श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मलोक ६
6 Sanatana Dharma Lok By Devnath Sharma Shastri 1959 New Delhi - Sanatan Dharmalok Karyalay · 488 पृष्ठ · 49 खण्ड
In English
Sanatana Dharmalok Volume 6
This is the sixth volume of a series titled Sanatana Dharmalok, which serves as an encyclopedia of Hindu religion. The book contains essays on various topics of Sanatana Dharma, including the Vedas, Puranas, and social structures. It was written by Dinanath Sharma Shastri and published in Hindi in 1959.
This book answers
- Is the brahmin caste considered part of the vedas?
- Was cow slaughter practiced in ancient india?
- How does the varna system relate to birth and occupation?
- What are the various criticisms found in the puranas?
विषय सूची
- - 6 IIIIIIIII CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative X CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative uters… 1–10
- [ अ ] हम चिर- कृतज्ञ ही नहीं, अपने नष्ट - धनको प्राप्त कर एक विशेष-झमें आनन्दका अनुभव कर रहे हैं; और भविष्य में करेंगे, और इस्य आपसे निरन्तर साभिमान… 11–20
- १४. श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) 3518 ) मनुजीने नियोगको सनातनधर्मसे विरुद्ध कहा है । ' भ्रातुर्व भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ' ( वाल्मी ० किष्किन्धा… 21–30
- ३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हैं, उसे मित है, संसार में व्यापक है । देवता भी इसका उल्लंघन नहीं स्त्रियोंको करते… 31–40
- १४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्वा.द.की ६ युक्रियोंकी समीक्षा ( घ ) श्री सायणाचार्यने भी निरुक्तस्थ ' निगम ' शब्द के लिए अपने ' ऋग्वेदभाष्योपोद्घात ' में यही… 41–50
- ७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रहेगा? इसप्रकार के एक मन्त्रके अनुवादक अन्य मन्त्र बहुत दिखलाये जा सकते हैं… 51–60
- ६ ६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) छन्द ‘ मन्त्रे ' यह वेदके भिन्न - भिन्न भागके नाम हैं । इससे सामान्यतया एकदेशी नामसे दोनों का ग्रहण नहीं हो सकता… 61–70
- ११६ ( ग ) स.प्र. ४३ - ' कुलीन है अर्थात्, जो - जो इस प्रकार उसका इम यथावत् संस्कार में मान्य हैं, इसलिए ४४ पृष्ट तब संगत हो में निषेध जिसमें उपनिषद्… 71–80
- १३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) स्यनुवर्तते । लिखा है-वेद के उद उपनिपदो न संहिताओ ई उदाहरण सिद्ध हो र श्री वेदसंहित भाग भार समा हां कदाचि • वैदिक कार्य न होते… 81–90
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अन्य आक्षेपोंका समाधान १२७ ताते हैं । इससे मन्त्रभागकी अवेदता न मानें; वैसे ही उन्हें वैशेषिकदर्शन के तब दिसूत्रों में तथा उक्त… 91–100
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नवीन तर्कों पर विचार १७७ १७६ लकर ही चाहिये - यह भाव निकलता है | जैसे देवताओंके बाहुल्य होने पर म भी भक्त को अपने ही इष्टदेवमें… 101–110
- १६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १३५ | ' गायत्री वा । एकादशवर्षं राजन्यम् द्वादशवर्ष वैश्यम् ' ' वें वर्ष में ब्राह्मण का टकिल्विषः तथा ११ वें में क्षत्रियका… 111–120
- २१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) आदिका पूजाविधि बताई गई है । से कहे ( ४ ) पहले बताया जा चुका है कि - यज्ञमें द्विजका, एवं यज्ञो-प्रकारोको पबीतीका अधिकार होता… 121–130
- श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) २३६ ( घ ) यदि इसमें अद्विज आनेको लालसा रखते हैं; तो इससे लेकिन मन्दिर में चढ़ावा और भी अधिक चढ़ सकता है… 131–140
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २१६ फाँसी दे दी थी; तो क्या ईश्वरको ही न माना जावेगा? वा उसे उसे असमर्थ मान लिया जावेगा? वस्तुतः यह शुष्क - कुतर्कमात्र र्कमान… 141–150
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २७६ ( देवीभागवत || ८३, चाणक्यनीति २/१, हितोपदेश १ १६५, सु पञ्चतन्त्र- मित्रभेद ) । ' शय्यासनमलंकारं कामं क्रोधमनार्जवम्… 151–160
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) २६६ । देखिये- यह निजी कल्पना नहीं । पणादिदाने ( १३ ) पुराण से इतिहास भी लिया जाता है… 161–170
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३१६ ' के नामसे व्याकरणसिद्ध प्रयोग भी जान लेने चाहियें । हितोपदेशमें पाणिनि -- ' स्वर्गेषु मी ' अनेकगो - मानुषाणां वधान्मे पुत्राः… 171–180
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३३५ ३३६ सिद्ध हो नहीं; अतः वात्स्यायन - मत पुरातन ऐतिह्य पर आश्रित है… 181–190
- श्री सनातनधर्मा लोक ( ६ ) ३१६ वा नाय, से चुके हैं । पाठकगण एक - दो अन्य भी प्रमाण देख लें — ' आहन्ति उसे डर गमे पसो ' ( बा. सं. २३… 191–200
- श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ३७६ नर्मूल उपपत्ति देकर कर रही है, वैसे व्यक्तिको गर्भ हत्यारा, निषेध विवाद और पापी कहती है, तो गाय - बैलके खाने का तो प्रति-है… 201–210
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३६६ सष्ठस्मृति निर्वचन करते हुए पहले ' निगमा इमे भवन्ति ' ( १ | १ | ३ ) यह ' गम् ' बड़ा धातुसे निर्वचन किया गया, फिर ' आहननादेव… 211–220
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) 815 सन्धानय ब्राह्मणोंको नित्य १२ लाख गौका मांस खिलाया करता था; 1. और देखिये - ( ख ) ' गोमेधं च चतुर्लक्षं विधिवन्महृदद्भुतम्… 221–230
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४३८ लोग नही मी; अतः यहाँ दोनोंके कहनेसे पुनरुक्ति दोष होगा । वस्तुतः सोमलवा है - ' अनड्वान् वृपभः प्रोक्तस्त्वनड्वान् मुख्य… 231–240
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वता उसे विविध वहाने बनाते देरी नहीं लगती । एतदादिक हानियां में ि पल पैतृकको भी कलिवर्ज्य कर दिया गया… 241–250
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ले विकल्प हैं । इनमें भूतार्थवादमें कई कल्पित आख्यायिकाएँ होती रजः हूँ, और कई पारम्परिक - उपाख्यान होते हैं, दोनोंका तात्पर्यं… 251–260
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४६८ दादिकमादा उस वैष्टिक - हितको समष्टिके लिए हित समझकर हटा दिया । यति सममा सामष्टिक - हितको पूर्ण करनेकेलिए ही उन्होंने वैसा… 261–270
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) उनके आगे माथा नहीं रगड़ना पड़ेगा? पुत्रादि जैसे श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण, परमात्माका अवतार बताये रुक्मि उनके गये हैं; वैसे ही… 271–280
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ५१० २३६ थे कि इससे वे स्त्रियां व्यभिचारिणी ( भिन्न - विचारवाली ) बर्जित होते sad अपने में स्वामीजीका गर्भ स्थिर लेती थीं… 281–290
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १५६ कैसे बना लिये? वादी तो ऐसे अवसरों पर आत्मा प्रकारसे इतने रूप टुकड़े हो जाने का करता है, तब इस बात पर वादीने मः इन क्यों… 291–300
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १७८ रे सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ' ( १३ । ३२ ) वयमपि । लिप्यते । भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते… 301–310
- श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) कुब्जा और श्रीकृष्ण १६६ नहीं सोचा कि यहां कौनसे वीर्यका आधान है? सन किया! वादीने क्यों के अनुसार परमात्मा थे… 311–320
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६१० ' निरुक्त ' के वचनमें भी पृथिवीका बादलसे वही करते ( २ ) इस होंगे, मान लेंगे? ' राजाका पृथिवीसे भोग ' में भी आप क्या होंगी, परम… 321–330
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) श ६४२ है, तो श्रीराधाका स्वकीय - छाया निर्माण ' पागलपन'की बात न शावतारा व्यवहार हुई; किन्तु क्रियात्मक बात हुई… 331–340
- श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) ६६१ ६६१ देखिये - आर्यसमाजी विद्वान् श्रीचन्द्रमणि - पालीरत्नका यह सब हैं, की भूमिका स्वा. द. जी को अपनी पुस्तकका समर्पण; तथा… 341–350
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६८ । ६८२ द्वारका है, ३ हमको नियोगकी बात में पाप मालूम पड़ता है ' ( स.प्र. एक दीखता और पति के मरते ही श्मशानमें पति के जलानेकेलिए ४… 351–360
- ७०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ऋषि - द्वारा नगरको दण्डकारण्यरूपमें परिणत करने के इतिहास-वैसे को, तथा अगस्त्यके समुद्र - पानके इतिहासको सत्य मानते हैं… 361–370
- ७२१ ७२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यंही उपस्थ हो गया । उसको आर्तव ( ऋतुकाल ) भी होने लगा । नुरुपका गर्भ भी हो गया, स्तनोंमें दूध भी आ गया… 371–380
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७४२ या जीभ द्वारा । शरीरमें प्रकट होने पर छूनेसे दूसरे-उसकी मुखद्वारा को जलाती है… 381–390
- ७६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७६१ राजाओं के पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रोंकी सन्तति अतिशयित हो गई हो; ( जिनका निवास समुद्रस्थित ( ५६ करोड़ ) हुए हों; -… 391–400
- श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) -मन्त्र में यदि यह दोष है, तो बादीका ' पद्भयां, मनसः, चक्षोः, श्रोत्राद्, -मन्त्र में मुखात्, नाभ्याः, शीर्ष्णः, पद्भयां, इन… 401–410
- ८०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ८०१ किन्तु ' उत्तमाङ्ग ' माना जाता है, इसमें सारा संसार सम्मत है, न लें, वैसे ब्राह्मण दोषादियुक्त होता हुआ भी उत्तम है, उसके… 411–420
- ८२२ श्रीसनातनधर्मालोक ६ ) ८२१ सृष्टः ' ( ६ | १ | ८ ) इस ‘ ताण्ड्यब्राह्मण'की साक्षीसे ' सुपां च सुपो शास्त्र के भवन्ति ' से ‘ भ्याम्’को ‘ औ ' हुआ… 421–430
- ८४१ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) से हीनको भी ‘ जातिब्राह्मण ' कह दिया । अन्यथा वह उसे शूद्र कहता । इनमें मुख्य योनि है, क्योंकि अब्राह्मणमें तप और श्रुत | महा-… 431–440
- ८६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) GE1 उत्पत्ति मान नहीं सकता । वस्तुतः व्यवस्थाएँ भी प्रकृतिनियमा-वचन नुवर्तनके समय मैथुनयोनिता में ही चलती हैं, अतः यहाँ भी… 441–450
- ८८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) था । तपस्या करते हुए भी शुद्रको श्रीरामने शुद्र ही जान लिया था । निपादोंके पास ठहरे हुए और निषादाचार भी जन्म-ब्राह्मणको गरुडने… 451–460
- ६०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तथा कान बकरी जैसे ही हैं । मानव ( ङ ) दो सिर और पूँछवाली प्रद्भुत लड़की --- ( नवभारत - टाइम्स t? १६-११-१६४६ ) सिवनी १५ नवम्बर… 461–470
- १७ ६१८ श्रीसनातनधर्माल्लोक ( ६ ) नय उदास था । मैंने कहा आप लोगोंने जो कहा वह तो सत्य ही ठी निकला… 471–480
- ६३८ श्रीसनातनधर्मालांक ( ६ ) पद छिपा देते हैं । कभी दो पदोंको एक पद कर देते हैं, कभी एक पदकों दो पद कर देते हैं । कभी चतुर्थीको तृतीया कर देते हैं… 481–488