06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 471–480
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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तदेतत् सर्वमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यताम् ॥ ३० ॥
हम इस विषयमें यथार्थ तत्त्वको जानना चाहते हैं । आप हमारे पथप्रदर्शक होइये । इन सब बातोंको स्पष्टरूपसे बताइये । मैं आपकी बातें सुननेसे तृप्त नहीं हो रहा हूँ । अतः आप इस विषयका प्रतिपादन कीजिये ॥ ३० ॥
भीष्म उवाच
नैव निष्ठाकरं शुल्कं ज्ञात्वाऽऽसीत् तेन नाहृतम् ।
न हि शुल्कपराः सन्तः कन्यां ददति कर्हिचित् ॥ ३१ ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! मूल्य दे देनेसे ही विवाहका अन्तिम निश्चय नहीं हो जाता ( उसमें परिवर्तनकी सम्भावना रहती ही है ) । यह समझकर ही मूल्य देनेवाला मूल्य देता है और फिर उसे वापस नहीं माँगता । सज्जन पुरुष कभी -कभी मूल्य लेकर भी किसी विशेष कारणवश कन्यादान नहीं करते हैं ॥ ३१ ॥
अन्यैर्गुणैरुपेतं तु शुल्कं याचन्ति बान्धवाः ।
अलंकृत्वा वहस्वेति यो दद्यादनुकूलतः ॥ ३२ ॥
कन्याके भाई- बन्धु किसीसे मूल्य तभी माँगते हैं जब वह विपरीत गुण ( अधिक अवस्था आदि ) -से युक्त होता है । यदि वरको बुलाकर कहा जाय कि ' तुम मेरी कन्याको आभूषण पहनाकर इसके साथ विवाह कर लो और ऐसा कहनेपर वह उसके लिये आभूषण देकर विवाह करे तो यह धर्मानुकूल ही है ॥ ३२ ॥
यच्च तां च ददत्येवं न शुल्कं विक्रयो न सः ।
प्रतिगृह्य भवेद् देयमेष धर्मः सनातनः ॥ ३३ ॥
क्योंकि इस प्रकार जो कन्याके लिये आभूषण लेकर कन्यादान किया जाता है, वह न तो मूल्य है और न विक्रय ही; इसलिये कन्याके लिये कोई वस्तु स्वीकार करके कन्याका दान करना सनातन धर्म है ॥
दास्यामि भवते कन्यामिति पूर्वं न भाषितम् ।
ये चाहुर्ये च नाहुर्ये ये चावश्यं वदन्त्युत ॥ ३४ ॥
जो लोग भिन्न - भिन्न व्यक्तियोंसे कहते हैं कि ' मैं आपको अपनी कन्या दूँगा ', जो कहते हैं ' नहीं दूँगा ' और जो कहते हैं ' अवश्य दूँगा ' उनकी ये सभी बातें कन्या देनेके पहले नही कही हुई के ही तुल्य हैं ॥ ३४ ॥
तस्मादा ग्रहणात् पाणेर्याचयन्ति परस्परम् ।
कन्यावरः पुरा दत्तो मरुद्भिरिति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥
जबतक कन्याका पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न न हो जाय तबतक कन्याको माँगना चाहिये । ऐसा कन्याओंके लिये मरुद्गणोंने पहले वर दिया है, अर्थात् अधिकार दिया है—
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यह हमारे सुननेमें आया है । इसलिये पाणिग्रहण होनेके पहलेतक वर और कन्या आपसमें एक- दूसरेके लिये प्रार्थना कर सकते हैं ॥ ३५ ॥
नानिष्टाय प्रदातव्या कन्या इत्यृषिचोदितम् ।
तन्मूलं काममूलस्य प्रजनस्येति मे मतिः ॥ ३६ ॥
महर्षियोंका मत है कि अयोग्य वरको कन्या नहीं देनी चाहिये; क्योंकि सुयोग्य पुरुषको कन्यादान करना ही काम- सम्बन्धी सुख और सुयोग्य संतानकी उत्पत्तिका कारण है । ऐसा मेरा विचार है ॥ ३६ ॥
समीक्ष्य च बहून् दोषान् संवासाद् विद्धि पाणयोः ।
यथा निष्ठाकरं शुल्कं न जात्वासीत् तथा शृणु ॥ ३७ ॥
कन्याके क्रय- विक्रयमें बहुत- से दोष हैं । इस बातको तुम अधिक कालतक सोचने-विचारनेके बाद स्वयं समझ लोगे । केवल मूल्य दे देनेसे विवाहका अन्तिम निश्चय नहीं हो जाता है । पहले भी कभी ऐसा नहीं हुआ था, इस विषयमें तुम सुनो ॥ ३७ ॥
अहं विचित्रवीर्यस्य द्वे कन्ये समुदावहम् ।
जित्वा च मागधान् सर्वान् काशीनथ च कोसलान् ॥ ३८ ॥
मैं विचित्रवीर्यके विवाहके लिये मगध, काशी तथा कोशलदेशके समस्त वीरोंको पराजित करके काशिराजकी दो* कन्याओंको हर लाया था ॥ ३८ ॥
गृहीतपाणिरेकाऽऽसीत् प्राप्तशुल्का पराभवत् ।
कन्या गृहीता तत्रैव विसर्ज्या इति मे पिता ॥ ३ ९ ॥
अब्रवीदितरां कन्यामावहेति स कौरवः ।
अप्यन्याननुपप्रच्छ शङ्कमानः पितुर्वचः ॥ ४० ॥
उनमेंसे एक कन्या अम्बा अपना हाथ शाल्वराजके हाथमें दे चुकी थी; अर्थात् मन- ही-मन उनको अपना पति मान चुकी थी । दूसरी ( दो कन्याओं) का काशिराजको शुल्क प्राप्त हो गया था । इसलिये मेरे पिता (चाचा ) कुरुवंशी बाह्लीकने वहीं कहा कि ' जो कन्या पाणिगृहीत हो चुकी है उसका त्याग कर दो और दूसरी कन्याका (जिनके लिये शुल्कमात्र लिया गया है ) विवाह करो । ' मुझे चाचाजीके इस कथनमें संदेह था, इसलिये मैंने दूसरोंसे भी इसके विषयमें पूछा ॥ ३ ९ -४० ॥ अतीव ह्यस्य धर्मेच्छा पितुर्मेऽभ्यधिकाभवत् ।
ततोऽहमब्रुवं राजन्नाचारेप्सुरिदं वचः ।
आचारं तत्त्वतो वेत्तुमिच्छामि च पुनः पुनः ॥ ४१ ॥
परंतु इस विषयमें मेरे चाचाजीकी बहुत प्रबल इच्छा थी कि धर्मका पालन हो ( अतः वे पाणिगृहीता कन्याके त्यागपर अधिक जोर दे रहे थे ) । राजन्! तदनन्तर मैं आचार जाननेकी इच्छासे बोला — ' पिताजी! मैं इस विषयमें यह ठीक - ठीक जानना चाहता हूँ कि परम्परागत आचार क्या है? ' ॥ ४१ ॥
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ततो मयैवमुक्ते तु वाक्ये धर्मभृतां वरः ।
पिता मम महाराज बाह्लीको वाक्यमब्रवीत् ॥ ४२ ॥
महाराज! मेरे ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मेरे चाचा बाह्लीक इस प्रकार बोले — ॥ ४२ ॥
यदि वः शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात् तथा ।
लाजान्तरमुपासीत प्राप्तशुल्क इति स्मृतिः ॥ ४३ ॥
' यदि तुम्हारे मतमें मूल्य देनेमात्र से ही विवाहका पूर्ण निश्चय हो जाता है, पाणिग्रहणसे नहीं, तब तो स्मृतिका यह कथन ही व्यर्थ होगा कि कन्याका पिता एक वरसे शुल्क ले लेनेपर भी दूसरे किसी गुणवान् वरका आश्रय ले सकता है । अर्थात् पहलेको छोड़कर दूसरे गुणवान् वरसे अपनी कन्याका विवाह कर सकता है ॥
न हि धर्मविदः प्राहुः प्रमाणं वाक्यतः स्मृतम् ।
येषां वै शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात् तथा ॥ ४४ ॥
जिनका यह मत है कि शुल्कसे ही विवाहका निश्चय होता है, पाणिग्रहणसे नहीं, उनके इस कथनको धर्मज्ञ पुरुष प्रमाण नहीं मानते हैं ॥ ४४ ॥
प्रसिद्धं भाषितं दाने नैषां प्रत्यायकं पुनः ।
ये मन्यन्ते क्रयं शुल्कं न ते धर्मविदो नराः ॥ ४५ ॥
‘ कन्यादानके विषयमें तो लोगोंका कथन भी प्रसिद्ध है ' अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि कन्यादान हुआ है । अतः जो शुल्कसे ही विवाह निश्चय मानते हैं उनके कथनकी प्रतीति करानेवाला कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता । जो क्रय और शुल्कको मान्यता देते हैं वे मनुष्य धर्मज्ञ नहीं हैं ॥ ४५ ॥
न चैतेभ्यः प्रदातव्या न वोढव्या तथाविधा ।
न ह्येव भार्या क्रेतव्या न विक्रय्या कथंचन ॥ ४६ ॥
' ऐसे लोगोंको कन्या नहीं देनी चाहिये और जो बेची जा रही हो ऐसी कन्याके साथ विवाह नहीं करना चाहिये; क्योंकि भार्या किसी प्रकार भी खरीदने या विक्रय करनेकी वस्तु नहीं है ॥ ४६ ॥
ये च क्रीणन्ति दासीं च विक्रीणन्ति तथैव च ।
भवेत् तेषां तथा निष्ठा लुब्धानां पापचेतसाम् ॥ ४७ ॥
‘ जो दासियोंको खरीदते और बेचते हैं वे बड़े लोभी और पापात्मा हैं । ऐसे ही लोगोंमें पत्नीको भी खरीदने -बेचनेकी निष्ठा होती है ॥ ४७ ॥
अस्मिन्नर्थे सत्यवन्तं पर्यपृच्छन्त वै जनाः ।
कन्यायाः प्राप्तशुल्कायाः शुल्कदः प्रशमं गतः ॥ ४८ ॥
पाणिग्रहीता वान्यः स्यादत्र नो धर्मसंशयः ।
तन्नश्छिन्धि महाप्राज्ञ त्वं हि वै प्राज्ञसम्मतः ॥ ४ ९ ॥
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इस विषयमें पहलेके लोगोंने सत्यवान् से पूछा था कि ' महाप्राज्ञ! यदि कन्याका शुल्क देनेके पश्चात् शुल्क देनेवालेकी मृत्यु हो जाय तो उसका पाणिग्रहण दूसरा कोई कर सकता है या नहीं? इसमें हमें धर्मविषयक संदेह हो गया है । आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आप ज्ञानी पुरुषोंद्वारा सम्मानित हैं ॥ ४८-४९ ॥
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ।
तानेवं ब्रुवतः सर्वान् सत्यवान् वाक्यमब्रवीत् ॥ ५० ॥
‘ हमलोग इस विषयमें यथार्थ बात जानना चाहते हैं । आप हमारे लिये पथप्रदर्शक होइये । ' उन लोगोंके इस प्रकार कहनेपर सत्यवान्ने कहा– ॥ ५० ॥
यत्रेष्टं तत्र देया स्यान्नात्र कार्या विचारणा ।
कुर्वते जीवतोऽप्येवं मृते नैवास्ति संशयः ॥ ५१ ॥
'जहाँ उत्तम पात्र मिलता हो वहीं कन्या देनी चाहिये । इसके विपरीत कोई विचार मनमें नहीं लाना चाहिये । मूल्य देनेवाला यदि जीवित हो तो भी सुयोग्य वरके मिलनेपर सज्जन पुरुष उसीके साथ कन्याका विवाह करते हैं । फिर उसके मर जानेपर अन्यत्र करें — इसमें तो संदेह ही नहीं है ॥ ५१ ॥
देवरं प्रविशेत् कन्या तप्येद् वापि तपः पुनः ।
तमेवानुगता भूत्वा पाणिग्राहस्य काम्यया ॥ ५२ ॥
' शुल्क देनेवालेकी मृत्यु हो जानेपर उसके छोटे भाईको वह कन्या पतिरूपमें ग्रहण करे अथवा जन्मान्तरमें उसी पतिको पानेकी इच्छासे उसीका अनुसरण ( चिन्तन ) करती हुई आजीवन कुमारी रहकर तपस्या करे ॥ ५२ ॥
लिखन्त्येव तु केषांचिदपरेषां शनैरपि ।
इति ये संवदन्त्यत्र त एतं निश्चयं विदुः ॥ ५३ ॥
तत्पाणिग्रहणात् पूर्वमन्तरं यत्र वर्तते ।
सर्वमङ्गलमन्त्रं वै मृषावादस्तु पातकः ॥ ५४ ॥
‘ किन्हींके मतमें अक्षतयोनि कन्याको स्वीकार करनेका अधिकार है । दूसरोंके मतमें यह मन्दप्रवृत्ति— अवैध कार्य है । इस प्रकार जो विवाद करते हैं, वे अन्तमें इसी निश्चयपर पहुँचते हैं कि कन्याका पाणिग्रहण होनेसे पहलेका वैवाहिक मंगलाचार और मन्त्रप्रयोग हो जानेपर भी जहाँ अन्तर या व्यवधान पड़ जाय; अर्थात् अयोग्य वरको छोड़कर किसी दूसरे योग्य वरके साथ कन्या ब्याह दी जाय तो दाताको केवल मिथ्याभाषणका पाप लगता है ( पाणिग्रहणसे पूर्व कन्या विवाहित नहीं मानी जाती है ) ॥ ५३-५४ ॥ पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात् सप्तमे पदे ।
पाणिग्रहस्य भार्या स्याद् यस्य चाद्भिः प्रदीयते ।
इति देयं वदन्त्यत्र त एनं निश्चयं विदुः ॥ ५५ ॥
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‘ सप्तपदीके सातवें पदमें पाणिग्रहणके मन्त्रोंकी सफलता होती है ( और तभी पति-पत्नीभावका निश्चय होता है ) । जिस पुरुषको जलसे संकल्प करके कन्याका दान दिया जाता है वही उसका पाणिग्रहीता पति होता है और उसीकी वह पत्नी मानी जाती है । विद्वान् पुरुष इसी प्रकार कन्यादानकी विधि बताते हैं । वे इसी निश्चयपर पहुँचे हुए हैं ॥ ५५ ॥
अनुकूलामनुवंशां भ्रात्रा दत्तामुपाग्निकाम् ।
परिक्रम्य यथान्यायं भार्यां विन्देद् द्विजोत्तमः ॥ ५६ ॥
' जो अनुकूल हो, अपने वंशके अनुरूप हो, अपने पिता- माता या भाईके द्वारा दी गयी हो और प्रज्वलित अग्निके समीप बैठी हो, ऐसी पत्नीको श्रेष्ठ द्विज अग्निकी परिक्रमा करके शास्त्रविधिके अनुसार ग्रहण करे ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मकथने चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंविवाहधर्मका वर्णनविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
FUEL O FUTE १ - स्मृतियोंमें निम्नलिखित आठ विवाह बतलाये गये हैं-ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, गान्धर्व, आसुर, राक्षस और पैशाच । किंतु यहाँ १ ब्राह्म, २ प्राजापत्य, ३ गान्धर्व, ४ आसुर और ५ राक्षस– इन्हीं पाँच विवाहोंका उल्लेख किया गया है; अतः यहाँ जो ब्राह्म विवाह है उसीमें स्मृतिकथित दैव और आर्ष विवाहोंका भी अन्तर्भाव समझना चाहिये । इसी प्रकार यहाँ बताये हुए राक्षस विवाहमें उपर्युक्त पैशाच विवाहका समावेश कर लेना चाहिये । प्राजापत्यको ही ' क्षात्र ' विवाह भी कहा गया है । २ - सापिण्ड्य निवृत्तिके सम्बन्धमें स्मृतिका वचन है- वध्वा वरस्य वा तातः कूटस्थाद् यदि सप्तमः । पंचमी चेत्तयोर्माता तत्सापिण्ड्यं निवर्तते ॥ अर्थात् ' यदि वर अथवा कन्याका पिता मूल पुरुषसे सातवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुआ है तथा माता पाँचवी पीढ़ीमें पैदा हुई है तो वर और कन्याके लिये सापिण्ड्यकी निवृत्ति हो जाती है । ' पिताकी ओरका सापिण्ड्य सात पीढ़ीतक चलता है और माताका सापिण्ड्य पाँच पीढ़ीतक । सात पीढ़ीमें एक तो पिण्ड देनेवाला होता है, तीन पिण्डभागी होते हैं और तीन लेपभागी होते हैं । * भीष्मजी काशिराजकी तीन कन्याओंको हरकर लाये थे, उनमेंसे दोको एक श्रेणीमें रखकर एकवचनका प्रयोग किया गया है, यह मानना चाहिये; तभी आदिपर्व अध्याय १०२ के वर्णनकी संगति ठीक लग सकती है ।
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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार युधिष्ठिर उवाच
कन्यायाः प्राप्तशुल्कायाः पतिश्चेन्नास्ति कश्चन ।
तत्र का प्रतिपत्तिः स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – पितामह! जिस कन्याका मूल्य ले लिया गया हो उसका ब्याह करनेके लिये यदि कोई उपस्थित न हो, अर्थात् मूल्य देनेवाला परदेश चला गया हो और उसके भयसे दूसरा पुरुष भी उस कन्यासे विवाह करनेको तैयार न हो तो उसके पिताको क्या करना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
या पुत्रकस्य ऋद्धस्य प्रतिपाल्या तदा भवेत् ।
अथ चेन्नाहरेच्छुल्कं क्रीता शुल्कप्रदस्य सा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! यदि संतानहीन धनीसे कन्याका मूल्य लिया गया है तो पिताका कर्तव्य है कि वह उसके लौटनेतक कन्याकी हर तरहसे रक्षा करे । खरीदी हुई कन्याका मूल्य जबतक लौटा नहीं दिया जाता तबतक वह कन्या मूल्य देनेवालेकी ही मानी जाती है ॥ २ ॥
तस्यार्थेऽपत्यमीहेत येन न्यायेन शक्नुयात् ।
न तस्मान्मन्त्रवत्कार्यं कश्चित् कुर्वीत किंचन ॥ ३ ॥
जिस न्यायोचित उपायसे सम्भव हो, उसीके द्वारा वह कन्या अपने मूल्यदाता पतिके लिये ही संतान उत्पन्न करनेकी इच्छा करे । अतःदूसरा कोई पुरुष वैदिक मन्त्रयुक्त विधिसे उसका पाणिग्रहण या और कोई कार्य नहीं कर सकता ॥ ३ ॥
स्वयंवृत्तेन साऽऽज्ञप्ता पित्रा वै प्रत्यपद्यत ।
तत् तस्यान्ये प्रशंसन्ति धर्मज्ञा नेतरे जनाः ॥ ४ ॥
सावित्रीने पिताकी आज्ञा लेकर स्वयं चुने हुए पतिके साथ सम्बन्ध स्थापित किया था । उसके इस कार्यकी दूसरे धर्मज्ञ पुरुष प्रशंसा करते हैं; परंतु कुछ लोग नहीं भी करते हैं ॥ ४ ॥
एतत् तु नापरे चक्रुरपरे जातु साधवः ।
साधूनां पुनराचारो गरीयान् धर्मलक्षणः ॥ ५ ॥
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कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरे सत्पुरुषोंने ऐसा नहीं किया है और कुछ कहते हैं कि अन्य सत्पुरुषोंने भी कभी - कभी ऐसा किया है । अतः श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार ही धर्मका सर्वश्रेष्ठ लक्षण है ॥ ५ ॥
अस्मिन्नेव प्रकरणे सुक्रतुर्वाक्यमब्रवीत् ।
नप्ता विदेहराजस्य जनकस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
इसी प्रसंगमें विदेहराज महात्मा जनकके नाती सुक्रतुने ऐसा कहा है ॥ ६ ॥
असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् ।
अत्र प्रश्नः संशयो वा सतामेवमुपालभेत् ॥ ७ ॥
दुराचारियोंके मार्गका शास्त्रोंद्वारा कैसे अनुमोदन किया जा सकता है? इस विषयमें सत्पुरुषोंके समक्ष प्रश्न, संशय अथवा उपालम्भ कैसे उपस्थित किया जा सकता है? ॥ ७ ॥
असदेव हि धर्मस्य प्रदानं धर्म आसुरः ।
नानुशुश्रुम जात्वेतामिमां पूर्वेषु कर्मसु ॥ ८ ॥
स्त्रियाँ सदा पिता, पति या पुत्रोंके संरक्षणमें ही रहती हैं, स्वतंत्र नहीं होतीं । यह पुरातन धर्म है । इस धर्मका खण्डन करना असत् कर्म या आसुर धर्म है । पूर्वकालके बड़े - बूढ़ोंमें विवाहके अवसरोंपर कभी इस आसुरी पद्धतिका अपनाया जाना हमने नहीं सुना है ॥ ८ ॥
भार्यापत्योर्हि सम्बन्धः स्त्रीपुंसोः स्वल्प एव तु ।
रतिः साधारणो धर्म इति चाह स पार्थिवः ॥ ९ ॥
पति और पत्नीका अथवा स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध बहुत ही घनिष्ठ एवं सूक्ष्म है । रति
उनका साधारण धर्म है । यह बात भी राजा सुक्रतुने कही थी ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरउवाच
अथ केन प्रमाणेन पुंसामादीयते धनम् ।
पुत्रवद्धि पितुस्तस्य कन्या भवितुमर्हति ॥ १० ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! पिताके लिये पुत्री भी तो पुत्रके ही समान होती है; फिर उसके रहते हुए किस प्रमाणसे केवल पुरुष ही धनके अधिकारी होते हैं? ॥ १० ॥
भीष्मउवाच
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा ।
तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥ ११ ॥
भीष्मजीने कहा- बेटा! पुत्र अपने आत्माके समान है और कन्या भी पुत्रके ही तुल्य है, अतः आत्मस्वरूप पुत्रके रहते हुए दूसरा कोई उसका धन कैसे ले सकता है? ॥ ११ ॥
मातुश्च यौतकं यत् स्यात् कुमारीभाग एव सः ।
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दौहित्र एव तद् रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ॥ १२ ॥
माताको दहेजमें जो धन मिलता है उसपर कन्याका ही अधिकार है; अतः जिसके कोई पुत्र नहीं है उसके धनको पानेका अधिकारी उसका दौहित्र (नाती ) ही है । वही उस धनको ले सकता है ॥ १२ ॥
ददाति हि स पिण्डान् वै पितुर्मातामहस्य च ।
पुत्रदौहित्रयोरेव विशेषो नास्ति धर्मतः ॥ १३ ॥
दौहित्र अपने पिता और नानाको भी पिण्ड देता है । धर्मकी दृष्टिसे पुत्र और दौहित्रमें कोई अन्तर नहीं है ॥ १३ ॥
अन्यत्र जामया सार्धं प्रजानां पुत्र ईहते ।
दुहितान्यत्र जातेन पुत्रेणापि विशिष्यते ॥ १४ ॥
अन्यत्र अर्थात् यदि पहले कन्या उत्पन्न हुई और वह पुत्ररूपमें स्वीकार कर ली गयी तथा उसके बाद पुत्र भी पैदा हुआ तो वह पुत्र उस कन्याके साथ ही पिताके धनका अधिकारी होता है । यदि दूसरेका पुत्र गोद लिया गया हो तो उस दत्तक पुत्रकी अपेक्षा अपनी सगी बेटी ही श्रेष्ठ मानी जाती है ( अतः वह पैतृक धनके अधिक भागकी अधिकारिणी है ) ॥ १४ ॥
दौहित्रकेण धर्मेण नाज पश्यामि कारणम् ।
विक्रीतासु हि ये पुत्रा भवन्ति पितुरेव ते ॥ १५ ॥
जो कन्याएँ मूल्य लेकर बेच दी गयी हों उनसे उत्पन्न होनेवाले पुत्र केवल अपने पिताके ही उत्तराधिकारी होते हैं । उन्हें दौहित्रक धर्मके अनुसार नानाके धनका अधिकारी बनानेके लिये कोई युक्तिसंगत कारण मैं नहीं देखता ॥ १५ ॥
असूयवस्त्वधर्मिष्ठाः परस्वादायिनः शठाः ।
आसुरादधिसम्भूता धर्माद् विषमवृत्तयः ॥ १६ ॥
आसुर विवाहसे जिन पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है, वे दूसरोंके दोष देखनेवाले, पापाचारी, पराया धन हड़पनेवाले, शठ तथा धर्मके विपरीत बर्ताव करनेवाले होते हैं ॥ १६ ॥
अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
धर्मज्ञा धर्मशास्त्रेषु निबद्धा धर्मसेतुषु ॥ १७ ॥
इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले तथा धर्मशास्त्रों और धर्ममर्यादाओंमें स्थित रहनेवाले धर्मज्ञ पुरुष यमकी गायी हुई गाथाका इस प्रकार वर्णन करते हैं— ॥ १७ ॥
यो मनुष्यः स्वकं पुत्रं विक्रीय धनमिच्छति ।
कन्यां वा जीवितार्थाय यः शुल्केन प्रयच्छति ॥ १८ ॥
सप्तावरे महाघोरे निरये कालसाह्वये ।
स्वेदं मूत्रं पुरीषं च तस्मिन् मूढः समश्नुते ॥ १ ९ ॥
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' जो मनुष्य अपने पुत्रको बेचकर धन पाना चाहता है अथवा जीविकाके लिये मूल्य लेकर कन्याको बेच देता है, वह मूढ़ कुम्भीपाक आदि सात नरकोंसे भी निकृष्ट कालसूत्र नामक नरकमें पड़कर अपने ही मल- मूत्र और पसीनेका भक्षण करता है ' ॥ १८-१९ ॥
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् ।
अल्पो वा बहु वा राजन् विक्रयस्तावदेव सः ॥ २० ॥
राजन्! कुछ लोग आर्ष विवाहमें एक गाय और एक बैल - इन दो पशुओंको मूल्यके रूपमें लेनेका विधान बताते हैं, परंतु यह भी मिथ्या ही है; क्योंकि मूल्य थोड़ा लिया जाय या बहुत, उतनेहीसे वह कन्याका विक्रय हो जाता है ॥ २० ॥
यद्यप्याचरितः कैश्चिन्नैष धर्मः सनातनः ।
अन्येषामपि दृश्यन्ते लोकतः सम्प्रवृत्तयः ॥ २१ ॥
यद्यपि कुछ पुरुषोंने ऐसा आचरण किया है; परंतु यह सनातन धर्म नहीं है । दूसरे लोगोंमें भी लोकाचारवश बहुत- सी प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं ॥ २१ ॥
वश्यां कुमारीं बलतो ये तां समुपभुञ्जते ।
एते पापस्य कर्तारस्तमस्यन्धे च शेरते ॥ २२ ॥
जो किसी कुमारी कन्याको बलपूर्वक अपने वशमें करके उसका उपभोग करते हैं, वे पापाचारी मनुष्य अन्धकारपूर्ण नरकमें गिरते हैं ॥ २२ ॥
अन्योऽप्यथ न विक्रेयो मनुष्यः किं पुनः प्रजाः ।
अधर्ममूलैर्हि धनैस्तैर्न धर्मोऽथ कश्चन ॥ २३ ॥
किसी दूसरे मनुष्यको भी नहीं बेचना चाहिये; फिर अपनी संतानको बेचनेकी तो बात ही क्या? अधर्ममूलक धनसे किया हुआ कोई भी धर्म सफल नहीं होता ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे यमगाथा नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंविवाहधर्मसम्बन्धी यमगाथानामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४५ ॥
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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः स्त्रियोंके वस्त्राभूषणोंसे सत्कार करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन भीष्म उवाच
प्राचेतसस्य वचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
यस्याः किंचिन्नाददते ज्ञातयो न स विक्रयः ॥ १ ॥
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यतमं च तत् ।
सर्वं च प्रतिदेयं स्यात् कन्यायै तदशेषतः ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! प्राचीन इतिहासके जाननेवाले विद्वान् दक्षप्रजापतिके 1-वचनोंको इस प्रकार उद्धृत करते हैं । कन्याके भाई- बन्धु यदि उसके वस्त्र आभूषणके लिये धन ग्रहण करते हैं और स्वयं उसमेंसे कुछ भी नहीं लेते हैं तो वह कन्याका विक्रय नहीं है । वह तो उन कन्याओंका सत्कारमात्र है । वह परम दयालुतापूर्ण कार्य है । वह सारा धन जो कन्याके लिये ही प्राप्त हुआ हो, सब का सब कन्याको ही अर्पित कर देना चाहिये ॥ १-२ ॥
पितृभिर्भ्रातृभिश्चापि श्वशुरैरथ देवरैः ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥ ३ ॥
बहुविध कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पिता, भाई, श्वशुर और देवरोंको उचित है कि वे नववधूका पूजन – वस्त्राभूषणोंद्वारा सत्कार करें ॥ ३ ॥
यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् ।
अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनो न प्रवर्धते ॥। ४ ॥
पूज्या लालयितव्याश्च स्त्रियो नित्यं जनाधिप । नरेश्वर! यदि स्त्रीकी रुचि पूर्ण न की जाय तो वह अपने पतिको प्रसन्न नहीं कर सकती और उस अवस्थामें उस पुरुषकी संतानवृद्धि नहीं हो सकती । इसलिये सदा ही स्त्रियोंका सत्कार और दुलार करना चाहिये ॥ ४३ ॥
स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ॥ ५ ॥
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः । जहाँ स्त्रियोंका आदर- सत्कार होता है वहाँ देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जहाँ इनका अनादर होता है वहाँकी सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं ॥ ५३ ॥
तदा चैतत् कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामयः ॥ ६ ॥
जामीशप्तानि गेहानि निकृत्तानीव कृत्यया ।