06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2521–2530
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2521–2530
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तृतीयोऽध्यायः इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना वैशम्पायन उवाच
स्थिते मुहूर्तं पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
आजग्मुस्तत्र कौरव्य देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको उस स्थानपर खड़े हुए अभी दो ही घड़ी बीतने पायी थी कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
स च विग्रहवान् धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम् ।
तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
साक्षात् धर्म भी शरीर धारण करके राजासे मिलनेके लिये उस स्थानपर आये जहाँ वे कुरुराज युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥ २ ॥
तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु ।
समागतेषु देवेषु व्यगमत् तत् तमो नृप ॥ ३ ॥
राजन्! जिनके कुल और कर्म पवित्र हैं, उन तेजस्वी शरीरवाले देवताओंके आते ही वहाँका सारा अन्धकार दूर हो गया ॥ ३ ॥
नादृश्यन्त च तास्तत्र यातनाः पापकर्मिणाम् ।
नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह ॥ ४ ॥
लोहकुम्भ्यः शिलाश्चैव नादृश्यन्त भयानकाः । वहाँ पापकर्मी पुरुषोंको जो यातनाएँ दी जाती थीं वे सहसा अदृश्य हो गयीं । न वैतरणी नदी रह गयी, न कूटशाल्मलि वृक्ष । लोहेके कुम्भ और लोहमयी भयंकर तप्त शिलाएँ भी नहीं दिखायी देती थीं ॥ ४३ ॥
विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्ततः ॥ ५ ॥
ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन् ।
ततो वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः ॥ ६ ॥
ववौ देवसमीपस्थः शीतलोऽतीव भारत । कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य
हो गये । तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी ।
भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी ॥ ५-६३ ॥
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मरुतः सह शक्रेण वसवश्चाश्विनौ सह ॥ ७ ॥
साध्या रुद्रास्तथाऽऽदित्या ये चान्येऽपि दिवौकसः ।
सर्वे तत्र समाजग्मुः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ ८ ॥
यत्र राजा महातेजा धर्मपुत्रः स्थितोऽभवत् । इन्द्रके साथ मरुद्गण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अन्यान्य देवलोकवासी सिद्ध और महर्षि सभी उस स्थानपर आये जहाँ महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े थे ॥ ततः शक्रः सुरपतिः श्रिया परमया युतः ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वचः । तदनन्तर उत्तम शोभासे सम्पन्न देवराज इन्द्रने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ ९ ३ ॥ युधिष्ठिर महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ॥ १० ॥
एह्येहि पुरुषव्याघ्र कृतमेतावता विभो ।
सिद्धिः प्राप्ता महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ॥ ११ ॥
' महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं । पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है । आओ हमारे साथ चलो । महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है ॥ १०-११ ॥
न च मन्युस्त्वया कार्यः शृणु चेदं वचो मम ।
अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः ॥ १२ ॥
‘ तात! तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है इसके लिये क्रोध न करना । मेरी यह बात सुनो! समस्त राजाओंको निश्चय ही नरक देखना पड़ता है ॥ १२ ॥
शुभानामशुभानां च द्वी राशी पुरुषर्षभ ।
यः पूर्वं सुकृतं भुङ्क्ते पश्चान्निरयमेव सः ॥ १३ ॥
' पुरुषप्रवर! मनुष्यके जीवनमें शुभ और अशुभ कर्मोंकी दो राशियाँ सञ्चित होती हैं ।
जो पहले ही शुभ कर्म भोग लेता है उसे पीछे नरकमें ही जाना पड़ता है ॥ १३ ॥
पूर्वं नरकभाग् यस्तु पश्चात् स्वर्गमुपैति सः ।
भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्वं स्वर्गमनुते ॥ १४ ॥
' परंतु जो पहले नरक भोग लेता है वह पीछे स्वर्गमें जाता है । जिसके पास पापकर्मोंका संग्रह अधिक है वह पहले ही स्वर्ग भोग लेता है ॥ १४ ॥
तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोऽर्थिना नृप ।
व्याजेन हि त्वया द्रोण उपचीर्णः सुतं प्रति ॥ १५ ॥
व्याजेनैव ततो राजन् दर्शितो नरकस्तव ।
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‘ नरेश्वर! मैंने तुम्हारे कल्याणकी इच्छासे तुम्हें पहले ही इस प्रकार नरकका दर्शन करानेके लिये यहाँ भेज दिया है । राजन्! तुमने गुरुपुत्र अश्वत्थामाके विषयमें छलसे काम लेकर द्रोणाचार्यको उनके पुत्रकी मृत्युका विश्वास दिलाया था, इसलिये तुम्हें भी छलसे ही नरक दिखलाया गया है ॥ १५३ ॥
यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा ॥ १६ ॥
द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गताः । ' जैसे तुम यहाँ लाये गये थे उसी प्रकार भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा द्रुपदकुमारी कृष्णा — ये सभी छलसे नरकके निकट लाये गये थे ॥ १६३ ॥
आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात् ॥ १७ ॥
स्वपक्ष्याश्चैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे ।
सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान् पश्य भरतर्षभ ॥ १८ ॥
‘ पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं । भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो- जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं । चलो, उनका दर्शन करो ॥ १७-१८ ॥
कर्णश्चैव महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
स गतः परमां सिद्धिं यदर्थं परितप्यसे ॥ १ ९ ॥
' तुम जिनके लिये सदा संतप्त रहते हो वे सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण भी परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ १ ९ ॥
तं पश्य पुरुषव्याघ्रमादित्यतनयं विभो ।
स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ ॥ २० ॥
' प्रभो! नरश्रेष्ठ! महाबाहो! तुम पुरुषसिंह सूर्यकुमार कर्णका दर्शन करो। वे अपने
स्थानमें स्थित हैं । तुम उनके लिये शोक त्याग दो ॥ २० ॥
भ्रातॄंश्चान्यांस्तथा पश्य स्वपक्ष्याश्चैव पार्थिवान् ।
स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्तान् व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ २१ ॥
‘ अपने दूसरे भाइयोंको तथा पाण्डवपक्षके अन्यान्य राजाओंको भी देखो । वे सब अपने - अपने योग्य स्थानको प्राप्त हुए हैं। उन सबकी सद्गतिके विषयमें अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ २१ ॥
कृच्छ्रं पूर्वं चानुभूय इतःप्रभृति कौरव ।
विहरस्व मया साधे गतशोको निरामयः ॥ २२ ॥
‘कुरुनन्दन! पहले कष्टका अनुभव करके अबसे तुम मेरे साथ रहकर रोग - शोकसे रहित हो स्वच्छन्द विहार करो ॥ २२ ॥
कर्मणां तात पुण्यानां जितानां तपसा स्वयम् ।
दानानां च महाबाहो फलं प्राप्नुहि पार्थिव ॥ २३ ॥
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‘ तात! महाबाहु! पृथ्वीनाथ! अपने किये हुए पुण्यकर्मोंका, तपस्यासे जीते हुए लोकोंका और दानींका फल भोगो ॥ २३ ॥
अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्चाप्सरसो दिवि ।
उपसेवन्तु कल्याण्यो विरजोऽम्बरभूषणाः ॥ २४ ॥
' आजसे देव, गन्धर्व तथा कल्याणस्वरूपा दिव्य अप्सराएँ स्वच्छ वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो स्वर्गलोकमें तुम्हारी सेवा करें ॥ २४ ॥
राजसूयजिताँल्लोकानश्वमेधाभिवर्धितान् ।
प्राप्नुहि त्वं महाबाहो तपसश्च महाफलम् ॥ २५ ॥
‘ महाबाहो! राजसूय यज्ञद्वारा जीते हुए तथा अश्वमेध यज्ञद्वारा वृद्धिको प्राप्त हुए पुण्य लोकोंको प्राप्त करो और अपने तपके महान् फलको भोगो ॥ २५ ॥
उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्ठिर ।
हरिश्चन्द्रसमाः पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि ॥ २६ ॥
' कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें प्राप्त हुए सम्पूर्ण लोक राजा हरिश्चन्द्रके लोकोंकी भाँति सब राजाओंके लोकोंसे ऊपर हैं; जिनमें तुम विचरण करोगे ॥ २६ ॥
मान्धाता यत्र राजर्षिर्यत्र राजा भगीरथः ।
दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि ॥ २७ ॥
‘ जहाँ राजर्षि मान्धाता, राजा भगीरथ और दुष्यन्तकुमार भरत गये हैं, उन्हीं लोकोंमें तुम भी विहार करोगे ॥
एषा देवनदी पुण्या पार्थ त्रैलोक्यपावनी ।
आकाशगङ्गा राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि ॥ २८ ॥
‘ पार्थ! ये तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली पुण्यसलिला देवनदी आकाशगङ्गा हैं ।
राजेन्द्र! इनके जलमें गोता लगाकर तुम दिव्य लोकोंमें जा सकोगे ॥ २८ ॥
अत्र स्नातस्य भावस्ते मानुषो विगमिष्यति ।
गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि ॥ २ ९ ॥
‘ मन्दाकिनीके इस पवित्र जलमें स्नान कर लेनेपर तुम्हारा मानव- स्वभाव दूर हो जायगा । तुम शोक, संताप और वैरभावसे छुटकारा पा जाओगे' ॥ २ ९ ॥
एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम् ।
धर्मो विग्रहवान् साक्षादुवाच सुतमात्मनः ॥ ३० ॥
देवराज इन्द्र जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय शरीर धारण करके आये हुए साक्षात् धर्मने अपने पुत्र कौरवराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ३० ॥
भो भो राजन् महाप्राज्ञ प्रीतोऽस्मि तव पुत्रक ।
मद्भक्त्या सत्यवाक्यैश्च क्षमया च दमेन च ॥ ३१ ॥
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'महाप्राज्ञ नरेश! मेरे पुत्र! तुम्हारे धर्मविषयक अनुराग, सत्यभाषण, क्षमा और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ ॥ ३१ ॥
एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन् कृता मया ।
न शक्यसे चालयितुं स्वभावात् पार्थ हेतुतः ॥ ३२ ॥
‘ राजन्! यह मैंने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी । पार्थ! किसी भी युक्तिसे कोई तुम्हें अपने स्वभावसे विचलित नहीं कर सकता ॥ ३२ ॥
पूर्वं परीक्षितो हि त्वं प्रश्नाद् द्वैतवने मया ।
अरणीसहितस्यार्थे तच्च निस्तीर्णवानसि ॥ ३३ ॥
‘ द्वैतवनमें अरणिकाष्ठका अपहरण करनेके पश्चात् जब यक्षके रूपमें मैंने तुमसे कई प्रश्न किये थे वह मेरे द्वारा तुम्हारी पहली परीक्षा थी । उसमें तुम भलीभाँति उत्तीर्ण हो गये ॥ ३३ ॥
सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत ।
श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्वं मे परीक्षितः ॥ ३४ ॥
‘ भारत! फिर द्रौपदीसहित तुम्हारे सभी भाइयोंकी मृत्यु हो जानेपर कुत्तेका रूप धारण
करके मैंने दूसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी । उसमें भी तुम सफल हुए ॥ ३४ ॥
इदं तृतीयं भ्रातॄणामर्थे यत् स्थातुमिच्छसि ।
विशुद्धोऽसि महाभाग सुखी विगतकल्मषः ॥ ३५ ॥
' अब यह तुम्हारी परीक्षाका तीसरा अवसर था; किंतु इस बार भी तुम अपने सुखकी परवा न करके भाइयोंके हितके लिये नरकमें रहना चाहते थे, अतः महाभाग! तुम इस
तरहसे शुद्ध प्रमाणित हुए । तुममें पापका नाम भी नहीं है; अतः सुखी होओ ॥ ३५ ॥
न च ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते ।
मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता ॥ ३६ ॥
‘ पार्थ! प्रजानाथ! तुम्हारे भाई नरकमें रहनेके योग्य नहीं हैं । तुमने जो उन्हें नरक भोगते देखा है वह देवराज इन्द्रद्वारा प्रकट की हुई माया थी ॥ ३६ ॥
अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्याः सर्वराजभिः ।
ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्तं दुःखमुत्तमम् ॥ ३७ ॥
‘ तात! समस्त राजाओंको नरकका दर्शन अवश्य करना पड़ता है; इसलिये तुमने दो घड़ीतक यह महान् दुःख प्राप्त किया है ॥ ३७ ॥
न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ ।
कर्णो वा सत्यवाक् शूरो नरकार्हाश्चिरं नृप ॥ ३८ ॥
‘ नरेश्वर! सव्यसाची अर्जुन, भीमसेन, पुरुषप्रवर नकुल सहदेव अथवा सत्यवादी शूरवीर कर्ण– इनमेंसे कोई भी चिरकालतक नरकमें रहनेके योग्य नहीं है ॥ न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथंचन ।
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एह्येहि भरतश्रेष्ठ पश्य गङ्गां त्रिलोकगाम् ॥ ३ ९ ॥ ‘ भरतश्रेष्ठ! राजकुमारी कृष्णा भी किसी तरह नरकमें जानेयोग्य नहीं है । आओ, त्रिभुवनगामिनी गंगाजीका दर्शन करो ' ॥ ३ ९ ॥
एवमुक्तः स राजर्षिस्तव पूर्वपितामहः ।
जगाम सह धर्मेण सर्वैश्च त्रिदिवालयैः ॥ ४० ॥
गङ्गां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम् ।
अवगाह्य ततो राजा तनुं तत्याज मानुषीम् ॥ ४१ ॥
जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गङ्गाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया ॥ ४०-४१ ॥
ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
निर्वैरो गतसंतापो जले तस्मिन् समाप्लुतः ॥ ४२ ॥
तत्पश्चात् दिव्यदेह धारण करके धर्मराज युधिष्ठिर वैरभावसे रहित हो गये ।
मन्दाकिनीके शीतल जलमें स्नान करते ही उनका सारा संताप दूर हो गया ॥ ४२ ॥
ततो ययौ वृतो देवैः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
धर्मेण सहितो धीमान् स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ४३ ॥
यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शूरा विगतमन्यवः ते ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने - अपने स्थानोंपर रहते थे ॥ ४३-४४ ॥ इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरतनुत्यागे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें युधिष्ठिरका देहत्यागविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
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चतुर्थोऽध्यायः युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा देवैः सर्षिमरुद्गणैः ।
स्तूयमानो ययौ तत्र यत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और मरुद्गणोंके मुँहसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए राजा युधिष्ठिर क्रमशः उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ वे कुरुश्रेष्ठ भीमसेन और अर्जुन आदि विराजमान थे ॥
ददर्श तत्र गोविन्दं ब्राह्मेण वपुषान्वितम् ।
तेनैव दृष्टपूर्वेण सादृश्येनैव सूचितम् ॥ २ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने ब्राह्मविग्रहसे सम्पन्न हैं । पहलेके देखे गये सादृश्यसे ही वे पहचाने जाते हैं ॥ २ ॥
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम् ।
चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यैः पुरुषविग्रहैः ॥ ३ ॥
उनके श्रीविग्रहसे अद्भुत दीप्ति छिटक रही है । चक्र आदि दिव्य एवं भयंकर अस्त्र- शस्त्र दिव्य पुरुषविग्रह धारण करके उनकी सेवामें उपस्थित हैं ॥ ३ ॥
उपास्यमानं वीरेण फाल्गुनेन सुवर्चसा ।
तथास्वरूपं कौन्तेयो ददर्श मधुसूदनम ॥ ४ ॥
अत्यन्त तेजस्वी वीरवर अर्जुन भगवान्की आराधनामें लगे हुए हैं । कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् मधुसूदनका उसी स्वरूपमें दर्शन किया ॥ ४ ॥
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ समुद्वीक्ष्य युधिष्ठिरम् ।
यथावत् प्रतिपेदाते पूजया देवपूजितौ ॥ ५ ॥
पुरुषसिंह अर्जुन और श्रीकृष्ण देवताओंद्वारा पूजित थे । इन दोनोंने युधिष्ठिरको उपस्थित देख उनका यथावत् सम्मान किया ॥ ५ ॥
अपरस्मिन्नथोद्देशे कर्णं शस्त्रभृतां वरम् ।
द्वादशादित्यसहितं ददर्श कुरुनन्दनः ॥ ६ ॥
इसके बाद दूसरी ओर दृष्टि डालनेपर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णको देखा जो बारह आदित्योंके साथ ( तेजोमय स्वरूप धारण किये ) विराजमान थे ॥ ६ ॥
अथापरस्मिन्नुद्देशे मरुद्गणवृतं विभुम् ।
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भीमसेनमथापश्यत् तेनैव वपुषान्वितम् ॥ ७ ॥
वायोर्मूर्तिमतः पार्श्वे दिव्यमूर्तिसमन्वितम् ।
श्रिया परमया युक्तं सिद्धिं परमिकां गतम् ॥ ८ ॥
फिर दूसरे स्थानमें उन्होंने दिव्यरूपधारी भीमसेनको देखा जो पहलेहीके समान शरीर धारण किये मूर्तिमान् वायुदेवताके पास बैठे थे । उन्हें सब ओरसे मरुद्गणोंने घेर रखा था । वे उत्तम कान्तिसे सुशोभित एवं उत्कृष्ट सिद्धिको प्राप्त थे ॥ ७-८ ॥
अश्विनोस्तु तथा स्थाने दीप्यमानौ स्वतेजसा ।
नकुलं सहदेवं च ददर्श कुरुनन्दनः ॥ ९ ॥
कुरुनन्दन युधिष्ठिरने नकुल और सहदेवको अश्विनीकुमारोंके स्थानमें विराजमान देखा जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे ॥ ९ ॥
तथा ददर्श पाञ्चालीं कमलोत्पलमालिनीम् ।
वपुषा स्वर्गमाक्रम्य तिष्ठन्तीमर्कवर्चसम् ॥ १० ॥
तदनन्तर उन्होंने कमलोंकी मालासे अलंकृत पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीको देखा जो अपने तेजस्वी स्वरूपसे स्वर्गलोकको अभिभूत करके विराज रही थीं । उनकी दिव्य कान्ति सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो रही थी ॥ १० ॥
अखिलं सहसा राजा प्रष्टुमैच्छद् युधिष्ठिरः ।
ततोऽस्य भगवानिन्द्रः कथयामास देवराट् ॥ ११ ॥
राजा युधिष्ठिरने इन सबके विषयमें सहसा प्रश्न करनेका विचार किया । तब देवराज भगवान् इन्द्र स्वयं ही उन्हें सबका परिचय देने लगे— ॥ ११ ॥
श्रीरेषा द्रौपदीरूपा त्वदर्थे मानुषं गता ।
अयोनिजा लोककान्ता पुण्यगन्धा युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
' युधिष्ठिर! ये जो लोककमनीय विग्रहसे युक्त पवित्र गन्धवाली देवी दिखायी दे रही हैं, साक्षात् भगवती लक्ष्मी हैं । ये ही तुम्हारे लिये मनुष्यलोकमें जाकर अयोनिसम्भूता द्रौपदीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं ॥
रत्यर्थं भवतां ह्येषा निर्मिता शूलपाणिना ।
द्रुपदस्य कुले जाता भवद्भिश्चोपजीविता ॥ १३ ॥
‘ स्वयं भगवान् शंकरने तुमलोगोंकी प्रसन्नताके लिये इन्हें प्रकट किया था और ये ही द्रुपदके कुलमें जन्म धारणकर तुम सब भाइयोंके द्वारा अनुगृहीत हुई थीं ॥
एते पञ्च महाभागा गन्धर्वाः पावकप्रभाः ।
द्रौपद्यास्तनया राजन् युष्माकममितौजसः ॥ १४ ॥
' राजन्! ये जो अग्निके समान तेजस्वी और महान् सौभाग्यशाली पाँच गन्धर्व दिखायी देते हैं, ये ही तुमलोगोंके वीर्यसे उत्पन्न हुए द्रौपदीके अनन्त बलशाली पुत्र हुए थे ॥ १४ ॥
पश्य गन्धर्वराजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।
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एनं च त्वं विजानीहि भ्रातरं पूर्वजं पितुः ॥ १५ ॥
' इन मनीषी गन्धर्वराज धृतराष्ट्रका दर्शन करो और इन्हींको अपने पिताका बड़ा भाई समझो ॥ १५ ॥
अयं ते पूर्वजो भ्राता कौन्तेयः पावकद्युतिः ।
सूतपुत्राग्रजः श्रेष्ठो राधेय इति विश्रुतः ॥ १६ ॥
‘ ये रहे तुम्हारे बड़े भाई कुन्तीकुमार कर्ण जो अग्नितुल्य तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं । ये ही सूतपुत्रोंके श्रेष्ठ अग्रज थे और ये ही राधापुत्रके नामसे विख्यात हुए थे ॥
आदित्यसहितो याति पश्यैनं पुरुषर्षभम् ।
‘ इन पुरुषप्रवर कर्णका दर्शन करो, ये आदित्योंके साथ जा रहे हैं ॥ १६३ ॥
साध्यानामथ देवानां विश्वेषां मरुतामपि ॥ १७ ॥
गणेषु पश्य राजेन्द्र वृष्ण्यन्धकमहारथान् ।
सात्यकिप्रमुखान् वीरान् भोजांश्चैव महाबलान् ॥ १८ ॥
‘ राजेन्द्र! उधर वृष्णि और अन्धककुलके सात्यकि आदि वीर महारथियों और महान् बलशाली भोजोंको देखो । वे साध्यों, विश्वेदेवों तथा मरुद्गणोंमें विराजमान हैं ॥ १७-१८ ॥
सोमेन सहितं पश्य सौभद्रमपराजितम् ।
अभिमन्युं महेष्वासं निशाकरसमद्युतिम् ॥ १९ ॥
‘ इधर किसीसे परास्त न होनेवाले महाधनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्युकी ओर दृष्टि डालो । यह चन्द्रमाके साथ इन्हींके समान कान्ति धारण किये बैठा है ॥ १ ९ ॥
एष पाण्डुर्महेष्वासः कुन्त्या माद्रया च संगतः ।
विमानेन सदाभ्येति पिता तव ममान्तिकम् ॥ २० ॥
‘ ये महाधनुर्धर राजा पाण्डु हैं जो कुन्ती और माद्री दोनोंके साथ हैं । ये तुम्हारे पिता पाण्डु विमानद्वारा सदा मेरे पास आया करते हैं ॥ २० ॥
वसुभिः सहितं पश्य भीष्मं शान्तनवं नृपम् ।
द्रोणं बृहस्पतेः पार्श्वे गुरुमेनं निशामय ॥ २१ ॥
' शान्तनुनन्दन राजा भीष्मका दर्शन करो, ये वसुओंके साथ विराज रहे हैं । द्रोणाचार्य
बृहस्पतिके साथ हैं । अपने इन गुरुदेवको अच्छी तरह देख लो ॥ २१ ॥
एते चान्ये महीपाला योधास्तव च पाण्डव ।
गन्धर्वसहिता यान्ति यक्षपुण्यजनैस्तथा ॥ २२ ॥
'पाण्डुनन्दन! ये तुम्हारे पक्षके दूसरे भूपाल योद्धा गन्धर्वों, यक्षों तथा पुण्यजनोंके साथ जा रहे हैं ॥ २२ ॥
गुह्यकानां गतिं चापि केचित् प्राप्ता नराधिपाः ।
त्यक्त्वा देहं जितः स्वर्गः पुण्यवाग्बुद्धिकर्मभिः ॥ २३ ॥
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‘ किन्हीं- किन्हीं राजाओंको गुह्यकोंकी गति प्राप्त हुई है । ये सब युद्धमें शरीर त्यागकर अपनी पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर चुके हैं ' ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि द्रौपद्यादिस्वस्वस्थानगमने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ || इसप्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें द्रौपदी आदिका अपने-अपने स्थानमें गमनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥