सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 301–310
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 301–310
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ५६ ९ ५७० j इसमें यह ध्यान रखना चाहिये कि अन्य युगमें ' सप्त ः इष्ट नहीं । पौनर्भवाः कन्या वर्जनीयाः कुलाधमाः । वाचा दत्ता, मनोदत्ता, । तामनेन वचनसे । उदकस्पर्शिता या च या च पाणिगृहीतिका । क कृतकौतुकमङ्गला भी ' पति'- अग्निं परिगता या च पुनर्भू प्रभवा च या ' इस उद्वाहत्तत्त्वधृत पर भी काश्यपवचनसे वाग्दानादिकालीन - पतिके मरनेपर भी कन्याको वह पुनर्भू मानकर उनका विवाह निन्दित माना जाता था । इसलिए सावित्रीने जब अपने आपको सत्यवान्को मनसे दे दिया; तब लखा है- सुनकर उसने पुनर्भूत्वके विचारसे अपना अन्यसे ६६ ) इससे उसकी अल्पायु विवाह नहीं किया; किन्तु उसीसे विवाह किया ( महा. वनपर्व ) सद्ध हुआ, काशीनरेशकी कन्याने सुदर्शन के ( देवरादौ ) ' देवीभागवतके नवमस्कन्धमें नियुञ्जाना लक्षणोंको सुनकर उसको मनसे वरण कर लिया । काशीनरेशने है । इसी उसका स्वयंवर करना चाहा, पर कन्याने पूर्वोक्त कारणवश मा. ' निषेध कर दिया और सुदर्शनसे ही विवाह किया । इसी प्रकार से कन्या- अनु. • जब भीष्म स्वयंवर में काशीनरेशकी तीन अम्बा आदि लड़कियों-। देवराव को अपने भ्राताकेलिए हरण कर लाये, उनमें अम्बाने कहा कि-नादिद्य मैंने मनसे शाल्वको पति वरण कर लिया है, भीष्मने अक्षता सोह उस लड़कीको शाल्वके पास भेजा, पर शाल्वने उस गतप्रत्यागता-वाग्दत्ता को स्वीकार नहीं किया; उस बालाका भी पुनर्विवाह नहीं हुआ । अग्रिम - जन्ममें शिखण्डी बनकर वह भीष्मके विनाशमें कारण -- ना । ' यथा उस. बनी । जब इस प्रकार वाचा दत्ता, मनोदत्ता कन्याओंका भी प्रसवात् पहले समय में पुनर्भूत्वकी शङ्कासे विवाह नहीं हुआ करता था, तव पूर्णविवाहिताका पुनर्विवाह शास्त्रीय कैसे हो सकता है? । नियोग वा विधवाविवाह [ ५७१ इस प्रकार कलियुगमें भी वाग्दत्ताविधवाओंका पुनर्भूत्व और चर्जनीयता न हो जावे; उस इस वचनका अपवाद कलियुगके-लिए व्यवस्थापित ' पराशरस्मृति ' में ' क्लीवे च पतितेपतौ । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ' ( ४ | ३० ) ग्रह पराशरका वचन नियतीकृत है । अर्थात् कलियुग में वाग्दत्ता आदि कन्याओंका वैधव्य में देवरसे नियोग न होकर देवरसे विवाह हो ही सकता है । इस विषयमें आगे देखें । अव मनुवचनमें जो कि वाग्दत्ताके वैधव्यमें नियोग लिखा गया है; उसका उक्त पराशर चचनानुसार विवाह में ही पर्यवसान हो जाता है, जैसे कि श्रीकुल्लूकभट्टने भी उक्त मनुपद्यकी टीका में लिखा है- ' यस्याः कन्याया वाग्दाने कृते सति भर्ता म्रियते, तामनेन वच्यमाणानुष्ठानेन भर्तुः सोदरभ्राता परिणयेत । मेधातिथिने भी लिखा है- ' वाचा सत्ये कृते - वाग्दाने निष्पन्ने निजसोदरो देवरो विन्देत विवाहयेत् । सर्वज्ञनारायणने भी लिखा है - ' वाग्दत्ताविषयकमेव, वाचा - सत्यवचनेन - सत्यं मया दातव्या इयमिति सत्याङ्गीकारे । अनेन विधिना - विवाहविधिना, निजः पतिसोदरो देवरो विन्देत ' । नन्दनने भी लिखा है । ' अथ वाग्दत्तायाः पत्यौ मृते कर्तव्यं श्लोकद्वयेन आह ' । रामचन्द्रने लिखा है- ' वाग्दत्तां प्रति आह अनेन विधानेन - विवाहविधानेन निजो देवरः विवाहयेत् ' । स्वा ० दयानन्दजीने भी इसी मनुपद्यको अपूर्ण लिखकर उसका अर्थ किया है- ' अक्षतयोनि विधवा हो जाय; तो पतिका निज छोटा भाई भी उससे विवाह कर सकता CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५७२ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) है । ( स.प्र. ४ पृ. ७२ ) यहाँ भी वही वाग्दत्ता- विधवा विवाह में ही भाव है; क्योंकि तभी वह अक्षतयोनि होती है; विवाहवाले दिन तो स्वामीजी उसे क्षतयोनि करा दिया करते हैं । इस प्रकार आर्यसमाज के आर्यमुनिजीने भी तथा श्रीराजाराम शास्त्री आदि ने भी उक्त मनुपद्यको वाग्दत्ताके विवाह में ही लगाया है इस प्रकार आर्यसमाज से प्रकाशित ' अबला रक्षक ' पुस्तकमें भी । ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वो-ऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनुः २७ ) इस मनुस्मृतिके वचनसे सिद्ध होता है कि मनुने अपनी स्मृतिमें जो सिद्धान्त स्थिर किया है; वह सब वेदमें कहा गया है । तदनुसार ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ' ( मनु. ६६६ ) ' मिथो भजेताऽऽप्रसवात् सकृत् सकृद् ऋतावृतौ ' ( ६।७० ) यह मनुपद्य ' विधवेव देवरं ' इस पूर्व -वेदमन्त्रकी व्याख्या है । सो इससे वाग्दत्ता- विधवाका ही यहां नियोग वा विवाह इष्ट है, विवाहिता - विधवाका नहीं - यह सम्यक्तया सिद्ध हो गया; उसमें कारण यह है कि- वेद प्रविवा-हिता स्त्रीका ही विवाह मानता है, विवाहिताका नहीं | देखिये-' कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' ( अथर्व ११।५।१८ ) ' कन्या विन्दते पतिम् ' ( अ. १४/२/२२ ) ' कन्या - शब्दोऽयं पुंसाऽमिसम्बन्ध-( विवाह ) पूर्वके संप्रयोगे निवर्तते ' ( महाभाष्य ४ | १ | ११६ ) ‘ कन्या-अकृतविवाहा ' ( सायणाचार्य अथर्ववेदभाष्य -११।७ ( ५ ) ।१८ ) ‘ कन्या - शब्दो विवाहरहितस्त्रीमात्रमाचष्टे ' ( पराशरमाधवीय ) नियोग और विधवाविवाह [ 203 ५७ ' बुद्धिमते कन्यां प्रयच्छेत् ' ( अश्व. गृ. १५२२ ) ' यदियं कुमारी अभिजाता ' ( अश्व. १२५५ ) ' असमानर्विगोत्रां ही कन्या ( हारीत ४ | १ ) । विवाहिता हो जानेपर उन लड़कियोंके कन्यात्वके नष्ट जिर कारण उनका विवाह मानने पर ' कन्या युवानं विन्दते होने के पतिम् ' निय ( अथर्व -११।५।१८ ) इत्यादि वेद - वचन, तथा ' पाणिग्रहणिका मन्त्रा कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाऽकन्यासु ' ( मनु. ८२२८ ) इत्यादि स्मार्त-वचन भी व्याकुपित होजाएंगे । वाग्दत्ता लड़कीके तो विवाहिता न होनेसे ‘ अद्भिर्वांचा च दत्तायां म्रियेताथो वरो यदि । न च उसी मन्त्रोपनीता स्यात् कुमारी पितुरेव सा ' ( वसिष्ठ - स्मृति १७६४ ) इत्यादि वचनोंसे कन्यात्वके कारण भावी पतिकी मृत्युमें भी ‘ विधचैव देवरं ’ इस वेद - वचनके अनुवादभूत ' यस्या म्रियेत मन्त्र कन्याया वाचा सत्ये कृते पति: ' इस मनुपद्यसे विवाह सिद्ध हो कि-ही जाता है, जो आजकल भी हुआ करता है । देवर पतिका क क्यो , भ्राता ही होता है; इसलिए वह निरुक्तके ' द्वितीयो वर ' इस है, प्रक्षिप्तपाठानुसार दूसरा वर यहां निष्पन्न हो जाता है । जो ही स्वा. दयानन्दादि देवरका अर्थ ' पतिका भाई ' केवल न मानकर गौणथा अन्य पुरुषमात्रको देवर मानते हैं; उनके मतमें- ' या नियुक्ता और है ऽन्यतः पुत्रं देवराद् वाप्यवाप्नुयात् ' ( ६ १४७ ) इस मनुपद्यमें माओ ' अन्यतः ' और ' देवरात ' में पुनरुक्ति हो जावेगी, और ' देवराद् विध वा’में तथा ‘ देवराद् वा सपिण्डाद् वा ' ( मनु ६५६ ) इनमें ‘ वा ’ मिथो शब्द व्यर्थ हो जाएगा । नहीं तो फिर श्वशुर भी अन्य होनेसे यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्री सनातनधर्मांलोक ( ८ ) [ ५ ५७३ II J यं भी उस वधूका देवर हो जाएगा । श्रातः उक्त पक्ष ' वा ' शब्दसे कुमारी वह - कन्यां ही खण्डित हो जाता है । ' इस प्रकार ' विधवेव देवर ' में उसी वाग्दत्ताका वर्णन है, ष्ट होने के जिसे मनुजीने अन्यत्र भी स्पष्ट किया है— ' कन्यायां दत्तशुल्कायां पतिम म्रियते यदि शुल्कदः । देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ' का मन्त्राः ( मनु. ६/६७ ) । विवाहिता होनेपर तो उसमें उसके पतिका ही दि स्मार्त- अधिकार होनेसे ' जीवन् वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम् ’ विवाहिता ( बृहत्पराशर ० ४।४८ ) इस वचनके अनुसार पतिकी मृत्युमें भी दं । नच उसी पतिका ही पतित्य रहता है; तब उसमें देवरका भी अधिकार १७५६४ ) नहीं रहता; अन्यका तो भला अधिकार ही कैसे सम्भव हो? न्युमें भी शेष प्रश्न यह है कि इस पक्ष में भी ' मर्यं न योषा ' यह उक्त म्रियेत मन्त्रकी दूसरी उपमा व्यर्थ हो जाती है, उसपर वक्तव्य यह है सिद्ध हो कि उस पूर्वपक्ष तथा इस उत्तरपक्षका आपस में बड़ा अन्तर है, पतिका क्योंकि पूर्व पक्ष में तो श्रुति एवं स्मृतिका विरोध है; पर उत्तर-रः इस पक्षमें तो विरोध नहीं । हां, यह अवश्य है कि- वाग्दत्ता विधवा-है । जो का देवरसे विवाह होनेपर भी मुख्य पतित्व नहीं रहता; किन्तु मानकर गौणपतित्व ही, क्योंकि यहां मुख्य विवाहविधि नहीं होती, नियुक्ता- और ' मर्यं न योषा ' में मुख्यपतिकी उपमा है; अतः इन दो उप-पद्य माओंकी पृथकता व्यर्थ नहीं । कारण यह है कि - वाग्दत्ता देव विधवाके विवाहमें ‘ यथाविध्यभिगम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम् । ' ' मिथो भजेताऽऽ प्रसवात् सकृत् सकृद् ऋतौ ऋतौ ' ( मनु ० ६।७० ) हो यह परतन्त्रता होती है; उसमें मुख्य पति वाली स्वतन्त्रता नहीं CC - 0. Ankur Joshi नियोग वा विधवाविवाह [ ५७५ होती । अतः स्पष्ट है कि- ' विश्वेव देवरम् ' में वाग्दत्ताविधवाका देवरसे नियोग वा विवाह है; विवाहिता- विधवाका देवरसे नियोग वा विवाह नहीं; क्योंकि उसमें शास्त्रोंका निषेध है । ( ६ ) ' या पूर्व पति वित्त्वा पूर्वपक्षी लोग विधवा विवाह वा नियोगका एक अन्य मन्त्र भी उपस्थित करते हैं वह यह है- ' या पूर्वं पतिं वित्त्वा अथान्यं विन्दते परम् । पचौदनं च तौ अजं ददातो न वियोपतः ' ( अथर्व. ६।५।२७ ) ‘ समानलोको भवति पुनर्भुवा परः पति ' ( २८ ) इसका वे इस प्रकार करते हैं- जो बी पहले पतिको प्राप्त कर फिर दूसरेको प्राप्त करती है; वे दोनों पचौदन अजका दान करें; तो फिर परस्परसे वियुक्त नहीं होते । वह दूसरा पति उस पुनर्भू [ पुनर्विवाहिता के समान लोकमें जाता है । यहां ' पुनर्भू ' शब्द स्पष्टतया विधवाका पुनर्विवाह बता रहा है ' । इस मन्त्रको श्रीतुलसीरामस्वामीने ' भास्करप्रकाश ' में तो पुनर्विवाहवाचक माना है, पर मनुकी टीका में नियोगका । यह परस्पर विरोध है । इसपर यह जानना चाहिये कि प्रतिपक्षियोंके अर्थानुसार तो इस मन्त्रसे पतिके जीवनमें भी उसे छोड़कर दूसरा पति लेना भी वैदिक हो जायगा; क्योंकि यहाँ पूर्व पतिके मरनेका नाम तो है-नहीं; किन्तु ' पूर्वं पतिं वित्त्वा, अथ अन्यं परं श्रेष्ठं विन्दते ' यह • वहांके शब्द हैं । अथवा कुछ समयकेलिए यही प्रतिपत्ति - प्रोक्त अर्थ भी मान लिया जावे; तब भी यहाँ विधि सिद्ध नहीं होती; यहाँ ' विन्दते ' यह लट्लकार है, श्रज्ञात्मक विधिलिङ् नहीं, Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५७६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) जिससे अन्यकेलिए वैसी विधि हो जावे । दूसरे मन्त्रमें तो इस सम्बन्धमें बहुत निन्दा आई है- ' अपरः पतिः पुनर्भुवा समान-लोको भवति ' अर्थात् उस दूसरे पतिको भी वही लोक मिलता है, जो पुनर्भू को । सब शास्त्रोंमें पतिव्रता - स्त्रीको पतिलोककी प्राप्ति ही कही जाती है; जैसे कि वेदमें- ' इयं नारी पतिलोकं वृरणाना ' ( अथर्व. १८ | ३ | १ ) क्योंकि- स्त्री ही पतिकी मृत्युमें उसके साथ सती होती है, पति पत्नीके मरनेपर उसके साथ नहीं जलता । पतिको कहीं स्त्री लोककी प्राप्ति नहीं कही जाती; पर इस मन्त्रमें तो उससे विपरीत पतिको ही पुनर्भू के लोककी प्राप्ति कही गई है । पुनर्भू स्त्रियोंकेलिए तो धर्मशास्त्रों में सर्वत्र निन्दा हीत की गई है; उनको नरकलोककी प्राप्ति वा शृगालयोनि आदिकी प्राप्ति कही गई है; तब उन्हें उत्तम लोक प्राप्त न होनेसे उस पुनर्भू के पतिको भी वही नरकादि लोक ही मिलता है - यही ' समान - लोको भवति पुनर्भुवा परः पतिः ' कहनेका रहस्य है; और पौनर्भवको मनु ( ६।१६० ) आदि स्मृतियोंमें अदायाद कहकर निन्दित एवम् अपाङ्क्तेय माना गया है 1 । वस्तुतः यह दो मन्त्र भी वाग्दत्ता- विधवाके विवाहको ही बताने वाले हैं; विवाहिताके पुनर्विवाहको नहीं । नहीं तो इन मन्त्रोंका ' सोमो ददद् गन्धर्वाय... अग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( ऋ. १०१८५ | ४१ ) इस वैवाहिक मन्त्रसे विरोध हो जायगा, क्योंकि – अग्नि विवाहके समय वरको कन्यादान कर फिर स्वयं उसके पतित्व से हटकर किसी अन्य पुरुषको उस स्त्रीके दान करनेमें अधिकारी नहीं रहता । जब CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और विधवाविवाह [ ५७७ ५७ वह वैसा नहीं रहता; तो फिर उस स्त्रीका विवाह अग्नि द्वारा वरको कन्या देना ही विवाह होता है ही कैसा! । इसका स्पष्टीकरस जात हम पुनः अन्य किसी निबन्धमें करेंगे । तब उसका द्वारा दान न होने पर भी विवाह करनेसे ' देव दत्तां अभिदेव ) बाच विन्दते नेच्छयात्मनः ' ( ६६५ ) इस मनु वचनका व्याकोप पतिमांयां तब देवदत्तत्व न होनेसे परस्पर विरोध होनेसे वेदमें होगा; तथा अप्रामाण्य प्रसक्त होगा, पर यह अनिष्ट है । ही व्याघात भा जिस पतिव्रतधर्मके सब शास्त्र स्तुति करनेवाले पतिव्रत धर्म भारतवर्षको स्थिर कीर्ति देनेवाला हैं, जो । बना, ' पत्युरनुव्रता भूत्वा संनह्यस्व अमृताय कम् ' ( अ. १४ | १ | ४२ ) ' साम श्रहमस्मि ऋक् बं, [ द्यौरहं - पृथिवी त्वम् । तौ इह सम्भबाव, प्रजाया ग्रह जनयावहै ' ( अ. १४ | २ | ७१ ) इत्यादि वेदमन्त्र भी जिस पतिव्रत I धर्मकी दृढताकेलिए कमर कसे हुए हैं, वहाँ वेद कैसे कह सकते यह हैं कि स्त्री पतिके मरनेपर अन्य को ले ले । तब यहाँ स्पष्ट है कि- श इस अथर्वके मन्त्रमें भी ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये हृते वा पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ' ( ६।६६ ) इस वेदानुकूल लिखनेवाले मनुके पद्यमें उल्लिखित ' पति ' के अर्थवाला वे वाग्दानकालीन ही पति इष्ट है; बल्कि यह मनुवचन ही इस मन्त्रका सा अनुवाद है । जैसा कि बृहस्पतिने कहा है- ' वेदार्थोपनिवद्धत्वात्-प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम् ' । शेष रहा इस मन्त्रमें उल्लिखित ' पुनर्भू: ' शब्द; सो यह मी विवाहिता- विधवाकेलिए नहीं है, किन्तु वाग्दत्ता - विधवाकेलिए है, उ स्व स ० ध ० ३७ Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) ही क्योंकि - वाग्दत्ता होनेपर भी पति मरणमें बालाको ' पुनर्भू ' ह स्पष्टीकरण कैसा? जाता है । जैसे कि - ' सप्त पौनर्भवाः कन्या वर्जनीयाः प्रयत्नतः । अग्निदेव वाचा दत्ता मनोदत्ता ' ( धमँचन्द्रिकादि निवन्धों में उद्धृत ) इस - पतिर्मायी काश्यपादिके वचनको हम पूर्व उद्धृत कर चुके हैं । यहां वाचा-कोप होगा दत्ता मनोदत्ताको भी पतिमरणमें विवाह करने पर ' पुनर्भूः ’ ही व्याघात माना है । नारदने भी कहा है ' कन्यैवाऽक्षतयोनिर्या पाणिग्रहण-दूषिता । ' पुनर्भूः ' प्रथमा प्रोक्ता पुनः संस्कारकर्मणा ' ( १२।४६ ) यहां पर ‘ पाणिग्रहणदूषिता ’ शब्द वाग्दत्ता आदिके उपलक्षणार्थ है, तो है । याज्ञवल्क्यने भी कहा है- ' अक्षता च क्षता चैव पुनर्भूः ' पत्युरनुवता श्रहमस्मि संस्कृता पुनः ' ( १ | ३ | ६७ ) यहां भी ग्रहण स्पष्ट है T । उस वाग्दत्ताका प्रजावा पतिव्रत • ' तामनेन विधानेन निजो विन्देत कह सकते यह हम पूर्व लिख चुके हैं इससे शब्दका मेधातिथिने ‘ यथाशास्त्रं है कि-अक्षतासे वाग्दत्ता आदिका पतिमरण में विवाह मनुस्मृति में देवर: ( ६ | ६६ ) से स्पष्ट है— अग्रिम पद्यमें कहे ' यथाविधि ' वैवाह्यो विधिः, तथा विवाह्या । सत्ये वाचनिकोऽयं विवाहः, पुनर्भूश्च तथोच्यते, नवा व्यूढापि सती ६६ ) इस भार्यां भवति ' यह अर्थ किया है सो वही वाग्दत्ता - पुनर्भू उक्त अबाला वेदमन्त्रमें इष्ट है । तब उक्त वेदमन्त्र और उक्त मनुवचनका आपसमें स मन्त्रका सामानाधिकरण्य सिद्ध होगया । अतः उक्त मन्त्रमें ' या ' से ' स्त्री ' द्धत्वात्- नहीं लेनी है, किन्तु ' कन्या ' ही लेनी है, जिसका विवाह पहले नहीं हो चुका; सो वही वाग्दत्ता - कन्या ही यहां प्रतिफलित होती है । यह भी उसके विवाहको भी उत्तम नहीं माना जाता; वहांपर प्रायश्चित्त-केलिए है, स्वरूप पचौदनयागका विधान दीखता है; उसमें मुख्यपति- विवाह-CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ ५७६ की तरह स्वतन्त्रता नहीं होती । इसीलिए सावित्रीको जब पतिके अल्पायुष्ट्रका नारदने वृत्त सुनाया; और वाग्दत्तात्व - कालीन पतिके सम्बन्धके त्यागार्थं कहा; तब उसने उसमें भी पुनर्भूत्ववश उत्तम - कक्षासे पतन देखकर उसका निषेध कर दिया । पर अन्य पुनर्भुवोंसे इसका बड़ा अन्तर है । वे विवाहिता तो पतिके जीवन वा मरणमें शास्त्र विरुद्ध दूसरी वार पतिको लेती हैं; उसमें तो ' न विवाहविधावुक्त ं विधवा - वेदनं पुन: ( ६ | ६५ ) यह वेदानुकूल स्मृति - प्रणेता मनुका निषेध है, पर इस वरदान-कालीन पुनर्भू में मनुकी भी ( चाहे वह संकुचित ही क्यों न हो ) आज्ञा दीखती है ( मनु ० ६६६-७० ) । संकोचका कारण यह है कि ऐसा करनेमें स्त्रीको पतिलोक नहीं मिलता; किन्तु पतिको ही उस पुनर्भू का लोक प्राप्त होता है - इससे ऐसे बिवाहकी कुछ निन्दितता है; इसलिए ' कुहस्विद् दोषा ' मन्त्रमें ' म न योषा ' से ' विधवेव देवरम् ' की उपमा कुछ अन्तर के कारण पृथक् दी गई है । पर विवाहित- विधवाको सर्वत्र पत्यन्तरका निषेध है; अतः इस मन्त्रसे भी वादियोंकी इष्टसिद्धि नहीं हो सकती; पर कलियुगकेलिए व्यवस्थापित पराशर स्मृतिने तो कलियुगमें इस वाग्दत्तानियोगकी कठिनता जानकर ' नष्टे मृते प्रब्रजिते क्लीवे च पतितेपतौ । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ' ( ४३२ ) इससे वाग्दत्ताका विवाह विना ही संकोचके अभ्यनुज्ञात कर दिया है । इस पद्य में ' पति ' शब्द माना जावे; अथवा ' पति ' शब्द; पर यहाँ दोनों ही दशामें वाग्दानकालिक ही पति इष्ट है, Gujarat. An eGangotri Initiative
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५८० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जैसे कि- ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ' ( ६३६६ ) इस मनुपद्यमें वाग्दानकालीन पुरुषको भी ' पति ' शब्दसे कहा गया है । इस विषयमें विस्तार अन्य निबन्धमें किया जाएगा । ( ७ ) ' सोमः प्रथमो विविदे ' पाठकोंने देख लिया कि जो मन्त्र दिये जाते हैं; उनमें विधवाविवाह वा नियोग सर्वथा नहीं है; इसलिए आर्यसमाज के प्रसिद्ध निष्पक्ष विद्वान् श्रीनरदेवजी शास्त्रीने ' आर्यसमाजका इतिहास ' ( प्रथम भागमें ) लिखा है- ' चारों वेदोंमें एक भी ऐसा मन्त्र नहीं, जिसमें स्पष्ट रीतिसे नियोगका प्रतिपादन किया गया हो, हम यह स्पष्ट कह सकते हैं कि वेद नियोगसिद्धान्तका पोषक नहीं ' ( पृ. ४ ) पर फिर भी कई व्यक्तियोंका यही काम रहता है । कि - वेदसे खोद - खोदकर नियोग निकालेँ; वस्तुतः यह रास्ता उन्हें स्वाद जीने ही दिखलाया है । स्वामीने स.प्र. में ११ पति सिद्ध करनेकेलिए एक मन्त्र दिया है; उसे हम उनके अर्थ समेत उद्धृत करते हैं - । वह मन्त्र यह है - ' सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयोऽग्निष्टे पतिः तुरीयस्ते मनुष्यजाः ' ( ऋ. १०२८५५४० ) यहाँ स्वाद जी ' मनुष्यजा ' को बहुवचन मानकर ग्यारह पति अर्थ करते हैं; उसमें उपोद्वलकरूपसे ' पति-मेकादशं कृधि ' मन्त्र देते हैं; और आजकल के आर्यसमाजी उसमें ' उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अत्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद् हस्तमग्रभीत् स एव पतिरेकधा ' ( अ. ५१७१८ ) यह मन्त्र उपस्थित किया करते हैं- उसमें हम ' पतिमेकादशं कृधि ' का तो पूर्ण नियोग वा विधवाविवाह समाधान ( ३ संख्या में ) पूर्व कर चुके हैं; यहाँ बताते हैं । इसमें ' सोमः प्रथमो विविदे ' इस मन्त्रका इस प्रकार अर्थ करते हैं- ' हे स्त्रि! जो | ५८१ शेषका समाधान स्वा. द जी . स.प्र. में ( ते ) तेरा पहिला विवाहित (? ) ( पतिः ) पति तुझको ( विविदे ( प्रथमः ) ) प्राप्त होता है, उसका नाम (? ) सोमः सुकुमारतादि - गुणयुक्त होनेसे सोम, जो दूसरा नियोगसे (? ) प्राप्त हुआ, वह ( गन्धर्वः ) एक स्त्रीसे सम्भोग करनेसे (? ) गन्धर्व और जो ( तृतीय उत्तरः ) दो के बाद म तीसरा पति होता है, वह ( अग्नि ) अत्युष्णतायुक्त होनेसे (? ) अग्निसंज्ञक, और जो ( ते ) तेरे तुरीयः ' चौथेसे लेके ग्यारहवें तक ( १ ) नियोगसे पति होते हैं; वे ( मनुष्यजा:) मनुष्य नामसे ( १ ) कहते हैं ' । वाह, स्वामीजीके सात्त्विक मस्तिष्कसे कैसा सात्त्विक अर्थ निकला है? अव इसपर विचार किया जाता है । यह मन्त्र तथा उसके साथका ' सोमो ददद् गन्धर्वाय, गन्धर्वो दददग्नये । रयिं च पुत्रश्चादाद् अग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( ऋ. १०१ ८५ | ४१ ) यह दोनों मन्त्र विवाहका एडके हैं; क्योंकि १० वें मण्डलका ८५ सूक्त वैवाहिक सूक्त है; और पारस्करगृह्यसूत्रमें भी विवाहसंकारमें स्व इन मन्त्रों का उपयोग है । तब अपने मान्य गृह्यसूत्रसे विरुद्ध नियोग में इनका विनियोग बताना स्वामीजीकी. आहो- पुरुषिका-मात्र है । मनुस्मृतिमें कहा है- ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः अ कीर्त्यते क्वचित् । न विवाहविधायुक्त विधवा - वेदनं पुनः ( ६।६५ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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| श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) | IIIII ५८२ ( वैवाहिक मन्त्रों में नियोग कहीं भी कीर्तित नहीं, विवाहविधि में समाधान कहीं विधवा - वेदन नहीं कहा गया ), जब ऐसा है, और स्वा ० द ० जी ने भी प्रथम सत्यार्थप्रकाशमें इसका यही अर्थ माना है, स.प्र.मैं आर्यसमाजके श्रीतुलसीराम स्वामी आदि भी इसका यही अर्थ प्रथमः ) मानते हैं; तब इन विवाहविधिप्रयुक्त मन्त्रोंमें नियोगका गन्ध भी होता कैसे आ सकता है? " सोम, यह अर्थं जो स्वामीजी ने किया है, वह निर्मूल है । इस स्त्रीसे के बाद मन्त्रका वक्ता वर है; उसके आगे वाले मन्त्रका वक्ता भी वही है; से (? ) वह यह अपनी विवाह्यमान स्त्रीको कह रहा है । उसका प्रमाण हवें तक है — इसके आगेके मन्त्रमें ‘ मा ' ' पद । ' अग्निर्मह्यमथो इ॒माम् ' से (? ) इस मन्त्रको स्वामीजी दवा गये हैं; इस मन्त्रका अर्थ यह है कि – सोमने तुझे गन्धर्वको दिया; गन्धर्वने अग्निको दिया, अर्थ और अग्निने इस तु वधूको मुझे दिया । यह दोनों मन्त्र तथा ( ४०-४१ ) इकट्ठे हैं; अतः इन दोनोंका अर्थ भी इकट्ठा लगेगा । रविं वर अपनी पत्नीको कहता है कि- मुझे अग्निने तुम्हें दिया ] यह है । अग्नि हुआ । स्वामीजीके मतानुसार तीसरा अत्युष्णतायुक्त नियोगी पति; उसने सौंपा मनुष्यज चौथे पतिको; तब क्या सूक कारमें स्वामीजीके मतानुसार विवाहित वधूके विवाहसे पूर्व ही तीन विरुद्ध पुरुषोंसे नियोग हो जाते हैं? क्या वह चौथा मनुष्यज वर भी षिका- नियोगी होता है? इस मन्त्रके अर्थ में स्वामीने पहलेको ' विवाहित ' नयोगः और दूसरे - तीसरेको ' नियोगी लिखा है — यह इस मन्त्रमें अन्तर = ६५ ) कहां सूचित किया गया है? यहां पहले पतिको सुकुमारतादि-CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह [ ५८३ गुणयुक्त होनेसे स्वामीने ' सोम ' कहा है, दूसरेको ' गन्धर्व ' और तीसरेको अत्युष्णतायुक्त होनेसे ' अग्नि ' माना है - यह बात वहां कैसे सङ्गत है? ' अत्युष्णतायुक्त तो उल्टा पहला पति होगा — जिसने २४ वा ४८ वर्ष तक वीर्यको रोका, किसी स्त्रीसे जिसका मेल नहीं हुआ । वह जव नवविवाह करेगा; तो अत्युष्णता तो उसमें होगी; तीसरेमें तो क्षीणता हो जानेसे प्रत्युष्णता कहां होगी, उसमें तो क्षीणता होगी । गन्धर्वका एक स्त्रीसे सम्भोग करनेसे उक्त नाम होने में प्रमाण वा संगति क्या है? दो स्त्रियोंसे सम्भोग करनेसे पुरुषको स्वामीने अग्नि कहा है; यह कथन भी गलत प्रतीत हो रहा है । स्त्रीको तो तीन पुरुषोंसे संयोग करनेसे कामाग्नि बढ़ जानेसे ' अग्नि ' कहा जावे, यह कुछ संगत भी हो; परन्तु पुरुषकी अग्नि - संज्ञामें क्या प्रवृत्ति - निमित्त है? पुरुषकी ११ स्त्रियां यहां कहां कही गई हैं? ' तुरीय'का ' चौथा ' अर्थ तो होता है, परन्तु स्वामीजीने उसका ' चौथेसे लेके ग्यारहवें तक नियोगसे पति होते हैं ', यह अर्थ किस निघण्टुसे किया है? ' तुरीयः ' क्या बहुवचनान्त है? यदि नहीं; तब उसका वैसा अर्थ कैसे किया गया? ' मनुष्यजाः ' का ' मनुष्य ' अर्थ कैसे किया गया? ' मनुष्य नामसे कहाते हैं ' ऐसा अर्थ किसका है? । पहले दूसरे - तीसरे पतिके नामका तो भेद हुआ; पर चौथेसे लेकर ११ वें तक एक ही ' मनुष्य ' नामसे कैसे कहलाए? उनका नामभेद क्यों न हुआ? ' मनुष्य ' नाम ही क्यों रखा गया? उनकी कामाग्नि कैसी है - वह नहीं बताया Gujarat. An eGangotri Initiative
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५८४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) गया? । चौथे पतिका नाम मनुष्य होनेसे पहले के तीन सोम, गन्धर्व, और अग्नि अमनुष्य - देवता सिद्ध हुए यह भी क्या कभी स्वामीने सोचा? स्वामीजीने ' मनुष्यजाः ' को बहुवचन समझ लिया है; तभी तो ‘ मनुष्य - कहाते हैं ' - यह अर्थ बहुवचनका किया है; तभी उन्हें ' तुरीय: ' इस एक वचनान्त पदका ' चौथेसे लेकर ग्यारहवें तक ' यह अर्थ करनेका साहस होगया । वस्तुतः यह अज्ञान है । ' तुरीयः ' यह एकवचनान्त विशेषण है; यदि इसका विशेष्य ' मनुष्यजाः ' बहुवचन होता; तो ' तुरीय: ' भी बहुवचन में ' तुरीयाः ' रूपमें होता; पर वैसा न होनेसे स्पष्ट है कि- ' मनुष्यजा: ' भी एकवचनान्त है । यह लौकिक प्रयोग नहीं है, वा ' मनुष्यज ' शब्द नहीं है कि- ' मनुष्यजा: ' यह बहुवचनान्त हो; यह तो वैदिक शब्द है, और ' मनुष्यजा ' शब्द है; उसीका एकवचन सु - प्रत्ययमें ' मनुष्यजा: ' ही बनता है । देखिये इसकी सिद्धि-यहाँपर ' मनुष्य ' पूर्वक ' जन् ' धातुसे ' जनसनखनक्रमगमो विटू ' ( ३।२।६७ ) इस पाणिनिसूत्रसे विट् प्रत्यय और ' विड्वनो-नुनासिकस्य आत् ' ( ६ | ४ | ४१ ) इससे जन् धातुके ' न् ' को ' आ ' और बिट् प्रत्ययका सर्वापहारी लोप होकर कृदन्ती होनेसे प्रातिपदिकसंज्ञा ( १ | २ | ४६ ) और ' सु ' ( ४/१/२ ) होकर रुत्व और विसर्गे हुई ', और ' मनुष्यजा: ' बना । ' तुरीय: ' इस एक-वचनान्त विशेषणसे तो एकवचनकी अन्य भी दृढता हुई । जब ऐसा है; तो चौथेसे लेकर ग्यारह तक पति यहाँ कहांसे निकलेंगे? । नियोग वा विधवाविवाह [ ५८५ वस्तुतः यहाँ सोम, गन्धर्व, और अग्नि यह लड़कीके कुमारावस्था में तीन देवता- पति माने गये हैं । आठ वर्षके गौरीसंज्ञक कन्या में एक वर्षे तक सोम देवताका ' सोमो बाद से गौरी श्रितः ' ( ऋ. १२/३ ), नववर्षके बाद से रोहिणी में गन्धर्व-देवताका, और दश वर्षके बादसे कन्या में एक वर्षे तक अि देवताका आधिपत्य रहता है । इस प्रकार ११ वर्षके वाद अग्नि क्य || देव अपना आधिपत्य उस लड़की से छोड़कर उसे मनुष्य - पतिको जब देता है - जिसकेलिए वर कहता है - ' अग्निर्मह्यमथो इमाम् ' । यही नह अग्निद्वारा वरको देना ही लड़कीका विवाह माना जाता है; इसलिए विवाहमें अग्निकी साक्षीमें ही कन्याका विवाह किया जाता है । यही यहाँ वास्तविक अर्थ है | वस्तुतः यह मन्त्र कन्याकी विवाहावस्था-को ही बता रहा है, इसमें कोई नियोगकी गन्ध भी नहीं । वैज्ञानिक अर्थ इसका लिया जावे; तो यह होगा कि - लड़कीके अ ऋतुकालका देवता वा स्वामी अग्नि है; जव उस ऋतुका मीतर-को छोड़कर बाहर आनेका काल होनेवाला होता है; वह उसे छोड़नेका काल होता है; सो अग्नि अपनी उपस्थितिमें ही अर्थात् ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही वह लड़की वरको सौंप देता है - इसका भाव यह हुआ कि ऋतुकालसे पूर्व कन्याका विवाह दा हो, और ऋतुकाल उपस्थित होने पर वह उस स्त्रीका पति रूप में उपयोग ले | अब बोलिये कहाँ गया यहाँ स्वा. द. जीका नियोगार्थ? ' सोमो ददद् गन्धर्वाय ' मन्त्रमें कहा गया है कि सोम-देवताने वह कन्या गन्धर्व - देवताको दी; पर नियोग में विवाहित-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) [ ५८५ ५८६ । लड़कीके पति उस स्त्रीको नियोगीको भला कहाँ देता है? वह तो मर जाता के बादसे स्वा. द. जी ही उस स्त्रीको निर्मूलतासे नियोगीको देते हैं । मो गौरी है ' गन्धर्वो , दददग्नये ' में कहा है कि गन्धर्व देवताने अग्नि देवता-में गन्धर्व- को दिया । अब बोलिये पहला नियोगी दूसरे नियोगीको वह स्त्री क अग्नि- क्यों देने लगा? क्या वह नपुंसक था, जो दूसरेको देने लगा? जब नियोगीकी वह स्त्री नहीं; उसपर उसका अधिपत्य य - पतिको नहीं, अथवा वह भी मर गया; तब वह दूसरे नियोगीको दे ' । यही ही कैसे सकता है? आगे लिखा है कि - अग्निने मुझे दिया । इसलिए यहाँ पर प्रश्न है कि मुझे किसको? यदि यहाँ चौथेसे है । यह ग्यारह तक ' को दिया ' यह अर्थ हो; तो यहां ' अस्मभ्यं ’ होना बहावस्था चाहिये, ‘ मह्य ” कैसे श्राया? ' मह्यम् ' के ' मनुष्यजा: ' होनेसे स्पष्ट है भी नहीं । कि- पहलेके तीन पति देवता हैं - मनुष्य नहीं । तब यहां नियोग--लड़कीके अर्थ स्वतः ही कट गया । ' मह्य ' में सम्प्रदानमें चतुर्थी होनेसे का मीतर- वह वर अन्य किसीको नहीं दे सकता, नहीं तो चतुर्थी अमिका व्याकुपित होती है । जब तक वर किसी दूसरेको अग्नि आदि = पस्थिति में की भान्ति अपनी स्त्री न दे; तब तक उसका पतित्व कभी हट सौंप देता नहीं सकता । परन्तु पुरुषका किसी अन्य पतिको अपनी पत्नीके विवाह दानका विधान किसी भी मन्त्र वा प्रामाणिक पुस्तकमें नहीं पति रूप में लिखा; तब उस पुरुषकी पतित्वनिवृत्ति भी जीवन वा भरणमें नियोगार्थ? कभी नहीं हो सकती । स्वा. द. जीने भी स.प्र. ४ र्थ समुल्लास में कहा कि - सोम- है - ' जब विवाह होवे, तव स्त्रीके साथ पुरुष और पुरुषके साथ विवाहित- स्त्री विक चुकी ' ( ४ र्थ समु. पृ ० ६६ ) । अन्यत्र भी स्वामीने कहा नियोग वा विधवाविवाह [ ५८७ है- ' तन तो विवाह - समयमें स्त्री और पतिके समर्पण हो जाता है, पुनः मन भी दूसरेके समर्पण नहीं हो सकता, क्योंकि - मन ही के साथ तनका भी समर्पण करना वन सकता है, और जो [ मनके साथ तन समर्पण ] करें; तो व्यभिचारी कहावेंगे ' ( स.प्र. ११ समु. पृ. २३६ ) । इसी याशयका मन्त्र भी स्वामीने अपनी विवाह - संस्कारविधिमें मन्त्र - त्राह्मणका गोभिलगृह्यसूत्रसे दिया है— ' यदेतद् हृदयं तव तदस्तु हृदयं मम । यदिद हृदयं मम तद-स्तु हृदयं तव ' ( पृ. १६८ ) । इस प्रकार विधवाविवाह वा नियोगका मूल ही कट गया । पहले ही कहा जा चुका है कि - ' सोमः प्रथमो ' ' सोमो ददद् ' यह मन्त्र कुमारीकी विवाहविधिमें पढ़े जाते हैं: ( देखो पारस्करगृ. ) अतः विधवामें इनका उपयोग कभी नहीं होता । पता नहीं स्वामी इन मन्त्रोंको स्त्रीके प्रति विवाहितपतिके द्वारा कहलाते हैं, वा नियोगी द्वारा? और ग्यारह पतियोंका सम्बन्ध ही क्या है? २३ वर्ष तक बेचारीको एक पति भी न मिलाः फिर तो पतियोंकी बाढ़ आ गई । इनके वर्षोंका हिसाब क्या होगा? यह सन्तानार्थ होंगे, वा कामास्वादार्थ? सन्तानकी प्रतीक्षाक अवधि कितने - कितने वर्ष तक करनी पड़ेगी? । यदि पतिके भरनेपर दूसरा पति अभिमत है; तो अग्निके द्वारा दूसरे वरको दान ही कैसे हो सकेगा; क्योंकि -पूर्वमन्त्रोंसे प्रथम पतिको देनेके अवसर पर अग्निका पतित्व हट जाता है; अब उसे दूसरेको देनेका अधिकार है नहीं; क्योंकि अपने स्वत्व-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५८८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) को हटाकर दूसरेके स्वत्वको कर देनेका ही नाम ही दान होता है । यही बात मीमांसादर्शनके शाबरभाष्यमें भी कही है-' ददातिरुत्सर्गपूर्वकः परस्वत्वेन सम्बन्धः ( ४/२/२८ ) ' दानमि-त्युच्यते स्वस्वत्वनिवृत्तिः, परस्वत्वापादनं च ' ( मीमां. शाबर-६।७११ ) । तब वह दान तो पूर्व अग्नि द्वारा वरको हो गया. । यह ' रजकस्य वस्त्रं ददाति ' की भान्ति भी दान नहीं है, नहीं तो ' मह्यमिमामददात् ' इस मन्त्र - स्थित चतुर्थीका व्याकोप होता है । विवाह होता है अग्निकर्तृक, वरसम्प्रदानक, और कन्या - कर्मक, स्वतन्त्र नहीं । इस कारण मनुजीने कहा है- ' देव - दत्तां पतिर्भार्यां विन्दते, नेच्छयाऽऽत्मनः ' ( ६६५ ) तो जब अग्निने १२ वर्षमें उस बालाको पुरुषपतिको दान कर दिया, तब वह वाला अब कन्या न रही; इसलिए वेदमें अग्निको कन्याओंका जार ( ' जारः कनीनाम् ' ऋ. ११६६।४ ) कहा है । उस समय अग्निका अपना अधिकार उस स्त्रीमें नहीं रहता; किन्तु उस मनुष्यपतिका ही उसमें अधिकार हो जाता है; तब उस पतिके भरनेपर वह अन्यसे विवाह कैसे कर सकती है; क्योंकि अग्निका अब दूसरेको दानका अधिकार रहा नहीं; कारण- उस अग्निकी १२ वें वर्ष में पतित्वकी निवृत्ति हो जाती है - इस विषयको हम किसी अन्य पुष्पमें स्पष्ट करेंगे । फिर उस पुरुषका अन्य पुरुषको अपनी स्त्रीका देना किसी धर्मपुस्तक में कहा नहीं, इससे सिद्ध है कि - ' विधवा - विवाह ' शब्द ही अशिष्ट है, क्योंकि - धर्मशास्त्रानुसार उसका विवाह ही नहीं हो सकता । CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग वा विधवाविवाह ध [ ५८६ विवाहसे पूर्व ' कन्या ' वा ' कुमारी ' शब्द आता है; तब जिसका विवाह होता है, वह विधवा कैसे हो सकती है, क्योंकि प वह कन्या नहीं होती; पूर्व विवाह होनेपर उसका कन्याभाव नष्ट हो जाता है । यही बात मनुस्मृति ( ८।२२६-२२७ ) में स्पष्ट है । प इससे सिद्ध है कि – ' विवाह ' यह पारिभाषिक पद है, तब छ ' विधवा - विवाह ' यह शब्द कभी प्रयुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि- म धर्मशास्त्रीय- परिभाषा तथा विवाहविधि- प्रतिपादक ' ब्रा मथो इमाम् ' इत्यादि पूर्वप्रोक्त वेद - वचनोंका व्याकोप होता है । और ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ' ( १६६५ ) इस मनुवचनाऽनुसार विवाह - मन्त्रों में कहीं नियोगका वर्णन न होनेसे नियोग भी असिद्ध है । पाठकोंने देख लिया कि नियोग श्रर्थं करके स्वामी द्वारा श्रुतिके साथ कितना वलात्कार किया गया है; और उसकी संगति भी नहीं पड़ती । तव ' सोमः प्रथमो बिविदे ' ‘ सोमो ददद् गन्धर्वाय ' इन मन्त्रोंका नियोग अर्थ मी सिद्ध नहीं । ( ८ ) ' उत यत् पतयो दश स्त्रियाः । अव जो आर्यसमाजी ' उत यत् पतयो दश स्त्रियाः ' इस का वि मन्त्रसे ग्यारह पति अर्थं सिद्ध करते हैं, उसपर विवेचना देन शेष इस विषयको अन्य पुष्पोंके लिए रखकर यह विषय उपसंहृत हो, इस किया जावेगा -सम्पूर्ण मन्त्र यह है- ' उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वं अब्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद् हस्तमग्रभीत् स एव पतिरेकधा ' ( छ. हम ५।१७१८ ) इसका सीधा अर्थ तो यह है कि - स्त्रीके जो पाणिग्रहण-Gujarat. An eGangotri Initiative