06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2121–2130
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2121–2130
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क्षुत्पिपासाश्रमश्रान्त आर्तः खिन्नगतिर्द्विजः ॥
पृच्छन् वै ह्यन्नदातारं गृहमभ्येत्य याचयेत् ।
तं पूजयेत् तु यत्नेन सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥
तस्मिंस्तुष्टे नरश्रेष्ठ तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥
'जो दूरका रास्ता तय करनेके कारण दुर्बल तथा भूख- प्यास और परिश्रमसे थका-माँदा हो, जिसके पैर बड़ी कठिनतासे आगे बढ़ते हों तथा जो बहुत पीड़ित हो रहा हो, ऐसा ब्राह्मण अन्नदाताका पता पूछता हुआ धूलभरे पैरोंसे यदि घरपर आकर अन्नकी याचना करे
तो यत्नपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह अतिथि स्वर्गका सोपान होता है ।
नरश्रेष्ठ! उसके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं ॥
न तथा हविषा होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः ।
अनयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिपूजनात् ॥
‘ पार्थ! अतिथिकी पूजा करनेसे अग्निदेवको जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी हविष्यसे होम करने और फूल तथा चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होती ॥
देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टापमार्जनम् ।
श्रान्तसंवाहनं चैव तथा पादावसेचनम् ॥
प्रतिश्रयप्रदानं च तथा शय्यासनस्य च ।
एकैकं पाण्डवश्रेष्ठ गोप्रदानाद् विशिष्यते ॥
‘ पाण्डवश्रेष्ठ! देवताके ऊपर चढ़ी हुई पत्र- पुष्प आदि पूजन- सामग्रीको हटाकर उस स्थानको साफ करना, ब्राह्मणके जूठे किये हुए बर्तन और स्थानको माँज - धो देना, थके हुए ब्राह्मणका पैर दबाना, उसके चरण धोना, उसे रहनेके लिये घर, सोनेके लिये शय्या और बैठनेके लिये आसन देना – इनमेंसे एक- एक कार्यका महत्त्व गोदानसे बढ़कर है ॥
पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ।
ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥
' जो मनुष्य ब्राह्मणोंको पैर धोनेके लिये जल, पैरमें लगानेके लिये घी, दीपक, अन्न और रहनेके लिये घर देते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते ॥
विप्रातिथ्ये कृते राजन् भक्त्या शुश्रूषितेऽपि च ।
देवाः शुश्रूषिताः सर्वे त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥
‘ शत्रुदमन! राजन्! ब्राह्मणका आतिथ्य सत्कार तथा भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करनेसे समस्त तैंतीसों देवताओंकी सेवा हो जाती है ॥
अभ्यागतो ज्ञातपूर्वो ह्यज्ञातोऽतिथिरुच्यते ।
तयोः पूजां द्विजः कुर्यादिति पौराणिकी श्रुतिः ॥
' पहलेका परिचित मनुष्य यदि घरपर आवे तो उसे अभ्यागत कहते हैं और अपरिचित पुरुष अतिथि कहलाता है। द्विजोंको इन दोनोंकी ही पूजा करनी चाहिये । यह पञ्चम वेद
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-पुराणकी श्रुति है ॥
पादाभ्यङ्गान्नपानैस्तु योऽतिथिं पूजयेन्नरः ।
पूजितस्तेन राजेन्द्र भवामीह न संशयः ॥
' राजेन्द्र! जो मनुष्य अतिथिके चरणोंमें तेल मलकर, उसे भोजन कराकर और पानी पिलाकर उसकी पूजा करता है, उसके द्वारा मेरी भी पूजा हो जाती है — इसमें संशय नहीं ||
शीघ्रं पापाद् विनिर्मुक्तो मया चानुग्रहीकृतः ।
विमानेनेन्दुकल्पेन मम लोकं स गच्छति ॥
‘ वह मनुष्य तुरंत सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है और मेरी कृपासे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल विमानपर आरूढ़ होकर मेरे परमधामको पधारता है ॥ अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति
देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च ।
तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिताः स्यु- ते निराशाः पितरो व्रजन्ति ॥
' थका हुआ अभ्यागत जब घरपर आता है, तब उसके पीछे - पीछे समस्त देवता, पितर और अग्नि भी पदार्पण करते हैं । यदि उस अभ्यागत द्विजकी पूजा हुई तो उसके साथ उन देवता आदिकी भी पूजा हो जाती है और उसके निराश लौटनेपर वे देवता, पितर आदि भी हताश होकर लौट जाते हैं ॥
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ।
पितरस्तस्य नाश्नन्ति दशवर्षाणि पञ्च च ॥
‘जिसके घरसे अतिथिको निराश होकर लौटना पड़ता है, उसके पितर पंद्रह वर्षोंतक भोजन नहीं करते ॥
निर्वासयति यो विप्रं देशकालागतं गृहात् ।
पतितस्तत्क्षणादेव जायते नात्र संशयः ॥
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Milva ‘जो देश- कालके अनुसार घरपर आये हुए ब्राह्मणको वहाँसे बाहर कर देता है, वह तत्काल पतित हो जाता है - इसमें संदेह नहीं है ॥
चाण्डालोऽप्यतिथिः प्राप्तो देशकालेऽन्नकाङ्क्षया ।
अभ्युद्गभ्यो गृहस्थेन पूजनीयश्च सर्वदा ॥
‘ यदि देश- कालके अनुसार अन्नकी इच्छासे चाण्डाल भी अतिथिके रूपमें आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको सदा उसका सत्कार करना चाहिये ॥
मोघं ध्रुवं प्रोर्णयति मोघमस्य तु पच्यते ।
मोघमन्नं सदाश्नाति योऽतिथिं न च पूजयेत् ॥
'जो अतिथिका सत्कार नहीं करता, उसका ऊनी वस्त्र ओढ़ना, अपने लिये रसोई बनवाना और भोजन करना- सब कुछ निश्चय ही व्यर्थ है ॥ साङ्गोपाङ्गांस्तु यो वेदान् पठतीह दिने दिने ।
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न चातिथिं पूजयति वृथा भवति स द्विजः ॥ ‘ जो प्रतिदिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता है, किंतु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस द्विजका जीवन व्यर्थ है ॥
पाकयज्ञमहायज्ञैः सोमसंस्थाभिरेव च ।
ये यजन्ति न चार्चन्ति गृहेष्वतिथिमागतम् ॥
तेषां यशोऽभिकामानां दत्तमिष्टं च यद् भवेत् ।
वृथा भवति तत् सर्वमाशया हि तया हतम् ॥
' जो लोग पाक- यज्ञ, पञ्चमहायज्ञ तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, परंतु घरपर आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यज्ञ करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है । अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ-कर्मोंका नाश कर देती है ॥
देशं कालं च पात्रं च स्वशक्तिं च निरीक्ष्य च ।
अल्पं समं महद् वापि कुर्यादातिथ्यमाप्तवान् ॥
‘ इसलिये श्रद्धालु होकर देश, काल, पात्र और अपनी शक्तिका विचार करके अल्प, मध्यम अथवा महान् रूपमें अतिथि- सत्कार अवश्य करना चाहिये ॥ '
सुमुखः सुप्रसन्नात्मा धीमानतिथिमागतम् ।
स्वागतेनासनेनाद्भिरन्नाद्येन च पूजयेत् ॥
‘ जब अतिथि अपने द्वारपर आवे, तब बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए मुखसे अतिथिका स्वागत करे तथा बैठनेको आसन और चरण धोनेके लिये जल देकर अन्न- पान आदिके द्वारा उसकी पूजा करे ॥
हितः प्रियो वा द्वेष्यो वा मूर्खः पण्डित एव वा ।
प्राप्तो यो वैश्वदेवान्ते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥
' अपना हितैषी, प्रेमपात्र, द्वेषी, मूर्ख अथवा पण्डित-जो कोई भी बलिवैश्वदेवके बाद आ जाय, वह स्वर्गतक पहुँचानेवाला अतिथि है ॥
क्षुत्पिपासाश्रमार्ताय देशकालागताय च ।
सत्कृत्यान्नं प्रदातव्यं यज्ञस्य फलमिच्छता ॥
‘ जो यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दुःखी तथा देश-कालके अनुसार प्राप्त हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक अन्न प्रदान करे ॥
भोजयेदात्मनः श्रेष्ठान् विधिवद् हव्यकव्ययोः ।
अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् ॥
तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ॥
‘ यज्ञ और श्राद्धमें अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषको विधिवत् भोजन कराना चाहिये । अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है; इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले
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पुरुषको विशेषरूपसे अन्न -दान करना चाहिये ॥
अन्नदः सर्वकामैस्तु सुतृप्तः सुष्ठ्वलंकृतः ।
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ॥
सेव्यमानो वरस्त्रीभिर्देवलोकं स गच्छति । ‘ अन्न प्रदान करनेवाला मनुष्य सब भोगोंसे तृप्त होकर भलीभाँति आभूषणोंसे सम्पन्न हुआ पूर्ण चन्द्रमाके प्रकाशसे प्रकाशित विमानद्वारा देवलोकमें जाता है । वहाँ सुन्दर स्त्रियोंद्वारा उसकी सेवा की जाती है ॥ क्रीडित्वा तु ततस्तस्मिन् वर्षकोटिं यथामरः ॥
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके महायशाः ।
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ॥
‘ वहाँ करोड़ वर्षोंतक देवताओंके समान भोग भोगनेके बाद समयपर वहाँसे गिरकर यहाँ महायशस्वी और वेदशास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ॥ यथाश्रद्धं तु यः कुर्यान्मनुष्येषु प्रजायते ।
महाधनपतिः श्रीमान् वेदवेदाङ्गपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ॥
'जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अतिथि सत्कार करता है, वह मनुष्योंमें महान् धनवान्, श्रीमान्, वेद- वेदांगका पारदर्शी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वका ज्ञाता एवं भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ॥
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् वर्षमेकमकल्मषः ।
धर्मार्जितधनो भूत्वा पाकभेदविवर्जितः ॥
' जो मनुष्य धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके भोजनमें भेद न रखते हुए एक वर्षतक सबका अतिथि- सत्कार करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् यथाश्रद्धं नरेश्वर ।
अकालनियमेनापि सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥
सत्यसंधो जितक्रोधः शाखाधर्मविवर्जितः ।
अधर्मभीरुर्धर्मिष्ठो मायामात्सर्यवर्जितः ॥
श्रद्दधानः शुचिर्नित्यं पाकभेदविवर्जितः ।
स विमानेन दिव्येन दिव्यरूपी महायशाः ॥
पुरंदरपुरं याति गीयमानोऽप्सरोगणैः । ‘ नरेश्वर! जो सत्यवादी जितेन्द्रिय पुरुष समयका नियम न रखकर सभी अतिथियोंकी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, जो सत्यप्रतिज्ञ है, जिसने क्रोधको जीत लिया है, जो शाखाधर्मसे रहित, अधर्मसे डरनेवाला और धर्मात्मा है, जो माया और मत्सरतासे रहित है,
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जो भोजनमें भेद- भाव नहीं करता तथा जो नित्य पवित्र और श्रद्धासम्पन्न रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है । वहाँ वह दिव्यरूपधारी और महायशस्वी होता है । अप्सराएँ उसके यशका गान करती हैं ॥
मन्वन्तरं तु तत्रैव क्रीडित्वा देवपूजितः ।
मानुष्यलोकमागम्य भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ॥
‘वह एक मन्वन्तरतक वहीं देवताओंसे पूजित होता है और क्रीड़ा करता रहता है ।
उसके बाद मनुष्यलोकमें आकर भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ' ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[भूमि दान, तिल दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा ] श्रीभगवानुवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानमनुत्तमम् ॥
यः प्रयच्छति विप्राय भूमिं रम्यां सदक्षिणाम् ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय साग्निहोत्राय पाण्डव ॥
स सर्वकामतृप्तात्मा सर्वरत्नविभूषितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो दीप्यमानोऽर्कवत् तदा ॥
श्रीभगवान्ने कहा — पाण्डुनन्दन! अब मैं सबसे उत्तम भूमिदानका वर्णन करता जो मनुष्य रमणीय भूमिका दक्षिणाके साथ श्रोत्रिय अग्निहोत्री दरिद्र ब्राह्मणको दान देता है, वह उस समय सभी भोगोंसे तृप्त, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित एवं सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यके समान देदीप्यमान होता है ॥ बालसूर्यप्रकाशेन विचित्रध्वजशोभिना याति यानेन दिव्येन मम लोकं महायशाः ॥ वह महायशस्वी पुरुष प्रातः कालीन सूर्यके समान प्रकाशित, विचित्र ध्वजाओंसे सुशोभित दिव्य विमानके द्वारा मेरे लोकमें जाता है ॥
न हि भूमिप्रदानाद् वै दानमन्यद् विशिष्यते ।
न चापि भूमिहरणात् पापमन्यद् विशिष्यते ॥
क्योंकि भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है और भूमि छीन लेनेसे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है ॥
दानान्यन्यानि हीयन्ते कालेन कुरुपुङ्गव ।
भूमिदानस्य पुण्यस्य क्षयो नैवोपपद्यते ॥
कुरुश्रेष्ठ! दूसरे दानोंके पुण्य समय पाकर क्षीण हो जाते हैं, किंतु भूमिदानके पुण्यका कभी भी क्षय नहीं होता ॥
सुवर्णमणिरत्नानि धनानि च वसूनि च ।
सर्वदानानि वै राजन् ददाति वसुधां ददत् ॥
राजन्! पृथ्वीका दान करनेवाला मानो सुवर्ण, मणि, रत्न, धन और लक्ष्मी आदि समस्त पदार्थोंका दान करता है ॥
सागरान् सरितः शैलान् समानि विषमाणि च ।
सर्वगन्धरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥
भूमि-दान करनेवाला मनुष्य मानो समस्त समुद्रोंको, सरिताओंको, पर्वतोंको, सम-विषम प्रदेशोंको, सम्पूर्ण गन्ध और रसोंको देता है ॥ ओषधीः फलसम्पन्ना नानापुष्पसमन्विताः ।
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कमलोत्पलषण्डांश्च ददाति वसुधां ददत् ॥ पृथ्वीका दान करनेवाला मनुष्य मानो नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त वृक्षोंका तथा कमल और उत्पलोंके समूहोंका दान करता है ॥
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्ये यजन्ते सदक्षिणैः ।
न तत् फलं लभन्ते ते भूमिदानस्य यत् फलम् ॥
जो लोग दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करते हैं, वे भी उस फलको नहीं पाते, जो भूमि-दानका फल है ॥
सस्यपूर्णां महीं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति ।
पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
जो मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणको धानसे भरे हुए खेतकी भूमि दान करता है, उसके पितर महाप्रलयकालतक तृप्त रहते हैं ॥
मम रुद्रस्य सवितुस्त्रिदशानां तथैव च ।
प्रीतये विद्धि राजेन्द्र भूमिर्दत्ता द्विजाय वै ॥
राजेन्द्र! ब्राह्मणको भूमि- दान करने से सब देवता, सूर्य, शंकर और मैं —ये सभी प्रसन्न होते हैं ऐसा समझो ||
न पुण्येन पूतात्मा दाता भूमेर्युधिष्ठिर ।
मम सालोक्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥
युधिष्ठिर! भूमि-दानके पुण्यसे पवित्रचित्त हुआ दाता मेरे परम धाममें निवास करता है -इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ॥
यत्किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः ।
स च गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन शुद्धयति ॥
मनुष्य जीविकाके अभावमें जो कुछ पाप करता है, उससे गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेपर भी छुटकारा पा जाता है ॥
मासोपवासे यत् पुण्यं कृच्छ्रे चान्द्रायणेऽपि च ।
भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ॥
एक महीनेतक उपवास, कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रतका अनुष्ठान करनेसे जो पुण्य होता है, वह गोकर्णमात्र भूमि दान करने से हो जाता है ॥
सर्वतीर्थाभिषेके च यत् पुण्यं समुदाहृतम् ।
भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ॥
सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सारा पुण्य गोकर्णमात्र भूमिका दान करनेसे प्राप्त हो जाता है ॥ युधिष्ठिर उवाच
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देवदेव नमस्तेऽस्तु वासुदेव सुरेश्वर ।
गोकर्णस्य प्रमाणं वै वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥
युधिष्ठिरने कहा — देवेश्वर कृष्ण! आपको नमस्कार है । सुरेश्वर! मुझे गोकर्णमात्र भूमिका ठीक - ठीक माप बतलानेकी कृपा कीजिये ॥ श्रीभगवानुवाच
शृणु गोकर्णमात्रस्य प्रमाणं पाण्डुनन्दन ।
त्रिंशद्दण्डप्रमाणेन प्रमितं सर्वतो दिशम् ॥
प्रत्यक् प्रागपि राजेन्द्र तत् तथा दक्षिणोत्तरम् ।
गोकर्णं तद्विदः प्राहुः प्रमाणं धरणेर्नृप ॥
श्रीभगवान् बोले—नृपश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! गोकर्णमात्र भूमिका प्रमाण सुनो । पूर्वसे पश्चिम और उत्तरसे दक्षिण चारों ओर तीस- तीस दण्ड* नापनेसे जितनी भूमि होती है, उसको भूमिके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष गोकर्णमात्र भूमिका माप बताते हैं ॥
सवृषं गोशतं यत्र सुख तिष्ठत्ययन्त्रितम् ।
सवत्सं कुरुशार्दूल तच्च गोकर्णमुच्यते ॥
कुरुश्रेष्ठ! जितनी भूमिमें खुली हुई सौ गौएँ बैलों और बछड़ोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें, उतनी भूमिको भी गोकर्ण कहते हैं ॥
किंकरा मृत्युदण्डाश्च कुम्भीपाकाश्च दारुणाः ।
घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥
निरया रौरवाद्याश्च तथा वैतरणी नदी ।
तीव्राश्च यातनाः कष्टा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥
भूमिका दान करनेवाले पुरुषके पास यमराजके दूत नहीं फटकने पाते । मृत्युके दण्ड, दारुण कुम्भीपाक, भयानक वरुणपाश, रौरव आदि नरक, वैतरणी नदी और कठोर यम-यातनाएँ भी भूमिदान करनेवालोंको नहीं सतातीं ॥
चित्रगुप्तः कलिः कालः कृतान्तो मृत्युरेव च ।
यमश्च भगवान् साक्षात् पूजयन्ति महीप्रदम् ॥
चित्रगुप्त, कलि, काल, कृतान्त मृत्यु और साक्षात् भगवान् यम भी भूमिदान करनेवालेका आदर करते हैं ॥
रुद्रः प्रजापतिः शक्रः सुरा ऋषिगणास्तथा ।
अहं च प्रीतिमान् राजन् पूजयामो महीप्रदम् ॥
राजन्! रुद्र, प्रजापति, इन्द्र, देवता, ऋषिगण और स्वयं मैं - ये सभी प्रसन्न होकर भूमिदाताका आदर करते हैं ॥ कृशभृत्यस्य कृशगोः कृशाश्वस्य कृतातिथेः ।
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भूमिर्देया नरश्रेष्ठ स निधिः पारलौकिकः ॥ नरश्रेष्ठ! जिसके कुटुम्बके लोग जीविकाके अभावसे दुर्बल हो गये हों, जिसकी गौएँ और घोड़े भी दुबले - पतले दिखायी देते हों तथा जो सदा अतिथि सत्कार करनेवाला हो, ऐसे ब्राह्मणको भूमि-दान देना चाहिये; क्योंकि वह परलोकके लिये खजाना है ॥
सीदमानकुटुम्बाय श्रोत्रियायाग्निहोत्रणे ।
व्रतस्थाय दरिद्राय भूमिर्देया नराधिप ॥
नरेश्वर! जिसके कुटुम्बीजन कष्ट पा रहे हों - ऐसे श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, व्रतधारी एवं दरिद्र ब्राह्मणको भूमि देनी चाहिये ॥
यथा हि धात्री क्षीरेण पुत्रं वर्धयति स्वयम् ।
दातारमनुगृह्णाति दत्ता ह्येवं वसुन्धरा ॥
जैसे धाय अपना दूध पिलाकर पुत्रका पालन- पोषण करती है, उसी प्रकार दानमें दी हुई भूमि दातार अनुग्रह करती है ॥
यथा बिभर्ति गौर्वत्सं सृजन्ती क्षीरमात्मनः ।
तथा सर्वगुणोपेता भूमिर्वहति भूमिदम् ॥
जैसे गौ अपना दूध पिलाकर बछड़ेका पालन करती है, वैसे ही सर्वगुणसम्पन्न भूमि अपने दाताका कल्याण करती है ॥
यथा बीजानि रोहन्ति जलसिक्तानि भूपते ।
तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदस्य दिने दिने ॥
भूपाल! जिस प्रकार जलसे सींचे हुए बीज अंकुरित होते हैं, वैसे ही भूमिदाताके मनोरथ प्रतिदिन पूर्ण होते रहते हैं ॥
यथा तेजस्तु सूर्यस्य तमः सर्वं व्यपोहति ।
तथा पापं नरस्येह भूमिदानं व्यपोहति ॥
जैसे सूर्यका तेज समस्त अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार यहाँ भूमि-दान मनुष्यके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर डालता है ॥
आश्रुत्य भूमिदानं तु दत्त्वा यो वा हरेत् पुनः ।
स बद्धो वारुणैः पाशैः क्षिप्यते पूयशोणिते ॥
कुरुश्रेष्ठ! जो भूमि-दानकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता अथवा देकर फिर छीन लेता है, उसे वरुणके पाशसे बाँधकर पीब और रक्तसे भरे हुए नरक- कुण्डमें डाला जाता है ॥
स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धराम् ।
न तस्य नरकाद् घोराद् विद्यते निष्कृतिः क्वचित् ॥
जो अपने या दूसरेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है, उसके लिये नरकसे उद्धार पानेका कोई उपाय नहीं है ॥ दत्त्वा भूमिं द्विजेन्द्राणां यस्तामेवोपजीवति ।