06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2161–2170
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2161–2170
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‘ दिनके मध्य भागमें — दुपहरीके समय उन्हें विश्राम देना चाहिये; किंतु दिनके अन्तिम भागमें अपनी रुचिके अनुसार बर्ताव करना चाहिये अर्थात् आवश्यकता हो तो उनसे काम ले और न हो तो न ले । जहाँ जल्दीका काम हो अथवा जहाँ मार्गमें किसी प्रकारका भय आनेवाला हो, वहाँ विश्रामके समय भी यदि बैलोंको सवारीमें जोते तो पाप नहीं लगता ॥
भ्रूणहत्यासमं पापं तस्य स्यात् पाण्डुनन्दन ।
अन्यथा वाहयन् राजन् निरयं याति रौरवम् ॥
‘ पाण्डुनन्दन! परंतु जो विशेष आवश्यकता न होनेपर भी ऐसे समयमें बैलोंको गाड़ीमें जोतता है, उसे भ्रूण - हत्याके समान पाप लगता है और वह रौरव नरकमें पड़ता है ॥
रुधिरं पातयेत् तेषां यस्तु मोहान्नराधिप ।
तेन पापेन पापात्मा नरकं यात्यसंशयम् ॥
‘ नराधिप! जो मोहवश बैलोंके शरीरसे रक्त निकाल देता है, वह पापात्मा उस पापके प्रभावसे निःसंदेह नरकमें गिरता है ॥
नरकेषु च सर्वेषु समाः स्थित्वा शतं शतम् ।
इह मानुष्यके लोके बलीवर्दो भविष्यति ॥
‘ वह सभी नरकोंमें सौ - सौ वर्ष रहकर इस मनुष्यलोकमें बैलका जन्म पाता है ॥
तस्मात् तु मुक्तिमन्विच्छन् दद्यात् तु कपिलां नरः ॥
‘ अतः जो मनुष्य संसारसे मुक्त होना चाहता हो, उसे कपिला गौका दान करना चाहिये ॥
कपिला सर्वयज्ञेषु दक्षिणार्थं विधीयते ।
तस्मात् तद्दक्षिणा देया यज्ञेष्वेव द्विजातिभिः ॥
' सब प्रकारके यज्ञोंमें दक्षिणा देनेके लिये कपिला गौकी सृष्टि हुई है, इसलिये द्विजातियोंको यज्ञमें उनकी दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये ॥ होमार्थं चाग्निहोत्रस्य यां प्रयच्छेत् प्रयत्नतः ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय श्रान्तायामिततेजसे ।
तेन दानेन पूतात्मा मम लोके महीयते ॥
'जो मनुष्य अग्निहोत्रके होमके लिये अमिततेजस्वी एवं धनहीन श्रोत्रिय ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक कपिला गौ दानमें देता है, वह उस दानसे शुद्धचित्त होकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है ॥ सुवर्णखुरशृङ्गीं च कपिलां यः प्रयच्छति ।
विषुवे चायने चापि सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।
तेनाश्वमेधतुल्येन मम लोकं स गच्छति ॥
'जो मनुष्य कपिलाके सींग और खुरोंमें सोना मढ़ाकर उसे विषुवयोगमें अथवा उत्तरायण -दक्षिणायनके आरम्भमें दान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है तथा
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उस पुण्यके प्रभावसे वह मेरे लोकमें जाता है ॥ अग्निष्टोमसहस्रस्य वाजपेयं च तत्समम् ।
वाजपेयसहस्रस्य अश्वमेधं च तत्समम् ।
अश्वमेधसहस्रस्य राजसूयं च तत्समम् ॥
‘ एक हजार अग्निष्टोमके समान एक वाजपेय यज्ञ होता है । एक हजार वाजपेयके समान एक अश्वमेध होता है और एक हजार अश्वमेधके समान एक राजसूय- यज्ञ होता है ॥ कपिलानां सहस्रेण विधिदत्तेन पाण्डव ।
राजसूयफलं प्राप्य मम लोके महीयते ।
न तस्य पुनरावृत्तिर्विद्यते कुरुपुङ्गव ॥
'कुरुश्रेष्ठ पाण्डव! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे एक हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह राजसूय यज्ञका फल पाकर मेरे परमधाममें प्रतिष्ठित होता है; उसे पुनः इस लोकमें नहीं लौटना पड़ता ॥ तैस्तैर्गुणैः कामदुधा च भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः । स्वकर्मभिश्चाप्यनुबध्यमानं तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् । महार्णवे नौरिव वायुनीता दत्ता हि गौस्तारयते मनुष्यम् ॥ 'दानमें दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणोंद्वारा कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँचती है । वह अपने कर्मोंसे बँधकर घोर अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हुए मनुष्यका उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायुके सहारेसे चलती हुई नाव मनुष्यको महासागरमें डूबनेसे बचाती है ॥ यथौषधं मन्त्रकृतं नरस्य प्रयुक्तमात्रं विनिहन्ति रोगान् । तथैव दत्ता कपिला सुपात्रे पापं नरस्याशु निहन्ति सर्वम् ॥ ‘ जैसे मन्त्रके साथ दी हुई ओषधि प्रयोग करते ही मनुष्यके रोगोंका नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्रको दी हुई कपिला गौ मनुष्यके सब पापोंको तत्काल नष्ट कर डालती है ॥ यथा त्वचं वै भुजगो विहाय
पुनर्नवं रूपमुपैति पुण्यम् ।
तथैव मुक्तः पुरुषः स्वपापै- र्विरज्यते वै कपिलाप्रदानात् ॥
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‘ जैसे साँप केंचुल छोड़कर नये स्वरूपको धारण करता है, वैसे ही पुरुष कपिला गौके दानसे पाप- मुक्त होकर अत्यन्त शोभाको प्राप्त होता है ॥ यथान्धकारं भवने विलग्नं दीप्तो हि निर्यातयति प्रदीपः । तथा नरः पापमपि प्रलीनं निष्क्रामयेद् वै कपिलाप्रदानात् ॥ ‘ जैसे प्रज्वलित दीपक घरमें फैले हुए अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार मनुष्य कपिला गौका दान करके अपने भीतर छिपे हुए पापको भी निकाल देता है ॥ यस्याहिताग्नेरतिथिप्रियस्य शूद्रान्नदूरस्य जितेन्द्रियस्य । सत्यव्रतस्याध्ययनान्वितस्य दत्ता हि गौस्तारयते परत्र ॥ ‘ जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाला, अतिथिका प्रेमी, शूद्रके अन्नसे दूर रहनेवाला, जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा स्वाध्यायपरायण हो, उसे दी हुई गौ परलोकमें दाताका अवश्य उद्धार करती है ' ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त ) १. सुवर्णके समान पीले रंगवाली । २. गौर तथा पीले रंगवाली । ३. कुछ लालिमा लिये हुए पीले नेत्रोंवाली । ४. जिसके गरदनके बाल कुछ पीले हों । ५. जिसका सारा शरीर पीले रंगका हो। ६. कुछ सफेदी लिये हुए पीले रोमवाली । ७. सुर्ख और पीली आँखोंवाली । ८. जिसके खुर पीले रंगके हों । ९. जिसका हलका लाल रंग हो । १०. जिसकी पूँछके बाल पीले रंगके हों ।
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[कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन] वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार परम पुण्यमय कपिला गौके उत्तम दानका वर्णन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका मन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया— ॥
देवदेवेश कपिला यदा विप्राय दीयते ।
कथं सर्वेषु चाङ्गेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवताः ॥
‘ देवदेवेश्वर! जो कपिला गौ ब्राह्मणको दानमें दी जाती है, उसके सम्पूर्ण अंगोंमें देवता किस प्रकार रहते हैं? ॥
याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश चैव त्वया मम ।
तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिलाः पुण्यलक्षणाः ॥
' सुरश्रेष्ठ! आपने जो दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमेंसे कितनी कपिलाएँ पुण्यमयी मानी जाती हैं'? ॥
युधिष्ठिरेणैवमुक्तः केशवः सत्यवाक् तदा ।
गुह्यानां परमं गुह्यं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥
शृणु राजन् पवित्रं वै रहस्यं धर्ममुत्तमम् ॥
युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय सत्यवादी भगवान् श्रीकृष्ण गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय कथा कहने लगे – ' राजन्! मैं परम पवित्र, गोपनीय एवं उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
इदं पठति यः पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
'जो मनुष्य सबेरे उठकर मुझमें भक्ति रखते हुए इस परम पुण्यमय उत्तम कपिला-दानके माहात्म्यका पाठ करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ॥
मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर ।
पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठकः ॥
‘ युधिष्ठिर! इस अध्यायका पाठ करनेवाला मनुष्य रात्रिमें मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा जान- बूझकर: किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥
इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद् द्विजान् ।
तस्याप्यमृतमश्नन्ति पितरोऽत्यन्तहर्षिताः ॥
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' जो श्राद्धकालमें इस अध्यायका पाठ करते हुए ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करता है, उसके पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अमृत भोजन करते हैं ॥
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना ।
तस्य रात्रिकृतं सर्वं पापमाशु प्रणश्यति ॥
' जो मुझमें चित्त लगाकर इस प्रसंगको भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके एक रातके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ॥ अतः परं विशेषं तुतु कपिलानां ब्रवीमि ते ।
यश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश राजन् मया तव ।
तासां चतस्रः प्रवराः पुण्याः पापविनाशनाः ॥
‘ अब मैं कपिला गौके सम्बन्धमें विशेष बातें बतला रहा हूँ । राजन्! पहले जो मैंने तुम्हें दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमें चार कपिलाएँ अत्यन्त श्रेष्ठ, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा पाप नष्ट करनेवाली हैं ॥
सुवर्णकपिला पुण्यास्तथा रक्ताक्षपिङ्गला ।
पिङ्गलाक्षी च या गौश्च स्यात् पिङ्गलपिङ्गला ॥
एताश्चतस्रः प्रवराः पवित्राः पापनाशनाः ।
नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु ॥
'सुवर्णकपिला, रक्ताक्षपिंगला, पिंगलाक्षी और पिंगलपिंगला - ये चार प्रकारकी कपिलाएँ श्रेष्ठ, पवित्र और पाप दूर करनेवाली हैं । इनके दर्शन और नमस्कारसे भी मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥
यस्यैताः कपिलाः सन्ति गृहे पापप्रणाशनाः ।
तत्र श्रीर्विजयः कीर्तिः स्फीता नित्यं युधिष्ठिर ॥
' युधिष्ठिर! ये पापनाशिनी कपिला गौएँ जिसके घरमें मौजूद रहती हैं वहाँ श्री, विजय और विशाल कीर्तिका नित्य निवास होता है ॥
एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वजः ।
दध्ना च त्रिदशाः सर्वे घृतेन तु हुताशनः ॥
‘ इनके दूधसे भगवान् शंकर, दहीसे सम्पूर्ण देवता और घीसे अग्निदेव तृप्त होते हैं ॥
कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा ।
श्रोत्रियेभ्यः सकृद् दत्त्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ॥
‘ कपिला गौके घी, दूध, दही अथवा खीरका एक बार भी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
उपवासं तु यः कृत्वाप्यहोरात्रं जितेन्द्रियः ।
कपिलापञ्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात् परम् ॥
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'जो जितेन्द्रिय रहकर एक दिन- रात उपवास करके कपिला गौका पञ्चगव्य पान करता है, उसे चान्द्रायणसे बढ़कर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥
सौम्ये मुहूर्ते तत् प्राश्य शुद्धात्मा शुद्धमानसः ।
क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना ॥
'जो क्रोध और असत्यका त्याग करके मुझमें चित्त लगाकर शुभ मुहूर्तमें कपिला गौके पंचगव्यका आचमन करता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है ॥ कपिलापञ्चगव्येन समन्त्रेण पृथक् पृथक् ।
यो मत्प्रतिकृतिं वापि शङ्कराकृतिमेव वा ।
स्नापयेद् विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
‘जो विषुवयोगमें पृथक् - पृथक् मन्त्र पढ़कर कपिलाके पञ्चगव्यसे मेरी या शंकरकी प्रतिमाको स्नान कराता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥
स मुक्तपापः शुद्धात्मा यानेनाम्बरशोभिना ।
मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा ॥
‘ वह मुक्त, निष्पाप एवं शुद्धचित्त होकर आकाशकी शोभा बढ़ानेवाले विमानके द्वारा मेरे अथवा रुद्रके लोकमें गमन करता है ॥ तस्मात् तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता ॥ यदा च दीयते राजन् कपिला ह्यग्निहोत्रिणे । तदा च शृङ्गयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्च तिष्ठतः । ‘ राजन्! इसलिये परलोकमें हित चाहनेवाले पुरुषको कपिला गौका दान अवश्य करना चाहिये । जिस समय अग्निहोत्री ब्राह्मणको कपिला गौ दानमें दी जाती है, उस समय उसके सींगोंके ऊपरी भागमें विष्णु और इन्द्र निवास करते हैं ॥
चन्द्रवज्रधरी चापि तिष्ठतः शृङ्गमूलयोः ।
शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोर्वृषध्वजः ॥
' सीगोंकी जड़में चन्द्रमा और व्रजधारी इन्द्र रहते हैं । सींगोंके बीचमें ब्रह्मा तथा ललाटमें भगवान् शंकरका निवास होता है ॥
कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ ।
दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक् सरस्वती ॥
रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापतिः ।
निःश्वासेषु स्थिता वेदाः सषडङ्गपदक्रमाः ॥
‘दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्रमा और सूर्य, दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, रोमकूपोंमें मुनि, चमड़ेमें प्रजापति एवं श्वासोंमें षडंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंका निवास है ॥ नासापुटे स्थिता गन्धाः पुष्पाणि सुरभीणि च ।
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अधरे वसवः सर्वे मुखे चाग्निः प्रतिष्ठितः ॥ ‘ नासिका-छिद्रोंमें गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचेके ओठमें सब वसुगण तथा मुखमें अग्नि निवास करते हैं ॥
साध्या देवाः स्थिताः कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता ।
पृष्ठे च नक्षत्रगणाः ककुद्देशे नभःस्थलम् ॥
अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम् ।
अष्टैश्वर्यमयी लक्ष्मीर्गेमये वसते सदा ॥
‘ कक्षमें साध्य - देवता, गरदनमें पार्वती, पीठपर नक्षत्रगण, ककुद् स्थानमें आकाश, अपानमें सारे तीर्थ, मूत्रमें साक्षात् गंगाजी तथा गोबर में आठ ऐश्वर्योंसे सम्पन्न लक्ष्मीजी रहती हैं ॥
नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी ।
श्रोणीतटस्थाः पितरो रमा लाङ्गूलमाश्रिता ॥
'नासिकामें परम सुन्दरी ज्येष्ठादेवी, नितम्बोंमें पितर एवं पूँछमें भगवती रमा रहती हैं ॥
पार्श्वयोरुभयोः सर्वे विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः ।
तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुहः ॥
‘दोनों पसलियोंमें सब विश्वेदेव स्थित हैं और छातीमें प्रसन्नचित्त शक्तिधारी कार्तिकेय रहते हैं ॥
जानुजङ्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायवः ।
खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥
‘घुटनों और ऊरुओंमें पाँच वायु रहते हैं, खुरोंके मध्यमें गन्धर्व और खुरोंके अग्रभागमें सर्प निवास करते हैं ॥ चत्वारः सागराः पूर्णास्तस्या एव पयोधराः । रतिर्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धृतिः स्मृतिः ।
कीर्तिर्दीप्तिः क्रिया कान्तिस्तुष्टिः पुष्टिश्च संततिः ।
दिशश्च प्रदिशश्चैव सेवन्ते कपिलां सदा ॥
'जलसे परिपूर्ण चारों समुद्र उसके चारों स्तन हैं । रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शान्ति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, संतति, दिशा और प्रदिशा आदि देवियाँ सदा कपिला गौका सेवन किया करती हैं ॥
देवाः पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गद्याः सरितस्तथा ॥
देवाः पितृगणाश्चापि वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः ।
वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैः स्तुवन्ति हृषितास्तथा ॥
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विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा ।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः ॥
‘ देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ तथा अंगों और यज्ञोंसहित सम्पूर्ण वेद नाना प्रकारके मन्त्रोंसे कपिला गौकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति किया करते हैं । विद्याधर, सिद्ध, भूतगण और तारागण —ये कपिला गौको देखकर फूलोंकी वर्षा करते और हर्षमें भरकर नाचने लगते हैं ॥
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा ।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ॥
कपिलेऽथ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे । ‘ वे कहते हैं — ‘ सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित पुण्यमयी कपिलादेवी! तुम्हें नमस्कार है । ब्रह्माजीने तुम्हें अग्निकुण्डसे उत्पन्न किया है । तुम्हारी प्रभा विस्तृत और शक्ति महान् है । कपिलादेवी! समस्त तीर्थ तुम्हारे ही स्वरूप हैं और तुम सबका शुभ करनेवाली हो ' ॥
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम् ।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्रयं महाधनम् ॥
इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ॥
‘ समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर कहा करते हैं—' अहो! यह कपिला गौरूपी रत्न कितना पवित्र और कितना उत्तम है! यह सब दुःखोंको दूर करनेवाला है । अहा! यह धर्मसे उपार्जित, शुद्ध, श्रेष्ठ और महान् धन है ' ॥ युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः ।
के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः ॥
युधिष्ठिरने पूछा— दैत्योंके विनाशक देवदेवेश्वर! हव्य ( यज्ञ) और कव्य ( श्राद्ध ) -का उत्तम समय कौन- सा है? उसमें किन ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये और किनका परित्याग? ॥ श्रीभगवानुवाच
दैवं पूर्वाह्निकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्निकम् ।
कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदुः ॥
श्रीभगवान्ने कहा - युधिष्ठिर! देवकर्म ( यज्ञ) पूर्वाह्नकालमें करने योग्य है और पितृकर्म ( श्राद्ध ) अपराह्नकालमें - ऐसा समझना चाहिये । जो दान अयोग्य समयमें किया जाता है, उस दानको राजस माना गया है ॥
अवघुष्टं च यद् भुक्तमनृतेन च भारत ।
परामृष्टं शुना वापि तद् भागं राक्षसं विदुः ॥
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जिसके लिये लोगोंमें ढिंढोरा पीटा गया हो, जिसमेंसे किसी असत्यवादी मनुष्यने भोजन कर लिया हो तथा जो कुत्तेसे छू गया हो, उस अन्नको राक्षसोंका भाग समझना चाहिये ॥
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयोऽपि च ।
दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन् नार्हन्ति सत्क्रियाम् ॥
राजन्! जितने पतित, जड और उन्मत्त ब्राह्मण हों, उनका देव- यज्ञ और पितृ - यज्ञमें सत्कार नहीं करना चाहिये ॥
क्लीबः प्लीही च कुष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्च यः ।
अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नार्हति सत्कृतिम् ॥
नपुंसक, प्लीहा रोगसे ग्रस्त, कोढ़ी और राजयक्ष्मा तथा मृगीका रोगी भी श्राद्धमें आदरके योग्य नहीं माना गया है ॥
चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिणः ।
सोमविक्रयिणश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥
वैद्य, पुजारी, झूठे नियम धारण करनेवाले ( पाखण्डी ) तथा सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें सत्कार पानेके अधिकारी नहीं हैं ॥
गायका नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा ।
कथका यौधिकाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥
गवैये, नाचने - कूदनेवाले, बाजा बजानेवाले, बकवादी और योद्धा श्राद्धमें सत्कारके योग्य नहीं हैं ॥
अनग्नयश्च ये विप्राः शवनिर्यातकाश्च ये ।
स्तेनाश्चापि विकर्मस्था राजन् नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥
राजन्! अग्निहोत्र न करनेवाले, मुर्दा ढोनेवाले, चोरी करनेवाले और शास्त्रविरुद्ध कर्मसे संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेयोग्य नहीं माने जाते ॥
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्च ये द्विजाः ।
पुत्रिकापुत्रका श्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥
जो अपरिचित हों, जो किसी समुदायके पुत्र हों अर्थात् जिनके पिताका निश्चित पता न हो तथा जो पुत्रिका - धर्मके अनुसार नानाके घरमें रहते हों, वे ब्राह्मण भी श्राद्धके अधिकारी नहीं हैं ।
रणकर्ता च यो विप्रो यश्च वाणिज्यको द्विजः ।
प्राणिविक्रयवृत्तिश्च श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम् ॥
युद्धमें लड़नेवाला, रोजगार करनेवाला तथा पशु- पक्षियोंकी विक्रीसे जीविका चलानेवाला ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेका अधिकारी नहीं है ॥ चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्पराः ।
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सवित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमाः ॥ परंतु जो ब्राह्मण व्रतका आचरण करनेवाले, गुणवान्, सदा स्वाध्यायपरायण, गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता और क्रियानिष्ठ हों, वे श्राद्धमें सत्कारके योग्य माने गये हैं ॥
श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा ।
दर्भाः सुमनसः क्षेत्रं तत्काले श्राद्धदो भवेत् ॥
श्राद्धका सबसे उत्तम काल है सुपात्र ब्राह्मणका मिलना । जिस समय भी ब्राह्मण, दही, घी, कुशा, फूल और उत्तम क्षेत्र प्राप्त हो जायँ, उसी समय श्राद्धका दान आस्मभ कर देना चाहिये ॥
चारित्रनिरता राजन् कृशा ये कृशवृत्तयः ।
तपस्विनश्च ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्च ये ॥
अर्थिनः केचिदिच्छन्ति तेषां दत्तं महत् फलम् । राजन्! जो ब्राह्मण सदाचारी, थोड़ी -सी आजीविका - पर गुजारा करनेवाले, दुर्बल, तपस्वी और भिक्षासे निर्वाह करनेवाले हों, वे यदि याचक होकर कुछ माँगने आवें तो उन्हें दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥
एवं धर्मभृतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन सब बातोंको पूर्णरूपसे जानकर धनहीन और अपना उपकार न करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान करो ॥
दानं यत् ते प्रियं किंचिच्छ्रोत्रियाणां च यत् प्रियम् ।
तत् प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदीच्छसि तदक्षयम् ॥
धर्मज्ञ! यदि तुम अपने दानको अक्षय बनाना चाहते हो तो जो दान तुम्हें प्रिय लगता हो तथा जिसे वेदवेत्ता ब्राह्मण पसंद करते हों, वही दान करो ॥ निरयं ये च गच्छन्ति तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥ युधिष्ठिर! अब नरकमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन सुनो ॥
परदारापहर्तारः परदाराभिमर्शकाः ।
परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिनः ॥
जो परायी स्त्रीका अपहरण करते हैं, परस्त्रीके साथ व्यभिचार करते हैं और दूसरोंकी स्त्रियोंको दूसरे पुरुषोंसे मिलाया करते हैं, वे भी नरकमें पड़ते हैं ॥ सूचकाः संधिभेत्तारः परद्रव्योपजीविनः ।
वर्णाश्रमाणां ये बाह्याः पाखण्डाश्चैव पापिनः ।
उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालयाः ॥
चुगलखोर, सुलहकी शर्त तोड़नेवाले, पराये धनसे जीविका चलानेवाले, वर्ण और आश्रमसे विरुद्ध आचरण करनेवाले, पाखण्डी, पापाचारी तथा जो उनकी सेवा करते हैं, वे