अग्नि पुराण — पृष्ठ 1011–1020

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 1011–1020

पृष्ठ 1011

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चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः १००७ अथ चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः रुद्रशान्तिः ईश्वर रुवाच शिवशान्तिं प्रवक्ष्यामि कल्पाघोरप्रपूर्वकम् ॥ सप्तकोट्यधिपो घोरा ( रो ) ब्रह्महत्याद्यघार्दनः ॥१ ॥

उत्तमाधमसिद्धीनामालयोऽखिलरोगनुत् । दिव्यान्तरी ( रि ) क्ष भौमानामुत्पातानां विमर्दनः ॥२ ॥

विषग्रहपिशाचानां ग्रसनः सर्वकामकृत् । प्रायश्चित्तमघो ( घौ ) घार्तौ दौर्भाग्यार्तिविनाशनम् ॥३ ॥

एकवीरं तु विन्यस्य ध्येयः पञ्चमुखः सदा । शान्तिके पौष्टिके शुक्लो रक्तो वश्येऽथ पीतकः ॥४ ॥

स्तम्भने धूम्र उच्चाटमारणे कृष्णवर्णकः । कर्षणे कपिलो मोहे द्वात्रिंशद्वर्णमर्चयेत् ॥५ ॥

त्रिंशल्लक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः ॥ ' गुग्गुलघृतयुक्तेन सिद्धे सिद्धार्थसर्वकृत् ॥६ ॥

अघोरान्नापरो मन्त्रो विद्यते भुक्तिमुक्तिकृत् । अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी अस्नातः स्नातको भवेत् ॥७ ॥

अघोरास्त्रमघोरस्तु द्वाविमौ मंत्रराजकौ । जपहोमार्चनाद्युद्धे शत्रुसैन्यं विमर्दयेत् ॥८ ॥

रुद्रशान्तिं प्रवक्ष्यामि शिवां सर्वार्थसाधनीम् । पुत्रार्थं ग्रहनाशार्थं विषव्याधिविनष्टये ॥९ ॥

दुर्भिक्षमारीशान्त्यर्थं दुःस्वप्नं हरणाय च । बलादिराज्यप्राप्त्यर्थं रिपूणां नाशनाय च ॥१० ॥

अध्याय ३२४ रुद्रशान्ति कथन महेश्वर बोले- अब मैं अघोर कल्प के साथ शिव - शान्ति का वर्णन करूँगा । वह घोर ( अथवा अघोर ) कल्प सात अस्त्रों का स्वामी, ब्रह्म - हत्यादि पापों का नाशक, उत्तम और अधम नामक सिद्धियों का आगार, सम्पूर्ण रोगों को दूर करनेवाला, द्युलोक, अन्तरिक्ष और भूलोक के उत्पातों का संहारक, विष, ग्रह और पिशाचों का भक्षक, सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला, पाप - पुञ्जका प्रायश्चित्त और दुर्भाग्य रूप दुःखों का विनाशक है ॥१-३ ॥ एकवीर का न्यास करके सदा पञ्चमुख ( देवता ) का ध्यान करना चाहिए । शान्ति और पुष्टिकर्मों में क्रमशः उसके शुक्ल और रक्तवर्णों का, वशीकरण में पीत वर्ण का, स्तम्भन में धूम्रवर्ण का, उच्चाटन और मारण में कृष्णवर्ण का, ( किसी को अपनी ओर ) आकृष्ट करने में कपिलवर्ण का और मोहन में बत्तीस वर्गों का पूजन करना चाहिए । इस मन्त्र का तीस लाख बार जप करना चाहिए और तीन लाख मन्त्रों से आहुतियाँ देनी चाहिए । गुग्गुल और घृत से इस मन्त्र की सिद्धि करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं । अघोर मन्त्र से बढ़कर भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला कोई ऐसा मन्त्र है ही नहीं । इससे अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी और अस्नातक स्नातक हो जाता है । अघोरास्त्र और अघोर ये दोनों मन्त्र मन्त्रराज हैं । इनके जप, हवन और पूजन से शत्रु की सेना का विनाश हो जाता है ॥४-८ ॥ अब मैं रुद्रशान्ति का वर्णन करूँगा जो कि कल्याणकारिणी और सभी अभीष्टों को सिद्ध करानेवाली है । यह मन्त्र पुत्र - प्राप्ति, ग्रह-शान्ति, विष - व्याधिविनाश, दुर्भिक्ष और महामारी की शान्ति, दुःस्वप्नहरण, बल तथा राज्य आदि की प्राप्ति, शत्रुओं १ क. ङ. गुग्गुलं घृतसंयुक्तं सि । २ छ. सिद्धोऽसिद्धोऽर्थ ' । ३ क. ङ. ' ज्यसिद्ध्यर्थं । CI - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1012

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१००८ अग्निपुराणम्

फलिते वृक्षे सर्वग्रहविमर्दने । पूजने तु नमस्कारः ' स्वाहान्ते हवनं तथा ॥ ११ ॥

अका आप्यायने वषट्कारं पुष्टौ वौषण्नियोजयेत् । चकारद्वितयस्थाने जातियोगं तु कारयेत् ॥ १२ ॥

ॐ रुद्राय ' ठ, ॐ वृषभाय नमोऽविमुक्तायासंभवाय ' ' पुरुषाय पञ्चपूज्याय ईशपुत्रे ' ' पौरुषे ' पञ्चपञ्चोत्तरे विश्वरूपाय करालाय विकृतरूपाय, ( अविकृतरूपाय ) " निकृतौ चापरे काले अप्सु माया च नैर्ऋते एक पिङ्गलाय श्वेतपिङ्गलाय " कृष्णपिङ्गलाय नमः मधुपिङ्गलाय " नियतावनन्तायाऽऽर्द्राय शुष्काय पयोगणाय कालतत्त्वे करालाय मायातत्त्वे सहस्रशीर्षाय सहस्रवक्त्राय सहस्रकरचरणाय " सहस्रलिङ्गाय विद्यातत्त्वे सहस्त्राक्षाद्विन्यसेद्दक्षिणे दले एकजटाय द्विजटाय त्रिजटाय स्वाहाकाराय स्वधाकाराय वषट्काराय षड्द्राय ईशतत्त्वे तु वह्निपत्रे स्थिता गुह " भूपतये " " पशुपतये उमापतये कालाधिपतये सदाशिवाख्यतत्त्वे षट् पूज्याः पूर्वदले स्थिताः ॥१३ ॥

॥१४ ॥

॥१५ ॥

विकरालाय द्वौ ॥१६ ॥

॥१७ ॥

॥१८ ॥

॥१९ ॥

॥२० ॥

॥२१ ॥

" उमायैकरूपधारिणि, ॐ २० ' कुरु कुरुरुहिणि रुहिणि रुद्रोऽसि देवानां देव देव विशाख हन हन दह दह पच पच मथ मथ ” तुरु तुरु, अरु अरु मुरु मुरु रुद्रशान्तिमनुस्मर कृष्ण - पिङ्गल ३ अकाल-पिशाचाधिपतिविश्वेश्वराय नमः ॥२२ ॥

शिवतत्त्वे कर्णिकायां पूज्यौ मामहेश्वरौ ॥२३ ॥

के नाश, असमय में फले हुए वृक्ष और सभी ग्रहों के नाश के लिए होता है । इसके पूजन में नमस्कार तथा हवन में स्वाहा का प्रयोग करना चाहिए । इसी प्रकार आप्यायन में वषट्कार और पुष्टि ( के लिए किये गये कर्म ) में वौषट् का प्रयोग करना चाहिए । चकार का प्रयोग द्वितीय स्थान में करना चाहिए ॥ ९ - १२ ॥ ' ॐ रुद्राय ठ, ' सहस्रलिङ्गाय ' - इस मन्त्र से विद्यातत्त्व ( रूप कमल के ) दक्षिण दल पर सूर्य का आवाहन करना चाहिए ॥१३-१७ ॥ ‘ एकजटायषद्राय अये गुह ' ये सात विशेषण आकाश में रहनेवाले शिव के हैं । इन नामों को सम्बोधित करते हुए मन्त्र के साथ सदाशिव देवता से युक्त कमल के पूर्वी दल के ऊपर इन मन्त्रों से आहुतियाँ देनी चाहिए । ' भूपतये ‘ कालाधिपतये ' ॥१८-२० ॥ शिवतत्त्व रूप कर्णिका के ऊपर उमा और महेश्वर का पूजन इस मन्त्र से करना चाहिए - ' उमायैकरूपधारिणी, ॐ कुरु कुरु विश्वेश्वराय नमः ' । शिवतत्त्व रूपी कमल के आकाशवर्ती दल १ क. ङ. ' हान्तो हवने मनुः । आ । छ. हान्तो हवने तथा । आ ' । २ ख. ' त् । ओंका ' । क. ङ. ' त् । दका ' । ३ ग. यातियोगं । ४ क. ङ. ° य नमः, ॐ । छ. ' य च चे ॐ । ५ क. ङ. क्ताय ' सं ' । ६ क. ङ. ' य च सूर्याय । छ. ' य च पू ' । ७ ख. ईशपत्रे । छ. ईशानाय । ८ छ. पौरुषाय । ९ ' ञ्च चोत्त ' । १० ' अविकृतरूपाय ' नास्ति क. ख. ग. ङ. पुस्तकेषु । ११ क. ङ. च. नियतौ । १२ क. ङ. हृष्टपिङ्गलाय । १३ छ. ' मः । मधुपिङ्गलाय नमः, म । १४ ख. ग. निपतिताय । १५ क. ङ. सहस्रकिरणाय । १६ क. ङ. भूतपतये । १७ ख. ' ये भूतपतये महाभूतपतये प ' । १८ ' पशुपतये कालाधिपतये ' नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । १ ९ छ. ‘ यै कुरू । २० ख. ग. च. ॐ तुरु तुरु । २१ ख. ग. व्थ तुर तुर, अ ' । २२ ख. ग. रु स्वरु स्वरु रु ' । २३ क. ख. ङ. च. ' ल का ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1013

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चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०० ९ ॐ व्योमव्यापिने व्योमरूपाय सर्वव्यापिने ' शिवायानन्ताय नाथायानाश्रिताय शिवाय शिवतत्त्वे नव पदानि व्योमव्याप्यभिधास्य हि ॥२४ ॥

शाश्वताय योगपीठसंस्थिताय नित्ययोगिने ध्यानाहाराय नमः । ॐ नमः शिवाय ' सर्वप्रभवे शिवाय, ईशानमूर्धाय ' तत्पुरुषाय ' पञ्चवक्त्राय ॥२५ ॥

नवपदं पूर्वदले सदाख्ये पूजयेद्गुह ॥२६ ॥

अघोरहृदयाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये । ॐ नमो नमः । गुह्यातिगुह्याय गोप्त्रेऽनिधनाय सर्वयोगाधिकृताय ' ज्योतीरूपायाग्निपत्रे " हीशतत्त्वे " विद्यातत्त्वे तु गम्यते परमेश्वराय

अचेतनाचेतन " व्योमनव्यापिन ( न् ) " अरूपिन् । " प्रथम तेजस्तेजः ॥२७ ॥

मायातत्त्वे नैर्ऋते तु कालतत्त्वेऽथ वारुणे. ॥२८ ॥

ॐ धृ धृ १७ नाना वां वामनिधन " निधनोद्भव शिव सर्व परमात्मन् । महादेव सद्भावेश्वर महातेजयोगाधिपते मुञ्च मुञ्च प्रथम प्रथम, ॐ सर्व सर्व, ॐ भव भव, ॐ भवोद्भव सर्वभूतसुखप्रद वायुपुत्रेऽथ नियतौ पुरुषे चोत्तरे नव ॥२९ ॥

सर्वसांनिध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रप " रानर्चितास्तुत " स्तुत साक्षिण साक्षिण ` तुरु तुरु पतङ्ग पतङ्ग २२ पिङ्गपिङ्ग २४ ज्ञान ज्ञान शब्द शब्द सूक्ष्म सूक्ष्म शिव शिव " सर्वप्रद सर्वप्रद, ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो नमः शिवाय, ॐ नमो नमः ॥३० ॥

ईशाने प्राकृते तत्त्वे पूजयेज्जुहुयाज्जपेत् । “ ग्रहरोगादिमायार्तिशमनी सर्वसिद्धिकृत् ॥३१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये रुद्रशांतिविधानकथनं नाम चतुर्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२४ ॥

के ऊपर नव पदों का उच्चारण करना चाहिए । उसका मन्त्र यह है- " ॐ व्योमव्यापिने ` शिवाय ॥२१-२४ ॥ अये गुह! सद नामक पूर्वदल के ऊपर नवपदोंवाले इस मन्त्र से पूजन करना चाहिए- ' शाश्वताय ' पंचवक्त्राय ॥२५-२६ ॥ मायातत्त्व दक्षिण - पश्चिम और कालतत्त्व पश्चिम दल के ऊपर इस मन्त्र से पूजन करना चाहिए, ‘ अघोरहृदयाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये ' । ॐ नमो नमः प्रथम तेजस्तेजः ॥२७ ॥ उत्तर - पश्चिम कोण के दल के ऊपर नियति

के लिए और उत्तरवर्ती दल के ऊपर पुरुष के लिए नव बार इस मन्त्र से पूजन करना चाहिए- ॐ धृ धृ नाना ं सर्वभूतसुखप्रद ' । उत्तर- -पूर्व की ओर स्थित प्राकृत तत्त्व नामक दल के ऊपर पूजन, यजन और जप करना चाहिए । इसके लिए यह मन्त्र है - ' सर्वसान्निध्यकर.. ॐ नमो नमः ' । यह विद्या, ग्रह, रोग, माया और दुःख का विनाश करनेवाली तथा सिद्धियों को देनेवाली है ॥२८-३१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में रुद्रशान्ति - विधान - कथन नामक तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२४ ॥

१ छ. ' न्तायाना ' । २ ' नाथायानाश्रिताय ' इदं पदं नास्ति ख. ग. पुस्तकयोः । ३ ख. ग. ' न तब । ४ ' नमः ' इति पदं नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ५ ख. ग. ' र्वभावशि । ६ ख. ग. ' रुषव ' । ७ छ. षादिप ' । ८ ख. ग. ॐ नमः । ९ क. ङ. ' ज्योतिरू ' । १० छ. ‘ त्रे हौमत ' । ११ छ. ' धात्वे द्वे याम्यने प ° । १२ ख. ग. तु यास्यगोप । १३ छ. ' य चे ' । १४ क. ङ. व्योमन् । १५ क. ङ. व्यापिन् । छ. व्यापिने । १६ छ. प्रथम । १७ क. ङ. घ. ॐ नाना ॐ वा । १८ क. ङ. छ. ' निधान । १ ९ छ. प्रमथ, प्रमथ ॐ । २० ख. ग. ' पदान ' । २१ ख. ग. ' त सा । २२ ख. ग. तरु । २३ क. ङ. ' पिंग पिंग ' इति पदद्वयं नास्ति ख. ग. च. पुस्तकेषु । २ ४ ' ज्ञान ज्ञान ' इति पदद्वयं नास्ति क. ङ. पुस्तकयोः । २५ क. ङ. सर्वद । ख. ग. पद । २६ क. ङ. च. गारिमा । ६४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1014

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१०१० अग्निपुराणम् अथ पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः अंशकादिः ईश्वर उवाच

रुद्राक्षकटकं धार्यं विषमं सुसमं दृढम् । एकत्रिपञ्चवदनं यथालाभं तु धारयेत् ॥ १ ॥

द्विचतुःषण्मुखं शस्तमवणं तीव्रकण्टकम् । दक्षबाहौ शिखादौ च धारयेच्चतुराननम् ॥ २ ॥

अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी अस्नातः स्नातको भवेत् । ( हैमी वा मुद्रिका धार्या शिवमन्त्रेण चाऽऽर्च्य तु || ३ || शिवः शिखा तथा ज्योतिः सावित्रश्चेति गोचराः ) । गोचरं तु कुलं ज्ञेयं तेन लक्ष्यस्तु दीक्षितः || ४ || प्राजापत्यो महीपालः कापोतो ग्रन्थिकः शिवे । कुटिकाश्चैव वेतालाः पद्महंसाः शिखाकुले || ५ || धृतराष्ट्रा बकाः काका गोपाला ज्योतिसंज्ञके । कुटिका ' साठराश्चैव गुटिका ' दण्डिनोऽपरे ॥ ६ ॥

सावित्री गोचरे चैवमेकैकस्तु चतुर्विधः । सिद्धाद्यंशकमाख्यास्ये येन मन्त्रः सुसिद्धिदः | ७ || भूमौ तु मातृका लेख्याः ' कूटयन्त्रविवर्जिताः । मंत्राक्षराणि विश्लिष्य अनुस्वारं नयेत्पृथक् ॥८ ॥

अध्याय ३२५ अंशकादि - कथन महेश्वर बोले - विषम संख्यावाले समतल और दृढ़ रुद्राक्षों के कङ्कण को धारण करना चाहिए । रुद्राक्ष एक, तीन और पाँच मुखवाले होने चाहिए । अथवा जिस प्रकार के रुद्राक्ष प्राप्त हो सकें उन्हें ही धारण करना चाहिए । दो, चार और छह मुखवाले, व्रणरहित और तीव्र कण्टकों से युक्त रुद्राक्ष श्रेष्ठ माने गये हैं । चार मुखोंवाले रुद्राक्ष को दाहिनी भुजा में और शिखा आदि के ऊपर धारण करना चाहिए । ऐसा करने से अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी और अस्नातक स्नातक बन जाता है अथवा शिव मन्त्र से अभिमन्त्रित की हुई स्वर्ण - मुद्रिका भी धारण की जा सकती है ॥१-३ ॥ रुद्राक्ष के चार गोचर होते हैं - शिव, शिखा, ज्योति और सावित्र । गोचर का अभिप्राय है कुल । उसके एक लाख जप से मनुष्य दीक्षित हो जाता है । शिव कुल में आनेवाले रुद्राक्ष के भेद हैं - प्राजापत्य, महीपाल, कापोत और ग्रन्थिक । शिखाकुल के रुद्राक्ष हैं - कुटिका, बेताल और पद्महंस । ज्योति नामक कुल के अन्तर्गत हैं- धृतराष्ट्र, बक, काक और गोपाल । सावित्र कुल के रुद्राक्षों के नाम हैं - कुटिका, साठर, गुटिका और दण्डिन् । इनमें से एक - एक रुद्राक्ष के चार - चार भेद हो जाते हैं । अब मैं सिद्धि आदि अंशक का वर्णन करूँगा, जिससे मन्त्र शुभ सिद्धि प्रदान करनेवाला हो जाता है ॥४-७ ॥ कूट मन्त्रों को छोड़कर अन्य सभी मातृक वर्णों को भूमि के ऊपर लिखना चाहिए । मन्त्राक्षरों को अलग - अलग करके अनुस्वारों १ क. ङ. ' येदनुवासरम् । २ " हैमी वा ' ' इत्यत्र पाठोऽयं दृश्यते क. ङ. पुस्तकयोः- " हैमी धार्याऽसिमन्त्रेण वाच्यं तु शिरसः शिखा । तथा ज्योति समावित्रः सावित्रश्चेति गोचरा इति । ३ क. ङ. शिवाकु ' । ४ छ. सागरश्चै ' । ५ ख. ग. ' ण्डिनौ प ' । ६ छ. ' टषण्डवि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1015

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पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः साधकस्य तु या संज्ञा तस्या विश्लेषणं चरेत् सिद्धःसाध्यः सुसिद्धोऽरिः संज्ञातो गणयेत्क्रमात् सिद्धादिश्चान्तसिद्धिश्च तत्क्षणादेव सिध्यति अरिमादौ तथाऽन्ते च दूरतः परिवर्जयेत् आदौ सिद्धः स्थितो मन्त्रस्तदन्ते तद्वदेव हि मायाप्रसादप्रणवेनां * शकाख्यातमंत्रके रुद्रांशकों " बली वीर इन्द्रांशश्चेश्वरप्रियः गन्धर्वांशोऽतिगीतादिभीमांशो राक्षसांशकः पिशाचांशो मलाक्रान्तो मंत्रं दद्यान्निरीक्ष्य च बाला विंशाक्षरान्ता च'१ रुद्रा द्वाविंशगायुधा अकारादिहकारान्ताः क्रमात्पक्षौ सितासितौ ह्रस्वा शुक्ला दीर्घाः श्यामास्तिथयः प्रतिपन्मुखाः १०११ । मंत्रस्याऽऽदौ तथा चान्ते साधकार्णानि ' योजयेत् ॥९ ॥

। मंत्रस्याऽऽदौ तथा चान्ते सिद्धिदः स्याच्छतांशतः ॥१० ॥

। सुसिद्धादिः सुसिद्धान्तः सिद्धवत्परिकल्पयेत् ॥११ ॥

। ` सिद्धः सुसिद्धश्चैकार्थे अरिः साध्यस्तथैव च ॥१२ ॥

। मध्ये रिपुसहस्त्राणि न दोषाय भवन्ति हि ॥१३ ॥

। ब्रह्मांशको ब्रह्मविद्या विष्ण्वङ्गो वैष्णवः स्मृतः ॥१४ ॥

। ' नागांशो ' नागस्तत्त्वाक्षो " यक्षांशी भूषणप्रियः ॥१५ ॥

। दैत्यांशः स्याद्युद्धक श्रीर्मानी विद्याधरांशकः ॥१६ ॥

। मंत्र एकात्फडन्तः स्याद्विद्या पञ्चशतावधि ॥ १७ ॥ तत ऊर्ध्वं तु ये मन्त्रा वृद्धा यावच्छतत्रयम् ॥१८ ॥

। अनुस्वारविसर्गेण विना चैव स्वरा दश ॥ १ ९ ॥ । उदिते शान्तिकादीनि भ्रमिते १२ वश्यकादिकम् ॥ २० ॥

को भी उनसे अलग - अलग कर देना चाहिए । उसी प्रकार साधक के नाम के अक्षरों को भी अलग - अलग करके मन्त्र के आदि और अन्त में इन नामाक्षरों का प्रयोग करना चाहिए । मन्त्राक्षरों और ( साधक के ) नामाक्षरों को सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध और अरि इस क्रम से गिनना चाहिए । इनमें से एक भी अपने शतांश से मन्त्र के आदि और अन्त में प्रयुक्त होने से सिद्धिदायक हुआ करता है ॥८-१० ॥ सिद्धादि और सिद्धान्त मन्त्र तत्काल सिद्धि प्रदान करता है । सुसिद्धादि और सुसिद्धान्त भी सिद्धवत् ही समझना चाहिए । मन्त्र के आदि और अन्त में ' अरि ' का वर्जन करना चाहिए । सिद्ध और सुसिद्ध मन्त्रों को समान फल के लिए प्रयुक्त करना चाहिए । मन्त्रादि और मन्त्रान्त में सिद्धमन्त्र रहने से तथा बीच में हजारों अरि मन्त्र रहने से ( भी ) कोई दोष नहीं होता है । माया, प्रसाद और प्रणव नामक मन्त्र भी अंशक मन्त्रों के अन्तर्गत आते हैं । ब्रह्मविद्या, ब्रह्मांश और वैष्णव मन्त्र विष्णु अङ्गवाला कहा गया है । रुद्र मन्त्रों को वीर कहते हैं । इन्द्रांश मन्त्र ईश्वर को प्रिय होते हैं । नागांश मन्त्र सर्पों को प्रभावित करते हैं और यक्षांश मन्त्र आभूषण-प्रिय होते हैं ॥११-१५ ॥ गन्धर्वांश मन्त्रों से गीत आदि में कटुता आती है और राक्षसांशक मन्त्र भय को उत्पन्न करनेवाला है । दैत्यांश मन्त्र युद्ध में ऐश्वर्यं प्रदान करनेवाला और विद्याधरांशक मन्त्र मान बढ़ानेवाला है । पिशाचांश नामक मन्त्र मलाक्रान्त हुआ करता है अतः यह मन्त्र देखभाल करके देना चाहिए । फट् से अन्त होनेवाले मन्त्र से पचास प्रकार की विद्याएँ उत्पन्न होती हैं । बाला विद्या में बीस अक्षर और रुद्र मन्त्र में इक्कीस अक्षर होते हैं । उनके बाद के मन्त्रों में अक्षरों की संख्या बढ़ती ही जाती है और वे तीन सौ तक हो जाते हैं ॥१६-१८ ॥ अकार से लेकर हकार तक ( सभी वर्ण ) क्रमशः शुक्ल और कृष्ण पक्षों के प्रतीक हैं । अनुस्वार और विसर्ग को छोड़कर दस स्वर होते हैं । इनमें से ह्रस्व स्वर प्रतिपदा से प्रारम्भ होनेवाली शुक्लपक्ष की तिथियों के और दीर्घ स्वर कृष्णपक्ष की तिथियों के प्रतीक १ छ. याजयेत् । २ ख. ग. " द्धः स्वसि । ३ क. ङ. ' देद्बहिः । म ' । ४ क. ङ. नाङ्गकस्याङ्गम । ५ क. ङ. विष्णवंशो । ६ छ. ॰को भवेद्वीर । ७ क. ङ. च. व्रती । ८ क. ङ. नागाङ्गो । ९ क. ङ. ' गस्तद्वक्षो । १० क. ङ. ' क्षाङ्गो भू । ११ क. ङ. च. च रन्ध्राद्वात्रिंशतायु ' । ख. च. च वर्णा द्वा । १२ क. ङ. वशका । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1016

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१०१२ अग्निपुराणम् ' भ्रामिते ` सन्ध्यया द्वेषोच्चाटने स्तम्भनेऽस्तकम् । इडावाहे शान्तिकाद्यं पिङ्गले कर्षणादिकम् ॥२१ ॥

मरणोच्चाटनादीनि विषुवे पञ्चधा पृथक् । अधरस्य गृहे पृथ्वी ऊर्ध्वं तेजोऽन्तरा द्रवः ॥ २२ ॥

रन्ध्रपार्श्वे बहिर्वायुः सर्वं व्याप्य महेश्वरः । स्तम्भनं पार्थिवे शान्तिर्जले वश्यादि तेजसे । वायौ स्याद्भ्रमणं शून्ये पुण्यं कालं समभ्यसेत् ॥२३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽशकादिकथनं नाम पञ्चविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२५ ॥

अथ षड्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः गौर्यादिपूजा ईश्वर उवाच सौभाग्यादेरुमापूजां वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदाम् । मंत्रध्यानं मण्डलं च मुद्रां होमादिसाधनम् ॥१ ॥

चित्रभानुं शिवं कालं महाशक्तिसमन्वितम् । इडाद्यं परतोद्धृत्य सदेवं सविकारणम् ॥२ ॥

द्वितीयं द्वारकाक्रान्तं गौरीगतिपदान्वितम् । चतुर्थ्यन्तं प्रकर्तव्यं गौर्या वै मूलवाचकम् ॥३ ॥

हैं । शान्ति आदि के लिए किये जानेवाले कर्म उदित वर्णों से करना चाहिए । शान्ति आदि कर्मों को उस समय करना चाहिए जब साधक की इड़ा नाड़ी में रक्त प्रवाह हो रहा हो, आकर्षण आदि कर्म तब करना चाहिए जब रक्त प्रवाह पृथक्-पृथक् पाँच प्रकार के विषुव नाड़ी में हो रहा हो । अधोभाग से श्वास चलने पर पृथ्वी तत्त्व ( नासिका के ) ऊर्ध्व भाग से श्वास चलने पर तेजस् तत्त्व और इन दोनों के श्वास चलने पर द्रव तत्त्व की प्रधानता समझनी चाहिए । बाहर निकलते समय वायु ( नासा ) रन्ध्र के पार्श्व भाग से जिस प्रकार स्पर्श करती है उसी से उसकी गति समझी जाती है । महेश्वर सभी प्रकार की वायु में व्याप्त रहता है । पार्थिव तत्त्व की प्रधानता के समय स्तम्भन, जल - तत्त्व की प्रधानता के समय शान्ति और तेजस्तत्त्व की प्रधानता होने पर वशीकरण आदि कर्मों को करना चाहिए । इसी प्रकार वायु तत्त्व की प्रधानता होने पर ( शत्रु के लिए ) भ्रमण कर्म और शून्यावस्था में पुण्यकर्मों का अभ्यास करना चाहिए ॥१९ -२३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अंशकादि - कथन नामक तीन सौ पचीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२५ ॥

अध्याय ३२६ गौर्यादि - पूजा महेश्वर बोले - अब मैं उमा की पूजा का वर्णन करूँगा, जिससे सौभाग्य इत्यादि की प्राप्ति होती है और जो भोग प्रदान करनेवाली है । इसके लिए मैं मन्त्र, ध्यान, मण्डल, मुद्रा और होम आदि के साधक का वर्णन करूँगा । इस मन्त्र के बीज हैं - चित्रभानु, शिव, काल और महाशक्ति । इसे इड़ा से प्रारम्भ करना चाहिए । द्वितीय मन्त्र द्वारकनाम बीज तथा गौरी नाम से युक्त रहता है । इसमें गौरी के नामों का चतुर्थी विभक्ति में प्रयोग करना चाहिए । मूल मन्त्र १ ख. ग. त्रासिते । २ क. ङ. मध्यया । ३ छ. ' प्रीति ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 1017

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षड्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॐ ह्रीं सः शौ ' गौर्यै नमः तत्रार्णत्रितयेनैव जातियुक्तं षडङ्गकम् ऊहकं च तथा कालं शिवबीजं समुद्धरेत् । आसनं प्रणवेनात्र मूर्तिन्यासं हृदाऽऽचरेत् व्यापकं सृष्टिसंयुक्तं वह्निमायाकृशानुभिः गौरीं यजेद्धेमरूप्यां काष्ठजां ' शैलजादिकाम् ललिता सुभगा गौरी क्षोभनी ( णी ) चाग्नितः क्रमात् सपीठे वामभागे तु शिवस्याव्यक्तरूपकम् । ' पीठपद्मद्वयस्था वा द्विभुजा वा चतुर्भुजा " गक्षसूत्रकलिका गलकोत्पलपिण्डिका । वामेन पुस्तताम्बूलदण्डाभयकमंडलुम् । व्यक्ताव्यक्ताऽथ वा कार्या ' पद्ममुद्रा स्मृताऽऽसने । यह है- “ ॐ ह्रीं सः शौ गौर्यै नमः ' । तीन अक्षरों से १०१३ 11811 ॥ आसनं प्रणवेनैव मूर्ति वै हृदयेन तु ॥ ५ ॥

प्राणे दीर्घस्वराक्रान्तं षडङ्गं " जातिसंयुतम् ॥ ६ ॥

। यामलं कथितं वत्स एकवीरं वदाम्यथ ॥७ ॥

। शिवशक्तिमयं बीजं हृदयादिविवर्जितम् ॥८ ॥

। पञ्चपिण्डां तथाऽव्यक्तां कोणे मध्ये तु पञ्चमम् ॥९ ॥

। वामा ज्येष्ठा क्रिया ज्ञाना वृत्ते पूर्वादितो यजेत् ॥१० ॥

व्यक्ता द्विनेत्रा त्र्यक्षा वा शुद्धा वा शंकरान्विता ॥ ११ ॥

। सिंहस्था वा वृकस्था वा अष्टाष्टादशसत्कराः ॥१२ ॥

शरं धनुर्वा सव्येन पाणिनाऽन्यतम् महत् ॥१३ ॥

गणेशं दर्पणेष्वासान्दद्यादेकैकशः क्रमात् ॥ १४ ॥

लिङ्गमुद्रा शिवस्योक्ता ' मुद्रा चाऽऽवाहिनी द्वयोः ॥१५ ॥

युक्त न्यास तथा प्रणव मन्त्र के द्वारा ( गौरी के लिए ) आसन और हृदय मन्त्र से मूर्ति की उपकल्पना करनी चाहिए ॥१-५ ॥ ' ॐ ' कालबीज तथा शिवबीज का उद्धार करे । दीर्घस्वर से आक्रान्त प्राण - ' यां यीं ' इत्यादि से जातियुक्त षडङ्गन्यास करे । प्रणव से आसन तथा हृदय मन्त्र से मूर्तिन्यास करे । यह मैंने ' यामल मन्त्र ' कहा है । अब ' एकवीर ' का वर्णन करता हूँ । सृष्टिन्यास से युक्त व्यापक न्यास अग्नि, माया तथा कृशानु द्वारा करे । शिव शक्तिमय बीज हृदयादि से वर्जित है । गौरी की सोने, चाँदी, लकड़ी अथवा पत्थर आदि की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे । अथवा पाँच पिण्डीवाली मृण्मयी प्रतिमा बनाये । चारों कोणों में अव्यक्त प्रतिमा रहे और मध्य भाग में पाँचवीं व्यक्त प्रतिमा स्थापित करे । आवरण - देवताओं के रूप में क्रमशः ललिता आदि शक्तियों की पूजा करनी चाहिए । पहले वृत्ताकार अष्टदल कमल बनाकर आग्नेय आदि कोणवर्ती दलों में क्रमशः ललिता, सुभगा, गौरी और क्षोभणी की पूजा करे । फिर पूर्वादि दलों में वामा, ज्येष्ठा, क्रिया और ज्ञाना का यजन करे ॥६-१० ॥ शिव के अव्यक्त रूप का पूजन देवी के पीठासन के वाम भाग में करना चाहिए । देवी की कल्पना दो अथवा तीन नेत्रों से युक्त शुद्ध अथवा शंकर के साथ दो पद्मों के पीठ के ऊपर दो या चार भुजाओंवाली सिंहस्थ अथवा वृकस्थ, आठ अथवा अट्ठारह हाथोंवाली माला, रुद्राक्ष, यज्ञोपवीत, मणि - विशेष से युक्त एक बायें हाथ में धनुष अथवा बाण से युक्त, दूसरे बायें हाथ में पुस्तक, ताम्बूल, दण्ड, अभय मुद्रा और कमण्डलु से युक्त करनी चाहिए । क्रमशः दर्पणों में गणेश की कल्पना करनी चाहिए ॥११-१४ ॥ आसन के ऊपर पद्ममुद्रावाली व्यक्त अथवा अव्यक्त देवी का स्मरण करना चाहिए । शिव की मुद्रा लिङ्गमुद्रा कही गयी है और दोनों की मुद्रा आहवनीय मुद्रा १ ‘ “ गौर्यै नमः ” इतिपद ° नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । २ छ. ' डङ्गुलम् । ३ क. ख. ग. ङ. ' र्घसुरा ' । ४ क. ङ. जातसंयुगम् । ५ ख. ग. कांस्यजां । क. ङ. कोष्ठजां । ६ ख. ग. ' यस्तारा द्वि । ७ क. ख. ङ. ' का शलाको । ८ क. ङ. ' द्रा स्थिताऽऽ ° । ९ “ मुद्रयाऽऽवाहनं " तयोः इत्यपि क्वचित्पाठः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१०१४ अग्निपुराणम् शक्तिमुद्रा तु योन्याख्या चतुरस्त्रं तु मण्डलम् ॥ त्र्यस्त्रार्थे चार्धचन्द्रं तु द्विपदं द्विगुणं क्रमात् । द्वारत्रयं त्रयं दिक्षु अथ वा भद्रके यजेत् । रक्तपुष्पाणि देयानि पूजयित्वा द्युदङ्मुखः । बलिं दत्त्वा कुमारींश्च ` तिस्त्रो वा चाष्ट भोजयेत् । कन्यार्थी लभते कन्यामपुत्रः पुत्रमाप्नुयात् । अष्टलक्षैश्च वाक्सिद्धिर्देवाद्या वशमाप्नुयुः । अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तृतीयायां विशेषतः । " हूयमानं च प्रणवो मूर्तिरौजूंस ईदृशम् । होमयेत्क्षीरदूर्वाज्यममृतां च पुनर्नवाम् चतुर्मुखं चतुर्बाहुं द्वाभ्यां च कलशं दधत् आरोग्यैश्वर्यदीर्घायुरौषधं मन्त्रितं शुभम् चतुर्हस्तं त्रिपत्राब्जं मध्यकोष्ठचतुष्टये ॥ ॥१६ १६ ॥ ॥ द्विपदं द्वारकण्ठं तु द्विगुणादुपकण्ठतः ॥ १७ ॥

स्थण्डिले वाऽथ संस्थाप्य पञ्चगव्यामृतादिना ॥१८ ॥

शतं हुत्वा घृताद्यं च पूर्णादः सर्वसिद्धिभाक् ॥१९ ॥

नैवेद्यं शिवभक्तेषु दद्यान्न स्वयमाचरेत् ॥२० ॥

दुर्भगा चैव सौभाग्यं राजा राज्यं जयं रणे ॥ २१ ॥

अनिवेद्य न चाश्नीयाद्वामहस्तेन चार्चयेत् ॥ २२ ॥

मृत्युंजयार्चनं वक्ष्ये पूजयेत्कलशोदरे ॥ २३ ॥

मूलं च वौषडन्तेन कुम्भमुद्रां प्रदर्शयेत् ॥ २४ ॥

। पायसं च पुरोडाशमयुतं तु जपेन्मनुम् ॥२५ ॥

। वरदाभयकं द्वाभ्यां स्नायाद्वै कुम्भमुद्रया ॥ २६ ॥

। अपमृत्युहरो ध्यातः पूजितो " ह्यत एव सः ॥२७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गौर्यादिपूजावर्णनं नाम षड्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२६ ॥

कही गयी है । शक्ति मुद्रा योनि मुद्रा है । गौरी - पूजन के लिए बनाया गया मण्डल चौकोर होता है । वह चार हाथ का होता है जिसके मध्य के चौखाने में त्रिदल कमल रहा करता है । तीन हाथों के आधे भाग में अर्धचन्द्र की स्थापना करके क्रमशः उसे दुगुना करना चाहिए । उपकण्ठ से दूना द्वारकण्ठ होता है । तीन द्वारों पर तीन दिशाओं में, भद्रासन के ऊपर अथवा स्थण्डिल के ऊपर देवी की स्थापना करके पञ्चगव्यामृतादि से देवी की पूजा करनी चाहिए । घृत इत्यादि से सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति देने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ १५-१९ ॥ तदनन्तर देवी को बलि देकर तीन अथवा आठ कुमारियों को भोजन कराना चाहिए और शिव भक्तों को नैवेद्य बाँटकर स्वयं उसका उपभोग नहीं करना चाहिए । ( इस पूजन में ) कन्याभिलाषी को कन्या तथा पुत्रहीन को पुत्र की प्राप्ति होती है । भाग्यहीन को भाग्य प्राप्त होता है और राजा को राज्य तथा युद्ध में विजय होती है । इस मन्त्र का आठ लाख बार जप करने से वाक्सिद्धि होती है और देवादि वश में हो जाते हैं । बिना देवता को दिये हुए भोजन नहीं करना चाहिए और बायें हाथ से पूजन नहीं करना चाहिए । यह पूजन अष्टमी, चतुर्दशी और तृतीया में विशेष रूप से होता है । अब मैं मृत्युञ्जय पूजन के विषय में बतलाऊँगा जिसे कलश के अन्दर करना चाहिए । मूर्ति का आवाहन करके प्रणव के साथ ' ॐ जूं सः ' मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए । मूल मन्त्र के अन्त में ' वौषट् ' का प्रयोग करना चाहिए और कुम्भमुद्रा का प्रदर्शन करना चाहिए ॥२०-२४ ॥ दूध, दूर्वा, आज्य, अमृत, पुनर्नवा और खीर का हवन करके दस हजार मन्त्रों का जप करना चाहिए । देवता का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए कि उसके चार मुख और चार भुजाएँ हैं, उसने अपनी दो भुजाओं में कलश को धारण कर रखा है और दो भुजाओं को अभय वरदान देने के लिए उठा रखा है । कुम्भमुद्रा में ही स्नान करना चाहिए । इस देवता का मन्त्र आरोग्य, ऐश्वर्य और दीर्घायु के लिए औषधरूप और शुभ हुआ करता है । वह अपमृत्यु का अपहरण करनेवाला है । इसीलिए इस देवता का ध्यान और पूजन किया जाता है ॥२५-२७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गौर्यादिपूजा - वर्णन नामक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२६ ॥

१ ख. “ ष्टयम् । त्र्यौं । २ ख. ग. स्त्रियो । ३ क. ङ. ' न वाऽर्च ' । ४ ख. ग. जूमासनं । क. ङ. युग्मासनं । ५ क. ङ. भुवि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः १०१५ अथ सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः देवालयमाहात्म्यम् ईश्वर उवाच व्रतेश्वरांश्च सत्यादीनिष्ट्वा व्रतसमर्पणम् । अरिष्टशमने शस्तमरिष्टं सूत्रनायकम् ॥१ ॥

हेमरत्नमयं भूत्यै महाशङ्खं च मारणे । ' आप्यायने शंखसूत्रं मौक्तिकं पुत्रवर्धनम् ॥२ ॥

स्फाटिकं भूतिदं कौशं मुक्तिदं रुद्रनेत्रजम् । धात्रीफलप्रमाणेन रुद्राक्षं चोत्तमं ततः ॥ ३ ॥

समेरुं मेरुहीनं वा सूत्रं जप्यं तु मानसम् । अनामाङ्गुष्ठमाक्रम्य जपं भाष्यं तु कारयेत् ॥४ ॥

तर्जन्यङ्गुष्ठमाक्रम्य न मेरुं लङ्घयेज्जपे । प्रमादात्पतिते सूत्रे जप्तव्यं तु शतद्वयम् ॥ ५ ॥

सर्ववाद्यमयी घण्टा तस्या वादनमर्थकृत् । गोशकृन्मूत्रवल्मीकमृत्तिका भस्मवारिभिः ॥६ ॥

वेश्मायतनलिङ्गादेः कार्यमेवं विशोधनम् । स्कन्दों नमः शिवायेति मंत्रः सर्वार्थसाधकः ॥७ ॥

गीत: पञ्चाक्षरो वेदे लोके गीतः षडक्षरः । ओमित्यन्ते स्थितः शंभुर्महार्णे वटबीजवत् || ८ || क्रमान्नमः शिवायेति ईशानाद्यानि वै विदुः । षडक्षरस्य सूत्रस्य भाष्यं विद्याकदम्बकम् ॥९ ॥

अध्याय ३२७ देवालय - माहात्म्य महेश्वर बोले - सत्य इत्यादि व्रतेश्वरों का यजन करके व्रत समर्पण करना चाहिए । यह अनिष्टों को शान्त करने में श्रेष्ठ माना गया है । सोने और रत्नों की बनी हुई माला कल्याण के लिए, ( मरे हुए चाण्डाल के दाँतों से बनी हुई ) महाशंख नाम की माला मारण में, शंखों की बनी हुई माला पुष्टि करने में और मोतियों की माला पुत्रों की वृद्धि करनेवाली होती है । स्फटिक की बनी हुई माला कल्याणप्रद, रुद्राक्ष की माला मुक्तिप्रद और आँवले के बराबर रुद्राक्षों से बनी माला उससे उत्तम मानी गयी है । मानसिक जप में मेरु से युक्त अथवा मेरु से हीन माले का प्रयोग करना चाहिए । माले को अनामिका और अँगूठों से पकड़ना चाहिए ॥१-४ ॥ जप में तर्जनी और अंगुष्ठ से माले को पकड़ना चाहिए किन्तु जप में मेरु का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । यदि प्रमादवश माला ( हाथ से ) गिर जाय तो मन्त्र को दो सौ बार जपना चाहिए । घण्टा सभी वाद्यों से युक्त होता है और उसका बजाना सभी मनोरथों को पूर्ण करता है । घण्टे का शोधन गोबर, गोमूत्र, वल्मीक की मिट्टी, भस्म और घर इत्यादि की मिट्टी से करना चाहिए । हे स्कन्द! ‘ ॐ नमः शिवाय ' मन्त्र सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है ॥५-७ ॥ वेद में यह मन्त्र पाँच अक्षरों में गाया जाता है और लौकिक संस्कृत में उसे छह अक्षरों से युक्त गाना चाहिए । ' ॐ शम्भु ' इत्यादि अक्षर वट बीज के समान होता है । ' नमः शिवाय ' इत्यादि से ही ईशान इत्यादि देवताओं के मंत्रों का ज्ञान होता है । यह षडक्षर सूत्र सभी विद्वाओं का समूह है । ' ॐ नमः शिवाय ' इत्यादि मन्त्र उत्कृष्टतम है, इसी के द्वारा ( शिव ) लिङ्ग का पूजन करना चाहिए क्योंकि लिङ्ग में ही शिव स्थित रहा करते हैं । सभी लोकों में अनुग्रह करनेवाला और १ क. ङ. अघापने । २ क. ङ. ' मात्रेण न । ३ क. ङ. ' हार्थे बहुबी ' । ख. ' हार्थ व ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१०१६ अग्निपुराणम् यदों नमः शिवायेति एतावत्परमं पदम् । अनेन पूजयेल्लिङ्गं लिङ्गे यस्मात्स्थितः शिवः ॥ १० ॥

लोकानां धर्मकामार्थमुक्तिदः । यो न पूजयते लिङ्गं न स धर्मादिभाजनम् ॥११ ॥

अनुग्रहाय भुक्तिमुक्तिर्यावज्जीवमतो यजेत् । वरं प्राणपरित्यागो भुञ्जीतापूज्य नैव तम् ॥१२ ॥

लिङ्गार्चनाद् रुद्रस्य पूजनाद्रुद्रो विष्णुः स्याद्विष्णुपूजनात् । सूर्यः स्यात्सूर्यपूजातः शक्त्यादिः शक्तिपूजनात् ॥१३ ॥

सर्वयज्ञतपोदाने तीर्थे वेदेषु यत्फलम् । तत्फलं कोटिगुणितं स्थाप्य लिङ्गं लभेन्नरः ॥१४ ॥

त्रिसंध्यं योऽर्चयेल्लिङ्गं कृत्वा बिल्वेन पार्थिवम् । शतैकादशिकं यावत्कुलमुद्धृत्य नाकभाक् ॥१५ ॥

भक्त्या वित्तानुसारेण कुर्यात्प्रासादसंचयम् 1 । अल्पे महति वा तुल्यं फलमाढ्यदरिद्रयोः ॥ १६ ॥

भागद्वयं च धर्मार्थं कल्पयेज्जीवनाय च । धनस्य भागमेकं तु अनित्यं जीवितं यतः ॥१७ ॥

त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य देवागारकृदर्थभाक् । मृत्काष्ठेष्टकशैलाद्यैः क्रमात्कोटिगुणं फलम् || १८ || अष्टेष्टकसुरागारकारी स्वर्गमवाप्नुयात् । पांशुना क्राडमानोऽपि देवागारकृदर्थभाक् ॥१९ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये देवालयमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३२७ ॥

धर्म, काम और मोक्ष को देनेवाला लिङ्ग ही है । जो लिङ्ग का पूजन नहीं करता है, वह धर्म इत्यादि का पात्र नहीं होता है ॥८-११ ॥ शिवलिङ्गार्चन से ही भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है अतः जीवनपर्यन्त उसी का पूजन करना चाहिए । प्राणों का परित्याग श्रेष्ठ है किन्तु बिना शिवलिङ्ग के भोजन करना उचित नहीं है । रुद्र का पूजन करने से ( साधक ) रुद्रमय हो जाता है । विष्णु का पूजन करने से वह विष्णु हो जाता है, सूर्यार्चन से सूर्य और शक्ति का पूजन करने से शक्त्यादिमय हो जाता है । सभी प्रकार के यज्ञों, तपों, दानों, तीर्थों और वेदों का जो फल होता है वही फल करोड़ों गुना होकर शिवलिङ्ग की स्थापना करनेवाले मनुष्य को प्राप्त हो जाता है । पार्थिव लिंग की स्थापना करके त्रिकाल सन्ध्याओं में बिल्वपत्र से पूजन करने से ( साधक ) अपने एक सौ ग्यारह पीढ़ियों के साथ स्वर्ग का भागी होता है ॥१२-१५ ॥ अपने धनसंचय के अनुसार भक्तिपूर्वक देवमन्दिर का निर्माण कराना चाहिए । दरिद्र और धनिक को मन्दिर - निर्माण में यथाशक्ति अल्प या अधिक व्यय करने के समान फल मिलता है । संचित धन के दो भाग धर्म कार्य में व्यय करके जीवन - निर्वाह के लिए समभाग रखे, क्योंकि जीवन अनित्य है । देवमन्दिर बनवानेवाला अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति करता है । मिट्टी, लकड़ी, ईंट और पत्थर से मन्दिर निर्माण का क्रमशः करोड़ गुना फल है । आठ ईंटों से भी मन्दिर का निर्माण करनेवाला स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है । क्रीड़ा में धूलि का मन्दिर बनानेवाला भी अभीष्ट मनोरथ को प्राप्त करता है ॥ १६-१९ ॥ श्री अग्निमहापुराण में देवालय - माहात्म्य - वर्णन नामक तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२७ ॥

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