06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 501–510
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510
पृष्ठ 501
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
ब्रूहि तात कुरुश्रेष्ठ वर्णानां त्वं पृथक् पृथक् ।
कीदृश्यां कीदृशाश्चापि पुत्राः कस्य च के च ते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— तात! कुरुश्रेष्ठ! आप वर्णोंके सम्बन्धमें पृथक् - पृथक् यह बताइये कि कैसी स्त्रीके गर्भसे कैसे पुत्र उत्पन्न होते हैं? और कौन - से पुत्र किसके होते हैं? ॥ १ ॥
विप्रवादाः सुबहवः श्रूयन्ते पुत्रकारिताः ।
अत्र नो मुह्यतां राजन् संशयं छेत्तुमर्हसि ॥ २ ॥
पुत्रोंके निमित्त बहुत - सी विभिन्न बातें सुनी जाती हैं । राजन्! इस विषयमें हम मोहित होनेके कारण कुछ निश्चय नहीं कर पाते; अतः आप हमारे इस संशयका निवारण करें ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
आत्मा पुत्रश्च विज्ञेयस्तस्यानन्तरजश्च यः ।
निरुक्तजश्च विज्ञेयः सुतः प्रसृतजस्तथा ॥ ३ ॥
भीष्मने कहा- जहाँ पति- पत्नीके संयोगमें किसी तीसरेका व्यवधान नहीं है अर्थात् जो पतिके वीर्यसे ही उत्पन्न हुआ है, उस ' अनन्तरज ' अर्थात् ‘ औरस ' पुत्रको अपना आत्मा ही समझना चाहिये । दूसरा पुत्र ' निरुक्तज' होता है । तीसरा ' प्रसृतज' होता है ( निरुक्तज और प्रसृतज दोनों क्षेत्रजके ही दो भेद हैं ) ॥ ३ ॥
पतितस्य तु भार्याया भर्त्रा सुसमवेतया ।
तथा दत्तकृतौ पुत्रावध्यूढश्च तथापरः ॥ ४ ॥
पतित पुरुषका अपनी स्त्रीके गर्भसे स्वयं ही उत्पन्न किया हुआ पुत्र चौथी श्रेणीका पुत्र है । इसके सिवा ‘ दत्तक' और ' क्रीत' पुत्र भी होते हैं । ये कुल मिलाकर छः हुए । सातवाँ है ' अध्यूढ ' पुत्र ( जो कुमारी - अवस्थामें ही माताके पेटमें आ गया और विवाह करनेवालेके घरमें आकर जिसका जन्म हुआ ) ॥
षडपध्वंसजाश्चापि कानीनापसदास्तथा ।
इत्येते वै समाख्यातास्तान् विजानीहि भारत ॥ ५ ॥
आठवाँ ‘ कानीन ' पुत्र होता है । इनके अतिरिक्त छः ' अपध्वंसज' ( अनुलोम ) पुत्र होते हैं तथा छः ‘ अपसद ’ ( प्रतिलोम) पुत्र होते हैं । इस तरह इन सबकी संख्या बीस हो जाती है ।
पृष्ठ 502
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भारत! इस प्रकार ये पुत्रोंके भेद बताये गये । तुम्हें इन सबको पुत्र ही जानना चाहिये ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
षडपध्वंसजाः के स्युः के वाप्यपसदास्तथा ।
एतत् सर्वं यथातत्त्वं व्याख्यातुं मे त्वमर्हसि ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- दादाजी! छः प्रकारके अपध्वंसज पुत्र कौन- से हैं तथा अपसद किन्हें कहा गया है? यह सब आप मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
त्रिषु वर्णेषु ये पुत्रा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ।
वर्णयोश्च द्वयोः स्यातां यौ राजन्यस्य भारत ॥ ७ ॥
एको विड्वर्ण एवाथ तथात्रैवोपलक्षितः ।
षडपध्वंसजास्ते हि तथैवासपदान् शृणु ॥ ८ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! ब्राह्मणके क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र–इन तीन वर्णोंकी स्त्रियोंसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं वे तीन प्रकारके अपध्वंसज कहे गये हैं । भारत! क्षत्रियके वैश्य और शूद्र जातिकी स्त्रियोंसे जो पुत्र होते हैं वे दो प्रकारके अपध्वंसज हैं, तथा वैश्यके शूद्र-जातिकी स्त्रीसे जो पुत्र होता है वह भी एक अपध्वंसज है । इन सबका इसी प्रकरणमें दिग्दर्शन कराया गया है । इस प्रकार ये छः अपध्वंसज अर्थात् अनुलोम पुत्र कहे गये हैं । अब ‘ अपसद अर्थात् प्रतिलोम' पुत्रोंका वर्णन सुनो ॥ ७-८ ॥
चाण्डालो व्रात्यवैद्यौ च ब्राह्मण्यां क्षत्रियासु च ।
वैश्यायां चैव शूद्रस्य लक्ष्यन्तेऽपसदास्त्रयः ॥ ९ ॥
ब्राह्मणी, क्षत्रिया तथा वैश्या- इन वर्णकी स्त्रियोंके गर्भसे शूद्रद्वारा जो पुत्र उत्पन्न किये जाते हैं, वे क्रमशः चाण्डाल, व्रात्य और वैद्य कहलाते हैं । ये अपसदोंके तीन भेद हैं ॥ ९ ॥
मागधो वामकश्चैव द्वौ वैश्यस्योपलक्षितौ ।
ब्राह्मण्यां क्षत्रियायां च क्षत्रियस्यैक एव तु ॥ १० ॥
ब्राह्मण्यां लक्ष्यते सूत इत्येतेऽपसदाः स्मृताः ।
पुत्रा ह्येते न शक्यन्ते मिथ्याकर्तुं नराधिप ॥ ११ ॥
ब्राह्मणी और क्षत्रियाके गर्भसे वैश्यद्वारा जो पुत्र उत्पन्न किये जाते हैं, वे क्रमशः मागध और वामक नामवाले दो प्रकारके अपसद देखे गये हैं । क्षत्रियके एक ही वैसा पुत्र देखा जाता है, जो ब्राह्मणीसे उत्पन्न होता है । उसकी सूत संज्ञा है । ये छः अपसद अर्थात् प्रतिलोम पुत्र माने गये हैं । नरेश्वर! इन पुत्रोंको मिथ्या नहीं बताया जा सकता ॥ १०-११ ॥ युधिष्ठिर उवाच
पृष्ठ 503
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
क्षेत्रजं केचिदेवाहुः सुतं केचित्तु शुक्रजम् ।
तुल्यावेतौ सुतौ कस्य सन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! कुछ लोग अपनी पत्नीके गर्भसे उत्पन्न हुए किसी भी प्रकारके पुत्रको अपना ही पुत्र मानते हैं और कुछ लोग अपने वीर्यसे उत्पन्न हुए पुत्रको ही सगा पुत्र समझते हैं क्या ये दोनों समान कोटिके पुत्र हैं? इनपर किसका अधिकार है? इन्हें जन्म देनेवाली स्त्रीके पतिका या गर्भाधान करनेवाले पुरुषका? यह मुझे बताइये ॥ १२ ॥
भीष्म उवाच
रेतजो वा भवेत् पुत्रस्त्यक्तो वा क्षेत्रजो भवेत् ।
अध्यूढः समयं भित्त्वेत्येतदेव निबोध मे ॥ १३ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! अपने वीर्यसे उत्पन्न हुआ पुत्र तो सगा पुत्र है ही, क्षेत्रज पुत्र भी यदि गर्भस्थापन करनेवाले पिताके द्वारा छोड़ दिया गया हो तो वह अपना ही होता है । यही बात समय - भेदन करके अध्यूढ पुत्रके विषयमें भी समझनी चाहिये । तात्पर्य यह कि वीर्य डालनेवाले पुरुषने यदि अपना स्वत्व हटा लिया हो तब तो वे क्षेत्रज और अध्यूढ पुत्र
क्षेत्रपतिके ही माने जाते हैं । अन्यथा उनपर वीर्यदाताका ही स्वत्व है ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
रेतजं विद्म वै पुत्रं क्षेत्रजस्यागमः कथम् ।
अध्यूढं विद्म वै पुत्रं भित्त्वा तु समयं कथम् ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! हम तो वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले पुत्रको ही पुत्र समझते हैं । वीर्यके बिना क्षेत्रज पुत्रका आगमन कैसे हो सकता है? तथा अध्यूढको हम किस प्रकार समय - भेदन करके पुत्र समझें? ॥ १४ ॥
भीष्म उवाच
आत्मजं पुत्रमुत्पाद्य यस्त्यजेत् कारणान्तरे ।
न तत्र कारणं रेतः स क्षेत्रस्वामिनो भवेत् ॥ १५ ॥
भीष्मजीने कहा – बेटा! जो लोग अपने वीर्यसे पुत्र उत्पन्न करके अन्यान्य कारणोंसे उसका परित्याग कर देते हैं, उनका उसपर केवल वीर्यस्थापनके कारण अधिकार नहीं रह जाता । वह पुत्र उस क्षेत्रके स्वामीका हो जाता है ॥ १५ ॥
पुत्रकामो हि पुत्रार्थे यां वृणीते विशाम्पते ।
क्षेत्रजं तु प्रमाणं स्यान्न वै तत्रात्मजः सुतः ॥ १६ ॥
प्रजानाथ! पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष पुत्रके लिये ही जिस गर्भवती कन्याको भार्यारूपसे ग्रहण करता है, उसका क्षेत्रज पुत्र उस विवाह करनेवाले पतिका ही माना जाता है । वहाँ गर्भ - स्थापन करनेवालेका अधिकार नहीं रह जाता है ॥ १६ ॥
पृष्ठ 504
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्यत्र क्षेत्रजः पुत्रो लक्ष्यते भरतर्षभ ।
न ह्यात्मा शक्यते हन्तुं दृष्टान्तोपगतो ह्यसौ ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! दूसरेके क्षेत्रमें उत्पन्न हुआ पुत्र विभिन्न लक्षणोंसे लक्षित हो जाता है कि किसका पुत्र है । कोई भी अपनी असलियतको छिपा नहीं सकता, वह स्वतः प्रत्यक्ष हो जाती है ॥ १७ ॥
क्वचिच्च कृतकः पुत्रः संग्रहादेव लक्ष्यते ।
न तत्र रेतः क्षेत्रं वा यत्र लक्ष्येत भारत ॥ १८ ॥
भरतनन्दन! कहीं - कहीं कृत्रिम पुत्र भी देखा जाता है । वह ग्रहण करने या अपना मान लेने मात्रसे ही अपना हो जाता है । वहाँ वीर्य या क्षेत्र कोई भी उसके पुत्रत्व - निश्चयमें कारण होता दिखायी नहीं देता ॥ युधिष्ठिर उवाच
कीदृशः कृतकः पुत्रः संग्रहादेव लक्ष्यते ।
शुक्रं क्षेत्रं प्रमाणं वा यत्र लक्ष्यं न भारत ॥ १ ९ ।
युधिष्ठिरने पूछा — भारत! जहाँ वीर्य या क्षेत्र पुत्रत्वके निश्चयमें प्रमाण नहीं देखा जाता, जो संग्रह करने मात्रसे ही अपने पुत्रके रूपमें दिखायी देने लगता है वह कृत्रिम पुत्र कैसा होता है? ॥ १ ९ ॥ भीष्म उवाच
मातापितृभ्यां यस्त्यक्तः पथि यस्तं प्रकल्पयेत् ।
न चास्य मातापितरौ ज्ञायेतां स हि कृत्रिमः ॥ २० ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! माता- पिताने जिसे रास्तेपर त्याग दिया हो और पता लगानेपर भी जिसके माता - पिताका ज्ञान न हो सके, उस बालकका जो पालन करता है, उसीका वह कृत्रिम पुत्र माना जाता है ॥ २० ॥
अस्वामिकस्य स्वामित्वं यस्मिन् सम्प्रति लक्ष्यते ।
यो वर्णः पोषयेत् तं च तद्वर्णस्तस्य जायते ॥ २१ ॥
वर्तमान समयमें जो उस अनाथ बच्चेका स्वामी दिखायी देता है और उसका पालन-पोषण करता है, उसका जो वर्ण है, वही उस बच्चेका भी वर्ण हो जाता है ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथमस्य प्रयोक्तव्यः संस्कारः कस्य वा कथम् ।
देया कन्या कथं चेति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! ऐसे बालकका संस्कार कैसे और किस जातिके अनुसार करना चाहिये? तथा वास्तवमें वह किस वर्णका है, यह कैसे जाना जाय? एवं किस तरह
पृष्ठ 505
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
और किस जातिकी कन्याके साथ उसका विवाह करना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
आत्मवत् तस्य कुर्वीत संस्कारं स्वामिवत् तथा ।
त्यक्तो मातापितृभ्यां यः सवर्णं प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥
भीष्मजीने कहा- बेटा! जिसको माता-पिताने त्याग दिया है, वह अपने स्वामी ( पालक ) पिताके वर्णको प्राप्त होता है । इसलिये उसके पालन करनेवालेको चाहिये कि वह अपने ही वर्णके अनुसार उसका संस्कार करे ॥ २३ ॥
तद्गोत्रबन्धुजं तस्य कुर्यात् संस्कारमच्युत ।
अथ देया तु कन्या स्यात् तद्वर्णस्य युधिष्ठिर ॥ २४ ॥
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! पालक पिताके सगोत्र बन्धुओंका जैसा संस्कार होता हो वैसा ही उसका भी करना चाहिये, तथा उसी वर्णकी कन्याके साथ उसका विवाह भी कर देना चाहिये ॥ २४ ॥
संस्कर्तुं वर्णगोत्रं च मातृवर्णविनिश्चये ।
कानीनाध्यूढजौ वापि विज्ञेयौ पुत्र किल्बिषौ ॥ २५ ॥
बेटा! यदि उसकी माताके वर्ण और गोत्रका निश्चय हो जाय तो उस बालकका संस्कार करनेके लिये माताके ही वर्ण और गोत्रको ग्रहण करना चाहिये । कानीन और अध्यूढज - ये दोनों प्रकारके पुत्र निकृष्ट श्रेणीके ही समझे जाने योग्य हैं ॥ २५ ॥
तावपि स्वाविव सुतौ संस्कार्याविति निश्चयः ।
क्षेत्रजो वाप्यपसदो येऽध्यूढास्तेषु चाप्युत ॥ २६ ॥
आत्मवद् वै प्रयुञ्जीरन् संस्कारान् ब्राह्मणादयः ।
धर्मशास्त्रेषु वर्णानां निश्चयोऽयं प्रदृश्यते ॥ २७ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २८ ॥
इन दोनों प्रकारके पुत्रोंका भी अपने ही समान संस्कार करे – ऐसा शास्त्रका निश्चय है । ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वे क्षेत्रज, अपसद तथा अध्यूढ – इन सभी प्रकारके पुत्रोंका अपने ही समान संस्कार करें । वर्णोंके संस्कारके सम्बन्धमें धर्मशास्त्रोंका ऐसा ही निश्चय देखा जाता है । इस प्रकार मैंने ये सारी बातें तुम्हे बतायीं । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २६–२८ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे पुत्रप्रतिनिधिकथने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें पुत्रप्रतिनिधिकथनविषयक उनचासवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४९ ॥
पृष्ठ 506
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 507
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना युधिष्ठिर उवाच
दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह ।
महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! किसीको देखने और उसके साथ रहनेपर कैसा स्नेह होता है? तथा गौओंका माहात्म्य क्या है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते ।
नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – महातेजस्वी नरेश! इस विषयमें मैं तुमसे महर्षि च्यवन और नहुषके संवादरूप प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा ॥ २ ॥
पुरा महर्षिश्च्यवनो भार्गवो भरतर्षभ ।
उदवासकृतारम्भो बभूव स महाव्रतः ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनने महान् व्रतका आश्रय ले जलके भीतर रहना आरम्भ किया ॥ ३ ॥
निहत्य मानं क्रोधं च प्रहर्षं शोकमेव च ।
वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रतः ॥ ४ ॥
वे अभिमान, क्रोध, हर्ष और शोकका परित्याग करके दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए बारह वर्षों - तक जलके भीतर रहे ॥ ॥
आदधत् सर्वभूतेषु विश्रम्भं परमं शुभम् ।
जलेचरेषु सर्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभुः ॥ ५ ॥
शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके समान उन शक्तिशाली मुनिने सम्पूर्ण प्राणियों, विशेषतः सारे जलचर जीवोंपर अपना परम मंगलकारी पूर्ण विश्वास जमा लिया था ॥ ५ ॥
स्थाणुभूतः शुचिर्भूत्वा दैवतेभ्यः प्रणम्य च ।
गंगायमुनयोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह ॥ ६ ॥
पृष्ठ 508
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एक समय वे देवताओंको प्रणामकर अत्यन्त पवित्र होकर गंगा- यमुनाके संगममें जलके भीतर प्रविष्ट हुए और वहाँ काष्ठकी भाँति स्थिर भावसे बैठ गये ॥ ६ ॥
गंगायमुनयोर्वेगं सुभीमं भीमनिःस्वनम् ।
प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे ॥ ७ ॥
गंगा- यमुनाका वेग बड़ा भयंकर था । उससे भीषण गर्जना हो रही थी । वह वेग वायुवेगकी भाँति दुःसह था तो भी वे मुनि अपने मस्तकपर उसका आघात सहने लगे ॥ ७ ॥
गंगा च यमुना चैव सरितश्च सरांसि च ।
प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन् ॥ ८ ॥
परंतु गंगा- यमुना आदि नदियाँ और सरोवर ऋषिकी केवल परिक्रमा करते थे, उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाते थे ॥ ८ ॥
अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनिः ।
ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद् भरतर्षभ ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे बुद्धिमान् महामुनि कभी पानीमें काठकी भाँति सो जाते और कभी उसके ऊपर खड़े हो जाते थे ॥ ९ ॥
जलौकसां स सत्त्वानां बभूव प्रियदर्शनः उपाजिघ्रन्त च तदा तस्योष्ठं हृष्टमानसाः ॥ १० ॥
वे जलचर जीवोंके बड़े प्रिय हो गये थे । जल-जन्तु प्रसन्नचित्त होकर उनका ओठ सूँघा करते थे ॥
तत्र तस्यासतः कालः समतीतोऽभवन्महान् ।
ततः कदाचित् समये कस्मिंश्चिन्मत्स्यजीविनः ॥ ११ ॥
तं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते ।
निषादा बहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चयाः ॥ १२ ॥
महातेजस्वी नरेश! इस तरह उन्हें पानीमें रहते बहुत दिन बीत गये । तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले बहुत से मल्लाह मछली पकड़नेका निश्चय करके जाल हाथमें लिये हुए उस स्थानपर आये ॥
व्यायता बलिनः शूराः सलिलेष्वनिवर्तिनः ।
अभ्याययुश्च तं देशं निश्चिता जालकर्मणि ॥ १३ ॥
वे मल्लाह बड़े परिश्रमी, बलवान्, शौर्यसम्पन्न और पानीसे कभी पीछे न हटनेवाले थे ।
वे जाल बिछानेका दृढ़ निश्चय करके उस स्थानपर आये थे ॥ १३ ॥
जालं ते योजयामासुर्निःशेषेण जनाधिप ।
मत्स्योदकं समासाद्य तदा भरतसत्तम ॥ १४ ॥
पृष्ठ 509
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भरतवंशशिरोमणि नरेश! उस समय जहाँ मछलियाँ रहती थीं, उतने गहरे जलमें जाकर उन्होंने अपने जालको पूर्णरूपसे फैला दिया ॥ १४ ॥
ततस्ते बहुभिर्योगैः कैवर्ता मत्स्यकाङ्क्षिणः ।
गंगायमुनयोर्वारि जालैरभ्यकिरंस्ततः ॥ १५ ॥
मछली प्राप्त करनेकी इच्छावाले केवटोंने बहुत से उपाय करके गंगा- यमुनाके जलको जालोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १५ ॥
जालं सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा ।
विस्तारायामसम्पन्नं यत् तत्र सलिलेऽक्षिपन् ॥ १६ ॥
ततस्ते सुमहच्चैव बलवच्च सुवर्तितम् ।
अवतीर्य ततः सर्वे जालं चकृषिरे तदा ॥ १७ ॥
अभीतरूपाः संहृष्टा अन्योन्यवशवर्तिनः ।
बबन्धुस्तत्र मत्स्यांश्च तथान्यान् जलचारिणः ॥ १८ ॥
उनका वह जाल नये सूतका बना हुआ और विशाल था तथा उसकी लंबाई- चौड़ाई भी बहुत थी एवं वह अच्छी तरहसे बनाया हुआ और मजबूत था । उसीको उन्होंने वहाँ जलपर बिछाया था । थोड़ी देर बाद वे सभी मल्लाह निडर होकर पानीमें उतर गये । वे सभी प्रसन्न और एक - दूसरेके अधीन रहनेवाले थे । उन सबने मिलकर जालको खींचना आरम्भ किया । उस जालमें उन्होंने मछलियोंके साथ ही दूसरे जल- जन्तुओंको भी बाँध लिया था ॥ १६— १८ ॥
तथा मत्स्यैः परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम् ।
आकर्षयन्महाराज जालेनाथ यदृच्छया ॥ १ ९ ॥
महाराज! जाल खींचते समय मल्लाहोंने दैवेच्छासे उस जालके द्वारा मत्स्योंसे घिरे हुए भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनको भी खींच लिया ॥ १ ९ ॥
नदीशैवलदिग्धाङ्गं हरिश्मश्रुजटाधरम् ।
लग्नैः शङ्खनखैर्गात्रे क्रोडैश्चित्रैरिवार्पितम् ॥ २० ॥
उनका सारा शरीर नदीके सेवारसे लिपटा हुआ था । उनकी मूँछ- दाढ़ी और जटाएँ हरे
रंगकी हो गयी थीं और उनके अंगोंमें शंख आदि जलचरोंके नख लगनेसे चित्र बन गया था ।
ऐसा जान पड़ता था मानो उनके अंगोंमें शूकरके विचित्र रोम लग गये हों ॥ २० ॥
तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम् ।
सर्वे प्राञ्जलयो दाशाः शिरोभिः प्रापतन् भुवि ॥ २१ ॥
वेदोंके पारंगत उन विद्वान् महर्षिको जालके साथ खिंचा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़ मस्तक झुका पृथ्वीपर पड़ गये ॥ २१ ॥
परिखेदपरित्रासाज्जालस्याकर्षणेन च ।
मत्स्या बभूवुर्व्यापन्नाः स्थलसंस्पर्शनेन च ॥ २२ ॥
पृष्ठ 510
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स मुनिस्तत् तदा दृष्ट्वा मत्स्यानां कदनं कृतम् ।
बभूव कृपयाविष्टो निःश्वसंश्च पुनः पुनः ॥ २३ ॥
उधर जालके आकर्षणसे अत्यन्त खेद, त्रास और स्थलका संस्पर्श होनेके कारण बहुत - से मत्स्य मर गये । मुनिने जब मत्स्योंका यह संहार देखा, तब उन्हें बड़ी दया आयी और वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे ॥ २२-२३ ॥ निषादा ऊचुः
अज्ञानाद् यत् कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु ।
करवाम प्रियं किं ते तन्नो ब्रूहि महामुने ॥ २४ ॥
यह देख निषाद बोले — महामुने! हमने अनजानमें जो पाप किया है, उसके लिये हमें क्षमा कर दें और हमपर प्रसन्न हों। साथ ही यह भी बतावें कि हमलोग आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें? ॥ २४ ॥
इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्च्यवनोवाक्यमब्रवीत् ।
यो मेऽद्य परमः कामस्तं शृणुध्वं समाहिताः ॥ २५ ॥
मल्लाहोंके ऐसा कहनेपर मछलियोंके बीचमें बैठे हुए महर्षि च्यवनने कहा -'मल्लाहो! इस समय जो मेरी सबसे बड़ी इच्छा है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २५ ॥
प्राणोत्सर्गं विसर्गं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह ।
संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेऽध्युषितानहम् ॥ २६ ॥
' मैं इन मछलियोंके साथ ही अपने प्राणोंका त्याग या रक्षण करूंगा । ये मेरे सहवासी रहे हैं । मैं बहुत दिनोंतक इनके साथ जलमें रह चुका हूँ; अतः मैं इन्हें त्याग नहीं सकता' ॥ २६ ॥