महाभारत — खण्ड ६
Mahabharata - 6 · Gita Press, Gorakhpur · 2566 पृष्ठ · 257 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 37 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( षष्ठ खण्ड ) अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक और स्वर्गारोहणपर्व [ सचित्र, सरल… 1–10
- १४०- नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे… 11–20
- ३३- परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग- द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गंगाजीमें गोता… 21–30
- इसलिये इस सर्पको तुम जीवित छोड़ दो । ३१ । लुब्धक उवाच वृत्रं हत्वा देवराट् श्रेष्ठभाग् वै यज्ञं हत्वा भागमवाप चैव… 31–40
- सत्ये तपसि दाने च यस्य नित्यं रतं मनः । ७ । दशाश्वका पुत्र भी बड़ा धर्मात्मा राजा था । उसका मन सदा सत्य, तपस्या और दानमें ही लगा रहता था… 41–50
- मिथ्या नहीं हो सकती । ८२ । एषा हि तपसा स्वेन संयुक्ता ब्रह्मवादिनी । पावनार्थं च लोकस्य सरिच्छ्रेष्ठा भविष्यति । ८३… 51–60
- गीताप्रेस गोरखपुर शिव- पार्वती pary गीताप्रेस, गोरखपुर अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके साथ प्रश्नोत्तर गीताप्रेस गोरखपुर BieMike भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा… 61–70
- ‘ सुमध्यमे! इसीलिये तुम्हारे लिये नियत किये गये चरु और वृक्षमें मेरा अनुराग हुआ है । तुम भी यही चिन्तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो… 71–80
- महर्षि वसिष्ठका ब्रह्माजीके साथ प्रश्नोत्तर ततः फलानि पत्राणि शाखाश्चापि मनोहराः । शुकस्य दृढभक्तित्वात् श्रीमत्तां प्राप स द्रुमः । ३०… 81–90
- सप्तमोऽध्यायः कर्मोंके फलका वर्णन युधिष्ठिरउवाच कर्मणां च समस्तानां शुभानां भरतर्षभ । फलानि महतां श्रेष्ठ प्रब्रूहि परिपृच्छतः । १… 91–100
- नवमोऽध्यायः ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको… 101–110
- कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भवांश्चोदङ्मुखः शुचिः । स च तत् कृतवान् शूद्रः सर्वं यदृषिरब्रवीत् । ३१… 111–120
- जो स्त्री निर्दयतापूर्वक पापाचारमें तत्पर रहनेवाली, अपवित्र, चटोर, धैर्यहीन, कलहप्रिय, नींदमें बेसुध होकर सदा खाटपर पड़ी रहनेवाली होती है, ऐसी नारीसे मैं… 121–130
- भेदयामास तान् गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् । २८ । तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी । २८… 131–140
- त्वं प्रियश्चास्य भक्तश्च नान्यः काश्यप विद्यते । कश्यपकुमार! ये भगवान् नारायण भक्तोंके प्रिय हैं तथा भक्त भी उन्हें बहुत प्रिय हैं और आप भी उनके प्रिय… 141–150
- || हिरण्यगर्भाय नमः सौम्याय वृषरूपिणे । नारायणाग्रवपुषे पुरुहूताय वज्रिणे । धर्मिणे वृषसेनाय धर्मसेनाय रोधसे… 151–160
- सुपर्णउवाच एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत । पश्यतो मे महायोगी जगामात्मगतिर्गतिम् । गरुड कहते हैं —ऋषियो! ऐसा कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये… 161–170
- जिनके मस्तकसे पहली बार मदकी धारा फूटकर बही थी, ऐसे हाथी वहाँके उपवनकी शोभा बढ़ाते थे । हर्षमें भरे हुए नाना प्रकारके विहंगम वहाँके वृक्षोंपर बसेरे लेते थे… 171–180
- ‘ बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे' । १२८ । जनन्यास्तद् वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन्… 181–190
- जो अज्ञानान्धकारसे परे चिन्मय परमज्योतिःस्वरूप हैं, तपस्वीजनोंके परम तप हैं तथा जिनका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं, उन्हीं भगवान्… 191–200
- पिनाकमिति विख्यातमभवत् पन्नगो महान् । २५६ । उन महात्मा रुद्रदेवका इन्द्रधनुषके समान रंगवाला जो पिनाक नामसे विख्यात धनुष है, वह विशाल सर्पके रूपमें प्रकट… 201–210
- योगेश्वर नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वसम्भव । भगवन्! देव! आपको नमस्कार है । भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है । योगेश्वर! आपको नमस्कार है… 211–220
- नमस्यन्ति महाराज वाङ्मनः कर्मभिर्विभुम् । ४०२ । महाराज! विद्याधर, दानव, गुह्यक, राक्षस तथा समस्त चराचर प्राणी मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा भगवान् शिवको… 221–230
- जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो । १४ । निर्वाणद सहस्रांशो नमस्तेऽस्तु सुखाश्रय । विभो! जो जन्म - मरणसे भयभीत हो संसार- बन्धनसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न… 231–240
- सावधान होकर मेरे मुखसे इसका श्रवण करें । आप परमेश्वर महादेवजीके भक्त हैं; अतः इस शिवस्वरूप स्तोत्रका वरण करें । ३–६… 241–250
- २८६ लोहिताक्षः —रक्तनेत्र, २८७ महाक्षः -बड़े नेत्रवाले, २८८ विजयाक्षः-विजयशील रथवाले, २८ ९ विशारदः - विद्वान्, २ ९ ० संग्रहः- संग्रह करनेवाले, २ ९ १… 251–260
- तारनेवाले, ६८६ सारङ्गः -चातकस्वरूप, ६८७ नवचक्राङ्गः –नूतन हंसरूप, ६८८ केतुमाली - ध्वजा- पताकाओंकी मालाओंसे अलंकृत, ६८ ९ सभावनः – धर्मस्थानकी रक्षा… 261–270
- भगवान् शंकरकी कृपासे ही मनुष्योंके हृदयमें उनकी अनन्यभक्ति उत्पन्न होती है, जिससे वे अपने चित्तको उन्हींके चिन्तनमें लगाकर परमसिद्धिको प्राप्त होते हैं… 271–280
- किया । मुझे मेरे ही समान एक सहस्र ब्रह्मवादी पुत्र दिये तथा पुत्रोंसहित मेरी दस लाख वर्षकी आयु नियत कर दी । ३८-३९… 281–290
- दिव्याङ्गरागैः पैशाचैरन्यैर्नानाविधैः प्रभोः । १७ । वहाँ नाना प्रकारके मुखवाले भाँति- भाँतिके दिव्य अंगराग लगाये अनेकानेक पिशाच तथा अन्य भूत - वैताल आदि… 291–300
- ततः स ऋषिरेकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतां रुचितश्छन्दः किं च कार्यं ब्रवीहि मे । ९ ५… 301–310
- इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकविंशोऽध्यायः । २१ । इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें… 311–320
- भीष्म उवाच कुलीनः कर्मकृद् वैद्यस्तथैवाप्यानृशंस्यवान् । ह्रीमानृजुः सत्यवादी पात्रं पूर्वे च ये त्रयः । ९… 321–330
- राजन्! जो ब्राह्मण उन्नत होकर तत्काल ही अवनत और अवनत होकर उन्नत हो जाता है एवं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता है, वह थोड़ा दोषी हो तो भी उसे श्राद्धमें… 331–340
- जो सब प्रकारकी हिंसाओंसे अलग रहते हैं, सब कुछ सहते हैं और सबको आश्रय देते रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं… 341–350
- द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद् विप्रमुच्यते । ४७ । रामह्रद ( परशुराम-कुण्ड) - में स्नान और विपाशा नदीमें तर्पण करके बारह दिनोंतक उपवास करनेवाला पुरुष सब… 351–360
- यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाङ्गेयं पिबते जलम् । गवां निर्हारनिर्मुक्ताद् यावकात् तद् विशिष्यते । ३८… 361–370
- भक्त्या युक्तः श्रद्धया श्रद्दधानः । ९९ । अतः मैंने बड़ी श्रद्धाके साथ जो ये गंगाजीके गुण बताये हैं, उन सबपर विश्वास करके मन, वाणी, क्रिया, भक्ति और… 371–380
- एकोनत्रिंशोऽध्यायः मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना भीष्म उवाच एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः । सहस्रमेकपादेन ततो ध्याने व्यतिष्ठत । । १… 381–390
- पुत्रं प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम् । ३७ । इसके बाद राजाने अपने पुत्र शत्रुदमन प्रतर्दनको वीतहव्यके पुत्रोंका वध करनेके लिये भेजा । ३७… 391–400
- अतः कुन्तीनन्दन! यदि तुम भी सदा देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियोंका भलीभाँति पूजन एवं सत्कार करते रहोगे तो अभीष्ट गति प्राप्त कर लोगे । ३६… 401–410
- तेष्वेव यात्रा लोकानां भूतानामिव वासवे । ७ । राजाके लिये ब्राह्मण ही पिताकी भाँति पूजनीय, वन्दनीय और माननीय है… 411–420
- पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन भीष्म उवाच जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते । नमस्यः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक्… 421–430
- बोद्धव्यस्तादृशस्तात नरं श्वानं हि तं विदुः । १४ । जो ब्राह्मण अपने पाण्डित्यका अभिमान करके व्यर्थके तर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता है, आन्वीक्षिकी… 431–440
- शत्रुदमन! तब वे देवता ब्रह्माजीके पास गये और उनसे अपने मनकी बात निवेदन करके मुँह नीचे किये चुपचाप बैठ गये । ६३ । तेषामन्तर्गतं ज्ञात्वा देवानां स पितामहः… 441–450
- है? ' । १४ । वक्त्राच्छशाङ्कसदृशाद् वाणी संस्कारभूषणा । व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा । १५… 451–460
- त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना भीष्म उवाच तमागतमभिप्रेक्ष्य… 461–470
- तदेतत् सर्वमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यताम् । ३० । हम इस विषयमें यथार्थ तत्त्वको जानना चाहते हैं । आप हमारे पथप्रदर्शक होइये… 471–480
- नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिया हीनानि पार्थिव । ७ । जब कुलकी बहू - बेटियाँ दुःख मिलनेके कारण शोकमग्न होती हैं तब उस कुलका नाश हो जाता है… 481–490
- एष दायविधिः पार्थ पूर्वमुक्तः स्वयम्भुवा । ५८ । कुन्तीनन्दन! ज्येष्ठ पुत्रका भाग भी ज्येष्ठ होता है । उसे प्रधानतः एक अंश अधिक मिलता है… 491–500
- एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच ब्रूहि तात कुरुश्रेष्ठ वर्णानां त्वं पृथक् पृथक्… 501–510
- जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन इत्युक्तास्ते निषादास्तु सुभृशं भयकम्पिताः । सर्वे विवर्णवदना नहुषाय न्यवेदयन् । २७… 511–520
- द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा युधिष्ठिर उवाच संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान् सागरोपमः… 521–530
- उसमें अच्छे - अच्छे सैकड़ों बाण रखे गये हों' । ३१ । ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् । भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा । ३२… 531–540
- ‘ ब्राह्मणत्वके प्रभावसे ही महर्षिने हम दोनोंको अपने वाहनोंकी भाँति रथमें जोत दिया था । ' इस तरह राजा सोच - विचार कर ही रहे थे कि महर्षि च्यवनको उनका आना… 541–550
- निष्पाप महाराज! उन्हीं और्वके पुत्र भृगुकुलनन्दन ऋचीक होंगे, जिनकी सेवामें सम्पूर्ण धनुर्वेद मूर्तिमान् होकर उपस्थित होगा । ७… 551–560
- अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल युधिष्ठिर उवाच आरामाणां तडागानां यत् फलं कुरुपुंगव । तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ… 561–570
- छोटे - बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं । ३५-३६… 571–580
- पापं कुर्वन्ति यत् किंचित् प्रजा राज्ञा ह्यरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पापस्य राजा विन्दति भारत । ३४… 581–590
- सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामगुणान्विताम् । ददाति यः सहस्राक्ष स्वर्गं याति स मानवः । ६३ । सहस्राक्ष! जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली और समस्त मनोवांछित… 591–600
- भरतनन्दन! इस प्रकार जब मेघसे पृथ्वीपर जल गिरता है, तब पृथ्वीदेवी स्निग्ध ( गीली ) होती है । ३८ । ततः सस्यानि रोहन्ति येन वर्तयते जगत्… 601–610
- परमं भेषजं ह्येतद् यज्ञानामेतदुत्तमम् । रसानामुत्तमं चैतत् फलानां चैतदुत्तमम् । ८ । घी सबसे उत्तम औषध और यज्ञ करनेकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु है… 611–620
- न स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः । ६० । पराशर मुनिका कथन है कि ' जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट… 621–630
- इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है । उससे बढ़कर कोई दान नहीं है । युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी… 631–640
- एकसप्ततितमोऽध्यायः पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना युधिष्ठिर उवाच दत्तानां फलसम्प्राप्तिं गवां प्रब्रूहि… 641–650
- सास्यामुष्मिन् पुण्यतीर्था नदी वै । ५३ । ' जो मनुष्य किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको सहस्र, शत, दस अथवा पाँच गौओंका उनके अच्छे बछड़ोंसहित दान करता है अथवा एक ही… 651–660
- शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है, वह उस गौके जितने रोएँ होते हैं, उतने गौओंके दानका अक्षय फल पाता है… 661–670
- शूरान्वयानां निर्दिष्टं फलं शूरस्य चैव हि । २२ । शूरवीरोंके अनेक भेद बताये गये हैं । उन सबके तात्पर्य मुझसे सुनो… 671–680
- सप्तसप्ततितमोऽध्यायः कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्ठिरो राजा भूयः शान्तनवं नृपम्… 681–690
- ' गौओंका नाम - कीर्तन किये बिना न सोये । उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे । इससे मनुष्यको बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है । १६… 691–700
- पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् । को यज्ञः सर्वयज्ञानां वरिष्ठोऽभ्युपलक्ष्यते । ८ । निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ… 701–710
- गौओ! मैं तुमसे सम्मान चाहती हूँ । तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो । तुम्हारे किसी एक अंगमें, नीचेके कुत्सित अंगमें भी यदि स्थान मिल जाय तो मैं उसमें रहना… 711–720
- चतुरशीतितमोऽध्यायः भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका… 721–730
- ‘ प्रभो! संतानके लिये प्रकट होनेवाला जो आपका उत्तम तेज है, उसे आप अपने भीतर ही रोक लीजिये । आप दोनों त्रिलोकीके सारभूत हैं… 731–740
- देवता बोले — अग्निदेव! एक तारकनामक असुर है जो ब्रह्माजीके वरदानसे मदमत्त होकर अपने पराक्रमसे हम सब लोगोंको कष्ट दे रहा है… 741–750
- भृगोस्तु पुत्राः सप्तासन् सर्वे तुल्या भृगोर्गुणैः । च्यवनो वज्रशीर्षश्च शुचिरौर्वस्तथैव च । १२८ । शुक्रो वरेण्यश्च विभुः सवनश्चेति सप्त ते… 751–760
- खेल- खेलमें ही उन अग्निकुमारके द्वारा जब तारकासुर मार डाला गया, तब ऐश्वर्यशाली देवेन्द्र पुनः देवताओंके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये । ३०… 761–770
- ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गायनः सर्वविक्रयी । ६ । अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी । सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिकः कूटकारकः । ७… 771–780
- पादयोश्चैव विप्राणां ये त्वन्नमुपभुञ्जते । १४ । कृत्वा च दक्षिणाग्रान् वै दर्भान् स प्रयतः शुचिः प्रददौ श्रीमतः पिण्डान् नामगोत्रमुदाहरन् । १५… 781–790
- अभक्षयन् वृथा मांसममांसाशी भवत्युत । दानं ददत् पवित्री स्यादस्वप्नश्च दिवास्वपन् । १२ । जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है,… 791–800
- भीष्मजी कहते हैं - राजन्! कुत्तेसहित आये हुए संन्यासीने जब उन महर्षियोंको देखा, तब उनके पास आकर संन्यासकी मर्यादाके अनुसार उनका हाथसे स्पर्श किया । ६८… 801–810
- जीवतो वै गुरून् भृत्यान् भरन्त्वस्य परे जनाः । अगतिर्बहुपुत्रः स्याद् बिसस्तैन्यं करोति यः । १२४… 811–820
- नारदजीने कहा – जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह देहरूपी घरको ही आत्मा समझे । मर्यादाका उल्लंघन करके शास्त्र पढ़े… 821–830
- ‘विप्रवर! ब्रह्मर्षे! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब आप भी जानते हैं । भला, सूर्यको गिरानेसे आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना… 831–840
- क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विशः स्मृताः । शूद्राः परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणाः । क्षत्रिय आस्मभ ( उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं… 841–850
- न चायुक्तेन शक्योऽयं द्रष्टुं देहे महेश्वरः । युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि । जो योगयुक्त नहीं है ऐसा पुरुष अपने हृदयमें विराजमान उस… 851–860
- तथैव विश्वेदेवेभ्यो बलिमाकाशतो हरेत् । निशाचरेभ्यो भूतेभ्यो बलिं नक्तं तथा हरेत् । १४ । विश्वेदेवोंके लिये आकाशमें बलि अर्पित करे… 861–870
- करे । ५० । दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभः । दीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमालेव राजते । ५१ । दीपक चुरानेवाला मनुष्य अंधा और श्रीहीन होता है तथा मरनेके बाद… 871–880
- रथ ढोनेके लिये बुलाया । तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा । १४-१५ । निमीलय स्वनयने जटां यावद् विशामि ते… 881–890
- उस महानागके कुम्भस्थलसे फूटकर मदकी धारा बहने लगी । मानो पर्वतसे झरना झर रहा हो । एक दिन इन्द्रने राजा धृतराष्ट्रके रूपमें आकर उस हाथीको अपने अधिकारमें कर… 891–900
- रजोगुणसे रहित, समृद्धिशाली, बुद्धि और सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाकर तुम्हें मुझे यह हाथी वापस देना पड़ेगा । ४ ९ –५१… 901–910
- वासोभिरन्नैर्गोभिश्च शुभैर्नैवेशिकैरपि । शुभैः सुरगणैश्चापि स्तोष्या एव द्विजास्तथा । एतदेव परं गुह्यमलोभेन समाचर । ४५… 911–920
- आर्द्रपादस्तु भुंजानो वर्षाणां जीवते शतम् । त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन । ६२ । अग्निं गां ब्राह्मणं चैव तथा ह्यायुर्न रिष्यते… 921–930
- महाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्ठिर । अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता । १३५ । युधिष्ठिर! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान् या समान… 931–940
- धर्मदर्शी विद्वानोंने उनके लिये तीन राततक उपवास करनेका विधान नहीं किया है । १३ । पञ्चम्यां वापि षष्ठ्यां च पौर्णमास्यां च भारत… 941–950
- हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नरः । इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभिः समावृतः । १५ । वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी… 951–960
- रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर,… 961–970
- नवाधिकशततमोऽध्यायः प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य युधिष्ठिर उवाच सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः… 971–980
- शरीरमें सम्पूर्ण भूतोंसे युक्त हुआ वह जीव ही सुख या दुःख पाता है । उस समय पाँचों भूतोंमें स्थित उनके अधिष्ठाता देवता जीवके शुभ या अशुभ कर्मको देखते हैं… 981–990
- स मृतो मृगयोनौ तु नित्योद्विग्नोऽभिजायते । ११३ । गदहा होकर वह दो वर्षोंतक जीवित रहता है । फिर शस्त्रसे उसका वध होता है… 991–1000
- सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः । देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः । ७ । जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, अर्थात् सबकी आत्माको अपनी ही आत्मा समझता… 1001–1010
- घातकः खादकार्थाय तद् घातयति वै नरः । २ ९ । यदि कोई भी मांस खानेवाला न रह जाय तो पशुओंकी हिंसा करनेवाला भी कोई न रहे; क्योंकि हत्यारा मनुष्य मांस… 1011–1020
- अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा परम फल है, अहिंसा परम मित्र है और अहिंसा परम सुख है । २ ९ । सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम्… 1021–1030
- एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना भीष्म उवाच क्षत्रधर्ममनुप्राप्तः स्मरन्नेव च… 1031–1040
- स चान्नाज्जायते तस्मात् सूक्ष्म एष व्यतिक्रमः । १३ । प्रभाव और शक्तिसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण यदि अन्न भोजन करता है तो वह पुनः अन्नका उत्पादन करता है,… 1041–1050
- चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः नारदका पुण्डरीकको भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और… 1051–1060
- नूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते । कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिणः कृशः । २५ । निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट… 1061–1070
- ' देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों, मृग, पक्षी और भेड़ आदिको तथा कीड़ों, चींटे - चींटियों एवं सर्पोंकी हिंसा करते हैं, इससे वे… 1071–1080
- उपवासं तु गृह्णीयाद् यद् वा संकल्पयेद् व्रतम् । २० । देवता बोले — मनुष्य जलसे भरा हुआ ताँबेका पात्र लेकर उत्तराभिमुख हो उपवासका नियम ले अथवा और किसी… 1081–1090
- उसके ऊपर देवताओंसहित पितर भी विशेष संतुष्ट नहीं होते हैं । ऐसे स्थलोंपर जो प्रायश्चित्तका विधान है, उसे बताता हूँ, सुनो । ७… 1091–1100
- एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन भीष्म उवाच ततः सर्वे महाभागा देवाश्च पितरश्च ह… 1101–1110
- उसके ऊपर कभी पापका प्रभाव नहीं पड़ेगा, वह कभी पापसे लिप्त नहीं होगा । जो इस प्रसंगको पढ़ेगा, दूसरोंको सुनायेगा अथवा स्वयं सुनेगा, उसे भी उन धर्मोंके… 1111–1120
- सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन युधिष्ठिरउवाच दानेन वर्ततेत्याह तपसा चैव भारत… 1121–1130
- मृगैश्च विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम् । शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीनदर्शनम् । १८ । उस समय नाना प्रकारके जीव- जन्तुओंका आर्तनाद चारों ओर फैल रहा था, मानो… 1131–1140
- सधातुशिखराभोगो दीप्तदग्धलतौषधिः । ३५ । उसने क्षणभरमें हिमालय पर्वतको धातु और विशाल शिखरोंसहित दग्ध कर डाला… 1141–1150
- सोम ) । तयोर्हि ग्रथितं सर्वं सौम्याग्नेयमिदं जगत् । सौम्यत्वं सततं विष्णौ मय्याग्नेयं प्रतिष्ठितम् । अनेन वपुषा नित्यं सर्वलोकान् बिभर्म्यहम्… 1151–1160
- उमोवाच ( भगवन् देवदेवेश नमस्ते वृषभध्वज । श्रोतुमिच्छाम्यहं देव धर्ममाश्रमिणां विभो । उमा बोलीं- भगवन्! देवदेवेश्वर! वृषभध्वज! देव! आपको नमस्कार है… 1161–1170
- यो मार्गमनुयातीमं पदं तस्य च विद्यते । ८८ । यह मोक्षधर्मके ज्ञाता सत्पुरुषोंका वेदप्रतिपादित धर्म एवं सन्मार्ग है… 1171–1180
- दोनों प्रकारके ही ऋषियोंका यह महान् कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन तीनों समय जलमें स्नान करें और अग्निमें आहुति डालें… 1181–1190
- कर्मणा दुष्कृतेनेह स्थानाद् भ्रश्यति वै द्विजः । ज्येष्ठं वर्णमनुप्राप्य तस्माद् रक्षेत वै द्विजः । ७… 1191–1200
- परदारेषु ये नित्यं चरित्रावृतलोचनाः । १४ । जितेन्द्रियाः शीलपरास्ते नराः स्वर्गगामिनः । जो अपने सदाचारके द्वारा सदा ही परायी स्त्रियोंकी ओरसे अपनी आँखें… 1201–1210
- बहुत वर्षोंके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं… 1211–1220
- गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे । तत्पश्चात् अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे… 1221–1230
- अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे । राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे । लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर… 1231–1240
- पुत्रोंको विनय सिखाना, उन्हें भिन्न- भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे… 1241–1250
- उमोवाच मूर्खा लोके प्रदृश्यन्ते दृढमूला विचेतसः । ज्ञानविज्ञानरहिताः समृद्धाश्च समन्ततः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि… 1251–1260
- श्रीमहेश्वरने कहा – देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे आच्छादित होकर प्राणियोंके प्राणोंकी हिंसा करनेके लिये उनके अंग- भंग कर देते हैं, शस्त्रोंसे काटकर उन… 1261–1270
- कोई भी मनुष्य इस लोकमें कर्म करके यमराजको नहीं लाँघ सकता, उसे अवश्य दण्ड भोगना पड़ता है । शोभने! राजा और यम सबको भरपूर दण्ड देते हैं… 1271–1280
- शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं । वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता । जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय… 1281–1290
- वेदविद्वेषी मूर्ख, नास्तिक, अदृढ़निश्चयवाले, क्रियाहीन तथा अन्नार्थियोंको बिना कुछ दिये ही घरसे निकाल देनेवाले पापी मनुष्य अधम गतिको प्राप्त होते हैं… 1291–1300
- एवं ते नरकान् भुक्त्वा तत्र क्षपितकल्मषाः । नरकेभ्यो विमुक्ताश्च जायन्ते कृमिजातियु । इस प्रकार नरकोंका कष्ट भोग लेनेके बाद पाप कट जानेपर मनुष्य उन… 1301–1310
- बाह्यशौचं भवेदेतत् तथैवाचमनादिना । सदा ही विशुद्ध आहार ग्रहण करना, शरीरको धो - पोंछकर साफ रखना तथा आचमन आदिके द्वारा भी शरीरको शुद्ध बनाये रखना, यह बाह्य… 1311–1320
- दान देनेवाला, उसे ग्रहण करनेवाला, देय वस्तु, उपक्रम ( उसे देनेका प्रयत्न ), देश और काल — इन छः वस्तुओंके गुणोंसे युक्त दान उत्तम बताया जाता है… 1321–1330
- इसीलिये गौओंका दान सबसे उत्कृष्ट बताया जाता है । गौओंकी पूजा तथा उनके प्रति की हुई भक्ति मनुष्यकी आयु बढ़ानेवाली होती है… 1331–1340
- श्राद्ध - कर्ममें माघ और भाद्रपदमास प्रशंसित हैं । दोनों पक्षोंमें पूर्वपक्ष ( शुक्ल) की अपेक्षा कृष्णपक्ष उत्तम बताया जाता है… 1341–1350
- श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इस विषयका वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो… 1351–1360
- विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च । जो मरे हुए पुरुष या खोयी हुई वस्तुके लिये शोक करता है, वह केवल संतापका भागी होता है । उसका वह दुःख मिटता नहीं है… 1361–1370
- विस्तरेणैव वक्ष्यामि तस्य व्याख्यामहं शृणु । इन सबका लक्षण और आरम्भसे ही पृथक् - पृथक् विकल्प मैं विस्तारपूर्वक बताऊँगा, उसकी व्याख्या सुनो… 1371–1380
- पक्वाशयस्त्वधो नाभेरूर्ध्वमामाशयस्तथा । नाभिर्मध्ये शरीरस्य सर्वप्राणाश्च संश्रिताः । स्थिताः प्राणादयः सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधश्चराः… 1381–1390
- त्वत्प्रभावादियं देव वाक् चैव प्रतिभाति मे । १३ । इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युताः । उपस्पर्शनहेतोस्त्वामुपयान्ति समीपतः । १४… 1391–1400
- भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं सम्पूर्ण देवता उनके श्रीविग्रहमें सुखपूर्वक निवास करते हैं… 1401–1410
- ‘प्रभो! आपका जो यह अवतार अर्थात् मानव - शरीरमें जन्म हुआ है तथा जो इसका गुप्त कारण है, यह सब तथा अन्य बातें आपसे छिपी नहीं हैं… 1411–1420
- सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः । १७ । २५ सर्वः - सर्वरूप, २६ शर्वः- सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार… 1421–1430
- ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः । ५८ । ४१६ ऋतुः -ऋतुस्वरूप, ४१७ सुदर्शनः- भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे… 1431–1440
- नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप चार सींगोंको धारण करनेवाले शब्दब्रह्मस्वरूप, ७६४ गदाग्रजः - गदसे पहले जन्म लेनेवाले श्रीकृष्ण । ९ ४… 1441–1450
- हुआ । १४ ९ । (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं ) Pata पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे - शाम कीर्तन करनेयोग्य… 1451–1460
- उस घरके निवासी, जो परब्रह्मस्वरूप गायत्री - मन्त्रके गुणोंका कीर्तन सुनते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता है तथा वे परमगतिको प्राप्त होते हैं । ७२… 1461–1470
- क्षत्रियेष्वाश्रितो धर्मः प्रजानां परिपालनम् । क्षत्राद् वृत्तिर्ब्राह्मणानां तैः कथं ब्राह्मणो वरः । १८ । प्रजापालनरूपी धर्म क्षत्रियोंपर ही अवलम्बित है… 1471–1480
- पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन भीष्म उवाच इत्युक्तः स नृपस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत्… 1481–1490
- सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका… 1491–1500
- ये यज्ञकर्ता श्रीकृष्ण प्रत्येक मासमें यज्ञ करते हैं । प्रत्येक यज्ञमें वेदज्ञ ब्राह्मण इन्हींके गुण गाते हैं… 1501–1510
- वे बुद्धिमान् ब्राह्मण दुर्वासा अपने तेजसे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे । उन्होंने मेरे देखते - देखते जैसे रथके घोड़ोंपर कोड़े चलाये जाते हैं, उसी… 1511–1520
- एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन वासुदेव उवाच युधिष्ठिर महाबाहो महाभाग्यं महात्मनः । रुद्राय बहुरूपाय बहुनाम्ने निबोध मे । १… 1521–1530
- नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासविधिर्हि सः । ४० । सत्पुरुषको चाहिये कि वह सम्पूर्ण अतिथियों, सेवकों, स्वजनों तथा शरणार्थियोंका रक्षक एवं स्वागत करनेवाला बने… 1531–1540
- पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम - कीर्तनका माहात्म्य वैशम्पायन उवाच शरतल्पगतं भीष्मं पाण्डवोऽथ कुरूद्वहः… 1541–1550
- शर- शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिष्ठिरसे बातचीत ( भीष्मस्वर्गारोहणपर्व) सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्मके अन्त्येष्टि - संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका… 1551–1560
- जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात ह । भीष्मजीने अपने देहके सभी द्वारोंको बंद करके प्राणोंको सब ओरसे रोक लिया था; इसलिये वह उनका मस्तक ( ब्रह्मरन्ध्र )… 1561–1570
- द्वितीयोऽध्यायः श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता । तूष्णीं बभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः । १… 1571–1580
- यदा तु परमामार्तिं गतोऽसौ सपुरो नृपः । ततः प्रदध्मौ स करं प्रादुरासीत् ततो बलम् । १५ । जब वे नरेश नगरवासियोंसहित भारी विपत्तिमें पड़ गये, तब उन्होंने अपने… 1581–1590
- महाराज मरुत्तकी देवर्षिसे भेंट महाराज मरुत्तका संवर्तमुनिसे संवाद तं पृष्ठतोऽनुगच्छेथा यत्र गच्छेत् स वीर्यवान्… 1591–1600
- श्रिया ज्वलन् दृश्यते वै बालादित्यसमद्युतिः । न रूपं शक्यते तस्य संस्थानं वा कदाचन । ८ । निर्देष्टुं प्राणिभिः कैश्चित् प्राकृतैर्मांसलोचनैः… 1601–1610
- शक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र प्रीतिं चेच्छत्यजरां वै त्वया सः । देवाश्च सर्वे वशगास्तस्य राजन् संदेशं त्वं शृणु मे देवराज्ञः । १४… 1611–1620
- नरेश्वर! मैं अभी उन्हें स्तम्भित करता हूँ; अतः तुम इन्द्रसे न डरो । मैंने सम्पूर्ण देवताओंके अस्त्र- शस्त्र भी क्षीण कर दिये हैं… 1621–1630
- द्वादशोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश वासुदेव उवाच द्विविधो जायते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा… 1631–1640
- मंगलयुक्त थे । धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था । धर्मासनस्थः सद्भिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान्… 1641–1650
- (अनुगीतापर्व) षोडशोऽध्यायः अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना जनमेजय उवाच सभायां… 1651–1660
- शैत्यात् प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः । २१ । यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः । स गच्छत्यूर्ध्वगो वायुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणः । २२… 1661–1670
- जाता है । ६ । नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायकः । धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्वः स विमुच्यते । ७… 1671–1680
- एवमुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव । सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे । ५ । पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए -से बोले… 1681–1690
- जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि –ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है । ६ । घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च… 1691–1700
- नारदजीने कहा – मुने! संकल्पसे हर्ष उत्पन्न होता है, मनोनुकूल शब्दसे, रससे और रूपसे भी हर्षकी उत्पत्ति होती है । ५… 1701–1710
- तस्मिन् वने सप्त महाद्रुमाश्च फलानि सप्तातिथयश्च सप्त । सप्ताश्रमाः सप्त समाधयश्च दीक्षाश्च सप्तैतदरण्यरूपम् । ७… 1711–1720
- ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम् । ११ । (ब्राह्मणने कहा— ) कमलके समान नेत्रोंवाली देवि! तदनन्तर राजा कार्तवीर्य बड़े… 1721–1730
- ‘ मैंने बहुत - से दोषोंपर विजय पायी और समस्त शत्रुओंका नाश कर डाला; किंतु एक सबसे बड़ा दोष रह गया है… 1731–1740
- चतुस्त्रिंशोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मणगीताका उपसंहार ब्राह्मण्युवाच नेदमल्पात्मना… 1741–1750
- श्रद्धालक्षणमित्येवं धर्मं धीराः प्रचक्षते । इत्येवं देवयाना वः पन्थानः परिकीर्तिताः । सद्भिरध्यासिता धीरैः कर्मभिर्धर्मसेतवः । ४४… 1751–1760
- प्रेत्य भाविकमीहन्ते ऐहलौकिकमेव च । ददति प्रतिगृह्णन्ति तर्पयन्त्यथ जुह्वति । १७ । ऐसे लोग इस लोकमें बार- बार जन्म लेकर विषयजनित आनन्दमें मग्न रहते हैं और… 1761–1770
- एकचत्वारिंशोऽध्यायः अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन ब्रह्मोवाच य उत्पन्नो महान् पूर्वमहंकारः स उच्यते । अहमित्येव सम्भूतो द्वितीयः सर्ग उच्यते… 1771–1780
- ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद् दीपशतं यथा । जैसे एक दीपसे सैकड़ों दीप जला लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा यत्र - तत्र अनेक रूपोंमें उपलब्ध होता है… 1781–1790
- इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः । ४४ । इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत… 1791–1800
- असंवृतानि गृह्णीयात् प्रवृत्तानि च कार्यवान् । ३६ । मिट्टी, जल, अन्न, पत्र, पुष्प और फल - ये वस्तुएँ यदि किसीके अधिकारमें न हों तो आवश्यकता पड़नेपर… 1801–1810
- एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ऋषय ऊचुः को वा स्विदिह धर्माणामनुष्ठेयतमो मतः… 1811–1820
- शुक्रल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल -इस प्रकार तैजस् रूपका बारह प्रकारसे विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध… 1821–1830
- द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना वैशम्पायन… 1831–1840
- ददर्शाथ मुनिश्रेष्ठमुत्तङ्कममितौजसम् । ७ । इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तंकका दर्शन किया । ७… 1841–1850
- आकाश और पृथ्वीके बीचका जो भाग है, वह आपके उदरसे व्याप्त हो रहा है । आपकी भुजाओंने सम्पूर्ण दिशाओंको घेर लिया है । अच्युत! यह सारा दृश्य -प्रपंच आप ही हैं… 1851–1860
- अहल्या बोली — भगवन्! मैं इस बातको नहीं जानती थी, इसीलिये उस ब्राह्मणको ऐसा काम सौंप दिया । मुझे विश्वास है कि आपकी कृपासे उसे वहाँ कोई भय नहीं प्राप्त… 1861–1870
- सर्पके द्वारा कुण्डलोंका अपहरण होता देख उत्तंक मुनि उद्विग्न हो उठे और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वृक्षसे कूद पड़े… 1871–1880
- दीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः । गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो बभूव ह । ७ । वृक्षके आकारमें सजाये हुए सोनेके दीप उस स्थानकी शोभाको और भी उद्दीप्त कर… 1881–1890
- एकषष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना वैशम्पायन उवाच कथयन्नेव तु तदा वासुदेवः प्रतापवान्… 1891–1900
- त्रिषष्टितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद् वचनं ब्रह्मन्… 1901–1910
- उपलब्ध हुए । १४-१५ । उद्धारयामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिरः । तेषां रक्षणमप्यासीन्महान् करपुटस्तथा । १६… 1911–1920
- अष्टषष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका प्रसूतिकागृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राजेन्द्र… 1921–1930
- तब वे वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंने जब सुना कि पाण्डव लोग नगरके समीप आ गये हैं, उनकी अगवानीके लिये बाहर निकले । १४… 1931–1940
- इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसामग्र् सम्पादनविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ । ७२… 1941–1950
- धनुषः पततस्तस्य सव्यसाचिकराद् विभो । बभूव सदृशं रूपं शक्रचापस्य भारत । २३ । प्रभो! भरतनन्दन! अर्जुनके हाथसे गिरते हुए उस धनुषका रूप इन्द्रधनुषके समान… 1951–1960
- वे अर्जुनसे अपने नाम, गोत्र और नाना प्रकारके कर्म बताते हुए उनपर बाणोंकी बौछार करने लगे । ६ । ते किरन्तः शरव्रातान् वारणप्रतिवारणान्… 1961–1970
- एष प्रसाद्य शिरसा प्रशमार्थमरिंदम । ३८ । याचते त्वां महाबाहो शमं गच्छ धनंजय । ‘ शत्रुदमन महाबाहु धनंजय! यह तुम्हारे चरणोंमें सिर रखकर तुम्हें प्रसन्न करके… 1971–1980
- अयमश्वोऽनुसर्तव्यः स शेषे किं महीतले । १० । ‘ प्रभो! तुम्हें तो महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ- सम्बन्धी अश्वके पीछे - पीछे जाना है; फिर यहाँ पृथ्वीपर कैसे सो… 1981–1990
- amper अर्जुन अपने पुत्र बभ्रुवाहनको छातीसे लगा रहे हैं । ‘ उनकी बातें सुनकर मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं और पातालमें प्रवेश करके मैंने अपने पितासे… 1991–2000
- पुरुषप्रवर किरीटधारी अर्जुन दशार्णराज चित्रांगदको भी वशमें करके निषादराज एकलव्यके राज्यमें गये । ७ । एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा… 2001–2010
- बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें बहुत से वेदवेत्ता मुनिगण भी पधारे थे । २२ । ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन् पृथिवीपते… 2011–2020
- नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपाः । २१ । यत् त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि । ‘ कुरुकुलश्रेष्ठ! आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे… 2021–2030
- ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् साधु साध्विति भारत । १५ । तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वनः । भारत! उस समय आकाशवाणी हुई- ' पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया… 2031–2040
- बभूव शुक्लवृत्तः स धर्मात्मा नियतेन्द्रियः । २५ । वे अपनी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधूके साथ रहकर तपस्यामें संलग्न थे… 2041–2050
- ' जब मनुष्यमें दानविषयक रुचि जाग्रत् होती है, तब उसके धर्मका ह्रास नहीं होता । तुमने पत्नीके प्रेम और पुत्रके स्नेहपर भी दृष्टिपात न करके धर्मको ही… 2051–2060
- द्विनवतितमोऽध्यायः महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा जनमेजय उवाच धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् । १… 2061–2070
- [ युधिष्ठिरका वैष्णव - धर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन ] जनमेजय उवाच अश्वमेधे पुरा वृत्ते केशवं केशिसूदनम्… 2071–2080
- करनेके बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं, शूद्रका अन्न नहीं खाते हैं, दम्भ और मिथ्याभाषणसे दूर रहते हैं, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखते हैं तथा पञ्चयज्ञ और… 2081–2090
- सम्बन्धिने च यद् दत्तं प्रमत्ताय च पाण्डव फलार्थिभिरपात्राय तद् दानं राजसं स्मृतम् । पाण्डव! अपने सम्बन्धी और प्रमादीको दिया हुआ, फलकी इच्छा रखनेवाले… 2091–2100
- प्रजापति मनुका कहना है कि-' शील, स्वाध्याय, दान, शौच, कोमलता और सरलता —ये सद्गुण ब्राह्मणके लिये वेदसे भी बढ़कर हैं… 2101–2110
- जो लोग ब्राह्मणोंको, उनमें भी विशेषतः श्रोत्रियोंको अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अच्छी प्रकारसे बनाये हुए उत्तम अन्नका भोजन कराते हैं, वे महात्मा पुरुष विचित्र… 2111–2120
- क्षुत्पिपासाश्रमश्रान्त आर्तः खिन्नगतिर्द्विजः । पृच्छन् वै ह्यन्नदातारं गृहमभ्येत्य याचयेत् । तं पूजयेत् तु यत्नेन सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः… 2121–2130
- समूढो याति दुष्टात्मा नरकानेकविंशतिम् । नरकेभ्यो विनिर्मुक्तः शुनां योनिं स गच्छति । जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भूमिका दान करके उसीसे अपनी जीविका चलाता है,… 2131–2140
- गन्धर्वैर्भूतसङ्घैश्च गीयमानो महातपाः । प्रविशेत् स महातेजा मां वा शङ्करमेव वा । न स्यात् पुनर्भवो राजन् नात्र कार्या विचारणा… 2141–2150
- युधिष्ठिरने कहा— अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले माधव! जो पुष्प आपको अत्यन्त प्रिय हों तथा जिनमें आपका निवास हो, उन सबका मुझ अपने भक्तसे वर्णन कीजिये… 2151–2160
- ‘ दिनके मध्य भागमें — दुपहरीके समय उन्हें विश्राम देना चाहिये; किंतु दिनके अन्तिम भागमें अपनी रुचिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये अर्थात् आवश्यकता हो तो उनसे… 2161–2170
- सब नरकगामी होते हैं । क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः… 2171–2180
- श्रीभगवानुवाच अन्नेन धार्यते सर्वं जगदेतच्चराचरम् । अन्नात् प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नास्ति संशयः… 2181–2190
- अहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप । शूद्रान्नरसपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यशः । जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्वं न विद्यते… 2191–2200
- नरेश्वर! आत्मवेत्ता विद्वानोंने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक — ये तीन प्रकारके दुःख बतलाये हैं । यस्माद् वै त्रायते दुःखाद् यजमानं हुतोऽनलः… 2201–2210
- मदिरा, आसव, विष, घी, लाख, नमक और तेलकी बिक्री करनेवाले ब्राह्मणको भी चान्द्रायण- व्रत करना आवश्यक है । एकोद्दिष्टं तु यो भुङ्क्ते जनमध्यगतोऽपि यः… 2211–2220
- [ विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त ] युधिष्ठिर उवाच देव किं फलमाख्यातं… 2221–2230
- सर्वं च शूद्रसंस्पृष्टमपवित्रं न संशयः । भरतनन्दन! मैंने जो विद्याके चौदह पवित्र स्थान पूर्णतया बताये हैं, वे तीनों लोकोंके कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं… 2231–2240
- वैदूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् । दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छार्ङ्गधन्वनः । उसका डंडा वैदूर्यमणिका बना हुआ था तथा सोनेकी झालरें उसकी शोभा बढ़ा रही थीं… 2241–2250
- राजा धृतराष्ट्रको सदा पाण्डवोंके बर्तावसे जितनी प्रसन्नता होती थी, उतनी उत्कृष्ट प्रीति उन्हें अपने पुत्रोंसे भी कभी प्राप्त नहीं हुई थी । २३३… 2251–2260
- पुत्र! नरेश्वर! मैं दीर्घकालतक तुम्हारे पास रह चुका और तुमने भी बहुत दिनोंतक मेरी सेवा- शुश्रूषा की । अब मेरी वृद्धावस्था आ गयी… 2261–2270
- ' किंतु नरेश्वर! इस समय आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि पहले भोजन कर लीजिये, फिर आश्रमको जाइयेगा ' । २२… 2271–2280
- राजेन्द्र! प्रजाजनोंके भीतर जो दीन -दरिद्र ( अन्ध - बधिर आदि ) मनुष्य हों, उनका भी राजा आदर करे… 2281–2290
- नवमोऽध्यायः प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा -प्रार्थना धृतराष्ट्रउवाच शान्तनुः पालयामास यथावद् वसुधामिमाम् । तथा विचित्रवीर्यश्च भीष्मेण परिपालितः । १… 2291–2300
- ततो विवेश भवनं गान्धार्या सहितो निजम् । व्युष्टायां चैव शर्वर्यां यच्चकार निबोध तत् । ५३ । भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् धृतराष्ट्रने हाथ जोड़कर उन ब्राह्मण… 2301–2310
- ‘ धर्मराजने आपसे कहलाया है कि भीमसेन पूर्व वैरका स्मरण करके जो कभी- कभी आपके साथ अन्याय - सा कर बैठते हैं, उसके लिये आप इनपर क्रोध न कीजियेगा । ७… 2311–2320
- सोऽब्रवीन्मातरं कुन्तीं वनं तमनुजग्मुषीम् । अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् । ७ । वधूरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि… 2321–2330
- उस रातमें मुख्य- मुख्य ब्राह्मण स्वाध्याय करते थे और जहाँ- तहाँ अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो रही थी… 2331–2340
- एकविंशोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता वैशम्पायन उवाच वनं गते कौरवेन्द्रे दुःखशोकसमन्विताः… 2341–2350
- चतुर्विंशोऽध्यायः पाण्डवों तथा पुरवासियोंका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दर्शन करना वैशम्पायन उवाच ततस्ते पाण्डवा दूरादवतीर्य पदातयः… 2351–2360
- विदुरका सूक्ष्मशरीरसे युधिष्ठिरमें प्रवेश युधिष्ठिर उवाच कच्चित् ते वर्धते राजंस्तपो दमशमौ च ते । ११ । अपि मे जननी चेयं शुश्रूषुर्विगतक्लमा… 2361–2370
- अष्टाविंशोऽध्यायः महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना… 2371–2380
- भूरिश्रवाके पिता सोमदत्त भी अपने पिताके साथ ही उस महासमरमें वीरगतिको प्राप्त हुए थे । ४३-४४ । श्रीमतोऽस्य महाबुद्धेः संग्रामेष्वपलायिनः… 2381–2390
- द्वात्रिंशोऽध्यायः व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव- पाण्डववीरोंका गङ्गाजीके जलसे प्रकट होना वैशम्पायन उवाच ततो निशायां प्राप्तायां… 2391–2400
- चतुस्त्रिंशोऽध्यायः मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुनः दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान सौतिरुवाच… 2401–2410
- न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् । २३ । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्रने वैसी बात कही, तब युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा -' धर्मके… 2411–2420
- Mira गान्धारी च महाभागा जननी च पृथा तव । ३१ । दावाग्निना समायुक्ते स च राजा पिता तव । संजयस्तु महामात्रस्तस्माद् दावादमुच्यत । ३२… 2421–2430
- माल्यैर्गन्धैश्च विविधैरर्चयित्वा यथाविधि । कुल्यानि तेषां संयोज्य तदाचख्युर्महीपतेः । २३ । जो लोग राजाकी आज्ञासे हरद्वारमें भेजे गये थे, वे उन तीनोंकी… 2431–2440
- अन्वकुर्वन्नुलूकानां सारसा विरुतं तथा । अजाः शिवानां विरुतमन्वकुर्वत भारत । ७ । भारत! सारस उल्लुओंकी और बकरे गीदड़ोंकी बोलीकी नकल करने लगे । ७… 2441–2450
- ‘ भगवन्! अब सबका विनाश हो गया । इनमेंसे अधिकांश तो आपके हाथों मारे गये हैं । अब बलरामजीका पता लगाइये । अब हम तीनों उधर ही चलें, जिधर बलरामजी गये हैं '… 2451–2460
- हीनाः कृष्णेन पुत्रैश्च नाशकत् सोऽभिवीक्षितुम् । ७ । वहाँ पधारे हुए अर्जुनको देखते ही उन स्त्रियोंका आर्तनाद बहुत बढ़ गया… 2461–2470
- मामासे यों कहकर अर्जुनने दारुकसे कहा- ' अब मैं वृष्णिवंशी वीरोंके मन्त्रियोंसे शीघ्र मिलना चाहता हूँ ' । ६ । इत्येवमुक्त्वा वचनं सुधर्मां यादवीं सभाम्… 2471–2480
- अर्जुनउवाच यः स मेघवपुः श्रीमान् बृहत्पङ्कजलोचनः । ७ । स कृष्णः सह रामेण त्यक्त्वा देहं दिवं गतः… 2481–2490
- उत्सृज्याभरणान्यङ्गाज्जगृहे वल्कलान्युत । भीमार्जुनयमाश्चैव द्रौपदी च यशस्विनी । २० । तथैव जगृहुः सर्वे वल्कलानि नराधिप… 2491–2500
- युधिष्ठिरउवाच अयं श्वा भूतभव्येश भक्तो मां नित्यमेव ह । स गच्छेत मया सार्धमानृशंस्या हि मे मतिः । ७… 2501–2510
- द्वितीयोऽध्यायः देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुण - क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना युधिष्ठिर उवाच पश्यामि विबुधा… 2511–2520
- तृतीयोऽध्यायः इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना वैशम्पायन उवाच स्थिते मुहूर्तं पार्थे तु धर्मराजे… 2521–2530
- पञ्चमोऽध्यायः भीष्म आदि वीरोंका अपने - अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य जनमेजय उवाच भीष्मद्रोणौ महात्मानौ धृतराष्ट्रश्च पार्थिवः… 2531–2540
- |महाभारतश्रवणविधिः माहात्म्य, कथा सुननेकी विधि और उसका फल जनमेजय उवाच भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः । फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्विह… 2541–2550
- कथावाचक अपना गुरु होता है, अतः उसके प्रति भक्तिभाव रखते हुए उसे सर्वथा संतुष्ट करना चाहिये । उस समय सम्पूर्ण देवताओं तथा भगवान् नर- नारायणका कीर्तन करना… 2551–2560
- एक पाद भी श्रवण कराता है, उसके पितृगण अक्षय अन्नपानको प्राप्त करते हैं । इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम्… 2561–2566