05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 921–930

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930

पृष्ठ 921

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यदि आप कालको ही प्रमाण मानते हैं तो शोकसे मूर्च्छित हुए प्राणी क्यों महान् प्रलाप एवं हाहाकार करते हैं? फिर कर्म करनेवालोंके लिये विधि -निषेधरूपी धर्मके पालनका नियम क्यों रखा गया है? ॥ ५७ ॥

तव पुत्रो ममापत्यं हतवान् स हतो मया ।

अनन्तरं त्वयाहं च हन्तव्या हि नराधिप ॥ ५८ ॥

नरेश्वर! आपके बेटेने मेरे बच्चेको मार डाला और मैंने भी उसकी आँखोंको नष्ट कर दिया । इसके बाद अब आप मेरा वध कर डालेंगे ॥ ५८ ॥

अहं हि पुत्रशोकेन कृतपापा तवात्मजे ।

यथा त्वया प्रहर्तव्यं तथा तत्त्वं च मे शृणु ॥ ५ ९ ॥

जैसे मैं पुत्र शोकसे संतप्त होकर आपके पुत्रके प्रति पापपूर्ण बर्ताव कर बैठी, उसी प्रकार आप भी मुझपर प्रहार कर सकते हैं । यहाँ जो यथार्थ बात है, वह मुझसे सुनिये ॥ ५ ९ ॥

भक्ष्यार्थं क्रीडनार्थं च नरा वाञ्छन्ति पक्षिणः ।

तृतीयो नास्ति संयोगो वधबन्धादृते क्षमः ॥ ६० ॥

मनुष्य खाने और खेलनेके लिये ही पक्षियोंकी कामना करते हैं । वध करने या बन्धनमें डालनेके सिवा तीसरे प्रकारका कोई सम्पर्क पक्षियोंके साथ उनका नहीं देखा जाता ॥ ६० ॥

वधबन्धभयादेते मोक्षतन्त्रमुपाश्रिताः ।

जनीमरणजं दुःखं प्राहुर्वेदविदो जनाः ॥ ६१ ॥

इस वध और बन्धनके भयसे ही मुमुक्षुलोग मोक्ष- शास्त्रका आश्रय लेकर रहते हैं; क्योंकि वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि जन्म और मरणका दुःख असह्य होता है ॥ ६१ ॥

सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वस्य दयिताः सुताः ।

दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम् ॥ ६२ ॥

सबको अपने प्राण प्रिय होते हैं, सभीको अपने पुत्र प्यारे लगते हैं; सब लोग दुःखसे उद्विग्न हो उठते हैं और सभीको सुखकी प्राप्ति अभीष्ट होती है ॥ ६२ ॥

दुःखं जरा ब्रह्मदत्त दुःखमर्थविपर्ययः ।

दुःखं चानिष्टसंवासो दुःखमिष्टवियोजनम् ॥ ६३ ॥

महाराज ब्रह्मदत्त! दुःखके अनेक रूप हैं । बुढ़ापा दुःख है, धनका नाश दुःख है, अप्रियजनोंके साथ रहना दुःख है और प्रियजनोंसे बिछुड़ना दुःख है ॥ ६३ ॥

वधबन्धकृतं दुःखं स्वीकृतं सहजं तथा ।

दुःखं सुतेन सततं जनान् विपरिवर्तते ॥ ६४ ॥

वध और बन्धनसे भी सबको दुःख होता है । स्त्रीके कारण और स्वाभाविक रूपसे भी दुःख हुआ करता है तथा पुत्र यदि नष्ट हो जाय या दुष्ट निकल जाय तो उससे भी लोगोंको

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सदा दुःख प्राप्त होता रहता है ॥ ६४ ॥

न दुःखं परदुःखे वै केचिदाहुरबुद्धयः ।

यो दुःखं नाभिजानाति स जल्पति महाजने ॥ ६५ ॥

कुछ मूढ़ मनुष्य कहा करते हैं कि पराये दुःखमें दुःख नहीं होता; परंतु वही ऐसी बात श्रेष्ठ पुरुषोंके निकट कहा करता है, जो दुःख के तत्त्वको नहीं जानता ॥ ६५ ॥

यस्तु शोचति दुःखार्तः स कथं वक्तुमुत्सहेत् ।

रसज्ञः सर्वदुःखस्य यथाऽऽत्मनि तथा परे ॥ ६६ ॥

जो दुःखसे पीड़ित होकर शोक करता है तथा जो अपने और पराये सभीके दुःखका रस जानता है, वह ऐसी बात कैसे कह सकता है? ॥ ६६ ॥

यत् कृतं ते मया राजंस्त्वया च मम यत् कृतम् ।

न तद् वर्षशतैः शक्यं व्यपोहितुमरिंदम ॥ ६७ ॥

शत्रुदमन नरेश! आपने जो मेरा अपकार किया है तथा मैंने बदलेमें जो कुछ किया है, उसे सैकड़ों वर्षोंमें भी भुलाया नहीं जा सकता ॥ ६७ ॥

आवयोः कृतमन्योन्यं पुनः संधिर्न विद्यते ।

स्मृत्वा स्मृत्वा हि ते पुत्रं नवं वैरं भविष्यति ॥ ६८ ॥

इस प्रकार आपसमें एक दूसरेका अपकार करनेके कारण अब हमारा फिर मेल नहीं हो सकता । अपने पुत्रको याद कर- करके आपका वैर ताजा होता रहेगा ॥ ६८ ॥

वैरमन्तिकमासाद्य यः प्रीतिं कर्तुमिच्छति ।

मृन्मयस्येव भग्नस्य यथा संधिर्न विद्यते ॥ ६ ९ ॥

इस प्रकार मरणान्त वैर ठन जानेपर जो प्रेम करना चाहता है, उसका वह प्रेम उसी प्रकार असम्भव है, जैसे मिट्टीका बर्तन एक बार फूट जानेपर फिर नहीं जुटता है ॥ ६ ९ ॥

निश्चयः स्वार्थशास्त्रेषु विश्वासश्चासुखोदयः ।

उशना चैव गाथे द्वै प्रह्लादायाब्रवीत् पुरा ॥ ७० ॥

विश्वास दुःख देनेवाला है, यही नीतिशास्त्रोंका निश्चय है । प्रचीनकालमें शुक्राचार्यने भी प्रह्लादसे दो गाथाएँ कही थीं, जो इस प्रकार हैं ॥ ७० ॥

ये वैरिणः श्रद्दधते सत्ये सत्येतरेऽपि वा ।

वध्यन्ते श्रद्दधानास्तु मधु शुष्कतृणैर्यथा ॥ ७१ ॥

जैसे सूखे तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेके ऊपर रखे हुए मधुको लेने जानेवाले मनुष्य मारे जाते हैं, उसी प्रकार जो लोग वैरीकी झूठी या सच्ची बातपर विश्वास करते हैं, वे भी बेमौत मरते हैं ॥ ७१ ॥

न हि वैराणि शाम्यन्ति कुले दुःखगतानि च ।

आख्यातारश्च विद्यन्ते कुले वै ध्रियते पुमान् ॥ ७२ ॥

पृष्ठ 923

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जब किसी कुलमें दुःखदायी वैर बँध जाता है, तब वह शान्त नहीं होता । उसे याद दिलानेवाले बने ही रहते हैं, इसलिये जबतक कुलमें एक भी पुरुष जीवित रहता है, तबतक वह वैर नहीं मिटता है ॥ ७२ ॥

उपगृह्य तु वैराणि सान्त्वयन्ति नराधिप ।

अथैनं प्रतिपिंषन्ति पूर्णं घटमिवाश्मनि ॥ ७३ ॥

नरेश्वर! दुष्ट प्रकृतिके लोग मनमें वैर रखकर ऊपरसे शत्रुको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना देते रहते हैं । तदनन्तर अवसर पाकर उसे उसी प्रकार पीस डालते हैं, जैसे कोई पानीसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटककर चूर- चूर कर दे ॥ ७३ ॥

सदा न विश्वसेद् राजन् पापं कृत्वेह कस्यचित् ।

अपकृत्य परेषां हि विश्वासाद् दुःखमश्नुते ॥ ७४ ॥

राजन्! किसीका अपराध करके फिर उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । जो दूसरोंका अपकार करके भी उनपर विश्वास करता है, उसे दुःख भोगना पड़ता है ॥ ७४ ॥

ब्रह्मदत्तउवाच

नाविश्वासाद् विन्दतेऽर्थानीहते चापि किंचन ।

भयात् त्वेकतरान्नित्यं मृतकल्पा भवन्ति च ॥ ७५ ॥

ब्रह्मदत्तने कहा – पूजनी! अविश्वास करनेसे तो मनुष्य संसारमें अपने अभीष्ट पदार्थोंको कभी नहीं प्राप्त कर सकता और न किसी कार्यके लिये कोई चेष्टा ही कर सकता है । यदि मनमें एक पक्षसे सदा भय बना रहे तो मनुष्य मृतकतुल्य हो जायँगे — उनका जीवन ही मिट्टी हो जायगा ॥ ७५ ॥

पूजन्युवाच

यस्येह व्रणिनौ पादौ पद्भ्यां च परिसर्पति ।

खन्येते तस्य तौ पादौ सुगुप्तमिह धावतः ॥ ७६ ॥

पूजनीने कहा- राजन्! जिसके दोनों पैरोंमें घाव हो गया हो; फिर भी वह उन पैरोंसे ही चलता रहे तो कितना ही बचा - बचाकर क्यों न चले; यहाँ दौड़ते हुए उन पैरोंमें पुनः घाव होते ही रहेंगे ॥ ७६ ॥

नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते ।

तस्य वायुरुजात्यर्थं नेत्रयोर्भवति ध्रुवम् ॥ ७७ ॥

जो मनुष्य अपने रोगी नेत्रोंसे हवाकी ओर रुख करके देखता है, उसके उन नेत्रोंमें वायुके कारण अवश्य ही बहुत पीड़ा बढ़ जाती है ॥ ७७ ॥

दुष्टं पन्थानमासाद्य यो मोहादुपपद्यते ।

आत्मनो बलमज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ७८ ॥

पृष्ठ 924

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जो अपनी शक्तिको न समझकर मोहवश दुर्गम मार्गपर चल देता है, उसका जीवन वहीं समाप्त हो जाता है ॥ ७८ ॥

यस्तु वर्षमविज्ञाय क्षेत्रं कर्षति कर्षकः ।

हीनः पुरुषकारेण सस्यं नैवाश्नुते ततः ॥ ७९ ॥

जो किसान वर्षाके समयका विचार न करके खेत जोतता है, उसका पुरुषार्थ व्यर्थ जाता है; और उस जुताईसे उसको अनाज नहीं मिल पाता ॥ ७९ ॥

यस्तु तिक्तं कषायं वा स्वादु वा मधुरं हितम् ।

आहारं कुरुते नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ८० ॥

जो प्रतिदिन तीता, कसैला, स्वादिष्ट अथवा मधुर, जैसा भी हो, हितकर भोजन करता है, वही अन्न उसके लिये अमृतके समान लाभकारी होता है ॥ ८० ॥

पथ्यं मुक्त्वा तु यो मोहाद् दुष्टमश्नाति भोजनम् ।

परिणाममविज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ८१ ॥

परंतु जो परिणामके विचार किये बिना ही मोहवश पथ्य छोड़कर अपथ्य भोजन करता है, उसके जीवनका वहीं अन्त हो जाता है ॥ ८१ ॥

दैवं पुरुषकारश्च स्थितावन्योन्यसंश्रयात् ।

उदाराणां तु सत्कर्म दैवं क्लीबा उपासते ॥ ८२ ॥

दैव और पुरुषार्थ दोनों एक- दूसरेके सहारे रहते हैं, परंतु उदार विचारवाले पुरुष सर्वदा शुभ कर्म करते हैं और नपुंसक दैवके भरोसे पड़े रहते हैं ॥ ८२ ॥

कर्म चात्महितं कार्यं तीक्ष्णं वा यदि वा मृदु ।

ग्रस्यतेऽकर्मशीलस्तु सदानर्थैरकिञ्चनः ॥ ८३ ॥

कठोर अथवा कोमल, जो अपने लिये हितकर हो, वह कर्म करते रहना चाहिये । जो कर्मको छोड़ बैठता है, वह निर्धन होकर सदा अनर्थोंका शिकार बना रहता है ॥ ८३ ॥

तस्मात् सर्वं व्यपोह्यार्थं कार्य एव पराक्रमः ।

सर्वस्वमपि संत्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ॥ ८४ ॥

अतः काल, दैव और स्वभाव आदि सारे पदार्थोंका भरोसा छोड़कर पराक्रम ही करना चाहिये । मनुष्यको सर्वस्वकी बाजी लगाकर भी अपने हितका साधन ही करना चाहिये ॥ ८४ ॥

विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च बलं धैर्यं च पञ्चमम् ।

मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्तीह तैर्बुधाः ॥ ८५ ॥

विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और पाँचवाँ धैर्य - ये पाँच मनुष्य के स्वाभाविक मित्र बताये गये हैं । विद्वान् पुरुष इनके द्वारा ही इस जगत्में सारे कार्य करते हैं ॥ ८५ ॥

निवेशनं च कुप्यं च क्षेत्रं भार्या सुहृज्जनः ।

एतान्युपहितान्याहुः सर्वत्र लभते पुमान् ॥ ८६ ॥

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घर, ताँबा आदि धातु, खेत, स्त्री और सुहृद्जन - ये उपमित्र बताये गये हैं । इन्हें मनुष्य सर्वत्र पा सकता है ॥ ८६ ॥

सर्वत्र रमते प्राज्ञः सर्वत्र च विराजते ।

न विभीषयते कश्चिद् भीषितो न बिभेति च ॥ ८७ ॥

विद्वान् पुरुष सर्वत्र आनन्दमें रहता है और सर्वत्र उसकी शोभा होती है । उसे कोई डराता नहीं है और किसीके डरानेपर भी वह डरता नहीं है ॥ ८७ ॥

नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते ।

दाक्ष्येण कुर्वतः कर्म संयमात् प्रतितिष्ठति ॥ ८८ ॥

बुद्धिमान्‌के पास थोड़ा-सा धन हो तो वह भी सदा बढ़ता रहता है । वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयमके द्वारा प्रतिष्ठित होता है ॥ ८८ ॥

गृहस्नेहावबद्धानां नराणामल्पमेधसाम् ।

कुस्त्री खादति मांसानि माघमां सेगवा इव ॥ ८ ९ ॥

घरकी आसक्तिमें बँधे हुए मन्दबुद्धि मनुष्योंके मांसोंको कुटिल स्त्री खा जाती है अर्थात् उसे सुखा डालती है, जैसे केकड़ेकी मादाको उसकी संतानें ही नष्ट कर देती हैं ॥ ८ ९ ॥

गृहं क्षेत्राणि मित्राणि स्वदेश इति चापरे ।

इत्येवमवसीदन्ति नरा बुद्धिविपर्यये ॥ ९ ० ॥

बुद्धिके विपरीत हो जानेसे दूसरे -दूसरे बहुतेरे मनुष्य घर, खेत, मित्र और अपने देश आदिकी चिन्तासे ग्रस्त होकर सदा दुखी बने रहते हैं ॥ ९ ० ॥

उत्पतेत् सहजाद् देशाद् व्याधिदुर्भिक्षपीडितात् ।

अन्यत्र वस्तुं गच्छेद् वा वसेद् वा नित्यमानितः ॥ ९ १ ॥

अपना जन्मस्थान भी यदि रोग और दुर्भिक्षसे पीडित हो तो आत्मरक्षाके लिये वहाँसे हट जाना या अन्यत्र निवासके लिये चले जाना चाहिये । यदि वहाँ रहना ही हो तो सदा सम्मानित होकर रहे ॥ ९ १ ॥

तस्मादन्यत्र यास्यामि वस्तुं नाहमिहोत्सहे ।

कृतमेतदनार्यं मे तव पुत्रे च पार्थिव ॥ ९ २ ॥

भूपाल! मैंने तुम्हारे पुत्रके साथ दुष्टतापूर्ण बर्ताव किया है, इसलिये मैं अब यहाँ रहनेका साहस नहीं कर सकती, दूसरी जगह चली जाऊँगी ॥ ९ २ ॥

कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसौहृदम् ।

कुसम्बन्धं कुदेशं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ९ ३ ॥

दुष्टा भार्या, दुष्ट पुत्र, कुटिल राजा, दुष्ट मित्र, दूषित सम्बन्ध और दुष्ट देशको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ९ ३ ॥

कुपुत्रे नास्ति विश्वासः कुभार्यायां कुतो रतिः ।

कुराज्ये निर्वृतिर्नास्ति कुदेशे नास्ति जीविका ॥ ९ ४ ॥

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कुपुत्रपर कभी विश्वास नहीं हो सकता । दुष्टा भार्यापर प्रेम कैसे हो सकता है? कुटिल राजाके राज्यमें कभी शान्ति नहीं मिल सकती और दुष्ट देशमें जीवन - निर्वाह नहीं हो सकता ॥ ९ ४ ॥

कुमित्रे संगतिर्नास्ति नित्यमस्थिरसौहृदे ।

अवमानः कुसम्बन्धे भवत्यर्थविपर्यये ॥ ९ ५ ॥

कुमित्रका स्नेह कभी स्थिर नहीं रह सकता, इसलिये उसके साथ सदा मेल बना रहे-यह असम्भव है और जहाँ दूषित सम्बन्ध हो, वहाँ स्वार्थमें अन्तर आनेपर अपमान होने लगता है ॥ ९ ५ । |

सा भार्या या प्रियं ब्रूते स पुत्रो यत्र निर्वृतिः ।

तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते ॥ ९ ६ ॥

पत्नी वही अच्छी है, जो प्रिय वचन बोले । पुत्र वही अच्छा है, जिससे सुख मिले । मित्र वही श्रेष्ठ है, जिसपर विश्वास बना रहे और देश भी वही उत्तम है, जहाँ जीविका चल सके ॥ ९ ६ ॥

यत्र नास्ति बलात्कारः स राजा तीव्रशासनः ।

भीरेव नास्ति सम्बन्धो दरिद्रं यो बुभूषते ॥ ९ ७ ॥

उग्र शासनवाला राजा वही श्रेष्ठ है, जिसके राज्यमें बलात्कार न हो, किसी प्रकारका भय न रहे, जो दरिद्रका पालन करना चाहता हो तथा प्रजाके साथ जिसका पाल्य- पालक सम्बन्ध सदा बना रहे ॥ ९ ७ ॥

भार्या देशोऽथ मित्राणि पुत्रसम्बन्धिबान्धवाः ।

एते सर्वे गुणवति धर्मनेत्रे महीपतौ ॥ ९ ८ ॥

जिस देशका राजा गुणवान् और धर्मपरायण होता है, वहाँ स्त्री, पुत्र, मित्र सम्बन्धी तथा देश सभी उत्तम गुणसे सम्पन्न होते हैं ॥ ९ ८ ॥

अधर्मज्ञस्य विलयं प्रजा गच्छन्ति निग्रहात् ।

राजा मूलं त्रिवर्गस्य स्वप्रमत्तोऽनुपालयेत् ॥ ९९ ॥

जो राजा धर्मको नहीं जानता, उसके अत्याचारसे प्रजाका नाश हो जाता है । राजा ही धर्म, अर्थ और काम – इन तीनोंका मूल है । अतः उसे पूर्ण सावधान रहकर निरन्तर अपनी प्रजाका पालन करना चाहिये ॥

बलिषड्भागमुद्धृत्य बलिं समुपयोजयेत् ।

न रक्षति प्रजाः सम्यग् यः स पार्थिवतस्करः ॥ १०० ॥

जो प्रजाकी आयका छठा भाग कररूपसे ग्रहण करके उसका उपभोग करता है और प्रजाका भलीभाँति पालन नहीं करता, वह तो राजाओंमें चोर है ॥ १०० ॥

दत्त्वाभयं यः स्वयमेव राजा न तत् प्रमाणं कुरुतेऽर्थलोभात् ।

पृष्ठ 927

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स सर्वलोकादुपलभ्य पापं सोऽधर्मबुद्धिर्निरयं प्रयाति ॥ १०१ ॥

जो प्रजाको अभयदान देकर धनके लोभसे स्वयं ही उसका पालन नहीं करता, वह पापबुद्धि राजा सारे जगत्का पाप बटोरकर नरकमें जाता है ॥ १०१ ॥

दत्त्वाभयं स्वयं राजा प्रमाणं कुरुते यदि ।

स सर्वसुखकृज्ज्ञेयः प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १०२ ॥

जो अभयदान देकर प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए स्वयं ही अपनी प्रतिज्ञाको सत्य प्रमाणित कर देता है, वह राजा सबको सुख देनेवाला समझा जाता है ॥

माता पिता गुरुर्गोप्ता वह्निर्वैश्रवणो यमः ।

सप्त राज्ञो गुणानेतान् मनुराह प्रजापतिः ॥ १०३ ॥

प्रजापति मनुने राजाके सात गुण बताये हैं, और उन्हींके अनुसार उसे माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि, कुबेर और यमकी उपमा दी है ॥ १०३ ॥

पिता हि राजा राष्ट्रस्य प्रजानां योऽनुकम्पनः ।

तस्मिन् मिथ्याविनीतो हि तिर्यग् गच्छति मानवः ॥ १०४ ॥

जो राजा प्रजापर सदा कृपा रखता है, वह अपने राष्ट्रके लिये पिताके समान है । उसके प्रति जो मिथ्याभाव प्रदर्शित करता है, वह मनुष्य दूसरे जन्ममें पशु- पक्षीकी योनिमें जाता ॥ १०४ ॥

सम्भावयति मातेव दीनमप्युपपद्यते ।

दहत्यग्निरिवानिष्टान् यमयन्नसतो यमः ॥ १०५ ॥

राजा दीन- दुःखियोंकी भी सुधि लेता और सबका पालन करता है, इसलिये वह माताके समान है । अपने और प्रजाके अप्रियजनोंको वह जलाता रहता है; अतः अग्निके समान है और दुष्टोंका दमन करके उन्हें संयममें रखता है; इसलिये यम कहा गया है ॥

इष्टेषु विसृजन्नर्थान् कुबेर इव कामदः ।

गुरुर्धर्मोपदेशेन गोप्ता च परिपालयन् ॥ १०६ ॥

प्रियजनोंको खुले हाथ धन लुटाता है और उनकी कामना पूरी करता है, इसलिये कुबेरके समान है । धर्मका उपदेश करनेके कारण गुरु और सबका संरक्षण करनेके कारण रक्षक है ॥ १०६ ॥

यस्तु रञ्जयते राजा पौरजानपदान् गुणौः ।

न तस्य भ्रमते राज्यं स्वयं धर्मानुपालनात् ॥ १०७ ॥

जो राजा अपने गुणोंसे नगर और जनपदके लोगोंको प्रसन्न रखता है, उसका राज्य कभी डावाँडोल नहीं होता क्योंकि वह स्वयं धर्मका निरन्तर पालन करता रहता है ॥ १०७ ॥

स्वयं समुपजानन् हि पौरजानपदार्चनम् ।

पृष्ठ 928

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स सुखं प्रेक्षते राजा इह लोके परत्र च ॥ १०८ ॥

जो स्वयं नगर और गाँवोंके लोगोंका सम्मान करना जानता है, वह राजा इहलोक और परलोकमें सर्वत्र सुख - ही- सुख देखता है ॥ १०८ ॥

नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः ।

अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ॥ १० ९ ॥

जिसकी प्रजा सर्वदा करके भारसे पीड़ित हो नित्य उद्विग्न रहती है और नाना प्रकारके अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभवको प्राप्त होता है ॥

प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् ।

स सर्वफलभाग् राजा स्वर्गलोके महीयते ॥ ११० ॥

इसके विपरीत जिसकी प्रजा सरोवरमें कमलोंके समान विकास एवं वृद्धिको प्राप्त होती रहती है, वह सब प्रकारके पुण्यफलोंका भागी होता है और स्वर्गलोकमें भी सम्मान पाता है ॥ ११० ॥

बलिना विग्रहो राजन् न कदाचित् प्रशस्यते ।

बलिना विग्रहो यस्य कुतो राज्यं कुतः सुखम् ॥ १११ ॥

राजन्! बलवान्के साथ युद्ध छेड़ना कभी अच्छा नहीं माना जाता । जिसने बलवान्के साथ झगड़ा मोल ले लिया, उसके लिये कहाँ राज्य है और कहाँ सुख? ॥ १११ ॥

भीष्म उवाच

सैवमुक्त्वा शकुनिका ब्रह्मदत्तं नराधिप ।

राजानं समनुज्ञाप्य जगामाभीप्सितां दिशम् ॥ ११२ ॥

भीष्मजी कहते हैं— नरेश्वर! राजा ब्रह्मदत्तसे ऐसा कहकर वह पूजनी चिड़िया उनसे विदा ले अभीष्ट दिशाको चली गयी ॥ ११२ ॥

एतत् ते ब्रह्मदत्तस्य पूजन्या सह भाषितम् ।

मयोक्तं नृपतिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ११३ ॥

नृपश्रेष्ठ! राजा ब्रह्मदत्तका पूजनी चिड़ियाके साथ जो संवाद हुआ था, यह मैंने तुम्हें सुना दिया । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ११३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि ब्रह्मदत्तपूजन्योः संवाद एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें ब्रह्मदत्त और पूजनीका संवादविषयक एकसौ उनतालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३९ ॥

पृष्ठ 929

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चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश युधिष्ठिर उवाच

युगक्षयात् परिक्षीणो धर्मे लोके च भारत ।

दस्युभिः पीड्यमाने च कथं स्थेयं पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! पितामह! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर- ये तीनों युग प्रायः समाप्त हो रहे हैं, इसलिये जगत्में धर्मका क्षय हो चला है । डाकू और लुटेरे इस धर्ममें और भी बाधा डाल रहे हैं; ऐसे समयमें किस तरह रहना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि नीतिमापत्सु भारत ।

उत्सृज्यापि घृणां काले यथा वर्तेत भूमिपः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा – भरतनन्दन! ऐसे समयमें मैं तुम्हें आपत्तिकालकी वह नीति बता रहा हूँ, जिसके अनुसार भूमिपालको दयाका परित्याग करके भी समयोचित बर्ताव करना चाहिये ॥ २ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

भारद्वाजस्य संवादं राज्ञः शत्रुंजयस्य च ॥ ३ ॥

इस विषयमें भारद्वाज कणिक तथा राजा शत्रुंजयके संवादरूप एक प्रचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ ३ ॥

राजा शत्रुंजयो नाम सौवीरेषु महारथः ।

भारद्वाजमुपागम्य पप्रच्छार्थविनिश्चयम् ॥ ४ ॥

सौवीरदेशमें शत्रुंजय नामसे प्रसिद्ध एक महारथी राजा थे । उन्होंने भारद्वाज कणिकके पास जाकर अपने कर्तव्यका निश्चय करनेके लिये उनसे इस प्रकार प्रश्न किया- ॥ ४ ॥

अलब्धस्य कथं लिप्सा लब्धं केन विवर्धते ।

वर्धितं पाल्यते केन पालितं प्रणयेत् कथम् ॥ ५ ॥

‘ अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति कैसे होती है? प्राप्त द्रव्यकी वृद्धि किस प्रकार हो सकती है? बढ़े हुए द्रव्यकी रक्षा किससे की जाती है? और उस सुरक्षित द्रव्यका सदुपयोग कैसे किया जाना चाहिये? ' ॥ ५ ॥

तस्मै विनिश्चितार्थाय परिपृष्टोऽर्थनिश्चयम् ।

पृष्ठ 930

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उवाच ब्राह्मणो वाक्यमिदं हेतुमदुत्तमम् ॥ ६ ॥

राजा शत्रुंजयको शास्त्रका तात्पर्य निश्चितरूपसे ज्ञात था । उन्होंने जब कर्तव्य- निश्चयके लिये प्रश्न उपस्थित किया, तब ब्राह्मण भारद्वाज कणिकने यह युक्तियुक्त उत्तम वचन बोलना आस्मभ किया- ॥ ६ ॥

नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।

अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी च परेषां विवरानुगः ॥ ७ ॥

' राजाको सर्वदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये और सदा ही पुरुषार्थ प्रकट करना चाहिये । राजा अपनेमें छिद्र अर्थात् दुर्बलता न रहने दे । शत्रुपक्षके छिद्र या दुर्बलतापर सदा ही दृष्टि रखे और यदि शत्रुओंकी दुर्बलताका पता चल जाय तो उनपर आक्रमण कर दे ॥ ७ ॥

नित्यमुद्यतदण्डस्य भृशमुद्विजते नरः ।

तस्मात् सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ ८ ॥

' जो सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहता है, उससे प्रजाजन बहुत डरते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंको दण्डके द्वारा ही काबूमें करे ॥ ८ ॥

एवं दण्डं प्रशंसन्ति पण्डितास्तत्त्वदर्शिनः ।

तस्माच्चतुष्टये तस्मिन् प्रधानो दण्ड उच्यते ॥ ९ ॥

‘ इस प्रकार तत्त्वदर्शी विद्वान् दण्डकी प्रशंसा करते हैं; अतः साम, दान आदि चारों उपायोंमें दण्डको ही प्रधान बताया जाता है ॥ ९ ॥

छिन्नमूले त्वधिष्ठाने सर्वेषां जीवनं हतम् ।

कथं हि शाखास्तिष्ठेयुश्छिन्नमूले वनस्पतौ ॥ १० ॥

'यदि मूल आधार नष्ट हो जाय तो उसके आश्रयसे जीवननिर्वाह करनेवाले सभी शत्रुओंका जीवन नष्ट हो जाता है । यदि वृक्षकी जड़ काट दी जाय तो उसकी शाखाएँ कैसे रह सकती हैं? ॥ १० ॥

मूलमेवादितश्छिन्द्यात् परपक्षस्य पण्डितः ।

ततः सहायान् पक्षं च मूलमेवानुसाधयेत् ॥ ११ ॥

‘ विद्वान् पुरुष पहले शत्रुपक्षके मूलका ही उच्छेद कर डाले । तत्पश्चात् उसके सहायकों और पक्षपातियोंको भी उस मूलके पथका ही अनुसरण करावे ॥ ११ ॥

सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ।

आपदास्पदकाले तु कुर्वीत न विचारयेत् ॥ १२ ॥

‘ संकटकाल उपस्थित होनेपर राजा सुन्दर मन्त्रणा, उत्तम पराक्रम एवं उत्साहपूर्वक युद्ध करे तथा अवसर आ जाय तो सुन्दर ढंगसे पलायन भी करे । आपत्कालके समय आवश्यक कर्म ही करना चाहिये, पर सोच - विचार नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥

वाङ्मात्रेण विनीतः स्याद् हृदयेन यथा क्षुरः ।