्रब्रवीमि वः ॥ २० ॥
इस दुष्कर व्रतका अनुष्ठान करके देवताओंने उत्तम वैभव प्राप्त किया है । यह गृहस्थधर्मका पालन ही दुष्कर व्रत है । मैं तुमलोगोंसे इसी दुष्कर व्रतका भार उठानेके लिये कह रहा हूँ ॥ २० ॥
तपः श्रेष्ठं प्रजानां हि मूलमेतन्न संशयः ।
कुटुम्बविधिनानेन यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ २१ ॥
तपस्या श्रेष्ठ कर्म है । इसमें संदेह नहीं कि यही प्रजावर्गका मूल कारण है। परंतु गार्हस्थ्यविधायक शास्त्रके अनुसार इस गार्हस्थ्य- धर्ममें ही सारी तपस्या प्रतिष्ठित है ॥ २१ ॥
एतद् विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सराः ।
तस्माद् व्रतं मध्यमं तु लोकेषु तप उच्यते ॥ २२ ॥
जिनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं है, जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित हैं, वे ब्राह्मण इसीको तप मानते हैं । यद्यपि लोकमें व्रतको भी तप कहा जाता है, किंतु वह पंचयज्ञके अनुष्ठानकी अपेक्षा मध्यम श्रेणीका है ॥ २२ ॥
दुराधर्षं पदं चैव गच्छन्ति विघसाशिनः ।
सायंप्रातर्विभज्यान्नं स्वकुटुम्बे यथाविधि ॥ २३ ॥
दत्त्वातिथिभ्यो देवेभ्यः पितृभ्यः स्वजनाय च ।
अवशिष्टानि येऽश्नन्ति तानाहुर्विघसाशिनः ॥ २४ ॥
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महाभारत, सुवर्णमय पक्षीके रूपमें देवराज इन्द्रका संन्यासी बने हुए ब्राह्मण - बालकोंको उपदेश क्योंकि विघसाशी पुरुष प्रातः -सायंकाल विधि-विधानपूर्वक अपने कुटुम्बमें अन्नका विभाग करके दुर्जय अविनाशी पदको प्राप्त कर लेते हैं । देवताओं, पितरों, अतिथियों तथा अपने परिवारके अन्य सब लोगोंको अन्न देकर जो सबसे पीछे अवशिष्ट अन्न खाते हैं, उन्हें विघसाशी कहा गया है ॥ २३-२४ ॥
तस्मात् स्वधर्ममास्थाय सुव्रताः सत्यवादिनः ।
लोकस्य गुरवो भूत्वा ते भवन्त्यनुपस्कृताः ॥ २५ ॥
इसलिये अपने धर्मपर आरूढ़ हो उत्तम व्रतका पालन और सत्यभाषण करते हुए वे जगद्गुरु होकर सर्वथा संदेहरहित हो जाते हैं ॥ २५ ॥
त्रिदिवं प्राप्य शक्रस्य स्वर्गलोके विमत्सराः ।
वसन्ति शाश्वतान् वर्षाञ्जना दुष्करकारिणः ॥ २६ ॥
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वे ईर्ष्यारहित दुष्कर व्रतका पालन करनेवाले पुण्यात्मा पुरुष इन्द्रके स्वर्गलोकमें पहुँचकर अनन्त वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं ॥ २६ ॥
अर्जुनउवाच
ततस्ते तद् वचः श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् ।
उत्सृज्य नास्तीति गता गार्हस्थ्यं समुपाश्रिताः ॥ २७ ॥
अर्जुन कहते हैं - महाराज! वे ब्राह्मणकुमार पक्षिरूपधारी इन्द्रकी धर्म और अर्थयुक्त हितकर बातें सुनकर इस निश्चयपर पहुँचे कि हमलोग जिस मार्गपर चल रहे हैं वह हमारे लिये हितकर नहीं है । अतः वे उसे छोड़कर घर लौट गये और गृहस्थ धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ २७ ॥
तस्मात्त्वमपि सर्वज्ञ धैर्यमालम्ब्य शाश्वतम् ।
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां हतामित्रां नरोत्तम ॥ २८ ॥
सर्वज्ञ नरश्रेष्ठ! अतः आप भी सदाके लिये धैर्य धारण करके शत्रुहीन हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कीजिये ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये ऋषिशकुनिसंवादकथने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनके वचनके प्रसंगमेंऋषियों और पक्षिरूपधारी इन्द्रके संवादका वर्णनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥