सनातन धर्मलोक ६ — पृष्ठ 391–400

सनातन धर्मलोक ६ · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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७६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७६१ राजाओं के पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रोंकी सन्तति अतिशयित हो गई हो; ( जिनका निवास समुद्रस्थित ( ५६ करोड़ ) हुए हों; - द्वारकापुरीमें था; जो यदुवंशियोंके परस्पर - विनाशके वाद समुद्रमें डूब गई थी ) तो है । जैसे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं । गया है, क्या यह आश्चर्यकी बात नहीं है कि आज संसारकी कितनी प्रभाव- जनसंख्या है? वह मनुस्मृति ( ११३२ ) के अनुसार; तथा शतपथ-में भी ब्राह्मण ( १४ | ४ | २ | ४-५ ) के अनुसार एक युगलकी सन्तान श्री गमन कालकी स्थितियाँ विचित्र हुआ करती है । हैं - यह सोचकर उन हु प्राचीनकालकी वैसी बातोंमें सहसा ही अविश्वास नहीं करना चीर्यता के चाहिये । कुछ उसमें विचार दृष्टिपूर्वक मस्तिष्क भी लगाना नीकरण- चाहिये । एक मूषक -दम्पतीकी सन्तानें प्रतिवर्ष ८०० हो जाती = केवल हैं । और फिर पुराणोंमें सर्वत्र सन्तानकी अधिकता नहीं दिखलाई बी गई है, किन्तुं अपवाद - रूपसे । सामान्य शास्त्र हो सकते हैं - यह स्वाभाविक के अपवाद प्राप्त है । जैसे सामान्यतया विहित करती दैनिक सन्ध्या - वन्दन सूतक - आदि शौच में अपवादवश यदुवंशी जाता है, प्रतिग्रह क्षत्रियको सामान्यतया - इट निषिद्ध है, तथापि देवगणणे ' वैवाहिक - कन्याऽऽदानरूप प्रतिग्रहको अपवादरूपसे ' विद्या- करता है, वैसे यहां पर वह भी ग्रहण भूतो भी समझना चाहिये । तब प्रतिपक्षी न हैं । लोग प्रच्छंन्नवौद्ध न बनकर ‘ तस्मात् तिष्ठेत्तु मतिमान् श्रागमे, न तु हेतुषु ' ( सुश्रुतसं. सूत्रस्थान ४० २१ ) ' शब्द - प्रमाणका वयम् च श्रीर - वत् शब्द आह तदस्माकं प्रमाणम् ' ( पस्पशान्हिक, हो जाती- भाष्यके बचनानुसार ) इस महा-आगमका भी आदर करना सीखें, नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection पौराणिक बहु - सन्तान ७६३ तो उनसे प्रमाणित अन्य अदृष्ट वातें भी अप्रमाण हो जाएंगी; पर यह अनिष्ट होगा । अतः उन्हें इस विवेचना पर विचार करनेका कष्ट करना चाहिये - यह निवेदन कर हम यहां रुकते हैं? अब आगे पौराणिक कई शङ्कास्पद बातों पर प्रत्यक्ष घटनाएं, जिनका सनातनधर्म - प्रेमी भक्त -श्रीरामशरणदासजीने समाचार-पत्रोंसे संकलन किया है । — उन्हें हमने यहां देना था; पर स्था-नाभाववश हम उन्हें यहां न देकर सम्भवतः परिशिष्ट में देंगे । अब कुछ वेदपुराण - मूलक सैद्धान्तिक चर्चा भी अवसर प्राप्त है; हम उसमें वर्ण - व्यवस्थाके मूलभूत ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' मन्त्रमें प्रतिपक्षियों द्वारा किये जाते हुए तकको उपक्षिप्त करके उनका समाधान करेंगे, पाठकगण उसमें विशेष ध्यान दें-जो कई प्रूफकी त्रुटियां रह गई हैं, उनमें विशेषका निर्देश किया जाता है । पृ. ४७० पं ० ५ ' इसमें ए. बी. सी. डी. ई. श्रादि विटामिन पर्याप्त मात्रामें हैं । भैंस के दूधमें विटामिन बहुत कम है, जो है भी, वह कैरोटिन के प्रभावसे सहज ही नष्ट हो जाता है ' । पृ. ४८५ पं ० १४ . ' भगवद्गीता ' । पृ. ४६० पं ० २० ' जीणि ' । पृ. ६१६ पं ० १७ ' सदेवा-पद्गतों राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् ' ( पञ्चतन्त्र १।१२८ ) क्या यहां भोग भी वादीका मन चाहा है? ' । पृ. ६३५ पं ० २१ ( ४/२/५ ) | पृ. ६५२ पं ० १ ' अङ्ग - देवताओं द्वारा । Gujarat. An eGangotri Initiative

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सैद्धान्तिक चर्चा ( १७ ) ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ( ग ) ( वर्ण - व्यवस्था पर विचार ) [ १ ] ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' ( यजुः ३१ ( ११ ) इस मन्त्रके अर्थ पर प्रतिपक्षकी ओरसे बहुत - कुछ ऊहापोह, तर्क - वितर्क किये जाते हैं । मुखादिसे ब्राह्मणादिकी उत्पत्तिका अर्थ इतना दृढ और जन्मसिद्ध - वर्ण - व्यवस्थाका ऐसा पोषक है कि इस अर्थको गिरानेकेलिए एड़ीसे लेकर चोटीतकका पसीना बहाया जाता है । हम यहाँ उन * तकको उद्धृत करके साथ - साथ उनपर विचार रखते हैं । १ तर्क — ' वेद पर किसी विशेष वर्णका अधिकार नियत नहीं है । जब सर्वजनीन - ईश्वर पर किसी वर्ण - विशेषका अधिकार नियत नहीं, तब वेद पर वह प्रतिबन्ध कैसे हो सकता है? वेदमें कहीं भी अपने विशेष अधिकारी नहीं बतलाये गये । ' ( ब्रह्मसूत्रकी एक हिन्दीभाप्य भूमिका में ) १ विचार - वेदने स्वयं अपने लिए अधिकारी द्विज ही नियत किये हैं — ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अथर्व: १६/७१ | १ ), ' अयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ.सं. ११४६ ५ ) इत्यादि, ( इस * हम इसपर कुछ तर्कोंका समाधान ' आलोक ' के ४ पुष्पमें ( क - ख ) दो निबन्धों में कर चुके । पाठक उसे ६ ) में मँगा लें, अब अन्य तर्क तथा उनके प्रत्युत्तर दिये जाते हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदका अधिकार ७६६ BEY विषयमें इसी पुष्पके पृ. १७६ - २०६ देखें ) तब वेद द्विजोंकेलिए सूर्याद अनुप द्दी नियमित होनेसे नियताधिकार ही हैं । ईश्वर पर किसी वर्ण-' साधा विशेषका अधिकार नियत न होनेपर भी ईश्वरकी वैदिक वेदकेि उपासना, सन्ध्या, मूर्तिपूजा आदि पर भी द्विजोंका ही अधिकार अत्यन्त है । इसीलिए सृष्ट्यादिजात, वादिप्रतिवादिमान्य- श्रीमनुजीने श्रपठित ‘ न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रवद् त्रैवर्णिक बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मण: ' ( २/१०३ ) इस सर्वमान्य - पद्य अध्यय सन्ध्योपासनाको द्विजकर्म तथा उसे न करनेवाले द्विजको शूद्रवत् -'व कहा है । इससे वैदिक - कर्म तथा वेदमें शूद्रका अनधिकार ही अपना सिद्ध होता है, जिसे ' शूद्र ेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते ' मी अप ( २।१७२ ) यह मनुका सर्वमान्य पद्य स्पष्ट कर रहा है । परिचय २ पूर्व- - जब भगवान्के सूर्य, चन्द्र, तारे, पृथिवी, जल, कर्मण्य अग्नि, वायु, बन, पर्वत, पशु, अन्न आदि पदार्थ मनुष्यमात्रके- सिद्धिं वि लिए बनाये गये हैं; तब भगवान् के ज्ञान वेद ही स्त्री - शूद्रोंके लिए | सदोष हो निषिद्ध कैसे किये जा सकते हैं? क्या वे मनुष्य नहीं? क्या ईश्वर धर्म कौन्त पक्षपाती है कि - वेदोंके पढ़ने - सुननेका शूद्रोंकेलिए निषेध और विरिवाव द्विजों केलिए विधि करे? जो परमेश्वरका अभिप्राय शुद्रादिके ( ४७ ) इस पढ़ाने - सुनानेका न होता; तो इनके शरीरमें वाक् और श्रोत्र दिया है । इन्द्रिय क्यों रचता? इससे स्पष्ट है कि - ब्राह्मण - शूद्रादि सभी ब्राह्मणं -वेदके अधिकारी हैं ( स्वा. द. आदि सुधारक ) विज्ञानाम २ उत्तर — इसका उत्तर ‘ आलोक ' ३ य पुष्प ४०-४१ पृष्ठमै एकज-दिया जा चुका है, पाठक वहीं देखें । कुछ यहाँ भी लिखते हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative

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७६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७६५ सूर्यादिके प्रकाशको पठित - श्रपठित, पापी - पुण्यात्मा, उपनीत-जोंके लिए अनुपनीत सभी प्राप्त कर सकते हैं । जैसे कि वेदमें ही कहा है-सी वर्ण- ' साधारणः सूर्यो मानुषाणाम् ' ( ऋ. ७१६३ | १ ); परन्तु वेदमें वैदिक- वेदकेलिए कहीं सर्वसाधारणता नहीं बताई गई । वेदको तो अधिकार अत्यन्त उच्चशिक्षा - प्राप्त उपनीत पुरुष ही ग्रहण कर सकता हैं, मनुजीने अपठित एवं अनुपनीत पुरुष नहीं । पढ़ने में केवल आदिम शूद्रवद् त्रैवर्णिक पुरुष ही अधिकृत हैं, शूद्रादिका तो सेबासे अतिरिक्त न्य - पद्य में । अध्ययन किसी भी शास्त्रसे आदिष्ट नहीं । शास्त्रों में कहा गया शूद्रवत् -'वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ' ( मनु. १०/६७ ) चकार ही ' अपना धर्म अन्यके धर्मसे हीन भी श्रेष्ठ है, दूसरेका उन्नत धर्म जायते ' भी अपनेलिए ठीक नहीं ' । यही बात गीता में भी कही है-' परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ' ( १८ | ४४ ) ' स्वे स्वे न्वी, जल, कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ' ( ४५ ) स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य मात्र के- । सिद्धि विन्दति मानवः ' ( ४६ ) । बल्कि भगवान् ने अपने कर्मको द्रोंके लिए | सदोष होने पर भी उसके त्यागकेलिए निषेध किया है- ' सहजं या ईश्वर और कौन्तेय! सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेना-शूद्रादिके | रिवावृताः ' ( ४८ ) ' स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाप्नोति किल्विषम् ' और त्र ( ( ४७ ) इसलिए वेद में भी शूद्रके लिए कृच्छ्रकर्म ( सेवा ) का आदेश दि सभी दिया है । वेदका मुख्यतया अधिकार ब्राह्मणको आदिष्ट है - ‘ ब्रह्मणे " तपसे ( कृच्छ्रकर्मणे ) शुद्र " ( यजुः ३० ५ ) । ' वेदमाता ४१ पृष्ठमें देवानाम् ' इस पूर्व - कहे ं मन्त्रसे भी द्विजको ही वेदका अधिकार लखते हैं । एकज़ - शुद्रको नहीं । सौ उक्त तर्क, आगम ( वेदादिशास्त्र ) से CC - 0. Ankur Joshi वेदका अधिकार ७६७ Collection Gujarat. विरुद्ध होनेसे न्यायाभास ही है ( न्याय. १ । १११ ) । तब वादी ' असूयकायानृजवेऽयताय ' ( निरुक्त २२४ | १ ) वेदके सिद्धान्त के तर्क - द्वारा असूयक होनेसे ' योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विजः । स साधुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ' ( २।११ ) इस मनु - प्रोक्त व्यवहारके पात्र हैं । सूर्य के प्रकाशका उपयोग भी सभीको समान रूपसे नहीं मिलता । जन्मका अन्धा उससे देखनेका काम नहीं कर सकता । उल्लू तो उसे आजन्म प्राप्त ही नहीं कर सकता | हिमाच्छन्न-प्रदेशका रहनेवाला उसके तापको प्राप्त नहीं कर सकता । कैद-खानेकी कालकोठरीमें पड़ा हुआ कैदी भी उसे प्राप्त नहीं कर सकता । वेदमें भी ' यो दासं वर्णमघरं गुहाकः ' ( अथर्व. २० | ३४ | ४ ) ' न यो ररे श्रर्थं नाम दस्यवे ' ( ऋ. १०४६३ ) इत्यादि-मन्त्रोंसे पूर्वजन्मके अपराधी शुद्रको गुहा ( कालकोठरी ) में रखकर उसे वेद - सूर्यके प्रकाशसे रहित एवं निम्न रखना चाहता है । सो यदि मुख्याध्यापक निम्न श्रेणीको स्वयं न पढ़ाकर उच्च-श्रेणीवाले छात्रोंको ही उसके शिक्षणार्थ प्रेरित करता है, वैसे ही वेद भी शूद्रोंकेलिए स्वयं शिक्षा न देकर अपनी शिक्षा द्विजों-द्वारा पुराणोंके माध्यम से दिलवाता है, तब इसमें पक्षपातकी कोई बात नहीं । परमात्माने एक कश्मीर - देश भी बनाया है, मारवाड़ भी । एक स्थानमें सघन - छाया है, जल प्रचुर मात्रा में है, दूसरे स्थान इससे विरुद्धता है । कहीं अत्यन्त - सर्दी है, तो दूसरे स्थान An eGangotri Initiative

पृष्ठ 394

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७६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) भीषण गर्मी । तो जैसे यहाँ परमात्माका पक्षपात नहीं होता, वैसे प्रकृतमें भी समझना चाहिये । जब देश, काल, ऋतु तथा सृष्टिमें सर्वत्र पूर्वजन्म - कर्मानुसार विषमता है; कोई किसी वस्तुको प्राप्त करता है, दूसरा नहीं । किसी देशमें पहाड़ नहीं दिये, इसमें कारण पूर्व - जन्मके कर्मोंकी विषमता ही है । इस प्रकार पूर्व - जन्मकी निकृष्ट - कर्मतावश शूद्रको भी वेदाधिकारी नहीं किया गया है । अथवा यदि द्विज - शूद्रादिको सूर्यादिका प्रकाश समानरूपसे प्राप्त होना भी माना जावे; तो क्या इससे उनमें सभी व्यवहारों-की समता हो जावेगी? तब क्या सवर्णाविवाह - पक्षपाती वादी ( स्वा.द. ) शुद्रको ब्राह्मण - कन्या के साथ विवाहाधिकार देकर अपने सिद्धान्तका भङ्ग करेंगे, क्योंकि दोनोंको सूर्यका प्रकाश समानरूपसे प्राप्त होता है? बहिन और पत्नी भी सूर्य का समान प्रकाश पाती हैं, तब क्या उनसे पुरुषका समान विवाह सम्बन्ध हो जावेगा? सूर्यादिका प्रकाश पशु - पक्षियोंके लिए भी है, पर वेद पशु - पक्षियोंकेलिए नहीं हैं । तव मनुष्यमात्रको वेदाधिकार -देनेमें सूर्यादि दृष्टान्त विषम, निर्बल एवं अकिञ्चित्कर ही सिद्ध हुआ । जोकि कहा जाता है कि- फिर शूद्रादिके वाक्, श्रोत्रादि क्यों बनाये? इस पर जानना चाहिये कि कई जन्मसे ही पागल होते हैं, विवाहके योग्य नहीं होते, तव परमात्मा उनकी इन्द्रिय एवं शुक्रादि क्यों बनाता है? वस्तुतः जैसे उनकी इन इन्द्रियोंका CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राहाणोस्य मुखमासीत् ( ग ) ०७० ७६६ अन्य कार्य के लिए उपयोग होता है, वैसे ही शुद्रके वाकू श्रोत्रादिकी भी वेदसे भिन्न पुराणादि - वचन कहने, - सुनने में चरितार्थता है । क्या वाक् - श्रोत्रादि इन्द्रियोंवाले भी सभी नही मनुष्य वेदके विद्वान् हुआ करते हैं? वस्तुतः एतदादिक - तर्क यह ही हैं, अधिकार - अनधिकारकी वात पृथक् हुआ करती है । ' लो शूद्रादि - शरीर वेदाधिकारमें प्रतिबन्धक हुआ करता है, उसमें जा ब्राह्मणादि द्विज - पुरुपही अधिकृत होते हैं । इसमें प्रबल प्रमाण वह बादियोंका चार वेदोंको प्राप्त करनेवाले चार ऋषियों (? ) में वस एक भी स्त्री, शूद्र, अन्त्यज आदिका न रखना ही है । इस जै विषयमें तथा – ‘ यथेमां वाचं ' मन्त्रके विषयमें विशिष्ट - ज्ञानार्थ प्र ' आलोक ' का तृतीयपुष्प देखना चाहिये । स ३ तर्क — ' ब्राह्मणत्वादि सभी, व्यवहार की सुगमता के लिए स कल्पित किये जाते हैं, वास्तविक नहीं । ' ३ विचार - इस प्रकार तो जगत् भी ' कल्पित ' है, वास्तविक प्र नहीं । उसे भी ' व्यावहारिक ' ही माना जाता है । सृष्टि भी कल्पित है, व्यावहारिक है, अद्वैत ब्रह्मके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । ४ पूर्वपक्ष — ' यह कल्पितता वेदमें भी कही गई है - ' यत्पुरुपं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू-पादा उच्येते ' ( यजु. ३१।१० ) ' जिस पुरुष - विराट्का विद्वानोंने प्रतिपादन किया, उसको कितने प्रकारसे कल्पित किया? यह प्रश्न है । ' क rat, An eGangotri Initiative ४६ स ० ध ०

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७६६ ४ उत्तरपक्ष — ‘ व्यकल्पयन् ' स्थित ' विकल्प ' का अर्थ ‘ कल्पना ’ चाकू, नहीं हुआ करता, किन्तु ' भिन्नतासे निर्माण ' हुआ करता है, नहीं तो ‘ सूर्या - चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्व मकल्पयत् ' ( ऋ. १०।१६० । ३ ) ननुष्य यहां सूर्य - चन्द्रकी भी कल्पना हो जायगी, वास्तविकता नहीं । विभास ' ' लोकान् श्राकल्पयन् ' ( ३१।१३ ) यहां भी लोकोंकी कल्पना हो - है । जायगी । जब यहां ‘ अकल्पयन् ' का अर्थ भी ' कल्पना ' नहीं, तब उसमें बहू ‘ व्यकल्पयन्’का अर्थं भला ' कल्पना ' कैसे हो सकता है? माण वस्तुतः यहां पर ‘ क्लृपू ' धातुका अर्थ निर्माण अर्थात् ' सृष्टि ' है, ? ) में जैसे कि ' पतिंवरा क्लृप्त- ( कृत - सृष्ट ) विवाहवेपा ' ( रघुवंश ६।१० ) । इस प्रकृत अर्थ यह हुआ कि वह पुरुष अङ्गादिरूपसे कितने प्रकार सृष्ट हुआ? अन्तिम तात्पर्य यह प्रतिफलित हुआ कि उस सहस्रशीर्षा, सहस्रपात् पुरुषके मुख्य अङ्गोंकी सृष्टि क्या थी? लिए ५ पू. – ' उक्त - प्रश्नका यह तात्पर्य है – ' अस्य सुमेधोभिः प्रकल्पितस्य प्रथमं प्रतिबोधितस्य पुरुषस्य सर्वगस्य मुखं मुखमिव (? ) विक किमासीत? बाहू - भुजौ किमास्ताम्? ऊरू- सक्थिनी जानुनोरुप-भी रतनौ भागौ कौ आस्ताम्? पादौ चरणौ चलन - साधनभूतौ किमुच्येते - कावुच्येते? ' यह प्रश्नका स्वरूप है । जगदात्मा परमात्मा के मुख आदि अवयव नहीं होते । जिनके होते हैं, पुरुषं उनसे पूछा नहीं जाता कि ' आपका मुख वा वाहु क्या है? ' न ५ उ. — जब वह जगदात्मा है और जगत् के जीवोंके मुख आदि अवयव हैं, तब सर्वशक्तिमान् उस प्रभुके भी मुख आदि यह क्यों न हों? ' सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ' ( ३.१।१ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ग ) ७७१ यहां उस जगदात्माके सिर, यांखें, तथा पांव आदि अङ्ग क्या कहे गये? हां, वे अङ्ग लौकिक न होकर अलौकिक नहीं दिव्य हो सकते हैं । यहां परमात्मा - लोकोत्तर, से पूछा भी नहीं गया कि-' आपके अङ्ग क्या हैं? ' किन्तु उसकेलिए विवेचना की गई है । दिव्य होनेसे उसके अङ्गोंके कार्यके विषयके प्रष्टव्य होनेसे सरणिसे प्रश्न किया हैं कि उसका मुख क्या था? अर्थात् इस मुखका क्या बना? भाव यह है कि उसके मुख श्रादिसे. क्या उत्पन्न हुआ? ' पद्भयां शूद्रो श्रजायत ', ' चन्द्रमा मनसो जात: ' इन मन्त्रांशों की निकटता एवं साक्षीसे उक्त प्रश्न भी इसी अभिप्रायसे गर्भित हैं । ६ पू. –'सबका मुख ही मुख होता है, बाहु ही बाहु होते हैं, ऊरु ही ऊरु और पांव ही पांव होते हैं । इस प्रकारका प्रश्न तभी हो सकता है, जब दूसरेके स्थानमें दूसरेकी कल्पना करनी हो । ' ६ उ. - ऐसा नहीं । उक्त प्रश्नका शाब्दिक दृष्टिसे विचार नहीं करना है, किन्तु रहस्य- दृष्टिसे विचार करना है । वह रहस्य उसके उत्तरसे जाना जा सकता है । तब उस प्रश्नका प्रष्टव्यके विशेष-स्वरूप अर्थात् विशेष - कार्य की जिज्ञासामें पर्यवसान हुआ है, तभी तो उसके उत्तर में भी प्रश्न- गत कारणका कार्योत्पत्तिके द्वारा स्वरूप विशद् किया गया है । यहां कोई दूसरेके स्थानमें दूसरे की कल्पना नहीं । ७ पू. - ' विराट् निरवयव है, अतः उसके अवयव भी Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) ७७२ कल्पित हैं । ' अङ्ग कल्पित नहीं, ७ उ. — ' पुरुषसूक्त ' के सहस्रात्मा पुरुषके दिव्य होते हैं - यह हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । सबके किन्तु कर्ता कोई दूसरा होः यह श्रश्रद्धेय है । कर्ता पुरुषके अङ्गोंका कल्पित होंगे, यदि वे अङ्ग कल्पित होंगे भी; तो उसी स्वयंभूसे ऐरे गैरेसे कल्पित नहीं होंगे । ८ पू. - “ इस प्रकार निरवयव भी विराट्का मुख किसे कल्पित गया था? बाहुरूप किसे कहा गया था? ऊरु किसे किया गया था? पाँवोंसे किसे गृहीत किया गया था यह बनाया निरवयव पुरुषकी अवयव - कल्पनाके प्रश्न हैं । " ८ उ ० — कभी नहीं । यहाँ वादीने चतुरतासे ' मुख कल्पित किया गया, बाहुरूप कहा गया, ऊरू बनाया गया, पाँवोंसे गृहीत किया गया ' यह चार भिन्न - भिन्न क्रियाएँ खेच्छासे कल्पित करके अपने पक्षको ' सिकता - भित्ति ' बना दिया है । यदि ' पुरुष-सूक्त ' का पुरुष वेदको निरवयव इष्ट होता, तो उसे सहस्रशीर्षा, सहस्रपात् आदि आरम्भमें न कहा जाता, किन्तु तर्ककर्ताके अनुसार ' कायद्दीन ' कहा जाता । अवयव - हीनके अवयवोंकी कल्पनाका प्रश्न ही विप्रतिषिद्ध है 1 । यहाँ तो उसके दिव्य - अङ्गोंके कार्यके पूछनेकी इच्छा है, कल्पना नहीं । ६ पू ० - ' कोई मुखादि- अवयववाले देवदत्तके पास जाकर नहीं पूछना चाहता कि ' तेरा मुख क्या है? ' वह तो बिना पूछे भी जान लेता है कि यह इसका मुख है । अतः मुखादि - हीनकी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat ग्राहाणोस्य मुखमासीत् ( ग ) 008 ७७३ ही मुखादि - कल्पना - विषयक यह प्रश्न है । " ६ उ ० — यहाँ भी तो परमपुरुष से नहीं पूछा गया कि ' तुम्हारा अर्थ म मुख क्या वा कौन है, ' और फिर यहाँ देवदत्त - जैसे साधारण है । एवं ज्ञेय पुरुषका मुख भी नहीं पूछा गया कि उसका पूछना चल व्यर्थ होता, यहाँ तो असाधारण एवम् अज्ञेय सहस्रशीर्षा पुरुषके प्रकर दिव्य - अङ्गोंके कार्य - जिज्ञासार्थ इस शैली से प्रश्न है । यहाँपर ' अस्य सहस्रशीर्षा पुरुषकी अज्ञेयता तथा असाधारणता होनेसे, बिना- उत्पन्न प्रश्न तथा बिना उसका उत्तर सुने किसीको उस बातका ज्ञान जैसे नहीं हो सकता । अतः यहाँ वेदने इस तत्त्वज्ञानकेलिए इन ' ब्राह्म मन्त्रोंको द्वार बनाया । मुखादि - हीनकी मुख - आदिके विषय में C विवेचना क्या ‘ यावज्जीवमहं मौनी ' - न्यायकी पोषक नहीं? भ्यां १० पू ० – “ अग्रिम मन्त्र उत्तर देता है - ' ब्राह्मणोऽस्य अजा मुखमासीद् ' इत्यादि । ' मुखं किमासीत् ' इस प्रथम प्रश्नका उत्तर प्रकार है - ब्राह्मणोऽस्य ' मुखमासीत् ' । ' अस्य बाहू किमास्ताम्? ' इस सहस्र द्वितीय प्रश्नका उत्तर है - ' बाहू राजन्यः कृतः ' । ' ऊरू किमस्य ' पञ्चम इस तृतीय - प्रश्नका उत्तर है - ' ऊरू तदस्य यद् वैश्यः । ' पादौ ' श्रायु अस्य किमुच्येते ' इस अन्तिम - प्रश्नका उत्तर है - ' पद्भयां ं शूद्रो बाहू अजायत ’ । यहाँ ‘ पद्भ्याम् ' में पञ्चमी प्रथमा- अर्थ में है, क्योंकि अभव प्रकरण ऐसा है, और प्रश्न भी वैसा है । पूर्व मन्त्रमें शूद्रकी प्रश्न उत्पत्तिविषयक प्रश्न नहीं कि ' पाँबसे क्या पैदा हुआ '? ' ' पादौ प्र किमुक्तौ ' इतना ही प्रश्न है, उसका ' शूद्रः पादौ उक्तौ ' इतना ही मुख उत्तर होना चाहिए " । मुखम An eGangotri Initiative

पृष्ठ 397

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ०७३ 008 १० उ ० — प्रकरणका उपसंहारसे ही पता चलता है । संदिग्ध-' तुम्हारा अर्थमैं भी मीमांसानुसार उपसंहारसे ही अर्थनिश्चय हो पाता साधारण है । तब यहाँ ' पद्भ्यां शुद्रो अजायत ' इस उपसंहारसे ही पता का चल रहा है कि यहाँ पञ्चमीका तथा उत्पत्तिका प्रकरण है, सृष्टि-पूछना - पुरुषके प्रकरण तो स्पष्ट है ही । तब पूर्वके पदोंमें भी यही योजना हुई, यहाँपर ' अस्य – सहस्रशीर्षपुरुषस्य मुखं - मुखाद् ब्राह्मण श्रासीद्— , विना- उत्पन्नः ’ । ‘ नाभ्या श्रासीद् अन्तरिक्षं शीर्ष्या द्यौः समवर्तत ' यहाँपर का ज्ञान जैसे ' श्रासीत् ', और ' समवर्तत ' का अर्थ ' उत्पन्नः ' है, वैसे ही लिए इन ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् ' में भी । विपयमें ' बाहू — वाहुभ्यां राजन्यः- क्षत्रियः, कृतः - सृष्टः । ऊरू - ऊरु-ह्रीं? भ्यां वैश्यः कृतः ' यहाँ भी वही अर्थ हुआ । अव ' पट्टयां शूद्रो झणोऽस्य अजायत से सबकी योजना तुल्य होगई । प्रश्न- मन्त्रमें भी इसी का उत्तर प्रकार समझ लेना चाहिए । ' मुखं किम् अस्य आसीत् ' अस्य-? इस सहस्रशीर्षपुरुषस्य मुखं - मुखात् किमासीत् - किमुत्पन्नम्? ' यहाँ किमस्य ' पञ्चमीके अर्थ में प्रथमा है - जैसे, ' घृताद् श्रायुः ' कहना हो, तो ' | ' पादी ' आयुषृ ' तम् ' कहा जाता है, यहाँ पञ्चमी अर्थ में प्रथमा स्पष्ट है । ‘ अभ्य दयां ं शूद्रो वाहू किम्? ' – ' बाहुभ्यां किं कृतम्? ' ' ऊरू- ऊरुभ्यां किम् क्योंकि श्रभवत्? । ' ‘ पादौ किमुच्येते - पादाभ्यां किं जातमुच्यते '? यह में शुद्रकी प्रश्न है । ' ' पाद प्रश्नका भाव यह हुआ कि ' मुखं किम् ' मुखं किङ्कार्यवत्? ' इतना ही मुख किस कार्यवाला हुआ? इसका उत्तर हुआ - ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् ' अर्थात कारण - मुख ब्राह्मण - कार्यवाला हुआ । ' आयु-CC - 0. Ankur Joshi ग्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ग ) ७७५ Collection Gujarat. घृतम् ' की भांति यहाँ प्रथमा है । ' किं पादौ पादौ किङ्कार्यवन्तौ उच्येते ' इस प्रश्नका उत्तर स्पष्ट है कि ' पद्भयां शुद्रो अजायत ' । सृष्टिप्रकरण होनेसे यहाँ ' जनिकर्तुः प्रकृतिः ' ( पा. ११४/३० ) से अपादानमें पञ्चमी स्फुट है । तब ' अस्य मुखं किमासीत् ' ' मुखस्य सृष्टिः का? ' अथवा ' मुखात् किमासीत् किं सृष्टम् ' इन अर्थमं कोई भेद नहीं पड़ता । सृष्टि प्रकरण में पञ्चमीमें प्रथमा विभक्ति ' भी उसी अर्थ वाली हो जाती है - ' आयुर्धृतम ' ' आत्मा वै पुत्र-नामासि, ' ' आत्मैव देवताः सर्वाः ' की भांति अभेदमें प्रथमा-विभक्ति भी देखी गयी है । ' तस्मात् त्वमसि'को ' तत् त्वमसि, ' ' पितुः पुत्रः ' को ' पिता पुत्रः ' भी कहा जाता है । ' घृताद् आयुषो जनिर्भवति ' यह कहना हो, तो ' आयुवृतम् ' इस प्रकार कार्य - कारण- भावसम्बन्धरूप सारोपा शुद्धा लक्षणा वा रूपक अलङ्कारसे कहा जाता है । अतिशयोक्ति- श्रलङ्कार वा साध्यवसाना - लक्षणामें तो सर्वथा अद्वैतता मानकर ' आयु-रेव ' कह देना पड़ता है । इसी ' आयुषृतम् ' की प्रथमा की भांति ' ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद ' में भी कार्य - कारण के अभेदवश प्रथमा है । कारणस्वरूपसम्बन्धी प्रश्नमें उसका कार्य जिज्ञासित होता है, क्योंकि कारणके कार्य जान लेनेसे कारणका स्वरूप अभिज्ञात हो जाता है । इस प्रकार यदि कार्यस्वरूपसम्बन्धी-प्रश्न हो, तो उसका कारण जिज्ञासित होता है, वहाँ पर उसके कारणके कह देनेसे कार्यका स्वरूप अवगत हो जाता है । ' किम् श्रायुः? ' यह कार्यस्वरूपविषयक प्रश्न उसके कारण An eGangotri Initiative

पृष्ठ 398

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७७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) को जिज्ञासित कर रहा है, यहाँ उत्तर है- ' आयुर्वै घृतम् ' । अथवा ' घृतं किम्? ' इस कारण स्वरूपविषयक प्रश्नमें भी वही ' आयुर्वै घृतम् ' उत्तर बनता है । इस प्रकारके प्रश्नोत्तरमें भी इस उत्तरवाक्यके ' घृतसे आयु पैदा होती है ' इस पञ्चमी अर्थ में कोई भी बाधा नहीं रह जाती । इस शैलीसे ' मुखं किम् ' यह .कारणविषयक प्रश्न उसके कार्यको जिज्ञासित कर रहा है । तब उसके कार्यको प्रथमामें बतला देने पर भी पञ्चमी अर्थ में कोई भी बाधा शेष नहीं रह जाती । सृष्टि- अथ यद्यपि पंचमी - विभक्ति होनी चाहिये, तथापि उसी सृष्टि अर्थ में प्रथमा विभक्ति भी वैदिक - शैली में देखी जाती है । जैसे कि ' शतपथ ' में - ' तद् यद् इदमाहुः अमुं यज, मु यज इति एकैकं देवम्, एतस्यैव सा विसृष्टिः ' यहाँ पर देवताओं को ‘ परमात्माकी सृष्टि ' स्पष्ट शब्दों में कहा गया है । यह कहकर आगे कहा गया है— ' एष उ ह्येव सर्वे देवाः ' ( शत ० १४/४/२/१२ ) यहाँ पर ' एतस्मादेव सर्वे देवाः सृष्टाः ' इस पंचमी के स्थान में ' एष उव सर्वे देवाः ' यह प्रथमा विभक्ति आई है । इस प्रकार प्रकृतमें भी समझ लेना चाहिये । ' पुरुषादेव इदं सर्वम् ' के स्थान पर ' पुरुष एवेदं सर्वम् ' ऐसा पंचमीके अर्थको प्रथमा-विभक्तिमें कहना वैदिक - शैली है । इसमें कोई भ्रम वा विप्र-लिप्सा का कोई काम नहीं । जो कि कहा जाता है कि ' पादौ किमुक्ती ' का उत्तर ' तस्य शूद्रः पादौ उक्तौ ' इतना ही होना चाहिए ', इस पर जानना ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ग ) ७७७ चाहिए कि ' प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति करोति तत् ॥ इत्यादि पाणिनेर्न नदी गंगा यमुना च, स्थली नदी ' इस न्यायसे प्रश्न-| दोवारा कर्ता एवं उत्तरदाता, यदि समान ही हो, तो उसकी इच्छा होती शीर्षत्व है, जिस शैलीसे प्रश्नका उत्तर दे । प्रत्युत उत्तरकी विलक्षणता-में समझना पड़ता है कि उसको प्रश्न तब प्रश्नकी योजना भी उसी शैली से उपसंहारमें वैसा होने पर तो सभी करनी पड़ती है । कारणके स्वरूपके जिज्ञासित होने अन्तर्ग भी इस शैलीका इष्ट था । करनी पड़ती है । उत्तरोंके ११ प्रश्नोत्तरोंमें वैसी योजना भी पञ्च क्योंकि ११ पर उसके कार्यके परिचय अजायत दे देने पर वह जिज्ञासा शान्त हो जाती है, क्योंकि कार्य, यह यो कारणके ही अङ्ग अङ्गसे उत्पन्न हुए होनेसे उससे अभिन्न होता भाष्य ७ है – ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' । ' प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति वा प्रश्न करोति तत्'का प्रमाण यहां यह भी है कि ' चन्द्रमा मनसो जात: ' प्रकरण इत्यादि उत्तर, बिना ही प्रश्न करनेके दे दिये गये हैं, उसमें स्वयं उत्पत्त्यथ ही प्रश्नकी योजना कर लेनी पड़ती है कि ' किमस्य मनः ' अथवा ' अस्य मनसः को जातः? ' ' किं चक्षुः ' अथवा ' अस्य चक्षुषः को जातः '? ' किं श्रोत्रम् ' अथवा ' अस्य श्रोत्रात् किमजायत '? ' का वस्त नाभिः, किं शीर्षम् ' अथवा ' नाभ्याः किमासीत् ' शीर्पात् ( शीर्ष्णः ) समझ में किं समवर्तत इत्यादि । नहीं तो बिना प्रश्नके ही उत्तर कैसे दे विवक्षित दिया गया? वहाँ भी यही तात्पर्य निकलता है कि प्रश्न ' तत्पुरुषस्य मनसः किं जातम् ' का उत्तर मिला – ' चन्द्रमा मनसो | रेव ' इ जातः ’ । ‘ किं चक्षुः ' प्रश्नका उत्तर मिला- ' चक्षोः सूर्यो अजायत ' जाता ह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७७७ । ' मुखादग्निरजायत ', ' पद्भ्यां भूमिः ' आदि फिर तत् । / इत्यादि कार्य श्न- मुख वा पादका पूछा गया है, यह उसके सहस्र-होती | दोबारा और सहस्रपादत्वके दिङ्मात्रत्वरूपसे पुनः प्रश्नको ता- | शीर्षत्व श्रन्तर्गर्भित करके उत्तर दे दिया गया है । था । ११ पू. - " पद्भ्यां शूद्रो ' इस पञ्चमीके देखनेसे मुख श्रादिमें रोके भी पञ्चमीकी कल्पना किसी भी प्रकार उचित नहीं हो सकती, जना क्योंकि इससे प्रश्नके स्वरूपमें विरोध पड़ता है । " ११ उ. - नहीं । ' पादौ किम् ' इस प्रश्नके ' पद्भ्यां शूद्रो चय अजायत ' इस उत्तरको देखकर प्रश्नमें भी ' पद्भ्यां किमासीद् ' कार्य वह योजना भी हो जाती है । ' सुपां च सुपो भवन्ति ' ( महा-होता भाष्य ७ १ ३६ ) इस वार्तिकसे छन्दमें उक्त योजनामें कोई बाधा छति वा प्रश्न - उत्तरके स्वरूप में कोई अन्तर नहीं बच पाता । सृष्टि-तः ' प्रकरण होनेसे यहां ' मुखं किमस्यासीत् ' की ' आसीत् ' क्रिया भी स्वयं उत्पत्त्यर्थक है । इसमें ' नाभ्या श्रासीद् अन्तरिक्षं शीष्र्णो द्यौः सम-थवा वर्तत ' मन्त्रकी ' आसीत्, समवर्तत ' क्रियाओं की साक्षी भी प्रत्यक्ष है । का वस्तुतः यदि प्रतिपक्षी निष्पक्ष दृष्टि रख ले, तो उसे यह सब वर्ग:) समझमें आ सकता है । जब कारण और कार्यका अभेद - सम्बन्ध : दे विवक्षित होता है, तब तो दोनों ही स्थानमें प्रथमा आया करती इन है - ' आयुर्धृ तम् ' । उसमें भी सर्वथा अभेद इष्ट होने पर ' आयु-नसो रेव ' इत्यादिकी भाँति कार्य वा कारणको निगीर्ण कर दिया त ' जाता है, जैसे ब्राह्मणको ' मुखमेव ' कह देना । यदि कार्य - कारण CC - 0. Ankur Joshi ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ग ) ७Collection Gujarat. दोनोंका भेद दिखलाना पड़ता है, तो वहाँ कारणमें अपादान कर देना पड़ता है जैसे — ' घृताद् आयुर्भवति ' । यह यहाँ पर भी जान लेने पर कि मुख एवं ब्राह्मण यहाँपर कारण - कार्य हैं — चाहे इन्हें यों कहा जाय - ' मुखं ब्राह्मणः ', चाहे कहा जाय - ' मुखाद् ब्राह्मण: ' । प्रश्न किया जाय - ' अस्य किं मुखम् ', इसका उत्तर चाहे ' अस्य ब्रह्मणः मुखम् ' दिया जाय अथवा ' अस्य मुखाद् ब्राह्मणः ' कहा जाय । अथवा प्रश्न किया जाय कि ' अस्य मुखात् को जातः ' तब उसका उत्तर ' ब्राह्मणोऽस्य मुखम् ' अथवा ' मुखाद् ब्राह्मणो जातः ' कहा जाय, यहाँ कार्य-कारण - भाव सम्बन्ध विवक्षित होनेसे कोई भी किसी भी प्रकार-का दोष वा प्रश्न एवं उत्तर के स्वरूपमें विरोध नहीं रह जाता । परन्तु दृष्टिको निष्पक्ष न रखने पर यह बात समझमें नहीं आ सकती । इसका प्रसिद्ध उदाहरण भी दिया जाता है । वह यह है कि ' वेदान्तदर्शन ' के प्रथम सूत्रमें ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' ( १११११ ) ' ब्रह्म किम् ' ब्रह्मका स्वरूप पूछा गया है, उसका उत्तर उसके कार्य-द्वारा दिया गया है - ' जन्माद्यस्य यतः ' ( १ | १ | ३ ) ' यतः — यस्माद् ब्रह्मणः अस्य - जगतो जन्मादि, तदेव ब्रह्म । ' इसको तटस्थलक्षण कहते हैं । इसी प्रकार ' किं मुखम् ' का उत्तर भी यही होगा-· ' यस्माद् ब्राह्मण उत्पन्नः, तदेव अस्य मुखम् ' । तब उत्पत्ति अर्थ स्पष्ट हो गया । १२ पूर्व - ' प्रश्न - वाक्यों में ' अस्य मुखात् किमुत्पन्नम्, बाहु-भ्याम, ऊरुभ्यां, पादाभ्यां किमुत्पन्नम् ' ऐसा पञ्चमीका अर्थ An eGangotri Initiative

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७८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) करके ‘ पद्भयां शूद्रो अजायत ' इस उत्तरकी सङ्गति दिखलाकर प्रश्नोत्तरका सामञ्जस्य दिखलाना ठीक नहीं, इस पर कई आप-त्तियां उपस्थित हो जाती हैं । इससे ' यत् पुरुषं व्यदधुः ' इस पूर्वार्धका अर्थ असमञ्जस बन जाता है । इतना ही नहीं । सायण और महीधरके वहांके शब्दोंसे विरोध भी होता है, वहाँ तो उन विद्वानोंने यह लिखा है कि - ' अस्य पुरुषस्य मुखं किमासीद्? ' कौ च पादा उच्येते ' । अतः पञ्चमी अर्थ करनेमें ' वदतो-व्याघात ' होगा, यह पहली आपत्ति है । अनेक स्थलोंमें विभक्ति-परिवर्तन करना पड़ेगा- यह दूसरी आपत्ति है । ' आसीत् ' क्रिया-का ' उदपद्यत ' अर्थ करना होगा - यह तीसरी आपत्ति है । इस सम्पूर्ण - प्रकरणकी असमञ्जसता; यह चतुर्थ आपत्ति है ' । १२ उत्तर — यह सभी आपत्तियाँ आपाततः हैं, गम्भीरता से अवगाहन करने पर यह सबै समाहित हो जाती हैं । ' यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ' इस पूर्वार्धके अर्थ में कोई असमञ्जसता नहीं आती । ' यत् ' पुरुषं व्यदधुः ' में पुरुषका ' निर्माण ' वादी स्वयं भी नहीं मानता, किन्तु ' अभिदधुः ' ' अभिधान ' मानता है ' ' जिस विराट् पुरुषका विद्वानोंने प्रतिपादन किया ' यही अर्थवादी अपने पुरुषसूक्त - भाष्यमें मानता है । तब उस विराट्पुरुषका अभिधान है, निर्माण नहीं, तब उसके श्रङ्गों-की कल्पना भी कैसी? वस्तुतः यहां क्वप् धातु सृष्टि अर्थमें है कि - वह पुरुष अङ्गादिरूपसे कितने प्रकार सृष्ट हुआ? तात्पर्य यह हुआ कि उसके अङ्गोंकी सृष्टि क्या थी? इस अर्थ में कुछ CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ग ) ER भी असमञ्जसता नहीं । शेष रहा सायण आदिका प्रश्न - मन्त्र में यदि यह पञ्चमीका अर्थ न करना; सो जब श्रीसायणादिने उत्तर - मन्त्रमं मुखात्, पञ्चमी अर्थ स्पष्ट लिखा है; तब उनके मत में प्रश्नमन्त्रमें भी विभक्ति-पञ्चमी स्वतः सिद्ध - हो गई । यह साधारण जन भी समझ सकता हुआ । ६ है । हां, यदि सायादिका प्रश्न- मन्त्र केलिए स्पष्ट वैसा निर्देश ही देखिये-बादीके मतमें हमारे पक्षका स्पष्ट साधक हो; अन्यथा हमारा पुरुषस्य-पक्ष वादीके - मतमें बाधित हो; तो वादी महोदय श्रीसायणाचार्य- शीष्ण के प्रश्नमन्त्रकेलिए स्पष्ट शब्द भी देखें । तैत्तिरीयारण्यकमें उक्त समानार्थ मन्त्रकी व्याख्या करते हुए श्रीसायणाचार्य स्पष्ट लिखते हैं- इयं ' श्रासीत् ' च मुखादिभ्यो ब्राह्मणादीनामुत्पत्तिः सप्तमकाण्डे ' स मुखतस्त्रिवृतं की कोई निरमिमीत ' इत्यादौ स्पष्टमाम्नाता । अतः ( ' मुखं किमस्यासीद - बुके हैं । ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् इति ) प्रश्नोत्तरे उमे श्रपि तत्परत्वेनैव १३ योजनीये ' । अर्थात् यजुर्वेदादिके उक्त प्रश्नमन्त्र तथा उत्तरमन्त्र १३ ‘ स मुखतः ' इस मन्त्रकी साक्षीसे पञ्चमी अर्थ में जोड़ लेने चाहियें ये ही जा कि- ' मुखात् किमासीत् किमुत्पन्नम्, ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्- | वेदकी ही मुखाद् ब्राह्मण उत्पन्न इति ( ३ | १२ | ५ ) तब हमारा पक्ष सिद्ध होगया, नुसार बल सायरणादिसे कोई विरोध नहीं पड़ता, बल्कि अनुकूलता ही पड़ती एक - जाति है । ' तदास्योत्पन्नत्वात् ' यह ब्राह्मणकेलिए लिखकर उवटने भी केशावरम हमारा ही अर्थ पञ्चमी एवं उत्पत्त्यर्थक बताया है । अतः ' वदतो । बावत ' ( ६ व्याघात ' न रहा । ( ४६ ) अनेक - स्थलोंमें विभक्ति - परिवर्तन भी नहीं है किन्तु ' सुपां एवं पञ्चम्य भवन्ति ' इस वैदिक - वार्तिकसे पञ्चमीमें प्रथमा है । कजातीय च सुपो Gujarat. An eGangotri Initiative