सनातन धर्मालोक ८
8 Shri Sanatana Dharma Lok Vol-8 By Devnath Sharma Shastri 1962 New Delhi - Sanatan Dharmalok Karyalay · 434 पृष्ठ · 44 खण्ड
विषय सूची
- सनातन धर्भासोड - ४ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC -… 1–10
- यमराज ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के सम्बन्धमें विद्वानोंके भाव । , विवाह के ( १ ).. आप संस्कृतके अद्वितीय विद्वान् हैं । इससे हमें मीसूक्त, विशेष प्रसन्नता है… 11–20
- [ R १४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) प्रारम्भ है; पर भाष्यकार श्रीवात्स्यायनने उससे पहले अवतरणिका शासनम लिखने शुरू करते हुए उसमें ' प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ… 21–30
- ३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) नहि मंगलमथशब्दवाच्यं क्वचित् प्रसिध्यति । न चाऽप्रसिद्धार्थ - कल्पनं न्याय्यम् । ' अथ ' शब्दश्रवणमात्रार्थकं तु मङ्गलम्… 31–40
- t ' ५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ५५ एडल अन्तर्गत होते हैं । यही वास्तविकता है । यही सनातनधर्मका हम सिद्धान्त - सूत्र है… 41–50
- ७४ 1 श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ७५ का पाठ क्या पूर्वका पर्यायवाचक है? - वैदर इस प्रकार किसी शाखा में वालखिल्यसूक्तोंका होना, किसी में -… 51–60
- ६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ e या है । कर रहा है, अर्थात्- ' होतारं विश्ववेदसम् ' में ' होता यो विश्व-व स्थ ' वेदसः ' मत कहो, ऐसा सूचित… 61–70
- ११४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) के इन मन्त्रों में पष्ठी विभक्तिके ' स्य ' में स्वरित और अनुदात्त स्वरका भेद प्रत्यक्ष दीख रहा है; इसका जो उत्तर होगा, वह… 71–80
- १३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) एवं वेदका अधिकार भी नहीं हो सकता । इसमें स्पष्टता ' आलोक ' के तृतीय पुष्पमें देखनी चाहिये… 81–90
- १५४ ] श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) इस प्रकार वेदमें यौगिक, रूढ, योगरूढ और यौगिकरूढ शब्द सिद्ध होगये | जो आधुनिक वादी ' वेद में केवल यौगिकता है ' इस इठमें… 91–100
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) १७४ ] ' दिधिषोः ' आदिका ' गर्भस्य निधातुः ' इत्यादिमें प्रथं छोड़कर ' पुनर्भूर्दिधिपूरूढा द्विस्तस्या दिधिषूः ' अमरकोष ' का… 101–110
- ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) १६४ मरवाना इष्ट नहीं; वह तो पुरुषोंके कष्ट देनेवाले बिच्छू - ततैये के कांटेको, तथा साँपके दाँतों को तुड़वाकर • और सर्पका सर्पत्व… 111–120
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २१४ ] पुराणेतिहासके निन्दक उन लोगोंने जब वेदोंके पन्ने डाली । पर देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि वेदोंमें पलटे, तो यह वे ही… 121–130
- श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) २३४ j में भी इनका ऐसा प्रयत्न देखा जाता है, देखिये उसके बल्कि नियोगखण्डन मनुस्मृति - प्रकरणमें श्रीतुलसीराम - स्वामीकी अर्थोंमें… 131–140
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २५४ ] इतिहास - पुराणका खण्डन कभी कर न सके; अतः इतिह समाजी कर दिया । बिन्दुएँ दे उन्होंने अर्थ - परिवर्तन छिपा दिया ( ख ) एक अन्य… 141–150
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) २७४ ] ब्राहीमने उसने आश्चर्यसे देखा कि काले बोर्ड पर विशेष ए समयके बाद एक रेखाएँ बन गई हैं… 151–160
- श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ३६४ ] मानते । कई अर्वाचीन हिन्दु - सम्प्रदाय अपने - आपको तब सरे नहीं कहते हुए भी पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्मको केवल उसके श्रागेश… 161–170
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३१४ ] जन्म अर्थात् मेरा पुत्र क्षत्रिय न हो । मेरा पोता भले ही उग्रक्रम होवे… 171–180
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३३४ ] ' ब्राह्मी वी | इसलिए भिन्न - भिन्न वर्णवाले पति - पत्नीके वीर्य एवं उ rust रजके संयोगमें शास्त्रोंमें वर्णसङ्कर की… 181–190
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ३५४ ] ३५ श हो जाते हैं, क्योंकि यह अर्थवाद हैं; वर्ण - परिवर्तनमें केंगे । अब विश्रान्त तात्पर्य नहीं हुआ करता… 191–200
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) स्थानमें बुड्ढी दुष्ट स्त्रियाँ हों, वे इस वधूको तेज दें ' । तब जी आ रही इस कुलटाएँ आर्यसमाजी - वधुओंको अपना क्या तेज देंगी? यही… 201–210
- ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ३६४ यह निकलें; ऐसी दशा में राजसभा वा विद्यासभा न्यून - वर्णवाले सकता घट पुत्रोंके माता - पिता केलिए क्या प्रबन्ध करेगी? अथवा… 211–220
- ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ४१४ है, यही कर्मसङ्करताका दूसरा कारण है । रसे श्र कर्मसङ्करताका तीसरा कारण है मिश्र संस्कार | प्रकृतिके 1 तीन गुणवाली होनेसे… 221–230
- श्रीसनातनघर्मालोक ( ८ ) ४३४ ] वैसे पुरीषालयों तथा कूड़े के पीपों में भी आप लोग करते हैं: चाहिये… 231–240
- ४५० · ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ru उस पुरुषकी कोई रखेली तो ऐसा कर भी ले, पर उसकी धर्म-को मेरा पत्नी वैसा नहीं कर सकती… 241–250
- ४७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हस्तस्पर्शमात्रसे गर्भ हो जाना कहनेसे उक्त घात ( तपःशक्ति ) 1 मूल सिद्ध हो जाती है… 251–260
- ] श्रीसनातनधर्माला ( c ) ४६० यहाँ उतना स्थान नहीं । इधर लेखक महाशय ‘ श्रुतिस्मृतिपुराणानां का श्रा विरोधो यत्र दृश्यते… 261–270
- श्री सनातनधर्मालोक ( 5 ) ५१० ] ' दि ( ) धिषोः ' यह दोनों विशेषण सामने पड़े हुए मृतक पति के ( श ६३ ) सि द ही बतला रहे हैं, किसी अन्य के नहीं… 271–280
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ५३० ] ५२६ भी निषिद्ध होगया; तब इस मन्त्र में सुधारकों का सीका विधवाविवाह भी कैसा? यदि यहाँ ' कुमारी ' शब्द ' प्रथम-सीका विविवाह… 281–290
- [ ५५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ५४६ वं होते हैं? बल्कि पति भी नहीं होता; किन्तु प्रतिपक्षीके स्वामीके अनुसार ता है? रातको केवल उस विधवामें वीर्यको सींचकर… 291–300
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ५६ ९ ५७० j इसमें यह ध्यान रखना चाहिये कि अन्य युगमें ' सप्त ः इष्ट नहीं । पौनर्भवाः कन्या वर्जनीयाः कुलाधमाः… 301–310
- ५६० ] श्रीसनातनघमालाक ( ८ ) [ ५८६ से पूर्वके दस अनाह्मण पति हैं; जब ब्राह्मणने उस स्त्रीका जिसका पाणिग्रहण कर लिया; तो वही उसका एक पति हो जाता है '… 311–320
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६१० ] ६०६ वेद अन्य पतिकी इच्छाकेलिए प्रेरित करता है; वह विवाहसे देगा? नियोगसे? यहाँ तो न नियोगका नाम कहा है, न विवाहका र - पुरुषके… 321–330
- श्रीसनातनधर्मांलोक ( 4 ) ६३० ] [ ६२६ पहले तक होती है । सो सप्तम - पदसे पूर्व तक कन्यात्व होनेसे कई कारण विशेषवश उस लड़कीका विवाह हो सकता है… 331–340
- श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ६४ ९ ६५० ] पड़ती । हाँ, इतना अवश्य है कि उक्त पद्यका सब धर्मशास्त्रोंके मोदते '. सामञ्जस्यसे विधवाविवाह अर्थ नहीं होगा… 341–350
- ६६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६६७ पतिका गुम होना क्या हुआ? पति यदि क्लीच वन जावे; तो कर क्या स्त्री भी क्लीव वन जाए?… 351–360
- ६८८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ६८७ आजकल विधवाविवाहके अनुकूल हो रहे हैं । तब उन्हें ' सत्यार्थ-हो प्रकाश ' में भी परिवर्तन करना पड़ेगा… 361–370
- 1 श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ७०८ | ७०७ ' या च इदानीं प्रागभिसम्बन्धात् पुंसा सह संप्रयोगं गच्छति, का तस्यां कन्याशब्दो वर्तते एव ' यह भाष्यकारका कथन तथा उसपर… 371–380
- ७२८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) जो कामुकी विवाहित स्त्रियाँ उन अपने वृद्ध पतियोंसे अथवा शीघ्रपतन वाले युवक पतियोंसे अपनी कामपूर्ति होती नहीं देखेंगी; तब वे… 381–390
- ७४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ७४७ स्त्रीकी वृत्ति न बनाकर जावे, तो बड़ी से बड़ी पतिव्रता भी एतदपि नार्थम् पेटके लिए बिगड़ सकती है… 391–400
- 4 ७६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) है । और देखिये-‘ उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शं नो दिविचरा ग्रहाः ' ( अथर्व-१६६७ ) यहाँ प्रार्थना की गई है कि- पृथिवीके… 401–410
- [ ७८७ ७८८ | श्रीसनातनधर्मालीक ( 5 ) वादनवाचक नहीं । यदि अभिवादनार्थक होते; तो प्रत्यभिवादनमें इनका प्रयोग न किया जाता… 411–420
- | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ८०८ मितरूपसे ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यान लगाया करता हूँ, पर आज ध्यान में मुझे नित्यकी भांति ज्योति नहीं दिखाई दी, और उसके स्थान एक लाल… 421–430
- CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative CC - 0. Ankur Joshi… 431–434