सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 161–170

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 161–170

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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ३६४ ] मानते । कई अर्वाचीन हिन्दु - सम्प्रदाय अपने - आपको तब सरे नहीं कहते हुए भी पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्मको केवल उसके श्रागेश श्रास्तिक कथनमात्रमें मानते हैं, यथार्थरूपसे नहीं । पर आडम्बरमात्रमें, माने बारे हिन्दुधर्म इनकी सत्ता मानता है - ' सति मूले तद्विपाको है । सनातन ' ( योग. साधन. १३ ) ' कारणं गुणसङ्गोस्य सदसद्-वस्था जन्म जात्यायुर्भोगाः योनिजन्मसु ' ( गीता १३ । २१ ) । सनातन हिन्दुधर्मका यह सिद्धान्त का सम्मान है कि- जिस आदिम - ब्राह्मणने सृष्टिकी आदिमें परमात्माके क्षत्रियादिले मुखसे जन्म लिया; वह पिछले जन्म के उत्तमगुण - कर्मोंके बड़ी हारि कारण । इसी प्रकार जिसने उस ब्राह्मणके कुल में जन्म लिया; करेगा । वहां भी मूल पूर्वजन्मके उत्तम - गुणकर्म होते हैं । - सभी शाख अब हम जो उसका सम्मान करते हैं; वह हम उस व्यक्तिका कहते ह चाहिये सम्मान नहीं कर रहे, किन्तु उसके पूर्व - जन्मके उत्तम गुण - कर्मों । ने पर वह तथा उससे प्राप्त शरीरका सम्मान कर रहे हैं । इससे फिर उसको बाह्मणादिरी अपने उत्तम गुणकर्मोंके आश्रयण में प्रोत्साहन प्राप्त होगा । यदि मनुस्मृति वह इस जन्ममें उत्तम गुणकर्मोंको आश्रित नहीं करेगा; तो यह गुण - कमर || उसी व्यक्तिका अपना अनिष्ट होगा; अग्रिम - जन्म में वह सद्-फिर भी बो जाति में जन्म लेगा, दुःख उठाएगा । पर हमारा तो कर्तव्य हो प्रशंसा वा जाता है कि हम उस पूर्वजन्म के कर्मोंके कारण उत्पन्न हुए उस यह है कि शरीरका सम्मान करें । इससे जहां हमारी पूर्वजन्म तथा पूर्वजा पुनर्जन्मपर आस्था बढ़ेगी, वहां शुभकर्मों के आश्रयणका स्तिक धर्म प्रोत्साहन भी प्राप्त होगा । पुनर्ज ( ग ) सो जैसे कोई ' शास्त्री ' बनता है; उसमें प्रथम श्रेणी, ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( I द्वितीय श्रेणी, तथा तृतीय श्रेणी होती है; वहाँ उच्च अध्यापकता में शास्त्री प्रथम - द्वितीय श्रेणीका ही रखा जाता है, तृतीय श्रेणीका नहीं । तृतीय श्रेणीका भी शास्त्री अच्छी योग्यता सञ्चित करने पर वह भी उच्च - अध्यापनमें निर्वाचित कर लिया जाता है, वैसे ही जन्मजात ब्राह्मण भी तीन श्रेणियोंका होता है, उत्तम, मध्यम, और अधम | सो जहाँ कर्मकाण्डादिमें वा अन्य सम्मानित उच्च कर्ममें ब्राह्मणकी आवश्यकता पड़ती है; वहाँ उत्तम वा मध्यम ब्राह्मणको लिया जाता है, तृतीय श्रेणी वाले ब्राह्मणको नहीं । तृतीय श्रेणी वाले से भोजनादि पकवानेका काम लिया जा सकता है । पर जब तृतीय श्रेणी ब्राह्मण भी प्रथम - द्वितीय श्रेणी वालेका सम्मान देखकर स्वयं भी प्रथम - द्वितीय श्रेणी जैसी योग्यता सञ्चित कर ले; तब उसका भी वही सम्मान होगा । इससे यह सिद्ध हुआ कि - जहाँ शास्त्रोंमें ब्राह्मणका वर्णन आता है, व स्वजाति - जात तथा फिर उत्तम - गुणकर्मवान ब्राह्मण इष्ट होता है । अन्यजातिजात एवं उत्तम गुणकर्म वाला भी ब्राह्मणेतर वर्ण वहाँ ब्राह्मण इष्ट नहीं होता, और उसका ब्राह्मण - जैसा सम्मान भी इष्ट नहीं होता । इस वेदानुगृहीत निबन्धसे सम्यक सिद्ध हो गया कि वर्ण-व्यवस्था जन्मसे ही हुआ करती है; वही ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' मन्त्रमें भी इष्ट है, चाहे वहाँ पञ्चमी विभक्तिका अर्थ हो, चाहे प्रथमाका । यदि उस जन्मवाले ब्राह्मणादिमें स्वनियत गुण - कर्म होंगे; तो ' सोना और सुगन्ध ' होगा । अन्यवर्णजातको अन्य-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 162

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२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) वर्ण - व्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार व गुणकर्म ग्रहण करके कभी अव्यवस्था उत्पन्न नहीं करनी चाहिये । जन्म - ब्राह्मणको भी उचित है कि वह अपने गुण - कर्म में खरा उतरे । तब उसपर किसी भी अब्राह्मण अथवा गुणकर्म-बादीकी शक्ति नहीं कि उसपर आक्रमण कर सके । इस विषय में जो स्पष्टता देखना चाहें; वे ' आलोक'का ४ थे तथा छठा सुमन मंगा लें । ( ११ ) वर्ण - व्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार । ‘ वर्ण - व्यवस्था ' के विषयमें कुछ भ्रामक प्रमाण पूर्वपक्षियों-की ओरसे दिये जाते हैं; उनमें ' कुछ भ्रमोंका परिहार ' चतुर्थ-पुष्पमें किया जा चुका है । अब अन्य भ्रान्तियोंका परिहार यहाँ किया जाता है । यह स्मरण रहे कि प्रतिपक्षी प्रायः कर्म-प्रशंसक अर्थवाद - वचनोंका संग्रह कर अपने पक्षको पुष्ट करने की चेष्टा करते हैं । वस्तुतः अर्थवाद में किसीकी स्तुति - निन्दा में तात्पर्य हुआ करता है, यथाश्रुत- अर्थ में नहीं - यह हम आगे स्थल - स्थल पर स्पष्ट करेंगे । ( १ ) पूर्वपक्ष - ' वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु ' ( ब्राह्मपर्व ४१/८ ) भविष्यपुराणके इस श्लोक में वृत्त ( आचारवत्ता ) को ही ब्राह्मणत्व-. का कारण बताया गया है; तब जन्म - सिद्ध वर्ण - व्यवस्थाका खण्डन सिद्ध हुआ, और गुण - कर्मों से वर्ण व्यवस्था सिद्ध हुई ।.: उत्तरपक्ष - भविष्यपुराणके ब्राह्मपर्वके एतद्विषयक लोका CC - 0. Ankur Joshi Collection इमं चतुर्थपुष्पमें समाधान कर चुके हैं, पाठक उसीमें - व्यवस्था तो जन्म सिद्ध ही होती है; एतदर्थं देखें चतुर्थपु ६-७-८-१-१० विषयोंका तथा छठेपुष्प में की सैद्धान्तिक १७-१८-१६-२०-२१-२२ विषयोंका पाठक पारायण करें । चर्चा प्रकृत- आक्षेपों पर विचार किया जाता है । ब्राह : यहाँ वेदाध्ययनकी अपेक्षा वृत्त ( आचारवत्ता ) की प्रशंसामात्र जन की गई है, क्योंकि — इसका पूर्वार्ध है- ' शिल्पं हि वेदाध्यक्ष, द्विजानाम् ' वेदाध्ययन तो ब्राह्मणोंका शिल्प है । तब ' नहि लिनु निन्ध ं निन्दितुं प्रवृर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम ' इस न्यायसे वह अन अर्थवाद है । निन्दा निन्दित वस्तुकी निन्दार्थ नहीं होती; कि ब्राह्म वक्तासे इष्ट वस्तुकी स्तुतिकेलिए होती है । संरच जैसे— ( क ) ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् " यस्तन्न वेद किमृत वेदफ हुव करिष्यति ' ( ऋ. १।१६४ ३६ ) यह मन्त्र ब्रह्मज्ञान वा श्रार ज्ञानका अर्थवाद है, इससे ऋग्वेदकी निन्दा नहीं होती । ( ख ) ( मनु. अथवा जैसे - ' क्षरन्ति सर्वा वैदिक्यो जुहोतियजतिक्रियाः । श्र स्वीक ब्राह्मर त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ' ( मनु. २८४ ) यहाँ ओङ्कार वैदिक यज्ञ की अपेक्षा प्रशंसार्थवाद है; इससे वैदिक यज्ञादि रखा a क्रियाका खण्डन यहाँ इष्ट नहीं । ( ग ) अथवा जैसे- ' ये पाक वर्णोव यज्ञाञ्चत्वारो विधियज्ञ - समन्विताः । सर्वे ते जपयज्ञस्य का बर्षोंन नार्हन्ति षोडशीम् ' ( मनु. २/८६ ) यह श्लोक जपका, अर्थवाद है । पक्षिय वैदिक यज्ञोंका इससे निषेध इष्ट नहीं । ( घ ) अथवा जैसे-* चतुर्थंपुष्पका मूल्य ६ ) है । + छठे पुष्पका मूल्य १० ) हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 163

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) १६६ ' gananda पुरुषो यदमर्षी यदक्षमी । क्षमावान् निरमर्षश्च नैव उसमें देखें. स्त्री न पुनः पुमान् ' ( महाभारत उद्योग. १३३।३३ ) यहाँ अमर्षी चतुर्थ पुण् ( असहनशील ) पुरुषकी प्रशंसा है; क्षमा वाले पुरुषका वास्तव में न्तिक चर्चाि नपुंसक होना करें । ब्राह्मणकेलिए जन्मना वर्ण प्रशंसामात्र लेना चाहिये । वेदाध्व तब यहाँ ' नहि निन्दा अन्य वर्णोंकी न्याय से यह ब्राह्मणके लिए इष्ट नहीं; वैसे ही उक्त भविष्य - पुराणके पद्यमैं वृत्त ( आचारवत्ता ) का उत्कर्षं इष्ट है; इससे व्यवस्थाका निषेघ इष्ट नहीं, यह ध्यान में रख यही अभिप्राय है कि - ब्राह्मण वृत्त ( आचारवत्ता ) में अपेक्षा अधिक ध्यान रखते हैं, ना रखें । इसीलिए वृत्तकी प्रशंसा में एक पद्य प्रसिद्ध है – ' वृत्तं यत्नेन होती; संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषतः । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु इतो इतः ' ( महा. वनपर्व ३१३।१०६ ) ' आचाराद् विच्युतो विप्रो न वेद कि वेदफलमश्नुते । आचारेण तु संयुक्तः स पूर्णफलभाक् स्मृतः ’ शा ( मनु. १ | १०६ ) यहाँ आचारसे च्युत ब्राह्मणको भी ब्राह्मण होती । ( ख ) स्वीकृत किया गया है । इसलिए भविष्य पुराणके उक्त पद्यमें याः । अक्षरं । ब्राह्मणोंके चिह्न होनेसे आचारवत्ताको भी ब्राह्मणके लक्षण में ओङ्कार रखा गया है । कयज्ञादि केवल आचारवत्तासे ब्राह्मणत्व माना जावे; तो शेष तीन से- ' ये पा वर्णोंकी आवश्यकता ही नहीं रहती; क्योंकि क्या वृत्तकी शेष ज्ञस्य का वर्णोंमें आवश्यकता नहीं? यदि ऐसा नहीं; तो इससे प्रति-अर्थवाद है । जैसे- पक्षियोंकी कुछ भी इष्ट- सिद्धि नहीं । इसलिए ' श्रृणु यक्ष! थवा फुलं तात! न स्वाध्यायो न च श्रुतम् । कारणं हि द्विजत्वे च हैं । CC - 0. Ankur Joshi वर्णव्यवस्थागतं भ्रान्ति - परिहार [ २वृत्तमेव न संशय: ' ( वनपर्व ३१३ ( १०८ ) यह पद्य भी वृत्तका गुण-वादरूप अर्थवाद है । इस प्रकार ' चतुर्वेदोपि दुर्वृत्तः स शुद्राद अतिरिच्यते ' ( ३१३।१११ ) यह भी दुर्वृत्तकी निन्दारूप - अर्थवाद है । इसी कारण ब्राह्मणकेलिए वृत्त आदि होनेपर ही पात्रता मानी गई है । जैसेकि - ' न विद्यया केवलया तपसा वापि पात्रता । यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पात्रं प्रकीर्तितम् । ' ( याज्ञवल्क्यस्मृति ११२०० ) इससे विद्या आदि द्वारा वर्ण होना नहीं कहा गया; किन्तु केवल पात्र बन जाना ही कहा गया है । इससे ' न कुलेन न जात्या वा [ द्वाभ्यां वा ब्राह्मणो नहि ] क्रियाभिर्ब्राह्मणो भवेत् । चाण्डालोपि [ व्रतस्थश्चेत्. ] हि वृत्तस्यो ब्राह्मणः स युधिष्ठिर! शूद्रोपि शीलसम्पन्नो गुणवान् ब्राह्मणो भवेत् । ब्राह्मणोपि क्रियाद्दीनः शूद्रात् प्रत्यवरो [ प्रत्यनन्तरं ] भवेत् । न जातिदृश्यते तावद् गुणाः कल्याणकारकाः ' ( महा. वन. अनुशा. १ ) इत्यादि काचित्क श्लोकोंकी भी व्याख्या होगई । यह श्लोक अर्थवाद हैं । अर्थवाद होनेसे इनका अक्षरार्थ में तात्पर्य नहीं, किन्तु वृत्तकी स्तुति में ही तात्पर्य है । ' शूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्, क्रियाहीनो ब्राह्मणः ' इत्यादि शब्द क्रियाहीन-ब्राह्मणकी शुद्रता नहीं बताते; किन्तु शूद्रसे भी उसे निकृष्ट बताकर उसकी निन्दामात्र बताते हैं, जैसेकि - ' साहित्य - सङ्गीत-कलाविहीनः, साक्षात् - पशुः पुच्छविषाणहीनः ' ( नीतिशतक १२ ) यहाँ पर साहित्य - संगीतकलासे विहीन पुरुषको साक्षात् - पशु कहना अथवादसे है, वस्तुतः नहीं । जैसे- ' अपना वतन कश्मीर है, Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 164

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$ 88 1 " श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) ".. अपना देश ही स्वर्ग है ' इस वाक्यसे स्वदेश वास्तवमें कश्मीर बा स्वर्गे नहीं हो जाता; किन्तु कश्मीर वा स्वर्गके समान उसका सुखदायक होना इष्ट होता है; वैसे प्रकृत में भी समझना चाहिये । - इस प्रकार ' न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं न च सन्ततिः । कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम् । वृत्ते स्थितञ्च शुद्रोपि ब्राह्मणत्वं [ नियच्छति ] स गच्छति ' ( महा. अनु. १४३ । ५० ) एत-दादिक पद्य भी वृत्तके अर्थवाद हैं, ( क ) जैसे कि- ' न तेन वृद्धों भवति, येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानः तं देवाः स्थविरं विदुः ' ( मनु. २।१५६ ) यहां अध्ययन करनेवाले युवाको भी अर्थवादसे वृद्ध और अध्ययन - रहित सुफ़ेद बालों वाले वृद्ध-को भी वृद्ध न मानना अर्थवादसे है । ( ख ) जैसे ' पृथिव्यां त्रीणि ' रस्नानि अन्नमापः सुभाषितम् । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा ' विधीयते ' ( चाणक्यनीति १४ । १ ) इस पद्यमें अन्न आदिको रत्न कहना और रत्नको रत्न न कहना अर्थवादसे है । ( ग ) जैसे ' ' योऽर्थे शुचिः स हि शुचिर्न मृवारिशुचिः शुचिः ' ( मनु. ५ \ १०६ ) ' यहां जल - मिट्टी आदिसे शुद्धको शुद्ध न मानकर अर्थ - शुद्धिवालेको ' शुद्ध अर्थवादसे माना है; नहीं तो ' मृत्तोयैः शुध्यते शोध्यः ( ५ | १०८ ) यह मनुका मट्टी - पानीसे शुद्धता बतानेवाला अपना ' बाक्य अपनेसे विरुद्ध हो जावे । ( घ ) जैसे- ' निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र - तत्राश्रमे वसन् ' ( मनु. ३ | ५० ) इसमें नियममें स्थित गृहस्थीको भी ब्रह्मचारी ' अर्थवाद कहा है, नहीं तो ब्रह्मचर्याश्रमको पृथक् आश्रम ही न CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार माना जा सके । ( ङ ) जसे कि - अपशवो " वा अन्ये गोअश्वेभ्यः में गाय- घोड़े आदिसे भिन्न पशुओंको अपशु मानना । है; नहीं तो प्रत्यक्षका व्याकोप हो जावे; वैसे ही अर्थवाद प उक्त - पद्यमें भी योनि से द्विजत्वके निषेधमें तात्पर्य महाभारत | प पर श्रुत ( अध्ययन ) तथा संस्कार को भी द्विजत्वका निषेधक नहीं है । वहां यदि वहां अर्थवाद न माना जावे; तो प्रतिपक्षियोंका कहा है । इससे खण्डित हो जावेगा । तब अर्थवादवश इन पद्योंसे पक्ष हमारे भी उ .पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । ' शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः । शुद्रोप द्विजवत् सेव्यः ' ( महा. १३।१४३ । ४८ ) स्वभावः कर्म च शुभं यत्र शुद्रेऽपि तिष्ठति । विशिष्टः स द्विजातेर्वें ' ( ४६ ) इत्यादि पद्य स्पष्ट । न अर्थवाद हैं; नहीं तो द्विजसे भी शुद्रको बढ़ा देना क्या माने स रखता है? इस प्रकार ' न कुलेन न जात्या वा क्रियाभिर्ब्राह्मणो भवेत् ॥ चाण्डालोपि हि वृत्तस्थो ब्राह्मणः स युधिष्ठिर! ' ( महा. अनु. २१६'१४ १ ) इत्यादि पद्य भी वृत्तके प्रशंसात्मक अर्थबाद ही हैं । T महाभारतके ' न च मे ब्राह्मणोऽविद्वान्... ब्राह्मणा मे स्वकर्मस्था शु ( ७७ | ११-१२ ) एतदादिक पद्यों में शुद्रका ईर्ष्या - द्वेष छोड़कर तीन वर्णोंकी सेवा करना अपना कर्म कहा है । इससे स्पष्ट है कि-महाभारत प्रतिपक्षी के पक्षको पुष्ट नहीं करता । आशय यह है- न ' न कुलेन न जात्या वा, क्रियाभिर्ब्राह्मणो भवेत् ' यह महाभारतका

श्लोक वृत्त तथा क्रियाका अर्थवाद ही है ।

इस श्लोकके उपस्थित करनेवालोंने यह सुप्रसिद्ध श्लोक सुना Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 165

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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ३०२ ] कि- ' शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खो, यस्तु क्रियावान् अश्वेभ्यः ही होगा | स विद्वान ' ( हितोपदेश - मित्रलाभ १८५ ) अर्थात शास्त्रोंको अर्थवाद पुरुषः: भी लोग मूर्ख हुआ करते हैं, क्रियावान् ही पुरुष विद्वान् महाभारत पढ़कर करता है । तब क्या प्रतिपक्षि गण इस पद्यसे विद्वत्ताका है । वहां हुआ क्रिया को ही मानेंगे, शास्त्राध्ययनको नहीं? यदि ऐसा कहा है । मूलकारण का हो; तो जो विद्वत्तालिए द्विजका अध्ययनाध्यापन आदिष्ट है, पक्ष भी घोंसे उसका भी बहिष्कार करना पड़ेगा । परन्तु यदि वादी इस श्लोक हमारे मैं क्रियाके अर्थवादको मानकर क्रिया के साथ शास्त्राध्ययनको ही = शूद्रोषि विद्याका कारण मानें; वैसे ही ' न कुलेन न जात्या वा क्रियाभि-शुभं यत्र द पद्य ब्रह्मणो भवेत् ' यहां स्पष्ट क्या मारे सहित ब्राह्मरण - कुलको समझें । यहां जाति यो भवेत् । पक्षियोंका यह प्रयास महा. अनु. इसी प्रकारका भी क्रियाके अर्थवादको जानकर क्रिया-वा उसकी जातिको ही ब्राह्मणत्वका कारण वर्ण - व्यवस्था सिद्ध हो गई । तब प्रति-असफल सिद्ध हुआ । आक्षिप्त ' वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु ' यह ही हैं । भविष्य पुराणका पद्य वृत्तका अर्थवाद है, ( क ) जैसे कि - ' योर्थे चकर्मस्था शुचिः स हि शुचिर्न मृदुवारिशुचिः शुचिः ' ( मनु. ५१०६ ) यहां ढ़कर तीन अर्थचित्वक अर्थवाद है, मट्टी- जलसे शुद्ध की शुद्धताका इससे ट है कि निराकरण इष्ट नहीं । ( ख ) जैसे कि - ' न गृहाणि न वस्त्राणि यह है- न प्राकारस्तिरस्क्रिया । नेदृशा रानसम्माना वृत्तमावरणं स्त्रियाः ' भारतका ( वाल्मी. ६ | ११४ | ३७ ) यह पद्य स्त्रीके वृत्त ( सदाचार ) का अर्थवाद है; इससे स्त्रीका वस्त्रादि द्वारा अपने अङ्गों के आवरणका निषेध लोक सुना तात्पर्य - विषय नहीं; नहीं तो सदाचारिणी स्त्रीका नङ्गा घूमना भी वर्णव्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार [ ३०३ इससे विहित हो जावे । ( ग ) जैसे- ' पृथिव्यां श्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ' ( चाणक्य ) यह पद्य सुभाषित आदिको रत्न तो बताता है; पर इससे हीरे आदि मणियोंका रत्न होनेका निषेध इष्ट नहीं । ( घ ) अथवा अन्य प्रमाण देखिये- ' न तत्त्व - वचनं सत्यं ना-तत्त्व - वचनं मृषा । ‘ यद् भूतहितमत्यन्तं तद्धि सत्यं प्रकीर्तितम् ' इस पद्य में प्राणियोंके हितकी प्रशंसा इष्ट है; सत्यवचनकी असत्यता यहां प्रत्यक्ष कही हुई भी तात्पर्य विषय नहीं; वैसे ' न कुलेन न जात्या च क्रियाभिर्ब्राह्मणो भवेत् ' इस पद्यमें भी क्रियाको अतिशयित बताना इष्ट है । जैसे कि - ' वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषत: ' ( महा. ३।३१३ । १०६ ) इत्यादि पद्य स्वयं ही यह बता रहे हैं । इससे जाति एवं कुल द्वारा ब्राह्मणत्व-का खण्डन इष्ट नहीं । तब यहां वृत्तका ही अर्थवाद फलित हुआ । ( ङ ) एक उदाहरण अन्य भी देखिये- ' ते ( माता, पिता और आचार्य ) एव हि त्रयो लोकाः, त एव त्रय श्राश्रमाः । त एव हि त्रयो वेदाः, त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ' ( मनु ० २।२३० ) ' तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते ' ( २। २२६ ) यावत् त्रयस्ते जीवेयुस्ता-वन्नान्यं ( धर्मं ) समाचरेत् । तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः ' ( २।२३५ ) ' एष धर्मः परः साक्षाद् उपधर्मोऽन्य उच्यते ' ( २३६ ) यहां माता, पिता तथा आचार्यकी सेवाका अर्थवाद कहा गया है; यहां वेदों का अध्ययन तथा अग्निहोत्रादिको उपधर्म तथा माता आदिकी सेवाको परमधर्म कहा गया है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 166

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३०४ ] • श्रीसनातनधर्मालोक. ( ८ ) वर्ण - व्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार ' आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः । माता पृथिव्या मूर्तिस्तु ' ( २।२२६ ) तो क्या माता - पिता तथा आचार्यः श्रादिके जीवन तक अन्य धर्मोंको छोड़ देना चाहिये? तब तक ब्रह्मचर्य आदि तीन आश्रमोंका, तीन वेदोंका तथा तीन अग्नियों का सेवन न करना चाहिये? और ब्रह्म आदिकी उपासना नहीं करनी चाहिये? ऐसा नहीं । जैसे यहां माता, पिता आदिकी सेवाके साथ वेदादिका सेवन भी इष्ट है; वैसे ही क्रियाके अथैवादमें क्रिया के साथ जाति- कुल आदि भी ब्राह्मणत्वका कारण सिद्ध हुआ - यह ' आलोक ' पाठकोंने ठीक - ठीक समझ लिया होगा 1. ; · ( २ ) पूर्वपक्ष - ' शूद्र - ब्राह्मणयोर्भेदो मृग्यमाणोपि यत्नतः । नेक्ष्यते सर्वधर्मेषु संहतैस्त्रिदशैरपि ' ( भविष्य. ब्राह्म. ४१/३६ ) यहां शूद्र एवं ब्राह्मणका भेद ढूंढनेपर देवताओंको भी नहीं मिलता; यह कहा गया है; तब ब्राह्मणादि गुणकर्मसे ही सिद्ध हुए । उत्तरपक्ष - इस पद्यसे हमारे पक्ष की कोई हानि नहीं; क्योंकि-उनका बाह्य - शरीर से कोई भेद नहीं कह सकता । भेद तो वही · बता सकेगा; जो उनके पूर्वजन्मके कर्मोंको जानता हो, वा उनके भीतरी सूक्ष्म - शरीरको जानता हो । तभी तो भगवान् - रामने तपस्या करते हुए भी शम्बूकको शुद्र जान लिया; और नारदजीने ' भीलोंमें रहने वाले भी वाल्मीकिको ब्राह्मण जान लियो । उक्त पद्यमें बाहरी शारीरिक भेदका न जाना जा सकना कहा है । शारीरिक भेद तो बहिन और पत्नीका भी ज्ञात नहीं हो सकता; CC - 0. Ankur Joshi Collection तब क्या उनमें सर्वथा अभेद मान लिया जावे ? कमसे भेद कहा जावे; तब क्या सनातनधर्म ब्राह्मणोंके कहतां? शुद्रके कर्म नहीं कहता? केवल उसका कर्म कि - वर्ण जन्मसे होता है; तब उस वके यह कहना है नियुक्त किये जाते हैं । इसमें ( ३ ) पूर्वपक्ष - ' ममानुस्मरणं षोडशाङ्गा भक्तिरियं यस्मिन् मुनिः श्रीमान् स जात्या स च उस वर्णं वाले को तो सनातनधर्मके पक्षकी पुष्ट नित्यं भक्त्या श्रद्धापुरस्कृतम् । म्लेच्छेपि वर्तते । विप्रेन्द्रः । स पण्डितः । न मे पृथक् चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचोपि यः । तस्मै देयं ततो ग्राह्य ' स हि पूज्यो यथा हाम् ( भविष्य. ब्राह्मपर्व १५२।२७-२८ - २१ ) इससे भक्तिसे चाण्डाल द्विजेन्द्र होना कहा गया है । उत्तरपक्ष- - आर्य समाजने भक्ति से ब्राह्मणत्व कभी नहीं माना; नहीं तो वे भी भक्त - अछूतको बुलाकर क्यों उनके द्वारा विवाहादि - संस्कार नहीं कराते? उन्हें अपनी लड़कियाँ क्यों नहीं देते? उन्हें अपना अध्यक्ष क्यों नहीं बनाते? इससे स्पष्ट है कि - इस प्रकारके अर्थवादात्मक श्लोकोंका केवल भक्ति प्रशंसा में तात्पर्य है । शिखा ' ते वर्धते वत्स! गुडूचीं श्रद्धया पिब ' यहां गुडूची पीनेसे शिखा बढ़नेका कुछ सम्बन्ध न होने पर भी जैसे यह कह दिया जाता है कि बच्चे! गुहूची ( सत्त - गिलोय ) पी ले, तेरी चोटी बड़ी हो जावेगी, वैसे उ

श्लोक में भी जान लेना चाहिये । यहां मीमांसादर्शनका एक

स ० ध ० २० Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 167

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 167 का मूल पृष्ठ
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ३५ ३०६ ] देख लेना चाहिये- ' अपशवो वा अन्ये गो-कमसे उदाहरण भी गोअश्वाः ' एतदादिषु विध्यर्थवादसन्देहे अर्थ-कर्म अश्वेभ्यः, पशवो इति प्राप्त अभिधीयते - यदि विधयो भवेयुः, विधय कहना है । गो - अश्वा एव पशवः स्युः; अन्येषां पशूनामुत्पत्तिरनर्थिका स्यात् । वाले कर्म च नाव कल्पेत । अतः स्तुत्यर्थं संवादः । गोश्रश्वान् तकी विध्यन्तरं पशूनां निन्दा । यथा यद् अघृतम्, ' अभोजनं प्रशंसितुमन्येषां तत् । यद् मलिनम्, अवासस्तद् - इति ' ( १।४।२६ ) । पुरस्कृतम् । इस प्रकार पुराणके उक्त पद्यके भी अर्थवाद होने से भक्ति-विप्रेन्द्रः स रहित ब्राह्मणकी जो निन्दा प्रस्तुत हो रही है; उसमें भी मीमां-चतुर्वेदी सादर्शनकी यह बात याद रख लेनी चाहिये कि - ' नहि निन्दा -यथा हाम् निन्दितं निन्दितुं प्रयुज्यते, किं तर्हि? निन्दिताद् इतरत् एडालको प्रशंसितुम् । तत्र न निन्दितस्य प्रतिषेधो गम्यते, किन्तु इतरस्य कभी नहीं के द्वारा क्यों नहीं स्पष्ट है भक्तिरी बीं श्रद्धवा म्वन्धन गुडूची वैसे नका एक विधिः ' ( २ | ४ | २० ) इससे अर्थवादकी स्थिति पर प्रकाश पड़ता है कि - अर्थवादमें केवल तात्पर्य को देखना चाहिये; सब शब्दोंके अर्थका वहां कुछ भी सम्बन्ध नहीं हुआ करता । पुराणके उक्त श्लोकोंको उपस्थित करने वाले प्रतिपक्षियोंसे पूछना यह है कि - दूसरोंके मतको दूषित करनेकेलिए आप पुराणोंको प्रमाण मानते हैं; वा सर्वसाधारणरूपसे? पहली बात ठीक नहीं; क्योंकि वादी प्रतिवादी दोनोंसे सम्मत ही प्रमाण वादके उपयोगी होता है, नहीं तो आप भी पुराणोंको प्रमाण -कोटि में मानिये | दूसरी बात भी ठीक नहीं; तब तो पुराणोंमें, प्रतिपादित मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, विधवाविवाहका व्यवस्थागत भ्रान्ति परिहार [ ३०७ खण्डन - आदि आपकों भी मानने पड़ेंगे, पर आप लोग नहीं मानते । वास्तव में श्राक्षिप्त श्लोक केवल कर्म वा भक्तिकी प्रशंसाको ही सूचित करते हैं । पूर्व श्राचायेंने इस अभिप्राय से कहीं - कहीं भक्ति वा कर्मके अर्थवाद लिखे हैं कि- त्राह्मण गुण - कर्म वा भक्तिसे च्युत न हो जाएँ; और गुण - कर्मोंसे च्युत हुए हुओंका न होवे | गुणकर्म - व्यवस्थामें भी पूर्व - जन्मके ही गुणकर्म सम्मान हुआ करते हैं, इस जन्मके नहीं । इस जन्मके गुणकर्म इष्ट अग्रिम - जन्मके शरीर को बनाने वाले होते हैं । तो प्रतिपक्षियोंको यह सनातनधर्मका सिद्धान्त भी याद रख लेना चाहिये कि - श्रुति, स्मृति तथा पुराणमें विरोध हो; तो श्रुतिकी, स्मृति तथा पुराण में विरोध हो, तो स्मृतिको बात मानी जाती है । सबसे अविरोध होनेपर ही पुराणकी बात मानी जाती है - ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर् ( स्मृति - पुराणयोर् ) द्वेघे स्मृतिर्वरा ' ( व्यासस्मृति १।४ ) सनातनधर्म केवल पुराणोंपर अवलम्ब नहीं रखता; तथापि हमने पुराणके श्लोकोंकी व्यवस्था भी बता दी है । ( ४ ) पूर्वपक्ष — क्षत्रिय भी विश्वामित्र ब्राह्मण होगये; जैसे कि-' ततो देवो ददौ तस्मै विश्वामित्राय धीमते । इहैव तेन देहेन ब्राह्मणत्वं सुदुर्लभम् ' । तब वर्ण - व्यवस्था गुणकर्मसे है, जन्म से नहीं । उत्तरपक्ष - यह प्रतिपक्षीसे दिया हुआ पद्य उसीके पक्षको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३०८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) काट रहा है । यहाँ कहा है- ' इहैव तेन देहेन सुदुर्लभं ब्राह्मणत्वं ददौ ' । इस प्रकार महाभारत में भी कहा है- ' देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणोऽभवत् ' ( महा. अनुशासन. ३।१७ ) इससे स्पष्ट है कि-इसी जन्ममें, इसी शरीरसे क्षत्रिय - आदिका ब्राह्मण आदि होना सामान्यशास्त्र नहीं । इसलिए महाभारत में कहा है- ' एवमेतत् परं स्थानं ब्राह्मण्यं नाम भारत! तच्च दुष्प्रापमिह वै महेन्द्रवचनं यथा ' ( अनुशासन. २६।२६ ) सो दूसरे शरीरमें दूसरा वर्ण मिलना सामान्य-शास्त्र होनेसे सिद्धान्त हो है । विश्वामित्रका वर्णपरिवर्तन तो अपवाद है । अपवाद - वचनसे सार्वत्रिक व्यवस्था कभी नहीं हुत्रा करती । वस्तुतः विश्वामित्रकी क्षत्रियत्व - प्रसिद्धि भी असत्प्रसिद्धि ( गलत ) ही थी । ' नह्यमूला जनश्रुतिः ' ( जनश्रुति सर्वथा निर्मूल भी नहीं हुआ करती; उसका भी कुछ कारण अवश्य होता है ) इस न्यायसे उसकी क्षत्रियत्व - प्रसिद्धि में कारण यह है कि उसका पिता गाधि क्षत्रिय था; उसकी माता भी क्षत्रिया थी । इस बाहरी प्रसिद्धिके कारण ही विश्वामित्रको जहाँ - तहाँ क्षत्रिय भी कहा गया है । जैसा कि - ऐतरेय ब्राह्मण में उसे शुनःशेपने ' राजपुत्र ' ( ५।३३ ) कहा था । जैसे कि मतङ्ग, ब्राह्मण माता - पिता के होनेसे, बाहर ब्राह्मण प्रसिद्ध था; अथवा कंस बाहिरसे उग्रसेन के पुत्र होने से क्षत्रिय प्रसिद्ध था; वास्तव में उसकी मातासे कालनेमि दैत्यने बनमें बलात्कार कर लिया था - यह कथा ब्रह्मवैवर्त आदिमें स्पष्ट है । इस प्रकार मतङ्गकी वास्तविकताका पता भी पीछे लगा कि-उसकी ब्राह्मणी - माताका शूद्र - नाईसे संयोग हुआ था; तभी उसे CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत भ्रान्ति - परिहार [ ३० चाण्डाल समझा गया । परन्तु विश्वामित्र अपने माता - पिता के मैथुन से उत्पन्न नहीं । उनकी उत्पत्ति तो ऋषिसे दिये हुए ब्राह्मण - चरुसे हुई थी । हुए इसें थे । लिए वे जन्मसे ही ब्राह्मण थे । तभी तो ब्रह्माने भी उसे ।. वर देते हुए उसे जन्मसे ब्राह्मण सोचकर ' ब्रह्मर्षि ' का स ही ' नासतो विद्यते श भावो नाभावो विद्यते सतः ' ( अविद्यमानकी सत्ता नहीं विद्यमानका अभाव नहीं होता ) इस न्यायसे होती. त उसे वैसा वर दिया था; नहीं तो वार - बार तपस्या करने पर भी इन्द्रमत ब्राह्मण क्यों नहीं बनाया १ अथवा अन्य तपस्यामें लग्न भी, ब्रह्मज्ञानी भी जनक आादि ब्राह्मण क्यों नहीं माने गये, वा हुए? तब स्पष्ट है कि- जनक आदि जन्मसे क्षत्रिय थे, परन्तु चरु द्वारा विश्वामित्र को जो जन्म से ब्राह्मणता प्राप्त हुई थी; उसीने उसे मातासे आये हुए क्षत्रियत्वको हटाने के लिए प्रेरणा दी । वाल्मीकि - रामायणमें इनकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं लिखा; इसलिए बहुतसे व्यक्ति विश्वामित्रको क्षत्रिय समझते हैं । इनकी जन्मकी कथा तो महाभारत-मैं कही गई है, जिसके देखने से इस विषयका संशय रहता ही नहीं । विश्वामित्रकी पूरी कथा महाभारत के अनुशासनपर्व ( ४६ अध्याय ) में देखनी चाहिये । संक्षेप से यहाँ भी कहते हैं । रावा गाधिकी कन्या सत्यवतीका ऋचीकनामक ब्राह्मण - मुनिसे विवाह हुआ । सत्यवतीकी सेवासे प्रसन्न हुए मुनिने उसे वर माँगनेको कहा | सत्यवतीने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्रका वर माँगा । इसे मानकर ऋचीक - मुनिने दो चरुओं को अभिमन्त्रित Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ३१० 1 कि इस चरुको तो तुम खा लो, और दूसरा चरु करके कहा नहीं माँको दो । क्योंकि हुए थे । ' मया हि विश्वं यद् ब्रह्म त्वश्चरौ संनिवेशितम् । क्षत्त्रवीर्ये च थी । इसी चरौ तस्या ( त्वन्मातुः ) निवेशितम् ' ( महा. अनुशा. ४१३८, ब्रह्मर्षि का शान्ति सकलं. ४६।१६ ) तुम्हारे चरुमें मैंने ब्राह्मणत्व रखा है; और तो विद्यते के चरुमें मैंने क्षत्त्रवीर्य ( क्षात्रबल ) रखा है; अतः हीं होती; तुम्हारी माता में विख्यात ब्राह्मणको पैदा करेगी, और तेरी माता वैसा वर तू त्रिलोकी त्वं निमतको उप्र - बल वाले को उत्पन्न करेगी – ' त्रैलोक्यविख्यातगुणं ( सत्यवती ) विप्रं जनयिष्यसि । सा च ( गाधिपत्नी ) क्षत्नं विशिष्टं ब्रहाज्ञानी वै तत एतत् कृतं मया ' ( ४ | ३६ ) परन्तु भोली - लड़की सत्यवतीने स्पष्ट है माताके वरगलाने से चरुको बदल लिया, अर्थात् - अपना ब्राह्मण-हवसे मिला हुआ चरु तो अपनी माँ ( गाधि की स्त्री ) को दे दिया, रामायण में और स्वयं क्षात्रतेजयुक्त चरु खा लिया । यह जानकर मुनिने व्यक्ति कहा – ' व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात् त्वया मात्रा च ते शुभे! महाभारत- तस्मात् सा ( गाधि- भार्या ) ब्राह्मणं श्रेष्ठं माता ते जनयिष्यति ' ( ४ | ४० ) ही नहीं ' मातृस्ते ब्राह्मणो भूयात्, तव च क्षत्रियः सुतः ' ( शान्तिपर्व ४६/२१ ) ' ' क्षत्रियं तुझकर्माणं त्वं भद्रे! जनयिष्यसि ' ( ४ ४१ ) कि- तेरी माता-( का लड़का तो श्रेष्ठ ब्राह्मण होगा; और तेरा उग्रकर्मा क्षात्र-। राजा - विवाह बलधारी । माँगनेको इससे स्पष्ट होगया कि - गाधिकी स्त्रीने जो ब्राह्मणोत्पादक चरु त्रका वर खाया था; उससे उसकी सन्तान भी ब्राह्मण ही होनी थी । तभी कहा मन्त्रित है- ' विश्वामित्रं घाजनयद् गाधिभार्या यशस्विनी । ऋषेः प्रसादाद् CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार [ ३११ राजेन्द्र! ब्रह्मर्षि ब्रह्मवादिनम् ( महा. अनु. ४/४७ ) इससे विश्वा-मित्र जन्मसे ब्राह्मण सिद्ध हुए; और प्रतिपक्षियोंका आक्षेप सर्वेथा हट गया । जो व्यक्ति इतिहास में लिखी उनकी जन्मसे ब्राह्मणताको न माने; वह विश्वामित्र को भी इतिहासके बिना सिद्ध नहीं कर सकता कि विश्वामित्र भी कोई थे । तब उसका आक्षेप ही खण्डित होगया; क्योंकि पूर्व पक्षी इतिहासके अवलम्बन से ही तो क्षत्रियका ब्राह्मण बन जाना सिद्ध करना चाहता है । जब उसके मतमें इतिहास ही प्रमाण नहीं; तब वह कह नहीं सकता कि - अमुक - अमुक व्यक्ति निम्न वर्णसे उन्नत होगया । यदि वह पूर्वपक्षको सिद्ध करनेकेलिए इतिहास श्रादिको प्रमाण मानता है; तब विश्वामित्रका इतिहास - प्रोक्क जन्मसे ही ब्राह्मण होना भी उसे मानना ही पड़ेगा । इस प्रकार प्रतिपक्षीका पक्ष कट गया । विश्वामित्र गाधिके वीर्यंसे उत्पन्न नहीं हुए थे; इसलिए उनका पिताके वर्णसे भी सम्बन्ध नहीं था । वह तो ब्राह्मणसे दिये हुए ब्राह्मणत्व से अभिमन्त्रित चरु द्वारा उत्पन्न हुए थे; इस कारण वे जन्मसे ही ब्राह्मण थे; हाँ उनमें कुछ अपूर्णता अवश्य थी । उनके क्षत्रिय - पितासे सम्बद्ध क्षत्रिय- माताके शरीरसे जन्म होने-से ' यो भर्ता सा स्मृताङ्गना ' ( मनु. ६।४५ ) कुछ क्षत्रियत्व भी था । इस ब्राह्मणत्वकी अपूर्णता के कारण तपस्या - समाप्तिसे पूर्व उनका माता- पितृमूलक क्षत्रियत्व भी प्रसिद्ध था । इसीलिए उन्हीं-दिनों मेनकासे विश्वामित्रकी जो शकुन्तला नामकी कन्या उत्पन्न Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 170

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३१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हुई थी, क्षत्रिय राजा दुष्यन्तने उसे अपने विवाह - योग्य समझा, क्योंकि वह ब्राह्मणीसे तो उत्पन्न हुई नहीं थी । उन दिनों विश्वामित्रके शरीर से उसके क्षत्रिय पिता से सम्बद्ध क्षत्रिया-माताके परमाणु पूरे नहीं निकल पाये थे; क्योंकि मेनकाने तब उनकी तपस्यामें विघ्न कर दिया था; परन्तु तपस्या - समाप्तिके बाद उनकी क्षत्रिया - माताके परमाणु शरीरसे सर्वथा निकल गये; तब मुनिके ब्राह्मणत्वाधायक- चदका पूर्ण विकास हो जानेसे उनकी पूर्णता एवं शुद्ध - ब्राह्मणता होगई । इसलिए ब्राह्मणों का विश्वामित्र-गोत्र भी सुना गया है । जो कि कई क्षत्रियोंका भी विश्वामित्र गोत्र हुआ करता है; उसमें कारण अग्निपुराण में कहा गया है - ' वैश्य क्षत्रिय - शूद्राणां गोत्रं च प्रवरादिकम् । तथा सङ्कर- जातीनां येषां विप्राश्च याजकाः ' अर्थात् यज्ञ कराने वाले ब्राह्मणोंका जो गोत्र था; यजमान क्षत्रियोंने भी विद्या- वंश मानकर वही ब्राह्मणोंका गोत्र ले लिया । बीज और योनि प्रधानता बीजकी होती है, मनुस्मृति में लिखा है — ' बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते । सर्वभूत-प्रसृतिर्हि बीज लक्षण - लक्षिता ' ( ६ ३५ ) ' तस्माद् बीजं प्रशस्यते ' ( १०/७२ ) बीज था यहाँ ब्राह्मणत्वसे अभिमन्त्रित चर; तब उससे विश्वामित्रने ब्राह्मण बनना हीं था; परन्तु माताके रजके परमाणुओं के कारण प्राप्त हुए क्षत्रित्वको दूर करने केलिए विश्वामित्रने १५ सहस्र बर्षं तपस्या करके उन परमाणुओं को पृथक् कर दिया । पुरुषकी आयु १०० वर्षकी मानी जाती है; उस समय उसके शरीर में CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्णव्यवस्थागत - भ्रान्तिपरिहार परिवर्तन होकर नया शरीर मिलता है, तब गत- जन्मके नुसार वर्ण बदल जाता है । यहाँ के न मालूम कितने जन्म तथा क्षत्रियत्व के अभिमानके ढकनेसे ढकना हटा देने से प्रकट होगया । यदि प्रतिपक्षियोंके सिद्धान्त के होती, तो विश्वामित्र पूर्ण विद्वान् की प्राप्त्यर्थ घोर तपस्या की क्या तो १५ सहस्र वर्षों में विश्वापिक की म शरीर परिवर्तित होगये अ छिपा; द हुआ उसका ब्राह्मणल सुम ४ अनुसार. विद्वत्ता से ब्राहणन तो थे ही; तब उन्हें ब्राह्मणत आवश्यकता थी - श्रतः स्पष्ट कि ' — गुणकर्मसे वर्णव्यवस्था नहीं हुआ करती । यदि तपस्ता भी कर्म माना जावे; और उससे ब्राह्मणता सुलभ मानी जावे; ते भगवान् - रामने तपस्या करते हुए शूद्रको क्यों मारा? क्या तपस्यासे ब्राह्मण नहीं हुआ था? तपस्या करते हुए मतङ्गको ब्राह्म त्व क्यों नहीं दिया गया? इससे स्पष्ट है कि - विश्वासि व्या ऋचीकमुनि द्वारा दिये हुए ब्राह्मण चरुके कारण जन्मसे ही ब्राह्मण है । कर केवल माता से प्राप्त क्षत्रिय - परमाणुओं को दूर करने के लिए उतरे तपस्या करके उन परमाणुओं को दूर करके शुद्ध - ब्राह्मण वा प्रा पड़ की । तभी वसिष्ठ - आदिने भी उन्हें ' ब्रह्मर्षि ' माना । प्रश्न शेष प्रश्न यह बच गया कि सत्यवतीने जो क्षत्रियत्वाकि मन्त्रित चरु खाया था; उसकी क्या गति हुई- इसपर यह उ तैय है कि उसने पति को कहा था - ' प्रसादं कुरु विप्रर्षे! न मे स्यात् क्षत्रि सुतः । ( अनुशासन, ४ । ४४ ) कामं ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवि पित मर्हति । न तु मे स्यात् सुतो ब्रह्मन्! एष वै दीयतां वरः ( 818 ) Gujarat. An eGangotri Initiative